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कोका कोला की प्यास से बंजर होता बनारस

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सपना था कि गांव का शासन गांव से चले. गांव के लोग खुद ही यह तय करें कि उनका विकास किस तरह से किया जाए. इसी राह पर चलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की 18 ग्राम पंचायतों ने इलाके में स्थित विश्व की दिग्गज पेय पदार्थ निर्माता कंपनी कोका कोला के मेहदीगंज प्लांट को बंद करने की मांग की है. इन पंचायतों के प्रमुखों का कहना है कि कोका कोला संयंत्र द्वारा पानी की अत्यधिक खपत के चलते इलाके में पानी का स्तर काफी नीचे चला गया है और स्थानीय लोगों को पानी की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है. ये सारी 18 ग्राम पंचायतें कोका कोला प्लांट के पांच किमी. के दायरे में आती हैं.

इस विषय में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) को पत्र लिखकर कोका कोला संयंत्र के भूजल दोहन पर रोक लगाने की मांग करने वालों में स्थानीय विधायक महेंद्र सिंह पटेल भी शामिल हैं. इस पत्र में कहा गया है कि जब मेहदीगंज कोका कोला संयंत्र की स्थापना 1999 में हुई थी, उस समय इलाके का भूजल स्तर सुरक्षित था. स्थापना के बाद से कोका कोला प्रतिवर्ष 50 हजार घन मीटर भूजल का दोहन कर रही है. 2009 में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने पानी की भीषण किल्लत को देखते हुए वाराणसी के आराजी लाइन ब्लॉक को अधिक दोहित (ओवर एक्सप्लाॅयटेड) घोषित कर दिया है. मेहदीगंज इसी ब्लॉक के अंतर्गत आता है. ग्राम प्रतिनिधियों को कोका कोला द्वारा इतनी मात्रा में भूजल का दोहन करना स्वीकार्य नहीं है.

प्यासे लोग – बर्बाद खेती

विकास की राह किस तरह कभी-कभी बर्बादी की ओर ले जाती है इसका नजारा आप वाराणसी जंक्शन से करीब 25 किमी. दूर मेहदीगंज इलाके में देख सकते हैं. इसकी शुरुआत 90 के दशक में हुई जब इलाके के किसानों और ग्राम पंचायतों ने खुशी-खुशी अपनी जमीनें पारले एग्रो समूह को प्लांट लगाने के लिए दी थीं, जिसे बाद में कोका कोला ने खरीद लिया और मेहदीगंज में 1999-2000 के आसपास बॉटलिंग प्लांट लगाया. प्लांट लगाते समय कंपनी के अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि कोला कोला बहुराष्ट्रीय कंपनी है और वह इलाके की तस्वीर बदल देगी. लोगों को रोजगार मिलेगा और बड़ी संख्या में लोग लाभान्वित होंगे. हालांकि ऐसा नहीं हुआ. प्लांट लगने के साथ गांववालों का कंपनी से विवादों का सिलसिला शुरू हो गया था. शुरुआत जमीन विवाद से हुई. कंपनी के ऊपर आरोप लगा कि उसने ग्राम सभा की जमीन हथिया ली. मामला अदालत में पहुंचा और इस पर कंपनी को हाईकोर्ट से स्टे आॅर्डर मिला हुआ है. कंपनी का काम शुरू हुआ. कोल्ड ड्रिंक बनने के दौरान भारी मात्रा में प्रदूषित पानी भी निकलता है. कंपनी ने प्रदूषित पानी को गांव वालों के खेतों में डालना शुरू कर दिया.

‘इलाके का हाल बहुत बुरा है. यहां आपको पीने के पानी के लिए हैंडपंप लगाने पर पाबंदी है. खेती के लिए ट्यूबवेल लगाने के लिए भी आपको प्रशासन से अनुमति लेनी होगी’

गांव के किसानों को लगा कि यह पानी उनके खेतों के लिए फायदेमंद है तो उन्होंने कोई आपत्ति नहीं जताई लेकिन जल्द ही उनका ये भ्रम दूर हो गया. इस पानी के चलते पैदावार पर बुरा असर पड़ा. वहीं गांव के तालाबों और बावड़ियों का पानी भी प्रदूषित हो गया. 2003 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मेहदीगंज प्लांट से निकलने वाले पानी की जांच में पाया कि उसमें सीसा, कैडमियम और क्रोमियम की मात्रा निर्धारित मानकों से कहीं अधिक है. उस समय कृषि वैज्ञानिकों ने भी बताया कि पानी में कैडमियम की ज्यादा मात्रा होने से फसलें खराब हुईं और उत्पादन प्रभावित हुआ. जब यह बात गांववालों की समझ में आई तो उन्होंने इसका विरोध किया. विरोध बढ़ता देख कंपनी ने किसानों के खेतों में पानी डालना छोड़ दिया. इसी तरह प्लांट से निकलने वाले कचरे को भी कंपनी किसानों को उनकी फसलों के लिए उपयोगी बताकर खेतों में निरंतर डालती रही. पर इसने भी किसानों की फसलों को बर्बाद किया. कंपनी द्वारा कचरे का सही तरीके से निस्तारण करने को लेकर भी किसानों को आंदोलन करना पड़ा. एक बार तो इस कचरे को ट्रैक्टर पर लादकर किसान वाराणसी स्थित स्थानीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आफिस भी पहुंच गए.

पानी पर खींचातानी

2009 में केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीसीबी) ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि वाराणसी के आराजी लाइन ब्लॉक का भूजल स्तर बहुत ही नीचे पहुंच गया है इसलिए भूजल का दोहन तत्काल बंद कर देना चाहिए. इसके तुरंत बाद प्रशासन ने वहां स्थानीय लोगों व किसानों के भूजल दोहन पर पाबंदी लगा दी. अब आलम यह है कि नए हैंडपंप लगाने, कुआं खोदने और ट्यूबवेल लगाने से पहले प्रशासन की अनुमति लेनी पड़ती है. पर ये नियम-कानून किसानों और आमजन के लिए है, कोका कोला को इससे फर्क नहीं पड़ता. कोका कोला ने वर्ष 2012-13 में अपनी दोहन क्षमता का विस्तार करने की अर्जी दी. कंपनी को प्रतिवर्ष 50,000 घन मीटर पानी हर साल निकालने की अनुमति तो मिली ही थी, जिसे वह चार गुना बढ़ाकर 2,00,000 घन मीटर पानी प्रतिवर्ष करना चाहती थी. इस मांग का पंचायतों और स्थानीय लोगों ने कड़ा विरोध किया. एक बड़ा आंदोलन चला, जिसके चलते कोका कोला को यह अनुमति नहीं मिली.

जब पानी के संकट का मामला लगातार उठाया जाने लगा तो कंपनी ने ‘रेन वाटर हारवेस्टिंग’ की बात कही और उसने कहा कि वह जल संरक्षण करके प्लांट को वाटर पॉजिटिव बनाएगी यानी जितने पानी का दोहन करेगी उतने का संरक्षण भी करेगी. बाद में उसने प्लांट को वाटर पॉजिटिव भी घोषित कर दिया. हालांकि लगातार विरोध जारी रहने के बाद 6 जून 2014 को यूपीपीसीबी ने इस संयंत्र को बंद करने का आदेश दे दिया. यूपीपीसीबी ने कहा था कि कोका कोला ने कम पानी वाले क्षेत्रों में भूमिगत जल की निगरानी व नियमन करने वाली सरकारी एजेंसी केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्लूए) से जरूरी मंजूरी नहीं ली थी. कोका कोला ने इसके खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में अपील की, जहां से कंपनी को संयंत्र का परिचालन फिर से शुरू करने की अनुमति मिल गई.

लोक समिति संस्था से जुड़े और कोका कोला प्लांट के खिलाफ आंदोलन करने वाले नंदलाल मास्टर कहते हैं, ‘इलाके का हाल बहुत बुरा है. यहां आपको पीने के पानी के लिए हैंडपंप लगाने पर पाबंदी है. जीने के लिए आपको अन्न उपजाना होगा, लेकिन खेती के लिए ट्यूबवेल लगाने के लिए आपको प्रशासन से अनुमति लेनी होगी. अब किसान को अनुमति की जरूरत है पर कोका कोला को पानी निकालने की छूट मिल जाती है.’

