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शिवसेना को गुस्सा क्यों आता है?

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फोटो- दीपक साल्वी

हाल ही में पाकिस्तानी गजल गायक गुलाम अली ने भारत में प्रस्तावित अपने सभी संगीत कार्यक्रम रद्द कर दिए. उन्होंने कहा कि वह भारत तब तक नहीं आएंगे, जब तक स्थितियां अनुकूल नहीं हो जातीं. गौरतलब है कि शिवसेना के विरोध के चलते ही मुंबई और पुणे में गुलाम अली का संगीत कार्यक्रम रद्द कर दिया गया था.  शिवसेना की उग्रता का यह सिर्फ इकलौता उदाहरण नहीं है, सूची काफी लंबी है. पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की किताब के विमोचन के दौरान शिवसैनिकों ने भाजपा के पूर्व नेता सुधींद्र कुलकर्णी का मुंह काला कर दिया. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के प्रमुख शहरयार खान के साथ बीसीसीआई अध्यक्ष शशांक मनोहर की बातचीत नहीं होने दी.

शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने बीसीसीआई मुख्यालय में घुसकर जमकर हंगामा काटा. शिवसेना ने पाकिस्तानी कलाकारों का विरोध करते हुए कहा कि वह उन्हें महाराष्ट्र में काम नहीं करने देगी. इसके अलावा जैन मंदिरों के सामने चिकन बेचने और पकाने का भी काम शिवसैनिकों ने बखूबी किया है. गौरतलब है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद से ही शिवसेना के तेवर पूरी तरह से बदल गए हैं. पार्टी ने अपनी उग्रता और ताकत का खुला प्रदर्शन किया है. मजेदार बात यह कि शिवसेना राज्य और केंद्र में सरकार की सहयोगी पार्टी के रूप में शामिल भी है. अगर हम राजनीतिक दल के रूप शिवसेना की बात करें तो पिछले कुछ दशकों में उसकी पहचान राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और मराठी अस्मिता को लेकर बनी है. अब महाराष्ट्र के आज के हालात को देखें तो इन मसलों पर शिवसेना की जमीन तेजी से खिसक गई है. उनके चचेरे भाई राज ठाकरे मराठियों के बीच उग्र राजनीति करके खुद को मराठी मानुष का सच्चा हितैषी बताते हैं. दूसरी ओर उनकी वरिष्ठ सहयोगी भाजपा खुद राष्ट्रवादी पार्टी होने का दावा करती है और बेहतर तरीके से हिंदुत्व की राजनीति कर रही है. ऐसे में शिवसेना के सामने विकल्प ही नहीं रह गया था. दरअसल, महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद से जो हालात पैदा हुए उसने शिवसेना के लिए उग्रता को जरूरी बना दिया. पिछले ढाई दशक से छोटे भाई की भूमिका निभा रही भाजपा का बड़ी पार्टी बनकर उभरना शिवसेना को पचा नहीं. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले शिवसेना ने पिछले 25 सालों से चले आ रहे गठबंधन को फायदे के लिए तोड़ा था. जानकारों की माने तो विधानसभा चुनावों के पहले भाजपा और शिवसेना का गठबंधन टूटने के पीछे बड़ी भूमिका युवा नेताओं खासकर आदित्य ठाकरे जैसों की थी. युवा नेता किसी भी कीमत पर ज्यादा सीटें लेने के पक्ष में थे. वे भाजपा से बड़ी जीत हासिल कर यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि चुनाव बाद महाराष्ट्र की सत्ता पर शिवसेना काबिज हो या फिर मुख्यमंत्री तय करने में उनकी अहम भूमिका हो, लेकिन चुनाव परिणाम उतने बेहतर नहीं आए जितनी उम्मीद थी. महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की नाकामी का पूरा फायदा शिवसेना नहीं उठा पाई. विधानसभा चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. बदले हुए हालात में शिवसेना ने भाजपा का दामन तो थाम लिया, लेकिन यदि हम पार्टी की सोच और बाल ठाकरे की हनक को याद करें तो यह बिल्कुल अप्रत्याशित था. राज्य सरकार में भी शिवसेना का वर्चस्व कायम नहीं रहा. जूनियर पार्टनर के तौर पर शामिल होने के चलते कोई भी महत्वपूर्ण विभाग उसके हाथ में नहीं रहा. पार्टी ने आत्मसर्मपण करने जैसी हालत में भाजपा का समर्थन किया, क्योंकि भाजपा के पास एनसीपी के रूप में शिवसेना का एक विकल्प मौजूद था. ऐसे में शिवसेना की कमजोर होती स्थिति से कार्यकर्ताओं का भी मनोबल गिर गया. पार्टी के सामने सबसे बड़ी समस्या ऐसे मुद्दों की तलाश करना था जिससे अपनी खोई हुई लोकप्रियता और हनक फिर से हासिल की जा सके. मुंबई विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के विभाग के अध्यक्ष सुरेंदर जोंधाले बताते हैं, ‘शिवसेना जब पिछली बार सत्ता में आई थी तब उनका मुख्यमंत्री था. महाराष्ट्र में अब शिवसेना छोटी पार्टी की भूमिका में है. मंत्रिमंडल में भी उसे महत्वपूर्ण विभाग नहीं मिला, इसलिए सरकार के बडे़ फैसलों में वह शामिल नहीं हो पाती. इसकी निराशा उन्हें है. भाजपा के बड़े नेता बाल ठाकरे से मिलने आते थे, उनसे सलाह मशविरा करते थे, वैसा वे उद्धव के साथ नहीं कर रहे हैं, शिवसेना के कार्यकताओं को यह बात भी बहुत अखर रही है. ऐसे में खुद को हताशा से उबारने के लिए शिवसेना उग्र राजनीति का सहारा ले रही है.’

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हमेशा उग्र रही है शिवसेना

शिवसेना हमेशा से उग्र पार्टी रही है. पाकिस्तान का हम 1990 से लगातार विरोध कर रहे हैं. इसमें अब तक कोई बदलाव नहीं आया है. हाल फिलहाल की घटनाएं उसी का नतीजा हैं. जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देना बंद नहीं करेगा, हमारा विरोध जारी रहेगा. हम स्थानीय चुनावों में जीत के लिए ऐसा विरोध नहीं कर रहे हैं. शिवसेना ने हर समय जनता के मुद्दे पर सरकार का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया है. जहां तक बात महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मुखिया राज ठाकरे की है, तो उन्होंने हमेशा रिक्शा-रेहड़ी वालों को परेशान किया है. आप ऐसा कोई भी उदाहरण नहीं दे सकते हैं, जब शिवसैनिकों ने आम आदमी को परेशान किया है. हमारे लिए राष्ट्र सबसे ऊपर है.

प्रेम शुक्ल, कार्यकारी संपादक, दोपहर का सामना

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मजबूरी है उग्र राजनीति करना

बाल ठाकरे के बाद शिवसेना की कमान संभालने वाले उद्धव ठाकरे पार्टी का एक नरम चेहरा माने जाते थे. बाल ठाकरे के तेवर उनके भतीजे राज ठाकरे में देखने को मिलते हैं, जिन्होंने उनके जीवित रहते समय ही 2006 में शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का गठन किया. वह बाल ठाकरे द्वारा शिवसेना की कमान अपने बेटे उद्धव को दिए जाने से नाराज थे. खैर, बाल ठाकरे से ही राजनीति का ककहरा सीखने वाले राज ठाकरे ने भी राजनीति की गली में उन्हीं की तरह की क्रिकेट खेली. मराठी मानुष के हक के नाम पर पूरबियों को महाराष्ट्र से बाहर निकालने और टोल टैक्स जैसे मुद्दों पर सरकार की नाक में दम करके राज ने यह दिखाना भी चाहा कि वही मराठियों के सच्चे हितैषी व बाल ठाकरे के असली राजनीतिक वारिस हैं. हालांकि महाराष्ट्र की जनता ने उन पर ज्यादा विश्वास नहीं जताया और चुनावों में उनकी पार्टी को कभी बहुत अच्छी सफलता नहीं मिली है. लेकिन अगर हम चुनावी गणित को समझे तो यह बिल्कुल साफ है कि महाराष्ट्र में शिवसेना की खराब हालत के लिए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जिम्मेदार है. विश्लेषकों का मानना है कि मनसे  ने खुद भले ही ज्यादा सीटें हासिल नहीं की, लेकिन वह शिवसेना को नुकसान पहुंचाने में सफल रही. ऐसे में महाराष्ट्र में अब शिवसेना के सामने यह मजबूरी है कि उसे अपना वोट बैंक बचाए रखने के लिए राज ठाकरे की पार्टी से ज्यादा खुद को मराठी अस्मिता का रक्षक दिखाना है. इसके चलते हाल ही में जैनों के पर्यूषण पर्व के दौरान मुंबई में कुछ समय के लिए मनसे के कार्यकर्ताओं के साथ शिव सैनिक भी चिकन बेचते नजर आए. आदित्य ठाकरे मुंबई में नाइटलाइफ के समर्थन में उतर गए. पार्टी ने फिल्म अभिनेता शाहरुख खान का भी समर्थन किया. ऐसे तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं. दरअसल शिवसेना कोई भी ऐसा मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहती है, जिससे ऐसा संदेश जाए कि वह मराठी मानुष के हित का ध्यान नहीं दे रही है. इसके अलावा वह मनसे से आगे दिखने के चक्कर में अधिक आक्रामक भी है. हालांकि शिवसेना के मुखपत्र ‘दोपहर का सामना’ के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल इसे दूसरा रंग देने की कोशिश करते हैं और कहते हैं, ‘जहां तक बात राज ठाकरे की है, तो उन्होंने हमेशा रिक्शा-रेहड़ी वालों को परेशान किया है. आप ऐसा कोई भी उदाहरण नहीं दे सकते हैं, जब शिवसैनिकों ने आम आदमी को परेशान किया है. हमारे लिए राष्ट्र सबसे ऊपर है. मजेदार बात यह है कि शिवसेना का मराठी मानुष का हमदर्द होने का दावा सिर्फ मनसे विरोध तक ही सीमित रह गया है. वह मराठवाड़ा में सूखे की मार झेल रहे और विदर्भ में खुदकुशी कर रहे किसानों के मसले पर उग्रता नहीं दिखा रही है. आश्चर्यजनक रूप से उनकी राजनीति आम आदमी की रोजमर्रा की परेशानियों से हमेशा दूर ही रहती है.

अस्तित्व बचाए रखने के लिए पाक राग

राजनीति में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए खुद को चर्चा में बनाए रखना ही सबसे अच्छा उपाय है क्योंकि चर्चा के बाद ही प्रासंगिकता पर बात होती है. शिवसेना ने यही रास्ता अपनाया है. पार्टी ने खुद की अलग पहचान दिखाने के लिए पुराने पड़ चुके पाकिस्तान के मसले को रिचार्ज किया है. पाकिस्तान विरोध के चलते शिवसेना की चर्चा पूरे देश में होती रही है. प्रेम शुक्ल कहते हैं, ‘पाकिस्तान का हम 1990 से लगातार विरोध कर रहे हैं. इसमें अब तक कोई बदलाव नहीं आया है. हाल फिलहाल की घटनाएं उसी का नतीजा हैं. जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देना बंद नहीं करेगा, हमारा विरोध जारी रहेगा.’ दरअसल, पाकिस्तान के उग्र विरोध के अलावा शिवसेना के बाकी मुद्दों पर उसकी सहयोगी भाजपा भारी पड़ रही है. विकास के मसले पर शिवसेना भाजपा की जूनियर पार्टनर होने के चलते पूरा श्रेय खुद नहीं ले पाएगी. हिंदुत्व का एजेंडा भाजपा की प्राथमिकता सूची में शामिल है. ऐसे में अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए शिवसेना ने आक्रामकता और उग्र राजनीति का पुराना पड़ चुका, लेकिन कारगर फाॅर्मूला पकड़ लिया. अब वह एक अलग पार्टी दिख रही है और हर मुद्दे पर विश्लेषक व जनता उसकी बातों पर ध्यान दे रहे हैं. हालांकि शिवसेना की मजबूरियां यहीं खत्म नहीं होती हैं. उसे सरकार में भी तब तक बने रहना है, जब तक कि यह सुनिश्चित न हो जाए कि अलग होने में उसका बड़ा फायदा है. शिवसेना भाजपा से अलग होने की गलती एक बार कर चुकी है. ऐसे में उसका नुकसान भी हुआ है. विश्लेषकों का मानना है कि अगर विधानसभा चुनाव में वह भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ती तो उसकी हैसियत बड़े भाई की होती.

Cइसके अलावा स्थानीय निकायों में भी कई जगह शिवसेना ने भाजपा के समर्थन से अपनी सत्ता कायम की है. ऐसे में भाजपा का साथ छोड़ने का मतलब अपने असर को कम करना है. यही नहीं अपना स्वतंत्र अस्तित्व तलाश रही शिवसेना अगर भाजपा का साथ छोड़ती है तो महाराष्ट्र और देश के बाकी हिस्सों में यह संदेश जाएगा कि ऐसा करके वह राष्ट्रवादी और हिंदुत्ववादी ताकतों को कमजोर कर रही है. शिवसेना यह तमगा भी हासिल नहीं करना चाहती. इसी के चलते शिवसेना की परंपरागत दशहरा रैली को संबोधित करते हुए पार्टी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे भाजपा को सख्त संदेश देने में पीछे नहीं हटे और कहा कि भविष्य शिवसेना का है और अगर जरूरत पड़ी तो वह अकेले आगामी लड़ाईयां (चुनाव) लड़ने को तैयार है. लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी सरकार में बनी रहेगी और महाराष्ट्र सरकार किसी भी तरह के खतरे में नहीं है. गौरतलब है कि विश्लेषकों का मानना था कि दशहरा रैली के दौरान शिवसेना भाजपा गठबंधन टूट सकता है. वैसे शिवसेना ने 19 जून 1966 को अपने गठन के बाद से ही कई बार अपने एजेंडे में बदलाव किया है. दरअसल शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे बहुत ही शातिर नेता थे. उन्हें यह बात अच्छी तरह से पता थी कि किस वक्त कौन सी चाल चलनी है और किसका विरोध करना है. शिवसेना ने पहले दक्षिण भारतीयों का विरोध किया, फिर वामपंथियों का, बाद में उत्तर भारतीयों का. कभी हिंदुत्व का एजेंडा इनके लिए सबसे ऊपर रहा, तो कभी पाकिस्तान का विरोध कर उग्र राष्ट्रवाद को हवा दी. समय के हिसाब से पार्टी ने हमेशा अपनी रणनीति बदली. लेकिन आज शिवसेना राजनीति के जिस चौराहे पर खड़ी है, वहां उसे पता ही नहीं है कि किस रास्ते को पकड़ना बेहतर होगा. ऐसे में घबराई और मजबूर शिवसेना को अपनी आक्रामक छवि को बनाए रखना ही एकमात्र विकल्प दिख रहा है.

