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फांसी का समाजशास्त्र

ग्राफिक्स : प्रदीप कुमार
ग्राफिक्स : प्रदीप कुमार
ग्राफिक्स : प्रदीप कुमार

आम कहावत है कि कानून सिर्फ गरीबों के लिए होता है. दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की हालिया रिपोर्ट इस मामूली कहावत की तस्दीक करती है जिसमें कहा गया है कि मौत की सजा पाने वाले तीन चौथाई लोग वंचित, सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं. विश्वविद्यालय के ‘सेंटर ऑन डेथ पेनल्टी’ के शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि मौत की सजा पाने वाले तीन चौथाई से अधिक यानी 76 फीसदी दोषी आर्थिक, शैक्षिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े या धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग के हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मौत की सजा सुनाए गए 80 फीसदी से अधिक कैदियों को जेलों में ‘अमानवीय शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है.’ इस रिपोर्ट में उन 385 कैदियों का जिक्र है जो देश की विभिन्न जेलों में बंद हैं और जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई है. यह रिपोर्ट इन कैदियों से और उनके परिजनों से बातचीत के आधार पर तैयार की गई है. भारत सरकार के पास ऐसा कोई विश्वसनीय आंकड़ा नहीं है जिससे यह पता चल सके कि देश में कुल कितने लोग जेलों में बंद हैं जिन्हें फांसी की सजा मिल चुकी है. आजादी के बाद से कितने लोगों को फांसी की सजा हुई और माफ कर दी गई, इसका भी कोई रिकॉर्ड नहीं है.

अध्ययनकर्ताओं ने 385 ऐसे कैदियों की पहचान की जिन्हें फांसी की सजा मिल चुकी है और इनमें से 373 कैदियों और उनके परिजनों से परिजनों से बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है. हाल ही में दो खंडों में जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि फांसी की सजा पाने वाले जितने कैदी जेलों में बंद हैं, उनमें से 80 प्रतिशत ने अपनी स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं की और 18 साल की उम्र से पहले ही काम करने लगे थे. इनमें से 24.5 प्रतिशत आदिवासी और 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदाय से हैं. देश में 12 महिला कैदियों को भी मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है और ये महिला कैदी भी सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखती हैं.

साल 2013 से 2015 के बीच किए इस अध्ययन के मुताबिक, 270 कैदियों में से 216 यानी करीब 80 फीसदी ने स्वीकार किया कि जेल में रहने के दौरान उन्हें बेहद अमानवीय किस्म की प्रताड़ना झेलनी पड़ी. इन कैदियों के साथ सिगरेट से जलाने, नाखूनों में सुई घुसाने, निर्वस्त्र रखने, गुप्तांगों में लोहे की छड़ें या कांच की बोतलें डालने, पेशाब पीने को मजबूर करने जैसे अमानवीय कृत्य किए गए. इसके अलावा पिटाई और अन्य कई निर्मम किस्म के व्यवहार उन्हें झेलने पड़े जो मानवीय गरिमा के विरुद्ध हैं.

अमीर और गरीब में एक खाई जरूर है क्योंकि अमीरों को ​बढ़िया वकील मिल जाते हैं और गरीबों को बहुत ही नौसिखिए वकील मिलते हैं. वकील नहीं मिलते, ऐसा नहीं है. लेकिन सक्षम वकील नहीं मिलते हैं. उनको नए वकील या कम सक्षम वकील मिल जाते हैं, जिनकी प्रैक्टिस उतनी अच्छी नहीं है, या कुछ अनुबंध वाले लोग चुन लिए जाते हैं

रिपोर्ट के अनुसार, फांसी की सजा पाने वाले 44 प्रतिशत दोषियों को यह भी नहीं मालूम है कि सुप्रीम कोर्ट में उनका मुकदमा लड़ने वाले वकील का नाम क्या है. कुल सजायाफ्ता कैदियों में से 54.5 प्रतिशत कैदी ऐसे हैं जिनको फांसी की सजा सुनाने के लिए चली मुकदमे की कार्यवाही समझ में नहीं आई. 78.3 ने कहा कि उनसे ‘जबरदस्ती इकबालिया बयान’ लिया गया और उसी के आधार पर उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई. 97 प्रतिशत का कहना है कि जब पुलिस ने उनसे पूछताछ की तो उनके साथ कोई वकील नहीं था.

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद हमारी न्याय व्यवस्था की तमाम विसंगतियां सामने आई हैं. रिपोर्ट कहती है कि सन 2000 से 2015 के बीच निचली अदालतों ने जितनी भी फांसी की सजा दी, उनमें से पांच प्रतिशत से भी कम सजाओं को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा. मौत सजा के कुछ 1486 मामलों में से 73 ही सुप्रीम कोर्ट में टिक सके.

सर्वे के मुताबिक, 276 में 21 (7.6 प्रतिशत) कैदी ऐसे हैं जिनका पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड रहा है. इनमें से 18 (5.8 प्रतिशत) कैदी ऐसे हैं जो अपराध के समय 18 वर्ष से कम उम्र के थे, जबकि 54 (17 प्रतिशत) ऐसे हैं जो अपराध के समय 18 से 21 वर्ष के बीच की उम्र के थे. हत्या एवं हत्या व बलात्कार के आरोप में 297 दोषियों को मौत की सजा मिली है जबकि आतंकवाद के आरोप में 31 को दोषी पाया गया है.

गुजरात में 79 प्रतिशत (12 प्रतिशत) फांसी की सजा पाए व्यक्ति अल्पसंख्यक समुदाय से हैं, जबकि राज्य में उनकी कुल आबादी 12 प्रतिशत है. महाराष्ट्र में 50 (18 प्रतिशत) कैदियों को फांसी की सजा मिली है जो आदिवासी और दलित समुदाय से हैं. राज्य में इनकी कुल आबादी 20 प्रतिशत है. केरल में 93 प्रतिशत (14 कैदी) आर्थिक रूप से वंचित तब​के से हैं. 64 प्रतिशत कैदी प्राइवेट वकील करते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचने तक यह आंकड़ा मात्र 30 प्रतिशत रह जाता है. 70 प्रतिशत दोषियों का मानना है कि निचली अदालतों में उनके वकील उनसे या परिवारवालों से केस के बारे में विस्तार से बातचीत नहीं करते. प्राइवेट वकील की सेवा लेने के चलते ज्यादातर अपनी जायदाद बेच देते हैं. हाई कोर्ट में केस के दौरान 68.4 प्रतिशत दोषियों के वकीलों ने उनसे कभी बात नहीं की. 90 प्रतिशत कैदियों ने माना कि जब वे पहली बार मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए गए तो उनके साथ कोई वकील नहीं था.

Infographics by : National Law University's Report
Infographics by : National Law University’s Report

रिपोर्ट जारी होने के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मदन बी. लोकुर ने कहा, ‘हमारी न्याय व्यवस्था में गंभीर खामिया हैं. इसमें न सिर्फ प्रक्रियात्मक, बल्कि आमूल सुधार की जरूरत है. कानूनी सहायता भारत में एक मजाक के सिवा और कुछ नहीं है. इसमें किसी का भरोसा नहीं है. अगर आरोपी अशिक्षित है तो उसके बचाव पर इसका प्रभाव पड़ता है.’

