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समाज के तानों के खिलाफ महादलित महिलाओं की तान

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फोटो- कुमारी सीमा

सोना देवी आज भी याद करके सिहर जाती हैं कि कैसे उनके पति ने दाहिने गाल पर बेरहमी से थप्पड़ मारा था, जब उनको पता चला कि उनकी बीवी महादलित बैंड पार्टी में शामिल होकर बाजा बजा रही है. उस थप्पड़ की गूंज आज भी सोना देवी के कानों में गूंज रही है. दरअसल थप्पड़ के जरिए एक पुरुष ने अपनी बीवी को आगाह किया था, ‘हमें यह काम पसंद नहीं है.’ दुर्भाग्य से अनपढ़ पतिदेव शकुनी राम इस सच्चाई से वाकिफ नहीं थे कि नारी के कई रूपों में से एक रूप दुर्गा का भी है जिसके आगे सभी नतमस्तक हैं. वे जिस काम को करने की ठान लेती हैं, उसे अंजाम तक पहुंचाकर ही चैन की सांस लेती हैं. सोना देवी ने भी वही किया. इस जज्बे ने उनका बखूबी साथ दिया कि आखिर मेहनत, ईमानदारी और लगन से काम करने में बुराई क्या है?

सोना देवी के साथ बिहार की राजधानी पटना के नजदीक स्थित दानापुर प्रखंड के ढीबरा गांव की 12 महादलित महिलाओं ने अगस्त 2013 में सामूहिक रूप से एक क्रांतिकारी निर्णय लिया, जो सदियों से चली आ रही सामाजिक वर्जनाओं की मुखालफत करता है. इन खेतिहर मजदूर महिलाओं ने अपना म्यूजिकल बैंड बनाया है जो पटना के अलावा अन्य शहरों तथा सुदूर गांवों में जाकर बड़े-बड़े समारोहों में मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है. कई बार इस टीम ने मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में भी अपनी पहचान दर्ज कराई है. नारी गुंजन संस्था के आर्थिक सहयोग से बना यह संगीतमयी समूह ‘संगम बैंड’ के नाम से मशहूर है. हालांकि बाद में घरेलू कारणों से दो महिलाएं इससे अलग हो गईं.

अभी इस समूह में 10 महिलाएं हैं जो गाती हैं और साथ-साथ बैंड भी बजाती हैं. इनमें सविता देवी, अनिता देवी, लालती देवी, पंचम देवी, चित्रलेखा देवी, सोना देवी, विजयन्ती देवी, डोमनी देवी, छठिया देवी और मान्ती देवी शामिल हैं. ये सब की सब विवाहित होने के अलावा ‘लिख लोढ़ा, पढ़ पाथर’ (अशिक्षित) हैं. फिर भी साठ साल की सावित्री देवी फख्र से कहती हैं, ‘मेरे लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है, लेकिन डरम पर बजने वाली धुन को झट से पकड़ लेती हूं.’ टीम की बाकी सदस्यों की समझ भी ऐसी ही है. 38 साल की सावित्री देवी इस समूह की मुखिया हैं.

रविदास समाज से आने वाली ये महिलाएं खेतों में 10 घंटे मजदूरी करके प्रतिदिन 100 रुपये अर्जित करती थीं. इनके पति भी खेतिहर मजदूर हैं. बाल-बच्चेदार हो जाने के बाद इन गरीबों को घोर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा था और कोई कमाऊ रास्ता नहीं दिख रहा था. इसी बीच सविता देवी की मुलाकात सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के लिए काम करने वाली दक्षिण भारतीय सुधा वर्गीज से होती है. सुधा की सलाह पर सविता अपने गांव की 16 महिलाओं को नारी गुंजन संस्था के मुख्यालय दानापुर लाती हैं जहां पर यह तय होता है कि समय निकालकर रोज ड्रम बजाने की ट्रेनिंग लेने आना है. संस्था ने ही अपने पैसे से इन्हें ड्रम खरीद कर दिया है.

आदित्य गौतम के निर्देशन में रोज एक घंटे का प्रशिक्षण तीन महीने तक लगातार चलता रहा. इन महादलित महिलाओं को कदम-कदम पर विरोध का सामना करना पड़ रहा था. गांव के मर्दों के ताने सुनते-सुनते कान पक गए थे. घर में भारी विरोध का सामना पड़ता था. 65 वर्षीय चित्रलेखा देवी बताती हैं, ‘हमारे पति कहते थे कि बुढ़ापे में नगाड़ा बजाने चली हो, इससे पेट नहीं भरेगा. यह मर्दों का काम है तुम कभी सीख नहीं पाओगी. लेकिन अंततः हमने ड्रम बजाना सीख लिया और पहली बार पेशेवर रूप में बजाने पर मुझे 500 रुपये मिले तो जाकर अपने मरद के हाथों में दे दिया.’

पिछले दो वर्षों में संगम बैंड ने राज्य-भर में विभिन्न जगहों पर जाकर 200 से ज्यादा कार्यक्रम प्रस्तुत किए हैं. हर जगह इनको प्रशंसा मिली है. बीते 2 अक्टूबर को इनका कार्यक्रम पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में सरकारी मुलाजिमों द्वारा कराया गया था. सविता देवी का दावा है कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए थे. यहां पर इन्हें इनाम से भी नवाजा गया. शायद ये बिहार प्रदेश का एकमात्र म्यूजिकल बैंड है जिसकी सदस्य केवल महादलित समाज की महिलाएं हैं. इनके हर कार्यक्रम का मेहनताना 10,000 रुपये है. साथ ही मेजबान को एक जीप की व्यवस्था करनी होती है ताकि इस समूह को कार्यक्रम स्थल पर लाया जा सके और फिर वापस उनके घर छोड़ा जा सके.

आज सोना देवी के पति शकुनी राम को पछतावा होता है कि उन्होंने अपनी होनहार पत्नी को इसी वजह से कभी शारीरिक क्षति पहुंचाई थी. आज वे गर्व से कहते हैं, ‘मेरी सोना सचमुच की सोना है. उसके काम ने घर की आर्थिक तंगी पर विराम लगा दिया है. अब हमको अपने समाज में बहुत इज्जत मिलती है. अपनी पाखंडी भूल के लिए हमने उससे माफी मांग ली है और उसने मुझे माफ भी कर दिया है.’

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फोटो- कुमारी सीमा

इसी समाज के बुजुर्ग सीताराम दास का मानना है कि बैंड पार्टी की महिलाओं ने देश में ढीबरा गांव का नाम रोशन किया है. दास गदगद मन से फर्माते हैं, ‘गाने, बजाने और नाचने से कोई छोटा नहीं हो जाता है. मैं भी जवानी के दिनों में नौटंकी में नाचा करता था जिसकी कमाई से घर में छह सदस्यों का पेट भरता था. मैंने तो शुरू में ही इन सामंती मिजाज के पुरुषों को चेताया था कि अच्छे कार्य का कभी विरोध नहीं करना चाहिए वरना बाद में पछतावा होता है.’

संगम बैंड की ये दिलखुश महिलाएं नए पेशे से न केवल आत्मनिर्भर बनीं, बल्कि अपने और आसपास के गांवों की महिलाओं को घरेलू हिंसा के प्रति जागरूक भी करती हैं. गंभीर मिजाज की बैंड सदस्य लालती देवी कहती हैं, ‘मदिरा सेवन करके पत्नियों को प्रताड़ित करने वाले दर्जनों पतियों को हम लोगों ने सबक सिखाया है. जरूरत पड़ने पर हम ऐसे उत्पाती पतियों को शांत करने के लिए लप्पड़-थप्पड़ का डोज भी देते हैं.’

गांव के सुपन यादव को मलाल है कि उनके समाज में ऐसी क्रांतिकारी महिलाएं क्यों नहीं पैदा हुईं. वो खुलासा करते हैं कि उनके टोला में दारूबाजों की तादाद में इजाफा हुआ है जबकि रविदास समाज में इनकी संख्या में गिरावट हुई है. सुपन कहते हैं, ‘मैंने अपने समाज के अंग्रेजों को एक नेक सुझाव दिया है कि बैंड बजाने वाली महिलाओं की सहायता लेकर बेवड़ों पर नकेल कसी जाए.’

बहरहाल, महादलित वर्ग की इन महिलाओं को नीतीश सरकार से एकमात्र लेकिन उचित शिकायत है. सविता अपनी इस शिकायत को स्थानीय बोली में कुछ ऐसे बयां करती हैं, ‘भोटवा (वोट) तो हम नीतीशे कुमार को देबई, बाकी कोई मुख्यमंत्री से कहके हम गरीब के घर में पैखनवा (शौचालय) त बनवा देतई.’

मदर मिल्क बैंक : एक वरदान

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विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार जहां शिशु मृत्यु दर का वैश्विक औसत प्रति एक हजार पर 32 है वहीं भारत का औसत 38 है. नवजात शिशु मृत्युदर (प्रति एक हजार पर 28) और जन्म के पहले पांच सालों में होने वाली मौतों (प्रति एक हजार पर 48) के मामले में भी भारत आगे है, जो कि चिंताजनक है. शिशु मृत्यु पर रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय न्यूनतम विकास लक्ष्य अभी भारत की पहुंच से कोसों दूर है. कुपोषण के मामले में भारत की स्थिति किसी से छिपी नहीं है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में 5 साल से कम आयु के 42.5 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं और 69.5 प्रतिशत बच्चे खून की कमी से जूझ रहे हैं. दुनिया के 10 अविकसित बच्चों में से चार भारतीय होते हैं और पांच साल से कम उम्र के लगभग 15 लाख बच्चे हर साल भारत में अपनी जान गंवाते हैं. इस बारे में विशेषज्ञों की राय है कि इन मौतों का मुख्य कारण बच्चों में संक्रमण और उनका औसत से कम वजन का पैदा होना है. ऐसे ही बच्चे बाद में कुपोषण, निमोनिया, डायरिया जैसे रोगों के शिकार हो जाते हैं, जिसके चलते उनकी असमय मौत हो जाती है. इस स्थिति में एक बच्चे के लिए मां का दूध जीवनरक्षक साबित होता है. नवजात शिशुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता मां के दूध से ही विकसित होती है. मां का दूध उसके लिए एंटीबॉयोटिक (प्रतिजैविक) का काम करता है, जो पूर्ण पोषण देते हुए भविष्य में होने वाले किसी भी संक्रमण से उसे बचाता है. जिन बच्चों को उनके जीवन के शुरुआती घंटे से छह माह तक अच्छी मात्रा में स्तनपान नसीब होता है, उन्हें उन अन्य बच्चों के मुकाबले मधुमेह, हाइपरटेंशन जैसी गैर-संक्रमणीय बीमारियां होने का खतरा काफी कम रहता है, जिन्हें स्तनपान पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता. पर्याप्त स्तनपान का लाभ बच्चों को बड़े होने के बाद भी यानी प्रौढ़ावस्था/वृद्धावस्था में भी मिलता है. लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हर साल दुनियाभर में जन्म लेने वाले 13.5 करोड़ बच्चों में से 60 प्रतिशत को मां का दूध नसीब नहीं होता (ब्रेस्टफीडिंग प्रमोशन नेटवर्क ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार). इसलिए उन्हें केवल बकरी, गाय के दूध या फिर फॉर्मूला मिल्क का ही सहारा होता है, जिससे उनमें बीमारियों, संक्रमण और असमय मृत्यु की संभावना बढ़ जाती है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण सर्वेक्षण 2005-2006 के अनुसार भारत में केवल 23% माताएं ही शिशु के जन्म के एक घंटे के भीतर उन्हें स्तनपान करा पाती हैं. अगर नवजात के जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान करने की दर में वृद्धि कर दी जाए तो नवजात शिशुओं और 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु के अनुपात को कम किया जा सकता है. इस तरह हर साल भारत में करीब दस लाख शिशुओं की जान बचाई जा सकती है.

देश की बाल मृत्युदर और कुपोषण से संबंधित इन भयभीत कर देने वाले आंकड़ों से रूबरू होने के बाद योग गुरु देवेंद्र अग्रवाल को अपने अनाथाश्रम के बच्चों के बिगड़ते स्वास्थ्य का कारण समझते देर नहीं लगी. जो फॉर्मूला मिल्क वह अपने आश्रम के बच्चों को दे रहे थे, वह मां के दूध का एक सर्वोत्तम विकल्प साबित नहीं हो पा रहा था. जिससे उनके अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमता का समुचित विकास नहीं हो रहा था. इसका विकल्प केवल मां का दूध ही हो सकता था. इस दिशा में आगे बढ़ते हुए उन्होंने राज्य सरकार के पास एक प्रस्ताव भेजा जिसमें एक ऐसा बैंक खोलने की इच्छा जताई, जहां अपने शिशु को स्तनपान कराने के बाद बचे मां के अतिरिक्त दूध का संग्रह किया जा सके और उन बच्चों की मदद की जा सके जिन्हें मां का दूध नहीं मिल पाता. इस प्रस्ताव को राज्य सरकार द्वारा हरी झंडी मिलने पर उदयपुर जिले के आरएनटी मेडिकल कॉलेज स्थित शासकीय पन्ना धाय महिला चिकित्सालय के एक हिस्से में योग गुरु देवेंद्र अग्रवाल की स्वयंसेवी संस्था ने अपने खर्चे पर ‘दिव्य मदर मिल्क बैंक’ की स्थापना की. देवेंद्र अग्रवाल बताते हैं, ‘दो साल से संचालित हमारे बैंक में अब तक 2,911 महिलाएं 20,807 यूनिट यानी तकरीबन 624 लीटर (एक यूनिट में 30 मिलीलीटर दूध होता है) दूध दान कर चुकी हैं जिससे 1,661 नवजात और 1,793 मांएं लाभांवित हुए हैं. हमारे बैंक में पहली प्राथमिकता एनआईसीयू (नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट) में मौत से लड़ रहे शिशुओं को दी जाती है और बचा हुआ दूध आश्रम के बच्चों को मिलता है.’