 बंजर जमीन पर भारी बाजार

यूपीपीसीबी को भेजे गए पत्र में जन प्रतिनिधियों का कहना है कि भूजल संकट का सभी पर असर पड़ रहा है. नंदलाल मास्टर भी कहते हैं, ‘गांव के लोग पीने के लिए साफ पानी की मांग को लेकर जन प्रतिनिधियों के पास जाते हैं, लेकिन नए हैंडपंप लगाने या कुएं की खुदाई पर रोक लगी होने के कारण जनप्रतिनिधि भी लाचार हैं. ऐसे में उनके सामने भूजल संकट के लिए जिम्मेदार कोका कोला प्लांट को वापस भेजने का ही विकल्प बचता है’.

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ग्राम पंचायतों का समर्थन कर रहे कैलिफोर्निया स्थित इंडियन रिसोर्स सेंटर के अमित श्रीवास्तव ने कहा, ‘ग्राम प्रधानों की शिकायत से साफ है कि कोका कोला कंपनी मेहदीगंज के लिए समस्याएं पैदा कर रही है. कोका कोला को अब यहां से लौट जाना चाहिए. मेहदीगंज खेती योग्य इलाका है और यहां लोग अपनी जरूरतों के लिए भूमिगत जल पर ही निर्भर हैं. सिंचाई, मवेशियों के लिए, पीने और बाकी कामों के लिए भूमिगत जल ही उनका सहारा है. जबकि कोका कोला इसी पानी का उपयोग अपने उत्पाद यानी मुनाफा कमाने के लिए करती है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोका कोला कंपनी पानी का प्रयोग जिम्मेदारी से करने का दावा करती है लेकिन भारत में उसकी असलियत कुछ और ही है. यहां कंपनी अनुचित रूप से भूजल का दोहन कर रही है. जिसके चलते स्थानीय लोगों को पानी की कमी झेलनी पड़ रही है. साथ ही वे प्रदूषित पानी के साथ जिंदगी बसर करने को मजबूर हैं. इस इलाके की खेती पूरी तरह से बर्बाद हो रही है. जलस्तर नीचे जाने से किसानों के ट्यूबवेल से पर्याप्त पानी नहीं आता है. हर किसान के पास इतना पैसा नहीं है कि वह अपनी पानी की बोरिंग को नीचे तक ले जा पाए. इसलिए फसलें सूख जा रही हैं.’

हालांकि अमित श्रीवास्तव सीजीडब्लूए द्वारा भूजल इस्तेमाल को लेकर 16 नवंबर 2015 को लाई गई गाइडलाइन से खासे उत्साहित हैं. इसके तहत अधिक दोहित इलाके में भूमिगत जल का इस्तेमाल कर रहे संयंत्रों को अब सीजीडब्लूए की मंजूरी लेनी होगी. पहले सिर्फ उन्हें क्षमता विस्तार करने के लिए मंजूरी की जरूरत पड़ती थी. उनका कहना है कि इस गाइडलाइन से उनके आंदोलन को मदद मिलेगी.

 परेशानी का सबब बना प्लांट

स्थानीय निवासी दीपक चौबे का कहना है, ‘जब से कोका कोला कंपनी आई है तब से जलस्तर बहुत नीचे चला गया है. जो पानी पीने के लिए मिलता है वह भी बहुत गंदा है.’ ऐसा ही मानना ग्रामसभा देउरा के प्रधान राजेश वर्मा का है. वह कहते हैं, ‘कोका कोला प्लांट ने इतना पानी निकाल लिया है कि जलस्तर काफी नीचे चला गया है. गांव के लोग पानी की समस्या को लेकर हमारे पास आते हैं, तो हमारे सामने भी कोई विकल्प नहीं होता है. नए हैंडपंप और ट्यूबवेल के लिए आपको अनुमति लेनी पड़ती है, पुरानों से पानी नहीं आ रहा है. कुल मिलाकर हालात बद से बदतर हैं.’

कोका कोला एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहती है कि भले ही इन गांवों के तालाब, कुएं और हैंडपंप सूख चुके हैं लेकिन इस बात के सबूत नहीं मिले हैं कि इसके लिए उनका संयंत्र जिम्मेदार है

इसी तरह नागेपुर के प्रधान मुकेश कुमार ने बताया, ‘इलाके के ज्यादातर गांवों में पानी की व्यवस्था का बुरा हाल है. 2005 के करीब जब मैं पहली बार प्रधान बना तो हाल खराब होना शुरू हो गया था. शुरुआत में हमारी समझ में नहीं आया, लेकिन धीरे-धीरे पता चला कि इसके पीछे कोका कोला प्लांट है. स्थिति ज्यादा खराब तब हो गई जब 2009 में हमारे इलाके को ओवर एक्सप्लाॅयटेड घोषित कर दिया गया. इसके बाद सारे ग्राम पंचायतों के प्रमुखों ने मिलकर इसका विरोध करना शुरू किया. कंपनी ने जब अपने संयंत्र का विस्तार करने के लिए आवेदन किया तो हम सारे प्रधानों ने भी सभी विभागों को पत्र लिखा, जिसके बाद संयंत्र तो बंद नहीं हुआ, लेकिन विस्तार रुक गया. यह हमारी बड़ी जीत थी. अब हमने फिर से पत्र लिखकर इस प्लांट को बंद करवाने की मांग की है.’

 प्रशासन को परवाह नहीं

ग्राम प्रधानों ने मामले को लेकर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जल संसाधन मंत्रालय, केंद्रीय भूजल प्राधिकरण, केंद्रीय भूजल बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, ग्राम विकास मंत्रालय, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, वाराणसी के सांसद नरेंद्र मोदी और वाराणसी के जिलाधिकारी को पत्र लिखे हैं. 15 नवंबर को लिखे इस पत्र का महीने भर बाद भी कहीं से जवाब नहीं आया है और न ही किसी तरह की कार्रवाई की बात मीडिया के जरिये सामने आई है. जब इस मामले पर वाराणसी के जिलाधिकारी राजमणि यादव से बात की गई तो उन्होंने बताया, ‘पर्यावरण और भूगर्भ जल संरक्षण विभाग से इस मामले पर रिपोर्ट मांगी गई है. उनका जवाब आने के बाद नियमानुसार कदम उठाए जाएंगे.’ उन्होंने कहा, ‘ग्राम प्रधानों की शिकायत हमें डाक के जरिये मिली थी, इसलिए मामले को लेकर उठाए गए कदमों से प्रधानों को अवगत नहीं कराया गया है.’

वहीं नंदलाल मास्टर कहते हैं, ‘यह आंदोलन काफी लंबे समय से चल रहा है. जब भी किसी राजनीतिक पार्टी के नेता विपक्ष में होते हैं, तब वे हमारे समर्थन में होते हैं, हमारे साथ प्रदर्शन करते हैं, लेकिन जैसे ही उनकी सरकार आती है, उन्हें हमारी परेशानी दिखनी बंद हो जाती है. बॉटलिंग प्लांट को लेकर साल 2004 से 2009 तक लगातार आंदोलन भी होते रहे. इसमें मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय और समाज सेवी मेधा पाटकर जैसे लोगों ने भी भाग लिया था. कई विधायकों ने हमारे साथ प्रदर्शन किया है, लेकिन यह प्लांट आज भी चल रहा है.’

 कंपनी का आरोपों से इंकार

ग्राम प्रधानों द्वारा जलस्तर नीचे जाने को लेकर कोका कोला संयंत्र को जिम्मेदार ठहराए जाने से कंपनी साफ इंकार करती है. कंपनी केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा वर्ष 2012 में हुए एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहती है कि भले ही इन गांवों के तालाब, कुएं और हैंडपंप सूख चुके हैं, लेकिन इस बात के सबूत कहीं नहीं मिले हैं कि इसके लिए मेहदीगंज स्थित संयंत्र जिम्मेदार है. रिपोर्ट के हवाले से कोका कोला कंपनी कहती है कि संयंत्र आराजी लाइन ब्लॉक के भूमिगत जल का सिर्फ 0.06 प्रतिशत ही इस्तेमाल करता है, जबकि खेती के लिए 85.5 प्रतिशत जल का इस्तेमाल होता है. कंपनी का कहना है कि वह भूमिगत जल की कमी से खुद भी चिंतित है और जलस्तर ऊपर उठाने के लिए कई गैर सरकारी संगठनों के साथ काम भी कर रही है. भूमिगत जलस्तर घटने के चलते ही कंपनी ने अपने विस्तार की योजना को भी रद्द कर दिया है.

