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‘जुबानी तलाक एक गलत प्रथा है, महिलाओं के सम्मान के लिए इसे खत्म करना जरूरी है’

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 देश में कई दशक से धर्म के नाम पर वोट बैंक की राजनीति हो रही है. चुनाव कोई भी हो ‘हम मुस्लिमों के लिए ये कर देंगे, वो कर देंगे’ कहकर उनका सच्चा हितैषी बनने का खेल शुरू हो जाता है. इस शोर में मुस्लिमों की असली परेशानियां सुनने वाला कोई नहीं मिलता. काबिले गौर पहलू ये है कि मुस्लिमों के हित-अहित की बात करते सियासी रहनुमा पुरुषों को ही संबोधित करते नजर आते हैं, मुस्लिम महिलाओं द्वारा झेली जा रही परेशानियों-मुश्किलों पर कभी कोई बात नहीं होती. देश में औरतें चाहे किसी भी धर्म, जाति या समुदाय से आती हों, उनके सामने कमोबेश एक-सी दिक्कतें पेश आती हैं. पर बात जब मुस्लिम महिलाओं की सामाजिक स्थिति की होती है तब चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं.

 देश में मुस्लिमों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर जानने के लिए 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा गठित ‘सच्चर कमेटी’ की रिपोर्ट आंखें खोल देने वाली साबित हुई. मुस्लिमों में साक्षरता का स्तर 59.15 प्रतिशत था जो देश के साक्षरता स्तर (65.1 प्रतिशत, 2001 जनगणना आंकड़ों के अनुसार) से कम था. देश के बड़े कॉलेजों में मुस्लिम विद्यार्थियों का स्नातक और परास्नातक में औसत क्रमशः 04 और 02 प्रतिशत था. ग्रामीण क्षेत्रों में 25 फीसदी और शहरी क्षेत्रों में मात्र 18 फीसदी मुस्लिम महिलाएं काम करती हैं, जिसके फलस्वरूप उन्हें थोड़ी-बहुत आर्थिक स्वतंत्रता मिली हुई है. रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिमों में महिलाओं की स्थिति ज्यादा खराब है.

 हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अनिल दवे और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की बेंच ने भी नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी से सवाल किया था कि क्या मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव को भारतीय संविधान में दिए गए मूलभूत अधिकारों के अंतर्गत आने वाले अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (धर्म, जाति, लिंग के आधार पर किसी नागरिक से कोई भेदभाव न किया जाए) और अनुच्छेद 21 (जीवन और निजता के संरक्षण का अधिकार) का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए? देश में मुस्लिम महिलाओं की आवाज उठाने वाली संस्था ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ (बीएमएमए) का मानना है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाला भेदभाव इन मूलभूत अधिकारों का सीधा हनन है. 2007 में इस संस्था का गठन ज़किया सोमान और नूरजहां सफिया नियाज़ ने किया था. बीते नवंबर में बीएमएमए ने दस राज्यों में 4,710 मुस्लिम महिलाओं के बीच किए सर्वे के आधार पर एक रिपोर्ट ‘नो मोर तलाक तलाक तलाक’ प्रकाशित की.

 ये रिपोर्ट दावा करती है कि  92.1 प्रतिशत महिलाओं ने जुबानी या इकतरफा तलाक को गैरकानूनी घोषित करने की मांग की है. वहीं 91.7 फीसदी महिलाएं बहुविवाह के खिलाफ हैं. 83.3 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए मुस्लिम फैमिली लॉ को कोडीफाई (विधिसम्मत) करने की जरूरत है. इसके बाद संस्था द्वारा प्रधानमंत्री को एक पत्र भी भेजा गया जिसमें बीएमएमए द्वारा किए गए सर्वे के आधार पर मुस्लिम महिलाओं की कई मांगें रखी गईं.

बीएमएमए की स्थापना के पीछे क्या उद्देश्य था?

बीएमएमए की स्थापना के पहले से ही मैं और ज़किया मुस्लिम महिलाओं के लिए काम कर रहे हैं. हमें काम करते हुए लगभग एक दशक हो चुका है. आजादी के इतने समय बाद भी हमारा समुदाय काफी पिछड़ा हुआ है. विकास की बातें सब करते हैं पर कोई भी लीडर जमीनी मुद्दे नहीं उठाता. सरकारों ने भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. जरूरी मुद्दों पर बात करने के लिए कोई नहीं है. उस पर महिलाओं के मुद्दे तो वैसे ही सामने नहीं आ पाते. लीडरशिप में एक खालीपन है, जिसे हमने भरने का फैसला किया, आगे बढ़कर अपने लिए खुद आवाज उठाने का फैसला किया, ताकि महिलाएं आगे आएं, उन्हें अपनी समस्याएं बताने के लिए एक मंच मिले. हम अभी पांच राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा में काम कर रहे हैं और हमारी प्राथमिकता में शिक्षा, रोजगार, कानूनी सुधार और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे हैं.

अब तक के काम का अनुभव कैसा रहा?

अब तक हमारा अधिकतर काम कानूनी मुद्दों से जुड़ा हुआ ही रहा है. हमारे पास जो मामले आए उनमें अधिकतर घरेलू हिंसा और जुबानी तलाक के थे. लगातार महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है. हमने न जाने कितने मामले देखे जहां लंबे समय तक घरेलू हिंसा हुई, झगड़े होते रहे, फिर एक दिन पति ने तलाक तलाक तलाक कह दिया और सब खत्म! न मेहर वापस दी गई न भरण-पोषण के लिए गुजारा भत्ता. कई ऐसे भी मामले थे जहां पति ने दो शादियां की थीं और दोनों ही बीवियों को एक शादी के बारे में नहीं पता था. सोचिए 45-50 साल की एक महिला को पति यूं ही छोड़ देता है, वो शिक्षित नहीं है, कोई रास्ता नहीं है जिससे अपना पेट पाल सके, उसका क्या होगा? कई मामले ऐसे भी थे जहां पति ने किसी रिश्तेदार या काजी के जरिये तलाक कहलवा दिया. कहीं ईमेल पर तो कहीं वाट्सएप पर तलाक दे दिया गया. हमने जो रिपोर्ट जारी की है उसमें देखिए, कहीं तलाक के बाद भत्ते की बात ही नहीं है, कुछ तलाक बीवी की गैर-मौजूदगी में हुए. कहीं बीवी को ‘हलाला’ के लिए कहा गया. (हलाला- अगर शौहर तलाक दे दे और फिर उसी औरत से निकाह करना चाहे तो वह औरत उसी सूरत में निकाह कर सकती है जब दूसरा निकाह करके दूसरे पुरुष से संबंध स्थापित कर चुकी हो) जुबानी तलाक एक गलत प्रथा है और महिलाओं के सम्मान के लिए इसे खत्म करना जरूरी है. आप औरतों को कोई वस्तु नहीं समझ सकते. सोचिए ये सब 21वीं सदी में हो रहा है. यहां एक विधि सम्मत कानून की जरूरत है. जो कानून हैं उनमें सुधारों की जरूरत है. हम चाहते हैं महिलाएं संगठित हों, वे साथ में जुड़ें, सरकार से जुड़ें और अपने हक के लिए खड़ी हों.

आपकी सरकार से क्या मांगें हैं?

सबसे पहले तो हम चाहते हैं कि एक कोडीफाइड मुस्लिम फैमिली लॉ बनाया जाए. सभी समुदाय चाहे हिंदू हों या ईसाई, सबका एक कोडीफाइड कानून है जो शादी और उससे जुड़े मुद्दों के लिए नियम बताता है. मुस्लिम समुदाय में ऐसा कुछ नहीं है. कुरान के नाम पर बहुविवाह, जुबानी तलाक जैसी कुप्रथाओं को प्रश्रय दिया जा रहा है. इन समस्याओं का हल ढूंढना ही होगा.

कुरान के नाम पर बहुविवाह, जुबानी तलाक जैसी कुप्रथाओं को प्रश्रय दिया जा रहा है. कुरान के गलत अर्थ निकाले गए हैं. मुस्लिम समुदाय में धर्म के नाम पर डरा-धमकाकर पितृसत्ता को और बढ़ावा दिया गया

कुछ साल पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में  ‘इमराना रेप मामला’ सामने आया था जहां ससुर ने उससे बलात्कार किया और पंचायत में पीडि़ता को ससुर के साथ बीवी के बतौर रहने को कहा गया. दार-उल-उलूम ने भी कुरान का हवाला देते हुए इस फैसले को सही बताया था. इस पर क्या कहेंगी?

यही तो असली समस्या है. कुरान के नाम पर, धर्म के नाम पर डरा-धमका कर पितृसत्ता को और बढ़ावा दिया गया. कानूनी मसलों पर कुरान में ऐसा कुछ नहीं लिखा है. कुरान के गलत अर्थ निकाले गए हैं, उसमें चालाकी से हेर-फेर किया गया. दरअसल जिस भाषा में कुरान लिखी गई उसे लोग नहीं जानते थे तो इसका तर्जुमा किया गया और अपने हिसाब से अर्थ निकाले गए. हमने कुरान पढ़ी है और ये काफी प्रगतिशील है. उसमें कहीं बहुविवाह, जुबानी तलाक या हलाला की बात नहीं कही गई है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और इस तरह के संगठनों के बारे में क्या कहना है?

हम इन्हें नहीं मानते. इन्होंने पितृसत्ता को संस्थागत बना दिया है बस! और यह कोई सरकारी संस्था नहीं है. जिस तरह एनजीओ रजिस्टर होते हैं वैसे ही ये भी एक रजिस्टर्ड बोर्ड ही है. उन्हें कोई कानूनी अधिकार नहीं मिले हुए हैं. और फिर जो खुद को हमारे रहनुमा बता रहे हैं उन्होंने हमारे लिए कुछ किया क्यों नहीं. जो औरतों के साथ हो रही नाइंसाफी पर कुछ नहीं कर रहे उन्हें क्यों मानें? ये समुदाय की आधी आबादी की परेशानियों को नजरअंदाज कर रहे हैं. सरकार ने भी इन्हें गैर-जरूरी अहमियत दे रखी है.

एक तबके का मानना है कि वर्तमान सरकार मुस्लिम और महिला विरोधी है. आपका क्या कहना है?

सरकार किसी भी पार्टी की हो हमें इससे खास फर्क नहीं पड़ता. अगर वे जनता द्वारा चुनकर आई सरकार है तो उनका सभी नागरिकों के प्रति फर्ज बनता है. कोई भी जनतांत्रिक सरकार हो, उसे सभी नागरिकों की परेशानियों को सुनना होगा, उनका समाधान करना होगा, उनसे जुड़े मुद्दों को जानना होगा. हम बस ये चाहते हैं कि मुस्लिम महिलाओं को भी उतना हक मिले जितना बाकी नागरिकों को मिला है. वरना बताइए ये औरतें कहां जाएंगी? वैसे अब तक तो सभी सरकारें मुस्लिम महिलाओं के मुद्दों को लेकर समान रूप से ही उदासीन रही हैं. मनमोहन सरकार के समय सच्चर कमेटी का गठन हुआ पर उस कमेटी के पैनल में एक भी महिला नहीं थी. खुद समझ लीजिए कि मुस्लिम महिलाओं से जुड़े मुद्दों को किस हद तक नजरअंदाज किया जाता है.

मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई 1985 में शाहबानो के मामले से शुरू हुई थी. इंदौर की 62 साल की शाहबानो ने तलाक के बाद गुजारा-भत्ता न देने पर अपने पति के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 125 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर किया. कोर्ट ने उनके हक में फैसला दिया पर मुस्लिमों के एक तबके में इसका कड़ा विरोध हुआ, जिसके चलते तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए मुस्लिम विमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डाइवोर्स एक्ट, 1986 पारित किया, जिसमें मुस्लिम महिलाओं के अपने तलाकशुदा पति से गुजारा-भत्ता पाने के अधिकार को नकार दिया गया. मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को इस मामले ने कैसे प्रभावित किया?

जो होना था वो हो गया है पर जो हुआ वो सही नहीं था. कोर्ट के फैसले को बदलकर सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकारों की लड़ाई में और पीछे धकेल दिया. उन्हें सीआरपीसी से ही निकाल दिया गया. अगर उस फैसले के लिए दी गई दलीलें पढ़ें तो सिर्फ हंसी आएगी.

देश की राजनीति में बार-बार मुस्लिम अपीजमेंट (मुस्लिम तुष्टिकरण) की बात होती है.

तुष्टिकरण सिर्फ धार्मिक नेताओं का हुआ है. अगर जमीन पर कुछ काम हुआ है तो वे बताएं. सच्चर कमेटी में आप मुस्लिमों का आर्थिक और शिक्षा का स्तर देख चुके हैं फिर भी क्या हालात सुधरे हैं. गरीबी का वही हाल है. न शिक्षा है न रोजगार.

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वक्फ बोर्ड पर क्या कहेंगी?

उनके भी हाल बुरे हैं. वहां कौन काम कर रहा है! हर रमजान में जकात में इतनी बड़ी रकम आती है, उससे क्या होता है? समुदाय के धार्मिक नेताओं को लगता है कि विकास हो रहा है पर उन्होंने सामाजिक विकास के लिए कुछ नहीं किया है. इसे आप टोटल फेलियर ऑफ लीडरशिप कह सकते हैं.

उत्तर प्रदेश के एक बड़े मुस्लिम नेता ने मुस्लिम विद्यार्थियों के लिए यूनिवर्सिटी खुलवाई है, जिसे अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी का दर्जा भी दिया गया है. अल्पसंख्यकों के लिए विशेष यूनिवर्सिटी की भूमिका को किस तरह देखती हैं?

शिक्षा बहुत जरूरी है पर ये देखना होगा कि जरूरतमंदों को यूनिवर्सिटी तक पहुंचने के मौके मिलें, पढ़कर निकलने वाले युवाओं को आगे बढ़ने के अवसर मिलें. कई बार मुस्लिमों को अरबी-फारसी जैसी भाषाएं सिखाने पर भी बहस होती है पर कोई दबाव नहीं होना चाहिए कि आप मुस्लिम हैं तो कोई भाषा विशेष जानना जरूरी है. जिस भाषा से रोजगार मिले वो सीखना जरूरी है. मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र में काम करते हैं तो मराठी भी आनी चाहिए. राज्यों की भाषाएं आनी चाहिए. अंग्रेजी जानना भी जरूरी है. तो सीधा हिसाब है जो भाषा आपके रोजगार में मददगार हो, उसे सीखना ज्यादा जरूरी है. नेताओं को लोगों को हुनरमंद बनाने की ओर काम करना चाहिए, जिससे नौजवान अपने पैरों पर खड़े हो सकें, दो जून की रोटी कमा सकें, पैसा आए, उनकी गरीबी मिटे. इससे ही उनका जीवन स्तर सुधरेगा. बुनियादी मसलों को समझना ज्यादा जरूरी है.

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भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) ने प्रधानमंत्री को भेजे गए खत में कहा है कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए या तो शरियत एप्लीकेशन लॉ, 1937 और मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939 में संशोधन किए जाएं या फिर मुस्लिम पर्सनल कानूनों का एक नया स्वरूप ही लाया जाए. बीएमएमए ने मुस्लिम महिलाओं, वकीलों और धर्म के जानकारों से बातचीत और कुरान के सिद्धांतों के आधार पर मुस्लिम फैमिली लॉ का एक ड्राफ्ट तैयार किया है, जो उनके अनुसार भारतीय संविधान के अनुकूल है. इस ड्राफ्ट में दर्ज कुछ मुख्य बिंदु:

  • निकाह के लिए लड़के की न्यूनतम आयु 21 साल और लड़की की आयु 18 साल हो
  • निकाह के लिए बिना किसी धोखे या दबाव के, दोनों पक्षों की सहमति हो
  • मेहर की न्यूनतम रकम लड़के की पूरी वार्षिक आय के बराबर हो, जो निकाह के वक्त ही लड़की को देनी होगी
  • तलाक केवल तलाक-ए-अहसान को माना जाएगा जिसमें 90 दिनों की अनिवार्य मध्यस्थता जरूरी होगी
  • जुबानी और एकतरफा तलाक को गैरकानूनी घोषित किया जाए
  • शादी के बाद बीवी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी शौहर की होगी, भले ही बीवी के पास आय का अलग स्रोत हो
  • तलाक के बाद गुजारा-भत्ता ‘मुस्लिम विमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डाइवोर्स एक्ट, 1986’ के अनुसार दिया जाएगा
  • बहुविवाह गैरकानूनी हो
  • हलाला और मुताह निकाह को अपराध घोषित किया जाए
  • माता-पिता दोनों ही बच्चे के अभिभावक होंगे. तलाक की स्थिति में बच्चों की कस्टडी उनकी इच्छा और उनकी भलाई के लिए उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ विकल्प के आधार पर दी जाएगी
  • निकाह को रजिस्टर करवाना अनिवार्य हो
  • संपत्ति के मामलों में बेटियों को भी बेटों के बराबर हक दिया जाए
  • अगर तलाक, बहुविवाह या ऐसे ही किसी मसले में बनाए गए नियमों का उल्लंघन होता है, तो काजी की जवाबदेही होगी

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मदरसों में शोषण के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, इस पर क्या कहेंगी?

शोषण कहां नहीं है? हर वो जगह जहां बच्चे अभिभावकों से दूर हैं, जहां कोई देखने वाला नहीं है, वहां शोषण हो रहा है, भले ही वो मदरसा हो, आश्रम, बोर्डिंग या अनाथालय. फिर ये समझिए कि मदरसों में जाता कौन है? किसी संपन्न परिवार के बच्चे तो मदरसों में जाते नहीं हैं. वहां वे जाते हैं जो बिलकुल हाशिये पर पड़े हैं. वे इस उम्मीद में वहां जाते हैं कि दो वक्त की रोटी मिल जाएगी, सिर पर छत होगी. कुछ सीख लेंगे तो जिंदगी में कुछ कर पाएंगे. मदरसे चलाने वाले भी जानते हैं कि वो कुछ भी कर सकते हैं क्योंकि विरोध करने वाला कोई नहीं है. यहां जिम्मेदारी सरकार की बनती है. उनके पास एक पूरा सिस्टम है. ये उस पर सवाल है कि उनके रहते ये सब हो कैसे रहा है. इस सिस्टम को एक्टिव होकर काम करने की जरूरत है.

हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में, दिल्ली के जामिया मिलिया में लड़कियों पर पाबंदियां लगाई गईं, जिसके विरोध में वे खुलकर सामने आईं. इस बदलाव पर क्या कहना है?

ये बदलाव देखना सुखद है. अच्छा है लड़कियां आगे आ रही हैं. जहां भी गैर-जरूरी बंदिशें हैं, चाहे वे धार्मिक गुरुओं की लगाई गई हों, यूनिवर्सिटी प्रशासन की या सरकार की, उनके खिलाफ संगठित होकर आवाज उठाना बहुत जरूरी है.

सरकार को भेजे गए पत्र पर कोई जवाब मिला?

नहीं, अब तक सरकार की ओर से हमें कोई जवाब नहीं मिला है.

इस आंदोलन का भविष्य कैसा देखती हैं?

हर एक को आगे आकर लीडरशिप संभालनी होगी. बीएमएमए का नारा भी है, ‘जिसकी लड़ाई, उसकी अगुवाई.’ तो मुस्लिम महिलाओं को अपने हकों के लिए ये लड़ाई लड़ने आगे तो आना ही पड़ेगा.

विद्यार्थी और राजनीति

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इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान (विद्यार्थी) राजनीतिक या पॉलिटिकल कामों में हिस्सा न लें. पंजाब सरकार की राय बिल्कुल ही न्यारी है. विद्यार्थी से कॉलेज में दाखिल होने से पहले इस आशय की शर्त पर हस्ताक्षर करवाए जाते हैं कि वे पॉलिटिकल कामों में हिस्सा नहीं लेंगे. आगे हमारा दुर्भाग्य कि लोगों की ओर से चुना हुआ मनोहर, जो अब शिक्षा-मंत्री है, स्कूलों-कॉलेजों के नाम एक सर्कुलर या परिपत्र भेजता है कि कोई पढ़ने या पढ़ानेवाला पॉलिटिक्स में हिस्सा न ले. कुछ दिन हुए जब लाहौर में स्टूडेंट्स यूनियन या विद्यार्थी सभा की ओर से विद्यार्थी-सप्ताह मनाया जा रहा था. वहां भी सर अब्दुल कादर और प्रोफेसर ईश्वरचंद्र नंदा ने इस बात पर जोर दिया कि विद्यार्थियों को पॉलिटिक्स में हिस्सा नहीं लेना चाहिए.

पंजाब को राजनीतिक जीवन में सबसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है. इसका क्या कारण हैं? क्या पंजाब ने बलिदान कम किए हैं? क्या पंजाब ने मुसीबतें कम झेली हैं? फिर क्या कारण है कि हम इस मैदान में सबसे पीछे है? इसका कारण स्पष्ट है कि हमारे शिक्षा विभाग के अधिकारी लोग बिल्कुल ही बुद्धू हैं. आज पंजाब कौंसिल की कार्रवाई पढ़कर इस बात का अच्छी तरह पता चलता है कि इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा निकम्मी होती है और फिजूल होती है, और विद्यार्थी-युवा जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता. उन्हें इस संबंध में कोई भी ज्ञान नहीं होता. जब वे पढ़कर निकलते हैं तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफसोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता. जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अंधे बनाने की कोशिश की जा रही है. इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए. यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाए. ऐसी शिक्षा की जरूरत ही क्या है? कुछ ज्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं, ‘काका तुम पॉलिटिक्स के अनुसार पढ़ो और सोचो जरूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो. तुम अधिक योग्य होकर देश के लिए फायदेमंद साबित होगे.’

हमारी शिक्षा निकम्मी होती है और फिजूल होती है, और विद्यार्थी-युवा जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता. उन्हें इस संबंध में कोई भी ज्ञान नहीं होता. जब वे पढ़कर निकलते हैं तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफसोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता. जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अंधे बनाने की कोशिश की जा रही है. इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए.

बात बड़ी सुंदर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं, क्योंकि यह भी सिर्फ ऊपरी बात है. इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक दिन विद्यार्थी एक पुस्तक ‘अपील टू द यंग, प्रिंस क्रोपोटकिन’ पढ़ रहा था. एक प्रोफेसर साहब कहने लगे, ‘यह कौन-सी पुस्तक है? और यह तो किसी बंगाली का नाम जान पड़ता है!’ लड़का बोल पड़ा, ‘प्रिंस क्रोपोटकिन का नाम बड़ा प्रसिद्ध है. वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे.’ इस नाम से परिचित होना प्रत्येक प्रोफेसर के लिए बड़ा जरूरी था. प्रोफेसर की ‘योग्यता’ पर लड़का हंस भी पड़ा. और उसने फिर कहा, ‘ये रूसी सज्जन थे.’ बस! ‘रूसी!’ कहर टूट पड़ा! प्रोफेसर ने कहा, ‘तुम बोल्शेविक हो, क्योंकि तुम पॉलिटिकल पुस्तकें पढ़ते हो.’ देखिए आप प्रोफेसर की योग्यता! अब उन बेचारे विद्यार्थियों को उनसे क्या सीखना है? ऐसी स्थिति में वे नौजवान क्या सीख सकते हैं?

दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है? महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति, पर कमीशन या वायसराय का स्वागत करना क्या हुआ? क्या वो पॉलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं? सरकारों और देशों के प्रबंध से संबंधित कोई भी बात पॉलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जाएगी, तो फिर यह भी पॉलिटिक्स हुई कि नहीं? कहा जाएगा कि इससे सरकार खुश होती है और दूसरी से नाराज? फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराजगी का हुआ. क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही खुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? हम तो समझते हैं कि जब तक हिंदुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफादारी करने वाले वफादार नहीं, बल्कि गद्दार हैं, इंसान नहीं, पशु हैं, पेट के गुलाम हैं. तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफादारी का पाठ पढ़ें?

सभी मानते हैं कि हिंदुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की जरूरत है, जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी के लिए न्योछावर कर दें. लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे? क्या परिवार और दुनियादारी के झंझटों में फंसे सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल सकेंगे? यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फंसे हों और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो. सिर्फ गणित और ज्योग्राफी काे ही परीक्षा के पर्चों के लिए घोंटा न लगाया हो.

क्या इंग्लैंड के सभी विद्यार्थियों का कॉलेज छोड़कर जर्मनी के खिलाफ लड़ने के लिए निकल पड़ना पॉलिटिक्स नहीं थी? तब हमारे उपदेशक कहां थे जो उनसे कहते, जाओ, जाकर शिक्षा हासिल करो. आज नेशनल कॉलेज, अहमदाबाद के जो लड़के सत्याग्रह के बारदोली वालों की सहायता कर रहे हैं, क्या वे ऐसे ही मूर्ख रह जाएंगे? देखते हैं उनकी तुलना में पंजाब का विश्वविद्यालय कितने योग्य आदमी पैदा करता है? सभी देशों को आजाद करवाने वाले वहां के विद्यार्थी और नौजवान ही हुआ करते हैं. क्या हिंदुस्तान के नौजवान अलग-अलग रहकर अपना और अपने देश का अस्तित्व बचा पाएंगे? नौजवान 1919 में विद्यार्थियों पर किए गए अत्याचार भूल नहीं सकते. वे यह भी समझते हैं कि उन्हें क्रांति की जरूरत है. वे पढ़ें. जरूर पढ़ें, साथ ही पॉलिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करें और जब जरूरत हो तो मैदान में कूद पड़ें और अपने जीवन को इसी काम में लगा दें. अपने प्राणों को इसी में उत्सर्ग कर दें. वरना बचने का कोई उपाय नजर नहीं आता.

क्या बाल सुधार गृह को ‘बाल बिगाड़ गृह’ कहना ज्यादा सही है?

observation homeswebरमेश, विनय और सुशील (बदले हुए नाम) देश की राजधानी दिल्ली के दक्षिणपुरी इलाके की एक झुग्गी बस्ती में रहते हैं. दो अगस्त, 2012 की रात ये तीनों दोस्त अपने घर लौट रहे थे कि रास्ते में एक टेंट मालिक से उनका झगड़ा हो गया. एक मोटरसाइकिल के जमीन पर गिरने की वजह से शुरू हुए इस छोटे-से झगड़े के बाद तीनों को हत्या के प्रयास के आरोप में हिरासत में ले लिया गया. तब विनय और रमेश की उम्र मात्र 15 वर्ष थी जबकि सुशील 16 साल का था. नाबालिग होने की वजह से उन्हें सुनवाई के दौरान दिल्ली के बाल सुधार गृहों में भेज दिया गया. लेकिन जाने-अनजाने आपराधिक दुश्चक्र में फंस जाने वाले बच्चों के सुधार और पुनर्वास के उद्देश्य से स्थापित किए गए इन सुधार गृहों में इन तीनों को शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा. बच्चों का आरोप है कि सेवा कुटीर स्थित किंग्सवे कैंप सुधार गृह में उनके इलाज के लिए आने वाले चिकित्सा कर्मचारी उनके कपड़े उतरवाकर उनकी पिटाई किया करते थे. अदालती कार्यवाही के दौरान दर्ज करवाए गए अपने बयानों में बच्चों ने साफ कहा है कि इलाज के दौरान सहबंदियों और मेडिकल स्टाफ के अन्य सदस्यों के सामने  उनके कपड़े उतरवाए जाते थे और उन्हें घुटनों के बल झुकाकर डंडों से बुरी तरह पीटा जाता था.

लेकिन दिल्ली के बाल सुधार गृहों में बच्चों के उत्पीड़न का यह पहला मामला नहीं है. पीड़ित बच्चों से बातचीत करने और हालिया अदालती निर्णयों की पड़ताल करने पर यह साफ हो जाता है कि बच्चों की सुरक्षा और बेहतरी के लिए बनाए गए इन ‘बाल सुधार गृहों’ में बच्चों को घोर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है. छोटी उम्र में मिली इस प्रताड़ना के दंश से ज्यादातर बच्चे जीवन भर नहीं निकल पाते. जानकार बताते हैं कि कई मामलों में यही बच्चे बड़े होकर खूंखार अपराधियों में तब्दील हो जाते हैं.

रमेश, विनय और सुशील के अलावा दो अन्य बच्चों ने भी अलग-अलग मामलों में किंग्सवे कैंप के मेडिकल स्टाफ द्वारा प्रताड़ित किए जाने की शिकायत दर्ज करवाई थी. इन पांचों बच्चों के बयानों को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) के सामने लाकर संबंधित मेडिकल ऑफिसर डॉ बीएन शर्मा और पुरुष नर्स प्रदीप के खिलाफ केस दायर करने वाले किशोर मामलों के अधिवक्ता भूपेश समद कहते हैं, ‘बाल सुधार गृहों में माहौल बहुत खराब है. यहां रहने वाले बच्चों को अक्सर शारीरिक और मानसिक हिंसा का सामना करना पड़ता है. हम भी कुछ ही मामलों में मदद के लिए पहुंच पाते हैं क्योंकि ज्यादातर मामलों में हमें पता ही बहुत देर से चलता है. जब बच्चे हमें बताते हैं तभी हम कुछ कर सकते हैं. लेकिन कुछ ही बच्चे यह हिम्मत जुटा पाते हैं. कई बच्चे प्रशासन के डर की वजह से चुप रह जाते हैं.’ समद बताते हैं कि इस मामले में बोर्ड ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए बच्चों के बयानों का संज्ञान लिया और संबंधित मेडिकल स्टाफ को निलंबित करके उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया.

छोटी उम्र में मिली इस प्रताड़ना के दंश से ज्यादातर बच्चे जीवन भर नहीं निकल पाते. कई मामलों में यही बच्चे बड़े होकर खूंखार अपराधी बन जाते हैं

रमेश, विनय और सुशील दक्षिणपुरी की एक ही झुग्गी बस्ती में रहते हैं और फिलहाल जमानत पर हैं. दक्षिणपुरी के इस भीड़-भाड़ वाले इलाके में थोड़ी मेहनत के बाद हमें इन बच्चों के घर मिल जाते हैं. किंग्सवे कैंप के बाल सुधार गृह में बिताए गए अपने समय के बारे में पूछते ही बच्चे घबरा जाते हैं. वे चारों तरफ खड़े अपने घरवालों की ओर देखने लगते हैं. कुछ देर की सामान्य बातचीत के बाद वे थोड़े सहज होते हैं और फिर बताते हैं कि सुधार गृह में उन्हें पीटा जाता था. विनय कहता है, ‘मैं इलाज के लिए सेवा कुटीर में मौजूद डाक्टर के पास गया तो वहां प्रदीप नाम का एक आदमी था. उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं नशा करता हूं. मैंने मना कर दिया तो उसने मेरे खूब थप्पड़ मारे और फिर से वही पूछा. मैंने फिर वही कहा तो उसने मेरे पैरों में डंडों से मारा. फिर उसने मुझे वापस भेज दिया. फिर छह अगस्त को डाक्टर ने मुझे बुलाया और परदे के पीछे जाने के लिए कहा. वहां प्रदीप पहले से खड़ा था. डाक्टर ने मुझे कपड़े उतारने के लिए कहा और पूछा कि मैं क्या नशा करता हूं. मैंने कुछ नहीं कहा तो उसने मुझे कहा कि घुटनों के बल झुक जा. फिर उसने मेरी पीठ पर पूरी ताकत से मारना शुरू किया और मैं रोने लगा.’ रमेश और सुशील ने भी इसी तरह सुधार गृह में हुई अपनी पिटाई की बात स्वीकार की. अदालती कार्यवाही के दौरान जेजेबी के सामने रिकॉर्ड करवाए गए अपने बयान में रमेश ने कहा है, ‘छह सितंबर, 2012 की दोपहर डॉक्टर प्रदीप ने मुझे इलाज के लिए बुलाया. तब वहां एक और डाक्टर मौजूद था और साथ में मेरे साथ के दूसरे बच्चे भी खड़े थे. डाक्टर प्रदीप ने मुझसे कपड़े उतार कर अपने हाथों से अपने पैरों के अंगूठे छूने के लिए कहा और मैंने वैसा ही किया. फिर उन्होंने मुझे पूछा कि मैं कौन-सा नशा करता हूं. मैंने मना कर दिया. फिर दूसरे डाक्टर ने मुझे थप्पड़ मारे और बाहर निकल जाने को कहा.’

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सूत्र बताते हैं कि डॉक्टरों द्वारा बच्चों से उनकी नशे की आदतों के बारे में लगातार पूछताछ करने के पीछे एक उदेश्य उनकी जिम्मेदारी के झंझट से छुटकारा पाना भी होता है. प्रयास सुधार गृह के एक कर्मचारी बताते हैं, ‘दरअसल सुधार गृह में बच्चों की बढ़ती हुई संख्या की वजह से लोग उन्हें यहां से नशा मुक्ति केंद्र भेजना चाहते हैं. इसलिए भी बच्चों पर नशा करने की आदत को स्वीकार करने के लिए लगातार दबाव बनाया जाता है.’
‘तहलका’ के पास मामले से संबंधित सभी कानूनी दस्तावेजों की प्रतियां मौजूद हैं. इस मामले को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली बाल अधिकार कार्यकर्ता मीना कबीर बताती हैं कि जिन मामलों में विभागीय कर्मचारी शामिल होते हैं उन्हें सामने लाने में थोड़ी मुश्किल तो होती है लेकिन ऐसा करना बहुत जरूरी है. ‘तहलका’ से बातचीत में वे कहती हैं, ‘यह हमारा कर्तव्य है कि अगर कोई बच्चा कोई शिकायत कर रहा है तो हम उसे बोर्ड के सामने रखें. जब तक बच्चा बाल सुधार गृह में है तब तक उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी बोर्ड की है. यह शिकायतें सही हैं या गलत इसका फैसला तफ्तीश के बाद होगा, लेकिन पहले इनका दर्ज होना जरूरी है.’

सुशील की कहानी भी कमोबेश रमेश और विनय जैसी ही है. पांच अगस्त, 2012 को सुशील के हाथ-पैरों में दर्द हो रहा था. वह इलाज के लिए गया तो चिकित्सीय सहयोगी प्रदीप ने उससे पूछा कि वह कौन-सा नशा करता है. उसके इनकार करने पर प्रदीप ने उसे घुटनों पर झुकाकर उसकी पिटाई की. बोर्ड के सामने दिए गए अपने बयान में सुशील आगे जोड़ता है, ‘फिर लंच के बाद प्रदीप ने मुझे फिर बुलाया. वहां पर एक और बूढ़ा डाक्टर था जिसके बाल सफेद थे. उसने मुझसे कपड़े उतारने के लिए कहा और फिर पूछा कि मैं कौन-सा नशा करता हूं. मेरे मना करने पर उसने मुझे झुकाकर मारना शुरू कर दिया. प्रदीप ने भी मुझे डंडों से पीटा. मैं और कुछ नहीं कहना चाहता.’

 ‘यह पूरी तरह से बाल बिगाड़ गृह है. बच्चे छोटे होते हैं तो उन्हें मालूम नहीं होता कि वे कोई अपराध कर रहे हैं. ऐसे ही अगर कोई छोटा बच्चा पॉकेट मारने या किसी छोटे-मोटे लड़ाई-झगड़े में फंसकर यहां आ जाता है तो यह पक्की बात है कि वह यहां से एक बड़ा अपराधी बनने की पूरी ट्रेनिंग लेकर ही निकलेगा. यहां का सिस्टम ही ऐसा है.’