ज्यादातर गरीब और वंचित समुदाय के लोगों को फांसी क्यों होती है, इसे निठारी कांड पर निगाह डालकर समझा जा सकता है. निठारी कांड के मामले में जब सुरेंद्र कोली को फांसी हुई तो ​प्रमुख महिला संगठनों की कुछ महिलाओं ने राष्ट्रपति से अपील की कि कोली को फांसी को तब तक रोका जाए, जब तक अन्य आरोपियों की भूमिका साफ नहीं हो जाती. अपीलकर्ता महिलाओं में उमा चक्रवर्ती, कविता कृष्णन, वाणी सुब्रह्मण्यम, रेबेका जॉन, वृंदा ग्रोवर, मैरी ई. जॉन, आयशा किदवई, रोहिणी हेंसमैन, लक्ष्मी मूर्ति, अमृता नंदी आदि शामिल थीं.

इस अपील में कहा गया, ‘ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि कोली ही वास्तव में 18 औरतों व बच्चों का हत्यारा था. कोली की ‘आत्मस्वीकृति’- उसे दंडित करने का एकमात्र आधार- स्वयं ही घोषित करती है कि इसे मारपीट कर (टाॅर्चर) और पुलिस द्वारा रटा कर हासिल किया गया था. बच्चों के निठारी से असामान्य तौर पर गायब होने की परिघटना 2003 से ही जारी थी- कोली के पंढेर के घर में 2004 में घरेलू नौकर के तौर पर आने के पहले से. और वह परिघटना कोली के गिरफ्तार होने और दंडित किए जाने के बाद भी जारी है. ऑटोप्सी सर्जन, जिसने कि शवों का परिक्षण किए, ने नरभक्षण की बात को गलत बताया है और मानव अंगों के व्यापार को इन हत्याओं का कारण होने की ओर इशारा किया है. महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा नियुक्त कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि पुलिस कोली को दोषी मान कर चली और उसने मानव अंगों के व्यापार की संभावना की जांच ही नहीं की. ऑटोप्सी सर्जन ने कमेटी के सामने कहा था कि मानव शरीरों को सर्जरी के औजारों से काटा गया है. वकीलों का कहना है कि पुलिस ने ऑटोप्सी सर्जन के साक्ष्य को ही दबा दिया. मुकदमे के दौरान उससे एक गवाह की तरह न तो कोई पूछताछ की गई न ही चार्जशीट में उसके मत को ही शामिल किया गया. एक डॉक्टर पर मानव अंगों के व्यापार का आरोप लगा था, उसकी पुलिस ने जांच ही नहीं की. कोली ने अपने कथित बयान में कहा था कि उसने अपने मालिक के ड्राॅइंग रूम में 16 व्यक्तियों की हत्या की लेकिन डीएनए के साक्ष्यों के हिसाब से 19 लोगों के शरीर के हिस्से वहां मिले. उनमें से 11 की शिनाख्त नहीं हो पाई. स्पष्ट है कि उन हत्याओं की कहानी में कई झोल हैं और कोली की आत्मस्वीकृति सारे तथ्यों के साथ मेल नहीं खाती है. इस ओर इशारा करना प्रासंगिक होगा कि कोली दलित व गरीब है और उसे बहुत ही सस्ती कानूनी मदद मिली. मीडिया और पुलिस द्वारा उसे नरभक्षी और हत्यारा बनाकर प्रस्तुत किया गया और उसे चुनौती देने के लायक ही नहीं छोड़ा. कोली का उदाहरण इस बात को रेखांकित करता है कि किस तरह से अधिकतर मामलों में आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर लोगों को मृत्युदंड मिलता है, क्योंकि वे जनमत को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होते.’

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अधिवक्ता मोहम्मद शोएब कहते हैं, ‘न्याय प्रणाली पर तो सवाल उठता ही है, इसके अलावा शासन व्यवस्था भी ऐसे लोगों को ही टारगेट करती है. विधायिका कानून ही ऐसे बनाती है, सारे कानून अमीरों और पूंजीपतियों की सुरक्षा के लिए बनाए जाते हैं. सवर्ण या अमीर लोग अपराध में शामिल होते हैं, दलितों से ज्यादा होते हैं. लेकिन हर स्तर पर- पुलिस में, शासन में उनकी पकड़ ज्यादा होती है, न्याय व्यवस्था में भी उनकी पकड़ ज्यादा होती है. वे असर डाल पाने की स्थिति में होते हैं, इसलिए उनको सजा नहीं हो पाती. ये भी है कि हर स्तर पर, चाहे शासन हो, पुलिस हो या न्याय व्यवस्था हो, सबमें वर्चस्व सवर्णों का ही रहता है. वहां पर जो दलित या पिछड़े जाते हैं, वे दबाव में काम करते हैं. जो दबाव समाज में बना हुआ है, वह वहां भी काम करता है. इसलिए वे भी न्याय सही तरीके से नहीं दे पाते. सवर्ण या अमीर लॉबी से टकराना बहुत कठिन हो, ऐसा नहीं है. यह आसान काम है, लेकिन हिम्मत चाहिए. दूसरे, दलित हमारे समाज में हर तरह से दलित है. उसे सामाजिक न्याय नहीं मिलता, आर्थिक न्याय नहीं मिलता, इसलिए उसे कानूनी न्याय भी नहीं मिलता.’

अधिवक्ता कमलेश जैन इससे ​थोड़ी अलग राय रखती हैं. वे कहती हैं, ‘यह बहुत ही जटिल मसला है. जैसा कहा जा रहा है वैसा भी नहीं होता. इन मामलों में बहुत सारे पहलू काम करते हैं. क्रिमिनल जस्टिल सिस्टम को आप गहराई से देखेंगे तो चीजें ज्यादा समझ में आएंगी. अमीर और गरीब में एक खाई जरूर है क्योंकि अमीरों को ​बढ़िया वकील मिल जाते हैं और गरीबों को बहुत ही नौसिखिए वकील मिलते हैं. वकील नहीं मिलते, ऐसा नहीं है. लेकिन सक्षम वकील नहीं मिलते हैं. उनको नए वकील या कम सक्षम वकील मिल जाते हैं, जिनकी प्रैक्टिस उतनी अच्छी नहीं है, या कुछ अनुबंध वाले लोग चुन लिए जाते हैं. दूसरी बात है कि कभी-कभी जजों में भी खामियां होती हैं. कौन से जज के ​यहां केस पहुंचता है. उसे क्रिमिनल लॉ की कितनी समझ है. तीसरी बात है कि इसके अलावा अमीर-गरीब के बीच मामला होने पर गवाह कितने टिक पाते हैं. जो दबंग लोग हैं वे धमकियां देते हैं. एक केस मैं देख रही हूं जिसमें सुनवाई के बाद कोर्ट के बाहर ही आरोपी ने धमकी दी. तो अपने देश में चीजें बहुत जटिल हैं. जाति या धर्म के आधार पर तो मैं नहीं कहूंगी, लेकिन जज के दिमाग में भी यह बात असर डालती है कि आरोपी कौन-सा काम करता है. अगर वह गार्ड है, घरेलू नौकर है, या कोई ऐसा काम करता है कि सुरक्षा ही उसकी ड्यूटी थी, लेकिन उसने उलट काम किया तो यह चीजें बुरा प्रभाव डालती हैं. धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी, वह गार्ड था. चीजें बहुत महीन ढंग से काम करती हैं.’