एएसआई इसका स्मारक भूल गया

लाल पानी पर लगाम

Photo by - Sonu Kishan.
फोटोः सोनू किशन

करीब दो साल पहले की बात है. लालू प्रसाद यादव ‘तहलका’ से बातचीत कर रहे थे. इस दौरान शराब पर बात होने लगती है. लालू कहते हैं, ‘देखिए नीतीश को, उसका लोग शराबबंदी की बात को हवा में उड़ाता है. गरीबों का ‘लाल पानी’ बंद करवा देगा. बताइए गरीबों का लाल पानी बंद होगा तो उसका असर पड़ेगा न ! गरीबों को लाल पानी जरूर चाहिए. शराब की चेकिंग हो, उस पर नियंत्रण हो लेकिन उसकी बंदी तो कभी नहीं होने देंगे. बंद ही करना हो तो अमीरों का लाल पानी बंद होना चाहिए या उनके लिए शराब महंगी हो जानी चाहिए.’

लालू प्रसाद से हुई इस बातचीत से दो बातें साफ होती हैं. एक यह कि लालू प्रसाद यादव पूर्णतः शराबबंदी और उसमें भी देसी शराब की बंदी के पक्ष में कभी नहीं रहे. दूसरी बात यह कि नीतीश कुमार की यह बेचैनी बहुत दिनों से थी कि वे शराबबंदी कर दें. सत्ता संभालने के ठीक छठे दिन 26 नवंबर को मद्य निषेध दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने यह घोषणा भी कर दी.

नीतीश कुमार के दस वर्षों के कार्यकाल में हर गांव में या पंचायत स्तर पर शराब की दुकान खुलवाने वाला काम ही ऐसा रहा, जिससे न सिर्फ उनकी बदनामी होती रही बल्कि उसका नुकसान राज्य को भी उठाना पड़ा. घरेलू कलह से लेकर सामाजिक तनाव तक बढ़ा. इसका नुकसान सबसे ज्यादा उन महिलाओं को ही उठाना पड़ा, जो नीतीश की वोट बैंक मानी जाती रही हैं. स्थिति यह हुई कि नीतीश कुमार ने लड़कियों को साइकिल देकर और पंचायत चुनाव में आरक्षण देकर महिलाओं के बीच जो पैठ बनाई थी, वह भी दांव पर लगती गई. कई इलाकों में प्रायोजित तौर पर ही सही, ऐसी रैलियां भी निकलने लगी थीं, जिसमें लड़कियां हाथों में तख्तियां लेकर यह कहतीं कि ‘नीतीश अंकल आप अपनी साइकिल वापस ले लीजिए लेकिन शराब की दुकान बंद करवा दीजिए.’ बच्चियों के इस अभियान को तो फिर भी राजनीतिक तौर पर प्रायोजित अभियान माना गया लेकिन पिछले एक साल में राज्य में जिस तरह से अलग-अलग हिस्सों में महिलाओं ने शराब के खिलाफ छोटे-छोटे समूहों में मोर्चा संभाला था और शराबबंदी की कोशिश में लगी हुई थीं, उसके बाद नीतीश कुमार या किसी की भी सरकार आने पर कोई रास्ता नहीं बचता था. ऐसे में शराबबंदी की घोषणा करना ही एकमात्र विकल्प बच गया था.

महिलाओं ने राज्य में शराबबंदी के खिलाफ किस तरह से कमान संभाली, उसकी बानगी बिहार चुनाव के दौरान भी देखने को मिली थी. रोहतास जिले में महिलाओं ने शराबबंदी के लिए नोटा का प्रचार शुरू कर दिया था. पांच सितंबर को एक बड़ी खबर छपरा के शोभेपुर गांव से आई कि वहां शराबबंदी के लिए समूह में पहुंचीं महिलाओं ने शराब के अड्डों पर धावा बोला, अड्डे को ध्वस्त किया और कारोबारी देखते ही रह गए. ऐसी ही खबरें पटना से सटे मनेर हल्दी, छपरा, सादिकपुर, शेरपुर, छितनावां जैसे गांवों से आई थीं कि वहां महिलाओं ने शराब के अड्डों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया है. बरबीघा जैसे इलाके से तो यहां तक खबर आई कि महिलाओं ने समूह बनाकर पीनेवाले और पिलानेवाले, दोनों पर भारी जुर्माना और सार्वजनिक तौर पर डंडे से पिटाई जैसे दंड की व्यवस्था की न सिर्फ घोषणा की थी बल्कि उस पर अमल भी किया.

बिहार में पहली बार पूर्ण शराबबंदी की घोषणा 1977-78 में हुई थी लेकिन यह कारगर नहीं हो सकी थी. कुछ लोगों का मानना है कि इस बार भी यही होगा

शराबबंदी के इन तमाम अभियानों में एक बात समान रही कि ये बिना किसी राजनीतिक दल के सहयोग के महिलाओं ने खुद ही चलाए. नीतीश कुमार यह बात बहुत पहले से जान गए थे कि अगर  शराबबंदी नहीं की गई तो उन्हें राजनीतिक तौर पर इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. इसलिए नीतीश ने चुनाव से पहले जुलाई में ही महिलाओं के एक कार्यक्रम में कह दिया था कि अगर उनकी सरकार आई तो वे शराबबंदी करेंगे. जानकार मानते हैं कि नीतीश के उसी आश्वासन का असर था कि महिलाओं ने फिर से उनके पक्ष में वोट किया. सरकार बनते ही शराबबंदी के फैसले का एेलान करने के पीछे भी कारण यह बताया जा रहा है कि नीतीश किसी भी कीमत पर महिला वोट बैंक को कहीं और नहीं जाने देना चाहते.

हालांकि इस ऐलान के बाद से ही कई सवाल खड़े हो गए हैं. पहला सवाल तो यही उठाया जा रहा है कि खुद नीतीश कुमार के ही कार्यकाल में शराब गांव-गांव तक व्यवस्थित रूप में पहुंची है तो क्या शराबबंदी कर देने से वर्षों की लगी हुई लत अचानक खत्म हो जाएगी या फिर शराबखोरी दूसरे रूप में देखने को मिलेगी.

अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की रामपरी देवी कहती हैं, ‘सिर्फ सरकारी स्तर पर शराबबंदी का मामला नहीं है. हमारा आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक गांव-गांव में अवैध शराब की बिक्री बंद नहीं हो जाती है.’ रामपरी जैसी महिलाएं जानती हैं कि शराबबंदी के महज ऐलान कर देने से कुछ नहीं होने वाला उसका स्वरूप बदलेगा और उसका प्रकोप भी, क्योंकि चुलाई वाली शराब (महुवे से बनने वाली खतरनाक देसी शराब) से स्थितियां और बदतर होगी. लोजपा नेता व सांसद चिराग पासवान भी इसी बात को दोहराते हैं. चिराग कहते हैं, ‘नीतीश कुमार की इस घोषणा का स्वागत है लेकिन उनके ही राजकाज में शराब गांव-गांव तक पहुंची है. ऐसे में वे अपने इस फैसले को लागू कैसे करवाएंगे, यह देखना होगा.’ हालांकि भाजपा नेता गिरिराज सिंह जैसे लोग इस फैसले के बारे में दूसरे किस्म की बात करते हैं. गिरिराज कहते हैं, ‘नीतीश कुमार के इस फैसले का लागू होना इस बात पर निर्भर करेगा कि इसमें लालू प्रसाद यादव की कितनी सहमति है. अगर लालू की सहमति है तो बेहतर होता कि यह ऐलान नीतीश कुमार उनसे ही करवाते.’

गिरिराज जैसे नेता जानते हैं कि लालू यादव इतनी आसानी से सरेआम शराबबंदी का ऐलान नहीं करने वाले हैं. बिहार में शराब का सीधा रिश्ता वोट से है. चुनाव के वक्त शराब बांटे जाने के मामले तो होते ही हैं. देसी शराब की बंदी से एक बड़ा समूह है जो बिदक सकता है. जबकि दूसरी ओर नीतीश जानते हैं कि शराबबंदी के ऐलान से उन्हें देर-सबेर राजनीतिक तौर पर भी फायदा होगा. महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने जितने काम किए हैं और जिस वजह से महिलाएं राजनीतिक तौर पर उनकी मुरीद हुई हैं, उसमें बस शराब ही एक ऐसा पेंच रहा है, जिसके कारण वे नीतीश से अलग हो सकती थीं.