‘सामान्य तौर पर बच्चों के सुधार और पुनर्वास के लिए बने सुधार गृह कुप्रबंधन और सरकारी उपेक्षा के चलते बच्चों के लिए बहुत ही क्रूर अनुभव साबित होते हैं’ उधर, चिकित्सीय सहयोगी प्रदीप ने बोर्ड के सामने यह तो स्वीकार किया कि वह बच्चों के परीक्षण के समय चिकित्सीय कक्ष में मौजूद रहता था लेकिन उसका कहना है कि बच्चों से कभी अन्य लोगों के सामने कपड़े उतारने के लिए नहीं कहा गया. गौरतलब है कि बोर्ड के कड़े निर्देशों के बाद मुखर्जी नगर थाने में आरोपित डॉक्टर और चिकित्सीय सहायक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 323 और किशोर बाल अधिनियम की धारा 23 के तहत मामला दर्ज कर कर लिया गया है.  तहलका से बातचीत में आरोपित डॉक्टर बीएन शर्मा सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं, ‘बच्चों को यह शिकायत करने के लिए उकसाया जाता है. यह मेरा काम है कि मैं उनकी पूरी तरह से जांच करूं और मैं वही करता था. मैं पिछले 10 साल से यहां इलाज करता हूं और मैंने किसी बच्चे को नहीं मारा. मेरे रिटायरमेंट में अब सिर्फ एक साल बचा है, मैं यह सब क्यों करूंगा?’
लेकिन 30 अक्टूबर, 2012 को किंग्सवे कैंपस स्थित जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड-1 की प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट सुनयना शर्मा ने तीन अलग-अलग मामलों में दर्ज किए गए पांच बच्चों के बयानों के आधार पर अपने निर्देश जारी करते हुए कहा, ‘…अन्य लोगों के सामने बच्चों से कपड़े उतारने के लिए कहना और उन्हें झुकाकर मारना किशोर बाल अधिनियम ने तहत बच्चे की निजता और गरिमा का हनन है. कानून के मुताबिक बच्चों को एक सकारात्मक जांच का पूरा अधिकार है. बोर्ड के पास तीन अलग मामलों में पांच अलग-अलग बच्चों की एक जैसी शिकायतों पर विश्वास नहीं करने का कोई कारण नहीं है’ लेकिन दिल्ली के बाल सुधार गृहों में लंबे समय तक जेल अधीक्षक रहे एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर तहलका को बताते हैं कि बाल सुधार गृहों में बच्चों के साथ होने वाली बदसलूकी के कई दूसरे कारण भी हैं. वे कहते हैं, ‘यहां आने वाले लगभग 95 प्रतिशत बच्चे तो थोड़ी कोशिशों के बाद मुख्यधारा की तरफ मुड़ जाते हैं लेकिन जो पांच प्रतिशत बचते हैं वे बहुत परेशान कर देते हैं. ड्रग्स और धारदार हथियारों का प्रवेश अंदर रोकने के लिए हमें कई बार सख्ती करनी पड़ती है. बच्चे नशा मुक्ति केंद्र जाने के डर से कई बार डाक्टर को अपने नशे की आदतों के बारे में ठीक से नहीं बताते. हो सकता है इसलिए डाक्टर ने थोड़ी सख्ती की हो, यह सब तो यहां चलता रहता है. और जहां तक सुधार गृह में बच्चों के साथ होने वाली बदसलूकी का सवाल है, तो वह तो होता ही है. हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों के आरोपी भी पॉकेट मारने वाले किसी छोटे-से बच्चे के साथ एक ही हॉल में रहते हंै. ऐसे माहौल में छोटे बच्चों के हिंसा का शिकार होने और आगे जाकर बड़े अपराधी में तब्दील होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.’

दिल्ली के बाल सुधार गृहों में बच्चों पर अपनी उम्र से बड़े बच्चों के साथ-साथ प्रशासन के हाथों होने वाली हिंसा के ये मामले नए नहीं हैं. पिछले पांच साल के दौरान बड़े बच्चों द्वारा छोटे बच्चों और सुधार गृह के कर्मचारियों द्वारा बच्चों के शोषण से जुड़े कई बडे़ मामले सामने आए. बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था बचपन बचाओ आंदोलन द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी बताती है कि 2006 से 2010 के बीच कुल 1,800 बच्चे दिल्ली के अलग-अलग सुधार गृहों और आश्रय गृहों से भाग गए. किशोरों के न्यायिक मामलों से लंबे समय से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता अनंत अस्थाना इस संदर्भ में 28 अगस्त, 2010 को किंग्सवे कैंप स्थित जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड-1 में प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट अनुराधा शुक्ला भारद्वाज द्वारा दिए गए एक ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए कहते हैं, ‘बाल सुधार गृहों में दी जाने वाली सुविधाओं की वास्तविकता हमारे कानून में सजे सुंदर और मनोरम चित्र से बहुत अलग है. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो सामान्य तौर पर बच्चों के सुधार और पुनर्वास के लिए बने सुधार गृह कुप्रबंधन और सरकारी उपेक्षा के चलते बच्चों के लिए बहुत ही क्रूर अनुभव साबित होते हैं.’

अगस्त, 2010 में दीपेश (बदला हुआ नाम) नामक एक किशोर के साथ तत्कालीन जेल अधीक्षक द्वारा किए गए शारीरिक उत्पीड़न के मामले में जांच और कानूनी कार्यवाही के आदेश देते हुए जेजेबी ने कहा था, ‘…बच्चे को सुधार गृह प्रशासन द्वारा हिंसा का शिकार होना पड़ा और उसे बोर्ड के सामने चुप रहने के लिए डराया भी गया. उस छोटे बच्चे के लिए अपने साथ हुई इस हिंसा से उबर पाना बहुत मुश्किल होगा. बोर्ड को इस बात पर शर्मिंदगी महसूस होती है कि वह बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सका. हम इस बात के लिए खुद को दोषी भी मानते हैं कि हमने बच्चे के उस विश्वास को ठेस पहुंचाई जो उसने सुधार गृह में आते वक्त हम पर दिखाया था. यह याद रखना बहुत जरूरी है कि बच्चों को सुधार गृहों में सजा देने के लिए नहीं, बल्कि उनके हित में, उनके सुधार के लिए लाया जाता है.’

लेकिन हिंसा का यह सिलसिला सिर्फ सुधार गृहों के प्रशासन तक सीमित नहीं है. बाल सुधार गृहों में रहने वाले बड़ी उम्र के बच्चे भी छोटे बच्चों के साथ हिंसा पर उतारू हो जाते हैं. दिल्ली गेट स्थित प्रयास नामक बाल सुधार गृह में लंबे समय से कार्यरत एक कर्मचारी नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर ‘तहलका’ को बताते हैं, ‘यह पूरी तरह से बाल बिगाड़ गृह है. बच्चे छोटे होते हैं तो उन्हें मालूम नहीं होता कि वे कोई अपराध कर रहे हैं. ऐसे ही अगर कोई छोटा बच्चा पॉकेट मारने या किसी छोटे-मोटे लड़ाई-झगड़े में फंसकर यहां आ जाता है तो यह पक्की बात है कि वह यहां से एक बड़ा अपराधी बनने की पूरी ट्रेनिंग लेकर ही निकलेगा. यहां का सिस्टम ही ऐसा है. रेप और हत्या के आरोपी छोटे बच्चों के साथ रहते हैं. सब मारपीट करते हैं और अगर ब्लेड मिल जाए तो एक-दूसरे को चोट करने लगते हैं. यहां का पूरा माहौल ऐसा है कि अच्छे बच्चे भी हिंसक हो जाते हैं.’ बाल सुधार गृहों के वीभत्स माहौल के बारे में बताते हुए अस्थाना कहते हैं, ‘विधि विरुद्ध  किशोरों  के लिए बने संरक्षण  गृह तो सबसे ज्यादा  उपेक्षा  के शिकार हैं. दिल्ली में बच्चों  के लिए  बना  ‘स्पेशल  होम’ वाकई  स्पेशल है. जिस इमारत में यह होम चलता है, वह इंसानों के रहने के लिए बना ही नहीं था. असल में यह इमारत एक वक्त में गोला-बारूद और सैन्य हथियार रखने के लिए इस्तेमाल की जाती थी. बचाव पक्ष के वकील के तौर पर मैंने हमेशा कोशिश की है कि बच्चे इस अनुभव से दूर ही रहें.’

दिल्ली सरकार के महिला और बाल विकास विभाग के सहायक निदेशक पी खाखा मानते हैं कि सुधार गृहों में बच्चों को हिंसा से बचाने के लिए उनकी उम्र और अपराध के हिसाब से उनके लिए इंतजाम करने होंगे. वे कहते हैं, ‘बाल सुधार गृहों में जारी हिंसा को रोकने के लिए गंभीर अपराधियों के लिए तुरंत अलग सेल बनाए जाने चाहिए. हॉस्टलों की तरह छोटे-छोटे कमरे होने चाहिए जिनमें चार या ज्यादा से ज्यादा छह बच्चे रह सकें. बच्चों के इन कमरों के बीच काउंसल या मेडिकल जैसे छोटे-छोटे सेक्शन बनाए जाने चाहिए. इससे कर्मचारियों को बच्चों से सीधे और लगातार बातचीत करने का मौका मिलगा. बच्चे अगर छोटे-छोटे समूहों में रहेंगे तो उन्हें समझाने में भी सहूलियत होगी.’

गलतियों की खान सलमान का ‘हिंदी’ लर्निंग प्रोग्राम!

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Photo- Gilles Mingasson pour le Nouvel Observateur

मुफ्त ऑनलाइन लर्निंग प्रोग्राम शुरू करने के लिए चर्चित शिक्षाविद् सलमान खान की कैलिफोर्निया स्थित खान एके​ड​मी की दुनियाभर में काफी तारीफ हो रही है. बिल गेट्स और रतन टाटा जैसे लोग उनकी इस एके​ड​मी की मदद करने को आगे आए हैं. इस ऑनलाइन लर्निंग प्रोग्राम के लिए किसी छात्र को किसी भी तरह की सदस्यता लेने की जरूरत नहीं है. कोई भी इंटरनेट की मदद से उनकी वेबसाइट अथवा यूट्यूब से ‘विश्वस्तरीय’ शिक्षा हासिल कर सकता है.

हाल ही में खान एकेडमी के सलमान खान ने भारतीय उद्योगपति रतन टाटा के साथ पांच साल का अनुबंध किया है, जिसके तहत यह प्रोग्राम हिंदी में भी लॉन्च किया गया. इसमें कक्षा 5 से 8 तक के बच्चों के लिए एनसीईआरटी पाठ्यक्रम की सामग्री मौजूद है. अगले पांच साल में मराठी, तमिल और बांग्ला जैसी अन्य भारतीय भाषाओं में भी खान एकेडमी कंटेंट मुहैया कराएगी. ये सब तो ठीक है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू कुछ ज्यादा ही स्याह नजर आ रहा है. प्रोजेक्ट को देखने के लिए ‘तहलका’ ने एके​डमी की वेबसाइट को खंगाला. हिंदी में पहला पेज खोलने पर निर्देश लिखा मिलता है, ‘अपनी ‘शुरू करने के लिए’ अभिभावक चेकलिस्ट खत्म करें.’ एकेडमी के होम पेज पर साइन इन करने के लिए विकल्प है. उसमें अपना विवरण भरने के बाद आपको एकेडमी की तरफ से मेल आया, ‘हम आपके स्वागत करते हैं.’

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जैसे-जैसे वेबसाइट के विकल्पों को चुनते हुए आगे बढ़ेंगे, आपका सामना ऐसे-ऐसे वाक्यों से होगा जो समझ से परे होंगे. मसलन, ‘यहां निमिर्ती से बचने के लिए पोस्ट है. अगर आप उनका सामना करते हैं, तो अभिभावकों का ध्यान आकर्षित करने हेतु उन्हें चिह्नित करें.’ इसी तरह ‘एक प्रतिलिपि का जवाब’ जैसे विकल्पों को देखकर दिमाग चकरा जाएगा. गौर करने वाली बात यह है कि वेबसाइट पांचवीं से आठवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए बनाई गई है, पर कंटेंट ऐसा है, जो हिंदी भाषा के जानकार को भी सिर खुजाने पर मजबूर कर दे.

वेबसाइट अपने उद्देश्य के बारे में लिखती है, ‘खान अकादमी अभ्यास प्रश्नावलियां, अनुदेशात्मक वीडियो और एक व्यक्तिगत शिक्षण डैशबोर्ड प्रदान करता है जो शिक्षार्थियों को अपनी गति के अनुसार एवं कक्षा के बाहर अध्ययन करने के लिए सशक्त बनाता है. हम गणित, विज्ञान, कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग, इतिहास, कला इतिहास, अर्थशास्त्र और अधिक विषयों में शिक्षा प्रदान करते हैं. हमारे गणित मिशन शिक्षार्थियों को, राज्य कला, अनुकूली प्रौद्योगिकी का प्रयोग कर के बालवाड़ी से कलन तक सीखने में सहायता करते हैं, इससे सामर्थ्य और शिक्षण चूक की पहचान होती है. विशेषीकृत सामग्री प्रदान करने के लिए हमने नासा, आधुनिक कला संग्रहालय, कैलिफोर्निया की विज्ञान अकादमी और एमआईटी जैसे संस्थानों के साथ भागीदारी की है.’

ऑनलाइन मुफ्त शिक्षा का​ विचार तो नया और उपयोगी लगता है लेकिन वेबसाइट ‘अपनी खुद की गति को देखने के लिए में गहराई से वीडियो’ जैसे वाक्यों से आपका स्वागत करके इसका भविष्य निर्धारित कर देती है.

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दरअसल, हिंदी में अनुवाद की समस्या हमेशा से रही है. हिंदी में अब तक कार्यालय की भाषा, तकनीक, विज्ञान या गणित की शब्दावली पर काम ही नहीं हुआ है, न ही नई तकनीक और नए आविष्कारों के लिए भाषा में कोई प्रयोग किया गया है. यहां अब तक मोबाइल को या तो मोबाइल कहने की मजबूरी है या फिर चलित दूरभाष यंत्र जैसे मजाकिया अनुवाद किए जाते हैं. अब देखना यह है कि खान एकेडमी अपने इस व्यापक उद्देश्य के लिए भाषा पर भी काम करेगी या इन्हीं अबूझ अनुवादों के साथ बच्चों को पढ़ाने की नाकाम कोशिश जारी रहेगी?

बस्तर में दोधारी तलवार पर चलते हैं पत्रकार

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सोमारू नाग और संतोष यादव की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग करते हुए पत्रकार आंदोलन कर रहे हैं. इसके जरिये राज्यभर के पत्रकारों को कथित पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ एकजुट होने की अपील की जा रही है.

पिछले दिनों राजस्थान पत्रिका समूह के दरभा प्रतिनिधि संतोष यादव को माओवादियों के साथ कथित संपर्क के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. उनकी गिरफ्तारी टाडा और पोटा से भी खतरनाक माने जाने वाले ‘छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून’ के तहत गिरफ्तार किया है. हालांकि संतोष के परिजन, पत्रकार और मानवाधिकार संगठन इसे गलत बता रहे हैं. इसी तरह दो महीने पहले पुलिस ने सोमारू नाग को माओवादियों के साथ संबंध होने के आरोप में गिरफ्तार किया था. वे तब से जेल में हैं और अब संतोष यादव की गिरफ्तारी के चलते पत्रकारों का गुस्सा भड़क उठा है.

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55 वर्षीय सुधीर जैन पिछले 35 सालों से बस्तर में ही रहकर पत्रकारिता कर रहे हैं. जगदलपुर में रहने वाले सुधीर दैनिक भास्कर, नवभारत जैसे हिंदी दैनिकों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. फिलहाल वे तीन समाचार एजेंसियों के लिए काम कर रहे हैं. सुधीर बताते हैं, ‘बस्तर में रिपोर्टिंग करते वक्त कोई भी दिन आपकी जिंदगी का आखिरी दिन साबित हो सकता है. आप इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि यह दोधारी तलवार पर चलने जैसा है, एक तरफ नक्सलियों का खतरा रहता है तो दूसरी तरफ पुलिस का. खबर कवर करने से लेकर लिखने तक की प्रक्रिया इतनी चुनौतीपूर्ण होती है कि एक आम पत्रकार से हमारा तनाव सौ गुना ज्यादा बढ़ा हुआ होता है. कई बार ऐसा भी हुआ है कि कोई खबर निर्भीक होकर नहीं लिख पाया हूं.’

‘बस्तर जैसे इलाकों में जहां नक्सलवाद अपने चरम पर है, रिपोर्टिंग करना बेहद मुश्किल भरा और खतरनाक होता है. नक्सलियों और पुलिस दोनों तरफ से अपने-अपने किस्म के दबाव होते हैं. अगर आपको दोरनापाल से जगरगुंडा तक जाना हो तो हर चेकपोस्ट पर हाजिरी देनी होती है, बार-बार लिखवाना होता है कि आगे जाने का आपका मकसद क्या है. मुझे तो अपनी खबर रोकने के लिए कई बार पुलिस के आला अफसरों की तरफ से धमकियां भी मिली हैं. जहां तक बात नक्सलियों की है तो वे भी हमारा काम प्रभावित करने की कोशिश तो करते ही हैं. जिस इलाके में नक्सली नहीं चाहते कि पत्रकार आएं, वहां आप घुस भी नहीं सकते. सीधी-सी बात है कि इतना सारा जोखिम होते हुए भी अगर सावधानियों पर ध्यान देने लगे तो बस्तर में रिपोर्टिंग कभी संभव ही नहीं हो पाएगी. यहां तो जान हथेली पर रखकर चलना ही पड़ता है.’

हाल ये है कि छत्तीसगढ़ के पत्रकार नक्सल प्रभावित इलाकों से न सिर्फ समाचार भेजता है बल्कि कई बार तो उन्हें जवानों के क्षत-विक्षत शवों को भी गंतव्य तक पहुंचाना पड़ता है. 17 अप्रैल 2015 की एक घटना है. दक्षिण बस्तर के पामेड़ पुलिस थाने के तहत आने वाले नक्सल क्षेत्र कंवरगट्टा में पुलिस और नक्सलियों की मुठभेड़ हुई थी. इसमें आंध्र प्रदेश के ग्रे हाउंड्स फोर्स (नक्सल ऑपरेशन के लिए आंध्र प्रदेश में खासतौर पर तैयार फोर्स) के सर्किल इंस्पेक्टर शिवप्रसाद बाबू शहीद हो गए थे. लेकिन आंध्र प्रदेश व छत्तीसगढ़ पुलिस चार दिन तक शहीद अधिकारी के शव को बाहर नहीं निकाल सकी. फिर नवभारत अखबार के बीजापुर संवाददाता गणेश मिश्रा को पुलिस टीम के साथ भेजा गया. उन्होंने मध्यस्तता कर ग्रामीणों से शव सौंपने का अनुरोध किया. तब कहीं जाकर पुलिस अधिकारी का शव पामेड़ लाया गया. उस समय बस्तर आईजी हिमांशु गुप्ता ने पत्रकार का आभार माना था. इस पूरे मामले में गणेश मिश्रा ही वह पहले पत्रकार थे, जो घटनास्थल पर पहुंचे थे. उन्होंने ही वहां से लौटकर इस बात की तस्दीक की थी कि शिवप्रसाद बाबू नक्सलियों की गोलियों का शिकार हो गए हैं. इसके पहले तक तो पुलिस अपने अधिकारी को लापता ही मान रही थी. जवान का शव आंध्र प्रदेश व छत्तीसगढ़ की सीमा से लगभग 20 किलोमीटर दूर कंवरगट्टा गांव में तालाब की मेड़ पर लावारिस हालत में पड़ा हुआ था. जिला मुख्यालय बीजापुर से घटनास्थल की दूरी 85 किलोमीटर थी. घटना के बाद पुलिस तीन दिनों तक कंवरगट्टा नहीं पहुंच पाई थी. तब गणेश मिश्रा ही ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए, अपनी जान की परवाह न करते हुए उस इलाके में पहुंचे, जहां नक्सलियों ने पुलिस को पीछे खदेड़ दिया था और एंबुश के डर से पुलिस दोबारा उस इलाके में नहीं घुस पा रही थी.