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नई पीढ़ी के आगे आने से बदला है तेवर

शिवसेना सिर्फ राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि आंदोलन का नाम है. इसलिए प्रदर्शन करना इसका इतिहास रहा है. शिवसेना में जो नई पीढ़ी आई है, वह इसे आगे बढ़ा रही है. अभी हमें जो दिखाई दे रहा है, वह इसी का परिणाम है. सबसे अच्छी बात यह है कि यह सिर्फ राजनीतिक नहीं है. शिवसेना के कार्यकर्ता सामाजिक मामलों पर भी प्रदर्शन कर रहे हैं . मुझे नहीं लगता इसका कारण भाजपा के साथ किसी तरह की प्रतिद्वंद्विता है और न ही स्थानीय चुनावों को इसका कारण मानना चाहिए. यह बहुत ही स्वाभाविक है. नई पीढ़ी आक्रामक तरीके से आगे बढ़ती है और ऐसा हर पार्टी के लिए होना बहुत जरूरी भी है.

भरत कुमार राउत, पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनीतिक विश्लेषक

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भाजपा के अपने फायदे

इन सब बातों पर गौर करें तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर शिवसेना की आक्रामकता पर भाजपा चुप क्यों नजर आ रही है, जबकि शिवसेना ने अपनी बयानबाजी व आक्रामकता से केंद्र व राज्य में सहयोगी भाजपा के लिए कई बार असहज स्थिति पैदा कर दी है. दरअसल एनसीपी के रूप में विकल्प मौजूद होने के बावजूद चुप रहने में भाजपा का ही फायदा है, क्योंकि राज्य में एनसीपी की छवि बहुत साफ नहीं है, उसके नेताओं पर भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं. इसके अलावा सरकार में शामिल शिवसेना के उग्र होने के बावजूद भाजपा राज्य में अपना आधार तेजी से बढ़ा रही है. सरकार में शामिल होने के चलते भाजपा के हर निर्णय पर शिवसेना की मुहर लग ही जाती है. ऐसे में भाजपा के लिए यह गठबंधन घाटे का सौदा नहीं है. इस पर महाराष्ट्र भाजपा प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव सरोज पांडेय ने कहा, ‘भाजपा का शिवसेना के साथ गठबंधन सिर्फ विकास के लिए है. शिवसेना क्या कर रही है, इस पर हमे कुछ कहना नहीं कहना है. विकास हमारा लक्ष्य है. जिस दिन हमारे इस उद्देश्य पर आघात लगेगा, हम गठबंधन पर विचार करेंगे. इसके पहले तक भारतीय जनता पार्टी शिवसेना के साथ है.’ वैसे भी अगर हम बात शिवसेना की करें तो वह सिर्फ चुनावी फायदे के लिए उग्र है और इसमें सफलता मिलते ही उसके सुर नरम भी पड़ जाते हैं. इसका उदाहरण हाल ही में हुए कल्याण-डोबिंवली व कोल्हापुर महानगर पालिका के साथ ही 71 नगर परिषद चुनावों के परिणाम हैं. इन स्थानीय चुनावों में शिवसेना ने बेहतरीन प्रदर्शन किया, कई जगहों पर पहली बार उसके प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की. परिणाम आने के एक दिन बाद ही शिवसेना ने भाजपा के साथ संघर्ष विराम का संकेत देते हुए कहा है कि चुनावों के दौरान जो कुछ भी होता है, वह अस्थायी होता है और हमें पुरानी बातों को भूल जाना चाहिए. चुनाव से पहले शिवसेना के जिस आक्रामक रुख के कारण सहयोगी भाजपा के साथ उसके रिश्तों में गिरावट देखने को मिली थी, उसी आक्रामक रुख में नरमी के संकेत देते हुए शिवसेना ने कहा कि विकास सुनिश्चित करने के लिए हर किसी को साथ लेकर चलना चाहिए. ऐसे में विश्लेषकों का मानना है कि 2017 तक होने वाले स्थानीय चुनावों के कारण शिवसेना ऐसे उग्र हमले भाजपा पर जारी रखेगी और भाजपा उन्हें तब तक नजरअंदाज करती रहेगी, जब तक कि केंद्र या राज्य सरकार को कोई बड़ा नुकसान न उठाना पड़े.

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राजनीतिक हताशा का परिणाम है शिवसेना की उग्रता

शिवसेना जब पिछली बार सत्ता में आई थी तब उनका मुख्यमंत्री था. महाराष्ट्र में अब शिवसेना  छोटी पार्टी की भूमिका में है. मंत्रिमंडल में भी उसे महत्वपूर्ण विभाग नहीं मिला, इसलिए सरकार के बडे़ फैसलों में वह शामिल नहीं हो पाती. इसकी निराशा उन्हें है. भाजपा के बड़े नेता बाल ठाकरे से मिलने आते थे, उनसे सलाह मशविरा करते थे वैसा वे उद्धव के साथ नहीं कर रहे हैं, शिवसेना के कार्यकताओं को यह बात भी बहुत अखर रही है. ऐसे में खुद को हताशा से उबारने के लिए शिवसेना उग्र राजनीति का सहारा ले रही है. हालांकि उसे इसका फायदा नहीं मिल रहा है. भाजपा ऐसे मसलों पर चुप्पी साधकर शिवसेना को तवज्जाे नहीं दे रही है. बस समय-समय पर उसके नेता शिवसेना को उसकी हद याद दिलाते रहते हैं.

सुरेंदर जोंधाले, अध्यक्ष, राजनीति शास्त्र विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय

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आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं. फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था? आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं. फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था? 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आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं. फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था? आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं. फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था? आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं. फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था? आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं. फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था? आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं. फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था? आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं. फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था? आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं. फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था? आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं. फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था? आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं. फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था? आपकी फिल्म ‘कोर्ट’ के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक

गुमशुदगी का तिलिस्म

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बच्चों के खिलाफ होने वाले जघन्य अपराधों में गुमशुदा होने वाले बच्चों का मुद्दा कहीं गुम हो जाता है जबकि यह बात स्थापित हो चुकी है कि बच्चे केवल गुमते नहीं हैं बल्कि सुनियोजित ढंग से गुमाये जाते हैं. ऐसे बच्चे कहीं-किसी कारखाने में खट रहे हैं या फिर उनके अंग-भंग कर उनसे भीख मंगवाई जा रही है या फिर उन्हें देह व्यापार के धंधे में झोंक दिया जाता है. उनके अंग निकाल कर बेचे जा रहे हैं.

व्यथा कथा- 1

जून 2013 में गाजियाबाद जिले के मोदीनगर का 7 साल का वंश गुज्जर घर से एक किलोमीटर दूर रेल पटरी के आसपास खेल रहा था. अचानक एक ट्रेन आकर रुकी. वंश उसमें बैठ गया और ट्रेन चल दी. डर के कारण वह ट्रेन से उतर नहीं पाया. अंत में चेन्नई जाकर उतरा. घरवालों ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई. चेन्नई में घूमते-फिरते वंश को दो लोग मिले जो उसे सिलिगुड़ी ले आए और वहां से उसे पश्चिम बंगाल के सिंगला चाय बागान ले जाया गया. वहां से एक दंपति वंश को अवैध तरीके से गोद लेकर सिक्किम के दोदक गांव में ले गया. वहां दोनों उसके साथ मारपीट करने लगे. सितंबर 2015 में उनके पड़ोसी ने सूचना दी और चाइल्ड लाइन और स्थानीय स्तर पर काम कर रही संस्था ‘दृष्टि’ के प्रयास से बच्चे को वहां से बचाया गया.

‘दृष्टि’ संस्था के प्रमुख पासंग बूटिया बताते हैं, ‘वंश को उस परिवार के चंगुल से छुड़ाने के बाद हमने एक सप्ताह तक वंश को अपने आश्रय गृह ‘मंजुषा’ में रखा. बातचीत में उसने कई बार मोदीनगर का जिक्र किया था. हमारे काउंसलर ने इंटरनेट पर उसे मोदीनगर की कुछ जगहों की फोटो दिखाई. वंश ने उसमें से एक जगह ‘मोदी मंदिर’ काे पहचान लिया. इसके बाद हमने मोदीनगर के एसपी और एसएसपी को जानकारी दी. मेल भी किया लेकिन एक सप्ताह तक कोई जवाब नहीं आया. अंत में थक-हार कर संस्था ने वंश की पूरी जानकारी के साथ मोदीनगर थाने में फोन किया. यहां पर एसएचओ दीपक शर्मा ने जानकारी जुटाई और वंश को घर सौंपने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. आज वंश अपने घर पर है.’

व्यथा कथा- 2

14 अगस्त 2015 को सागर पब्लिक स्कूल, भोपाल में पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाला 11 वर्षीय निशांत स्कूल नहीं पहुंचा. गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई. गुम होने के तीन दिन बाद 50 लाख रुपये की फिरौती के लिए उसके घर फोन आया. मामला सुर्खियों में आया तो निशांत की जानकारी देने वाले व्यक्ति पर 50,000 रुपये का इनाम भी घोषित किया. मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को  हस्तक्षेप करना पड़ा. इसके बाद पुलिस और प्रशासन की टीम खोजबीन में जुट गई. आखिरकार नौ दिन बाद निशांत की सकुशल घर वापसी हो गई. अपहरणकर्ताओं ने उसे रायसेन के जंगलों में छोड़ दिया था. लौटकर निशांत ने बताया कि उसे स्कूल जाते समय ही तीन अज्ञात लोगों ने अगवा कर लिया. कार में ही निशांत के कपड़े बदल दिए गए. इस घटना के डेढ़ माह बाद भी अपहरणकर्ता पुलिस गिरफ्त से बाहर हैं.

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व्यथा कथा- 3

मध्य प्रदेश के मंडला जिले के पड़वार गांव की रविता अपने घर से एक दिन अचानक गायब हो गई. साल-दो साल उसकी खोज हुई और फिर घरवालों ने मान लिया कि अब वह नहीं आएगी या वो इस दुनिया में नहीं रही. इस वाकये के पांच साल बाद रविता अपने घर लौट आई. घरवालों की खुशी का ठिकाना न रहा, लेकिन यह खुशी तब काफूर हो गई जब उन्हें यह पता चला कि रविता के साथ एक बेटा भी है. रविता ने जब अपनी आप बीती सुनाई तो घरवालों के पांव तले जमीन खिसक गई. उसने बताया कि नौकरी दिलाने के नाम पर गांव की कमलावती नवल नाम के एक व्यक्ति के साथ उसे दिल्ली ले गई थी. वहां पर अच्छी नौकरी की जगह एक घर में झाड़ू-पोंछा करने की नौकरी मिली. दो महीने बाद उसे ईरान के एक व्यक्ति के हाथ बेच दिया गया.

रविता के अनुसार, ‘दिल्ली में काम करते-करते कब मेरा सौदा हो गया, मुझे पता ही नहीं चला. जहां मैं रहती थी उस परिवार ने मुझे बेच दिया. फिर जहाज में ईरान ले जाया गया. वहां डेढ़ वर्ष तक मुझे कमरे में बंद करके रखा गया. मुझसे कोई काम ताे नहीं कराया जाता था, लेकिन उस बीच लगातार शारीरिक शोषण होता रहा.’

इसके बाद रविता को गर्भ ठहर गया और वह मां बन गई. रविता के दुख से पड़ोस का एक व्यक्ति वाकिफ था. एक दिन उस व्यक्ति ने उसे आजाद करा दिया. वह व्यक्ति उसे अपने साथ कोलकाता लाया. फिर किसी तरह वह दिल्ली पहुंची. दिल्ली में उसे दो दिन भटकना पड़ा. उसे याद था कि महाकौशल एक्सप्रेस जबलपुर जाती है. वह उससे जबलपुर आ गई. फिर जबलपुर से मंडला तक ट्रैक्टर में बैठकर आई. मंडला से अपने गांव के नजदीक स्थित गुढ़ली कस्बे (50 किमी) तक का सफर पैदल तय किया और किसी तरह घर पहुंची. रविता अभी भी पड़वार में ही है लेकिन आज तक न तो नवल पर कोई कार्रवाई हुई, न ही कमलावती पर.

व्यथा कथा- 4

इसी साल अगस्त महीने में हरियाणा के फरीदाबाद के पास बाटा चौक स्टेशन के पास रहने वाली 10 साल की चुनचुन अचानक गायब हो गई. घरवालों ने थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई. इसके पांच दिन बाद चुनचुन मध्य प्रदेश के खजुराहो के एक होटल में मिली. इलाहाबाद की एक महिला चुनचुन को देह व्यापार के धंधे में उतारना चाह रही थी, इसलिए उसका सौदा करने खजुराहो ले गई थी. पुलिस और स्थानीय संस्था ‘अधर’ की कोशिशों से उस रैकेट का भंडाफोड़ किया जा सका.

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चुनचुन

व्यथा कथा- 5

12 फरवरी 2009 की शाम नाबालिग नीता भोपाल स्थित अपने घर से शौचालय जाने के लिए बाहर निकली. उसके बाद दो महीनों तक वह वापस नहीं लौट सकी. वह इसके दो दिन पहले ही सिवनी जिले के गांव आमगांव से अपने छोटे भाई के साथ नौकरी करने भोपाल आई थी. तीसरे ही दिन उसके साथ काम करने वाले हीरा ने उसका अपहरण कर लिया. उसे राजस्थान के डोकरखेड़ा ले जाया गया. यहां उसे 60,000 रुपये में रमेश को बेचा गया. रमेश ने दो महीने तक उसे जबरदस्ती पत्नी बनाकर रखा. घर का सारा कामकाज कराने के साथ उससे मजदूरी भी कराई. नीता बताती है, ‘काम में जरा भी गलती हो जाने पर मारा-पीटा जाता था.’ एक दिन मौका मिलने पर एक स्थानीय व्यक्ति की मदद से नीता वहां से भाग निकली. यहां भी नीता का दुख कम नहीं हुआ. इस व्यक्ति ने भी नीता का सौदा करने की कोशिश की, लेकिन सौभाग्य से वह उसके चंगुल से भी बच निकली. फिर नीता को बालाघाट के समाजसेवी महेश चौरसिया की मदद से बचाया जा सका. फिलहाल नीता अपने गांव में है.