खैर यह तो राजनीतिक दांव-पेंच है. दूसरा सवाल राजस्व का खड़ा हुआ है. बिहार एक ऐसा राज्य है, जहां राजस्व का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत शराब ही रहा है. 2012 से अब तक देखें तो हर साल शराब से राजस्व में लगातार बढ़ोतरी होती रही है. वित्तीय वर्ष 2012-13 में जहां शराब से 2,600 करोड़  रुपये राजस्व प्राप्ति हुई थी, वह 2013-14 में बढ़कर 3,100 करोड़ रुपये हुई, उसके अगले साल 3,250 करोड़ और फिर 2015-16 में अब तक बढ़कर 4,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है. शराब से बिहार में प्राप्त होने वाले राजस्व का एक गणित यह भी है कि इससे उत्पाद विभाग के अलावा वाणिज्य कर विभाग भी राजस्व वसूलता है.

इस आधार पर देखें तो चालू वित्तीय वर्ष में यह 5,300 करोड़ रुपये तक पहुंच जाने का अनुमान है. इससे अधिक राजस्व बिहार को सिर्फ वाणिज्य कर से मिल रहा है, जिससे वित्त वर्ष 2014-15 में 21,375 करोड़ रुपये की प्राप्ति हुई.

अगर बिहार जैसे राज्य के आर्थिक हित को ध्यान में रखकर देखें तो यह एक बड़े नुकसान की ओर संकेत देता है लेकिन इसको भी झेलने को तैयार होकर शराबबंदी की घोषणा करना नीतीश कुमार के राजनीतिक व्यक्तित्व को और बड़े रूप में स्थापित करने वाला फैसला साबित होगा, इसकी उम्मीद की जा रही है. नीतीश कुमार खुद कहते हैं, ‘उन्हें मालूम है कि शराब से करोड़ों के राजस्व की प्राप्ति होती है. यह राजस्व इसलिए भी बढ़ा है क्योंकि हमने उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग में राजस्व की चोरी रोकने का उपाय किया. इसी वजह से यह पांच सालों में एक हजार करोड़ से बढ़कर चार हजार करोड़ रुपये तक पहुंचा.’ नीतीश कुमार के मुताबिक राजस्व की इस क्षति को वह दूसरे तरीके से प्राप्त करने की कोशिश करेंगे लेकिन महिलाओं के हित को ध्यान में रखकर इस फैसले को जरूर लागू करेंगे. नीतीश कुमार जितने दृढ़ संकल्प के साथ इस बात को दोहरा रहे हैं, उससे यह भरोसा मिलता है कि बिहार में अप्रैल से शराबबंदी लागू होगी. हालांकि कुछ लोगों को आशंका है कि इसका भी 1977-78 वाला ही हाल होगा. बिहार में पहली बार पूर्णतः शराबबंदी की घोषणा 1977-78 में हुई थी लेकिन वह कारगर साबित नहीं हो सकी थी. फिलहाल शराबबंदी की घोषणा के बाद बिहार में 4,939 शराब दुकानों की ओर रोज देखा जा रहा है और उन्हें कहा जा रहा है कि आपके दिन जाने वाले हैं. दूसरी ओर कई जगह से यह सूचनाएं भी मिल रही हैं कि शराबबंदी की घोषणा के बाद शराब के कारोबारी तेजी से शिक्षा के धंधे में आने की तैयारी में हैं. वे स्कूल और कॉलेज आदि खोलने में लग गए हैं.

मंच पर लंपट

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इन दिनों देश और धर्म के लिए मुचैटा लेने वालों की भरमार हो गई है. यह वैसा बोलना नहीं है जैसा किसी लोकतांत्रिक समाज में होता है. यह गालियों और धमकियों से लदी भाषा है जो अपने से इतर नजरिया रखने वाले को थप्पड़ मारने के लिए मचल रही है. असहिष्णुता (जो एक नाकाफी शब्द है) के प्रश्न पर सबसे संयमित प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर देखने में आ रही हैं क्योंकि वहां सब कुछ ‘ऑन रिकॉर्ड’ है जिसके कारण कार्रवाई का वास्तविकता को छूता काल्पनिक खटका लगा रहता है. सड़कों और गलियों में परिदृश्य खौफनाक है क्योंकि वहां सब कुछ एक नितांत भिन्न शक्ति संतुलन से संचालित होता है जो कानून की पकड़ में नहीं आ पाता. अगर आ भी जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि भारी भरकम मानक शब्दों के पीछे छिपे कानून बनाने और लागू करने वाले वही सड़क वाला ही खेल खेलने लगते हैं. इसे इस कदर साधा जा चुका है कि कानून भीतर से ताकतवरों के पक्ष में बदल चुका है जबकि बाहर से कमजोरों को न्याय का न्योता देता हुआ आकर्षक बना हुआ है.

उदाहरण के लिए मोहल्ले की पान की दुकान पर कोई देश के बनैले होते माहौल पर चिंता जताता है या गाय से पहले अपनी मां का ख्याल रखने पर जोर देता है तो जवाब में उसे हाथ-पैर तोड़ने की धमकी दी जाती है या पाकिस्तान चले जाने को कहा जाता है. वह अपमानित आदमी थाने जाकर एफआईआर दर्ज कराना चाहता है तभी धमकाने वाला गिरोह ठहाकों के बीच कहता है… आप भी हंसी मजाक की बात में थाना-पुलिस ले आए, क्या पुलिस हिंदू नहीं है और न भी हो तो क्या उखाड़ लेगी. क्या यह काफी सहिष्णुता नहीं है कि अब भी आपका मुंह पान खाने लायक बचा हुआ है?

इस लचीलेपन के साथ गालियों और धमकियों का घेरा हर दिन उस आदमी के गिर्द और कसता जाता है. यह लचीलापन लंपटता की खास पहचान है जो इन दिनों देशभक्ति के बहाने कोई पुराना हिसाब बराबर कर लेना चाहती है. धार्मिक और जातीय घृणा को पोसने वाला कोई भाजपाई मंत्री या सांसद जब किसी कानूनी फंसान वाले अपने बयान को मीडिया द्वारा तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाना बताता है तब भी इस लचक को उसकी आंखों में कंपकंपाता देखा जा सकता है. हाल के दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा पांचजन्य को अपना मुखपत्र मानने से इंकार लंपटता का एक यादगार नमूना है.

लंपटता कांग्रेस के राज में भी भरपूर थी जिसके सर्वोच्च प्रतीक संजय गांधी बन कर उभरे. प्रधानमंत्री के बेटे के पास देश के विकास के लिए बीस सूत्री कार्यक्रम था और विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए लंपटों की फौज, जो उसके खानदान की बिरूदावली गाकर सत्ता से शक्ति और कानून से संरक्षण पाती थी. तब से इस मिलिशिया का निरंतर नवीनीकरण और विस्तार होता गया जिसका इस्तेमाल हर किस्म के दंगे प्रायोजित करने के लिए किया जाता रहा है. अब सत्ता की पार्टी भाजपा एक आदमी का चारणगान करते हुए पूछ रही है चौरासी में सिखों के संहार के वक्त सहिष्णुता कहां थी. खुद को न्यायसंगत ठहराने के लिए यही उसका सबसे ढीठ तर्क है जैसे कि मतदाताओं ने 2014 में मोदी को जनादेश उससे बड़े नरसंहार प्रायोजित करने और अपने से भिन्न विचार रखने वालों को ठिकाने लगाने के लिए ही दिया था.