यह तो एक छोटा-सा उदाहरण है, जब बस्तर के किसी पत्रकार ने अपनी जान जोखिम में डालकर पुलिस अधिकारी का शव लाने में मदद की है. छत्तीसगढ़ में ऐसे असंख्य मामले हैं, जिनमें पत्रकारों ने कभी स्वेच्छा से तो कभी पुलिस के अनुरोध पर न केवल मृतकों की संख्या की तस्दीक की, बल्कि उनके शवों को सुरक्षित बाहर निकालने का काम भी किया. छत्तीसगढ़ में अब यह भ्रांति भी टूटने लगी है कि नक्सली पत्रकारों पर हमला नहीं करते. 2013 में बस्तर के एक पत्रकार नेमीचंद जैन को पहले पुलिस ने माओवादी होने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में डाला और बाद में माओवादियों ने 2013 में पुलिस का मुखबिर बता कर उनकी हत्या कर दी. इसी तरह माओवादियों ने पत्रकार साईं रेड्डी की भी हत्या कर दी थी.

हालांकि दोनों की हत्या करने के बाद नक्सलियों की दंडकारण्य जोनल कमेटी के प्रवक्ता गुडसा उसेंडी ने बयान जारीकर माफी मांगी और भविष्य में ऐसा न करने की बात भी कही. लेकिन पत्रकारों पर मंडराता खतरा यहीं खत्म नहीं हो जाता. उन्हें लगातार प्रेशर बम, लैंड माइन बिछे हुए इलाकों में काम करना होता है. कई बार वे पुलिस व नक्सली मुठभेड़ की क्रॉस फायरिंग में भी फंस जाते हैं. पत्रकारों पर पुलिस की तरफ से पड़ने वाले दबाव भी हैं. बस्तर के अंदरूनी इलाकों में घुसने के लिए रास्तेभर पड़ने वाले पुलिस चेक पोस्ट पर रुककर आगे जाने की अनुमति लेना. कई बार पुलिस द्वारा पत्रकारों को वापस कर दिया जाना और फिर नए व खतरनाक रास्तों से पुलिस को बगैर बताए उन इलाकों में पहुंचकर सच्चाई की पड़ताल करना बस्तर के पत्रकारों के काम का हिस्सा है. हालांकि इतने खतरों के बावजूद एक अनुमान के मुताबिक बस्तर में करीब 270 पत्रकार काम कर रहे हैं. राजधानी रायपुर से नियमित बस्तर जाकर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की संख्या अलग है.

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27 वर्षीय पवन दहट बताते हैं, ‘बस्तर में काम करते वक्त कई बार ऐसी परिस्थिति आई है कि हमने कई टुकड़ों में बंटी हुई लाश को समेटने का काम भी किया है. ऐसा किसी दबाव में नहीं, बल्कि मानवता के नाते किया है. यह भी हमारी नौकरी का एक अघोषित हिस्सा हो गया है. 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान 10 अप्रैल को बस्तर में मतदान था. मैं वहां रिपोर्टिंग के लिए पहुंचा था. कनकापाल नाम के एक धुर नक्सल प्रभावित इलाके में रिपोर्टिंग करते वक्त मेरा पैर एक प्रेशर बम पर पड़ गया. गनीमत तो यह थी कि वह प्रेशर बम फटा नहीं, नहीं तो मैं आज आपसे बात नहीं कर रहा होता.’ पवन पिछले तीन सालों से छत्तीसगढ़ में ‘द हिंदू’ के राज्य संवाददाता हैं. पवन बस्तर में अपनी धुआंधार रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं. पिछले तीन सालों में उन्होंने बस्तर के अनगिनत दौरे किए हैं और कई मामलों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया है. वह कहते हैं, ‘मुझे अच्छी तरह से याद है कि कनकापाल को उस दिन एक तरफ से नक्सलियों ने तो दूसरी तरफ से पुलिस ने घेर रखा था. बस्तर जैसे इलाकों में जहां नक्सलवाद अपने चरम पर है, रिपोर्टिंग करना बेहद मुश्किल भरा और खतरनाक होता है. नक्सलियों और पुलिस दोनों तरफ से अपने-अपने किस्म के दबाव होते हैं.’ पवन के अनुसार, ‘अगर आपको दोरनापाल से जगरगुंडा तक जाना हो तो हर चेकपोस्ट पर हाजिरी देनी होती है, बार-बार लिखवाना होता है कि आगे जाने का आपका मकसद क्या है. मुझे तो अपनी खबर रोकने के लिए कई बार पुलिस के आला अफसरों की तरफ से धमकियां भी मिली हैं, कई तरह के प्रलोभन भी दिए गए हैं. सरकेगुड़ा जैसी जगहों पर पुलिस ने हम पत्रकारों को जाने से रोका हैं, जहां ग्रामीणों के घर जला दिए गए थे. जहां तक बात नक्सलियों की है तो वे भी हमारा काम प्रभावित करने की कोशिश तो करते ही हैं. जिस इलाके में नक्सली नहीं चाहते कि पत्रकार आएं, वहां आप घुस भी नहीं सकते. अगर किसी गांव में उन्होंने लोगों को प्रेस से बात करने की मनाही कर दी है, तो आप लाख कोशिश कर लो, गांववाले सहयोग ही नहीं करते, बात ही नहीं करते. कई बार हमें सलाह दी जाती है कि हम बुलेटप्रूफ जैकेट पहनकर एंटी लैंड माइन व्हीकल में ही रिपोर्टिंग करने पहुंचे लेकिन यह संभव ही नहीं है. सीधी-सी बात है कि इतना सारा जोखिम होते हुए भी अगर सावधानियों पर ध्यान देने लगे तो बस्तर में रिपोर्टिंग कभी संभव ही नहीं हो पाएगी. यहां तो जान हथेली पर रखकर चलना ही पड़ता है.’

‘बस्तर में रिपोर्टिंग करते वक्त कोई भी दिन आपकी जिंदगी का आखिरी दिन साबित हो सकता है. आप इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि यह दोधारी तलवार पर चलने जैसा है, एक तरफ नक्सलियों का खतरा रहता है तो दूसरी तरफ पुलिस का. खबर कवर करने से लेकर लिखने तक की प्रक्रिया इतनी चुनौतीपूर्ण होती है कि एक आम पत्रकार से हमारा तनाव सौ गुना ज्यादा बढ़ा हुआ होता है. कई बार ऐसा भी हुआ है कि कोई खबर निर्भीक होकर नहीं लिख पाया हूं.’

पत्रकार तामेश्वर सिन्हा कहते हैं, ‘अंतागढ़ से कोयलीबेड़ा जाते वक्त अर्धसैनिक बलों के चार कैंप पड़ते हैं. हर कैंप में हाजिरी लगानी पड़ती है. कई बार घंटों बैठा दिया जाता है. पत्रकार हूं, यह बोलना ही मूर्खतापूर्ण लगने लगता है. कौन हो, क्या हो, क्यों जा रहे हो, कई तरह के सवाल किए जाते हैं, हमें शंका की नजर से देखा जाता है. पुलिसवाले वापस जाने की नसीहत तक दे डालते हैं. ऐसे ही एक बार पुलिस के सवालों से जूझते हुए किसी घटना स्थल पर मैं पहुंचा और वहां नक्सलियों ने पुलिस का मुखबिर समझकर पकड़ लिया. बड़ी मुश्किल से उन्हें समझा पाया और जान छूटी.’

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अबूझमाड़ में लंबे समय से काम कर रहे तामेश्वर नक्सल मामलों में दिलचस्पी रखते हैं. इन दिनों वह भूमकाल समाचार नाम के अखबार में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. तामेश्वर बताते हैं, ‘बस्तर में तथ्यपूर्ण खबर लिखना पुलिस या नक्सलियों के निशाने पर आने जैसा है. यहां पत्रकारिता करना जोखिम का काम है. पुलिस पत्रकारों पर नक्सलियों के सहयोगी होने का आरोप लगा देती है, वहीं नक्सली पत्रकारों पर पुलिस के मुखबिर होने का आरोप लगाते हैं. हमें तो दोनों तरफ से शिकार होना पड़ता हैहमारे कई वरिष्ठ साथी पत्रकारों को पुलिस ने नक्सलियों के सहयोगी होने के आरोप में जेल में ठूंस दिया है. जब नक्सली किसी पुलिस वाले का अपहरण करके ले जाते हैं तो उस समय पुलिस को पत्रकारों की याद आती है, बाकी समय हमें संदेह की नजरों से देखा जाता है. ठीक ऐसे ही जब नक्सलियों को अपनी बात रखनी होती है तो वे पत्रकारों को याद करते हैं, बाकी वक्त उन पर पुलिस के लिए मुखबिरी का आरोप लगाते रहते हैं.’ वह बताते हैं, ‘वैसे भी हम अंदरूनी इलाकों में काम कर रहे लोगों को प्रशासन पुलिस पत्रकार ही नहीं मानती है. सबसे दुखद पहलू यह भी है कि हम जिस संस्थान के लिए काम कर रहे होते हैं, वह भी हमारी सुरक्षा की कोई जबावदेही नहीं लेता है.’

ऐसे ही चाहे पंखाजूर के 34 वर्षीय पत्रकार शंकर हों या 16 सालों से बस्तर में पत्रकारिता कर रहे 33 वर्षीय रजत बाजपेयी, प्रभात सिंह या बप्पी राय. सभी ने कभी न कभी किसी अपहृत पुलिसकर्मी की कुशलता का समाचार लाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली है. 25 मई 2013 को हुए झीरम घाटी नक्सल हमले में पत्रकार नरेश मिश्र ने ही सबसे पहले पहुंचकर दिंवगत कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल को अस्पताल पहुंचाने में मदद की थी. नरेश की ही मोटरसाइकिल से भागकर कांग्रेस विधायक कवासी लखमा ने अपनी जान बचाई थी. छत्तीसगढ़ के विभिन्न इलाकों में काम कर रहे इन पत्रकारों की जान की सुरक्षा का जोखिम उनका खुद का है. न तो सरकार और न ही उनका अपना संस्थान उनके प्रति किसी भी तरह की जबावदेही लेने को तैयार है. वर्षों से इन्हीं परिस्थितियों में काम कर रहे पत्रकार शायद अब मौत की इस मांद में काम करने के आदी हो गए हैं. हों भी क्यों न, पत्रकार लोकतंत्र का वह हिस्सा है, जिसने अपना काम निडरता, सहजता और जुनून की हद तक करने की कसम जो खाई है.

शिक्षा सुधार पर तकरार

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दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) के अरविंद केजरीवाल ने जब दोबारा सरकार बनाई तो उनके सामने प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को सुधारने के साथ-साथ यहां के प्राइवेट स्कूलों की मनमानियों पर नकेल कसना भी एक चुनौती थी. इन्हीं चुनौतियों से पार पाने के प्रयास में दिल्ली विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन उपमुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया ने शिक्षा सुधार से संबंधित तीन विधेयक सदन में पेश किए, दिल्ली विद्यालय (लेखों की जांच और अधिक फीस की वापसी) विधेयक, 2015, दिल्ली विद्यालय शिक्षा (संशोधन) विधेयक, 2015 व नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (दिल्ली संशोधन) विधेयक, 2015. लेकिन इन तीनों ही विधेयकों पर बवाल खड़ा हो गया है.

शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता व गैर सरकारी संगठन इन विधेयकों में किए गए प्रावधानों को शिक्षा विरोधी और प्राइवेट स्कूलों की मनमानियों को बढ़ावा देने वाला करार दे रहे हैं. उनका मानना है कि राज्य सरकार ‘दिल्ली विद्यालय विधेयक’ और ‘दिल्ली विद्यालय शिक्षा (संशोधन) विधेयक’ की आड़ में दिल्लीवासियों के साथ साजिश कर रही है. आम जनता को प्राइवेट स्कूलों पर लगाम कसने का सब्जबाग दिखा कर वह इन दोनों विधेयकों के माध्यम से प्राइवेट स्कूलों को यह कानूनी अधिकार देने जा रही है कि वह शिक्षा को व्यवसाय बनाकर जो अब तक करते आए थे, उसे जारी रख सकते हैं. साथ ही 2009 में पारित शिक्षा के अधिकार कानून में अनावश्यक हस्तक्षेप कर उसमें से धारा 8 व 16 को संशोधित कर आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल न करने वाली नो डिटेंशन पाॅलिसी को हटाए जाने को भी शिक्षा विरोधी करार दिया जा रहा है.

अखिल भारतीय अभिभावक संघ (एआईपीए) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘सरकार का उद्देश्य केवल प्राइवेट स्कूलों को खुली छूट देना है. दिल्ली विद्यालय विधेयक के प्रभाव में आने के बाद सभी प्राइवेट स्कूलों को यह अधिकार मिल जाएगा कि वह जब चाहंे, जितनी चाहें फीस बढ़ा सकते हैं. वहीं दिल्ली विद्यालय शिक्षा विधेयक, 1973 में संशोधन कर धारा 10(1) को हटाया जा रहा है जिसे 42 साल पहले काफी संघर्ष के बाद इस कानून में जोड़ा गया था. इस धारा में प्रावधान था कि प्राइवेट स्कूल के कर्मचारियों को सरकारी स्कूल के कर्मचारियों के समान ही वेतनमान दिया जाएगा और सभी वेतन आयोग इन पर भी लागू होंगे. लेकिन अब इन्हें घरेलू नौकर बनाने की तैयारी है, जिन पर कोई कानून लागू नहीं होता. अब प्राइवेट स्कूल चाहें तो इन्हें कितना भी वेतन दें. दो से तीन हजार रुपये प्रतिमाह भी.’

‘आठवीं तक फेल न करने की नीति ‘एजुकेशन फॉर ऑल’ के तहत लाई गई थी, ताकि गरीबों के बच्चे भी हर परिस्थिति में शिक्षा से जुड़े रहें’

प्राइवेट स्कूलों द्वारा बढ़ाई जाने वाली मनमानी फीस पर लगाम कसने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा लाए गए दिल्ली विद्यालय विधेयक, 2015 में प्रावधान है कि कोई भी प्राइवेट स्कूल अभिभावकों से जितनी चाहे उतनी फीस वसूल सकता है बशर्ते वह इस फीस का उपयोग उसी विद्यालय के अंदर विद्यालयीन जरूरतों की पूर्ति और सुविधाओं पर ही करे, विद्यालय के बाहर किसी और मद में नहीं. इसकी जांच के लिए सरकार एक समिति का गठन करेगी. हर स्कूल सरकार को अपने सालभर के लेखापरीक्षित खाते (ऑडिटेड अकाउंट) सौंपेगा और यह समिति उन खातों की जांच समिति में ही शामिल लेखा परीक्षक (चार्टर्ड अकाउंटेंट) की सहायता से करेगी. अगर यह समिति पाती है कि स्कूल के द्वारा वसूली गई फीस स्कूल के अलावा कहीं और खर्च की गई है तो उसे अतिरिक्त फीस लेना करार दिया जाएगा और ऐसी फीस को समिति या तो अभिभावकों को वापस करने का आदेश दे सकती है अथवा उसे निर्धारित मदों में उपयोग किए जाने का हुक्म सुना सकती है. इसके अतिरिक्त समिति को विद्यालय प्रबंधन को दंडित करने का भी अधिकार होगा. दंडस्वरूप वह पचास हजार से अधिकतम पांच लाख रुपये तक का अर्थदंड या तीन साल के कारावास की सजा अथवा दोनों ही सुना सकती है.

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लेकिन इस विधेयक में सरकार ने कई ऐसे पेंच फंसा दिए हैं जो प्राइवेट स्कूलों के पक्ष में जाते हैं. जिनके बारे में चर्चा करते हुए अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘नए विधेयक में अभिभावकों से फीस वृद्धि के खिलाफ न्यायालय में जाने का अधिकार छीना गया है. सारे अधिकार समिति को दे दिए गए हैं. अब अगर फीस वृद्धि के खिलाफ कोई न्यायालय जाना भी चाहे तो नहीं जा सकता, उसे इसी समिति के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज करानी होगी. लेकिन सरकार ने इसमें भी एक पेंच फंसा दिया है. शिकायत दर्ज कराने के लिए कम से कम बीस या संबंधित विद्यालय के कुल पांच फीसदी छात्रों के अभिभावकों की जरूरत होगी. वहीं शिकायत दर्ज कराने के लिए अभिभावकों को सत्र शुरू होने के बाद कम से कम 18 महीनों तक इंतजार करना होगा. क्योंकि बिल में ऐसा ही प्रावधान है कि एक स्कूल अभिभावकों से मनचाही फीस ले सकता है और सालभर उस फीस का उपयोग कर सकता है. सालभर बाद उसे इस फीस से संबंधित सभी खाते सरकार को सौंपने होंगे और सरकार उन खातों की जांच गठित समिति से कराएगी. जांच में तकरीबन छह माह का समय लगेगा. इस प्रकार देखा जाए तो उस स्कूल द्वारा बढ़ाई गई फीस के खिलाफ इस अवधि में कानूनन रूप से कोई भी शिकायत वैध नहीं होगी.’