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बच्चों और महिलाओं को गायब कर उनको बेचने का धंधा अब जिले/राज्य और राष्ट्र की परिधि को लांघ चुका है. यह जानकर आश्चर्य होगा कि मध्य प्रदेश के आदिवासी जिले से गायब हुई बालिका ईरान में मिली

ये पांचों प्रकरण तो बानगी हैं लेकिन सभी गुमशुदा बच्चे इतने खुशनसीब नहीं होते. ऐसा नहीं कि सारे गुमशुदा बच्चे मिलते ही नहीं हैं. इनमें से अधिकांश बच्चे जो खुद से गुमते हैं, कुछ नाराज होकर घर से भाग जाते हैं, वे देर-सबेर लौट आते हैं, लेकिन जो बच्चे नहीं मिलते, उनकी संख्या इनसे कहीं ज्यादा है.

भारत में गुमशुदा बच्चों के बाल-व्यापार में धकेले जाने का कोई प्रामाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. हालांकि स्थिति की गंभीरता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद में विगत वर्ष बताया कि 2011-14 के बीच 3.25 लाख बच्चे भारत से गायब हुए, इनमें से 55 फीसदी लड़कियां हैं और 45 फीसदी का कुछ पता नहीं चल पाया है. इसके मायने हैं कि हर साल 1 लाख और प्रतिदिन 296 बच्चे गायब हो रहे हैं. इन बच्चों में से सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश से गायब हुए. दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश और तीसरे नंबर पर महाराष्ट्र है. आखिर गायब हुए ये बच्चे जाते कहां हैं?

इन प्रकरणों में हम पाते हैं कि बच्चे गुमशुदा के रूप में दर्ज तो हुए लेकिन जब ये मिले, तब तक ये बाल व्यापार का शिकार हो गए थे यानी गुमशुदा बच्चे अब केवल एक पहेली नहीं हैं बल्कि अब यह स्थापित हो गया है कि अब बच्चे केवल गुमते नहीं हैं बल्कि सुनियोजित ढंग से गुमाये जाते हैं. गुम होने के बाद या तो इनसे किसी कारखाने में बंधुआ मजदूरी करवाई जाती है या फिर उनके अंग-भंग कर उनसे भीख मंगवाई जा रही है आैैर लड़की हुई तो उसे देेह व्यापार में धकेल दिया जाता है. उनके अंग निकाल कर बेचे जा रहे हैं. इतना ही नहीं ड्रग ट्रैफिकिंग के लिए भी बड़े पैमाने पर बच्चों के इस्तेमाल के मामले सामने आ रहे हैं.

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नीता

पिछले एक दशक से एक नए व्यवसाय ने पैर पसारे हैं और यह है विवाह. विवाह के लिए लड़कियों को खरीदा-बेचा जा रहा है. यह भी एक सुनियोजित व्यवसाय है और इसके लिए बाकायदा लड़कियों की बोली लगाई जा रही है. मध्य प्रदेश और देश के उन हिस्सों और उन समुदायों में जहां लिंगानुपात बहुत कम है, बड़े पैमाने पर लड़कियों को बेचा जा रहा है. ऐसे कुछ मामलों में परिवारवालों की भी सहमति होती है लेकिन न तो परिजनों को पता होता है और न ही लड़कियों को, कि उनकी शादी किससे हो रही है. सहमति से जा रही लड़की को भी शादी के मंडप में बैठकर या कई बार शादी के बाद में ही पता चलता है कि उसकी शादी किससे की जा रही है. मामले में झारखंड और असम जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों से लड़कियों को बेचा जा रहा है. हरियाणा में विवाह के नाम पर लड़कियों को बेचने के कई मामले सामने आए हैं. गुमशुदा बच्चे और इनका व्यापार अब संगठित गिरोंहों द्वारा संचालित किया जा रहा है. यह गिरोह बहुत ही व्यावसायिक तरीके से काम करता है. इनके चेकिंग पॉइंट्स और स्टेयिंग प्वाइंट्स (रहने की जगह) आदि हैं. इनकी एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया है. सबसे पहले घरेलू काम के बहाने बड़े पैमाने पर बच्चों/महिलाओं को बाहर ले जाया जाता है और एक बार विश्वास जमने पर उन्हें बेच दिया जाता है. हाल ही में झारखंड से खरीदी गई तीन नाबालिग लड़कियों को दिल्ली के शकूरपुर की एक प्लेसमेंट एजेंसी के आॅफिस से बरामद किया गया है. बच्चों और महिलाओं को गायब कर उनको बेचने का यह धंधा अब जिले/राज्य और राष्ट्र की परिधि को लांघ चुका है. यह जानकर आश्चर्य होगा कि मध्य प्रदेश के ठेठ आदिवासी जिले, मंडला से गायब हुई बालिका ईरान में मिली. उसका कहना था कि दिल्ली से जब उसे बेचा गया तब वहां ऐसी कई लड़कियां और थीं.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने वर्ष 2004-05 में अपनी रिपोर्ट ‘एक्शन रिसर्च ऑन ट्रैफिकिंग इन विमेन एंड चिल्ड्रेन’ में यह जिक्र किया है कि जिन बच्चों का पता नहीं लगता वास्तव में लापता नहीं होते, बल्कि उनका अवैध व्यापार किया जाता है. रिपोर्ट इस तथ्य की ओर भी इशारा करती है कि 80 प्रतिशत पुलिस वाले गायब होने वाले बच्चों की तलाश में कोई रुचि नहीं दिखाते. आयोग के अनुसार भारत में हर साल लगभग 45 हजार बच्चे गायब होते हैं और इनमें से 11 हजार बच्चे कभी नहीं मिलते. नोबल पुरस्कार विजेता और बचपन बचाओ आंदोलन संस्था के अध्यक्ष कैलाश सत्यार्थी कहते हैं, ‘जो बच्चे गायब हो रहे हैं इन्हंे गुमशुदा बच्चे कहना सही नहीं है. ये गुम नहीं होते बल्कि इनको चुराया जाता है. मानव तस्करी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अवैध व्यापार है.’

देश में बच्चों के रहस्यमय ढंग से लापता होने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) का कहना है कि हर साल 30,000 से ज्यादा बच्चे वापस नहीं मिलते. ऐसे गुमशुदा बच्चों की तादाद निरंतर बढ़ रही है, जिनके बारे में पुलिस कोई सुराग नहीं ढूंढ पाती है. पिछले 3.5 साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो गायब हुए बच्चों की संख्या 30 प्रतिशत से बढ़कर 58 प्रतिशत तक पहुंच गई है. इससे यही जाहिर होता है कि या तो मानव तस्करी में शामिल गिरोह ज्यादा सक्रिय हो गए हैं या फिर पुलिस की लापरवाही बढ़ती गई है. हालांकि सीबीआई ने इस साल की शुरुआत में ही एक ऐसे गिरोह को पकड़ने में कामयाबी हासिल की जो दिल्ली के रास्ते लगभग 8,000 नेपाली महिलाओं को दुबई भेज चुका था. सीबीआई ने इसके अलावा कई अन्य प्रकरणों में भी मुस्तैदी दिखाई है.

मानव तस्करी पर शिकंजा कसना सरकारों के लिए चुनौती बना हुआ है. हालांकि बाल अधिकारों की रक्षा और मानव तस्करी रोकने के लिए कई कड़े कानून हैं पर इन कानूनों के अमल में मुस्तैदी नहीं बरती जाती, जिसका फायदा मानव तस्करी करने वाले उठाते रहते हैं. एनसीआरबी की हालिया रिपोर्ट ‘भारत में अपराध’ कहती है कि वर्ष 2014 में देशभर में मानव तस्करी के 5,466 मामले सामने आए हैं. 2013 में बचपन बचाओ आंदोलन के ऐतिहासिक प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने गुमशुदा बच्चों की तलाश के लिए पुलिस को दिशानिर्देश दिए थे लेकिन इन निर्देशों को किसी राज्य की पुलिस ने जस का तस लागू किया हो, ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता. हर गुमशुदा बच्चे की थाने में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज किया जाना अनिवार्य है लेकिन अभी भी अधिकांश प्रकरणों में ऐसा नहीं हो रहा है. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी वर्ष 2012 में गुमशुदा बच्चों के मामले में पत्र लिखकर सभी राज्य सरकारों को कई सुझाव और निर्देश भेजे थे. इन सुझावों में प्रमुख थे:

  • प्रत्येक गुमशुदा बच्चे की 24 घंटे में ही अनिवार्य रूप से एफआईआर दर्ज करना.
  • रिपोर्ट दर्ज होने के 48 घंटे बाद तक बच्चा न मिलने की स्थिति में प्रत्येक गुमशुदा बच्चे की फाेटो और उसकी पहचान से जुड़े दस्तावेज समस्त आधिकारिक संस्थानों और एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट, प्रिंट व इलेक्ट्राॅनिक मीडिया को भेजा जाए.

हालांकि आंध्र प्रदेश को छोड़कर किसी भी राज्य सरकार ने इस पर ज्यादा तत्परता नहीं दिखाई थी. सवाल यह है कि इन तस्करों को सलाखों के पीछे भिजवाने की सरकार और प्रशासन की कितनी तैयारी है? पिछले कई सालों में सरकारें इस मसले पर थोड़ी चेती तो हैं लेकिन यह नाकाफी है. मध्य प्रदेश में 16 और देश के अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में 100 से ज्यादा एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट बनाई गई हैं. इनसे कुछ आस तो बनती है लेकिन जिस स्तर की यह समस्या है उसके हिसाब से यह बहुत ही कम है. पुलिस तंत्र में सात साल तक ही गुमशुदा का प्रकरण सुरक्षित रहता है और उसके बाद वह प्रकरण स्वतः समाप्त हो जाता है. ध्यान रहे कि बच्चा मिले या न मिले, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है.

बाल संरक्षण का बजट बढ़ा है लेकिन बच्चों के कुल बजट का केवल .04 प्रतिशत ही बाल सुरक्षा के लिए है. इस आवंटन से यह स्पष्ट है कि सरकारों की प्राथमिकता में न तो बच्चे हैं और न ही उनकी समस्याएं

इस मसले पर सरकार की संवेदनशीलता कितनी है, इसका पता इस बात से चलता है कि गत जुलाई माह में ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए गुमशुदा बच्चों की गलत व भ्रामक संख्या देने पर केंद्र सरकार पर 25,000 रुपये का अर्थदंड लगाया था और फिर से रिपोर्ट मांगी है. कोर्ट ने कहा कि 2013-15 के दौरान गुमशुदा बच्चों के जो आंकड़े राज्यसभा (79,721) में पेश किए गए, वे महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से पेश किए गए आंकड़े (25,834) से काफी अलग हैं.

गुमशुदा बच्चों के मामलों को देखते हुए देश में पुलिस की स्थिति पर भी गौर करने की जरूरत है. एनसीआरबी की रिपोर्ट, ‘भारत में अपराध-2013’ के अनुसार संयुक्त राष्ट्र संघ के मानकों के मुताबिक प्रति एक लाख की जनसंख्या पर 220 पुलिसकर्मी होने चाहिए, परंतु भारत में अभी 136 ही हैं. स्वीकृत पदों के आधार पर अभी भारत को 8.86 लाख पदों को सृजित करने की जरूरत है ताकि मानकों के मुताबिक 26.73 लाख पुलिसकर्मी हो सकें. पुलिस महानिदेशकाें से लेकर उप पुलिस महानिरीक्षकों के 1,432 में से 1,248 पद ही भरे हैं. जमीनी स्तर पर तो हालात और भी खराब हैं. देश भर में सहायक उपनिरीक्षकों के 15,13,311 पदों में से 3,63,505 पद खाली हैं, जिनमें से उत्तर प्रदेश में 60 फीसदी, छत्तीसगढ़ में 40 फीसदी, गुजरात में 25 फीसदी तथा मध्य प्रदेश में 20 फीसदी पद खाली पड़े हैं. केवल पंजाब में ही स्वीकृत पदों से एक फीसदी ज्यादा पुलिसकर्मी हैं.

‘हक- सेंटर फाॅर चाइल्ड राइट्स’ की ओर से ‘बजट विश्लेषण पाॅलिटिक्स, पैसा और प्रीऑरिटीज’ को देखने से यह पता चलता है कि मोदी सरकार ने अपने बजट का केवल 4.52 फीसदी ही बच्चों के लिए सुरक्षित रखा है. हालांकि बस यह बात ही सुकून देने वाली है कि बाल संरक्षण का बजट कुछ बढ़ा है लेकिन बच्चों के कुल बजट का केवल .04 प्रतिशत ही बाल सुरक्षा के लिए है. ‘हक’ की को-डायरेक्टर भारती अली कहती हैं, ‘इस आवंटन से यह तो बहुत हद तक स्पष्ट है कि सरकार की प्राथमिकता में न तो बच्चे हैं और न ही उनकी यह समस्या.’ सरकार और पुलिस तंत्र संवेदनहीन है. पुलिस की ओर से छानबीन का दायरा मौका-ए-वारदात पर मिले लोगों तक सीमित रखा जाता है जबकि मानव तस्करी में भर्ती करने वाले, सवारी ढोने वाले, दलाल, शरण देने वाले, शोषक, षड्यंत्रकारी, शह देने वाले जैसे अनेक लोग शामिल होते हैं. मानव तस्करी संगठित अपराध है और इसके बारे में हर प्रकार की खुफिया जानकारी एक-दूसरे को देने और सभी संपर्कों की गहराई से छानबीन करने की जरूरत होती है लेकिन अभी तक इसकी तैयारी कम ही दिख रही है जिसके चलते लाखों बच्चे हमारे बीच से गायब हो रहे हैं और सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं. सरकारी हीलाहवेली पर ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ की याचिका (75/2012, बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत सरकार व अन्य) पर सुनवाई करते समय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी बहुत ही मौजूं है. न्यायालय ने कहा था, ‘पुलिस बड़े लोगों के बच्चे खोजने में पूरी टीम लगा देती है जबकि गरीबों के बच्चों के लापता होने की एफआईआर भी दर्ज करने की जहमत नहीं उठाती.’