दिव्य मदर मिल्क बैंक की तर्ज पर ही राज्य की राजधानी जयपुर के जेके लोन अस्पताल में चल रहे महिला चिकित्सालय में राज्य सरकार और नॉर्वे सरकार की भागीदारी से ‘जीवनधारा’ नाम का मदर मिल्क बैंक खोला गया है जो राज्य का पहला सरकारी और उत्तर भारत का दूसरा मदर मिल्क बैंक है. मदर मिल्क बैंकिंग पर प्रकाश डालते हुए ‘जीवनधारा’ की मिल्क काउंसलर ममता महावत बताती हैं, ‘शिशु और मां का नाता केवल भावनात्मक ही नहीं होता, यह दोनों के लिए जीवनदायी भी होता है. मां का दूध अपने शिशु के लिए अमृत से कम नहीं होता. स्तनपान के अभाव में एक शिशु के जीवनभर गंभीर रोगों से ग्रस्त रहने की आशंका बढ़ जाती है तो मां के अंदर भी स्तनपान न कराने से स्तन कैंसर की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. मां के दूध के विकल्प के तौर पर हम आज जिस फॉर्मूला दूध का इस्तेमाल करते हैं, उसे विशेषज्ञों द्वारा शिशु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया जा चुका है. स्तनपान का विकल्प केवल मां का ही दूध हो सकता है. वे अनाथ शिशु या वे शिशु जिनकी मां किसी कारणवश उन्हें दूध नहीं पिला पाती हैं, उन्हें मदर/ह्यूमन मिल्क बैंक के माध्यम से अस्पताल की नर्सरी में भर्ती उन दूसरी मांओं का दूध पिलाया जाता है जिनके पास अपने शिशु को स्तनपान करने के बाद भी प्रचुर मात्रा में दूध बनता है. इन महिलाओं के दूध को पॉश्च्युराइज कर माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तापमान पर संग्रह किया जाता है. जिसे बाद में स्तनपान से वंचित शिशुओं को आवश्यकतानुसार पिलाया जाता है. इसके अलावा कुछ ऐसी महिलाएं भी बाहर से आती हैं जो अपना दूध दान करने की इच्छा जताती हैं.’

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महिलाओं के दूध को पॉश्च्युराइज कर माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तापमान पर संग्रह किया जाता है

वर्तमान में भारत के विभिन्न राज्यों में 20 ऐसे मिल्क बैंक हैं, जिनमें से अधिकांश हाल ही में खुले हैं. भविष्य में कई राज्य सरकाकों की इस तरह के और भी बैंक खोलने की योजना है. ‘जीवनधारा’ की शुरुआत के बाद राजस्थान सरकार ने राज्य के दस जिलों में भी मिल्क बैंक स्थापित करने की घोषणा की है. राज्य की इस योजना से बतौर सलाहकार जुड़े देवेंद्र अग्रवाल कहते हैं, ‘भारत में स्तनपान की स्थिति पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी बदतर है, जो शर्म की बात है. यही कारण है कि शिशु मृत्युदर के आंकड़े हमारे लिए चिंता का सबब हैं. मां के दूध का मोल तो बताया नहीं जा सकता पर यह हर नवजात को मिलना ही चाहिए. इससे नवजात शिशु मृत्युदर में 22 प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है. इसके लिए मदर मिल्क बैंक की स्थापना एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा.’

पिछले दिनों तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता द्वारा राज्य के सात जिला अस्पतालों में मदर मिल्क बैंक खोले हैं, जिसके बाद राज्य में इनकी संख्या आठ पर पहुंच गई है. हालांकि ब्रेस्टफीडिंग प्रमोशन नेटवर्क ऑफ इंडिया के केंद्रीस समन्वयक डॉ. अरुण गुप्ता शिशु मृत्युदर और कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में मदर मिल्क बैंक को क्रांतिकारी कदम के तौर पर नहीं देखते. उनका मानना है, ‘केवल मिल्क बैंक बना देने से समस्या का हल नहीं हो जाएगा. यह महज स्वास्थ्य बजट के नाम पर आया पैसा खर्च करने की सरकारी कवायद है. बाकी चीजें जो इतने सालों से नहीं हो रही हैं पहले उन पर तो ध्यान दीजिए.’ वह जोर देते हैं कि भारत में स्तनपान के मामले में महिलाओं में काफी भ्रांतियां हैं. उन भ्रांतियों को दूर करने और स्तनपान कराने के लिए महिलाओं को प्रेरित करने हेतु प्रशिक्षित सलाहकारों की कमी है. वह कहते हैं, ‘समय पूर्व जन्मे अल्पविकसित और कम वजन के शिशुओं के लिए मिल्क बैंक लाभदायक तो हो सकते हैं पर स्तनपान की कमी, किसी अन्य मां का दूध पूरी नहीं कर सकता. मां के दूध में जीवित कोशिकाएं होती हैं जो स्तन से बाहर आते ही मृत हो जाती हैं. साथ ही मिल्क बैंक के दूध में हाइजीन की भी समस्या बनी ही रहती है, क्योंकि इसे पिलाने के लिए चम्मच आदि का ही प्रयोग किया जाता है. इसलिए स्तनपान को लेकर एक व्यापक रणनीति के तहत आगे बढ़ना होगा और ह्यूमन मिल्क बैंकिंग को एक सहयोगी रणनीति में रखना होगा. ब्राजील, जहां विश्व में सर्वाधिक मिल्क बैंक हैं वह यही तो कर रहा है. दूध बैंकों के अलावा वहां डाकियों को भी प्रशिक्षण दिया जाता है कि वो गर्भवती महिलाओं को स्तनपान से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराएं. परिणाम सबके सामने है, आज वहां शिशु मृत्यु दर में 73 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है.’

मुंबई के लोकमान्य तिलक म्युनिसिपल जनरल अस्पताल में 1989 में स्थापित किए गए एशिया के सबसे पहले ह्यूमन मिल्क बैंक ‘स्नेहा’ को अब ‘सायन मिल्क बैंक’ के नाम से जाना जाता है. यहां की वर्तमान निदेशक डॉ. जयश्री मोंडकर कहती हैं, ‘मां का दूध तो शिशु का सर्वोत्तम आहार है ही लेकिन कई बार उच्च रक्तचाप, अधिक रक्तस्राव या तेज बुखार के चलते मां शिशु को दूध नहीं पिला पाती हैं. उस स्थिति में किसी दूसरी मां का दूध ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प होता है, लेकिन यह सीधा स्तन से निकालकर शिशु को नहीं दिया जा सकता है. उससे पहले कुछ सेफ्टी टेस्ट करने पड़ते हैं और सावधानियां भी बरतनी होती हैं. सबसे पहले तो डोनर मदर का स्वस्थ होना जरूरी है. उसे सर्दी, खांसी, टीबी या अन्य कोई बड़ी बीमारी न हो. उसके खून में एचआईवी, हेपेटाइटिस और बीडीआरएल टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव हो. फिर ऐसी मांओं से इलेक्ट्रिक पंप की सहायता से दूध निकाला जाता है, जिसे बैंक में 62.5 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर 30 मिनट तक पॉश्च्युराइज करने के बाद 4 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर ठंडा किया जाता है. इसके बाद हर डिब्बे से एक मिलीलीटर दूध का नमूना माइक्रोलैब में टेस्टिंग के लिए भेजा जाता है. रिपोर्ट निगेटिव आने पर इसे शून्य से 20 डिग्री नीचे के तापमान पर बर्फ के गोले के रूप में बैंक के फ्रीजर में संग्रहित कर लिया जाता है. इस स्थिति में यह छह महीने तक प्रयोग किया जा सकता है. जब इसे किसी शिशु को पिलाना होता है तो उसे गर्म पानी में पतलाकर नली या चम्मच के सहारे पिला दिया जाता है. एक बार तरल रूप में आने पर यह अधिकतम चार घंटों तक ही उपयोगी होता है.’ आगे वह जो भी बताती हैं उससे डॉ. अरुण गुप्ता की बात को बल मिलता है. वह कहती हैं, ‘हम एक शिशु को मिल्क बैंक के सपोर्टिंग सिस्टम पर सिर्फ तब तक ही रखते हैं जब तक कि उसकी मां को इतना सक्षम नहीं बना देते कि वह खुद अपने शिशु को स्तनपान करा सके, क्योंकि पराई मां का यह दूध महज एक विकल्प है जो मां के स्तनपान की जगह नहीं ले सकता है.’

वर्तमान में मां का दूध हर मिल्क बैंक में निशुल्क उपलब्ध है पर इस संबंध में कोई ठोस सरकारी नीति का न होना भविष्य में इसे एक व्यापार में भी तब्दील कर सकता है. डॉ. अरुण गुप्ता भी ऐसी आशंका व्यक्त करते हैं. वह कहते हैं, ‘ठोस सरकारी नीति के अभाव में देश में जिसे देखो वो मदर मिल्क बैंक खोल रहा है. इस तरह तो एक दिन मां के इस अनमोल अमृत का मोल लगाया जाने लगेगा. इससे काफी समस्याएं खड़ी होंगी. ममता बिकने लगेगी. जो समाज का भी नैतिक पतन होगा. इसलिए एक सरकारी व्यवस्था बनाकर ही इस पर आगे बढ़ा जाए तो ठीक रहेगा. कहां ऐसे बैंक की ज्यादा जरूरत है यह भी देखना होगा.’ डॉ. अरुण गुप्ता की यह आशंका व्यर्थ नहीं है. विकसित देशों में आज मानव दूध का एक बड़ा ऑनलाइन बाजार सज चुका है. भारत अब तक इससे अछूता है तो शायद इसीलिए ही कि यहां अभी ह्यूमन मिल्क बैंक की उपलब्धता शुरुआती दौर में है.

ह्यूमन मिल्क बैंक में दूध दान करने वाली प्रमुख तौर पर तीन प्रकार की महिलाएं होती हैं. पहली वे जिनका दूध अधिक बनता है, दूसरी वे जिनके शिशु एनआईसीयू में होने के कारण दूध नहीं पी सकते और तीसरी वे जिनके शिशु की मृत्यु हो जाए. इनमें कुछ ऐसी महिलाएं भी होती हैं, जिन्हें दूध तो बनता है पर किन्हीं कारणों से वे शिशु को पिला नहीं पाती. ऐसी महिलाओं का दूध इलेक्ट्रिक पंप की सहायता से निकालकर उनके शिशु को पिलाया जाता है और बाकी बचा दूध बैंक में संग्रहित कर लिया जाता है. कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जो प्रसव के बाद कुछ दिन तक अपने शिशु को स्तनपान नहीं करा सकी थीं और विकल्प के अभाव में उनका बच्चा शुरुआती आवश्यक मां के दूध से वंचित रहा. ऐसी ही एक महिला सोनू नागदा से ‘तहलका’ ने बात की. सोनू की दोनों ही डिलीवरी सीजेरियन पद्धति से हुई थीं जिसके चलते उनके सामने दूध न बनने की समस्या आई. वह बताती हैं, ‘मैंने अपने बच्चों का दर्द महसूस किया था जब मैं उन्हें स्तनपान नहीं करा पाती थी. डॉक्टर कहा करते थे कि शिशु के उचित पोषण के लिए मां का दूध जरूरी है, पर मैं बेबस थी. जब सब सामान्य हुआ तो लगा कि उन बच्चों का क्या जिनकी मां ही नहीं हैं? जब मेरी दूसरी बेटी का जन्म हुआ था, उसके कुछ ही दिन बाद अखबार में मदर मिल्क बैंक के बारे में जाना, जहां माताएं अपने शिशु को पिलाने के बाद अतिरिक्त दूध दान कर सकती थीं, जिसका उपयोग ऐसे जरूरतमंद बच्चों के लिए किया जाना था जो किसी कारणवश मां के दूध से वंचित हों. मैनें तब ही ठान लिया था कि मुझे भी दूध दान करना है.’

हालांकि हकीकत ये है कि देश में मिल्क बैंक का नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है पर इन्हें दानदाताओं की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है. मुंबई के सायन मिल्क बैंक में अस्पताल आधारित दान व्यवस्था है अर्थात जो महिलाएं अस्पताल में इलाज के लिए आती हैं वही दानदाता होती हैं. सालभर में ऐसी आठ से दस हजार महिलाओं से बैंक को 1000 से 1400 लीटर तक दूध प्राप्त हो जाता ह,ै जिसका हर साल औसतन चार हजार बच्चे लाभ उठाते हैं. किसी दिन दूध पर्याप्त रहता है तो किसी दिन कमी भी पड़ जाती है. इसी तरह सूरत म्युनिसिपल चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान में 2011 से संचालित मिल्क बैंक भी दानदाताओं की समस्या से जूझ रहा है. उनकी वेबसाइट पर दिए आंकड़े मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर दिखा रहे हैं. अप्रैल से जुलाई 2015 के बीच मिल्क बैंक में 12.5 लीटर दूध दान में मिला है जबकि 21 लीटर से अधिक दूध जरूरतमंदों में बांटा गया है. लेकिन राहत की बात यह है कि अब महिलाएं दान के लिए खुद ही आगे आ रही हैं.

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मदर मिल्क बैंक में इलेक्ट्रॉनिक पंप की मदद से माताओं का अतिरिक्त दूध निकालकर फ्रीजर में संग्रहित किया जाता है

दिव्य मदर मिल्क बैंक के दो साल के इतिहास में रेखा चेदवाल सबसे ज्यादा दूध दान कर चुकी हैं. जब वह गर्भ से थी तो इलाज के लिए जाते वक्त उन्होंने अस्पताल परिसर में खुल रहे मदर मिल्क बैंक का विज्ञापन देखा था. वह बताती हैं, ‘जब मेरा पहला बच्चा हुआ तो मुझे काफी अतिरिक्त दूध बनता था. इसके बाद दूसरे बच्चे के समय मैं जब अस्पताल गई तो देखा कि अस्पताल में खुले मिल्क बैंक में माताएं अपना अतिरिक्त दूध दान कर सकती हैं. इससे अच्छी और क्या बात हो सकती थी कि मेरा दूध उन जरूरतमंद बच्चों के काम आ रहा था जो अनाथ हैं, अल्पविकसित हैं या जिनकी मां उन्हें स्तनपान कराने में सक्षम नहीं हैं. इसके बाद मैं अपना दूध दान करने लगी.’ डॉ. मोंडकर बताती हैं, ‘कई ऐसी महिलाएं हैं जो अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद भी दो से छह महीने तक अपना दूध मिल्क बैंक को दान करने आती रहीं. चूंकि हमने उन्हें बता दिया था कि वह अपना दूध निकालकर सात दिन तक घर के फ्रिज में बर्फ के गोले के रूप में जमाकर रख सकती हैं. तो वह यही करती और जैसे ही समय मिलता हमें आकर दे जातीं.’