कांग्रेस ने लंपटों को बढ़ावा अपने सामंती तासीर वाले राजनीतिक वर्चस्व और भ्रष्टाचार को अबाध जारी रखने के लिए दिया था लेकिन भाजपा ने कहीं अधिक खतरनाक खेल शुरू कर दिया है. अब निम्न मध्यवर्ग और दरिद्र तबके के युवाओं का अपराधीकरण देश और हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर किया जा रहा है जिसके लिए कच्चा माल उनके दिमागों में पहले से गश्त करते धार्मिक अंधविश्वासों, रूढ़ियों, कुरीतियों और मनगढ़ंत कहानियों के रूप में विपुल मात्रा में मौजूद है. बेरोजगारी की हताशा और हर तरह की संकीर्णता (खासतौर से विपरीत सेक्स से दूरी) के कारण पैदा हुई कुंठाओं के कारण वे हिंसा के जरिए खुद को साबित करने का मौका खोजते ही रहते हैं और अपराध की ओर मुड़ना उनके लिए सबसे सहज है. सत्ता से संरक्षण पाए भाजपा के सहयोगी तमाम तथाकथित हिंदू नामधारी संगठनों ने हीनता और कुंठा को अपने राजनीतिक स्वार्थ से जोड़ दिया है जिसका नतीजा ‘विधर्मियों’ को सबक सिखाने और विरोधियों पर हिंदू आतंक कायम करने के रूप में सामने आ रहा है.

लंपटों को पालने का एक और फायदा भी है जिसके कारण वे सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों को भाने लगे हैं. पहले विचारधारा में थोड़ा बहुत प्रशिक्षित कार्यकर्ता हुआ करते थे जो नेतृत्व की गलतियों पर टोकते थे, विरोध करने की हद तक जा सकते थे लेकिन लंपटों की एकमात्र विचारधारा अवसरवाद होती है. वे सवाल नहीं उठाते सिर्फ हुक्म की तामील करते हैं.

मंदना बनाम सेंसर बोर्ड

Mandana Karimiweb

सेंसर बोर्ड जब फिल्मों और इसके चाहने वालों को संस्कारी बनाने में व्यस्त था, उन्हीं दिनों बॉलीवुड में एक नया मील का पत्थर रख दिया गया है. सिचुएशनल कॉमेडी- सिटकॉम, रोमांटिक कॉमेडी-रोमकॉम से निकलकर अब एक नए जॉनर की फिल्म ने सेंसर बोर्ड के दरवाजे पर दस्तक दी है. एडल्ट कैटेगरी की इस फिल्म को भारत की पहली ‘पोर्न कॉम’ का तमगा मिला है. फिल्म का नाम ‘क्या कूल हैं हम-3’ है, जिसमें आफताब शिवदासानी और तुषार कपूर के साथ मंदना करीमी नजर आएंगी. फिल्म के ‘ए सर्टीफाइड’ पोस्टर मंदना के बिकिनी अवतार में कुछ ज्यादा ही बोल्ड नजर आ रहे हैं. भारतीय-ईरानी मूल की यह अभिनेत्री ‘रॉय’, ‘भाग जॉनी’ और ‘मैं और चार्ल्स’ फिल्मों में नजर आ चुकी हैं और इन दिनों बिग बॉस की वजह से चर्चा में हैं. मजेदार बात ये है कि फिल्म के पोस्टर, डायलॉग से लेकर ट्रेलर तक कुछ भी ‘संस्कारी’ नजर नहीं आ रहा. ऐसे में ये देखना जबरदस्त होगा कि जरूरत से ज्यादा ‘अनकूल’ सेंसर बोर्ड इस फिल्म के साथ मंदना को संस्कारी बनाता है या सिर्फ उसका बस सिर्फ ‘जेम्स बॉन्ड’ पर ही चलता है.

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Daisyweb‘जय हो फिल्म के बाद कोई अच्छा प्रस्ताव नहीं मिल रहा था. अगर अच्छा प्रस्ताव मिलता तो हेट स्टोरी-3 जैसी इरोटिक थ्रिलर नहीं करती’

डेजी शाह, अभिनेत्री

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Bajirao-Mastani

 

 

 

देखा जब पहली बार…

रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की रियल लाइफ जोड़ी ने ‘बाजीराव मस्तानी’ के साथ सिनेमाघरों में दस्तक दे दी है. इस फिल्म और शाहरुख खान की फिल्म ‘दिलवाले’ में सिनेमाघरों को लेकर विवाद जारी है. वहीं रणवीर और दीपिका की जोड़ी खूब सुर्खियां बटोर रही है. पिछले दिनों एक इंटरव्यू में रणवीर और दीपिका ने उन अनुभवों को साझा किया जब उन्होंने एक-दूसरे को पहली बार देखा था. दीपिका अपने रिलेशनशिप को लेकर जहां शांत रहती हैं, वहीं रणवीर कहीं ज्यादा बेबाक हैं. दीपिका के अनुसार, जब उन्होंने ‘बैंड बाजा बारात’ देखी तब उनकी नजर रणवीर पर पड़ी थी. दीपिका ने कहा, ‘यह लड़का कौन है और इसमें इतनी एनर्जी कैसे है?’ दूसरी ओर रणवीर पूरी बेबाकी से कहते हैं, ‘मैंने मकाऊ में जी सिने अवॉर्ड्स के समय सिल्वर ड्रेस में जब पहली बार दीपिका को देखा, तभी से उन पर फ्लैट हो गया था.’ तो अब तो भाई लोग समझ गए न कि आग दोनों तरफ बराबर लगी है.

 

0001webइश्क छुपता नहीं छुपाने से

काफी दिनों की चुप्पी के बाद वीजे, मॉडल और सिंगर अनुषा दांडेकर अचानक सुर्खियों में हैं. ये सब किसी मॉडलिंग असाइनमेंट या फिर किसी शो को लेकर नहीं बल्कि उनके रिलेशनशिप स्टेटस को लेकर है. खबर है कि वे टीवी कलाकार करन कुंद्रा के साथ रिलेशनशिप में हैं. मीडिया की बातों पर भरोसा किया जाए ताे दोनों दिल्ली में साथ पार्टी करते हुए देखे गए हैं. इसके अलावा करन ने सोशल मीडिया पर अनुषा के साथ एक इंटीमेट फोटो भी शेयर किया है. खबर यह भी है कि करन ने अनुषा को बतौर गिफ्ट एक पपी दिया है, जिसका नाम दोनों ने ‘मॉन्स्टर’ रखा है. करन कुछ भी सीधे तौर पर स्वीकार नहीं कर रहे हैं. वे बस इतना कह रहे हैं कि अभी वे कुछ दिन पहले ही अनुषा से मिले हैं और उनसे रिलेशनशिप के बारे में श्योर नहीं हैं. अब करन कुछ भी कहें लेकिन जिन्हें जो समझना था वो खुद-ब-खुद समझ जाएंगे.

जापान चलाएगा भारत में पहली बुलेट ट्रेन

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अब ये तय हो गया है कि भारत में पहली बुलेट ट्रेन जापान के सहयोग से दौड़ेगी. बुलेट ट्रेन परियोजना को लेकर 12 दिसंबर को भारत और जापान के बीच करार हो गया है. दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने इस डील पर हस्ताक्षर किए. 98 हजार करोड़ रुपये की इस योजना पर करार होने के बाद मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाने का रास्ता साफ हो गया है. दोनों शहरों के बीच की दूरी करीब 505 किलोमीटर है जिसे ट्रेन से तय करने में अभी अमूमन 7 घंटे का वक्त लगता है. बुलेट ट्रेन चलने के बाद यह दूरी मात्र 2 घंटे में तय की जा सकेगी. इसमें एक तरफ की यात्रा करने का किराया लगभग 2800 रुपये होगा. इस परियोजना पर अनुमानित खर्च 98,805 करोड़ रुपये है जिसमें 2017 से 2023 के बीच निर्माण काल के दौरान मूल्य और ब्याज वृद्धि भी शामिल है. पटरी, ट्रेन और संचालन प्रणाली से जुड़े सभी उपकरण जापान ही उपलब्ध कराएगा. जापान इंटरनेशनल कॉर्पोरेशन एजेंसी (जेआईसीए) और भारत के रेल मंत्रालय ने 2 साल पहले हाईस्पीड रेल नेटवर्क बनाने और चलाने संबंधी पहलुओं के अध्ययन पर काम शुरू किया था. जेआईसीए की फाइनल रिपोर्ट में कहा गया था कि मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन 350 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकती है. ऐसा माना जा रहा है कि बुलेट ट्रेन का व्यावसायिक संचालन 2024 से शुरू हो जाएगा. गौरतलब है कि चीन भी इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर उत्साहित था लेकिन जापान के हाथ बाजी लगने के बाद भी चीन दुखी नहीं है. इस परियोजना के लिए चीन अधिक ब्याज दर पर पैसा देना चाहता था जिसके चलते मामला आगे नहीं बढ़ पाया. इस बारे में पूछे जाने पर चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होंग ली ने कहा, ‘ये डील गंवाने के बाद भी चीन हाईस्पीड रेल नेटवर्क के क्षेत्र में भारत का सहयोग करने के लिए आगे बढ़ेगा.’