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दुनिया भर में फांसी की सजा में बढ़ाेतरी

दुनिया भर में फांसी की सजा में आई नाटकीय बढ़ोतरी के बीच यह भी बहस जारी है कि फांसी की सजा दी जाए या खत्म कर दी जाए. एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट कहती है कि पिछले साल दुनिया भर में मौत की सजा में खौफनाक इजाफा हुआ है. 2015 में ईरान, पाकिस्तान और सऊदी अरब में सबसे ज्यादा मौत की सजाएं दी गईं, जो वैश्विक आंकड़ों का 89 प्रतिशत है. 2014 में दुनिया भर में 1061 और 2015 में 1634 लोगों को फांसी दी गई. यह संख्या 1989 के बाद सबसे ज्यादा है. हालांकि, 2015 में ही फिजी, मेडागास्कर, रिपब्लिक ऑफ कांगो और सूरीनाम ने अपने यहां फांसी की सजा को समाप्त कर दिया है. अब तक दुनिया भर में 140 ऐसे देश हैं जहां पर फांसी की सजा या मृत्युदंड समाप्त कर दिया गया है, जबकि एशियाई देशों में फांसी की सजा में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, चीन दुनिया भर में सबसे ज्यादा फांसी देने वाला देश है, लेकिन गोपनीयता के कारण आंकड़े सामने नहीं आते.[/symple_box]

दूसरी ओर अधिवक्ता पवन दुग्गल कहते हैं, ‘हमारा सिस्टम संविधान पर आधारित है और संविधान सभी को समानता का अधिकार देता है. लेकिन कहीं न कहीं आर्थिक स्थितियां असर डालती हैं. अगर आप निचले तबके आते हैं तो आपके जीवन में रोटी, कपड़ा, मकान जैसे बुनियादी संघर्ष होते हैं. इसी के क्रम में कई बार आपराधिक घटनाएं भी होती हैं. अधिकांशत: लोगों के पास इतनी क्षमता भी नहीं होती कि वे अपने आपको कानूनी लड़ाई में बचा सकें, वे कानूनी सलाह नहीं ले पाते. निचले वर्ग में पैसे की कमी तो है ही, जागरूकता की भी कमी है. बहुत बार लोग ऐसे काम कर जाते हैं जो उन्हें लगता है कि ये तो साधारण बात है. बिना जानते हुए कि ये कानून का उल्लंघन है. हालांकि आप कानून से अनभिज्ञ हैं तो भी वह आप पर लागू होता है.’

न्यायपालिका के बारे में लोगों की धारणाएं भी कम समझ के आधार पर बन जाती हैं, इसे समझाते हुए कमलेश जैन कहती हैं, ‘अफजल गुरु के केस में इतना बड़ा जजमेंट मैंने बहुत बारीकी से पढ़ा तो पाया कि उसमें परिस्थितिजन्य साक्ष्य वगैरह बहुत पक्के थे. जबकि उसके सिर्फ एक पैराग्राफ को लेकर लोगों ने बड़ा बवाल मचाया. मेरा यह कहना है कि क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की जिसे अच्छे से पहचान है, वही इसे समझ सकता है. यह जरूर है कि हमारे समाज में कमजोर के प्रति, गरीबों के प्रति पूर्वाग्रह है. बाहर का पूरा समाज जैसा रहता है, पूरा न्यायिक तंत्र भी वैसे ही रहता है. तो मेरा कहना है कि गरीब या कमजोर होने का फर्क तो पड़ता है, लेकिन यह नहीं कह सकते कि पूरी तरह तंत्र खराब हो चुका है.’

फांसी की सजा के 95 प्रतिशत मामले सुप्रीम कोर्ट में नहीं टिकने या उम्रकैद में तब्दील हो जाने को लेकर पवन दुग्गल कहते हैं, ‘फांसी अल्टीमेट सजा है. उच्चतम न्यायालय कहता है कि जब तक कोई मामला दुर्लभतम न हो, रेयरेस्ट आॅफ रेयर न हो, तब तक फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए. जिन मुकदमों में सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि यहां फांसी की जगह आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है, तो वह देता है. सजा देने का उद्देश्य यह नहीं है कि आप ऐसी सजा दें कि दोषी का जीवन ही खत्म हो जाए. बल्कि ऐसी सजा दें कि उसे पश्चाताप हो और उसे सुधरने का मौका मिले. मरने के बाद यह संभावना खत्म हो जाती है. फांसी दुर्लभ से दुर्लभ मामलों में ही दी जा सकती है. दूसरी बात, सुप्रीम कोर्ट के पास जितने विशेषाधिकार हैं, वह दूसरी अदालतों के पास नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट अंतिम न्यायालय है. उसके बाद कोई न्यायालय नहीं है. सुप्रीम कोर्ट हर फैसले में इस बात का भी ध्यान रखता है. निचली अदालत कानून जैसा बोलता है, उसे ही फॉलो करती है, पर सुप्रीम कोर्ट उसकी समीक्षा भी करता है और नई व्याख्याएं भी देता है.’

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फांसी पाने वाले लोगों में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों की संख्या ज्यादा होने को लेकर समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार कहते हैं, ‘इसके सामाजिक पहलू हैं. वो ये कि बद अच्छा बदनाम बुरा, ये जो कलंकीकरण है समाज का, इसके चलते दलित-पिछड़े समुदाय के छोटे-मोटे अपराध को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. इसको सही ठहराने के लिए बहुत बार कहा जाता है कि अरे ये तो ऐसा है, ऐसा ही रहेगा. इस तरह एक समुदाय के कलंकीकरण को इस तरह सही भी ठहराया जाता है. दूसरी बात उनके पास अपने को बचाने का मैकेनिज्म नहीं है. आप सोचिए कि निठारी कांड में पंढेर कैसे बच जाता है जो कोली के माध्यम ये काम कर रहा था? कोली को सजा हुई लेकिन पंढेर बाहर हो गया. आपको मालूम है कि भंवरी देवी के केस में क्या हुआ था? जजों ने निर्णय दिया कि ऊपरी जाति के लोग अपने बच्चों के सामने रेप जैसा अपराध कर ही नहीं कर सकते.’