वैसे दानदाताओं की कमी का एक कारण यह भी है कि हमारे रूढ़िवादी समाज में अगर कोई महिला कुछ नया करने निकले तो उसे तानों और टीका-टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है. उदयपुर के पास स्थित सज्जनगढ़ से गायत्री नागदा रोजाना 15-20 किलोमाटर की दूरी तय करके दिव्य मदर मिल्क बैंक जाया करती थीं. उनकी दिनचर्या कुछ ऐसी हो गई थी कि अलसुबह उठना और रोजमर्रा के कामकाज निपटाकर नौ बजे तक आरएनटी मेडिकल कॉलेज पहुंचना. गायत्री बताती हैं, ‘डिलीवरी के बाद मुझे जितना दूध बनता था, उतना मेरा बच्चा पी नहीं पाता था, इसलिए दूध बर्बाद हो जाता था. उस वक्त ख्याल आता था कि काश कोई ऐसी जगह होती जहां दूध का सदुपयोग हो सकता.’ उनकी पीड़ा समझते हुए उनके पति ने एक मिल्क बैंक ढूंढ निकाला. गायत्री बताती हैं, ‘जब मैं रोज-रोज वहां जाने लगी तो घर-परिवार वालों ने रोकना-टोकना शुरू कर दिया. पड़ोसी मजाक बनाने लगे, फब्तियां कसने लगे. टेम्पो में जाओ तो शोर वाले अश्लील गाने बजते थे. मेरा बच्चा 15 दिन का था, उसे शोर से दिक्कत होती थी. उस वक्त बहुत संघर्ष करना पड़ा था, लेकिन अब दिली सुकून मिलता है. मैंने 25 लीटर दूध दान किया. न जाने कितने ही बच्चों को उससे जीवन मिला होगा.’

शायद इन्हीं समस्याओं की आशंका के चलते मिल्क बैंक को ब्राजील की तर्ज पर व्यापक सरकारी रणनीति के तहत आगे बढ़ाने की बात कही गई है. एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्राजील में अभी विश्व के सर्वाधिक 250 से अधिक ह्यूमन मिल्क बैंक संचालित हैं. अग्निशमन विभाग से जुड़े कर्मचारियों को अग्निशमन के साथ वहां महिलाओं का दूध एकत्रित करने के काम पर लगाया गया है. बाकायदा टीवी पर सूचना प्रसारित की जाती है कि इस निश्चित समय पर अग्निशमन विभाग आपके क्षेत्र में आएगा जिसे दूध दान करना हो वह कर सकता है. उसी समय महिलाएं अपना दूध कप में भरकर देती हैं.

भारत में मिल्क बैंकिंग को शुरू हुए भले ही ढाई दशक बीत गए हों पर अभी भी वह अपने शैशवकाल में ही है. स्तनपान का केवल शिशु को ही लाभ नहीं होता, यह स्तनपान कराने वाली मां को भी गठिया और स्तन कैंसर जैसे घातक रोगों से बचाता है. अगर यह बात ही भारत की महिलाओं को समझ आ जाए तो शिशु मृत्युदर और कुपोषण पर काफी हद तक लगाम कसी जा सकती है. बहरहाल ह्यूमन मिल्क बैंक भारत में शिशु स्वास्थ्य की बदहाली पर कहां तक लगाम लगा सकते हैं यह तो भविष्य ही बताएगा पर फिलहाल यह उन नवजातों के लिए वरदान साबित हो रहे हैं जो कि स्तनपान से वंचित हैं और रेखा, सोनू, गायत्री जैसी उन महिलाओं के चेहरे पर भी खुशी ला रहे हैं जो अपना अतिरिक्त दूध बर्बाद होने से नहीं रोक पाती थीं.

‘पश्चिम ने जो समस्या हमारे यहां खड़ी की वह अब उनकी ओर बढ़ रही है’

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फोटो- विजय पांडेय

किन कारणों से इतनी बड़ी संख्या में सीरियाई नागरिक यूरोप की ओर पलायन कर रहे हैं? आप क्या सोचते हैं, इसके लिए कौन जिम्मेदार है? 

सबसे पहले मैं आपसे ये पूछना चाहता हूं कि इस समस्या के पीछे कौन है? शरणार्थी संकट की वजह क्या है? सीरिया में यह समस्या तब शुरू हुई जब अमेरिका, सऊदी अरब, तुर्की, कतर और कुछ दूसरे देशों ने मिलकर यहां हमारे लोगों को मारने और हमारे देश काे नष्ट करने के लिए भाड़े के सैनिक भेजे. तुर्की ने इन लोगों के समर्थन में अपनी सीमा खोल दी ताकि ये लोग सीरिया में प्रवेश कर सकें. सीरिया में यह समस्या आतंकवाद के कारण शुरू हुई और इस समस्या को बनाने में शीर्ष स्थान पर कौन हैं? ये वही देश थे, जिनके बारे में मैंने ऊपर बताया है.

अपना घर कौन छोड़ना चाहता है? कोई अपना देश नहीं छोड़ना चाहता. इससे पहले हमारे यहां यह समस्या (शरणार्थी संकट) नहीं थी. शरणार्थियों का इस तरह पलायन कोई सहज बात नहीं है. उन्होंने हमारे देश में समस्या खड़ी की, अब यह समस्या खुद उनके देशों की ओर बढ़ रही है. उनका उद्देश्य सीरिया को बर्बाद करना है और सैन्य शक्ति के दम पर यहां की सत्ता में परिवर्तन करना है. 2011 में जब युद्ध शुरू हुआ और उसके बाद जो कुछ भी हुआ, ये सारी गतिविधियां सीरिया के शासन को अस्थिर करने के लिए पश्चिम की चाल है. तुर्की ने अपनी सीमाओं को खुला छोड़ रखा है और वह भाड़े के सैनिकों को सीरिया में घुसने के लिए सहयोग कर रहा है. तुर्की पश्चिम को यह बता रहा है, ‘देखो, तुम्हें मुझसे मदद की गुहार लगानी पड़ेगी. अगर तुम मुझसे मदद के लिए नहीं कहते हो तो मैं सीमा खुली छोड़ दूंगा.’ तुर्की के राष्ट्रपति तैयप इरडोगन का उद्देश्य सीरिया में ‘नो फ्लाई जोन’ बनाना है. तो इस तरह उनकी मंशा है कि यदि आप मुझे ‘नो फ्लाई जोन’ बनाने में मदद नहीं करते तो मैं अपने दरवाजे (सीमा) खुले छोड़ दूंगा. पश्चिम सीरियाई शरणार्थियों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना चाहता है. धर्म को सीरिया के विरूद्ध इस्तेमाल करना पश्चिम का उद्देश्य है. सीरियाई लोगों के जेहन को वे इस कदर बदल देना चाहते हैं कि  अगर भविष्य में सीरिया में राष्ट्रपति के चुनाव हों तो लोग बशर अल असद के खिलाफ वोट करें.

तुर्की के समुद्री किनारे पर बहकर आई ऐलन कुर्दी की लाश की तस्वीरों ने सारी दुनिया के लोगों को हिलाकर रख दिया. तो अगर मैं आपसे पूछूं कि ऐलन कुर्दी को किसने मारा तो आपका जवाब क्या होगा?

इसके लिए वही लोग जिम्मेदार हैं, जिन्होंने सीरिया समेत सारी दुनिया में अशांति फैला रखी है. सारी दुनिया में आत्मघाती बम धमाके वहाबियों (इस्लाम की एक शाखा, जिसका स्वभाव अत्यन्त कट्टर माना जाता है) के द्वारा ही किए जा रहे हैं. उन्हें समर्थन कौन दे रहा है? आतंक की एक भी घटना किसी गैर-वहाबी व्यक्ति द्वारा नहीं की गई है. चाहे वह न्यूयार्क में 9/11 का हमला हो, 2004 का मैड्रिड रेल धमाका हो, 2005 में लंदन बम धमाका या फिर 2015 में पेरिस में ‘चार्ली हेब्दो’ टेबलॉयड के दफ्तर पर किया गया हमला हो, ये सभी वहाबियों द्वारा किए गए हैं. आपको एक उदाहरण देता हूं. इसी साल जनवरी में पेरिस के सुपर मार्केट में हुए हमले में दशहतगर्द अमेदी कौलीबली की पत्नी हयात बौमेद्दीन के बारे में कथित रूप से खबर आई थी कि वह तुर्की के रास्ते सीरिया भाग गई थी. इसमें किसने उसकी मदद की? सीरिया सीमा पार आतंकवाद का सामना कर रहा है और इस वजह से भी पलायन बढ़ रहा है. शरणार्थी उन इलाकों से निकलकर आ रहे हैं जहां आतंकी समूह सक्रिय हैं. सभी शरणार्थी सीरियाई नहीं हैं. कुछ इराकी हैं, कुछ एरिट्रियाई (अफ्रीका महाद्वीप में स्थित एरिट्रिया देश के नागरिक) और कुछ दूसरे देशों से भी हैं. कुछ लोगों के बारे में खबर मिली है कि उन्होंने यूरोप में प्रवेश करने के लिए नकली सीरियाई पासपोर्ट का इस्तेमाल किया है. इनमें से तकरीबन 25 प्रतिशत आईएस के लोग हैं. पहले उन्होंने हमारे देश में खराब सामान भेजा, अब वे अपने देश में खराब सामान पा रहे हैं. सीरिया में उनके काम का यही प्रभाव या प्रतिक्रिया है.

इस्लामिक स्टेट का मूल सूत्र क्या है?

यह सब जानते हैं कि किस तरह अमेरिका और सऊदी अरब जैसे उसके साथी देशों ने मिलकर अफगानिस्तान में सोवियत संघ को हराने के लिए अलकायदा को खड़ा किया. उन्होंने इस्लामी देशों से लोगों को भर्ती किया और उन्हें नास्तिकों के खिलाफ लड़ाई में लगाया. यह तरीका उस समय सफल रहा. कुछ समय बाद इराक और अफगानिस्तान पर अमेरिका का कब्जा हो गया. जब इराक में बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक अपनी जान गंवाने लगे और इराक पर अमेरिका अपना कब्जा जारी नहीं रख सका तो उसे एक नया विचार आया यह अफगानिस्तान मॉडल की ही तर्ज पर था और फिर उसने इस्लामिक स्टेट तैयार किया.

इस्लामिक स्टेट पश्चिमी एशिया में अलकायदा की ही एक शाखा है, जिसे अमेरिका का पूरा समर्थन है और सीधे सऊदी अरब से अनुदान मिल रहा है. इस्लामिक स्टेट वहाबीवाद ही है. दूसरी ओर पश्चिमी एशिया में किसी भी जमीन पर कब्जा करने के लिए, किसी भी सत्ता को बर्बाद करने, अमेरिकी नीतियों को लागू करने और अपने हित साधने के लिए अमेरिका भाड़े के सैनिकों की पूरी सेना का नेतृत्व कर रहा है. सीरिया एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जो पूरी तरह अमेरिकी योजनाओं के खिलाफ है और अमेरिकी कैंप का अनुयायी नहीं बनना चाहता. अगर अमेरिकी लोकतंत्र इराक और यमन को बर्बाद करता है तो हम ऐसे अमेरिकी लोकतंत्र में यकीन नहीं करते! इस वजह से सीरिया, इराक, ईरान के खिलाफ वह इस्लामिक स्टेट का इस्तेमाल कर रहा है. ये हर उस देश के खिलाफ हैं, जो अमेरिकी नीतियों के अनुयायी नहीं बनना चाहते. यही वास्तविकता है.

यह कैसे हुआ कि इस्लामिक स्टेट इतना मजबूत संगठन बन गया? इस्लामिक स्टेट को समर्थन कौन दे रहा है? यह वही देश है जो हमारा कच्चा तेल चुराता है और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में बेच देता है. आपको क्या लगता है, इस्लामिक स्टेट के प्रशिक्षण शिविर कहां हैं? ये तुर्की में हैं. आप यह क्यों नहीं देखते कि इस्लामिक स्टेट द्वारा अपहृत हर आदमी को मार दिया जाता है लेकिन तुर्की राजदूतों को नहीं मारा गया जिनका अपहरण इस्लामिक स्टेट ने इराक में किया था. ऐसा कैसे है कि इस्लामिक स्टेट ने सीरिया की सभी पुरानी मजारों को तोड़ दिया है, सिवाय सुलेमान शाह की मजार के, जो कि ऑटोमन साम्राज्य (तुर्की साम्राज्य) के संस्थापक ओसमान प्रथम के दादा थे. (इस साल की शुरुआत में तुर्की शासन ने सुलेमान शाह की मजार को उसके मूल स्थान से हटाकर तुर्की-सीरिया सीमा पर बनाया था). इस्लामिक स्टेट ने कथित रूप से एक नक्शा जारी किया है जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप को शामिल किया गया है. इस्लामिक स्टेट भारत तक पहुंच चुका है लेकिन इसने तुर्की की एक सेंटीमीटर जमीन तक को नक्शे में शामिल नहीं किया है, क्यों? अगर यह इस्लाम और इसकी अस्मिता का मसला है तो इस्लामिक स्टेट अल अक्सा मस्जिद (इसी मस्जिद से इस्लाम धर्म की उत्पति मानी जाती है. माना जाता है कि इसी स्थान से इस्लाम धर्म के पैगम्बर मोहम्मद साहब ने जन्नत के लिए प्रस्थान किया था.) के लिए क्यों नहीं लड़ता, जिस पर इस्राइल का कब्जा है.