दिल्ली सचिवालय पर सीबीआई का छापा

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क्यों पड़ा छापा?

पिछले दिनों सीबीआई ने भ्रष्टाचार की शिकायत मिलने पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के सचिवालय स्थित दफ्तर के साथ-साथ उनके घर पर भी छापेमारी की. वरिष्ठ नौकरशाह आशीष जोशी ने राजेंद्र कुमार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए एसीबी से शिकायत की थी लेकिन एसीबी ने कोई कार्रवाई नहीं की तो उन्होंने 13 जुलाई को इसकी शिकायत सीबीआई से कर दी. मामला 2007 से 2014 के बीच दिल्ली सरकार के ठेके एक खास कंपनी को देने से जुड़ा है.

कौन हैं राजेंद्र कुमार?

राजेंद्र कुमार 1989 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और केजरीवाल के करीबी अधिकारियों में माने जाते हैं. आशीष जोशी ने राजेंद्र पर आरोप लगाया था कि उन्होंने शिक्षा और आईटी विभाग में अपने कार्यकाल के दौरान बेनामी कंपनियां बनाकर वित्तीय धांधली को अंजाम दिया था. जोशी के मुताबिक, राजेंद्र कुमार 2002 से 2005 तक शिक्षा निदेशक रहे. कुमार ने दिनेश गुप्ता और संदीप कुमार के साथ मिलकर एंडेवर्स सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड नाम से कंपनी बनाई. दिनेश शिक्षा विभाग को स्टेशनरी सप्लाई किया करते थे. 2007 में आईटी सचिव रहते हुए उन्होंने अपनी कंपनी को इस तरह से सूचीबद्ध कर दिया था कि वह बिना किसी टेंडर के ही सरकारी विभागों के साथ डील कर सके. शीला दीक्षित के कार्यकाल में सीएनजी किट घोटाले में भी उन पर आरोप लगे हैं. दो कंपनियों को बिना टेंडर ठेका दिया गया था जिसमें दिल्ली सरकार को करीब 100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था.

अरविंद केजरीवाल का क्या है आरोप?

सीबीआई के छापे को लेकर केजरीवाल ने मोदी सरकार पर हमला बोल दिया है. उनका आरोप है कि राजेंद्र कुमार तो केवल बहाना हैं असली मकसद तो डीडीसीए घोटाले में फंस रहे अरुण जेटली को बचाना है. जेटली कुछ समय के लिए दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष रहे थे. केजरीवाल ने मीडिया से बातचीत में कहा, ‘सीबीआई मेरे कार्यालय में डीडीसीए से जुड़ी फाइलों को पढ़ती रही. अगर मैं मीडिया से बात नहीं करता तो वे उन फाइलों को जब्त कर लेते. मुझे ये जानकारी नहीं है कि सीबीआई उन फाइलों की कॉपी अपने साथ ले गई है या नहीं.’ जेटली से सवाल पूछते हुए उन्होंने कहा, ‘डीडीसीए में कथित धांधली की जांच किए जाने से जेटली डरे हुए क्यों हैं?’ केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि ये सब पीएमओ के निर्देश पर हो रहा है.

..तो शायद मैं ये कहानी बताने के लिए जिंदा न बचती

Domestic1वो ग्रेजुएशन के दूसरे साल के इम्तिहान के दिन थे. हर विषय की परीक्षा के बीच कुछ दिन की छुट्टी होने के कारण जिस दिन परीक्षा होती थी उसके बाद का समय मौज-मस्ती के नाम होता था. यह शादियों का सीजन था. संयोग से उस रोज गांव में कई शादियां थीं. शाम ढलते ही बारात लेकर कई दूल्हे सड़कों पर निकल चुके थे. बैंड-बाजे की धुन पर थिरकते लोगों को देखने के लिए हम भागकर घर की छत पर पहुंच जाते. हमारे पुरुष प्रधान समाज में जब कहीं बारात जाती है तो बाराती अपने पौरुष का प्रदर्शन करते हुए चलते हैं. बारात के साथ और वर-वधू के फेरों के समय हमारे यहां फायरिंग आम बात है.

बारात में खुद को अलग दिखाने और अपने पौरुष का प्रदर्शन करने लिए कुछ युवा हथियार से बेहतर माध्यम किसी को नहीं समझते हैं. हालांकि ये शौक कई बार उनके साथ-साथ दूसरों के लिए भी घातक साबित होता है. इसके बावजूद ये ‘प्रथा’ हमारे समाज में बदस्तूर जारी है. पौरुष दिखने की पुरातन परंपरा से भइया भी अछूते नहीं थे. वो भी हथियार चलाने का शौक रखते थे. उनके पास भी एक पिस्तौल थी, इसकी जानकारी उस दिन के पहले तक घर में किसी को नहीं थी.

उस रोज भइया एक शादी में गए थे. मैं और छोटी बहन सोफे पर बैठकर टीवी पर फिल्म देखने में मशगूल थे. रात के तकरीबन दस बज चुके थे. तभी भइया दनदनाते हुए कमरे में दाखिल हुए और फिल्मी खलनायक की तरह बोले, ‘जल्दी से बताओ पहले किसको मरना है!’ यह कहकर उन्होंने हम दोनों पिस्तौल पर तान दी.

मुझसे छह साल बड़े भाई शादी से लौटने के बाद उसी खुमारी में थे. बारात के समय शायद उन्होंने भी फायरिंग की थी. घर लौटने पर भी फायरिंग का उनका भूत नहीं उतरा था. हम दोनों बहनें उनकी इस बात से चौंक गए क्योंकि उन्होंने इससे पहले इस तरह का मजाक नहीं किया था. हालांकि अगले ही पल जहां छोटी बहन खिलखिला कर हंस दी वहीं मैंने ये दिखाने की कोशिश कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा. मेरे मुंह से निकल पड़ा, ‘टीवी के सामने से हटो, हवा आने दो.’ लेकिन इस बात का उन पर कोई असर नहीं हुआ. उन पर जैसे कोई भूत सवार था. उन्होंने कहा, ‘सच कह रहा हूं, मैं गोली चला दूंगा.’ इसके बाद छोटी बहन ने ‘चलाकर दिखाओ’ बोलकर उन्हें चुनौती दे डाली. कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा था कि अगले ही पल गोली चलने की आवाज ने रात के सन्नाटे को चीर कर रख दिया. गांव में सनसनी फैल गई. गोली मेरे हाथ पर लग चुकी थी. दर्द इतना भयानक था कि मेरी चीख भी दबकर रह गई थी. गोली लगने की वजह से हाथ की नसें कट गईं थीं, जिसकी वजह से असहनीय दर्द हो रहा था. दर्द से आंखें बंद हो गई थीं और भीतर से जितनी तेज मैं चीखना चाहती थी उतना ही खुद को अशक्त महसूस कर रही थी. घर के बाहर गांव के लोग जुट गए थे. हाथ खून से लथपथ था.

एक पड़ोसी की मदद से मुझे गांव के पास ही एक नर्सिंग होम में ले जाया गया. उस छोटे से नर्सिंग होम में कोई सर्जन नहीं था जो मेरे बुरी तरह जख्मी हाथ का ऑपरेशन कर पाता. दर्द निवारक का कोई खास असर नहीं हो रहा था. करीब तीन घंटे तक मैं असहनीय दर्द से जूझती रही. रात को 2:30 बजे एक सर्जन को विशेष तौर पर मेरे इलाज के लिए शहर से बुलाया गया.