आर्थिक अपराध का उदाहरण देते हुए विवेक कुमार कहते हैं, ‘जो एनपीए यानी नॉन परफार्मिंग एेसेट्स एक लाख चौदह हजार करोड़ रुपये का है. इनमें से कौन दलित है? फिर आप कैसे कहते हैं कि दलित ही चोर होते हैं? भारतीय समाज में जजों की क्या ट्रेनिंग है? भारतीय समाज के अनुरूप कौन सा कोर्स है जिसको पढ़ाकर उनको संवेदनशील बनाया जाता हो? जब तक आप यह नहीं करेंगे तब तक कानून की सीरत और सूरत दोनों नहीं सुधरेगी. समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह थ्योरी बहुत पुरानी है कि सफेदपोश अपराध को कभी अपराध नहीं माना जाता. ब्लू कॉलर वर्कर का अपराध हमेशा अपराध होता है.’

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 1951 में स्पष्ट किया था कि मजिस्ट्रेट को अभियुक्त से ‘उचित’ पूछताछ के बाद ही उसके बयान को सबूत के तौर पर दर्ज करना चाहिए. तारा सिंह बनाम राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के धारा 313 का मूल मकसद ‘अभियुक्त को अपने ऊपर लगाए गए आरोपों की सफाई देने के लिए निष्पक्ष और उचित मौका उपलब्ध कराना है.’ हालांकि, कई मजिस्ट्रेट अभियुक्तों के इस बुनियादी अधिकार की अनेदखी करते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में अपने एक फैसले में कहा था कि सिर्फ दुर्लभतम (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) मामलों में ही फांसी की सजा दी जा सकती है. क्रूरतम हत्या, हत्या के साथ डकैती, बच्चे को खुदकुशी के लिए उकसाने, राष्ट्र के खिलाफ युद्ध भड़काने और सशस्त्र बल के किसी सदस्य द्वारा विद्रोह करने की स्थिति में भारत में फांसी दी जा सकती है. 1989 में इस नियम को बदला गया और इसमें नशीली दवाइयों का कारोबार करने वालों के लिए भी फांसी की सजा तय कर दी गई. कुछ समय पहले आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने वाले व्यक्तियों को भी फांसी की सजा देने का फैसला किया गया.

‘ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि कोली ही 18 औरतों व बच्चों का हत्यारा था. कोली की आत्मस्वीकृति- उसे दंडित करने का एकमात्र आधार- स्वयं ही घोषित करती है कि इसे टाॅर्चर और पुलिस द्वारा रटा कर हासिल किया गया था. बच्चों के निठारी से गायब होने की घटना 2003 से ही जारी थी- कोली के पंढेर के घर में 2004 में घरेलू नौकर के तौर पर आने के पहले से’

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो 2004 से 2013 के बीच भारत में 1,303 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन इस अवधि में सिर्फ तीन लोगों को ही फांसी दी गई. 14 अगस्त, 2004 को धनंजय चटर्जी, 21 नवंबर, 2012 को अजमल कसाब और 9 फरवरी, 2013 को अफजल गुरु को. इसके उलट इस दौरान 3751 लोगों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया. इसके बाद एकमात्र फांसी मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में 30 जुलाई, 2015 को याकूब मेमन को दी गई. धनंजय चटर्जी से पहले 1995 में सीरियल किलर शंकर को सेलम में फांसी दी गई थी. इन दस सालों में सबसे ज्यादा 318 फांसी की सजा उत्तर प्रदेश में दी गई. महाराष्ट्र 108, कर्नाटक 107, बिहार 105 और मध्य प्रदेश में 104 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई. 57 प्रतिशत फांसी के मामले इन्हीं पांच राज्यों से थे. एमनेस्टी इंटरनेशल के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 2007 में 100, 2006 में 40, 2005 में 77, 2002 में 23 और 2001 में 33 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई लेकिन किसी भी दोषी को फांसी पर लटकाया नहीं गया. देश आजाद होने के बाद भारत में पहली फांसी नाथूराम गोडसे को दी गई थी. तबसे अब तक सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में कुल 57 लोगों को फांसी दी जा चुकी है. सबसे अंतिम फांसी याकूब मेमन को दी गई. भारत में फांसी की सजा पाने वाला याकूब 57वां अपराधी था.

फांसी की सजा को खत्म करने के लिए भारत में समय-समय पर आवाज उठती रही है. कई न्यायाधीश से लेकर सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता इस बात के पक्षधर हैं कि फांसी की सजा को खत्म कर दिया जाना चाहिए ​क्योंकि इसके अब तक कोई सबूत नहीं हैं कि फांसी देने से अपराध में कमी आती है या अपराधियों की मानसिकता पर कोई फर्क पड़ता है. इसके उलट फांसी मानवीय गरिमा के खिलाफ है जो व्यक्ति से सुधरने या उसके जीवन के अधिकार को छीन लेती है.

पूर्व न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर लिखते हैं, ‘फांसी की सजा वह उद्देश्य पूरा नहीं करती, जिसके लिए इस सजा का प्रावधान किया गया है. वैसे भी, सभ्य समाज में सजा की संकल्पना अपराधियों को सुधारने के लिए की गई है, उन्हें मौत की नींद सुलाने के लिए नहीं. अगर हम उनकी जान लेने लगे, तो एक राष्ट्र के तौर पर हममें और आतंकवादी में भला क्या अंतर रह जाएगा? मृत्युदंड का प्रावधान भारतीय दंड संहिता में साल 1861 में किया गया था. 1931 में बिहार विधानमंडल में एक विधायक ने इसकी समाप्ति को लेकर विधेयक पेश करने की कोशिश की थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सके. अलबत्ता मृत्युदंड के पक्ष में आवाज दिनोंदिन मजबूत ही होती गई. आजादी के बाद जब केंद्र सरकार ने राज्यों से इस मामले में अपनी राय जाहिर करने को कहा, तब उनमें से ज्यादातर राज्य सरकारों ने इस सजा का पक्ष लिया. इन्हीं सब कारणों से विधि आयोग ने 1967 में अपनी 35वीं रिपोर्ट में मौत की सजा को बरकरार रखा और माना कि यह अपराध को हतोत्साहित करने में कारगर होगा. मगर सच तो यह है कि ऐसे कोई ठोस आंकड़े नहीं हैं, जो यह साबित करते हों कि फांसी की सजा से वाकई अपराध के खिलाफ माहौल बनता है. अगर कोई व्यक्ति समाज के लिए खतरा है, तो उसे निश्चय ही सजा मिलनी चाहिए. मगर फांसी देने से बेहतर है कि उसे पूरी उम्र जेल में रखा जाए. आजीवन कारावास की सजा तो मौत से कहीं ज्यादा कष्टदायक होती है.’