हम नहीं चाहते कि कोई देश इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़े. यदि पश्चिम सचमुच इस्लामिक स्टेट से टकराने के लिए गंभीर है तो उन्हें ये कदम उठाने चाहिए; पहला- आईएस को अनुदान देना बंद करें. दूसरा- सीरिया के साथ लगी तुर्की की सीमा को बंद करना चाहिए. एक बार ऐसा हो जाने पर सीरियाई सेना सीरिया की सीमा के भीतर इस्लामिक स्टेट को हराने की अपनी जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक निभाएगी. यह बहुत सरल है. पश्चिम इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अपनी लड़ाई को सीरिया की सरकार को अस्थिर करने के लिए इस्तेमाल कर रहा है.

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क्या सीरिया में गृहयुद्ध की समस्या का कोई शांतिपूर्ण हल निकलने के आसार हैं? यदि हैं तो आप कैसे इस दिशा में बढ़ेंगे?

यदि मीडिया की कुछ रिपोर्टों पर भरोसा किया जाए तो सीरिया के संकट का राजनीतिक हल निकालने के लिए चर्चा की जा रही है. रूस और अमेरिका के बीच कुछ बातचीत चल रही है. कोई भी युद्ध हमेशा नहीं चलता लेकिन सीरिया के भीतर आतंकवाद का जो असर पड़ा है उससे इस क्षेत्र के सभी देश प्रभावित होंगे.

आप  ‘ब्रिक्स’  समूह की भूमिका को किस प्रकार देखते हैं, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं. रूस के विदेश मंत्री सरगेई लावरोव ने कहा है कि सीरिया को सैन्य हथियारों और सैनिकों समेत सैन्य सहयोग देते रहेंगे. आप सीरिया और रूस के बीच द्विपक्षीय संबंधों की वर्तमान स्थिति और सीरिया-रूस गठबंधन के भविष्य को कैसे देखते हैं?

इस संकट का राजनीतिक हल तलाशने और सैन्य शक्ति के इस्तेमाल के खिलाफ ब्रिक्स द्वारा लिए गए पक्ष का हम सम्मान करते हैं. हम भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वकतव्य की भी प्रशंसा करते हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि आतंकवादी अच्छे या बुरे नहीं होते.

सीरिया में शांति के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ, यूरोपियन यूनियन और लीग ऑफ अरब स्टेट जैसी स्थानीय संस्थाओं द्वारा निभाई गई भूमिका से संतुष्ट हैं?

लीग ऑफ अरब स्टेट एक बदतर संगठन है. यह अपने खुद के सदस्यों का बचाव नहीं करता. इसने इराक, यमन, लीबिया या सीरिया के लिए क्या किया है? इस लीग का सबसे सशक्त प्रभाव यही है कि इसके कारण अरब देश बर्बाद हो गए हैं. जहां तक संयुक्त राष्ट्र संघ का सवाल है, वह अमेरिकी नीतियों का ही अनुयायी है.

क्या सरकार नियंत्रित सीरिया और इस्लामिक स्टेट नियंत्रित सीरिया के बीच का विभाजन अब लगभग स्थायी हो चुका है? क्या यह विभाजन पूर्ण हो चुका है?

ऐसा एक भी इलाका नहीं है, जहां सीरिया की सेना प्रवेश नहीं कर सकती. सभी मुख्य शहर सीरियाई सेना के नियंत्रण में हैं. सेना जहां प्रवेश करना चाहती है, वहां प्रवेश कर सकती है. सीरिया के भीतर लगभग चालीस लाख लोगों ने इस्लामिक स्टेट और जभात अल नूसरा जैसे आतंकी समूहों के कारण अपना आवास स्थानांतरित किया है. आंतरिक रूप से विस्थापित ये लोग अब सीरियाई सेना द्वारा नियंत्रित इलाकों में जा रहे हैं.

विकास पर भारी जुबानी बिसात

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फोटो- विजय पांडेय

बिहार में इस बार का चुनाव कई मायने में दिलचस्प है. 2010 से 2015 के बीच जो विधानसभा के सदस्य रहे, उनमें से सारे सत्ता और विपक्ष दोनों का मजा ले चुके हैं. जदयू सत्ता में भी रही है और एक दिन के लिए विपक्ष में भी, जब जीतन राम मांझी को बहुमत साबित करना था. कांग्रेस विपक्ष में भी रही है और सत्ता के समर्थन में भी. राजद और सीपीआई का भी वही हाल रहा. भाजपा तो सत्ता में रही ही और बाद में विपक्ष की भूमिका में आई. यह दिलचस्प है कि सभी सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों का मजा ले चुके लोग इस बार आपस में अलग-अलग खेमे में बंटकर एक-दूसरे की औकात नाप रहे हैं.

जब यह समाचार लिखा जा रहा है, तब बिहार की राजनीति में तंत्र-मंत्र वाला अध्याय परवान चढ़ा हुआ है. केंद्रीय राज्यमंत्री गिरिराज सिंह के सौजन्य से जारी नीतीश कुमार का वह वीडियो, जिसमें एक तांत्रिक उन्हें गले लगाए हुए दिख रहा है, उसे ही केंद्र में रखकर सारे आयोजन हो रहे हैं. नरेंद्र मोदी धुआंधार चुनावी प्रचार में हैं और सभी जगह नीतीश कुमार के नाम के पहले लोक-तांत्रिक नीतीश कुमार कहकर संबोधित कर रहे हैं. वे तांत्रिक प्रकरण को मुद्दा बनाने में पूरी ऊर्जा लगाए हुए हैं. संभव है, जब तक यह पत्रिका आपके हाथों में पहुंचे और आप इस लिखे से गुजर रहे हों, तब तक कोई और चुनावी बम बिहार में फट चुका हो. कोई और वीडियो या फिर कोई और नया बयान चर्चा के केंद्र में होगा, क्योंकि तब बिहार में आखिरी चरण का चुनाव हो रहा होगा और जनता बेसब्री से चुनाव परिणाम का इंतजार करने के मूड में आ रही होगी. कौन हारेगा, कौन जीतेगा, यह कह सकने की स्थिति में इस बार कोई नहीं है. पूरे चुनावी दौर में अनुमानों का युद्ध तो चलता रहा लेकिन कोई भी सटीक अनुमान नहीं लगा सका. जीत और हार का फैसला आठ नवंबर को होगा.

नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला महागठबंधन जीतेगा तो उसके अलग मायने होंगे, राज्य की राजनीति के संदर्भ में भी और देश की राजनीति के संदर्भ में भी. भाजपा हारती या जीतती है तो भी उसका असर पार्टी की राजनीति पर दोनों ही स्तरों पर पड़ेगा. केंद्रीय स्तर पर और राज्य स्तर पर भी. हालांकि, हार या जीत से पहले नीतीश और भाजपा- दोनों ने कुछ हद तक बाजी को अपने पाले में कर रखा है. चित भी अपनी ओर और पट भी अपनी ओर. भाजपा ने पूरी कोशिश कर लड़ाई को मोदी बनाम नीतीश की बजाय मोदी बनाम लालू कर दिया है. लड़ाई को मोदी बनाम लालू करने से भाजपा को नुकसान में भी राहत की उम्मीद है. बिहार में लड़ाई अगर मोदी बनाम नीतीश होती और अगर भाजपा हारती तो भाजपा को ज्यादा नुकसान होता. नीतीश से हार का मतलब विकास के मसले पर हुई हार माना जाता.

नीतीश और मोदी में सीधे टकराव के बाद नीतीश की जीत का मतलब राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद बढ़ने का संकेत होता और नीतीश का कद बढ़ता तो फिर वे राष्ट्रीय स्तर पर बिखरे विपक्षी दलों की गोलबंदी की ताकत रखते. लेकिन लालू प्रसाद के नेतृत्व में महागठबंधन की जीत के बाद भाजपा यह कहकर खुद को तसल्ली दे सकने की स्थिति में रहेगी और लोगों को भी समझाएगी कि घृणित जात-पात की राजनीति से हार गई. जानकार बता रहे हैं कि इसलिए भाजपा ने आगे की पूरी राजनीति को संभाले रखने के लिए लड़ाई को लालू बनाम मोदी में बदल दिया है, नीतीश बनाम मोदी में नहीं रहने दिया. दूसरी ओर नीतीश ने भी इस पूरी लड़ाई में अपने को कंफर्ट जोन में रखा है. वे लालू प्रसाद के साथ रहते हुए भी लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय के मसले को या अगड़े बनाम पिछड़े की लड़ाई वाले मसले को नहीं उठा रहे. क्योंकि नीतीश अपनी छवि का नुकसान नहीं चाहते, इसलिए वे जीत और हार दोनों की स्थिति में अपनी छवि को बनाए-बचाए रखना चाहते हैं. इस पूरे चुनाव में यह दिखा भी जब पूरी बिहार की राजनीति फिसलन के रास्ते चलती रही, रोजाना बयानों के वार चलते रहे और निचले पायदान तक पहुंचते रहे, नीतीश ने अपने आपको संभाले रखा. खैर, यह पूरी सियासत तो जीत और हार के बाद की है, जो आठ नवंबर के बाद तय होगा लेकिन बिहार में इस जीत-हार के बाद एक और बात चारों तरफ चर्चा में है और लोग यह मानने लगे हैं कि इस जीत-हार के खेल में जीत किसी की हो, हार बिहार की हो चुकी है.

नैराश्य का यह भाव उपजने की ठोस वजहें भी हैं. वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर कहते हैं कि बिहार में इस बार जो बयान चल रहे हैं, उसका असर चुनाव में वोट पाने में कितना होगा, वह तो नेता भी नहीं बता सकते लेकिन यह तय है कि इस चुनाव के बाद बिहार एक बार फिर अराजक दौर में पहुंचेगा और बड़े नेताओं द्वारा दिए गए बयानों का असर निचले स्तर तक पहुंचकर अराजकता को बढ़ावा देगा. ज्ञानेश्वर या उन जैसे लोग अगर ऐसी बात कर रहे हैं तो उसके पीछे कोई रहस्य नहीं. बिहार की राजनीति की शुरुआत इस बार चक्रवर्ती सम्राट अशोक की जाति का पता लगाने से हुई थी और उसके बाद विकास, बीफ, अगड़ा-पिछड़ा, डीएनए, नरपिशाच, नरभक्षी जैसे शब्दों से गुजरते हुए अब तांत्रिक और स्त्री के चरित्र हनन तक पहुंची है. उन बयानों पर एक बार गौर कर सकते हैं, जो इस बार बिहार के चुनाव में छाए रहे.

‘जितने भी गुंडे-बवाली-मवाली हैं, सब लालू यादव के दामाद हैं.’

‘अमित शाह नरभक्षी है.’

‘मोटा तोंदवाला अमित शाह इतना मोटा है कि लिफ्ट में फंस गया था.’

‘लालू प्रसाद यादव के रिश्तेदार शैतान हैं क्या?’

‘लालू यादव चाराखोर हैं.’

‘नरेंद्र मोदी ब्रह्मपिशाच है, हम ओझा हैं, बोतल में बंद कर लेंगे, लाल मिरचा के धुआं से भगाएंगे.’

‘जो हमारी ओर आंख उठाकर देखेगा, उसका छाती तोड़ देंगे.’

‘मटन पत्नी की तरह है, बीफ मां और बहन की तरह.’

‘नीतीशजी डाइवोर्सी दुलहा हैं.’

‘अगर जवानी में लालूजी बधिया करा लिए होते तो जनसंख्या कुछ कम रहती.’

यह सारे बयान कुछ उदाहरण हैं. इन बयानों के बीच नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित सवा लाख करोड़ वाला विकास पैकेज और उसके जवाब में नीतीश कुमार द्वारा घोषित चार लाख वाला विकास पैकेज कहां दबकर रह गया, किसी को पता नहीं चला. नीतीश कुमार द्वारा विकास के सात सूत्र भी कहां गए, उसकी थाह नहीं मिल रही और भाजपा के विकास के एजेंडे कहां गए, यह भाजपा नेताओं को भी नहीं पता.

जो युवा वोटर इन नेताओं के अशालीन भाषणों को सुन रहे हैं, कल वे भी राजनीति में आएंगे. आज जो वे सीख रहे हैं, कल को वही आजमाएंगे

बिहार के इस चुनाव में विश्लेषक और जानकार देश का भविष्य देख रहे हैं. ज्ञानेश्वर कहते हैं कि जिन चीजों को लोग बिहार में भूल गए थे, उन्हें फिर से दोहराया जा रहा है. साफ दिख रहा है कि बिहार भयावह भविष्य के रास्ते बढ़ रहा है. विधानसभा चुनाव में यह भाषा है, संयम इस तरह जवाब दे गया है तो अगले साल बिहार में पंचायत और निकाय चुनाव भी होने हैं. उस चुनाव को करवाने की जिम्मेदारी उनकी ही होगी, जो आज तमाम किस्म की विकृत भाषा और वाणी का इस्तेमाल कर सत्ता पाएंगे. सत्ता किसे मिलेगी, यह भले न पता हो लेकिन यह तय है कि जो सत्ता में आएगा, उससे अपना बोया हुआ ही काटते नहीं बनेगा. क्योंकि ऐसी ​स्थिति ही नहीं होगी. विधानसभा चुनाव जिस तरह से लड़ा जा रहा है, जाहिर-सी बात है, पंचायत चुनाव में उसकी परछाईं पड़ेगी.

भयावह भविष्य सिर्फ इस रास्ते नहीं दिख रहा. खतरनाक पहलू दूसरा है. बिहार में इस बार के चुनाव को एक दूसरी वजह से भी खास माना जा रहा है. आंकड़ों का सहारा लेते हुए विभिन्न तरीके से रोजाना बताया जाता है कि यह जो अपना युवा देश है, उसे युवा बनाने में बिहार की युवा आबादी की बड़ी भूमिका है. बिहार में 18 से 39 साल वालों की आबादी 3.79 करोड़ है. यानी कुल आबादी में करीब 61 प्रतिशत. पांच साल पहले इस आयु समूह की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत थी.