‘शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं आया तो सरकार धारा 17 के तहत बच्चों को काॅरपोरल पनिशमेंट (शारीरिक दंड) देने की भी वकालत करने लगेगी’

इसके अतिरिक्त विवाद इस समिति के अध्यक्ष को लेकर भी है. सरकारी विधेयक के अनुसार इस समिति का अध्यक्ष उच्च न्यायालय अथवा जिला न्यायालय का कोई सेवानिवृत्त न्यायाधीश या फिर प्रमुख सचिव स्तर का कोई सेवानिवृत्त नौकरशाह हो सकता है. इसके विरोध में तर्क यह है कि जब किसी नौकरशाह को अध्यक्ष बनाने का विकल्प मौजूद है ही तो फिर क्यों किसी न्यायाधीश को इस समिति की बागडौर सौंपी जाएगी? एआईपीए का कहना है, ‘केजरीवाल जो अपने उदय से ही नौकरशाही पर बेईमान होने का आरोप लगाते आए, आज वो उसी बेईमान नौकरशाही पर इतना भरोसा जता रहे हैं. यहां उनकी कथनी और करनी में ही अंतर नहीं बल्कि उनकी नीयत में भी खोट नजर आता है.’ अशोक अग्रवाल बताते हैं, ‘समिति चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा जिस भी स्कूल के खातों की जांच कराएगी, चार्टर्ड अकाउंटेंट की फीस भी वही स्कूल देगा. इससे केजरीवाल सरकार ने स्कूलों को फीस बढ़ाने का एक नया कारण और उपलब्ध करा दिया है.’

प्राइवेट स्कूलों द्वारा वसूली जाने वाली मनमानी फीस के संबंध में अगर तमिलनाडु, महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों पर नजर दौड़ाई जाए तो वहां सरकार अपने अधीन एक समिति का गठन करती है  और समिति इन स्कूलों की फीस तय करती है कि हमारे राज्य में कौन सा स्कूल कितनी फीस लेगा. अगर कोई  स्कूल अपनी फीस बढ़ाना चाहता है तो वो इस समिति को प्रस्ताव देता है और वो समिति तय करती है कि फीस वृद्धि आर्थिक लाभ के उद्देश्य से तो नहीं की गई. इस कानून के पक्ष में सभी की सहमति है. लेकिन मनीष सिसोदिया कहते हैं, ‘अगर सरकार प्राइवेट स्कूलों की फीस तय करने की जिम्मेदारी ले लेगी तो ये तानाशाही होगी. इससे प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी और सुविधाओं पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा. कैसे हम सबको एक लाठी से हांक सकते हैं?’

वहीं दिल्ली विद्यालय शिक्षा विधेयक, 1973 की धारा 10(1) के संशोधन पर मचे बवाल के बीच अपने बचाव में सरकार का कहना है कि यह प्रावधान प्राइवेट स्कूलों के लिए यह अनिवार्य करता है कि वह अपने कर्मचारियों को सरकारी स्कूल कर्मियों के समान वेतन दें लेकिन यह गैर व्यवहारिक है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कहते हैं, ‘एक सरकारी स्कूल में शिक्षक की तनख्वाह औसतन चालीस हजार होती है. अगर बात करें प्राइवेट स्कूल की तो दिल्ली के 1800 प्राइवेट स्कूलों में से लगभग एक हजार स्कूल ऐसे हैं जिनकी फीस हजार रुपये प्रतिमाह से अधिक नहीं है. कई स्कूल तो ऐसे हैं जो दो सौ रुपये की मामूली मासिक फीस पर भी बच्चों को पढ़ा रहे हैं. किसी स्कूल में तीन सौ तो किसी में चार सौ बच्चे हैं . इस लिहाज से देखें तो बीस छात्रों की एक कक्षा में एक शिक्षक के अनुपात से प्रबंधन को स्कूल में 15-20 शिक्षकों की जरूरत होती है. अब अगर इन शिक्षकों को सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के समान वेतन दिया जाए तो छह लाख से आठ लाख रुपये का खर्चा आएगा लेकिन इतना तो इनके पास फीस कलेक्शन भी नहीं होता. इसका नतीजा ये होता है कि ये स्कूल फर्जी खातों का सहारा लेते हैं या फिर शिक्षक को सरकारी स्कूल के समान वेतन का चेक थमाते समय उससे  एक ब्लैंक चेक पर हस्ताक्षर करा लेते हैं और बाद में इस चेक के माध्यम से उस शिक्षक के खाते से दी हुई फीस को वापस अपने खाते में ट्रांसफर कर लेते हैं. इस प्रकार एक शिक्षक को न्यूनतम वेतन से भी कम में अपना गुजारा करना होता है. हमारा प्रयास है कि इस फर्जीवाड़े को रोका जाए. इसलिए हम दिल्ली विद्यालय शिक्षा कानून (डीएसई एक्ट),1973 में शामिल गैर व्यवहारिक धारा 10 (1) को हटाने के लिए यह संशोधन विधेयक लाए हैं.’ लेकिन जब कानून में समान वेतन के सिद्धांत वाली यह धारा नहीं रहेगी तो फिर वेतन निर्धारित करने के क्या मापदंड होंगे? यह अभी निर्धारित नहीं हुआ है. इसके लिए सरकार एक समिति के गठन पर विचार कर रही है जो दिल्लीवासियों के बीच जाकर उनसे रायशुमारी कर कोई ऐसा तरीका ईजाद करेगी जो प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के साथ वेतन के मामले में हो रहे शोषण पर लगाम लगा सके और उन्हें एक सम्मानजनक वेतन दिला सके.

अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘सरकार केवल और केवल अंधेरे में रखने का काम कर रही है. सच तो यह है कि यह धारा प्राइवेट स्कूलों के गले की हड्डी बनी हुई थी और वो किसी भी तरह से इसे हटाना चाहते थे. बेरोजगारी के इस दौर में आज आसानी से दो-दो हजार रुपये में पढ़ाने वाले शिक्षक उपलब्ध हो सकते हैं पर इस धारा के कारण स्कूल विवश थे कि वह अपने कर्मचारियों को सरकारी स्कूल के समान वेतन दें. उनकी समस्या का समाधान सरकार ने कर दिया.’ पर केजरीवाल आश्वासन देते हैं कि जितना वेतन वर्तमान में एक शिक्षक को मिल रहा है, नए कानून के बाद उससे कम नहीं मिलेगा. शिक्षा के अधिकार की लंबे समय से लड़ाई लड़ते आ रहे सूर्यकांत कुलकर्णी कहते हैं, ‘अभी सरकार ने घोषित किया है कि इसके लिए ब्लॉक, जिला, ग्रामीण स्तर पर रायशुमारी करेंगे लेकिन इसके बाद जो लाखों सुझाव आएंगे, उन्हें कौन देखेगा? कौन पढ़ेगा? ये कमेटी तो पांच-दस सदस्यों तक सीमित होगी. यह सब महज खानापूर्ति है. सरकार का एजेंडा पहले से ही साफ है और वह वही करने वाली है.’ अगर इसे सही मानकर चलें तो सरकार शिक्षकों की फीस निर्धारित करने के लिए जिस फार्मूले का प्रयोग करने जा रही है उसके तहत वह स्कूल को मिलने वाली कुल फीस का एक निश्चित प्रतिशत कर्मचारियों के वेतन के रूप में बांटे जाने के प्रावधान पर काम कर रही है. या फिर अलग-अलग किस्म के स्लैब भी बनाए जा सकते हैं कि इस किस्म के स्कूल कम से कम इतनी तनख्वाह देंगे.

अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘मान लीजिए अगर वह कुल फीस का चालीस फीसदी वेतन के रूप में दिया जाना निर्धारित करते हैं. अब सवाल ये उठता है कि स्कूलों के पास फीस पाने के तो बहुत स्रोत होते हैं. जैसे ट्यूशन फीस, वार्षिक फीस आदि. तो कौन सी फीस का चालीस प्रतिशत? इस पर कहेंगे कि ट्यूशन फीस का चालीस प्रतिशत तो स्कूल ट्यूशन फीस नहीं बढ़ाएगा और वार्षिक फीस दोगुनी कर देगा और कहेगा कि ट्यूशन फीस तो मैंने बढ़ाई ही नहीं. इसलिए मैं वेतन क्यों बढ़ाऊं? कुल मिलाकर देखा जाए तो सरकार निजीकरण को बढ़ावा देने पर तुली है. एक बैठक के दौरान केजरीवाल ने मुझसे कहा भी था कि प्राइवेट स्कूलों पर हाथ डालने का अधिकार हमें नहीं है.’  वहीं स्लैब बनाए जाने का फैसला तो और अधिक विवादित जान पड़ता है. केजरीवाल की ही भाषा में कोई स्कूल 200 रुपये फीस लेता है तो कोई 300 रुपये, कोई 500 रुपये तो कोई 1000, 5000, 7000 या 10000 रुपये प्रतिमाह. मतलब हर स्कूल का अपना एक अलग फीस स्ट्रक्चर है तो क्या सरकार हर स्कूल के लिए एक अलग स्लैब निर्धारित करेगी? और यदि वह स्लैब इस आधार पर बनाती है कि एक हजार प्रतिमाह तक फीस वसूलने वाले अपने शिक्षकों को इतना निर्धारित वेतन देंगे या 1000 से 5000 प्रतिमाह तक फीस वसूलने वाले इतना, तो सरकार के लिए यह अपने ही उस कथन से मुकरना होगा जहां वह कहते हैं, ‘सरकार अगर प्राइवेट स्कूलों की फीस तय करने की जिम्मेदारी ले लेगी तो ये तानाशाही होगी. इससे प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी’. तो सवाल उठता है, क्या शिक्षकों की फीस तय करने का अधिकार तानाशाही नहीं होगा? जहां एक हजार से लेकर पांच हजार फीस तक वसूलने वाले स्कूल के शिक्षकों को समान वेतन मिलेगा. इससे भी तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होने का डर है.

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इस विधेयक में सरकार ने प्रवेश के समय स्कूलों द्वारा वसूली जाने वाली कैपिटेशन फीस के संबंध में भी सजा के नए प्रावधान किए हैं. अब तक जहां इस एक्ट में कैपिटेशन फीस वसूलने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द करने या उनके प्रबंधन को सरकारी नियंत्रण में लेने का प्रावधान था. अब इसमें ढील देकर इसे केवल अर्थदंड में बदल दिया गया है. इसके पीछे जो तर्क है वह यह कि मान्यता रद्द करने का नकारात्मक प्रभाव शिक्षकों के रोजगार व छात्रों की आगे की पढ़ाई पर पड़ता है. लेकिन प्रवेश के समय बच्चों की छंटाई प्रक्रिया (स्क्रीनिंग) को लेकर सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है जो विवाद को जन्म दे रहा है. सरकार ने विधयेक में इस संबंध में स्कूलों पर अर्थदंड लगाने का तो प्रावधान किया है लेकिन जो हालिया सर्कुलर जारी हुआ है उसमें नर्सरी में दाखिला अंक पद्धति के आधार पर बच्चे का आकलन करने के बाद होना बताया गया है. लेकिन ये अंक पद्धति क्या होगी? अभी यह स्पष्ट नहीं है. अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘स्क्रीनिंग पर लगाम लगाने का झांसा देकर सरकार की जबरदस्त स्क्रीनिंग को बढ़ावा देने की तैयारी है. अंक पद्धति हो या बच्चे का इंटरव्यू, स्क्रीनिंग तो हुई ही न. बस अब इसे सरकारी अमलीजामा पहनाया जा रहा है.’

‘सरकार निजीकरण को बढ़ावा देने पर तुली है. एक बैठक में केजरीवाल ने मुझसे कहा था कि प्राइवेट स्कूलों पर हाथ डालने का अधिकार हमें नहीं है’

दिल्ली विद्यालय विधेयक और दिल्ली विद्यालय शिक्षा (संशोधन) विधेयक के इतर जो नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (दिल्ली संशोधन) विधेयक दिल्ली सरकार लेकर आई है उस पर भी वह घिरती नजर आ रही है. इस बदलाव के पीछे सरकार का तर्क है कि बच्चे को आठवीं तक फेल न करने की नीति ने शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित किया है. इससे छात्रों और शिक्षकों की क्षमताओं का सही से मूल्यांकन नहीं हो पा रहा है. जब फेल होना ही नहीं है तो छात्र, शिक्षक और अभिभावक भी लापरवाह हो गए हैं. इसलिए इस नीति को बदलने की जरूरत है. लेकिन सरकार के इस तर्क का व्यापक विरोध भी हो रहा है. सूर्यकांत कुलकर्णी कहते हैं, ‘यह नीति हवा में नहीं लाई गई थी. इसके पीछे सोच थी. दस साल इस पर व्यापक चर्चा हुई थी. इसका मकसद था बच्चों को विकास की प्रक्रिया से जोड़ने के लिए शिक्षित करना. उनको स्कूलों में रोकना. बस्ते का बोझ कम करना. फेल-पास के तंत्र से बाहर निकालकर उन्हें तनावमुक्त करना. अफसर या उच्च वर्ग के बच्चे तो कैसे भी पढ़ ही लेते हैं. लेकिन यह नीति ‘एजुकेशन फॉर ऑल’ के तहत लाई गई थी, ताकि गरीबों के बच्चे भी हर परिस्थिति में शिक्षा से जुड़े रहें. उदाहरण के तौर पर इस नीति के आने से पहले महाराष्ट्र में एसएससी लेवल के चालीस प्रतिशत बच्चे फेल हो जाते थे. उन चालीस प्रतिशत को आगे बढ़ने से रोक दिया जाता था इसका नतीजा यह होता था कि बच्चों का बीच में शिक्षा छोड़ने का प्रतिशत काफी बढ़ गया था. इस तरह आप उन्हें विकास की प्रक्रिया से अलग कर रहे थे. बच्चा नहीं पढ़ रहा तो क्या उसे विकास की प्रक्रिया से हटा देंगे? उन्हें प्रोत्साहन की जरूरत होती है और यह पॉलिसी उन्हें वही देती है. लेकिन दुर्भाग्य से कई राज्यों ने इसे ढंग से लागू ही नहीं किया. संकल्पना थी कि जो बच्चे ढंग से नहीं पढ़ सकते उन्हें प्रोत्साहन मिले. इसे नजरअंदाज किया गया. हमें करना ये था कि बच्चों की कमजोरी का पता लगाकर उसे दूर करने के प्रयास करते. यहां सरकारें असफल हुईं लेकिन सजा बच्चों को दी जा रही है.’ अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘फेल बच्चा नहीं होता, फेल शिक्षक होता है. व्यवस्था होती है. और यह नीति प्राइवेट स्कूलों के लिए नहीं थी, सरकारी स्कूलों के लिए थी. उन स्कूलों के लिए जहां पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं हैं, बैठने के लिए जगह नहीं है. कहीं डेढ़ सौ बच्चों की क्लास एक शिक्षक के भरोसे है तो कहीं एक शिक्षक पहली से आठवीं तक के सैकड़ों बच्चों की संयुक्त क्लास ले रहा है. और उस शिक्षक की शैक्षणिक योग्यता क्या है, वह इसी से समझा जा सकता है कि उसे देश के प्रधानमंत्री का नाम तक नहीं पता होता. अब इन हालातों में बच्चों को फेल-पास की कसौटी पर तौला जाना कहां तक जायज है?’ सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति को मनीष सिसोदिया भी स्वीकारते हैं लेकिन साथ ही अपने बचाव में एक हास्यापद तर्क भी देते हैं. वह कहते हैं, ‘नो डिटेंशन पॉलिसी एक अच्छा कदम साबित हो सकती थी लेकिन इसे लाने में जल्दबाजी की गई. इसे लाने से पहले सभी सरकारों को सरकारी स्कूलों की बदहाली को दूर करना चाहिए था. शिक्षकों को आधुनिक शिक्षा के हिसाब से ट्रेनिंग दी जानी चाहिए थी और शिक्षक-छात्र अनुपात कम करने जैसे आवश्यक कदम उठाकर यह स्थिति उत्पन्न करनी चाहिए थी कि हर छात्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पा सके. हम ऐसा ही करेंगे.’ लेकिन प्रश्न ये उठता है कि जब हर छात्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाकर पास होने की स्थिति में आ जाएगा तब इस नीति को लागू करने की जरूरत ही क्यों होगी? लेकिन अगर यह नीति खत्म की जाती है तो यह उन सभी बच्चों के साथ अन्याय होगा जो सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं. वे डेढ़ सौ बच्चों की क्लास में कुछ सीख सकेंगे नहीं और उन्हें फेल करके ऐसी परिस्थितियां उनके सामने खड़ी कर दी जाएंगी कि हताशा में या तो वे खुद स्कूल से मुंह मोड़ लें या मां-बाप के दबाव में पढ़ना छोड़ दें. इसका जवाब सरकार के सिपहसालारों के पास नहीं है. वहीं एक ओर सरकार यह भी मान रही है कि शिक्षक का महत्व बहुत अधिक है और वर्तमान शिक्षक शिक्षा प्रदान करने की योग्यता पर खरे नहीं उतरते. जिससे यह स्वत: ही तय हो जाता है कि वर्तमान शिक्षक बच्चों को वो शिक्षा ही नहीं दे पाएगा जिसकी उन्हें जरूरत है. यहां फेल शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था को होना चाहिए लेकिन छात्र फेल होगा. अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘इसके बाद भी अगर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं आया तो सरकार धारा 17 के तहत बच्चों को कॉरपोरल पनिशमेंट (शारीरिक दंड) देने की भी वकालत करने लगेगी.’

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फीस वापसी सिर्फ एक झांसा ?