सुबह होश आने पर भी जेहन में कई सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे. दिल और दिमाग भइया के गोली चलाने के पीछे के कारणों को ढूंढने में लगा था. हालांकि इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं था. बाद में पता चला कि उस रात नर्सिंग होम के मालिक ने पुलिस न बुलाने के एवज में भइया से अच्छी खासी रकम उगाही थी. इस हादसे के बाद कई दिन तक वह बिल्कुल खामोश रहे. हथियार से कभी किसी का भला नहीं हुआ है, शायद वो ये बात समझ चुके थे. क्षणिक सुख के लिए चलाए गए हथियार कभी भी किसी खुशनुमा माहौल में मातम घोल सकते हैं. उस रोज गोली कहीं और लगी होती तो शायद मैं ये कहानी बताने के लिए जिंदा न बचती.

‘शब्दों में लिंग निर्धारण और उसे याद करने में भारत की जितनी ऊर्जा लग रही है, उतने में रॉकेट बनाया जा सकता है’

Rajendra Prasad Singh-27

आप निरंतर भाषा पर काम करते रहते हैं. कई भाषाओें पर काम करने के अलावा आपने तमाम भाषाओं के शब्दकोश भी तैयार किए हैं. इन दिनों क्या नया कर रहे हैं?

भाषा पर निरंतर काम करते रहने से ही जड़ता दूर होगी. भाषा विज्ञान के सामने चुनौतियों का जो पहाड़ है, वह तभी खत्म होगा. खैर आपने पूछा कि अभी क्या कर रहा हूं तो जल्द ही भारत की बोलियों पर एक किताब आने वाली है, जिसमें यह बताने की कोशिश है कि जो लोग बोलियों के मरने से चिंतित हैं, उन्हें यह जानना जरूरी है कि बोलियां बन भी रही हैं और उनके बनने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है. जब समाज बदल रहा है, संस्कृति बदल रही है, जीवनशैली में बदलाव आ रहा है तो भाषाएं भी अपना स्वरूप बदल रही हैं. संक्रमण, मेल-मिलाप, तोड़फोड़ से नई भाषाओं का जन्म हो रहा है, पुरानी भाषाएं मर रही हैं. इधर मैंने बोलियों पर कुछ अध्ययन किया है. हिंदी के बारे में कहा जाता है कि इसका संसार 18 बोलियों पर खड़ा है जबकि अभी हकीकत यह है कि बोलियां 48 हो गई हैं.

आपने एक बात कही कि भारत में भाषा विज्ञान के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है. क्या कुछ चुनौतियों के बारे में बताएंगे?

अनगिनत चुनौतियां हैं. एक-दो बातें करते हैं. पहले तो यही कि 70 के दशक के शुरू में भाषायी गणना हुई थी. भारत में 1652 भाषाएं थीं. पांच दशक बाद अब 232 ऐसी भाषाएं हैं, जिन्हें सिर्फ एक आदमी जानता है. अब उनको भी भाषा में गिना जाता है. भाषा की परिभाषा यह है कि उससे विचारों का आदान-प्रदान हो, भावों का विस्तार हो. अब जिसे  जानने वाले एक लोग ही बचे हैं, उसे भी भाषा में शामिल करके रखना कौन सी बात है. अब दूसरी बात सुनिए. भारत में बच्चों को उलटा ही पढ़ाया जा रहा है. इसमें धीरे-धीरे सुधार लाने की जरूरत है. एबीसीडी…कखगघ… बच्चों को पढ़ाने की इस विधा में बदलाव लाने की जरूरत है. भाषाविज्ञान ध्वनियों से नहीं चलता, वाक्यों से चलता है. वाक्य उसकी मूल इकाई होती है, ध्वनि नहीं. आप खुद सोचिए कि सबसे पहले जब भाषा का आविष्कार हुआ होगा तो वाक्य ही आया होगा, ध्वनि नहीं. दुनिया में अभी कई भाषाएं हैं, जहां ध्वनि को इकाई नहीं माना जाता, वाक्यों को इकाई माना जाता है. एक और बात बताना चाहूंगा. भारत में दुनिया के चार सबसे प्रमुख भाषा परिवारों की भाषाएं बोली जाती हैं. सामान्यतया उत्तर भारत में बोली जाने वाली भारोपीय परिवार की भाषाओें को आर्य भाषा समूह, दक्षिण की भाषाओं को द्रविड़ भाषा समूह, आस्ट्रो-एशियाटिक परिवार की भाषाओं को मुंडारी भाषा समूह और पूर्वोत्तर में रहने वाली तिब्बती-बर्मी नृजातीय समूह की भाषाओं को नाग भाषा समूह के रूप में जाना जाता है.

भारत में भाषायी अध्ययन सिर्फ आर्य समूह को ही ध्यान में रखकर ज्यादा होता रहा है जबकि बाकी तीनों समूह कोई कम महत्वपूर्ण नहीं. आर्य समूह को आधार बनाने और संस्कृत को अवलंबन बनाने से भाषा विज्ञान का विकास रुका हुआ है. वह जड़ता का शिकार बना हुआ है. इन बातों का क्या असर पड़ता है?

बहुत असर पड़ता है. सबसे पहले तो अगर आप आर्य समूह को आधार बनाते हैं तो आप हमेशा द्वंद्व और दुविधा की दुनिया में रहते हैं. संस्कृत में सभी बातों का निदान नहीं है. आप एक शब्द जानते होंगे ‘मायके’ या ‘मैके’. ‘नैहर’ को कहा जाता है. ‘मायके’ का मतलब होता है मां का घर. बहुत ही लोकप्रिय शब्द है. अब इसकी तलाश संस्कृत से कीजिए, ओर-छोर का ही पता नहीं चलेगा. जब आप पूर्वोत्तर में जाएंगे तो मायके के ‘के’ का मतलब समझ में आएगा. वहां ‘के’ का मतलब घर होता है. वहीं से यह शब्द आया. एक और शब्द गांव-घर में बहुत मशहूर रहा है, सुने होंगे-कनखी. यानी आंख मारना या नजर बचाकर देखना. अब बताइए आंख दबाने को कनखी कहा जाता है. कान से उसका क्या लेना-देना! अब इस लोकप्रिय शब्द का मतलब संस्कृत को या आर्य भाषा को आधार बनाकर तलाशते रहिए, नहीं मिल पाएगा. दक्षिण भारत में जाएंगे तो मालूम होगा कि आंख को ‘कन’ कहा जाता है तो वहां से यह शब्द आया है. लेकिन हमारे यहां के भाषाविज्ञानी संस्कृत को ही बड़ा अवलंबन बनाकर भारत में भाषा विज्ञान को आगे बढ़ाना चाहते हैं और इससे भाषा और भाषा के अध्ययन दोनों का विकास रुका हुआ है. तत्सम-तद्भव वगैरह में ही सब उलझ कर रह जाते हैं. अब आप एक और शब्द ‘आम’ को देखिए. तत्सम ‘आम्र’ कहा जाता है, तद्भव ‘आम’. जबकि आप इसके मूल में जाइएगा तो यह मुंडारी शब्द है, ‘अम्ब’. यह वहीं से आया है. ‘अम्बू’, ‘निम्बू’, ‘अम्ब’ यह सब मुंडारी से आए हुए शब्द हैं. आप बिहार के औरंगाबाद वाले इलाके में जाएंगे तो कई इलाके इस नाम पर मिलेंगे- ‘अम्बा’, ‘कुटुम्बा’ आदि. मेरे कहने का मतलब यह है कि भारत के भाषा विज्ञानियों को थोड़ा अपने अवलंबन को बदलकर भाषा विज्ञान का विस्तार करना चाहिए या होने देना चाहिए नहीं तो मनुष्य को मनु की संतान बताया जाता रहेगा जबकि मनुष्य ‘मानुष’ से आया हुआ शब्द है और यह वेद ही बताता है.

आर्य भाषा समूह का जो वर्चस्व थोपा गया, वह इरादतन था या फिर उस समय की स्थितियां ही ऐसी थीं?