अगर हर विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से देखें तो अमूमन हर क्षेत्र में औसतन करीब 84,651 मतदाता इस आयु समूह के हैं. पिछली बार बिहार विधानसभा में सभी सीटों पर जीत हार का अंतर औसतन 15 हजार का था. यानी साफ है कि यह आयु समूह इस बार जीत-हार तय करेगा. इनमें बड़ी आबादी उन युवाओं की है, जो पहली बार मतदान कर रहे हैं. इस युवा आबादी पर सभी दलों की टकटकी है. सबको उम्मीद है कि वे उनके साथ आएंगे और बाजी को पलट देेंगे. वे युवा मतदाता किसी न किसी के साथ जा रहे हैं, जाएंगे ही, लेकिन याद रखिए कि बिहार में कल को वे भी राजनीति में आएंगे. वे इस बार सिर्फ पहली बार वोट ही नहीं दे रहे, बहुत करीब से चुनाव को देख भी रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं- कल को इन्हीं बच्चों को बिहार की राजनीति में आना है. आज जो वे सीख रहे हैं, कल को उसे ही वे फिर से बिहार की राजनीति में आजमाएंगे. यह दुखद है. सुमन कहते हैं कि इस बार के चुनाव में दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि प्रधानमंत्री ने भी हल्की भाषा का इस्तेमाल किया, उन्हें संयम बरतना चाहिए था. महेंद्र सुमन की बातें सही हैं. संयम सबको बरतना चाहिए था लेकिन किसी ने नहीं बरता.

सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज

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भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है. एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं. अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है. यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें. किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिंदुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है. यह मार-काट इसलिए नहीं की गई कि फलां आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलां आदमी हिंदू है या सिख है या मुसलमान है. बस किसी व्यक्ति का सिख या हिंदू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था. जब स्थिति ऐसी हो तो हिंदुस्तान का ईश्वर ही मालिक है.

ऐसी स्थिति में हिंदुस्तान का भविष्य बहुत अंधकारमय नजर आता है. इन ‘धर्मों’ ने हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है. और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे. इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है. और हमने देखा है कि इस अंधविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं. कोई बिरला ही हिंदू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठंडा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डंडे लाठियां, तलवारें-छुरे हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सिर फोड़-फोड़कर मर जाते हैं. बाकी कुछ तो फांसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिए जाते हैं. इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डंडा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है.

यहां तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे सांप्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है. इस समय हिंदुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली. वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज-स्वराज’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाए चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मांधता के बहाव में बह चले हैं. सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो सांप्रदायिक आंदोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं. जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं. और सांप्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आई हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे. ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है.

दूसरे सज्जन जो सांप्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं. पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था. आज बहुत ही गंदा हो गया है. यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौवल करवाते हैं. एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं. ऐसे लेखक बहुत कम हैं, जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शांत हो.

अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है. यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’

जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति देख रोना आता है. कहां थे वे दिन कि स्वतंत्रता की झलक सामने दिखाई देती थी और कहां आज यह दिन कि स्वराज एक सपना मात्र बन गया है. बस यही तीसरा लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है. जिसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया था, कि आज गई, कल गई वही नौकरशाही आज अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर चुकी है कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है.

यदि इन सांप्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है. असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्रकारों ने ढेरों कुर्बानियां दीं. उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गई थी. असहयोग आंदोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर अविश्वास-सा हो गया जिससे आजकल के बहुत से सांप्रदायिक नेताओं के धंधे चौपट हो गए. विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है. कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धांतों में से यह एक मुख्य सिद्धांत है. इसी सिद्धांत के कारण ही ‘तबलीग’, ‘तनकीम’, ‘शुद्धि’ आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है.

बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है. दरअसल, भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है. भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धांत ताक पर रख देता है. सच है, मरता क्या न करता. लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होना अत्यंत कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती. इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिए और जब तक सरकार बदल न जाए, चैन की सांस नहीं लेना चाहिए.

लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है. गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं. इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए. संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं. तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथों में लेने का प्रयत्न करो. इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जाएंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी.

जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि जार के समय वहां भी ऐसी ही स्थितियां थीं, वहां भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पतांग करते रहते थे. लेकिन जिस दिन से वहां श्रमिक-शासन हुआ है, वहां का नक्शा ही बदल गया है. अब वहां कभी दंगे नहीं हुए. अब वहां सभी को ‘इंसान’ समझा जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं. जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी. इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे. लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गई है और उनमें वर्ग-चेतना आ गई है इसलिए अब वहां से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आती.

इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन कलकत्ते के दंगों में एक बात बहुत खुशी की सुनने में आई. वह यह कि वहां दंगों में ट्रेड यूनियन के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन सभी हिंदू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे. यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे. वर्ग-चेतना का यही सुंदर रास्ता है, जो सांप्रदायिक दंगे रोक सकता है.

यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से, जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं. उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नजर से- हिंदू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन सभी को पहले इंसान समझते हैं, फिर भारतवासी. भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है. भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए. उन्हें यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, और दंगे हों ही नहीं.

1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था. वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं. न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सबको मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता. इसलिए गदर पार्टी जैसे आंदोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फांसियों पर चढ़े और हिंदू-मुसलमान भी पीछे नहीं रहे.

इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं. झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुंदर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं.

यदि धर्म को अलग कर दिया जाए तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं. धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें.

हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताए इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमें बचा लेंगे.

(आरोही पब्लिकेशन की ओर से प्रकाशित संकलन ‘इंकलाब जिंदाबाद’ से साभार)

गई जमीन अब जान के लाले

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तीन साल के एक बच्चे के कंधे पर 12 टांके आए हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि उसे पुलिस की गोली छूकर निकली है जबकि पुलिस का कहना है कि बच्चा ग्रामीणों के हमले में दराती से घायल हुआ है

इलाहाबाद जिले की करछना तहसील के कचरी गांव में करीब दो महीने से धारा 144 लागू है. पुलिस आैैर ग्रामीणाें में संघर्ष के बाद पूरे गांव में पीएसी तैनात है. गांव के कई घरों में ताले लगेे हैं. गांव सूना  पड़ा है. पुलिस की दहशत से गांव के 70 फीसदी लोग घरों में ताला लगाकर वहां से भाग गए हैं. जो घर खुले हैं, उनमें सिर्फ महिलाएं और बच्चे हैं. कई घरों के दरवाजे टूटे हैं. घरों के अंदर भी तोड़फोड़ की गई है. गांव वालों के मुताबिक इन्हें पुलिस ने तोड़ा है. गांव के सभी पुरुष पुलिस के डर से फरार हैं,  यहां सिर्फ महिलाएं, बच्चे और बूढ़े बचे हैं.

जमीन बचाने के लिए कचरी गांव के किसान 1,850 से ज्यादा दिनों से धरने पर हैं. इसी साल 9 सितंबर की सुबह 7 बजे किसान आंदोलनकारियों पर पुलिस ने धावा बोल दिया. ग्रामाणों और पुलिस के बीच जबर्दस्त संघर्ष हुआ. लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले छोड़े गए, जमकर पथराव हुआ, चापड़ चले और आगजनी भी हुई. ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिस ने एक घर में आग भी लगा दी. कई राउंड गोलियां चलाईं. धरनास्थल पर मौजूद लोगों की पिटाई की और उन्हें गिरफ्तार कर ले गई. हालांकि पुलिस ज्यादातर आरोपों से इंकार कर रही है. पुलिस का कहना है कि उन्होंने गोली नहीं चलाई और घर में आग खुद ग्रामीणों ने लगाई थी.

गांव के एक घर में दो ग्रेनेड फेंके गए. घर के अंदर की दीवारें काली पड़ गई हैं. गांव वाले कह रहे हैं कि यह ग्रेनेड पुलिस ने फेंका है जबकि पुलिस का कहना है कि बम घर के अंदर से फेंका गया. अब सवाल ये है कि अगर बम घर के अंदर से फेंका गया तो अंदर ही कैसे फट गया? यदि अंदर से कोई बम फेंक रहा था और बम अंदर ही फट गया तो कोई हताहत क्यों नहीं हुआ? बहरहाल, ये बम आर्टिलरी (आयुध कारखाने) के बने हैं, जिन पर सितंबर 2010 एक्सपाइरी डेट है. पुलिस अधिकारियों ने सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की एक जांच समिति के सवालों के जो जवाब दिए, उनमें हास्यास्पद किस्म का विरोधाभास है. अधिकारियों ने एक ही बातचीत में बार-बार बयान बदले हैं.

तीन साल के एक बच्चे के कंधे पर 12 टांके आए हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि उसे पुलिस की गोली छूकर निकली है जबकि पुलिस का कहना है कि बच्चा ग्रामीणों के हमले में दराती से घायल हुआ है. जो भी हो, पुलिस को कम से कम ऐसे सवाल का जवाब देना चाहिए कि चारपाई पर पड़े 84 साल के बुजुर्ग से सरकार को क्या खतरा था, जिसे घर में से घसीट कर पीटा गया? सरकार या पुलिस को 13-14 साल के बच्चे से क्या खतरा हो सकता है जिसे जेल में डाल दिया गया?

बहरहाल, गांव के 41 किसान इलाहाबाद की नैनी जेल में बंद हैं. इन 41 लोगों में 13 साल से लेकर 17 साल तक के नाबालिग और 75 साल के बुजुर्ग भी शामिल हैं. ये सभी बिना किसी सुनवाई के जेल में बंद हैं. इन लोगों के अलावा पुलिस अन्य किसानों और 300 अज्ञात लोगों के खिलाफ गैंगस्टर और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) की कार्रवाई की तैयारी कर रही है. महिलाओं और बच्चों के साथ आंदोलन में उतरे किसानों को प्रशासन ने उपद्रवी मानते हुए उनके खिलाफ हत्या के प्रयास सहित विभिन्न गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज कराए हैं.

आंदोलनकारियों के मुखिया किसान नेता राज बहादुर पटेल अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं. उन पर 12 हजार रुपये का इनाम है. उनके परिवार के 22 सदस्य जेल में बंद हैं. यह सब इसलिए हुआ है क्योंकि किसान अपनी जमीन किसी कंपनी को देने का विरोध कर रहे हैं, इसीलिए पुलिस उन्हें अपराधी मानती है. कचरी गांव के कई घरों में पुलिस ने तोड़फोड़ की है. राज बहादुर पटेल के घर की महिलाओं ने बताया, ‘नौ सितंबर को भारी संख्या में आई पुलिस ने पूरा गांव घेर लिया, जो सामने मिला, उसे पीटा, घरों में तोड़फोड़ की और 46 ग्रामीणों को पकड़ कर थाने ले गई. पुलिस दल के साथ डीएम भी थे.’

लगातार धारा 144 लागू होने, गांव में पुलिस की दबिश और उत्पीड़न के चलते गांववाले दहशत में जी रहे हैं. आठ अक्टूबर को एक किसान सहदेव (65) की मौत हो गई. ग्रामीणों का कहना है कि सहदेव की मौत पुलिस की प्रताड़ना और सदमे से हुई है. पुलिस गांव वालों को इतना प्रताड़ित कर रही है कि हर कोई भय में जी रहा है. इसी तरह से पास के कोहड़ार गांव में जय प्रकाश के घर पर बुलडोजर चलवाकर उसे ध्वस्त करा दिया है.

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पुलिस की दहशत से गांव के 70 फीसदी लोग घरों में ताला लगाकर वहां से भाग गए हैं. जो घर खुले हैं, उनमें सिर्फ महिलाएं और बच्चे हैं. कई घरों के दरवाजे टूटे हैं. घरों के अंदर भी तोड़फोड़ की गई है

इन किसानों का दोष बस इतना है कि वे अपनी जमीन जेपी समूह को नहीं देना चाहते. गौर करने लायक बात ये है कि सरकार भी ग्रामीणों से बातचीत करने को राजी नहीं है, वह कोर्ट का आदेश मानने को तैयार नहीं है कि किसानों की जमीन वापस की जाए. सरकार कोई भी यत्न करके ग्रामीणों से निपटने के मूड में है.

इलाहाबाद के पास के इलाके में 20 किलोमीटर की दूरी में तीन थर्मल पावर प्लांट लगाए जाने हैं. करछना और बारा में दो पावर प्लांट जेपी समूह के होंगे और बारा में एक प्लांट एनटीपीसी और यूपी पावर कॉरपोरेशन का होगा. इसके लिए भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना 23 नवंबर, 2007 को अधिग्रहण अधिनियम की धारा 4, 17(1) और 17(4) के तहत जारी हुई थी. तत्कालीन प्रदेश सरकार ने अधिग्रहीत जमीन पावर प्रोजेक्ट के लिए जेपी समूह को हस्तांतरित कर दी थी.

जब अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई तो कचरी के किसान नेता राजबहादुर पटेल की अगुवाई में दर्जनों किसानों ने अधिग्रहण के खिलाफ प्रशासन को आवेदन सौंपा लेकिन प्रशासन ने इसकी अनदेखी की और अधिग्रहण संबंधी कार्रवाई जारी रही. आखिरकार अप्रैल, 2008 में सात किसानों की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिग्रहण की योजना को चुनौती दी गई. इस प्रोजेक्ट के लिए 2010 में 2200 बीघा जमीन अधिग्रहीत की गई. सरकार ने जमीन का मुआवजा बाजार दर से दस गुना कम तय किया, कुल तीन लाख रुपये प्रति बीघा, जबकि तब जमीन का बाजार भाव 30 लाख रुपये प्रति बीघा था. यहां के किसान ‘किसान कल्याण संघर्ष समिति’ के बैनर तले भूमि अधिग्रहण के विरोध में लामबंद हैं. किसानों का संघर्ष जारी है तो पुलिस का दमन भी. इस मुद्दे पर अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा दूसरे संगठनों के साथ मिलकर आंदोलन कर रही है. विरोध के चलते अभी तक अधिग्रहीत जमीन की घेराबंदी पूरी नहीं हो सकी है.

22 अगस्त, 2010 से इलाके के किसान धरने पर बैठे. सरकार ने जब इस तरफ भी ध्यान नहीं दिया तो किसानों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया. प्रशासन ने बातचीत करके मसला सुलझाने की जगह आंदोलन को कुचलने का रास्ता अपनाया. जनवरी 2011 में अनशनरत किसानों पर लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले दागे गए और फायरिंग की गई. इस संघर्ष में पुलिस की गोली से एक किसान गुलाब विश्वकर्मा की मौत हो गई थी, जिसके कारण किसानों का गुस्सा बढ़ गया. उस वक्त किसानों के उग्र हो जाने पर पुलिस को पीछे हटना पड़ा था. इसके बाद 22 अगस्त 2015 को भी कचरी के 122 ग्रामीणों के विरुद्ध शांति भंग की धारा 107/116 के अंतर्गत कार्रवाई करते हुए नोटिस तामील किया गया.