(सभी नाम परिवर्तित हैं)

‘ये हो सकता है तो कुछ भी हो सकता है’

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फोटोः जीनू राज

आत्मकथाएं लिखना चुनौती भरा काम होता है. अपने जीवन पर आधारित नाटक लिखने का विचार आपको किस तरह से आया?

12 या 15 साल पहले मैं अपने जीवन के एक बुरे दौर से गुजर रहा था. मेरे निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘ओम जय जगदीश’ का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा. उसके बाद मेरा चेहरा आंशिक तौर पर लकवे का शिकार हो गया और जो कंपनी मैंने शुरू की वह भी लगभग दिवालिया हो गई. तब दो जाने-माने पब्लिशिंग हाउस मेरे पास आत्मकथा लिखने का विचार लेकर आए. हालांकि मैं लेखक नहीं था. इसलिए उसके बाद जो भी मेरे दिमाग में आता मैं उसे रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया. जब ये प्रक्रिया पूरी हुई तो मेरे पास करीब 8 या 10 घंटे की रिकॉर्डिंग थी. जब मैंने उन रिकॉर्डिंग्स को सुना तो मुझे लगा कि ये तो एक मजेदार कहानी बन सकती है. हालांकि इसके कुछ भाग प्रेरणादायक थे लेकिन मैं ये भी सोच रहा था कि मैंने इसको इस तरह से बयां क्यों किया है जैसे कोई खुद पर हंस रहा हो. तब मुझे लगा कि अपनी कहानी को स्टेज पर परफॉर्म कर सामने लाना चाहिए जो अभी तक दुनिया के किसी भी अभिनेता ने नहीं किया है.

 आठ घंटे लंबी रिकॉर्डिंग को आपने इस नाटक में कैसे समायोजित किया?

ये विचार मेरे दिमाग में आने के बाद ही मैंने काम शुरू कर दिया और लेखक अशोक पटोले की सेवा ली. उन्हें और मेरे निर्देशक फिरोज खान को उस टेप में से बहुत सी चीजें निकालनी पड़ीं. आज नाटक की जो समय सीमा है उस काम को पूरा करने में हमें दो से तीन महीने लगे. आप एक बात समझिए, जब हम पांच-दस लोगों को एक ड्रॉइंगरूम में बैठकर कहानी सुनाते हैं तब ये मजेदार हो सकता है क्योंकि आपकी बात सभी सुन-समझ सकते हैं. लेकिन जब बात 500 से ज्यादा दर्शकों की आती है तब उनका ध्यान आकर्षित करना एक बड़ी चुनौती होती है. मैंने अपने पहले मंचन के लिए नाटक में दिखने वाले लोगों को खुद ही निमंत्रित किया. दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, मेरे माता-पिता, विजय सहगल सभी वहां मौजूद थे. तब से पूरे विश्व में मैंने इस नाटक का मंचन किया है. मेरा लक्ष्य लोगों तक यही बात पहुंचाना है कि ‘ये हो सकता है तो कुछ भी हो सकता है.’

इस नाटक ने मुझे आजाद कर दिया है. जब भी मैं इस नाटक का मंचन करता हूं तो दुनिया में सबसे बड़ा आदमी होने की अनुभूति होती है

 सार्वजनिक जीवन में रहते हुए अपनी जिंदगी की कहानी को मंच पर लोगों के सामने लाने का अनुभव कैसा रहा?

जब आप मंच पर अपनी जिंदगी के भेद खोलते हैं तो आपके मन में कोई डर नहीं रह जाता. मैंने ये पाया है कि जब आप अपनी कमियों को दुनिया के सामने लाते हैं तो आपको किसी चीज से डर नहीं लगता. मान लीजिए अगर मैं अपने गंजेपन को दुनिया से छुपाने की कोशिश करूंगा तो मुझे इस भेद के खुलने का डर सताता रहेगा. लेकिन इसकी जगह अगर मैं अपने दिवालिया होने की कहानी दुनिया के सामने रखूंगा तो मुझे यहां तक पहुंचने के अपने संघर्ष के लिए तारीफ ही मिलेगी. इस नाटक ने मुझे आजाद कर दिया है. जब भी मैं इस नाटक का मंचन करता हूं तो दुनिया में सबसे बड़ा आदमी होने की अनुभूति होती है.

2 घंटे 15 मिनट के आपके नाटक में सिर्फ आप ही नजर आते हैं. सिर्फ एक व्यक्ति पर केंद्रित नाटक करना कितनी बड़ी चुनौती होती है?

मैं इसको एक डराने वाली चुनौती मानता हूं. ये एक तरह से बिना हथियार के युद्ध में जाने जैसा होता है. आपको खाली हाथ ही लड़ना होता है. दूसरे नाटकों में तो मेरा सहयोग करने के लिए मेरे सह-अभिनेता होते हैं जो रिहर्सल, स्टेज के पीछे और मंच पर अभिनय के दौरान मेरे साथ रहते हैं. लेकिन यहां तो मैं एक गिलास पानी भी खुद नहीं ले सकता क्योंकि दर्शकों का ध्यान भटकने का डर रहता है. इस नाटक में तो 1 घंटा 20 मिनट गुजरने के बाद मुझे पहला ब्रेक मिलता है.

नाटक की शुरुआत दर्शकों के साथ संवाद से शुरू होती है. आपके, कहानी कहने वाले और दर्शकों के बीच एक लाइन खींचने की जरूरत आपको क्यों महसूस हुई?

मेरे निर्देशक नाटक को परंपरागत तरीके से शुरू करना चाहते थे, जिसमें लाइट धीरे-धीरे मद्धम होती और मैं मंच पर आता हूं. लेकिन मैंने जोर दिया कि जब मैं मंच पर आऊं तब दर्शकों को लगे वे मेरी ही जिंदगी का हिस्सा हैं. वे उस सच्चाई में खो जाएं जो मैं उनके सामने लाने वाला हूं. इस तरह मैं उनके साथ मजाक करता हूं, उनके साथ घुलता-मिलता हूं और जब नाटक शुरू होता है तब दर्शक बड़ी आसानी से मेरी जिंदगी के करीब आ जाते हैं. मेरी सोच थी कि दर्शक मेरी जिंदगी की यात्रा में मेरे साथ चलें ना कि सिर्फ कुर्सियों पर बैठकर दूरबीन के सहारे दूर से ही मुझे समझने की कोशिश करें.

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फोटोः जीनू राज

देश में थियेटर परंपरा के इतना धनी होने के बावजूद भी दर्शकों की संख्या घटती जा रही है. आपको इसके पीछे क्या कारण लगता है?

ये आपकी जगह पर भी निर्भर करता है. जब भी मैंने कोलकाता, बंगलुरु, चेन्नई और मुंबई जैसी जगहों पर मंचन किया है तब मैं अलग तरह के दर्शकों को महसूस करता हूं. पूरे सम्मान के साथ कहना चाहूंगा कि दिल्ली के दर्शक अपने मन मुताबिक समय का चुनाव करते हैं. थियेटर में अनुशासन का होना बहुत जरूरी होता है क्योंकि एक अभिनेता दर्शकों के सामने अपना जीवन खपा कर एक अद्भुत क्षण प्रस्तुत कर रहा होता है. मैं ये नहीं चाहूंगा कि नाटक देर से शुरू हो क्योंकि अगर ऐसा होता है तो ये उन दर्शकों की बेइज्जती करना होगा जो समय पर नाटक देखने आए हैं. मेरे निर्देशक शुरू करने के लिए कहते हैं लेकिन मैं देरी से आने वाले लोगों के लिए थोड़ा इंतजार कर लेता हूं.

आपकी जिंदगी में उतार-चढ़ाव के दौर आए हैं. इन सबसे  ‘कुछ भी हो सकता है’  कि अवधारणा कैसे पैदा हुई?

नाटक में अपने बुरे दौर पर हंसना आसान था. लेकिन उसका मंचन दुख के परिवेश में था इसलिए यह हंसने लायक नहीं था. मेरे नाटक की अवधारणा उस जिंदगी से आई है, जिस तरह से मैंने उसे जी है. हम तमाम चीजों के बारे में हमेशा शिकायत करते रहते हैं लेकिन मैं उनमें से नहीं हूं. मैं सोचने में नहीं करने में विश्वास करता हूं. मैं विपत्ति आने पर रोने की बजाय उसका समाधान खोजूंगा. शिकायत करना आपको थोड़े समय के लिए संतुष्ट कर सकता है लेकिन आपको उससे आजादी नहीं दिला सकता. मैंने अपने नाटक में इस विचार को इसलिए शामिल किया क्योंकि मैं पूरी तौर पर आशावादी हूं. मैं मानता हूं कि जीवन जीने के लिए आशावादी होना ही एकमात्र जरिया है. जिंदगी जीने के दूसरे तरीके निराशा और दुख से भरे हुए हैं. आपको ये मानना ही पड़ेगा कि दुनिया बेहद खूबसूरत है.

 अपने नाटक के आखिर में आपने बताया कि हर प्रदर्शन के बाद आप और मजबूत हुए हैं. क्या आप इस बारे में और कुछ बता सकते हैं?

एक अभिनेता के नाते ‘कुछ भी हो सकता है’ के मंचन के दौरान मुझे हमेशा चुनौती मिलती है क्योंकि मैं अपनी जिंदगी को बार-बार जी रहा होता हूं. मुझे अपनी जिंदगी के हर पल को दोबारा जीना पड़ता है, ताकि दर्शकों को वह विश्वसनीय लगे. लेकिन अगर मुझसे मेरी जिंदगी के बारे में कुछ बदलाव करने के लिए कहा जाए तो मैं अपनी कहानी में कोई छेड़छाड़ नहीं करूंगा. मैं आज जो भी हूं उस जिंदगी की बदौलत हूं जो मैंने जी है.

‘प्रधानमंत्री जितने का चश्मा पहनते हैं, उतने में तो कितने बच्चों का पेट पल सकता है’

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बच्चों की सुरक्षा और परवरिश के लिए सरकार जो कुछ भी कर रही है, वह बिल्कुल पर्याप्त नहीं है. क्योंकि पूरे देश बच्चों की हालत बहुत खराब है. बच्चों के लिए इस बार का बजट बेहद खराब रहा. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का बजट घटाकर आधा कर दिया गया. हालांकि सरकार का कहना है कि बजट कम नहीं किया गया है, बल्कि फिस्कल डिवोल्यूशन (राजकोषीय हस्तांतरण) किया गया है, जिसके तहत हर मद के लिए राज्यों को सीधे एकमुश्त रकम दिया गया है. संघीय ढांचे की मजबूती के लिए यह अच्छी बात है कि सीधे राज्यों को पैसा दिया जाए और वे उसे अपने तरीके से खर्च करें. लेकिन राज्यों में यह दिखाई नहीं दे रहा है. ऐसा नहीं हो सकता कि अचानक आप कहें कि ऐसा कीजिए और कल हो जाएगा. इसे धीरे-धीरे कई चरणों में पूरा करना चाहिए था.

बजट आवंटन के बाद असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा, केंद्र ने अचानक यह फैसला कैसे कर दिया? हमें क्या करना है, यह स्थिति साफ नहीं है. बिना स्पष्ट योजना के अचानक राज्यों पर जिम्मेदारी डाल दी गई है. भाजपा शासित राज्यों को तो सवाल नहीं उठाना था, उन्होंने नहीं उठाया, लेकिन बाकी लगभग सभी राज्यों ने इसका विरोध किया. यह विरोध जायज भी है. 2014 तक बजट में बच्चों के लिए जितना पैसा आवंटित होता था, वह भी घट गया. राष्ट्रीय बजट में बच्चों का हिस्सा कम कर देना चिंताजनक स्थिति है. एक तो बजट पहले से पर्याप्त नहीं था, दूसरे वह घट रहा है.

यह बेहद शर्मनाक स्थिति है कि हम भारत को विश्वशक्ति बनाने की बात करते हैं, मेक इन इंडिया कार्यक्रम चलाते हैं, भारत को संयुक्त राष्ट्र में सदस्यता दिलाने की बात करते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा कुपोषित आबादी पर बात नहीं करते. बच्चे कुपोषण से मर रहे हैं. प्रधानमंत्री जितने का चश्मा पहनते हैं, उतने में तो कितने बच्चों का पेट पल सकता है. बताते हैं कि उनका चश्मा खास किस्म का है जो गिरने या दब जाने से टूटता नहीं. वह बहुत महंगा है.

बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हो, इसके लिए पहली प्राथमिकता होनी चाहिए कि इसके लिए पैसा हो. यही नहीं पैसे देने के बाद यह भी निगरानी रखनी होगी कि उससे फायदा कितना होता है

हालांकि, हमारे देश में जो नीति है वह और देशों से काफी आगे है. बहुत कम देश हैं जहां पर बच्चों के लिए अलग से बजट का प्रावधान है. पंचवर्षीय योजनाओं में भी बच्चों और महिलाओं पर अलग से प्रावधान होता है. लेकिन आज आप जाकर मंत्रालय में पूछ लीजिए तो उनको ही इस बारे में नहीं पता. बच्चों के लिए क्या-क्या योजनाएं चल रही हैं, क्या प्रावधान थे, क्या नए प्रावधान रखे गए हैं, उन्हें कुछ नहीं मालूम रहता. सरकार और मंत्रालयों के पास इंस्टीट्यूशनल मेमोरी की कमी है. जो उन्हें जानना चाहिए, यह गैर-सरकारी संस्थाएं तो जानती हैं, लेकिन मंत्रालयों को उसके बारे में कुछ नहीं पता. यह दुखद है.

पिछली सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधिकारियों ने गौर किया कि बच्चों की सुरक्षा के लिए जो बजट है, वह तब के लिए है, जब वे असुरक्षा में जा चुके होते हैं. होना यह चाहिए कि वे पहले से ही सुरक्षित जोन में रहें. इसलिए इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन स्कीम (आईसीपीएस) लाई गई. चूंकि अब नई सरकार में मंत्री- अफसर सब बदल गए हैं तो उनको इसका इतिहास ही नहीं मालूम. उन्हें यह ध्यान देना चाहिए कि यह कार्यक्रम क्यों चलाया गया था. यह कार्यक्रम लागू होने के बाद हमें लगता था कि इससे बच्चों की समुचित निगरानी हो सकेगी. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. सारी योजनाएं कागजी कार्रवाई बनकर रह गई हैं. सरकार को आंतरिक समीक्षा करवानी चाहिए और उस हिसाब से फैसले लेने चाहिए.