फीस वापसी की बात करें तो छठे वेतन आयोग के बहाने प्राइवेट स्कूलों द्वारा बढ़ाई गई फीस की जांच के लिए दिल्ली हाइकोर्ट ने जस्टिस अनिल देव समिति का गठन किया था और निर्देश दिए थे कि अगर स्कूलों द्वारा फीस वृद्धि किन्हीं गैरवाजिब कारणों से की गई है तो अतिरिक्त फीस 9 प्रतिशत की ब्याज दर के साथ अभिभावकों को लौटाई जाएगी. लेकिन एआईपीए का दावा है कि यह समिति अब तक 450 से अधिक स्कूलों को गैरवाजिब कारणों से फीस में बढ़ोतरी करने का दोषी पा चुकी है. जिनसे कि लगभग 250 करोड़ रुपये की राशि वसूली जानी बाकी है. लेकिन अब तक किसी भी स्कूल ने अभिभावकों को बढ़ाई गई फीस वापस नहीं की है. इसलिए दिल्ली सरकार के दिल्ली विद्यालय (लेखों की जांच और अधिक फीस की वापसी) विधेयक, 2015 पर सवाल उठना लाजमी है. लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि फीस वापसी की नौबत ही नहीं आएगी. मान लीजिए अगर कोई स्कूल फीस बढ़ाकर भी लेता है तो वह दोषी तब माना जाएगा जब वह उस अतिरिक्त फीस का उपयोग स्कूल के अलावा कहीं और करे. लेकिन यदि वह उस फीस को अपने खाते में सुरक्षित जमा दिखाकर यह कहता है कि इसका उपयोग वह स्कूल में ही करेगा तो उस पर कोई आरोप ही नहीं बनता और विधेयक में यह प्रावधान भी है कि समिति ऐसी फीस को स्कूल प्रबंधन को निर्धारित मदों में खर्च करने का आदेश दे सकती है. [/box]

अपने खिलाफ बन रहे माहौल पर काबू पाने के लिए केजरीवाल अब जहां एक ओर अभिभावकों के बीच यह संदेश प्रसारित करवा रहे हैं कि वेतन आयोग के आने पर प्राइवेट स्कूलों को शिक्षकों का वेतन बढ़ाना पड़ता था और वो इसकी वसूली आपकी जेब से करते थे. अब हमने वो कानून ही खत्म कर दिया. इसलिए फीस बढ़ेगी ही नहीं. वहीं दूसरी ओर उन्होंने शिक्षकों को यह सब्जबाग दिखाकर विरोधी रुख अपनाने से रोका हुआ है कि नए प्रावधान के अनुसार आपको वेतन तो मिलेगा ही, साथ ही फीस की जांच के बाद जितनी भी राशि विद्यालयों द्वारा अभिभावकों से अतिरिक्त वसूली गई होगी, उसे भी वेतन के रूप में आपमें बांट दिया जाएगा.

आत्महत्या का अनुबंध

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फोटोः विजय पांडेय

‘नरेंद्र मोदी दुर्योधन की तरह व्यवहार क्यों कर रहे हैं?’  इस साल  मार्च में उत्तर प्रदेश के मथुरा के नजदीक स्थित एक गांव के दौरे पर गए सामाजिक कार्यकर्ताओं से वहां के किसानों ने यह प्रतिक्रिया जाहिर की. मार्च में असमय हुई बारिश की वजह से गांव के किसानों की फसल खराब हो गई थी. इलाके के किसानों ने ‘अच्छे दिन’ की उम्मीद में मोदी को बढ़-चढ़कर वोट दिया था लेकिन उनके द्वारा यूपीए सरकार के भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन करने पर इनमें रोष व्याप्त हो गया. किसानों को इस डर ने घेर लिया कि नए विधेयक में किसानों की अनुमति को अप्रासंगिक बना देने से बड़ी कंपनियां आसानी से उनकी जमीन पर कब्जा जमा लेंगी. ‘भूमि अधिग्रहण न्यायपरक क्षतिपूर्ति रकम व पारदर्शिता, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिकार अधिनियम’ में भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों के ‘न’ कहने का अधिकार महत्वपूर्ण था. अधिनियम के इस स्वरूप को किसानों और आदिवासियों ने लंबी लड़ाई के बाद पाया था.

धलगढ़ी नाम के इस गांव में किसान और मजदूर आंदोलनों से जुड़े संगठन ‘भूमि अधिकार आंदोलन’ के कार्यकर्ता मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल का पुरजोर विरोध करते रहे हैं. उनका कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी किसानों की नहीं सुन रहे हैं, ऐसे में अपनी जमीन बचाने के लिए किसानों को आज के युग के महाभारत के लिए तैयार हो जाना चाहिए.

पौराणिक महाभारत तब शुरू हुई थी, जब कौरवों ने पांडवों को सुई की नोंक के बराबर जमीन देने से भी इंकार कर दिया था. दुर्योधन का अहंकार उस समय इतना था कि उस समय वह पांडवों की मामूली मांग को मानने के लिए भी तैयार नहीं था. पांडव राज्य पर बराबर की हिस्सेदारी को त्यागने के एवज में केवल पांच गांव चाहते थे. संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि महाभारत से मिलता जुलता विवाद 21वीं सदी में दोहराया जा रहा है. जमीन से बेदखली के डर ने देशभर के किसानों को मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण विधेयक के विरूद्ध एक कर दिया था. जिसके बाद सरकार को अपना विधेयक रोकना पड़ा. फिर पूर्व की संप्रग सरकार के विधेयक में कुछ संशोधन करके उसे ही पारित किया गया.

भारत में इस वर्ष रबड़ उत्पादन करने वाले राज्यों में किसानों ने सबसे अधिक आत्महत्या की है. ऐसा तब है जब भारत की सबसे बड़ी टायर कंपनी एमआरएफ ने इस वर्ष अप्रैल-जून की तिमाही में अपने कुल मुनाफे में 94 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है

बहरहाल जीत की यह खुशी बहुत देर तक नहीं बनी रह सकी. जमीन से बेदखली की आशंका ने फिर से सिर उठा लिया है. अब यह खबर सामने आई है कि खेती, पौधरोपण और पशुपालन उन 15 सेक्टरों में शामिल हैं, जिनमें 100 प्रतिशत विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी गई है. बिहार चुनाव हारने के तुरंत बाद सरकार ने यह घोषणा की. ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन’ की अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया, ‘एफडीआई संबंधी सुधारों के लिए हमारी सरकार की प्रतिबद्धता स्पष्ट और अटल है.’

सभी इलाकों के सभी तरह के विचारधारात्मक झुकावों वाले विभिन्न किसान संगठन इस बारे में चौकन्ने हो गए हैं. संघर्षरत कार्यकर्ताओं ने इसे ‘लाभ के लिए बहुराष्ट्रीय पूंजी का संस्थागत प्रवेश’ कहा है जो मुनाफे के लिए लालायित है. आरएसएस से जुड़े भारतीय किसान संघ के महासचिव प्रभाकर केलकर का कहना है, ‘अगर कृषि में प्रत्यक्ष एफडीआई को किसानों की जमीन छीनने के लिए शॉर्टकट के तौर पर इस्तेमाल किया गया तो हम इसके खिलाफ लड़ाई में एड़ी-चोटी का जोर लगा देंगे.’

लेकिन भूमि अधिग्रहण के लिए हिंसात्मक रास्ता अपनाया जाएगा, इसकी संभावना कम ही है, क्योंकि अतीत में सत्ताधारी दलों को इसकी बड़ी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी है. ऐसे में सरकार को कुछ ऐसे रास्ते ढूंढने होंगे जो प्रत्यक्ष तौर पर उतने दमनकारी न दिखाई दें. अखिल भारतीय किसान सभा के पी. कृष्णप्रसाद का कहना है, ‘कृषि में प्रत्यक्ष एफडीआई असल जमीन पर कैसे काम करेगा अभी तक इस बारे में बहुत कम ब्यौरा दिया है. लेकिन इस सरकार का पिछला ट्रैक रिकाॅर्ड तथा तीसरी दुनिया के देशों के इस क्षेत्र के अनुभवों को अगर देखा जाए तो हम पाते हैं कि कृषि में एफडीआई ने बड़े व्यवसायियों को फायदा पहुंचाया है तथा छोटे और मझोले किसानों की जीविका को नुकसान पहुंचाया है.’

क्या ये तथ्य मोदी के इस दावे के उलट नहीं हैं कि एफडीआई दुनिया भर में रोजगार और आमदनी बढ़ाने में सहायक रहा है. न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय से पंजाब की कॉरपोरेट खेती पर शोध कर रहीं रितिका श्रीमाली का कहना है, ‘एफडीआई भारतीय कृषि के कॉरपोरेटीकरण को बहुत तेजी से बढ़ा देगा. अनुबंध आधारित खेती को तेजी से संस्थागत रूप मिलेगा. अनुबंध आधारित खेती किसानों और कॉरपोरेट कंपनियों के बीच अनुबंध से कहीं बढ़कर है. ऐसी खेती करने वाली कंपनियां ही बीज, उर्वरक और कीटनाशक जैसे खेती में काम आने वाले उत्पाद भी बेचती हैं. इसी तरह वे किसानों से अपने उत्पाद खरीदते समय भी मुनाफा कमाती हैं. प्रत्यक्ष रूप से खेती में शामिल हुए बिना उत्पादों को खरीदने और बेचने की कीमतें कंपनियां ही तय करती हैं. इस तरह बिना कोई जोखिम उठाए ये कंपनियां नियमित रूप से अपना मुनाफा कमाती हैं.’

श्रीमाली इस ओर भी ध्यान दिलाती हैं कि गरीब किसानों के लिए तय ऋण के एक बड़े हिस्से पर कॉरपोरेट खेती करने वाली कंपनियां कब्जा जमा लेती हैं. साथ ही कॉरपोरेट खेती के नाम पर बड़े पैमाने पर खेती करने के कारण उनके लिए ऋण लेने की राह आसान होती है. यही तथ्य मुंबई में रहने वाले अर्थशास्त्री आर. रामकुमार के हाल ही में किए गए एक अध्ययन में भी सामने आए, जिसमें उन्होंने वर्ष 2000 से बैंकों द्वारा खेती के लिए दिए ऋणों का अध्ययन किया था.

कॉरपोरेट खेती में अग्रणी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और गुजरात जैसे राज्यों में खेती में उत्पन्न होती अस्थिरता और संकट की स्थिति साफ तौर पर इस ओर संकेत करती है कि कृषि में एफडीआई के क्या प्रभाव हो सकते हैं.  हैदराबाद स्थित सुंदरय्या विज्ञान केंद्र (एसवीके) द्वारा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के 88 गांवों में क्षेत्रवार सर्वेक्षण किया जा रहा है. सर्वेक्षण के संयोजक के. वीरैया का कहना है कि सर्वेक्षण में ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं, जो दिखाते हैं कि अनियंत्रित विदेशी पूंजी किस तरह का संकट पैदा कर सकती है. वीरैया कहते हैं, ‘कॉरपोरेट खेती किसानों के शोषण को तेज करने के अलावा खेती की शैली को भी प्रभावित करती है जिससे खाद्य सुरक्षा भी प्रभावित होती है.’

एसवीके ने अपने अध्ययन में तेलंगाना के वारंगल जिले में तेजी से बढ़ती किसान आत्महत्याओं को कॉरपोरेट खेती से जोड़ा है. इस नए गठित राज्य में जून 2014 से अब तक 1,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. वारंगल के इन किसानों में से एक चौथाई एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट खेती कंपनी की भारतीय शाखा द्वारा की गई ठगी का शिकार हुए थे. इस कंपनी ने अपने स्थानीय नेटवर्क के माध्यम से किसानों को काफी ऊंची कीमत पर बीटी कॉटन के बीज बेचे थे. बीज अच्छी किस्म के नहीं थे. इस कारण फसल भी उम्मीद के मुताबिक अच्छी नहीं हुई. कंपनी ने खराब किस्म के कपास को खरीदने से मना कर दिया और इस तरह एक बड़े घाटे के शिकार हुए किसानों में आत्महत्या का सिलसिला शुरू हो गया. आंध्र प्रदेश में भी कॉरपोरेट खेती का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा. पश्चिम गोदावरी जिले के बी.वी. गुडेम गांव में गोदरेज ग्रुप की कंपनी ने ताड़ के तेल और कोका जैसी नकदी फसलों की कॉरपोरेट खेती शुरू की. इस खेती ने एक ऐसे बड़े भूभाग को घेर लिया जो इससे पहले धान की समृद्ध खेती के लिए जाना जाता था. एसवीके के अध्ययन के अनुसार इन नकदी फसलों ने लगभग 3000 एकड़ की धान की खेती की जगह ले ली है.

एक प्रचलित धारणा यह है कि कॉरपोरेटीकरण जाति प्रथा की जकड़नों को तोड़ देता है. लेकिन एसवीके का अध्ययन यह दर्शाता है कि गोदरेज ग्रुप ने प्रचलित जाति आधारित भेदभाव और प्रथाओं को मजबूत किया है जिसमें बंधुआ मजदूरी से मिलती-जुलती एक प्रथा भी शामिल है. गुंटूर जिले के कट्टावारिपलम गांव में भी गन्ने और कपास की खेती में अनुबंध आधारित खेती को अपनाया गया है. इससे पहले खेत मजदूरों को एक किलो कपास को तोड़ने के लिए 7 रुपये और एक किलो मिर्च तोड़ने के लिए 12 रुपये दिए जाते थे. लेकिन अनुबंध आधारित खेती के चलते दूसरे जिलों और राज्यों से खेती के लिए मजदूरों के आने के बाद मजदूरी क्रमश: 2.5 रुपये और 7 रुपये पर आ गई है. इस कारण स्थानीय मजदूर निराश होकर यहां से पलायन कर रहे हैं. आंध्र प्रदेश में भी कमोबेश यही हाल है. गुजरात जहां मोदी ने कॉरपोरेट और अनुबंध आधारित खेती को संस्थागत रूप दिया है, वहां भी कठिन श्रम और मजदूरी कम होने का यही कारण सामने आया है.

इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है कि ऐसे हालात में कॉरपोरेटीकरण के क्या प्रभाव होंगे जहां आरंभिक उत्पादक यानी किसान अपने उत्पादों से तैयार होने वाले प्रसंस्कृत उत्पादों की कुल कीमत का 10 प्रतिशत से भी कम प्राप्त कर पाते हैं. इसका यह भी अर्थ है कि कॉरपोरेट कंपनियां खेतों से कच्चा माल बहुत कम कीमत पर और अपने नियम एवं शर्तों पर उठाती हैं.

उदाहरण के लिए भारत में इस वर्ष रबड़ उत्पादन करने वाले राज्यों में किसानों ने सबसे अधिक आत्महत्या की है. ऐसा तब है जब भारत की सबसे बड़ी टायर कंपनी एमआरएफ ने इस वर्ष अप्रैल-जून की तिमाही में अपने कुल मुनाफे में 94 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है. फूड एंड एग्रीकल्चरल आॅर्गनाइजेशन की रिपोर्ट ‘द स्टेट आॅफ फूड इनसिक्योरिटी इन द वर्ल्ड, 2015’ में भारत भुखमरी के शिकार देशों में पहले स्थान पर है. इसके बावजूद ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन’ के नाम पर सरकार एक ओर लगातार सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं को कम कर रही है और दूसरी ओर 2014-15 के वित्तीय वर्ष में हीरे और सोना उद्योगों को 75,592 करोड़ की भारी भरकम सब्सिडी देने में भी उसे कोई गुरेज नहीं.

जब नई दिल्ली में मोदी सत्ता में आए तब मुंबई की दलाल स्ट्रीट के ब्रोकर इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि क्या वे वैसे कदम उठा सकते हैं जैसे 1980 में  इंग्लैंड में मारग्रेट थैचर ने उठाए थे. उस समय थैचर ने सभी मजदूर यूनियनों को कुचल कर मुक्त बाजार को जोर-शोर से बढ़ावा दिया था. परिणामस्वरूप बड़े व्यवसायियों को फायदा हुआ. क्या एफडीआई के रास्ते कॉरपोरेटीकरण के माध्यम से खेती के संकट को बढ़ाकर मोदी ‘थैचर चमत्कार’ के भारतीय संस्करण का सपना देख रहे हैं?

पंचायत पर पांचवीं पास का पेंच

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सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में पंचायत चुनाव के उम्मीदवारों के लिए शैक्षणिक योग्यता तय किए जाने को सही ठहराते हुए कहा कि शिक्षा ही वह जरिया है जो मनुष्य को सही-गलत और अच्छे-बुरे का फर्क समझने की ताकत प्रदान करता है. शीर्ष अदालत के इस फैसले से अब हरियाणा में पढ़े-लिखे लोग ही चुनाव लड़ पाएंगे.

न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर व न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे की खंडपीठ ने हरियाणा पंचायती राज (संशोधन) अधिनियम, 2015 को सही ठहराया और इसे चुनौती देनी वाली राजबाला, कमलेश व प्रीत सिंह की याचिका को खारिज कर दिया. गौरतलब है कि हरियाणा पंचायती राज (संशोधन) अधिनियम, 2015 के तहत चुनाव लड़ने के लिए सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों का 10वीं, महिलाओं व दलित पुरुषों का आठवीं पास होना अनिवार्य है. वहीं दलित महिलाओं के लिए पांचवीं पास होना जरूरी है. इसके अलावा बिजली बिल का बकाया होने, बैंक का लोन न चुकाने और गंभीर अपराधों में चार्जशीट होने वाले लोग भी पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाएंगे. साथ ही प्रत्याशी के घर में शौचालय भी होना चाहिए.

70 पेज के अपने फैसले में खंडपीठ ने कहा कि अदालत द्वारा किसी भी कानून को इस आधार पर असंवैधानिक नहीं करार दिया जा सकता है कि वह मनमाने तरीके से बनाया गया है. हरियाणा पंचायती राज कानून संशोधन से संविधान का उल्लंघन नहीं हुआ है. यह बहुत जरूरी है कि चुने हुए प्रतिनिधि शिक्षित हों, जिससे वे अपने कर्तव्यों का सही तरीके से निर्वाह कर सकें. शीर्ष अदालत ने उस प्रावधान को भी सही बताया जिसमें उन लोगों के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई गई है जिनके ऊपर सहकारी बैंकों का ऋण या बिजली का बिल बकाया है. खंडपीठ ने इस पर कहा कि हम सब जानते हैं कि इन दिनों चुनाव लड़ना कितना खर्चीला है. ऐसी स्थिति में कर्जदार व्यक्ति का चुनाव लड़ना उसकी आर्थिक क्षमता से बाहर है. शीर्ष अदालत ने शौचालय की अनिवार्यता पर कहा कि शौचालय बनाने के लिए राज्य सरकार सहायता देती है, ऐसे में इसकी अनिवार्यता का फैसला सही है. खुले में शौच करने की कुप्रथा के खिलाफ महात्मा गांधी भी थे.

शिक्षा का मतलब क्या?