इस बीच 13 अप्रैल, 2012 को हाईकोर्ट ने करछना में प्रस्तावित जेपी समूह के थर्मल पावर प्लांट के लिए भूमि का अधिग्रहण रद्द करते हुए कहा था कि किसानों को मुआवजा लौटाना होगा, इसके बाद उनकी जमीनें वापस कर दी जाएं. वहीं बारा पावर प्रोजेक्ट के मामले में किसानों की याचिका खारिज कर दी गई. दोनों ही मामलों में भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली अवधेश प्रताप सिंह और अन्य किसानों की याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया. बारा में जेपी के पावर प्रोजेक्ट के मामले पर कोर्ट ने कहा कि बारा प्लांट में निर्माण का कार्य काफी आगे बढ़ चुका है, इसलिए वहां भूमि अधिग्रहण रद्द किया जाना नामुमकिन है. नोएडा भूमि अधिग्रहण मामले में गजराज सिंह केस का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर अधिग्रहण के बाद प्रोजेक्ट पर काम प्रारंभ हो चुका है तो वहां का अधिग्रहण रद्द नहीं किया जा सकता है. बारा के किसान मुआवजे को लेकर अपनी लड़ाई जारी रख सकते हैं. करछना के किसानों के मामले में कोर्ट ने कहा कि अभी तक  परियोजना का कार्य शुरू नहीं किया गया है.

मामले में प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल जवाब में कहा गया कि किसानों के आंदोलन के कारण पावर प्लांट का कार्य प्रारंभ नहीं हो सका. तब कोर्ट ने कहा कि भूमि का अधिग्रहण मनमाने और मशीनरी तरीके से नहीं किया जा सकता. किसानों की आपत्तियों को सुनना जरूरी है. करछना मामले में कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह छूट दी है कि वह चाहे तो कानून के मुताबिक नए सिरे से अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर सकती है.

किसानों की मांग है कि पांच साल तक उनकी जमीनें सरकार के पास खाली पड़ी रहीं. अगर जमीनें उनके पास होतीं तो उस पर फसल पैदा की जाती. इसलिए सरकार पांच साल में उन जमीनों पर पैदा होने वाले अनाज की कीमत किसानों को दे लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की बात पर गौर करने की बजाय उनके विरोध को कुचलने के लिए पुलिस ने दमन का सहारा लेना शुरू कर दिया. गांववाले बताते हैं कि नौ सितंबर को गांव में पुलिसिया हमला करवाने वाले डीएम कौशल राज शर्मा ने धमकी दी थी कि जिस तरह उन्होंने मुजफ्फरनगर में दंगा करवाया था, वैसे ही यहां भी करवा सकते हैं इसलिए सुधर जाओ. उनका अब कानपुर तबादला हो चुका है. संजय कुमार नए डीएम बनकर आए हैं. कनहर गोलीकांड के बाद इनको सोनभद्र में लगाया गया था. जांच टीम के सदस्याें के साथ एक अनौपचारिक बातचीत में उन्हाेंने पिछले डीएम कौशल राज को ‘दंगा स्पेशलिस्ट’ भी बताया.

कुछ स्थानीय पत्रकारों ने बताया कि जिन जमीनों को लेकर मामला फंसा है, वे सारी अधिग्रहण से पहले आला अधिकारियों की पत्नियों और सगे-संबंधियों के नाम कर दी गई थीं, इसलिए किसानों को मुआवजा वापसी का नोटिस नहीं दिया जा रहा कि बात कहीं खुल न जाए. यह आरोप सही भी लगता है क्योंकि जब कोर्ट ने किसानों की जमीन वापस करने का आदेश दे दिया है तो प्रशासन जमीन वापस क्यों नहीं कर रहा है? इस सवाल पर डीएम संजय कुमार का कहना है, ‘अखबारों में विज्ञापन दिया गया लेकिन गांववाले पैसा वापस नहीं कर रहे हैं.’ जबकि ग्रामीणों का कहना है कि कैसे करना है, क्या करना है, हमें कुछ मालूम ही नहीं है. प्रशासन ने जमीन वापस करने की प्रक्रिया के बारे में कोई सूचना नहीं दी है. प्रशासनिक अधिकारियाें का कहना है कि वे जो कर रहे हैं, वह सब ‘ऊपर’ के आदेश के मुताबिक कर रहे हैं.

पुलिस की रिपोर्ट में गांव के आधे से ज्यादा लोग अधिग्रहण से असहमत हैं और अपनी जमीन नहीं देना चाहते. दूसरी तरफ डीएम से फोन पर हुई बातचीत में उन्हाेंने कहा कि अस्सी फीसदी लोग जमीन देने के लिए सहमत हैं यानी ग्रामीणों की असहमति और कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रशासन जमीन वापस करने की प्रक्रिया शुरू करने की बजाय अधिग्रहण की कोशिश में लगा है. प्रशासन का कहना है कि हम ग्रामीणों को सहमत करने का प्रयास कर रहे हैं. किसानों के इस आंदोलन से अलग ‘पावर प्लांट बचाओ आंदोलन’ भी चल रहा है जिससे सपा से पूर्व सांसद रेवती रमण सिंह भी जुड़े हैं. हाल ही में वे पावर प्लांट का काम पूरा कराने का संकल्प भी जता चुके हैं.

उधर, 26 सितंबर को नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर आंदोलन कर रहे किसानों से मिलने जा रही थीं, तभी इलाहाबाद पुलिस ने उनको समर्थकों के साथ हिरासत में ले लिया. मेधा भूमि अधिग्रहण का विरोध करने पर बच्चों और महिलाओं की जेल में डालने का विरोध कर रही हैं. वे किसानों से मिलना चाह रही थीं लेकिन जिलाधिकारी संजय कुमार ने उन्हें वहां जाने से रोक दिया. उन्होंने कहा, ‘गांव में धारा 144 लगी हुई है और किसी सभा की इजाजत नहीं है.’ प्रशासन ने मेधा को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में ही नजरबंद कर दिया था. उन्हें बाद में छोड़ दिया गया.

मेधा को नजरबंद किए जाने को लेकर पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई कि मेधा पाटकर की नजरबंदी गैरकानूनी थी. याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश सरकार से जवाबी हलफनामा तलब करके पूछा है कि मेधा और उनके समर्थकों को क्यों गिरफ्तार किया गया? पीयूसीएल की इस याचिका में कचरी गांव में धारा 144 लगाने को लेकर भी चुनौती दी गई है. गौरतलब है कि पुलिस ने 144 लागू करने का जो आदेश जारी किया है, उसमें कहा गया है कि प्रशासन को यह ‘आभास’ है कि क्षेत्र में अशांति की ‘संभावना’ है. सवाल यह भी है कि क्या ‘आभास’ और ‘संभावना’ के आधार पर किसी क्षेत्र में इतने लंबे समय तक धारा 144 लागू की जा सकती है?

गांव के एक घर में दो ग्रेनेड फेंके गए. घर के अंदर की दीवारें काली पड़ गई हैं. गांव वाले कह रहे हैं कि यह ग्रेनेड पुलिस ने फेंका है जबकि पुलिस का कहना है कि बम घर के अंदर से फेंका गया. बहरहाल, ये बम आर्टिलरी (आयुध कारखाने) के बने हैं, जिन पर सितंबर 2010 एक्सपाइरी डेट है
गांव के एक घर में दो ग्रेनेड फेंके गए. घर के अंदर की दीवारें काली पड़ गई हैं. गांव वाले कह रहे हैं कि यह ग्रेनेड पुलिस ने फेंका है जबकि पुलिस का कहना है कि बम घर के अंदर से फेंका गया. बहरहाल, ये बम आर्टिलरी (आयुध कारखाने) के बने हैं, जिन पर सितंबर 2010 एक्सपाइरी डेट है

अब इस आंदोलन में कई किसान संगठन शामिल हो गए हैं.  ‘कृषि भूमि बचाओ मोर्चा’ और ‘जन संघर्ष समन्वय समिति’ ने 27 अक्टूबर को बनारस में किसान-मजदूर संगठनों का एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया. इस सम्मेलन में तय किया गया कि पांच नवंबर को प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर सामूहिक धरना दिया जाएगा और 16 नवंबर को लखनऊ में धरना प्रदर्शन होगा.

उधर, जेल में बंद ग्रामीणों ने जमानत लेने से इनकार कर दिया है. उनका कहना है, ‘हमने कोई अपराध नहीं किया है. हमारी जमीन पर हमारा अधिकार है. सरकार जब तक चाहे, हमें जेल में रखे, पर हम जमानत नहीं लेंगे.’ गांव के एक बुजुर्ग ने एक लोकगीत गाकर अपनी भावनाएं कुछ इस तरह जाहिर कीं, ‘जब सर पर कफन को बांध लिया तब पांव हटाना न चाहिए…’ पर सवाल यह है कि जब सरकार ही इन गरीब ग्रामीणों को पांव पीछे हटाने पर मजबूर कर दे तो ये न्याय की अपेक्षा किससे करें?

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प्रशासन का सभी आरोपों से इंकार 

इलाहाबाद के जिलाधिकारी संजय कुमार ने इन आरोपों के मद्देनजर कहा, ‘ये सारे आरोप गलत हैं. हम जनता के दुश्मन नहीं हैं. हम जनता की सेवा के लिए हैं, अन्याय क्यों करेंगे? सबको साथ लेकर काम करना है.’ भारी संख्या में पुलिस बल तैनात करने या लाठी चार्ज करने की जरूरत क्या थी, इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘कुछ लोगों ने जनता को भड़काने की कोशिश की. रणनीति के तहत पुलिस पर हमला किया गया, जिसके बचाव में पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी.’

महिलाओं और बच्चों को भी जेल में डालने के बारे में उनका कहना है, ‘जिन लोगों ने माहौल खराब करने की कोशिश की, उन पर कार्रवाई की गई. कुछ और नाम भी प्रकाश में आए हैं, जिनके बारे में जांच की जा रही है.’ कोर्ट के आदेश के बावजूद जमीन वापसी की प्रक्रिया नहीं शुरू करने के सवाल पर उन्होंने कहा, ‘हमने प्रक्रिया शुरू की थी, अखबारों में विज्ञापन दिए थे, गांव में भी अधिकारियों को भेजा गया, लेकिन गांववालों ने कोई रुचि नहीं दिखाई. कोई अपनी जमीन वापस लेने नहीं आया.’ हालांकि, वे यह भी कह रहे हैं कि 80 फीसदी लोग जमीन देने के लिए सहमत हैं. बाकी को सहमत करने का प्रयास किया जा रहा है.

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‘सफेदपोशों को बचाने के लिए वीरप्पन को मारा’

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वीरप्पन से कथित संबंधों को लेकर कई लोग आपको खलनायक बता चुके हैं. क्या आप दस्यु सरगना वीरप्पन के साथ अपने संबंधों पर कुछ प्रकाश डालेंगे?

हम दोनों में समानता बस मूंछों तक ही सीमित है (हंसते हुए). खोजी पत्रकारिता करने के लिए हम लोगों ने 1988 में ‘नक्कीरण’ पत्रिका शुरू की. अगले ही साल डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) पी. श्रीनिवास की निर्मम हत्या के बाद तमिलनाडु में खौफ पसर गया. अखबारों ने खबर छापी कि इस जघन्य हत्याकांड के लिए चंदन तस्कर वीरप्पन जिम्मेदार है. उसने कथित तौर पर डीएफओ का सिर धड़ से अलग कर दिया था.

तब वीरप्पन के ठिकाने के बारे में किसी को जानकारी नहीं थी. इसलिए मैं उसकी खोज में निकल पड़ा. एक बार किसी ने मुझे मूछों वाले एक दुबले-पतले आदमी की तस्वीर दिखाई. शुरू में तो मुझे भी विश्वास नहीं हुआ कि इन अमानवीय हरकतों के पीछे ये दुबला-पतला आदमी था.

इसके बाद 1990 में कर्नाटक कैडर के पुलिस अधीक्षक हरिकृष्णा वीरप्पन को पकड़ने के लिए पुलिस बटालियन लेकर जंगल के अंदर गए. जंगल में जो मुठभेड़ हुई, उसमें एसपी हरिकृष्णा, एक इंस्पेक्टर और छह पुलिसवाले मारे गए. उसके बाद मैंने अपने सभी संवाददाताओं, फोटोग्राफर्स को इस चंदन तस्कर के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाने और उसकी फोटो भी हासिल करने को कहा.

हमारे ही एक संवाददाता सिवा सुब्रह्मणयम को उसकी तस्वीर हासिल करने में सफलता मिली लेकिन उसने फोटो देने वाले सूत्र का खुलासा नहीं किया. इसके फौरन बाद हमने अपनी पत्रिका में वीरप्पन के बारे में एक लेख प्रकाशित किया. उस लेख और तस्वीर ने स्पेशल टास्क फोर्स की काफी मदद की. उस समय के एसटीएफ चीफ वाल्टर देवराम ने ‘आउटलुक’ मैगजीन को दिए एक साक्षात्कार में माना कि उस लेख और फोटो से उन्हें पता चला कि जंगल में वीरप्पन नाम का कोई जंगली डाकू है. तब तक तो ये एक कोरी अफवाह की तरह था. इस तरह वीरप्पन के साथ हमारे संबंधों की शुरुआत हुई.

वीरप्पन ने जब कन्नड़ सुपरस्टार राजकुमार का अपहरण किया तब आपने एक दूत की भूमिका निभाई थी. ऐसी अफवाह थी कि वीरप्पन अभिनेता राजकुमार की रिहाई के लिए होने वाली बातचीत में तमिल सुपरस्टार रजनीकांत व स्व. सिवाजी गणेसन को शामिल कराना चाहता था. सच्चाई क्या है?