बजट घटा देने और नई व्यवस्थाएं लागू करने की वजह से अभी बहुत उथल-पुथल की स्थिति है. यही नहीं पता है कि किसी मसले पर जिम्मेदारी किसकी है. केंद्र सरकार कहती है कि हमने राज्यों को सीधे पैसा दे दिया गया, लेकिन राज्य अपनी प्राथमिकता अपने हिसाब से तय करेंगे. ज्यादातर राज्यों के पास पैसे की कमी है. ऐसे में जाहिर है कि बच्चों पर गाज गिरेगी.

बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हो, इसके लिए पहली प्राथमिकता होनी चाहिए कि इसके लिए पैसा हो. पैसा होगा तभी ढांचा विकसित होगा. पैसे ही संसाधन, संस्थाएं, ट्रेनिंग, मॉनीटरिंग आदि की उचित व्यवस्था हो सकेगी. दूसरी अहम बात है ये है कि सिर्फ पैसा जारी कर देने भर से भी बात नहीं बनती. वह बंदरबांट में चला जाता है. पैसे देने के बाद यह भी निगरानी रखनी होगी कि उससे फायदा कितना होता है.

फिलहाल हालात चिंताजनक हैं. हमारी चमक-दमक तो बढ़ रही है, लेकिन अंदर से बुरी स्थिति है. सिर्फ ‘चेहरे’ पर ‘मुखौटे’ लगाने से बात नहीं बनेगी. चेहरे चमकदार होने के साथ-साथ पूरे बदन की देखभाल करनी होती है. सरकार को ‘चेहरे’ और ‘बदन’ में सामंजस्य बनाने की कोशिश करनी चाहिए.

(लेखिका हक-सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स की सह-निदेशक हैं)

बाल विवाह : बंदिश में बचपन

45 year old WEBकिशनगढ़, राजस्थान की रहने वाली 23 साल की अनु ने इसी साल बीएड का कोर्स खत्म किया है. उसका सपना है कि शिक्षा के जरिये वह समाज की इस सोच में बदलाव लाए जो बच्चों खासकर लड़कियों के सपनों को उभरने ही नहीं देता, उन्हें पूरे करने के अवसर देना या बनाना तो अलग ही बात है. अपनी तीन बहनों के साथ जब अनु का ब्याह हुआ तो वह सिर्फ तीन साल की थी. पढ़ाई को लेकर उसमें जिद थी और परिवार भी उसे पढ़ने से रोक नहीं पाए. इस बीच कई मौके आए जब उसके ससुरालवालों ने उसे ले जाने की जद्दोजहद की, समाज और पंचायत ने बहिष्कार कर दिया और परिवार पर एक लाख रुपये का जुर्माना दंड भी लगाया. मगर अनु जैसे-तैसे अपनी मन की करने में कामयाब रही. पर हजारों लड़कियां ऐसा चाहकर भी नहीं कर पातीं.

अनु की हमउम्र माया इस उम्र में तीन बच्चों की मां है. उसके पति दो-तीन साल पहले एक दुर्घटना में गुजर गए हैं, जबकि एक दूसरी हमउम्र धनेश्वरी 17 साल की उम्र में पति के जुल्मों और यौन हिंसा से गुजरकर वापस मायके लौट आई है. ये सभी पीड़िता नहीं हैं बल्कि समाज के तथाकथित ‘परंपरावादी’ चेहरे पर एक सवाल हैं. हमारी परंपराओं, मान्यताओं और संस्कारों ने आज के समाज को जितना पीछे धकेला हैं, शायद लोकतांत्रिक कही जाने वाली व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती भी वहीं से निकलती है.

इसका सबसे दुखद पहलू है, अपने ही घर समाज में बच्चों के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया कहीं पर सीधे-सीधे दिखाई देता है और कहीं प्यार भरे वातावरण में जटिल पितृसत्ता के साथ गुंथा हुआ. इन युवा होते बच्चों के संबंधों और कमाई पर पूरी तरह नियंत्रण और उसका दोहन करने की परंपरा पर चुनौती कौन देगा?

अब जब भारत में लगभग 48% आबादी बाल और किशोर वर्ग से है, जो अगले सालों में उत्पादक वर्ग में आने वाले में हैं, यह चिंता का विषय है कि कैसे इन बच्चों को सुरक्षा और विकास के अवसर मुहैया कराए जाएं ताकि उनकी सारी क्षमताओं को उभरने का अवसर मिल सके. जिसका पूरा उपयोग विकास के तत्कालीन मॉडल में किया जा सके. विकास की राह में बाल विवाह एक बड़ी बाधा है. बाल विवाह पर कई नजरिये हैं. हाल ही में आर्थिक तरक्की पर हुए एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में वर्ष 2030 तक के लिए ‘सतत विकास के लक्ष्य’ निर्धारित किए गए हैं. लड़कियों के लिए शिक्षा, किशोर वय में मातृत्व, जीवन कौशल और आजीविका से जुड़ी कुशलताएं बढ़ाने पर काफी जोर दिया गया है. इस प्रक्रिया में किशोर युवा लड़कों पर पहली बार ध्यान केंद्रित किया गया है. भारत और दुनिया के तमाम देशों में जारी बाल विवाह की परंपरा को लेकर चिंताएं जाहिर हुई हैं और इस पर काबू पाने के लिए कई तरह के कार्यक्रम भी बनाए जा रहे हैं. आशंका है कि यह सब ऊपर ही ऊपर किया जा रहा है, समाज के साथ बैठकर एक गंभीर चिंतन नहीं हो रहा. इसमें खतरा इतना ही है कि विकास के इस मॉडल में एक बड़ा वर्ग लगातार हाशिये पर जा रहा है, सवाल ये है कि उसे कैसे मुख्यधारा में लाया जाए कि वह स्वयं इस बदलाव को लाने के लिए उत्सुक हो.

दरअसल बच्चों से जुड़ी नीतियों, कानूनों और कार्यक्रमों से कई तरह के भ्रम फैले हैं. किस उम्र का व्यक्ति बच्चा कहलाएगा? शिक्षा का अधिकार एक उम्र पर निर्धारित है तो श्रम कानून एक अलग उम्र पर

वर्तमान समय में बाल विवाह के बने रहने का एक बड़ा कारण समाज का पिछड़ापन तो है ही, मगर इस पिछड़ेपन के बने रहने में हमारे विकास के मॉडल का भी बड़ा हाथ है. जिसके चलते सामाजिक-आर्थिक-वर्गीय विषमताएं बढ़ रही हैं, वहीं न्याय की परिभाषा सिकुड़ती जा रही है. आखिर अनु या माया या धनेश्वरी जैसी लड़कियां अपने लिए न्याय के मायने कहां खोजें, कैसे उसे प्राप्त करें? अनु जब 18 वर्ष की होकर अपनी शादी रद्द करवाने की अर्जी पारिवारिक न्यायालय में लगाती है तो उसका केस काउंसलिंग में चला जाता है और उसे समझाया जाता है कि शादी को जोड़कर रखना औरत की खूबी होती है. दरअसल यहीं से अपना बाल विवाह निरस्त करवाने के उसके कानूनी अधिकार की धज्जियां उड़ जाती हैं. देखा जाए तो इस तरह बाल विवाह को कानूनी दर्जा मिलता है और अनु को तलाक लेने में डेढ़ बरस का समय. मजदूर परिवार की होने के कारण केस के लिए आर्थिक भार भी पड़ता है यानी जब वे खुद निर्णय लें और न्याय मांगें तो उन्हें कानूनी सहायता के लिए काफी ठोकरें खानी पड़ती हैं.

आखिर इन जैसी कितनी लड़कियां हैं जो ऐसी जबरन की शादी नहीं चाहती या उससे निकलना चाहती हैं. किंतु राजनीतिक प्रतिबद्धता न होने के चलते जिस संख्या में बाल विवाह हो रहे हैं, उसके मुकाबले ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम’ में दर्ज प्रकरणों की संख्या बहुत ही कम है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के बरक्स तमाम राज्यों को मिलाकर 2013 में 222 और 2014 में 280 बाल विवाह प्रकरण दर्ज हुए हैं. वहीं भारतीय दंड संहिता की धारा 366 में लड़कियों के अपहरण के 12,243 मामले दर्ज हुए हैं. इनमें से कई मामले लड़के-लड़कियों की आपसी पसंद की शादियों से संबंधित हैं, जिसमें परिवार की रजामंदी नहीं थी. बलात्कार से जुड़े मामलों में कई आपसी रजामंदी से यौन संबंध से हैं किंतु जहां कम उम्र की शादियों में लड़कियों पर परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा बलात्कार, यौन हिंसा आदि हैं, वे मामले परिवार के ‘सम्मान’ की रक्षा में कहीं दर्ज नहीं होते.

दरअसल बच्चों से जुड़ी नीतियों, कानूनों और कार्यक्रमों से कई तरह के भ्रम फैले हैं. किस उम्र का व्यक्ति बच्चा कहलाएगा? शिक्षा का अधिकार एक उम्र पर निर्धारित है तो श्रम कानून एक अलग उम्र पर. यह शादी के लिए 18:21 (लड़की और लड़के की उम्र) का मसला क्या है? और यदि इसे मान भी लें तो इससे कम उम्र की शादी और शादी में यौन संबंधों को वैधता क्यों? कई बार यह तस्वीर स्थानीय दायरे में सिमटी दिखाई देती है और उससे जुड़ी समस्याओं का हल उसी दायरे में ढूंढा जाता हैं. या फिर कभी बाल विवाह को ही हम मूल समस्या और उसके कारण के रूप में देखकर कार्रवाई करने लगते हैं.

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बाल विवाह कहें या जल्द और जबरन शादियां, यह एक जटिल विषय है जिस पर सभी अपने तरीकों और अपनी समझ से जूझ रहे हैं. यह  परंपरागत समाजों के अपने जीवन दर्शन और जिंदगी की समझ पर आधारित है जो अपनी तत्कालीन अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ी रही है. आधुनिक समाज और बदलती अर्थव्यवस्था में अधिकारों के बढ़ते दायरे को जमीन पर लाने की जिम्मेदारी एक चुस्त राज्य को निभानी है. जिसमें सामाजिक न्याय और विकास को साथ-साथ चलाना जरूरी है. समय की मांग को देखते हुए इस विषय को समग्रता से देखने-समझने और उस पर एक नजरिया बनाने की जरूरत है. इसके लिए चिंतन और आपसी चर्चाओं के अवसर बढ़ाने की भी बेहद जरूरत है. यह भी बहुत जरूरी है कि किशोर किशोरियों, युवाओं को इन परिचर्चाओं में शामिल किया जाए, उनकी आवाज और विचारों को सुना जाए ताकि हम पूरी व्यवस्था को उनकी बातों के अंदर परख सकें; उनका परीक्षण कर सकें.

अनु जैसी लड़कियां शिक्षा के क्षेत्र को अपनाना चाहती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि अनु मानती हैं, ‘एक शिक्षक चाहे तो बदलाव के लिए काफी कुछ कर सकता है, कम से कम वह हममें सोचने, प्रश्न और आलोचना करने के साथ सक्रिय बनने की समझ तो डाल ही सकता है.’

दुनिया को बच्चों के लिए दुरुस्त यानी फिट होना होगा और अगर हम सच्चे रूप में सतत विकास चाहते हैं तो पूरी प्रणाली को दुरुस्त करने पर ध्यान देने की जरूरत होगी. अपने में, अपने परिवार, कार्यस्थलों, सार्वजनिक स्थानों और राज्य के स्तर तक लोकतांत्रिकरण को अपनाना होगा. लैंगिक समानता और सशक्तिकरण भी तब ही टिक सकेगा.

(लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

कल कोई 14 साल का बच्चा अपराध करता है तो क्या कानून में फिर से बदलाव करेंगे?

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दिल्ली में पिछले दिनों एक ढाई साल की बच्ची के साथ बलात्कार की घटना, जिसमें 16-17 के दो युवकों के शामिल होने का आरोप है, के बाद फिर से यह मांग जोर पकड़ने लगी थी कि किशोर न्याय अधिनियम में जघन्य अपराधों में लिप्त किशोर की उम्र 18 से घटाकर 16 साल कर दी जाए. मंगलवार को राज्यसभा में पारित ‘किशोर न्याय अधिनियम (बाल देखभाल और संरक्षण), 2015 के अंतर्गत अब जघन्य अपराध करने वाले 16-18 आयुवर्ग के बच्चों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाए जाने का रास्ता साफ हो जाएगा. हालांकि उन्हें सजा 21 साल की उम्र के बाद ही दी जा सकेगी. यह मौजूदा किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की जगह लेगा.

यह बहस दिल्ली में 16 दिसंबर को हुए सामूहिक बलात्कार कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर शुरू हुई थी जो अब तक जारी रही. लगातार यह प्रश्न पूछा जाता रहा कि क्यों न वयस्कों जैसे अपराध करने वाले किशोरों को सामान्य कानून के अनुसार सजा दी जाए जिससे बाकी बच्चों को सबक मिल सके?

ऐसी मांग दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर से भी उठी थी. ऐसा नहीं है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री बाल अधिकार विरोधी हैं. वह भी पीड़ित (जो एक बच्चा है) के दर्द से व्यथित हैं और उन्हें यह लगता है इन जैसे बच्चों को न्याय दिलाने के लिए कानून में बदलाव जरूरी है लेकिन ऐसा लगना तथ्यों पर नहीं भावनाओं पर आधारित है.

इस कानून में बदलाव की मुख्य वजह किशोरों द्वारा किए गए अपराधों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि बताई जा रही है. आइए एक नजर इन आंकड़ों पर डालकर देखते हैं कि इन दावों में कितनी सच्चाई है?

अगर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) पर यकीन करें तो 2014 में दिल्ली में होने वाले कुल बलात्कारों की संख्या 2,096 थी और 2013 की तुलना में इसमें 28.12 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इनमंे से 5.73 प्रतिशत यानी 120 बलात्कार किशोरों द्वारा किए गए थे. 2013 की तुलना में किशोरों द्वारा किए गए बलात्कारों में 12.41 प्रतिशत की गिरावट आई है. राष्ट्रीय स्तर पर संज्ञेय अपराधों में 18 वर्ष से कम के बच्चों का हिस्सा 2011 में 1.1 प्रतिशत था जबकि वह जनसंख्या का लगभग 42 प्रतिशत हैं. लेकिन नेता, मीडिया और समाज का एक वर्ग भ्रमित करने वाली तस्वीर पेश कर रहा है और इसके आधार पर कानून में बदलाव लाने की कोशिश हुई.