कुछ तो इरादतन भी और कुछ उस समय में समझ नहीं होने के कारण या दायरा सीमित होने के कारण. कुछ भारत जैसे देश में भाषा को गंभीरता से नहीं लेने और शोध नहीं होने के कारण भी. अब आप देखिए कि रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा. अब उन्होंने अपना पूरा आधार ही इसे लिखने के लिए एक पत्रिका ‘सरस्वती’ को बना दिया और उसी के आधार पर हिंदी साहित्य का इतिहास लिख दिया. हुआ यह कि मिर्जापुर, बनारस, इलाहाबाद के साहित्यकार और उस इलाके में होने वाली साहित्यिक गतिविधियां ही उसमें आ सकीं जबकि उस समय सिर्फ ‘सरस्वती’ पत्रिका ही तो नहीं निकलती थी. रामचंद्र शुक्ल के पास वही पत्रिका आती होगी, वही उन्होंने पढ़ा होगा और फिर इसी आधार पर लिखा होगा. कहने का मतलब है कि अब उसको ही जीवन भर आधार मत बनाए रखिए. बात को आगे बढ़ाइए. ऐसा नहीं करेंगे तो संकट और गहराएगा. हिंदी पर जिस तरह से यूपी-बिहार का वर्चस्व दिखता है, वही दिखता रहेगा जबकि हिंदी भाषी राज्य तो दस हैं देश में.

हिंदी को अपनी रूढ़ियों से निकलना होगा. व्याकरण को बोझ बनाने की बजाय उसे सहायक बनाना होगा

बतौर भाषा अगर बात करें तो हिंदी के सामने क्या संकट दिखता है?

सबसे पहले तो यह समझना होगा कि हिंदी का जो समाज रहा है वह पारंपरिक रहा है. रूढ़ियों से ग्रस्त और शुद्धतावादी आग्रह रखने वाला भी. यही रवैया हिंदी भाषा के सामने संकट के तौर पर है. इसे मैं थोड़ा और विस्तार से बताता हूं. हिंदी भाषा की जब पहला शब्दकोश तैयार हुआ था तो 20 हजार शब्दों को लिया गया था उसमें और अंग्रेजी के पहले शब्दकोश में 10 हजार शब्द. आज अंग्रेजी के शब्दकोश में 7.5 लाख के करीब शब्द हैं और हिंदी दो लाख के आसपास ही फंसा हुआ है. हिंदी ने उदारता नहीं दिखाई, यह रूढ़ियों में फंसी रह गई. हिंदी टिकट, बैंक, ट्रेन का हिंदी मतलब तलाशती रह गई और अंग्रेजी ने ‘रिक्शा’ जैसे जापानी शब्द को, ‘टोबैको’ जैसे पुर्तगाली शब्द को, ‘चॉकलेट’ जैसे अमेरिकन मूल के शब्द को आसानी से अपने में समेटते हुए अपना ही शब्द बना लिया. भाषा को समृद्ध करने और उसे बढ़ाने के लिए उदारता चाहिए, रूढ़िवादी रवैया नहीं. हम अब भी कामता प्रसाद गुप्त के व्याकरण से ही हिंदी को तय करते हैं. फ्रांस जैसे देश में वहां की सरकार हर दस साल पर व्याकरण बदल देती है. हिंदी में तो कविता के लिए जिस तरह से छंद बंधन रहा है, उसी तरह से व्याकरण भी बंधन हो गया. महिलाओं के चूल्हे-चौके से, खेत-खलिहान से शब्द आते हैं लेकिन हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह हिंदी को बनाए रखने में रह गए. यहां मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं लीला पुरुषोत्तम कृष्ण चाहिए, जो हमेशा निर्धारित दरवाजे से ही नहीं घुसेंगे, खिड़की से भी आ जाएंगे, निकल जाएंगे. हिंदी को अपनी रूढ़ियों से निकलना होगा. व्याकरण को बोझ बनाने की बजाय उसे सहायक बनाना होगा. उससे मुक्त भी होना होगा और सिर्फ आर्य दुनिया में नहीं रहना होगा. हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़ यह सब हिंदी भाषी राज्य ही हैं, उनके शब्दों को लेना होगा, विस्तार करना होगा. और जो परिवर्तन हो रहा है, उसे भी समझना होगा. पहले घुटने से नीचे वाले हिस्से को ‘जंघा’ कहते थे, अब घुटने से ऊपर वाला हिस्सा ‘जांघ’ कहा जाता है. भाषा ऐसे ही अपना रूप-स्वरूप बदलती है. इसे मानना और जानना होगा क्योंकि यह वैज्ञानिक प्रणाली है कि हर एक हजार साल पर किसी भाषा के 19 प्रतिशत शब्द मर जाते हैं. उसकी जगह नए शब्द आ जाते हैं. पूरी दुनिया में ऐसा होता है. उसे लेकर आह नहीं भरते रहना होगा. कबीर ने अपने समय में व्याकरण से मुक्ति पाई तो देखिए उनका असर, तुलसीदास उसी आर्य प्रणाली में फंसे रह गए और उसके बाद छायावादी युग के लोग भी संस्कृत और आर्य प्रभाव में रहे. निराला से लेकर सुमित्रानंदन पंत तक. बाद के कालखंड में रेणु ने बंधन को तोड़ा तो देखिए उनकी कालजयिता. हमें बंधनों को तोड़ना होगा.

आपने तुलसीदास की बात कही. तुलसीदास ने तो अपने समय में ब्राह्मणों की भाषा, देव की भाषा, वर्चस्व की भाषा संस्कृत के काशी जैसे गढ़ में एक लोकभाषा अवधी को खड़ा किया.

मैं यह कह रहा हूं कि तुलसीदास ने अवधी में अधिकाधिक संस्कृतनिष्ठ शब्दों का भी प्रयोग किया.

आपने एक बात कही कि व्याकरण से मुक्ति चाहिए. क्या इससे भाषा का स्वरूप ही अलग नहीं हो जाएगा?

मैंने ऐसा नहीं कहा. मैंने कहा कि बेजा व्याकरण के दबाव में रहने या हिंदी को रखने की जरूरत नहीं. अब एक उदाहरण सुनिए. लिंग निर्णय की बात. देखिए हिंदी कितना बोझ झेल रही है. टेबल का लिंग क्या होगा, कुर्सी का लिंग क्या होगा, ईंट का लिंग क्या होगा, पत्थर का लिंग क्या होगा… अब दो लाख शब्द हैं, पूरी जिंदगी एक आदमी सभी शब्दों का लिंग जानने में ही लगा देगा. सिर्फ लिंगबोध के ही कारण वाक्य की क्रिया, विशेषण सब बदलने पड़ते हैं. राम जाता है, सीता जाती है. यह क्या है? अंग्रेजी व्याकरण में ऐसा क्यों नहीं. वहां तो सीधे होता है ‘राम इज गोइंग, सीता इज गोइंग’. ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ अंग्रेजी में देख सकते हैं आप. देखिए आदिवासी भाषाओं में, लिंग निर्णय का इतना बोझ नहीं है. यह आर्य पद्धति है, इसमें ऊर्जा लग रही है. जितनी ऊर्जा इसमें लगती है, उतने में तो नौजवान रॉकेट बना लेगा.

फिर एक तरीके से कहें कि राजभाषा हिंदी का जो कॉन्सेेप्ट देश के लिए है, वह भी ठीक नहीं. संपूर्ण देश के लिए सरकारी स्तर पर एक भाषा को निर्धारित कर देना भी ठीक नहीं.

ऐसा नहीं. राष्ट्र की एक अवधारणा होती है. भारत जब आजाद हुआ तो हिंदी का निर्धारण हुआ. इसका कोई एक कारण नहीं रहा. और यह पहली बार भी नहीं हुआ. हर शासन में शासक द्वारा अपनी भाषा चलाई गई है. मौर्य काल में प्राकृत को राजभाषा बनाया गया. तब सब लोग प्राकृत नहीं जानते थे. गुप्तकाल में संस्कृत राजभाषा बनी. मुगलकाल में फारसी को राजभाषा बना दिया गया. तब आम जनता तो ये भाषाएं नहीं बोलती थी. शेरशाह ने भी फारसी को ही चलाया, जबकि शेरशाह की खुद की भाषा पश्तो थी. बाबर की भाषा तुर्की थी. उसने तो अपनी जीवनी भी तुर्की भाषा में ही लिखी लेकिन राजभाषा फारसी को रखा. शासन और शासक वर्ग के इर्द-गिर्द जो लोग होते हैं, वह अपने अनुसार राजभाषाओं का निर्धारण करवाते रहे हैं. वह कोई समस्या नहीं. जनता अपने हिसाब से अपनी भाषा में व्यवहार करती है, नई भाषा का निर्माण करती है.

यूजीसी आंदोलन पर कब्जा