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार से पूछा था कि नए नियमों के मुताबिक कितने लोग चुनाव नहीं लड़ पाएंगे. इस पर राज्य सरकार की तरफ से अदालत में पेश अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने बताया कि 43 फीसदी लोग चुनाव नहीं लड़ पाएंगे. उन्होंने अदालत को बताया कि राज्य में 84 फीसदी घरों में शौचालय हैं, जबकि 20 हजार स्कूल हैं. हालांकि याचिकाकर्ताओं ने सरकार के आंकड़े को गलत बताया और कहा कि सही में यह संख्या 43 नहीं 64 फीसदी है. यदि हम बात दलित महिलाओं की करेंगे तो यह संख्या 83 फीसदी तक पहुंच जाती है. इसी तरह राज्य सरकार ने 20 हजार स्कूलों में प्राइवेट स्कूलों को भी गिना है, जबकि हकीकत यह है कि राज्य में दसवीं के लिए सिर्फ 3, 200 स्कूल हैं. हालांकि कौन से आंकड़े सही हैं, कौन से गलत यह अलग बात है. अहम सवाल यह है कि क्या सिर्फ किताबी शिक्षा हासिल न कर पाने वाले लोगों को उनके चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित कर देना जायज है? जब भारत में संविधान का निर्माण हो रहा था उस दौरान जनप्रतिनिधियों के लिए शिक्षा को अनिवार्य किए जाने को लेकर संविधान सभा में जमकर बहस हुई थी. इस दौरान भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जनप्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित किए जाने के पक्ष में थे, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसका विरोध करते हुए इसे अलोकतांत्रिक बताया था. उस दौरान संविधान सभा ने यह तय किया कि इस देश में हर व्यक्ति को चुनाव लड़ने की छूट मिलनी चाहिए और इसी आधार पर कानून बने. लेकिन अब इस फैसले के चलते लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली ही कड़ी में बहुत सारे लोग चुनाव लड़ने से वंचित रह जाएंगे.

हमारे ही देश में ऐसे हजारों उदाहरण मिल जाएंगे जहां अशिक्षित लोगों ने मील के पत्थर स्थापित किए हैं. देश के कई बड़े दिग्गज नेताओं, स्वतंत्रता सेनानियों और सफल उद्योगपतियों के पास डिग्रियां नहीं रही हैं. यहां तक कि मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की शैक्षणिक योग्यता पर भी सवाल उठते रहे हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश अपने एक लेख में तमिलनाडु के नेता के. कामराज का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘के. कामराज ने अपनी स्कूली शिक्षा भी नहीं पूरी की थी, लेकिन इस बात ने उनके राजनीतिक करिअर को प्रभावित नहीं किया. उन्होंने तमिलनाडु के प्रशासन को बहुत ही अच्छी तरह से संभाला और नई ऊंचाईयों पर पहुंचाया. लेकिन अगर वह आज होते तो हरियाणा में पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाते.’ उन्होंने हरियाणा सरकार के इस फैसले को महिला, अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित विरोधी करार दिया. उन्होंने कहा, ‘यह कितना अजीब है कि पंचायत चुनाव लड़ने के लिए आपकी शैक्षणिक योग्यता देखी जा रही है, जबकि हरियाणा का मुख्यमंत्री बनने के लिए आपको इस तरह की किसी भी बाधा को नहीं पार करना है. संविधान में अन्य पिछड़ा वर्ग की व्याख्या ऐसे समुदाय के रूप में की गई है जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा है. इसका मतलब साफ है कि देश में अभी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे शिक्षित किए जाने की जरूरत है. क्या ऐसे में उनके साथ भेदभाव नहीं किया जा रहा है? क्या यह बात दलित और आदिवासियों के लिए और भी सटीक नहीं बैठती है? हां, यह सही है कि उनकी शिक्षा के लिए बहुत सारे कदम उठाए गए हैं, लेकिन यह भी वास्तविकता है कि सिविल सेवा समेत अन्य जगहों यहां तक कि संसद में भी सर्वणों का ही वर्चस्व दिखाई पड़ता है.’

गलती आपकी और सजा हमको

हमें आजाद हुए करीब सात दशक होने वाले हैं, लेकिन इतने समय बाद भी हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा साक्षर नहीं हो पाया है. ऐसे में यह सरकारों की नाकामयाबी रही कि वह अपने देश के लोगों को साक्षर नहीं बना पाईं. पर इस नाकामयाबी की सजा आम जनता को दी जा रही है. देश में पढ़ाई-लिखाई को लेकर माहौल यह है कि हर व्यक्ति अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजना चाहता है, पर इसके लिए स्कूल समेत अन्य सुविधाएं मुहैया करा पाने में सरकारें नाकाम रही हैं. अब ऐसी ही एक सरकार चुनाव लड़ने के लिए शैक्षणिक बाध्यता लगाकर अशिक्षित लोगों को इस बात से भी वंचित कर देना चाहती है कि वह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करके चुनाव जीतें और अपने समुदाय समेत गांव का विकास कर सकें. पूर्व न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर ने अपने एक लेख में कहा, ‘उन लोगों को जिन्हें औपचारिक शिक्षा का मौका नहीं मिला है, वो पहले से ही राज्य की नाकामी से पीड़ित हैं. ऐसे में उन्हें लोकतांत्रिक संस्था से बाहर नहीं किया जाना चाहिए.’

वैसे भी हरियाणा की कुल एक करोड़ 60 लाख की ग्रामीण आबादी में महज 12.70 फीसद ही दसवीं पास हैं. राज्य की ग्रामीण आबादी का 34 फीसद निरक्षर हैं. ग्रामीण आबादी का महज 4.4 प्रतिशत ही ग्रेजुएट हैं. अब इसके लिए सिर्फ लोगों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. सरकारों को अपनी जिम्मेदारी भी तय करनी होगी. मजेदार बात यह है कि देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने में आजादी के बाद पचास साल लग गए और इसके लागू होने के एक दशक के भीतर ही हम पंचायत चुनाव में शैक्षणिक योग्यता निर्धारित किए जाने संबंधी कानून भी लाने लगे. आखिर हम यह कैसे मान लें कि इतने समय में देश का हर नागरिक कम से कम पांचवीं और आठवीं की पढ़ाई पूरी कर लेगा. सबसे अहम सवाल यह है कि क्या हरियाणा सरकार ने इस बात की रिपोर्ट मांगी कि 2015 में कितने प्रतिशत बच्चे स्कूली शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो गए हैं. अगर मांगी तो कितने प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पा रहे हैं और उन्हें स्कूल पहुंचाने के लिए राज्य सरकार ने क्या कदम उठाए?

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क्या है पूरा मामला ?

हरियाणा में सरपंचों का कार्यकाल 25 जुलाई 2015 को खत्म हो गया, जिसके बाद 11 अगस्त 2015 को राज्य सरकार ने पंचायती राज कानून में संशोधन कर दिया. सरकार ने 7 सितंबर को पंचायती राज (संशोधन) विधेयक, 2015 को विधानसभा से पारित करा लिया. इसी दिन इसे राज्यपाल ने मंजूरी भी प्रदान कर दी. इसके अगले ही दिन राज्य चुनाव आयोग ने नए नियमों के आधार पर प्रदेश में पंचायत चुनावों की घोषणा कर दी. 17 सितंबर को संशोधन के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पंचायती राज संशोधन अधिनियम पर रोक लगा दी. बाद में राज्य चुनाव आयोग ने पंचायत चुनावों को रद्द कर दिया. सुप्रीम कोर्ट में मामले को लेकर सुनवाई होती रही. 10 दिसंबर को शीर्ष अदालत ने हरियाणा सरकार के पक्ष में फैसला सुना दिया.

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वैसे भी यह सिर्फ हरियाणा की बात नहीं है. इससे पहले राजस्थान की सरकार ने पंचायत चुनाव के लिए शैक्षणिक योग्यता और शौचालय की अनिवार्यता लागू करने की पहल की. तब पूर्व चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह और एसवाई कुरैशी समेत बहुत सारे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया. उन्होंने तर्क दिया था कि ऐसे प्रावधानों से बड़ी ग्रामीण आबादी चुनाव लड़ने से वंचित हो सकती है. यही नहीं राजस्थान में तो एक नए तरह की मुश्किल भी सामने आई है. राज्य में निर्वाचित हुए दो सौ से अधिक पंचायत प्रतिनिधियों के निर्वाचन को शैक्षणिक योग्यता के फर्जी प्रमाणपत्र जमा करने की वजह से अदालत में चुनौती दी गई है.

एक वर्ग ऐसा भी है जो इस फैसले का स्वागत करता है. इनका मानना है कि यदि पढ़े-लिखे और जिम्मेदार लोग प्रतिनिधि के रूप में चुने जाएंगे, तो इससे लोकतंत्र को ही मजबूती मिलेगी. शीर्ष अदालत के इस फैसले से विधायक और सांसद के चुनाव में शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करने की मांग करने वालों को बल मिलेगा. संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हैं. ‘तहलका’ से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों में अच्छा-बुरा नहीं देखता है. वह इस आधार पर निर्णय देता है कि विधानसभा ने अपने तय संवैधानिक अधिकारों का पालन करते हुए संशोधन किए हैं या नहीं और विधानसभा के पास यह अधिकार है कि वह कानून में संशोधन कर सके. वैसे भी यह मामला राजनीतिक व्यवस्था के लिए शर्मिंदगी वाला है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी देश में लोग निरक्षर हैं.’ कुछ ऐसा ही मानना चुनाव आयोग के पूर्व सलाहकार केजे राव का है. वह कहते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक नजीर है. जनप्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता का निर्धारण होना चाहिए. यह विधायकों और सांसदों के लिए भी होना चाहिए. ये लोग हमारे देश का कानून बनाते हैं. उन्हें पढ़ा-लिखा होना चाहिए.’

खत्म नहीं हुई है उम्मीद

हरियाणा सरकार के पंचायत चुनाव संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाली राजबाला और कौशल्या समेत प्रीत सिंह ने अभी हार नहीं मानी है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी है, पर ये सारे लोग अब सुप्रीम कोर्ट में ही पुनर्विचार याचिका दायर करने की तैयारी में है. फतेहाबाद की राजबाला कहती हैं, ‘जब सांसद और विधायक अनपढ़ होकर चुनाव लड़ सकते हैं तो फिर पंच-सरपंच क्यों नहीं.’ उन्होंने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने के साथ ही अपने मौलिक अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगी. रोहतक के प्रीत सिंह ने कहा कि लोकतंत्र में चुनाव लड़ने से रोकना दुर्भाग्यपूर्ण है. वहीं हिसार की कौशल्या उर्फ कमलेश का कहना है कि पढ़े-लिखे से ज्यादा अनपढ़ लोग बेहतरीन काम कर सकते हैं. बस उन्हें जागरूक किए जाने की जरूरत है. वह अपने परिवार की खराब माली हालत के चलते स्कूल नहीं जा पाईं.            

‘देश के सम्मान के लिए आमिर ऑटोरिक्शा वालों को अच्छा व्यवहार करने की सीख देते हैं, उन्हें वैसी ही सीख पत्नी को भी देनी चाहिए’

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Photo- Vijay Pandey

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व पर बिहार चुनाव नतीजों का क्या असर पड़ा? क्या किसी बदलाव के बारे में सोचा जा रहा है?

बिहार चुनाव विधानसभा का चुनाव था. भाजपा में एक पूरी प्रक्रिया है जिसके तहत राज्यों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक हम चुनाव कार्य संपन्न कराते हैं. वह प्रक्रिया चल रही है, जब यह पूरी हो जाएगी तो परिणाम सबके सामने आ जाएगा.  

क्या लगता है, बिहार चुनाव के नतीजे अमित शाह के दूसरी बार अध्यक्ष चुने जाने को प्रभावित करेंगे?

इन दोनों चीजों में आपस में कोई संबंध नहीं है. पार्टी संगठन के भीतर के चुनावों और विधानसभा चुनावों के बीच कोई संबंध नहीं है.

आप कह चुके हैं कि किसी भी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने की जगह पार्टी को बिहार में हार के कारणों पर आत्मचिंतन करना चाहिए. आपके अनुसार बिहार में इस हार के क्या कारण हैं?

बिहार में खराब प्रदर्शन के कारणों पर हमने विभिन्न स्तरों पर विचार विमर्श किया है. जो चुनाव परिणाम हमें वहां मिले, उनके कारणों के बारे में काफी स्पष्टता आई है. हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह चुनाव परिणाम दो हिस्सों में है. सीटों के मामले में हमने मुंह की खाई है. हम बहुत कम संख्या में सीटें जीत पाए, लेकिन वोट की संख्या के मामले में हमारा प्रदर्शन काफी अच्छा रहा. हमने बड़ी संख्या में वोट प्राप्त किए हैं. कुल मिलाकर इस तरह का परिणाम आने के बहुत से मिले जुले कारण रहे हैं, जिसकी वजह से इस तरह का जनमत मिला है. हमने काफी विश्लेषण किया है और इससे हमने जरूरी सबक भी सीखा है. पार्टी इन सब पर मीडिया से चर्चा नहीं करेगी.

भाजपा ने बिहार में मोदी को आगे रख चुनाव क्यों लड़ा? क्या इससे पार्टी के प्रदर्शन पर प्रतिकूल असर पड़ा है?

बिहार में केवल मोदी जी ने ही चुनाव प्रचार नहीं किया. पार्टी के बहुत से लोगों ने प्रचार किया. हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी जोर-शोर से चुनाव प्रचार किया था. बिहार चुनाव हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण था. सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि हर राज्य का चुनाव हमारे लिए महत्वपूर्ण है. चुनाव में हम हमेशा अपने सबसे बेहतर नेताओं को आगे रखते हैं और बिहार में भी हमने यही किया. हमारे राज्य या राष्ट्रीय स्तर के जो भी नेता वहां प्रचार के लिए गए, उन सभी ने बिहार के विकास और बेहतर भविष्य की बात की. हमने चुनाव को गंभीरता से लिया और हम गंभीरता से लड़े भी. चुनाव किसी एक व्यक्ति पर आधारित नहीं था न ही किसी एक व्यक्ति को आगे किया गया. हर किसी ने चुनाव प्रचार में योगदान दिया. हमने अपने सबसे बेहतर नेताओं को आगे रखा और दूसरे लोगों ने भी ऐसा ही किया. जहां तक उल्टा असर पड़ने की बात है तो इसका जवाब ‘नहीं’ है. जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि चुनाव किसी एक मुद्दे या किसी एक चेहरे को आगे करके नहीं लड़ा गया. अगर कोई हारता है तो ऐसा किसी एक कारण से नहीं हो सकता. इसके लिए कई कारण जिम्मेदार होते हैं. मेरा आपसे यह सवाल है कि बिहार में हम 25 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 55 सीटें कैसे जीते? बिहार में हमें सबसे ज्यादा वोट मिले हैं. इसके लिए भी अनेक कारण जिम्मेदार हैं, जिसमें प्रधानमंत्री की लोकप्रियता भी शामिल है जो आज की तारीख में भी ज्यों की त्यों बनी हुई है. मैं फिर कहूंगा कि बिहार चुनाव में हमारी हार के लिए बहुत से कारण जिम्मेदार हैं, केवल कोई एक कारण या चेहरा जिम्मेदार नहीं है.

लालकृष्ण आडवाणी, यशवंत सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी और शांता कुमार जैसे वरिष्ठ सदस्यों द्वारा बिहार चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन की आलोचना के बारे में क्या कहना है?  

ये सब बीते समय की बातें हो गई हैं. खुद आडवाणी जी ने यह कहा है कि ‘अब पार्टी में नई ऊर्जा है’ जीत और हार दोनों ही मौकों पर लोग अपने दिल की बात को विभिन्न तरह से व्यक्त करते हैं. हम भाजपा में हैं और यह एक लोकतांत्रिक पार्टी है. हमने सभी तरह के विचारों और आलोचनाओं पर गौर किया है और पार्टी की कार्यप्रणाली की समीक्षा और विश्लेषण में इनसे मदद ली है.

क्या बिहार चुनाव परिणाम का असर असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में होने वाले विधानसभा चुनावों पर भी पड़ेगा?

हर चुनाव अलग तरह का होता है. असम चुनाव अलग तरह का होगा क्योंकि वह अलग तरह का राज्य है. हम पूरी कोशिश कर रहे हैं. बिहार से हमें जो भी सीखना था, हम सीख चुके. असम अलग तरह का राज्य है और वहां हमें अलग तरह से पेश आना होगा. हम यह सुनिश्चित करेंगे कि बिहार चुनाव परिणामों का असर असम विधानसभा चुनाव पर न पड़े और असम चुनाव अच्छे परिणाम लेकर आए. पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों में भी पार्टी अपना बेहतरीन प्रदर्शन करने की कोशिश करेगी.

क्या इन राज्यों में होने वाले चुनाव में पार्टी किसी नई रणनीति के साथ लड़ेगी?

रणनीति पर कभी मीडिया से चर्चा नहीं की जाती, लेकिन मैं आपसे इतना कह सकता हूं कि असम के लिए हम अलग रणनीति तैयार कर चुके हैं. बीते तीन महीनों से हम असम के लिए तैयार की गई रणनीति के तहत काम भी कर रहे हैं. असम में हमें सकारात्मक परिणाम मिलेंगे और हम जरूर जीतेंगे क्योंकि हमें असमिया समाज के सभी वर्गों का समर्थन मिल रहा है. असम का समाज बहुलवादी है जहां विभिन्न वर्गों के लोग रहते हैं और हमें इन सभी वर्गों का समर्थन मिल रहा है. 

क्या पार्टी इस बार चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करेगी?

सही वक्त आने पर हम फैसला लेंगे. दिल्ली में हमने मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा की थी, लेकिन हम हार गए. बिहार में हमने मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं की फिर भी हम हार गए. हर राज्य अलग है. असम के बारे में हम मीडिया को बहुत जल्द सूचित करेंगे. वक्त आने पर हम अपनी योजना का खुलासा करेंगे.

‘अगर केवल पीआर के बल पर कोई चुनाव जीतना संभव हो पाता तो कांग्रेस चुनाव कभी नहीं हारती. पीआर के अलावा अन्य कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं’

पार्टी के खिलाफ सांसद शत्रुघ्न सिन्हा के बयानों पर क्या कहना है?