अगर आज आप कानून में बदलाव करके किशोर की उम्र 16 साल कर भी देते हैं और कल कोई 14 साल का बच्चा यह अपराध करता है तो क्या आप कानून में फिर से बदलाव करेंगे?

दिल्ली में लैंगिक अपराध करने वाले बच्चों से इन अपराधों से पीड़ित होने वाले बच्चों की संख्या कहीं ज्यादा है. बच्चों के शोषण की आठ घटनाएं रोज दर्ज होती हैं जिनमें से केवल 2.4 प्रतिशत में ही अपराधी को सजा हो पाती है. अगर सरकार कानून में बदलाव करने की बजाय कानून के क्रियान्वयन पर ज्यादा जोर दे तो हम बच्चों के लिए शायद ज्यादा सुरक्षित शहर बनने में सफल होंगे.

हम कानून में बदलाव करने का प्रस्ताव रखकर लोगों की उमड़ती भावनाओं को तो शांत कर सकते हैं पर एक सुरक्षित शहर बनने की अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते. कानून में बदलाव करने का प्रस्ताव एक आसान समाधान तो हो सकता है, और आप यह भी कह सकते हैं कि आपने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए कुछ किया लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं होगा. इस समय जरूरत कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की है इसमें बदलाव की नहीं.

बाल मनोवैज्ञानिकों की राय में किशोरावस्था में जोखिम के परिणाम के आकलन की क्षमता कम होती है. इस उम्र के बच्चे ऐसे काम करना चाहते हैं जिससे ज्यादा से ज्यादा सनसनी का एहसास मिले. अक्सर ये देखा गया है कि इस उम्र के किशोर ऐसे कामों को अंजाम देते हैं, जिसमंे भारी जोखिम होता है पर पारितोषिक कम. सोलह से बीस साल की उम्र में बहुत से मानसिक परिवर्तन होते हैं और लगभग 20 साल तक ही किशोर/किशोरी परिपक्वता हासिल कर पाते हैं. इसलिए इससे ठीक पहले का आयुवर्ग (16-18) में बच्चों के अपराध की दुनिया में आने का खतरा बहुत ज्यादा होता है. इसी कारण साधारणतः अधिकतर कानूनों में किशोरावस्था के लिए 18 साल की उम्र को कट ऑफ के तौर पर लिया जाता है. अगर आज आप कानून में बदलाव करके किशोर की उम्र 16 साल कर भी देते हैं और कल कोई 14 साल का बच्चा यह अपराध करता है तो क्या आप कानून में फिर से बदलाव करेंगे? उम्र कम करने का यह सिलसिला कहां जाकर रुकेगा?

यह तर्क भी दिया जा रहा है कि आजकल इंटरनेट और सूचना के अन्य साधनों की वजह से बच्चे 16 साल की उम्र तक बहुत कुछ जान जाते हैं और जल्दी ही परिपक्व हो जाते हैं. अहम बात ये है कि जानकारी होना और मानसिक परिपक्वता दोनों अलग-अलग बातें हैं. बच्चों को तमाम जानकारियां हो सकती हैं पर ये जरूरी नहीं कि वे परिपक्व हो गए हैं और जानकारी का उपयोग कर सकते हैं. और फिर उस जानकारी का प्रयोग ऐसे कामों के लिए करना जिसके अंजाम को आप ठीक से नहीं समझते, परिपक्वता नहीं अपरिपक्वता का सबूत है.

किशोर न्याय अधिनियम की बुनियाद सुधारात्मक दंड प्रक्रिया पर आधारित है, प्रतिक्रियात्मक हिंसा पर नहीं. यह कानून इस मान्यता पर आधारित है कि बच्चों के अधिकतर मामलों में सुधार की गुंजाइश होती है और इसके लिए कोशिश की जानी चाहिए.

इस विषय पर किए गए विभिन्न अध्ययनों के अनुसार जघन्य अपराधों में लिप्त बच्चों को शैक्षणिक कार्यक्रम की जरूरत होती है ताकि वो अपने किए गए अपराध के परिणामों को अच्छी तरह समझ सकें. सख्त सजा बच्चों द्वारा किए गए अपराधों को रोकने में इतनी कारगर नहीं है जितने कि पेशेवर ढंग से चलाए गए शैक्षणिक कार्यक्रम. बल्कि पेशेवर अपराधियों के संपर्क में आने से उनके भी पेशेवर अपराधी बनने का खतरा बढ़ जाता है. हाल ही में आई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और हत्या मामले में दोषी किशोर सुधार गृह में एक कश्मीरी किशोर अपराधी की सांगत में रहा, जिसने उसे कश्मीर में जिहाद में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. किशोरों के मामले में यह भी देखना उतना ही महत्वपूर्ण है कि ऐसे कौन से हालात थे जो उनको इस स्थिति तक लेकर आए जहां उन्होंने इस तरह के  अपराध को अंजाम दिया.

किशोर न्याय अधिनियम में बदलाव करके जघन्य अपराधों में लिप्त बच्चों के साथ व्यस्कों जैसा व्यवहार ना केवल हमारी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के खिलाफ है बल्कि इस तरह के प्रयोग दुनिया के किसी भी हिस्से में सफल नहीं हुए हैं. यह कहना कि इस कानून में बदलाव होना चाहिए कतई भी तर्कों पर आधारित न होकर अतार्किक भावनाओं पर आधारित है. याद रहे कि दिल्ली में दिसंबर 2012 के सामूहिक बलात्कार कांड के बाद बनी वर्मा कमेटी ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया था.

ज्यादातर किशोर अपराधी समाज के हाशिये पर रह रहे बच्चे होते हैं जिन्हें देखभाल और सुरक्षा (चाइल्ड इन नीड ऑफ केयर एंड प्रोटेक्शन) की जरूरत होती है और समय पर संरक्षण न मिलने पर वह कानून विवादित बच्चा (चाइल्ड इन काॅनफ्लिक्ट विद लॉ ) की श्रेणी में आ जाते हैं. किशोर न्याय अधिनियम के तहत सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि उन सभी बच्चों को जो जोखिम में हैं, संरक्षण एवं सुरक्षा प्रदान करे. इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य बच्चों को अपराध करने से बचाना है. पर समस्या यह है कि इस कानून का ध्यान कानून विवादित बच्चों पर है पर उन बच्चों पर नहीं जिन्हें देखभाल और सुरक्षा की जरूरत है. इस कानून को ठीक से लागू करने की कभी कोशिश ही नहीं की गई और अब मांग उठ रही है कि इस कानून को बदला जाए? ये कितना उचित है कि जिस कानून को ठीक से क्रियान्वित करने का मौका भी नहीं दिया गया, उसमें बदलाव लाया जाए?

(लेखक टेरे डेस होम्स संस्था से जुड़े हैं)

दर्द की दोहरी मार

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दिल्ली में 10 से 16 अक्टूबर 2015 के बीच तीन बच्चियों के साथ बलात्कार किया गया. इनमें से एक अपने घर के बाहर खेल रही थी. थोड़ी देर के लिए बिजली गई और बच्ची गायब थी. तीन घंटे बाद वह एक उद्यान में खून से लथपथ पाई गई. बच्चों के साथ लगातार हो रहे अपराधों ने हमारे समाज के सभ्य होने पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है.

देश में हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि बच्चे बाहर के साथ घर में भी अब सुरक्षित नहीं रह गए हैं. देश की राजधानी होने के नाते दिल्ली में होने वाली घटनाओं का तो पता चल जाता है, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में होने वाली ऐसी घटनाओं की न तो रिपोर्ट हो पाती है और न ही ऐसे पीड़ितों की कोई सुनने वाला होता है. उन्हें न्याय के लिए या तो लंबा इंतजार करना पड़ता है या फिर उन्हें न्याय मिल ही नहीं पाता. बलात्कार के संदर्भ में बात करें तो अधिकतर समय तो मामले दर्ज ही नहीं होते, अगर हो भी जाएं तो न्याय की उम्मीद बिन पतवार की नाव जैसी होती है, जो देर-सवेर डूब ही जाती है. बलात्कार की पीड़ा न्याय की आस से कम नहीं होती पर यदि मामला बलात्कार के परिणामस्वरूप ठहरे गर्भ का हो, तब ये पीड़ा दोगुनी जरूर हो जाती है.

ऐसा ही एक मामला मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के एक गांव माझा में सामने आया. कुछ महीनों पहले 14 साल की शीलू (बदला हुआ नाम) के पिता की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसकी मां राधा ने जगत गोंड नाम के व्यक्ति से शादी कर ली. राधा पत्थर खदानों में मजदूरी करने जाती थी. उसके मजदूरी पर निकल जाने के बाद सौतेला पिता जगत गोंड डरा धमकाकर शीलू के साथ छेड़खानी किया करता था. डर के कारण वह मां से कुछ कह नहीं पा रही थी. छेड़खानी होने पर अपने स्तर पर तो वह उसका विरोध करती रही, मगर उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि यह बात अपनी मां को बता सके. इसी बात का फायदा उठाकर जगत ने उसके साथ बलात्कार करना शुरू कर दिया था, जिससे शीलू गर्भवती हो गई. तब जाकर उसकी मां को सच का पता चला और मामले में केस दर्ज हो सका.

राजधानी होने के नाते दिल्ली में बच्चों के खिलाफ होने वाली घटनाओं का तो पता चल जाता है, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में होने वाली अधिकांश घटनाओं की न तो रिपोर्ट हो पाती है और न ही कोई सुनवाई

इसके बावजूद शीलू की मुसीबतों का अंत नहीं हुआ. जगत के जेल चले जाने के बाद मां भी नहीं समझ पाई कि वह क्या करे! ऐसे मामलों में सरकारी सहायता से ज्यादा समाज के सहयोग की जरूरत होती है, जो सामान्यतया कभी नहीं मिलता. इसी के चलते शीलू को पहले पन्ना से कटनी बाल संरक्षण गृह भेजा गया. डेढ़ महीने बाद जब प्रसव की तारीख नजदीक आने लगी तो उसे जबलपुर भेज दिया गया. कहीं भी कोई शीलू की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता था. मामला उच्च स्तर तक गया तो उसे वापस कटनी भेज दिया गया. अभी वह कटनी बाल संरक्षण गृह में ही रह रही है. अब उस बेचारी को यह समझ नहीं आ रहा है कि वह वास्तव में है कौन और आने वाले दिनों में उसके साथ क्या होने वाला है?

ऐसे ही मध्य प्रदेश के ही शिवपुरी जिले के सड गांव में रहने वाली छठवीं कक्षा की छात्रा गीतू (बदला हुआ नाम) को 18 सितंबर 2015 को अचानक पेट में तेज दर्द उठा. डॉक्टरी चेकअप में पता चला कि वह आठ महीने की गर्भवती है. तब गीतू ने बताया कि गांव के ही बंटी रावत और उसके भाई ने गीतू के साथ बलात्कार किया और ये बात किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी भी दी, जिस वजह से उसने किसी को कुछ भी नहीं बताया और बंटी बार-बार उसके साथ बलात्कार करता रहा. 8 अक्टूबर 2015 को ग्वालियर के जयारोग्य अस्पताल में गीतू ने एक बच्ची को जन्म दिया. रोते हुए वह बस एक ही बात दोहरा रही थी, ‘मैं मां नहीं बनना चाहती.’

वहीं दूसरी तरफ बलात्कार के एक मामले में पुलिस के सुस्त रवैये की वजह से एक किशोरी को कई बार उसी पीड़ा से गुजरना पड़ा. इसी साल जुलाई में महाराष्ट्र के जालना में 17 साल की एक किशोरी के साथ दो युवकों द्बारा गैंगरेप करने का मामला सामने आया था. गैंगरेप के समय युवकों ने उसका वीडियो बना लिया था. इसके बाद दोनों ने किशोरी का मोबाइल छीनकर उसके बदले में दो हजार रुपये लाने की मांग की. किशोरी मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने थाने पहुंची तो पता चला कि दोनों युवक उसे मोबाइल लेने के लिए बुला रहे हैं. इसे देखते हुए पुलिस ने युवकों को पकड़ने के लिए योजना बना ली और किशोरी को महिला पुलिसकर्मी के साथ युवकों से मिलने के लिए भेजा. युवकों ने मामले को पहले ही भांप लिया और फरार हो गए. इस वजह से मामले की रिपोर्ट भी दर्ज नहीं हो सकी. बाद में युवकों ने मोबाइल लेने के लिए किशोरी को फिर बुलाया तो पुलिस ने फिर वैसी ही योजना बना ली. बदकिस्मती ये थी कि पुलिस समय से पहुंच ही नहीं सकी और युवकों ने किशोरी के साथ फिर सामूहिक दुष्कर्म किया. पुलिस की सुस्ती की वजह से युवक फिर पकड़ में नहीं आ सके. दोनों युवकों को बाद में पकड़ा गया.

छोटी उम्र में बलात्कार और उसके बाद ठहरे गर्भ की पीड़ा का एक और मामला सामने आया. गुजरात में 14 साल की किशोरी के साथ बलात्कार हुआ और वह गर्भवती हो गई. मामला गुजरात हाईकोर्ट पहुंचा, जहां वह गर्भपात करवाने की अनुमति चाहती थी, लेकिन उसे अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि वह 24 सप्ताह की गर्भवती थी और गर्भपात कानून के अनुसार 20 सप्ताह की गर्भावस्था तक ही गर्भपात कराया जा सकता है. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो गर्भपात की संभावना जांचने के लिए पांच डाक्टरों का समूह बनाया गया. इसने अपना मत देते हुए कहा कि किशोरी का गर्भपात कराया जा सकता है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बलात्कार पीड़ित का गर्भपात तभी करवाया जाएगा जब स्वयं उसका जीवन संकट में होगा. यहां अंतिम निर्णय लेने का अधिकार किशोरी के हाथ में न देकर डॉक्टरों के हाथ में दे दिया गया.