लोग पत्रकारों को गाली दे रहे हैं, अगर समाज इसे मान्यता देता है तो मैं उसे माला पहनाना चाहता हूं: रवीश

Ravish

मेरा तो मानना है कि ये संगठित तरीका है और ये हर स्तर पर हो रहा है. देश में पार्टी के कार्यकर्ता कहीं भी हो सकते हैं, वहां से ये शुरू हो जाते हैं. तरह-तरह के वाट्स ऐप ग्रुप बने हुए हैं. वहां से इन बातों को फैलाया जाता है. मेरे ही बारे में इतनी सारी बातें घर तक पहुंचती हैं तो वे हैरान हो जाते हैं कि ये सब करता कब है. एक ग्रुप ने ये फैला दिया कि मेरे घर पर एक मीटिंग हुई है और मैंने विरोध की एक योजना बनाई है. तो घरवाले हैरान रह जाते हैं कि ये तो अपने घर में किसी को घुसने नहीं देता तो दूसरे को कैसे बुलाता है. हमारे रिश्तेदार तो इसी बात से दुखी रहते हैं कि ये किसी को घर में नहीं आने देता. मामला यहां तक पहुंच गया है कि गांव-देहात तक इन चीजों को फैला दिया गया है. जिन लोगों को अफवाहों पर विश्वास करना है, ये उनकी अपनी जिम्मेदारी है. वे अफवाहों पर खूब विश्वास करें. लेकिन ये एक रणनीति के तहत है कि आपको बदनाम कर दिया जाए. आपको गाली देकर आपका मनोबल तोड़ दिया जाए. पूरी एक टोली बनी हुई है और ये ‘​रीयल लोग’ हैं. ‘अनरीयल लोग’ नहीं हैं. ‘रीयल लोग’ में कोई भी हो सकता है. या तो आईटी सेल के लोग हो सकते हैं, या तो सपोर्टर हो सकते हैं. जो एक्टिव सपोर्टर हैं वो तो एक तरह से राजनीतिक व्यक्ति ही हो जाते हैं. पूरी कोशिश चल रही है कि जो विरोध है या जो भी लगता है कि वह सवाल कर सकता है तो उसको चुप करा दो.

मीडिया तो अब मीडिया रहा नहीं. टीवी मीडिया सोशल मीडिया का काउंटर हो गया है. वो बॉक्स आॅफिस काउंटर है. वहां से कुछ आ रहा है तो ये होता है कि फीड आ रही है, यही करो. वह जैसी भीड़ देखता है, वैसा ही करने लगता है. मीडिया तो जो कर रहा है, आप देख ही रहे हैं. कितने लोगों ने मुझे गाली दी कि नीतीश कुमार आपको राज्यसभा में भेज देंगे. मैं चाहता हूं कि और लोग राज्यसभा में जाएं ताकि मुझे गाली कम पड़े. मैं मनाता हूं कि एक नहीं, बीस पत्रकार राज्यसभा में भेज दिए जाएं ताकि जितने गाली देने वाले लोग हैं वो कन्फ्यूज हो जाएं कि अब किसको गाली देनी है. मैंने बाकायदा लेख भी लिखा है और जान-बूझकर लिखा है कि कुछ दिन के लिए गाली देने वालों का ध्यान तारीफ करने में चला जाए. जिनको राज्यसभा सीट मिल गई है आप उनकी तारीफ कीजिए. जिनको नहीं मिली, उनको कब तक गाली देंगे आप.

तो पूरी फौज खड़ी कर दी गई है जो एक खास तरह के लोग हैं और जो एक खास तरह के लोगों पर बोलते हैं. अब इसमें जनता को तय करना है कि उसे खराब मीडिया चाहिए तो उसे मुबारक हो. अगर जनता को चाटुकार मीडिया चाहिए, ये उसकी जिम्मेदारी है. हमारा कोई लोड नहीं है. पत्रकार जो बहुत दिनों से लोड लेकर घूम रहे हैं, उसे भी ये लोड नहीं लेना चाहिए. उससे पूछना चाहिए कि भाई जो तुम अखबार खरीदते हो, जो केबल खरीदते हो, अगर आपको लगता है कि इसमें सब जानकारी मिल रही है, एक ही तरह की जानकारी आपको हमेशा चाहिए तो मुबारक हो. फिर ये मत करो कि ताली कहीं और बजाओ और समस्या में फंस जाओ तो मुझे फोन करो कि ये वाली स्टोरी आपने उठाई नहीं तो कौन करेगा. समाज से भी पूछा जाना चाहिए.

अब जब कोई अफवाह फैलती है तो जब तक आप उसका खंडन करेंगे, तब तक वाट्स ऐप ग्रुप से लेकर फेसबुक तक इतना फैल चुका होता है, फिर वो कोई पढ़ता थोड़े ही है? जो खंडन वाला होता है उसको तो दो-चार स्टेकहोल्डर लोग, हमीं लोग पढ़ते हैं कि अरे ये खबर गलत है, चला दिया लोगों ने तो चला दिया. नहीं भी चलाया तो कोई बात नहीं.

क्या सचमुच ऐसा युग आ गया है कि आलोचना लायक कुछ बचा ही नहीं? अगर आलोचना नहीं हो तो वह सबसे नकारात्मक है. ये जो दुकानदारी चल रही है- निगेटिविटी पॉजिटिविटी की, ये वही है कि जो हम बता रहे वही सच है

All Images : naisadak.org
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ये अब रोज हो रहा है. इसका कारण है कि रिपोर्टिंग हो नहीं रही है. रिपोर्टर हैं नहीं. सोशल मीडिया रिपोर्टर का रिप्लेसमेंट हो गया है. रिपोर्टर होता है तो अपनी खबर लाता है. कम से कम भले ही उसकी खबर गलत हो, तो भी एक आदमी जिम्मेदारी लेता है कि हमने चलाई है. सोशल मीडिया में आप किसको पकड़ेंगे? बाकी लोगों ने सोशल मीडिया के कमेंट को, जानकारियों को मान लिया है कि यही हमारे नए रिपोर्टर हैं. उसका क्या किया जा सकता है. सबको पता है गलतियां हो रही हैं. तरह-तरह झूठ के फैलाए जा रहे हैं. जिससे फायदा होता है, उस पर आप नहीं बोलते. नुकसान होता है तो आप केस करने चले जाते हैं. राजनीतिक दलों को देखिए, दूसरों के खिलाफ कितना प्रपंच फैला रहे हैं. अपने खिलाफ कोई कुछ बोल देता है ​तो केस कर देते हैं. 

अब आप बताइए कि गालियां देने वाले इतने लोग कहां से आ गए. क्या भारत में गालियों का प्रचलन बढ़ गया है अचानक? इतना विकास हो रहा है, इतनी अच्छी चीजें हो रही हैं, जैसा लोग बता रहे हैं तो गालियां क्यों बढ़ रही हैं? क्या बहुत अच्छी चीजें होंगी तो गालियां बढ़ जाएंगी? फिर तो वो अच्छी चीजें नहीं होनी चाहिए. हम तो डर गए हैं. इतनी सारी अच्छी चीजें हो रही हैं, लोग दावा कर रहे हैं तो गालियां क्यों बढ़ रही हैं? क्या मां-बाप बच्चों को सिखा रहे हैं कि आओ तुम गाली दो? मुझे भी दो, दूसरों को भी दो. क्या ऐसा बदल गया है हमारा समाज? मुझे मालूम नहीं कि समाज बदला है कि नहीं. ये संगठित रूप से है. आम तौर पर लोग ऐसी भाषा में बात नहीं करते. आपसे संतुष्ट नहीं होते, बहुत-सा काम पसंद नहीं आता. लेकिन कभी वो गलत भाषा में बात नहीं करता. तो निश्चित रूप से गाली देने वाला समर्थक होता है और सक्रिय समर्थक होता है जो अपने आपको आम आदमी बनाकर कुछ भी कर जाता है. जो रीयल आम आदमी है वो कभी भी ऐसी अभद्र भाषा में बात नहीं करता. वो किसके दम पर करेगा? वो किसी को जानता नहीं, वो मारपीट करेगा तो पता नहीं क्या होगा. ये नए तरह के बाहुबली हैं जो सोशल बाहुबली कहलाए जा रहे हैं.