शुरुआत में जब वीरप्पन ने कुछ वन अधिकारियों का फिरौती के लिए अपहरण किया तब मुझे एक दूत बनाकर भेजा गया. उस मुलाकात के दौरान वीरप्पन ने मांग रखी कि बातचीत में रजनीकांत और सिवाजी गणेसन को भी शामिल किया जाए क्योंकि वह उन दोनों का प्रशंसक था. हालांकि उन बंधकों को छुड़ाने में मैं सफल हुआ लेकिन वीरप्पन की कई शर्तों को कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों ही राज्य सरकारों ने स्वीकार नहीं किया. इसलिए जब राजकुमार का अपहरण हुआ तब मैंने दूत बनने से इंकार कर दिया.

हालांकि उस वक्त डीएमके सुप्रीमो करुणानिधि और कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा का मुझ पर काफी दबाव था. मेरे पास रजनीकांत और सिवाजी गणेसन की तरफ से भी कई बार फोन आए. कर्नाटक में रहने वाले तमिलों पर भी दबाव बढ़ रहा था. राजकुमार के अपहरण के कारण कर्नाटक में रहने वाले लाखों तमिलों पर भी हिंसा का खतरा बढ़ रहा था क्योंकि राज्य के लोग अभिनेता राजकुमार को भगवान की तरह पूजते थे.

उस वक्त कर्नाटक में रहने वाले तमिलों की संख्या करीब 65 लाख थी. इसलिए मैंने कर्नाटक में रह रहे लाखों तमिलों की जान बचाने की खातिर फिर से दूत बनना स्वीकार किया. मैं जंगल में गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की वजह से वीरप्पन के साथ बातचीत सफल नहीं हो पाई. फिर करुणानिधि ने मुझे बंगलुुरु जाकर कर्नाटक सरकार को ताजा हालात से अवगत कराने को कहा.

दो कारणों के चलते करुणानिधि ने रजनीकांत से भी मेरे साथ जाने का अनुरोध किया. पहला, रजनीकांत न सिर्फ तमिलनाडु के सुपरस्टार हैं बल्कि पूरे दक्षिण भारत में उनकी शख्सियत का बोलबाला है. दूसरा, वे कन्नड़ बोलना जानते हैं. इस तरह हम दोनों एक चार्टर्ड फ्लाइट से कर्नाटक में एक जगह पहुंचे, जहां पुलिस की गाड़ियों के विशाल काफिले ने हमारा स्वागत किया. जब हमें बुलेटप्रूफ गाड़ी में बिठाया गया तब मैं हक्का-बक्का रह गया. इस बारे में जब मैंने रजनी सर से पूछा कि ये सुरक्षा बंदोबस्त आपके लिए किया गया है तब उन्होंने जवाब दिया कि मेरी जिंदगी को भी खतरा है. इस तरह वीरप्पन के चंगुल से राजकुमार को निकालने में रजनी सर ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. सिवाजी गणेसन ने शायद तमिलनाडु सरकार से इस बारे में चर्चा की होगी.

वीरप्पन की भविष्य की योजना क्या थी? वह जिंदगी भर फरार रहना चाहता था या फिर आत्मसमर्पण करना चाहता था? क्या उसने इस बारे में आपको कुछ बताया?

वीरप्पन बातचीत के लिए रजनीकांत और सिवाजी गणेसन को शामिल करने का दबाव इस वजह से डाल रहा था ताकि पुलिस के सामने आत्मसमर्पण के वक्त उसकी जान की सुरक्षा हो सके. शायद उसका मानना था कि अपहृत अभिनेता राजकुमार समेत प्रभावशाली अभिनेताओं की मौजूदगी तमिलनाडु और कर्नाटक की सरकार को उसके जघन्य अपराधों के लिए माफ करने के लिए मजबूर कर सकती है. वह अपने परिवार के साथ तमिलनाडु में बसना चाहता था. वह हथियार त्यागने के लिए भी तैयार था. हालांकि मौजूदा कानून उस जैसे खूंखार भगोड़े के लिए किसी भी तरह उपयुक्त नहीं थे कि उसे पूरी तरह क्षमादान मिल सके.

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क्या ये सच है कि लोग और पुलिस जंगल में अभी भी उसकी दौलत की खोजबीन में लगे हैं? आपको क्या लगता है वीरप्पन की मौत के बाद उसकी दौलत का क्या हुआ होगा?

हां, ये मैंने सुना है कि स्थानीय लोग अभी भी उसके पैसों को जंगल में ढूंढ़ रहे हैं. वे इसके लिए काफी मेहनत भी कर रहे हैं. हालांकि मेरा मानना है कि वीरप्पन अपने पीछे कोई संपदा छोड़कर नहीं गया. पैसे को संभालने में वीरप्पन कमजोर था. जो भी उसे मिला उसने स्थानीय समुदाय के खाने-पीने और अन्य जरूरतों को पूरा करने में खर्च कर दिया.

एसटीएफ ने उसे जिंदा पकड़ने की बजाय गोली क्यों मारी? इस तरह की अफवाह है कि कुछ वीवीआईपी लोगों को बचाने के लिए उसे खत्म कर दिया गया जिनके उसके साथ संबंध थे. क्या ये सच है? 

ये सच है कि उसे जिंदा पकड़ा गया था और मारने से पहले दो दिनों तक यातनाएं दी गई थीं. मारे गए इस डाकू की बिना मूछों वाली तस्वीर इस बात की तस्दीक करने के लिए काफी है. उसे अपनी मूंछों पर बहुत गर्व था. काटने की तो छोड़ो, वह अपनी मूंछों को किसी को छूने भी नहीं देता. मैं ये भी मानता हूं कि वह कई वीवीआईपी लोगों के करीब था जिनके राजनीतिक संपर्क थे. अगर उसे जिंदा पकड़ा जाता तो कई सफेदपोश लोग बेनकाब हो सकते थे इसी वजह से उसकी हत्या कर दी गई. यही नहीं, एसटीएफ भी वीरप्पन को कुचलने की कुंठा से भरी हुई थी.

‘ये बहुत मुश्किल है कि वीरप्पन जैसा कोई दोबारा पैदा हो. वह दिल से अच्छा इंसान था. पुलिस के अत्याचारों ने ही उसे क्रूरता के दलदल में धकेला’

दो दशकों से भी ज्यादा समय तक वीरप्पन को किसने पनाह दी? तमिलनाडु और कर्नाटक की सरकारों को उसे पकड़ने में इतना वक्त क्यों लग गया?

राज्य सरकारों की राजनीतिक रस्साकशी और दोनों राज्यों की एसटीएफ के बीच तनातनी के कारण ही उसे पकड़ने में ज्यादा वक्त लगा. वीरप्पन जंगल के चप्पे-चप्पे से अच्छी तरह वाकिफ था और आसानी व बहुत तेजी के साथ जंगल के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंच सकता था. वह पलक झपकते ही गायब हो जाने में माहिर था. बंदूकें और अन्य हथियार होने के बावजूद जंगल में पुलिस असहाय थी. यही नहीं, उसे जंगल में रहने वाले स्थानीय लोगों का भी समर्थन प्राप्त था जो पुलिस और एसटीएफ के निरंकुश व्यवहार से चिढ़ते थे. वीरप्पन गांव वालों पर होने वाले अत्याचारों से कठोरता से निपटता था इसलिए गांव वाले भी उसकी रक्षा के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार रहते थे.

क्या वीरप्पन का कोई उत्तराधिकारी बचा है?

नहीं. जहां तक मेरा मानना है उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं है. ये बहुत मुश्किल है कि वीरप्पन जैसा कोई दोबारा पैदा हो. वह दिल से अच्छा इंसान था. पुलिस के अत्याचारों ने ही उसे क्रूरता के दलदल में धकेला. उसने पहले डीएफओ पी. श्रीनिवास की हत्या की जिसने उसकी बहन के साथ बलात्कार किया था. इस वजह से उसकी बहन ने आत्महत्या कर ली थी.

आप वीरप्पन का आकलन किस तरह करेंगे?

वीरप्पन एक हत्यारा था, जो खुद को सुधारना चाहता था.

वीरप्पन : राक्षस या रक्षक!

Veerappan, Photo by Tehelka

‘वीरम विधैक्का पट्टथु’ तमिल भाषा के इन शब्दों का हिंदी में अर्थ है, ‘यहां वीरता के बीज बोए गए हैं’. ये शब्द पत्थर के एक टुकड़े पर खुदे हुए हैं जो घने जंगल की झाडि़यों में स्थित एक कब्र का पता साफ तौर पर देते हैं. हालांकि इस स्मृतिलेख के लेखक के नाम की खबर नहीं मिलती. अपनी भव्यता में बहती कावेरी नदी के उस पार मेट्टूर बांध के पास चट्टानों से घिरे जंगल में दस्यु सरगना वीरप्पन की कब्र है जो  वीरान नहीं है.

इस चंदन तस्कर की मौत को हालांकि अब 11 वर्ष गुजर चुके हैं, लेकिन वीरप्पन की कब्र पर अब भी उसके चाहने वाले खिंचे चले आते हैं. विशेषकर पश्चिमी तमिलनाडु के जंगल में बसे गांवों और कर्नाटक के चमराजनगर इलाके के लोग यहां बड़ी संख्या में आते हैं. इन लोगों के लिए वीरप्पन एक रक्षक था. इसीलिए हर वर्ष 18 अक्टूबर को लोग वीरप्पन की पुण्यतिथि पर उसे श्रद्धांजलि देने पहुंच जाते हैं. चेन्नई से 350 किलामीटर दूर औद्योगिक नगर मेट्टूर के सीमांत इलाके में यह कब्र स्थित है.

श्रद्धांजलि अर्पित करने आए एक श्रद्धालु मुरूगेसन का कहना है, ‘11 वर्ष पहले हमने यहां वीरता के बीज बोए हैं. बाहरी दुनिया के लिए वे भले ही चंदन तस्कर और हाथी दांत चोर रहे हों लेकिन इस इलाके के गरीब लोगों, जंगल और पुलिस अधिकारियों के हाथों सताए हुए लोगों के लिए वे एक मसीहा थे. वीरप्पन सिर्फ एक बागी ही नहीं थे बल्कि हमारे लिए  अभिभावक और एक देवदूत की तरह थे जो हमें हर तरह के जुल्म और बर्बरता से बचाते थे. हमें यकीन है कि वीरता के ये बीज एक दिन फिर से अंकुरित होंगे.’ 18 अक्टूबर, 2004 को धर्मपुरी के नजदीक एक गांव में पुलिस अधिकारी के. विजय कुमार के नेतृत्व में तमिलनाडु स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने वीरप्पन और उसके दो साथियों को मार गिराया था.

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वीरप्पन की पुण्यतिथि पर उसके समाधि स्थल पर उमड़ी भीड़

तब वीरप्पन की पत्नी मुथुलक्ष्मी की तरह मेट्टूर के अधिकांश लोगों ने भी एसटीएफ के एनकांउटर की कहानी को नकार दिया था. उस वक्त वीरप्पन आंशिक रूप से अपनी दृष्टि खो चुका था और इलाज की उम्मीद लिए गांवों में घूमता रहता था. ऐसे ही किसी मौके पर वह एसटीएफ के बिछाए जाल में फंस गया. स्थानीय निवासी और वीरप्पन के रिश्तेदार के. संबथ का कहना है, ‘इडली उन्हें बेहद पसंद थी और मटन करी के साथ इडली वह बहुत चाव से खाया करते थे. उनकी इस पसंद से वाकिफ एक रिश्तेदार ने एसटीएफ के कहने पर उन्हें इडली में जहर मिला कर खिला दिया था. खाना देने वाले आदमी पर वीरप्पन को पूरा भरोसा था. जहर मिली इडली खाकर वीरप्पन बेहोश हो गए. बेहोशी की हालत में वीरप्पन को पुलिस के हवाले कर दिया गया, जिसने उन्हें प्रताडि़त किया और फिर मार डाला.’ इसमें कोई शक नहीं कि आर्थिक मदद करने के चलते सत्यमंगलम, मेट्टूर और थलावाड़ी के लोगों के लिए वीरप्पन राॅबिनहुड की तरह था. गांववालों से जानकारी निकलवाने के लिए एसटीएफ अधिकारियों द्वारा की गई हिंसा ने स्वाभाविक रूप से वीरप्पन को उस क्षेत्र के लोगों का हीरो बना दिया था. ‘चाहे वह तमिलनाडु हो या कर्नाटक, हर जगह गांव वाले बड़ी संख्या में वीरप्पन के समर्थक थे.’ ये कहना है मुथुलक्ष्मी का, जो उस आदमी (वीरप्पन) से शादी करने का खामियाजा भुगत रही है जो भारतीय इतिहास के सबसे लंबे अपराधी खोज अभियान के शुरू होने का जिम्मेदार है. मुथुलक्ष्मी दिल दहला देने वाली घटनाओं का भी जिक्र करती हैं. ‘दूसरे बच्चे के जन्म के समय घने जंगल के बीच मेरे आसपास तकरीबन 10 महिलाएं थीं जो पुलिस और एसटीएफ के जवानों से लोहा ले रही थीं.’

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गांववालों के अनुसार, वीरप्पन ने पक्षपात को कभी भी बर्दाश्त नहीं किया. पुलिस के मुखबिरों के लिए वह एक बुरे सपने की तरह थे. उनके साथ वे बहुत सख्त थे, किसी दानव की तरह. दुविधा के क्षणों में फंसे निर्दोष गांववालों ने हमेशा वीरप्पन को प्राथमिकता दी. वीरप्पन की पुण्यतिथि पर मेट्टूर के लोगों के बीच खाना बांटने के बाद ‘तहलका’ से बात करते हुए मुथुलक्ष्मी कहती हैं, ‘पुलिस अब भी मुझे डराती है और वीरप्पन की पुण्यतिथि पर कोई आयोजन करने के मेरे मूलभूत अधिकारों को छीनना चाहती थी. बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने मुझे इसके लिए अनुमति दी. हालांकि पुलिस ने एक बार फिर इस आयोजन के लिए मुझे परेशान किया. आयोजन स्थल पर बैनर लगाने के लिए मेरे खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई.