बहरहाल हमारी संवैधानिक व्यवस्था में गर्भपात कराने का कोई अधिकार परिभाषित नहीं है. मेडिकल टर्मिनेशन आॅफ प्रेगनेंसी एक्ट, 1971 में यह उल्लेख है कि कुछ खास परिस्थितियों में गर्भपात करवाया जा सकता है, किन्तु निर्णय में डाॅक्टरों की अहम भूमिका होगी. यह प्रमाण है कि हमारे समाज में महिलाओं और नाबालिग बच्चियों को सोच समझ कर निर्णय लेने लायक नहीं माना जाता है. बलात्कार की शिकार बच्ची या महिलाओं के संदर्भ में भी ठीक वही नियम कैसे लागू हो सकते हैं, जो एक सामान्य व्यवस्था में या लिंग परीक्षण आधारित गर्भपात के संदर्भ में लागू होते हैं? यहां कुछ अहम बिंदु हैं- एक बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, यह पहला अपराध है. जिसमें आज इस बात पर विमर्श हो रहा है कि बच्ची या महिला को ही अपराध के लिए दोषी मानने की प्रवृत्ति को बदलने की कोशिश की जाए, लेकिन यदि वह बच्ची मां बन जाए, तो क्या उसके लिए ‘बलात्कार’ को भूल पाना संभव होगा? इसके बाद उस बच्ची का अपना जीवन क्या रूप लेगा? उसकी शिक्षा, उसके कौशल, उसके खुद के विकास के अधिकार का क्या होगा? किसी अपराधी द्वारा किए गए कृत्य की सजा में उसे क्यों बराबरी का साझेदार बनाया जाना चाहिए? इसके बाद सवाल यह भी है कि जन्म लेने वाले बच्चे का क्या होगा, उसकी पहचान क्या होगी? क्या हमारा समाज अभी इतना सभ्य और मानवीय हो गया है कि वह बेहद सहज और सामान्य रूप से उन दोनों को अपना लेगा? इसका जवाब है, नहीं! इस संदर्भ में एक मत बनाना बहुत आसान नहीं है- एक तरफ बलात्कार से प्रभावित बच्ची है और दूसरी तरफ गर्भ में जीवन पा चुका भ्रूण, जिसे जीवन का अधिकार दिए जाने की वकालत हम सब करते हैं. कुछ और हो न हो, किंतु बलात्कार से प्रभावित बच्ची या महिला को गर्भावस्था में रहने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए और उसे यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि वह गर्भपात करवाना चाहती है या नहीं.

भारत में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की स्थिति पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में 53.22 प्रतिशत बच्चे एक या एक से अधिक तरह के यौन दुर्व्यवहार के शिकार हुए हैं

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के सालाना प्रतिवेदनों के मुताबिक भारत में वर्ष 2005 से 2014 के बीच की दस वर्ष की अवधि में बच्चों के साथ बलात्कार के 71,872 प्रकरण दर्ज हुए. इन दस सालों में ऐसे मामलों में 341 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाई देती है. साल 2005 में 4,026 प्रकरण दर्ज हुए थे, जो वर्ष 2014 में बढ़कर 13,766 हो गए. यह भी एक तथ्य है कि ये संख्या वास्तव में होने वाली घटनाओं से बहुत कम है, शायद ये वास्तविक मामलों का 5 प्रतिशत भी नहीं है. भारत में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की स्थिति पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में 53.22 प्रतिशत बच्चे एक या एक से अधिक तरह के यौन दुर्व्यवहार के शिकार हुए हैं. 21.90 प्रतिशत बच्चों के साथ गंभीर किस्म का यौन दुर्व्यवहार हुआ है. 50 प्रतिशत मामलों में इस तरह का व्यवहार परिचितों के द्वारा किया गया. ज्यादातर बच्चे इसके बारे में बात नहीं करते हैं और उस पीड़ा में रहते हैं.

झारखंड में वर्ष 2014 में एक भी प्रकरण दर्ज नहीं हुआ. वहां दस साल में 212 मामले दर्ज हुए. इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी बहुत कम प्रकरण दर्ज होते हैं. हमने शीलू और गीतू के मामले में देखा कि ये घटनाएं तब तक सामने नहीं आईं, जब तक कि वे गर्भवती नहीं हो गईं. दूसरी बात यह है कि बच्चों के साथ बलात्कार की सबसे ज्यादा हरकतें परिजनों और परिचितों के द्वारा अंजाम दी जाती हैं. प्रतिष्ठा व नाते-रिश्तों के नाम पर इन घटनाओं को दबा दिया जाता है.

बेहतर समाज बनाने की जिम्मेदारी हमारी ही है

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बच्चों के साथ होने वाले अपराध इन दिनों सुर्खियों में हैं. लोग आक्रोशित होते हैं, राजनीतिक लोगों में इस जनाक्रोश को भुनाने की होड़ लगती है, तरह-तरह की बयानबाजी की जाती है और फिर कुछ दिनों में सब कुछ शांत. यही होता आ रहा है. बात इससे आगे बढ़ ही नहीं पाती और यही हमारा दुर्भाग्य है. बच्चों के प्रति यौन अपराधों के बढ़ते मामले देखकर 2012 में पोक्सो कानून लाया गया. कानून आ गया और बस हो गया समाधान? लागू कौन करेगा? सारा आक्रोश, सारा उत्साह कानून बनते ही खत्म हो जाता है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकल पाता. खास अदालतें बनीं… पहले से ही काम के बोझ से दबे जज को पोक्सो कोर्ट की अतिरिक्त जिम्मेदारी दे दी और इस तरह बनी खास अदालत. पुलिस और अदालतें बच्चों के बयान ऑडियो-वीडियों में रिकॉर्ड करेंगे. ये सब बहुत अच्छा है, लेकिन क्या ऐसा करने के लिए संसाधन उपलब्ध कराए गए? महिला पुलिस अधिकारी बच्चों के बयान लिखेगी. कहां से आएंगी ये महिला पुलिस अधिकारी? क्या नई भर्तियां की गईं? तीस दिन के अंदर मुआवजा दिया जाएगा. लोगों की एड़ियां घिस जाती हैं भागते-भागते तब कहीं जा के मुआवजा हाथ लगता है. ऐसे में नए-नए कानून बनाते रहना बेमानी हो जाता है. कानूनों को लागू करने की इच्छाशक्ति और इरादा भी तो होना चाहिए. अभी 2-3 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम’ नाम से जारी एक रिपोर्ट में सरकारों से कहा है कि अगर संसाधन न दे सको तो नए-नए कानून भी न बनाए जाएं.

अब अगर बच्चों के प्रति यौन अपराधों की बात करें तो थोड़ा और विस्तार में जाने की जरूरत है. जवान होते बच्चों के बीच यौन आकर्षण, भागकर शादी करना और स्वेच्छा से शारीरिक संबंध बनाना, इस तरह के मामलों को एक अलग नजरिये से देखे जाने की जरूरत है. ऐसे मामले तकनीकी तौर पर तो अपराध की श्रेणी में आते हैं, लेकिन इन मामलों में सख्त सजा देना बड़ा जुल्म है. अब अगर एक 16-17 साल की किशोरी और 17 साल का लड़का प्रेम संबंध या फिर सिर्फ आकर्षण के चलते भागकर शादी कर लें या न भी करें और शारीरिक संबंध बना लें या न भी बनाएं, जब लड़की के अभिभावक इस बारे में जान पाते हैं तो लड़की को मार-पीट के घर ले आते हैं और लड़के पर अपहरण और बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा देते हैं. ज्यादातर मामलों में ये देखा जाता है कि किशोरियां अपराधबोध में आकर या माता-पिता की मानसिक पीड़ा देख लड़के के खिलाफ बयान दे देती हैं. किसी भी बच्ची के लिए स्वेच्छा या सहमति से सेक्स करने की बात स्वीकार करना एक बेहद मुश्किल काम होता है.

इस तरह के मामलों की संख्या कम नहीं है. नारी निकेतनों में जाकर देखिए, तमाम ऐसे मामले मिलेंगे जिसमें लड़कियां माता-पिता के पास वापस जाने को तैयार नहीं हैं और लड़के के जेल से छूटने का इंतजार कर रही हैं. बच्चों के प्रति यौन अपराधों की रोकथाम के लिए बने नए सख्त कानूनों के सबसे बड़े भुक्तभोगी इस तरह के बच्चे ही हैं. धीरे-धीरे लोग इस आंच को महसूस कर रहे हैं और दबाव और चूक का एहसास इस स्तर तक आ गया है कि आप जल्द ही इस दिशा में कोई ठोस पहल देखेंगे. कानून कहीं-कहीं तो इतने सख्त हैं कि जज भी अपने हाथ बंधे हुए पाते हैं. बच्चों के प्रति अपराधों का ये भी अहम पक्ष है, जिसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

‘लल्ला-लल्ला लोरी से लेकर दारू की कटोरी’ तक का सफर तो हमने ही तय किया है! लड़ाई होने पर मां-बहन की गालियों का प्रयोग हमारी मानसिकता का ही प्रतिबिम्ब है. कानून क्या करेगा इसमें?

अपराध कोई वायरल बुखार नहीं है, जो किसी संक्रमण की वजह से फैल रहा हो. हम हकीकत को नजरअंदाज करने में लगे हैं, लेकिन वास्तव में समस्या की जड़ हम खुद हैं. आजकल अभिभावकों के पास बच्चों के लिए समय नहीं है. ऐसे में कोई कैसे जानेगा कि उनके बच्चों के जीवन में चल क्या रहा है? परिवार टूट कर ‘हम दो, हमारे दो’ के जुमले पर आकर सिमट गया है. समुदाय नाम की चीज मध्य वर्ग में अब रह नहीं गई. हमारा संगीत-सिनेमा, उत्तेजना और हिंसा से सराबोर है. हम एक ऐसा वातावरण बना रहे हैं, जहां बिखराव, हताशा, एकाकीपन और अलगाव को आना ही आना है. और यह भी सच है कि परिवार और समाज का सुरक्षा तंत्र टूट रहा है जिसका सीधा असर बच्चों पर पड़ता है. समाज में व्यभिचारी हमेशा से थे और आगे भी रहेंगे. चुनौती ये है कि बच्चे इनकी पहुंच से दूर रहें. अब हर घर में पुलिस बैठाना तो समाधान हो नहीं सकता तो ऐसे में सामाजिक-पारिवेशिक सुरक्षा बनाए रखना और उसको मजबूत बनाना ही कारगर उपाय है. जब ये कहा जाता है कि नया कानून बनाया जाए, तो बस वहीं से समाधान की दिशा भ्रमित हो जाती है.

मौजूदा कानूनों को लागू करने की जिम्मेदारी जिस प्रशासनिक तंत्र की है, उसको मजबूत करने पर ध्यान ही नहीं जाता, जो कि अपने आप में चुनौती भरा काम है और जिसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना बेहद जरूरी है. उदाहरण के लिए पुलिस को ले लीजिए. थानों में क्या हालात हैं? आप कानून चाहे जितना भी सख्त बनाकर पास करते रहिए, उसको लागू करने वाले तंत्र में ही अगर खामी है, तो वह कानून प्रभावी तरीके से कैसे लागू होगा? कॉमनवेल्थ खेलों के लिए पुलिस में ताबड़तोड़ भर्तियां की गई थीं लेकिन वही तत्परता महिला और बाल सुरक्षा के लिए दिखाई नहीं पड़ती. अपराधी को दंडित करने वाली न्याय प्रक्रिया और प्रणाली में अन्वेषण और दोष सत्यापन के मानदंड बहुत मजबूत हैं और काम के बोझ से पस्त, संसाधन विहीन पुलिस के लिए उस स्तर की विवेचना कर पाना बेहद दुष्कर होता है. नतीजा ये निकलता है कि अपराधी अदालत से भी बच निकलता है.

पुलिस को जब तक समुचित संसाधनों से लैस नहीं किया जाता, पुलिस-नागरिक अनुपात एक स्वीकार्य स्तर तक नहीं लाया जाता, अपराधी व्यवस्था की खामियों का फायदा उठा कर बच निकलते रहेंगे. दंड की मात्रा से कहीं ज्यादा प्रभावी है दंड मिलने की प्रक्रिया काे सुनिश्चित किया जाए. एक बार अपराधियों की समझ में ये आ जाए कि अपराध करके आप बचकर निकल नहीं पाएंगे, तब कहीं जाकर अपराधियों के दिल में डर आएगा. कानून की किताब में चाहे आजन्म कारावास ही क्यों न लिख दिया जाए, अगर वो सजा मिल पाना ही मुश्किल है तो ऐसे कानून का क्या फायदा? बलात्कारियों को बधियाकरण को अनुमति देने को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में टिप्पणी की है. हमारे स्वनामधन्य मुख्यधारा के सनसनीखेज मीडिया के चलते सारा ध्यान सिर्फ बलात्कारियों के बधियाकरण के प्रस्ताव पर चला गया है लेकिन उस फैसले में दस सलाह और दस निर्देश भी हैं जोकि दूरगामी और निश्चित परिणाम देने वाले हैं. उन पर भी तो कोई ध्यान दे.

एक सलाह है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को विखंडित करके बच्चों के लिए एक बिल्कुल अलग मंत्रालय बनाने की. राजस्थान सरकार ने कुछ समय पहले इस विचार की प्रभावशीलता को पहचाना और एक संबद्ध विभाग के अंदर ही एक अलग और लगभग स्वतंत्र और सक्षम बाल अधिकारिता निदेशालय का गठन किया है. बच्चों से जुड़े मामलों पर एक सतत और केंद्रित तरीके से नीति निर्माण और कार्यान्वयन की दृष्टि से ये अच्छा कदम है. रोकथाम और सुरक्षा को लेकर समुदाय के स्तर पर चेतना निर्माण पर काम होना चाहिए. पुलिस की क्षमता बढ़ाई जाए, उनको अच्छा माहौल और संसाधन दिए जाएं ताकि वो ठीक से अच्छी गुणवत्ता का काम कर पाए. निचली अदालतें, जहां ऐसे मुकदमे सुने जाते हैं वहां का माहौल और कार्यपद्धति बच्चों की सुविधा और सहजता के अनुरूप रखने पर गंभीरता से काम हो. इन सब उपायों के अलावा जो कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है वो है सामाजिक जिम्मेदारी. सारा ठीकरा हम सरकार और व्यवस्था के सिर ही नहीं फोड़ सकते. किस तरह का समाज हम बच्चों को दे रहे हैं, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है. आजकल के गीत-संगीत की बात करें तो ‘लल्ला-लल्ला लोरी से लेकर दारू की कटोरी’ तक की स्वीकार्यता का सफर तो हम लोगों ने ही तय किया है न! लड़ाई झगड़े होने पर मां-बहन को विदूषित कर डालने की गालियों का प्रयोग हमारी मानसिकता का ही तो प्रतिबिम्ब है. कानून क्या करेगा इसमें?