मालदा में घटना हो गई. मैं छुट्टी पर था. मैंने न टीवी देखा था न अखबार देखा था. पता चला कि सोशल मीडिया पर फोटो लगाकर चलता है कि रवीश कुमार हंड्रेड परसेंट रंडी की औलाद है. इसका मतलब ये संगठित हैं न! क्या ये कहीं लिखा है कि भारत की सभी दिशाओं को मैं ही कवर करूंगा? तब तो मैं रोज एक हजार पेज का अखबार बनकर छपने लगंू! क्या संभव है ये? पूछते हैं कि आप वहां गए थे, यहां क्यों नहीं गए. अरे भाई, हम तो पहले से ही बहुत जगह नहीं जा रहे थे. जहां जा सकते हैं, वहीं जाते हैं. क्या एक पत्रकार सब जगह जा सकता है? हम हनुमान जी हैं कोई कि उड़कर हर जगह पहुंच जाएंगे? तो जब हमने देखा कि सब इस तरह गाली दे रहे हैं तो हमने लिखा कि मैं हंड्रेड परसेंट भारत माता की औलाद हूं. 

जो नौजवान किसी पार्टी के लिए ऐसा कर रहे हैं, कम से कम उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है. वे चाहे किसी दल के समर्थक हों. वो अपने दल के भीतर बदमाश के रूप में ही पहचाने जाएंगे. अगर वे इस छवि के साथ किसी राजनीतिक दल में अपना जीवन लगाना चाहते हैं तो मेरी शुभकामनाएं! लेकिन क्या जब वे पचास साल के हो जाएंगे तब भी गाली देने के काम में लगे रहेंगे? अभी नौजवान हैं तो गाली दे रहे हैं, पर क्या वे जीवन भर गाली ही देंगे? बच्चे पूछेंगे क्या करते हो तो कहेंगे कि मैं गाली देता हूं. दो-चार पत्रकार हैं उनको गाली देता रहता हूं! हम फलां पार्टी की ओर से उनको मां-बहन की गालियां देते रहते हैं. अगर यही लक्ष्य है तो अच्छी बात है, गालियां ही दीजिए.

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अब इसका क्या करें कि कभी छुट्टी पर हैं, घर पर हैं, अस्पताल में हैं. गाली देने लगते हैं लोग कि आप वहां नहीं गए. रवीश कुमार ने फलां स्टोरी नहीं की. बहुत जगह नहीं की. बहुत जगह संसाधन ही नहीं. बहुत जगह नहीं कर पाए. केरल आज तक नहीं जा पाए. हिमाचल नहीं गए. तो क्या हम, हम नहीं रहेंगे? क्या हम पूरा विश्व घूम आएंगे, स्टोरी कर लाएंगे तब हम पत्रकार कहलाएंगे? वह भी निष्पक्ष? और कहने वाले कौन लोग हैं? सबसे ज्यादा तटस्थ वही लोग हैं क्या? वे तो पार्टी के लिए ऐसा कर रहे हैं. ये जितने लोग पत्रकारों को गाली दे रहे हैं, उनको देखिए तो वे तटस्थ लोग थोड़े ही हैं! वे गुंडे लोग हैं. उनकी टाइमलाइन देखिए तो वे खास तरह की ही बात करते हैं और उसी के लिए गाली देते रहते हैं. अगर हमारा समाज ऐसी प्रवृत्ति को मान्यता देता है तो मैं इस समाज को माला पहनाना चाहता हूं. बस यही बताऊंगा कि किसी दिन यही भीड़ उसके खिलाफ भी आएगी. कई दफा आई भी है. आज उनको मजा आ रहा है कि इसको गाली पड़ रही है.

मैं देखना चाहता हूं कि जीडीपी की ग्रोथ इतनी बढ़ गई है तो गालियों की ग्रोथ इतनी कैसे बढ़ गई? सुबह से लेकर शाम तक खूब गाली दी जा रही है. मुझे लगता है ये भी ‘स्किल इंडिया’ का प्रोजेक्ट हो सकता है. वे गाली दे सकते हैं. बहुत सारे राजनीतिक दल के लोग समर्थकों से गाली दिलवा रहे हैं पैसा देकर. तो इसे एक स्किल का रूप दे दिया जाए.

मुझे पता नहीं है कि मीडिया का कोई सांस्थानिक स्वरूप है कि नहीं. मैं ऐसा नहीं मानता कि मीडिया का कोई सांस्थानिक स्वरूप होता है. बस चल रहा है तरल पदार्थ की तरह तो ठीक है. कोई सांस्थानिक स्वरूप नहीं मिलता. दो-चार लोगों का स्वरूप होता है वही अपने आप में संस्थान हो जाते हैं. मीडिया का कोई सांस्थानिक स्वरूप नहीं होता. हमने तो नहीं देखा.

विश्वसनीयता एक ऐसी चीज है कि जिस पर कभी असर नहीं पड़ता. इस पर असर पड़ने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता. इतने अविश्वसनीय लोग हैं और जनता का समर्थन लेकर राज करते हैं, विश्वसनीयता ले लेते हैं. ये बड़ी सापेक्षिक चीज है. एक जगह गंवाकर आप दूसरी जगह हासिल कर सकते हैं. इसको भी आपको थोड़ा रिलेटिवली देखना पड़ेगा कि क्या है विश्व​सनीयता. क्या किसी के चले जाने से लोग टीवी देखना बंद कर देते हैं? अखबार पढ़ना बंद कर देते हैं? लोग जानते हैं कि फलां अखबार में किसी एक की आलोचना कभी नहीं छपती, फिर वे वह अखबार कैसे पढ़ लेते हैं? क्या सचमुच कोई ऐसा युग आ गया है कि आलोचना लायक कुछ बचा ही नहीं है? अगर किसी चीज की आलोचना नहीं हो, तो वह तो सबसे नकारात्मक है. आलोचना ही तो सबसे सकारात्मक चीज है. ये जो दुकानदारी चल रही है- निगेटिविटी और पॉजिटिविटी की, ये वही है कि जो हम बता रहे हैं उससे अलग मत सोचो. अस्पताल खुल जाएं, लोगों की सैलरी बढ़ जाए, पेंशन मिल जाए, सब कुछ हो जाए क्या उसके बाद कोई निगेटिव नहीं लिखेगा? तब भी बहुत-से लोग लिखेंगे. तब भी बहुत-सी चीजें होनी रह जाएंगी. नहीं तो अमेरिका और फ्रांस में सब बंद हो जाना चाहिए कि हमने सब पा लिया है. हम फिलहाल तो उन्हीं के जैसे हो रहे हैं और वे खुद ही स्ट्रगल कर रहे हैं.