मुथुलक्ष्मी का कहना है, ‘गांववालों को खाना खिलाना वीरप्पन के सम्मान में आयोजित पारिवारिक कर्मकांड का हिस्सा है. उन्हें गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने पर तसल्ली मिलती थी.’ जब मुथुलक्ष्मी से उनकी दोनों लड़कियों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने इस बारे में कुछ कहने से मना कर दिया. गांववाले उनके बारे में बताते हैं कि उन दोनों की शादी हो गई है और दोनों अब अपने-अपने परिवारों के साथ कहीं दूर रहती हैं. तमिलनाडु में सामाजिक सुधार के लिए कार्यरत ‘द्रविड़र विदुथलाई कषगम’ नाम के राजनीतिक संगठन के संस्थापक कोलाथुर मणि बताते हैं, ‘मेरे पिता लकडि़यों के ठेकेदार थे, हम नदी के रास्ते लकडि़यां लाते थे. फिर वीरप्पन के पिता बाद में मजदूरों के बीच लकड़ी ढोने की मजदूरी बांटते थे.’

वीरप्पन का परिवार कावेरी नदी के किनारे कर्नाटक की सीमा पर बसे गोपीनाथम गांव में रहता था. वीरप्पन बहुत कम उम्र से ही शिकार करने लगा था. बदला लेने के लिए एक खून करने के बाद से उसे जंगल में छिपकर रहना पड़ा. उसके बाद से ही वीरप्पन ने जानवरों का शिकार और चंदन की तस्करी शुरू कर दी. मणि का कहना है, ‘वह एक अच्छा इंसान था, लेकिन पुलिस की हिंसा ने उसे बर्बर बना दिया.’ वीरप्पन को 1980 में गिरफ्तार किया था, लेकिन वह जेल से भाग गया. बाद में फिरौती के लिए बड़े-बड़े लोगों के अपहरण और पुलिस व वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की हत्या के लिए कुख्यात हुआ. मेट्टूर, गोपीनाथम और थलावाड़ी जैसे कुछ अन्य गांवों के लोग वीरप्पन से आज भी बेहद प्यार करते हैं. वीरप्पन की पुण्यतिथि पर वे श्रद्धाजंलि देते हैं और उसके लिए प्रार्थना करते हैं.

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वीरप्पन की पत्नी अपनों बेटियों के साथ (फाइल फोटो)

वीरप्पन एक अनुशासित इंसान था और महिलाओं का वह बहुत सम्मान करता था. बलात्कार या यौन अपराधों को वह बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करता था. इसलिए महिलाएं अक्सर उसे ‘पेरियन्ना’ (बड़ा भाई) कहती थीं. 55 वर्षीय थंगमा अपने साथ हुई हिंसा को याद करते हुए बताती हैं, ‘वीरप्पन को पान के पत्ते बेचने के आरोप में पुलिस ने एक बार मुझे गिरफ्तार किया था. हिरासत में तत्कालीन एसटीएफ प्रमुख वाल्टर देवराम सहित कई पुलिस अधिकारियों ने मेरे साथ गैंगरेप किया था. इसके बाद मुझे अधमरा होने तक पीटा गया. आज वे अधिकारी खुलेआम घूम रहे हैं. सरकार उन लोगों को सजा क्यों नहीं देती, जिन्होंने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी.’

महिलाओं के साथ ज्यादती करने वाले लोगों को वीरप्पन सजा देता था. वास्तव में भारतीय वन सेवा अधिकारी पी. श्रीनिवास का सिर काट देने की घटना से वीरप्पन काफी कुख्यात हुआ था. इस अधिकारी ने कथित रूप से वीरप्पन की बहन का बलात्कार किया था. जिसके बाद उसकी बहन ने आत्महत्या कर ली थी.

एसटीएफ की हिंसा की शिकार मुनियम्मा कहती हैं, ‘किसी भी तरह का दुर्व्यवहार जो हम झेलते हैं, वह बलात्कार की तुलना में कुछ भी नहीं होता.’ गांव के पुरुषों और महिलाओं को अक्सर पुलिस अपने कैंप में ले जाती थी जिसे वह ‘वर्कशाॅप’ कहती थी. वहां उनसे सवाल किए जाते थे और बुरी तरह उन्हें प्रताडि़त किया जाता था. इसमें बलात्कार करने के साथ गुप्तांगों पर इलेक्ट्रिक शाॅक दिया जाना, अपंग बना देना और बुरी तरह पीटना शामिल था.

अपने साथ हुई ज्यादती को याद करते हुए मुनियम्मा गहरी सांस लेते हुए बताती हैं, ‘मुझे हिरासत में लेने के बाद मेरे कपड़े उतार दिए गए थे. फिर मेरे ऊपर पानी फेंका गया और मेरे गुप्तांग और वक्षों पर इलेक्ट्रिक शाॅक दिया गया. वीरप्पन ने ऐसे अमानवीय अधिकारियों से बदला लिया था.’ बाहरी दुनिया वीरप्पन को एक जघन्य अपराधी मानती है लेकिन मेट्टूर और आसपास के इलाकों के गांव वाले अब भी उसकी पूजा करते हैं. पुलिस की धमकियों के बावजूद स्थानीय समुदाय के लोग आज भी वीरप्पन की याद को जिंदा रखने की कोशिश में लगे हुए हैं.

‘लड़कियों के साथ बदतमीजी करने वाला आज बिहार का प्रतिष्ठित नेता है’

RRRRRRबात तब की है जब पटना साइंस कॉलेज से इंटरमीडिएट पास कर ताजा-ताजा निकला था और पास ही स्थित बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (आज का एनआईटी) पटना में एडमिशन लिया था. दोनों संस्थानों के बीच फासला महज चंद कदमों का ही था मगर वातावरण में जमीन-आसमान का फर्क था. ‘भावुक पढ़ाकू लड़कों’ से हम रातोंरात ‘भावी इंजीनियर’ में तब्दील हो चुके थे. अब हमारे पास करने के लिए सब कुछ था सिवाय पढ़ाई के. वहां प्रवेश लेते ही सीनियर छात्रों द्वारा जातिवाद की कुनैनी घुट्टी पिलाई जाती थी. खाने-पीने से लेकर रहना-सहना, हॉस्टल में रूममेट चुनने से लेकर दोस्ती करना, सब कुछ जातिवाद से संचालित होता था. किसी न किसी ग्रुप से जुड़कर रहना हर छात्र की मजबूरी थी. मजे की बात यह थी कि आपकी रैगिंग करने का अधिकार भी आपके ही ‘ग्रुप’ के सीनियर्स के पास था, किसी और की क्या मजाल जो आपको छू भी सके.

एकतरफा इश्क करने से तो कोई किसी को कभी रोक नहीं सका, मगर उस जमाने में  गर्लफ्रेंड भी बड़ा सोच-समझकर बनानी पड़ती थी. अपनी सीमाओं से बाहर की गई अनाधिकार चेष्टा प्रायः मारपीट पर खत्म होती थीं और दिल की कई दास्तानें दिल में ही दफन हो जाती थीं. चाहे-अनचाहे हमें भी फर्स्ट ईयर में एक जातिवादी ग्रुप से जुड़कर रहना पड़ा था. हमारा ग्रुप लीडर जबरदस्त महत्वाकांक्षी था. नेता बनने के सभी गुण उसमें कूट-कूट कर भरे हुए थे, मगर लड़कियों के सामने दाल नहीं गलती थी उसकी. लड़कों ने तो अपने लीडर को सिर-आंखों पर बैठा रखा था, पर लड़कियों की नजरों में उसे उपेक्षा ही दिखती. ज्यादा उपेक्षा प्रायः लोगों को सैडिस्ट (जिसे दूसरे को पीड़ा पहुंचा कर खुशी मिले) बना देती है. शायद यही हमारे लीडर के साथ भी हुआ.

एक रोज लीडर महाशय अपने दो खास गुर्गों के साथ क्लास शुरू होने से थोड़ा पहले ही क्लास में पहुंच गए और लड़कियों की बेंच पर चुपके से खुजली वाले पाउडर का छिड़काव कर दिया. हममें से अधिकांश ग्रुपवालों को यह बात पसंद नहीं आई लेकिन कायरता ने हमारी जुबान पर ताला जड़ रखा था. बेचारी लड़कियों की जो दशा हुई, उसका यहां जिक्र करना उन पर फिर से प्रताड़ना करने जैसा होगा. हालांकि सत्रह-अठारह वर्ष के हमारे बहुत सारे साथियों का उस दिन नेताओं के दोमुंहे चरित्र से साबका पड़ा. ओढ़ी हुई सहानुभूति, मदद का घिनौना प्रयास और जीत की खुशी से लीडर का चेहरा दमक रहा था, साथ-साथ वह अज्ञात अपराधियों को डांटने का दिखावा भी कर रहा था.

एक रोज लीडर महाशय ने लड़कियों की बेंच पर खुजली वाला पाउडर छिड़क दिया और हमारी कायरता के चलते हम चुप रहे

तब तक शायद हमारी क्लास के ही किसी बंदे ने खबर फैला दी और फाइनल ईयर के एक दबंग सीनियर वहां आ गए. असलियत उन्हें मालूम थी, सो उन्होंने दोषियों को खूब खरी-खोटी सुनाई और चेतावनी दी कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होनी चाहिए. लीडर को खून का घूंट पीकर माफी मांगनी पड़ी. इसे बदकिस्मती ही कहिए वे सीनियर महोदय जातिवादी नजरिये के हिसाब से प्रतिद्वंद्वी ग्रुप के थे. फिर क्या था! हमारे समूह के लीडर में जोश आ गया कि इस बेइज्जती का ऐसा बदला लेना है कि पूरा कॉलेज याद रखे. दबंग सीनियर की पिटाई का प्रोग्राम बन गया. किसी गुप्त क्रांतिकारी मिशन की तरह योजना बनी. खास-खास लोगों को उनकी भूमिका समझा दी गई. आखिर वह दिन आ गया जब सीनियर महोदय इलेक्ट्रिकल लैब में अकेले पाए गए. हमारे लीडर ने पहले तो उनका कॉलर पकड़ा, फिर जी-भरकर गालियां दीं. उस समय हमारे लीडर के हाथ में पिस्तौल भी थी. तब तक खासमखास गुर्गों ने अपने हाथ साफ करने शुरू कर दिए. हम दस-बारह थे, पिटनेवाला अकेला. किसी ने बेल्ट चलाई, किसी ने लोहे की चेन से मारा, एक ने तो वहां पड़ी ट्यूबलाइट की रॉड उनके सर पर फोड़ डाली. देखते ही देखते वे लहूलुहान हो गए.

मैंने ऐसा दृश्य सिर्फ फिल्मों में देखा था. उनकी पिटाई देख मेरी हिम्मत जवाब देने लगी. चक्कर खा कर गिर न जाऊं, सोचकर धीरे-धीरे मैं उस घेरे से बाहर निकलने लगा. मगर तब तक मेरे लीडर की निगाह मुझ पर पड़ गई. आंखें लाल कर वह चिल्लाया, ‘यह कायरता दिखाने का समय नहीं है राकेश! पीटो इसे.’ मेरे चेहरे की दुविधा पढ़ने में उसे कोई दिक्कत नहीं हुई. वह फिर गुर्राया, ‘या तो तुम इसकी पिटाई करो या हम लोग तुम्हें पीटेंगे.’

मरता क्या न करता! मैंने एक बार छह फुट के उस घायल सीनियर को देखा, एक बार अपनी पिद्दी सी काया को. फिर एक निर्मम घूंसा मैंने भी उस निरीह के पेट में जमा ही दिया. मेरे उस घूंसे से उस भले-मानुष को कितनी चोट पहुंची, वह तो मुझे नहीं पता, मगर उस घूंसे की चोट अपनी अंतरात्मा पर मैं आज भी महसूस करता हूं. कॉलेज छोड़ने के बाद फिर कभी उन सीनियर से मुलाकात नहीं हुई और माफी मांगने का सपना अधूरा ही रह गया. और हां! ये बता देना भी मैं अपना पुनीत कर्तव्य समझता हूं कि काॅलेज के हमारे लीडर महाशय आज बिहार के प्रतिष्ठित नेताओं में से एक हैं और भूतपूर्व मंत्री भी रह चुके हैं.

( लेखक कोल इंडिया लिमिटेड में मुख्य प्रबंधक हैं)

स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे रही मोदी सरकार

Modi222222ब्रिटेन के विश्व प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल ‘लैंसेट’ ने खराब स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान नहीं देने को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना की है. हाल ही में ‘लैंसेट’ के  संपादक रिचर्ड हॉर्टन ने एक अंग्रेजी दैनिक को दिए साक्षात्कार में कहा कि मोदी सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र पर पर्याप्त गौर नहीं कर रही है. उन्हाेंने आगाह किया है कि भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र बहुत खराब हालत में है और यह इस देश के वैश्विक नेता बनने की राह में एक रोड़ा है.

11 दिसंबर को प्रकाशित होने जा रहे ‘लैंसेट’ के ताजा अंक में भारत की स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में एक शोध पत्र शामिल किया गया है, जिसे दुनिया के कई मशहूर विशेषज्ञों ने लिखा है. इसमें मोदी सरकार द्वारा बजट में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को नजरअंदाज करने और उसके लिए पर्याप्त धन आवंटित न किए जाने पर गंभीर चिंता जताई गई है. इस शोध पत्र में मोदी के चुनावी वादों की भी याद दिलाई गई है.

रिचर्ड ने कहा, ‘भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर मैं कोई भी नीति, नया आइडिया या महत्वपूर्ण जनप्रतिबद्धता नहीं देख रहा हूं. सबसे अहम तो यह कि इसे लेकर कोई वित्तीय प्रतिबद्धता भी नहीं दिखती है.’ रिचर्ड ने कहा, ‘जबसे नरेंद्र मोदी की सरकार आई है, स्वास्थ्य क्षेत्र इसकी प्राथमिकता से एकदम बाहर हो गया है. भारत के लिए स्वास्थ्य राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है. यदि भारत में स्वस्थ जनसंख्या नहीं रहेगी तो सरकार भारत की संप्रभुता और स्थिरता सुनिश्चित नहीं कर पाएगी.’  संयुक्त राष्ट्र की भी एक रिपोर्ट में भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र पर चिंता जताई गई है.