बड़ों के द्वारा बच्चों की बात-बात पर पिटाई कर देना और बच्चों द्वारा उसे चुपचाप स्वीकार किया जाना तो हमें सामाजिक मूल्य की तरह ही सिखाया गया है. जब हम बच्चे को बड़ों की हिंसा स्वीकार करना सिखा रहे होते हैं तो ये नहीं ध्यान में आता कि बड़ों द्वारा लैंगिक अतिक्रमण भी बच्चे को हिंसा ही लगता है और फिर किसी और हिंसा की तरह ही बच्चा अपने को दोष देता है बजाय मुखर होने और प्रतिकार करने के. इसी तरह भाई जब बहन को मारना और बाल नोचना सीख रहा होता है तब हम उसमें बाल चंचलता देखते हैं और अगर बहन उलटकर एक थप्पड़ मार दे तो सब उस पर टूट पड़ते हैं. भाई यही देखता और करता बड़ा होता है. गौर करने वाली बात ये है कि उस समय हम उसे स्त्री-पुरुष का शक्ति समीकरण सिखा रहे होते हैं! ये हमारे ही तो भाई और बेटे होते हैं जो आगे चलकर दूसरों का अतिक्रमण करते पाए जाते हैं. शारीरिक, मानसिक और यौन हिंसा के बीज अलग-अलग नहीं होते.

(लेखक अधिवक्ता हैं)

‘बच्चों को न्याय दिलाने के लिए अभी भी बहुत काम बाकी है’

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जब मैं बच्चों की सुरक्षा से जुड़े अपने काम के बारे में सोचती हूं तो मेरे मन में तीन अलग-अलग मामले सामने आते हैं जिन्होंने मेरी जिंदगी पर गहरी छाप छोड़ी. इनसे मैंने सीखा कि बाल यौन उत्पीड़न के मामले में खुलासे से लेकर न्यायिक प्रक्रिया तक का माहौल कितनी जटिलताओं से भरा होता है.

पहला मामला एक लड़की मीरा (काल्पनिक नाम) का है. तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली आठ साल की मीरा पढ़ाई में अच्छी होने के कारण शिक्षकों की चहेती थी. अचानक मीरा तीन विषयों में फेल हो गई. इससे परेशान शिक्षकों ने उससे बात की. तब घबराई और परेशान मीरा ने अपने सौतेले पिता द्वारा तीन महीने से उसका लगातार यौन उत्पीड़न करने की बात का खुलासा किया.

जब पहली बार सौतेले पिता ने उसका यौन उत्पीड़न किया तब बड़ी हिम्मत करके ये बात उसने अपनी मां को बताई, ये सोचकर कि मां उसकी सुरक्षा करेंगी. लेकिन मां ने उसे ये कहकर चुप करा दिया कि लड़कियों की जिंदगी की कहानी यही होती है. जितनी बार उसने अपने साथ हुए उस दर्दनाक अनुभव को बताया, उसी कष्ट और बेबसी को महसूस किया.

इसके बाद उसकी शिक्षक ने एक स्थानीय संगठन से संपर्क किया और फिर पुलिस को भी साथ लिया. आगे भी जांच के लिए एक अति आत्मविश्वासी और उत्साही जांच अधिकारी ने सीधे परिवार से संपर्क किया. लड़की को बचाने की जगह मामला उसकी मां और जांच अधिकारी के झगड़े पर खत्म हुआ. उसके बाद जो हुआ उसकी अपेक्षा किसी ने भी नहीं की थी. रातोंरात वह परिवार शहर से चला गया और अभी तक उनका कोई अता-पता नहीं है. पड़ोसियों का मानना है कि वह परिवार वापस बिहार चला गया है लेकिन जानकारी किसी को नहीं है.

पोक्सो के क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्यों के बाल अधिकार संरक्षण आयोग जवाबदेह हैं, लेकिन ज्यादातर राज्यों में आयोग बुनियादी ढांचे और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं

दूसरा मामला दो बहनों नीता (6) और रेखा (4) का है जो कैब से स्कूल आया-जाया करती थीं. छोटी बहन रेखा 12 बजे ही घर आ जाती थी, जबकि नीता को 2 बजे घर वापस आना होता था. उसे सबसे आखिर में उतरना होता था इसी बात का फायदा उठाकर कैब का ‘अंकल’ अक्सर उसकी छाती दबाता, उसे गंदी नीयत से छूता था. कभी तो वहशीपन की सारी हदंे लांघते हुए वह अपनी उंगली उस बच्ची की योनि में भी डाल देता था. लेकिन नीता ने इसकी शिकायत किसी से नहीं की क्योंकि कैब चालक ने उसे इस बारे में किसी को भी बताने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी. इस समय मासूम नीता को अपनी छोटी बहन की सुरक्षा का भी एहसास था.

बच्ची की चुप्पी से उस कैब ड्राइवर की हिम्मत और बढ़ गई और एक दिन उसने बच्ची के साथ बलात्कार किया. फिर बच्ची के शरीर से अपनी दरिंदगी के निशान धोकर साफ किए और उसे घर छोड़ दिया. नीता के माता-पिता को इस यौन उत्पीड़न के बारे में तब पता चला जब उसे तेज बुखार हुआ और उसने चलने-फिरने से भी मना कर दिया. उसके माता-पिता ने तुरंत इस बारे में पुलिस को सूचना दी. वे चाहते थे कि उनकी बेटी के साथ इस जघन्य अपराध को अंजाम देने वाला अपराधी किसी दूसरी बच्ची को अपनी हवस का शिकार न बना पाए.

शुरुआत में स्कूल प्रशासन ने इस घटना से इंकार किया लेकिन बाद में कैब चालक को निलंबित कर दिया. मीडिया में इस घटना की खबर पीड़िता के नाम के बिना चली लेकिन मामले की विस्तृत जानकारी सामने आने के बाद पीड़िता के बारे में अनुमान लगाना आसान हो गया. तब से पीड़िता ने खेलने के लिए घर से बाहर जाना और दूसरे बच्चों से बात करना बंद कर दिया. आरोपी की तरफ से मिलने वाली धमकियों ने पीड़ित परिवार पर इस इलाके को छोड़ने और बच्ची का स्कूल बदलने के लिए दबाव बनाया. सिविल सोसायटी के लोगों ने पीड़ित के इलाज के लिए वित्तीय सहायता जरूर मुहैया कराई है लेकिन कोर्ट केस अभी भी चल रहा है. फिर जैसा कि होता है, कुछ समय के बाद कोर्ट की बढ़ती हुई फीस और असंख्य सुनवाईयों की सुस्त चाल के चलते माता-पिता ने इस केस में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया.

तीसरा मामला 12 साल के गणेश का है, जिसके साथ यौन उत्पीड़न की जघन्यतम घटना उसके पिता की उम्र के लोगों ने अंजाम दी थी. गणेश स्कूल की छुट्टियों में एक मोटर गैराज में काम करता था. उसके आत्मविश्वास को कुचलने की कोशिश के चलते उसके दो साथी कर्मचारियों ने उसके गुदाद्वार में हवा पंप कर दी. चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के बाल हक अभियान ने इस मामले की 18 महीने तक लगातार निगरानी की और बच्चे के इलाज और पुनर्वास तक सहयोग किया. मामले में दोनों आरोपियों और गैराज मालिक के खिलाफ केस दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया गया.

गणेश के मामले में उसकी आपातकालीन सर्जरी के बाद भी ट्रायल खत्म नहीं हुआ है. गणेश दलितों के मतंग समुदाय से था, जिस कारण पूरी घटना का राजनीतिकरण हो गया. पिता के शराबी होने के कारण इलाज की पूरी जिम्मेदारी उसकी मां पर आ गई. काफी प्रयास के बाद बच्चे को महाराष्ट्र के समाज कल्याण बोर्ड की तरफ से सहायता राशि के तौर पर कुल 25 हजार रुपये मिले जिससे उसका अच्छा इलाज और आगे की पढ़ाई कराने को कहा गया.

अपने करिअर की शुरुआत से बच्चों की सुरक्षा विशेषज्ञ होने के नाते मैं प्रक्रिया से अनजान लोगों के विशाल संघर्ष और केस प्रबंधन से जुड़ी खामियों को पहचानती हूं. यहां उल्लिखित पहला मामला अवैध संबंधों से जुड़ा हुआ है, जिसके बारे में हमारे देश में पर्याप्त चर्चा इसलिए नहीं होती क्योंकि यह परिवार के सम्मान से जुड़ा  है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक 2014 में सामने आए कुल 713 मामलों में से 46 प्रतिशत परिवार के अंदर हुए अवैध संबंधों से जुड़े थे, साथ ही उत्पीड़न के शिकार बच्चों की उम्र 12 से 18 साल के बीच थी. ये जो मामले सामने आए हैं, वे हकीकत से काफी कम हैं.

कानूनी रूप से दूसरा मामला काफी मजूबत था क्योंकि इस मामले में पीड़िता खुलकर सामने आई और कार्रवाई की गई लेकिन समुदाय और समाज ने उस मासूम बच्ची को हरा दिया, जिसने अपने ऊपर हुई ज्यादती के बारे में बोलने की हिम्मत दिखाई थी. वहां आर्थिक विसंगतियां थीं, उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा, साथ ही बच्ची की मां ने अपनी नौकरी भी गंवा दी. पीड़ित परिवार की सहायता के लिए कोई माहौल नहीं बन पाया, जिससे मामले का सही तरह से निपटारा हो सके.

उसी तरह तीसरे मामले में कानूनी तौर पर न्याय होता दिखा. हालांकि बच्चे की मानसिक पीड़ा उस कष्ट से और बढ़ी जो उसके समुदाय ने दिया. बच्चे को मिले मानसिक आघात से निकालने की बजाय लोग इस घटना के राजनीतिकरण में लगे रहे. बाल यौन उत्पीड़न के मामलों में बच्चे को सदमे से उबारने के लिए न्याय के अलावा सामाजिक स्थिरता, नियमित स्वास्थ्य सेवाओं और निरंतर परामर्श की जरूरत भी महत्वपूर्ण होती है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

सालों के संघर्ष के बाद बच्चों की यौन उत्पीड़न से सुरक्षा के लिए प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल अॉफेंस एक्ट (पोक्सो अधिनियम) 2012 लागू हुआ, जिसके तहत बच्चों के यौन उत्पीड़न को दंडनीय अपराध माना गया और न्याय की पूरी प्रक्रिया को पीड़ित बच्चे के अनुकूल रखने का प्रयास हुआ. पहले अश्लीलता और उत्पीड़न से जुड़े मामलों में मुकदमा चलाना काफी मुश्किल था क्योंकि सभी मामले भारतीय दंड संहिता के तहत ही दर्ज होते थे.

हालांकि इस कानून के अमल में आने के तीन साल बाद भी पीड़ित बच्चों की स्थितियों में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है. पोक्सो कानून के अनुसार ऐसे किसी भी मामले को विशेष किशोर संरक्षण इकाई में रिपोर्ट करना होगा. पोक्सो  पीड़ित की सुरक्षा और विभिन्न सुविधाएं देने के लिए बाल कल्याण समितियों की भूमिका भी स्पष्ट करता है पर मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकती हूं कि ये बाल कल्याण समितियां भी बाल यौन उत्पीड़न के जटिल मामलों से निपटने के लिए बहुत योग्य नहीं हैं.

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ‘समेकित बाल संरक्षण योजना’ को लाने का उद्देश्य देश के सभी बच्चों के लिए संरक्षणपूर्ण वातावरण बनाना था, जहां उन्हें समुचित आर्थिक सुविधाएं और सहयोग दिया जा सके, पर भूमिकाओं की अस्पष्टता और संविदा कर्मियों की कम तनख्वाह के मुद्दे के चलते इसका क्रियान्वयन ठीक तरह से नहीं हो पाया. इन समस्याओं से पार पाना अभी तो मुश्किल लग रहा है.

पोक्सो के क्रियान्वयन और देखरेख के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्यों के बाल अधिकार संरक्षण आयोग जवाबदेह हैं. इन आयोगों को राज्य सरकारों द्वारा प्रतिपादित दिशा-निर्देशों की भी निगरानी करनी होती है. पर ज्यादातर राज्य आयोग घटिया बुनियादी ढांचे, संसाधनों की कमी और स्वायत्तता और शक्ति की कमी से जूझ रहे हैं. उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश राज्य आयोग ने पांच सदस्यों को एक साल के लिए नियुक्त किया लेकिन वर्तमान में आयोग में सिर्फ एक सदस्य है. इसी तरह हरियाणा और राजस्थान के आयोगों में भी सिर्फ एक -एक सदस्य ही है.

इस कानून की धारा 35, स्पेशल पोक्सो कोर्ट के लिए ये अनिवार्य करती है कि पीड़ित बच्चे के बयान और सबूत 30 दिन के अंदर रिकॉर्ड करे और एक साल के अंदर मामले का निपटारा करे. देश के कई भागों में या तो इन मामलों को सुनने के लिए कोई स्थायी कोर्ट नहीं है और अगर है तो फिर वे काम नहीं कर रहे हैं. पोक्सो के प्रावधानों को अमल में लाने के लिए फिर से समीक्षा की जरूरत है. इस कानून को सफल रूप से क्रियान्वित करने के लिए ऐसे मामलों का अनिवार्य रूप से रिपोर्ट होना और पीड़ित की क्षतिपूर्ति का जनता की नजर में आना बहुत जरूरी है.

एनसीआरबी के अनुसार, पोक्सो एक्ट के तहत 2014 में दर्ज मामलों की संख्या 9,712 थी, जिनमें से 6,982 मामलों को निपटा दिया गया. जो 8,379 मामले कोर्ट में चले उनमें से कुल 406 केसों का ट्रायल पूरा हो पाया, जिसमें सिर्फ 1.19 प्रतिशत (100 केस) मामलों में ही आरोपियों को सजा हो पाई. शहरों में हालत थोड़ी ठीक है लेकिन ग्रामीण इलाकों में अब भी इस योजना का प्रसार-प्रचार बाकी है.

सजा मिलने के खराब आंकड़ों और स्पेशल कोर्ट की भारी कमी को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि हमें अपने बच्चों को न्याय दिलाने के लिए अभी बहुत काम करना है. उसी से साबित होगा कि हम अपने बच्चों के खिलाफ किसी भी तरह का उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं करते.

(लेखिका चाइल्ड राइट्स एंड यू की निदेशक (नीति एवं अनुसंधान) हैं)