इन सब बातों से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. अगर इस समाज में आप जरा-सा खुद को ईमानदार घोषित करके जोर से बोलेंगे तो सौ लोग आ जाएंगे आपको बेईमान साबित करने के लिए. ये देखिए आप वहां गए थे. ये देखिए आपने रेड लाइट क्रॉस की, आप कहां ईमानदार हैं. इसमें लोग बहुत दिलचस्पी लेते हैं. और इसी ईमानदारी के नाम पर बहुत सारे ठग लूट रहे हैं जो अपने को ईमानदार बोलते हैं. उन पर कोई सवाल भी नहीं करता. इस समाज की नैतिकता को मैं खूब अच्छे से समझता हूं. यहां विश्वसनीयता जैसा कुछ नहीं है. मैंने देखा हुआ है कि आप कुछ भी करके आइए और आप भाषण दीजिए, लोग आपको पसंद कर लेते हैं. चाहे राजनीति में, चाहे सिनेमा में, चाहे पत्रकारिता में. इसलिए इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए.

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लेकिन 2013 के बाद इतनी गालियां दी जाने लगीं, ये समझ में नहीं आया कि क्या है ये? ये गाली देने वाले लोग कुछ भी करें, इनको कोई कुछ नहीं बोलता. फोटोशॉप वालों को कोई कुछ नहीं बोलता.

ये थोड़ी बहुत मात्रा में कर सब रहे हैं. लेकिन जो सत्ता पक्ष से जुड़ा पक्ष होता है, वह खतरनाक हो जाता है. यह हर कहीं खतरनाक हो जाता है. हमें मालूम नहीं दक्षिण भारत में या उड़ीसा में इसका क्या स्वरूप है. हम दिल्ली और आसपास देख रहे हैं. इंटरनेट कोई ग्लोबल चीज थोड़ी है. घटनाएं पता चलती हैं लेकिन क्या सारी घटनाएं पता चल जाती हैं? नहीं पता चलतीं. इंटरनेट के बहुत सारे लोकल फिनॉमेना हैं. हमें मालूम नहीं कि बंगाल-बिहार में इसका क्या स्वरूप है. जो हम देख रहे हैं, उसमें देख रहे हैं कि खास तरह का राजनीतिक दल जो सत्ता पक्ष में होता है, उसका बड़ा पावर होता है, और ये लोग उसी की तरफ से अफवाह फैलाते हैं और गाली देते हैं. कई बार मिनिस्टर लोग शामिल हो जाते हैं. दुखद है पर कोई बात नहीं. मीडिया के बिना अगर समाज रह सकता है तो अच्छा ही है.

लोकतंत्र में नागरिक होना आईआईटी के इम्तिहान की तैयारी से कमतर बात नहीं है. ये आपकी नागरिकता का फर्ज है कि आपको जानने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी. बिल्डर के जो सताए लोग हैं, हमारे सहयोगी अभिज्ञान ने उस पर पचासों शो किए हैं. इसका मतलब तब वे लोग कुछ और देख रहे थे. जब अभिज्ञान उनके लिए काम कर रहा था क्या वे लोग कुछ और देख रहे थे. अब हंगामा मचा. अब पूछिए कि क्या वे सताए हुए लोग जागरूक लोग हैं? बिल्कुल नहीं हैं. आज वे लड़ रहे हैं, पर आज तक वे कहां थे? तो अगर लोग नशे में हैं तो रहें. वरना उनको भी मेहनत करनी पड़ेगी, आपको भी और हमको भी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(बातचीत पर आधारित)

अगर आप मेरे विचार से सहमत नहीं हैं तो बहस कीजिए, गाली क्यों देते हैं : सागरिका घोष

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आप लगातार देख सकते हैं कि जो भी महिला जनता के बीच आ रही है, सवाल उठा रही है, जिसकी जनता के बीच कोई पहचान है, उसको निशाना बनाया जाता है. उसके खिलाफ अश्लील भाषा का इस्तेमाल करते हुए बेहद घटिया तरीके से उस पर हमले किए जाते हैं. मुझे तो लगता है कि आजकल के दिग्गज नेता हैं, उनकी ओर से भी ऐसे लोगों को बढ़ावा मिलता है. अभी हमने देखा कि बीजेपी के माननीय अध्यक्ष अमित शाह ने सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों को ‘सोशल मीडिया के योद्धा’ कहा है. इनका भी समारोह हुआ है, इनको भी संबोधित किया गया है. ऐसे में उनको लगता है कि उन्हें सरकार का समर्थन हासिल है.

ऐसे बहुत-से अकाउंट हैं जो खूब गाली-गलौज करते हैं और उन्हें हमारे प्रधानमंत्री जी भी फॉलो करते हैं. इससे शायद गाली देने वालों को सरकार की ओर से मनोवैज्ञानिक तौर पर बढ़ावा मिलता है. मुझे लगता है कि महिलाओं को लेकर समाज में एक तरह की घृणा है, जो बढ़ रही है. जहां भी महिलाएं आगे आ रही हैं, उन्हें लेकर एक तरह की आक्रामक प्रतिक्रिया हो रही है. इसके पीछे महिलाओं के प्रति घृणा दिखती है कि कैसे ये लोग आगे आ रही हैं. अजीब तरह का विरोधाभास है कि एक तरफ हम किरण बेदी, सानिया नेहवाल, सानिया मिर्जा और दूसरी तमाम महिलाओं की सफलता को सेलिब्रेट करते हैं, दूसरी तरफ तमाम महिलाओं के साथ गाली-गलौज और अभद्रता की जाती है. हमारा समाज पाखंडी समाज है जिसका महिलाओं को लेकर दोहरा रवैया है. एक तरफ हम बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ नारा लगा रहे हैं, महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं और दूसरी तरफ जो महिलाएं आगे आ रही हैं, उन पर इस तरह का अत्याचार हो रहा है. मैं इसे अभद्रता नहीं मानती, यह हमला है. अगर महिलाओं के प्रति रंडी, रखैल, वेश्या आदि शब्द इस्तेमाल करेंगे तो यह हमला ही है. आप लगातार किसी के चरित्र हनन की कोशिश करते हैं. मेरे ख्याल से समाज में महिलाओं के खिलाफ आक्रामकता बढ़ रही है.