हमें अपने नेताओं की मीडिया द्वारा बनाई गई छवि पर कुछ नहीं कहना. कुछ मसले ऐसे हैं जिन्हें हमारा शीर्ष नेतृत्व बेहतर तरीके से संभालता है.

क्या आपको लगता है कि प्रशांत किशोर ने महागठबंधन की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई? चुनाव परिणाम प्रभावित करने में पीआर की कितनी भूमिका है?

अगर केवल पीआर के बल पर कोई चुनाव जीतना संभव हो पाता तो कांग्रेस कभी चुनाव नहीं हारती. पीआर के अलावा अन्य कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं. कई बार पीआर हार का कारण भी बन सकता है.

क्या आपको लगता है कि टिकट बंटवारा भी बिहार चुनाव में एक मसला था?

नहीं. बड़े स्तर पर देखने पर टिकट बंटवारे का कोई मामला नहीं था.

आमिर खान के असहिष्णुता संबंधी बयान के बारे में क्या कहना है?

देखिए, आदर्श स्थिति तो यह होगी कि मैं कुछ भी न कहूं. हर किसी को अपने तरीके से सोचने की स्वतंत्रता है. लेकिन दो चीजें हैं- पहला, उन्हें इस मसले पर अपनी पत्नी किरन को बीच में नहीं घसीटना चाहिए था. दूसरा, जो कुछ उन्होंने कहा अगर वह सच भी है, तो जैसे आमिर आॅटोरिक्शा वालों को देश के सम्मान के लिए अच्छा व्यवहार करने की सीख देते हैं, उन्हें अपनी पत्नी को भी वैसी ही सीख देनी चाहिए थी.

मरते तालाब, मुश्किल में जीवन

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सभी फोटो : अमरजीत सिंह

विकासशील देशों की कतार से निकलकर विकसित देशों में शामिल होने की बेताबी के बीच तालाब, नदी और पहाड़ जैसे प्राकृतिक संसाधनों के लापरवाह दोहन की दुहाई देने के कोई मायने नहीं रह गए हैं. ऐसा कहने की वजह ये है कि भारत सहित दुनियाभर में एक के बाद एक आने वाली आपदाओं ने प्रकृति के साथ हमारी लापरवाही और उसके घातक परिणामों को लगातार रेखांकित किया है. पर्यावरणविद और ‘आज भी खरे हैं तालाब’ के लेखक अनुपम मिश्र कहते हैं, ‘चेन्नई जैसी प्राकृतिक आपदा कहीं भी आ सकती है. इस शहर में सैकड़ों की तादाद में मौजूद तालाबों को बहुत पहले ही खत्म कर दिया गया. नदी के बहने के रास्ते पर भी कब्जा कर लिया गया है. अब इंद्र महाराज को नहीं पता कि आपने धरती के साथ कैसा सुलूक किया है, वे तो अपने नियमों के हिसाब से बरसते हैं. बीते जमाने के लोग इन नियमों को समझते थे. इसलिए उस दौर में बारिश के पानी को जमा करने के लिए बड़ी संख्या में तालाब बनाए गए. कोई दुख आन पड़ा तो तालाब बनवाए, कोई खुशी हुई तो तालाब खुदवाए गए. लेकिन पिछले 200 सालों में नई तरह की पढ़ाई पढ़ने वाले लोगों ने इन चीजों को गया बीता माना और पानी की समस्या को नए तरीके से सुलझाने का वादा भी किया, लेकिन इसका कोई बेहतर नतीजा सामने निकलकर नहीं आया. कितने ही शहरों के नलों में पानी न आना इस दावे और वादे पर सबसे मुखर टिप्पणी है.’ अनुपम मिश्र ध्यान दिलाते हैं कि 2013 के मानसून में दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के टर्मिनल 3 पर घुटनों तक पानी भर गया था. असल में इस एयरपोर्ट को तालाबों की जमीन पर बनाया गया है. अब जब तालाब पर ही एयरपोर्ट तान दिया जाएगा तो वहां पानी भरना स्वाभाविक है.

पर्यावरण पर काम करने वाले एनजीओ ‘नेचुरल हैरिटेज फर्स्ट’ के संयोजक दीवान सिंह यह बात बिल्कुल सहज ढंग से बताते हैं कि व्यस्ततम बाजारों, सड़कों, अपार्टमेंट और अपनी चमक से मुग्ध कर देने वाले मॉल्स की दिल्ली में 90 के दशक तक तकरीबन 1,000 तालाब थे. यह बात शायद आपको चौंका सकती है, लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि दिल्ली सरकार की आधिकारिक सूची में वर्ष 2000 तक केवल 177 तालाब (जिनमें गांवों के जोहड़, दलदल और बावड़ियां भी शामिल हैं) दर्ज थे. दिल्ली के पर्यावरण और स्वच्छ जल से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार जैन की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल की गईं कई जनहित याचिकाओं के बाद मई 2001 में संयुक्त सर्वेक्षण समिति का गठन किया गया ताकि दिल्ली में तालाबों की वास्तविक संख्या की जानकारी मिल सके.

दिल्ली सरकार की ‘पार्क एंड गार्डन सोसाइटी’ के अनुसार, वर्तमान में दिल्ली में 629 तालाब हैं, लेकिन असल में इनमें से अधिकांश खराब हाल में हैं. ये सूखे हैं और इन पर अवैध कब्जे किए जा चुके हैं. खुद दिल्ली सरकार के आंकड़ों के अनुसार 180 तालाबों पर अतिक्रमण किया जा चुका है. जिनमें से 70 तालाबों पर आंशिक रूप से तो 110 तालाबों पर पूरी तरह अवैध कब्जा हो चुका है. इन आंकड़ों के अलावा कितनी ही जगहों पर सीवेज और कूड़े के निपटान की सही व्यवस्था न होने का खामियाजा भी ये तालाब ही भुगत रहे हैं.

गैर सरकारी संस्था ‘फोरम फॉर ऑर्गनाइज्ड रिसोर्स कंजर्वेशन एंड एनहांसमेंट’ (फोर्स) के एक अध्ययन के अनुसार, दिल्ली की अधिकांश पुनर्वास कॉलोनियां तालाबों पर या उनके आसपास बनाई गई हैं. जो कॉलोनियां तालाबों के आसपास बनाई गई हैं वहां के रहवासियों ने धीरे-धीरे तालाबों पर भी कब्जा कर लिया क्योंकि महानगरीय जीवन शैली में उन्हें तालाबों की जरूरत महसूस नहीं हुई और वे उनके पर्यावरणीय महत्व से अनजान थे. दूसरी ओर द्वारका के पास स्थित अमराही गांव के निवासी महावीर बताते हैं, ‘विकास के लिए सरकार द्वारा गांवों की जमीन अधिग्रहित कर लिए जाने के कारण दिल्ली के गांवों से खेती-किसानी लगभग खत्म हो गई है. इस वजह से सिंचाई और पशुओं को पीने का पानी मुहैया कराने की जरूरत भी खत्म हो गई. ऐसे में तालाब जैसे पारंपरिक जलस्रोत की प्रासंगिकता भी गांववालों के जीवन में नहीं रही इसलिए गांवों में भी तालाबों पर अवैध कब्जे के उदाहरणों की कमी नहीं.’ अमराही में ही 11 बीघे का तालाब अब 4 से 5 बीघे में सिमट कर रह गया है. इस तालाब के अधिकांश हिस्सों पर गांववालों का कब्जा है और तालाब अब पूरी तरह से सूख गया है. आम जनता तालाबों के दूरगामी महत्व को नहीं समझ सकी, यह बात समझ में आती है लेकिन स्थिति तब और भी दुर्भाग्यपूर्ण हो गई जब नीति नियंताओं और प्रशासनिक एजेंसियों ने भी तालाबों की जमीन को पाटकर उस पर निर्माण कार्य जारी रखा. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दक्षिणी दिल्ली के शेख सराय डीडीए अपार्टमेंट तालाब की जमीन पर ही बना है. इसके अलावा फोर्स संस्था के अनुसार, दक्षिण पश्चिम दिल्ली के वसंत कुंज का सी-6 पाॅकेट भी तालाब की जमीन पर बसा है. कड़कड़डूमा झील को पार्क में तब्दील कर दिया गया है. इसी प्रकार 86 तालाबों पर पार्क बना दिया गया है.

वर्ष 2000 के बाद से लगभग हर साल हाई कोर्ट के निर्देश के बावजूद प्रशासन ने तालाबों की देखरेख और सूख गए तालाबों के पुनरुत्थान के प्रति जरूरी सजगता नहीं दिखाई. 2004 में दिल्ली हाई कोर्ट ने तीन सदस्यीय निगरानी समिति का गठन किया ताकि तालाबों के पुनरुत्थान संबंधी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके. निगरानी समिति के सदस्य अधिवक्ता अरविंद शाह का कहना है, ‘प्रशासनिक एजेंसियां खुद ही सूखे तालाबों पर निर्माण कार्यों के लिए लगातार मंजूरी दे रही हैं. उदाहरण के लिए यमुना किनारे के चिल्ला सरोदा तालाब की जमीन पर डीडीए ने ‘बापू नेचर केयर हॉस्पिटल एंड गांधी स्मारक निधि योग आश्रम’ के निर्माण को मंजूरी दे दी है. दरअसल तालाब प्रशासनिक एजेंसियों की प्राथमिकता में ही नहीं हैं.’ पार्क एंड गार्डन सोसाइटी की ओर से जारी आंकड़ों पर नजर डालें तो पाते हैं कि 86 सूख चुके तालाबों के पुनरुत्थान की जगह उन पर पार्क बनवा दिए गए हैं. दीवान सिंह कहते हैं, ‘पार्कों का निर्माण और देखभाल काफी महंगा है, फिर भी इसका निर्माण कराया गया. दूसरी ओर तालाबों की भूमिका को पार्कों से किसी भी तरह प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता. तालाब भू-जलस्तर को कायम रखते हैं, तापमान को नियंत्रित रखते हैं और जैव विविधता को बनाए रखकर शहर को पर्यावरण के लिहाज से जीवंत बनाते हैं. यह सही है कि आज जीवनशैली बदल जाने के कारण रोजमर्रा के जीवन में तालाबों की भूमिका पहले जैसी नहीं है, लेकिन जल संग्रहण से पर्यावरणीय संतुलन के लिए तालाबों की प्रासंगिकता पहले से कहीं ज्यादा अब बढ़ चुकी है’

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बावड़ियों का मिटता नामोनिशान

दिल्ली में 13वीं से 18वीं शताब्दी के बीच विभिन्न शासकों द्वारा बनवाई गईं बावड़ियां उस समय के महत्वपूर्ण जलस्रोत होने के साथ-साथ वास्तुकला के बेहतरीन उदाहरण भी हैं. आदित्य अवस्थी की किताब ‘नीली दिल्ली प्यासी दिल्ली’ में लगभग दो दर्जन बावड़ियों के बारे में बताया गया है. हजार वर्ष से भी पुराने इतिहास वाले दिल्ली शहर में हो सकता है बावड़ियों की संख्या इससे कहीं ज्यादा रही हो. पुरानी दिल्ली में खारी बावड़ी नामक थोक बाजार का नाम बावड़ी के नाम पर ही है लेकिन आज इस बावड़ी का कोई निशान हमें नहीं मिलता.

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हिंदी फिल्मों में शूटिंग स्पॉट के तौर पर कनॉट प्लेस के हेली रोड स्थित अग्रसेन की बावड़ी काफी लोकप्रिय हो गई है लेकिन चारों और ऊंची इमारतों की गहरी नींव ने इस बावड़ी के आंतरिक चैनलों को बंद कर दिया है. वर्तमान में ज्यादातर बावड़ियों का पानी सूख चुका है क्योंकि बावड़ियों को भरने वाले पानी के आतंरिक चैनल शहरीकरण की भेंट चढ़ चुके हैं. मेहरौली स्थित गंधक की बावड़ी दिल्ली की सबसे पुरानी बावड़ी है. लालकिला, पुराना किला, फिरोजशाह कोटला, तुगलकाबाद जैसे सभी प्रमुख किलों में बावड़ियां हैं. महरौली सहित दक्षिणी दिल्ली में दर्जनभर बावड़ियां स्थित हैं. लेखक, फिल्मकार और सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक सोहेल हाशमी बताते हैं, ‘दिल्ली की कुछ बावड़ियां यमुना नदी के पानी पर निर्भर थीं लेकिन अधिकांश बावड़ियां प्राकृतिक झीलों, तालाबों और पोखरों पर निर्भर थीं.’ अनुपम मिश्र का कहना है कि दिल्ली के तालाबों को जीवित करने से ही उन बावड़ियों के जीवित होने की भी संभावना है जिनके आंतरिक चैनल अभी सीमेंटीकरण से बचे हुए हैं.  

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सरकारी एजेंसियां तालाबों को संरक्षित करने के लिए आमतौर पर तालाब के किनारों को सीमेंटीकृत कर रही हैं. पर्यावरणविद इस तरीके पर भी सवाल उठा रहे हैं. दरअसल तालाब के जीवित रहने की जरूरी शर्त उसके आसपास कैचमेंट एरिया का होना है. कैचमेंट एरिया तालाब के पास 40-50 मीटर तक का खाली स्थान होता है जहां से बहकर पानी तालाब तक पहुंचता है. विनोद जैन कहते हैं, ‘डीडीए जैसी संस्थाएं तालाबों को बचाने के लिए जिस नीति पर काम कर रही हैं वह खतरनाक है. तालाबों और झीलों के किनारे पार्क बनाने से वे सूख रहे हैं. वसंत कुंज के पास मसूदपुर गांव का तालाब इसका उदाहरण है जिसके किनारे पार्क बनाने के बाद वह सूख गया. तालाब के किनारे पर पक्का निर्माण करने से भी तालाब सूख रहे हैं.’

एक बड़ी समस्या यह है कि दिल्ली के इन तालाबों का भूस्वामित्व डीडीए, एमसीडी और राजस्व विभाग जैसी विभिन्न प्रशासनिक एजेंसियों के अधीन है. इसलिए इन पर निगरानी का काम कठिन होता है. 2011 में दिल्ली सरकार द्वारा बंगलुरु वाटर बॉडी अथॉरिटी की तर्ज पर दिल्ली वाटर बॉडी अथॉरिटी के गठन का फैसला लिया गया था. हालांकि चार साल बीतने के बावजूद इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है. जहां सरकारी एजेंसियां अपनी नाकामी का ठीकरा स्थानीय लोगों की उदासीनता पर भी फोड़ती रही हैं, वहीं द्वारका इलाके के नागरिकों की सक्रियता का उदाहरण दूसरी ही तस्वीर पेश करता है. 2012 में द्वारका सेक्टर 23 के नजदीक स्थित गांव पोचनपुर के कुछ जागरूक नागरिकों ने पहल करके डीडीए के स्वामित्व वाले 200 साल पुराने तालाब के पुनरुत्थान के लिए प्रयास किया. इसमें डीडीए ने भी सहयोग किया, लेकिन अगले वर्ष डीडीए के एक दूसरे अधिकारी की नियुक्ति के साथ ही तालाब की इस जमीन को पाटने का काम शुरू हो गया. अपनी मेहनत पर यूं मिट्टी पड़ती देख स्थानीय नागरिकों ने तत्कालीन उपराज्यपाल से शिकायत की. 2013 में उपराज्यपाल ने स्थानीय नागरिकों के नेतृत्व में तालाब समिति का गठन किया. समिति की सक्रियता के फलस्वरूप इलाके के दो गांवों पोचनपुर और अमराही के कुल तीन तालाबों को पुनर्जीवित किया गया. दिल्ली विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग के डॉ. शशांक शेखर के नेतृत्व में किए गए अध्ययन में इस इलाके में भू-जलस्तर में पहले की अपेक्षा उल्लेखनीय सुधार आया है.

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दक्षिण पश्चिमी दिल्ली के गांव अमराही में कैचमेंट एरिया पर अवैध कब्जे के चलते सूख चुका तालाब

दीवान सिंह का कहना है कि द्वारका इलाके के कुल 30 तालाबों को पुनर्जीवित करने का काम महीने भर में हो सकता है. तालाबों की देखभाल, खुदाई और उनमें से गाद निकालने का काम हर साल नियमित मानसून से पहले किए जाने की जरूरत होती है, लेकिन स्थानीय निवासियों के पास तालाबों का स्वामित्व नहीं है, न ही किसी प्रकार के अधिकार. इतना ही नहीं अपनी सक्रियता के कारण उन्हें सरकारी एजेंसियों की बदसलूकी का शिकार भी होना पड़ता है. दीवान सिंह बताते हैं, ‘जब शिकायती आवेदनों से बात नहीं बनी तो तालाब पर काम करने की अनुमति के लिए वे तत्कालीन डीडीए इंजीनियर अभय कुमार के दफ्तर गए जहां से उन्हें धक्के देकर निकलवा दिया गया.’ यह उदाहरण तालाबों को लेकर स्थानीय निवासियों की उदासीनता नहीं बल्कि सरकारी एजेंसियों की समझ और मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है, लेकिन सरकारी मशीनरी जवाबदेही के लिए तैयार नहीं. ‘तहलका’ ने हाईकोर्ट द्वारा गठित निगरानी समिति के प्रमुख दिल्ली के मुख्य सचिव से लगातार संपर्क साधने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी.

हाल ही में हाईकोर्ट ने दिल्ली की आबोहवा पर चिंता जाहिर करते हुए शहर को ‘गैस चेंबर’ कहा है. दिल्ली की यूं ही गैस चेंबर बन जाना अचानक नहीं हुआ. प्राकृतिक संसाधनों की अनदेखी करते हुए विकास के सीमेंटीकृत और मोटरीकृत मॉडल को आंख मूंदकर अपनाने के नतीजे महानगरों में घातक रूप से सामने आ रहे हैं. इस सबके बावजूद नागरिक और सरकारी अमले सामूहिक रूप से नहीं चेते तो निश्चित ही हम किसी बड़ी आपदा का इंतजार कर रहे हैं. अनुपम मिश्र के शब्दों में कहा जाए तो ‘हमें प्रकृति की चिंता करने की जरूरत नहीं, वह अपनी चिंता आप कर लेगी. आप प्रकृति का कुछ नहीं बिगाड़ सकते लेकिन आप खुद की चिंता कीजिए, आप खुद को बिगड़ने से बचाइए.’