मुझे लगता है ये यौन-कुंठित लोग हैं जो पहचान छिपाकर ट्विटर पर बैठकर कुछ भी कह सकते हैं. ये एक तरह की यौन-कुंठा है. रवीश, राजदीप या दूसरे पुरुष पत्रकारों के साथ जो होता है, उनके साथ बहस भी होती है. लेकिन मेरे, बरखा दत्त औैर राना अयूब के साथ जो होता है, वो ज्यादातर गैंगरेप की श्रेणी में चला जाता है. रेप कर देंगे, गैंगरेप कर देंगे, स्लट, वेश्या, रंडी… ये जो यौन उत्पीड़न है ये महिला पत्रकार के साथ ही होता है. अगर आप मेरे विचार से सहमत नहीं हैं तो बहस कीजिए, गाली क्यों देते हैं? अच्छा रवीश और राजदीप के साथ भी बहस होगी, गालियां दी जाएंगी तो उनकी मां को, बहन को गालियां दी जाएंगी. मुझे और मेरी बेटी को गैंगरेप की धमकी दी गई. मैंने एफआईआर भी दर्ज कराई.

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यह इतना भयानक है कि देखिए कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी, भाजपा नेता अंगूरलता डेका, अरुण शौरी के बेटे जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं, सबके साथ यही सब हुआ. विराट कोहली जितने मैच खेलता है उतनी बार अनुष्का की फोटो लगाकर घटिया कमेंट और जोक्स शेयर किए जाते हैं. हम वहां इसलिए हैं कि तर्क हो और उसका काउंटर हो. अगर मेरी पत्रकारिता में कमी है तो आप जरूर कहिए. आप कमेंट कीजिए, लेख लिखिए. पहले ऐसा ही होता था. लेकिन इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कभी नहीं होता था. मुझे लगता है यह सब प्रायोजित है. वरना इतनी संख्या में लोग बोले जा रहे हैं रंडी-रंडी-रंडी, राहुल गांधी की रखैल, अरविंद केजरीवाल की वेश्या, स्लट… ये सब एक ही समय में एक साथ कैसे कहा जा रहा है? मैं बहुत निराश हूं कि निर्भया के बाद इतना कुछ हुआ, हमने समाज बदलने की कोशिश की. कानून बनाए. लेकिन हमारा समाज कहां जा रहा है? सोशल मीडिया को देखें तो लगता है हम तो पीछे जा रहे हैं.

मैं बहुत बार प्रतिक्रिया देती हूं लेकिन नहीं जानती कि क्या करना चाहिए. इतनी बड़ी संख्या में लोग गाली-गलौज करेंगे तो उनको कौन रोकेगा? केस दर्ज कराइए तो कार्रवाई भी नहीं होती. अब यही उम्मीद कर सकते हैं कि अच्छी सोच चलन में आएगी और यह सब रुकेगा. या फिर पार्टी की तरफ से इस पर काबू किया जाए. अगर पार्टी की तरफ से इन्हें रोका जाए तो शायद यह रुक सकता है. हम यह नहीं कह सकते कि तर्क मत करो, हम भी तर्क ही कर रहे होते हैं, लेकिन गाली तो मत दो. धमकी तो मत दो कि मार देंगे, गैंगरेप कर देंगे.

अब अंगूरलता का मसला लीजिए, वो तो भाजपा की ही हैं. उनका अपराध क्या था? वह एक युवा महिला हैं, उन्होंने कुछ बोला नहीं, कुछ किया भी नहीं, मैं समझ नहीं पाई कि उसने किया क्या है! बस उसके पीछे लग गए और लगे हैं. ये सब कुंठित मर्द हैं. हमारे देश में लिंगानुपात कम होता जा रहा है, लड़कियों का प्रतिशत कम होता जा रहा है. ऐसे ही रहा तो धीरे-धीरे शादी करने के लिए लड़कियां नहीं मिलेंगी. इससे मर्दों की कुंठा बढ़ेगी. अभी भी यौन-कुंठित मर्दों की संख्या बहुत बड़ी है. हमारे यहां आॅनलाइन पॉर्न के सर्वाधिक उपभोक्ता हैं. मुझे तो यही लगता है कि मर्दों की यह गाली-गलौज यौनकुंठा का नतीजा है.

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(बातचीत पर आधारित)

सोशल मीडिया : यौन उत्पीड़न का नया अड्डा

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सोशल मीडिया पर अक्सर किसी महिला पत्रकार या नेता को विरोधस्वरूप हजारों की संख्या में गालियां दी जाती हैं. बरखा दत्त, सागरिका घोष, राना अयूब, कविता कृष्णन, अलका लांबा, स्मृति ईरानी, अंगूरलता डेका, यशोदा बेन आदि महिलाएं इस अभद्रता की भुक्तभोगी हैं. जो लोग किसी की बात-विचार या व्यक्तित्व को नापसंद करते हैं तो वे लोग इसका विरोध गंदी गालियों या चरित्र-हनन के रूप में करते हैं. हाल ही में बरखा दत्त के नाम के साथ गाली जोड़कर ट्विटर पर हैशटैग ट्रेंड कराया गया और यह पहली बार नहीं था.

केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह के बयान से चर्चा में आया ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द का किसी भी महिला पत्रकार के लिए इस्तेमाल आम है. सागरिका घोष और उनकी बेटी का बलात्कार करने की धमकी दी गई. हाल ही में फेसबुक पर कविता कृष्णन ने कथित ‘फ्री सेक्स’ के बारे में विचार रखे तो उनके खिलाफ एक वरिष्ठ पत्रकार ने अभद्र टिप्पणी की. असम में नवनिर्वाचित भाजपा विधायक अंगूरलता डेका की फोटो शेयर करके अपमानजनक टिप्पणियां की गईं. अदाकारा अंगूरलता की इंटरनेट पर मौजूद उनकी एक्टिंग या मॉडलिंग से जुड़ी तस्वीरों को उनके चरित्र से जोड़कर पेश किया गया. राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली दमदार अभिनेत्री कंगना रनाैत भी सोशल मीडिया पर होने वाली अभद्रता का शिकार हुईं. ऋतिक रोशन के साथ विवाद, पासपोर्ट पर उम्र विवाद जैसी वजहों को लेकर कंगना पर विवाद छिड़ हुआ था. कुछ उनके पक्ष में लिख रहे थे, कुछ विपक्ष में. राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के बाद कंगना के खिलाफ ट्विटर पर कैरेक्टरलेस कंगना, फेक फेमिनिज्म जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे. 17 से 19 मई तक फेक फेमिनिस्ट कंगना हैशटैग ट्रेंड करता रहा. इसके बाद 19 मई को एक बार फिर क्वीन ऑफ लाइफ हैशटैग ट्रेंड हुआ. 

इस बारे में कविता कृष्णन कहती हैं, ‘आॅनलाइन तो यह हो ही रहा है, लेकिन ऐसे भी नेता हैं जो मीडिया के जरिए सीधे तौर पर यही व्यवहार करते हैं. उदाहरण के तौर पर, फ्री सेक्स के नाम पर जेएनयू, जादवपुर विश्वविद्यालय और मेरे जैसे कार्यकर्ताओं को हजारों हजार गालियां पड़ती हैं. वही बात सुब्रमण्यम स्वामी टेलीविजन चैनल पर मुझसे कर लेते हैं. एंकर कुछ नहीं बोलते. बंगाल भाजपा नेता दिलीप घोष ने जादवपुर की लड़कियों को कहा कि आपके साथ तो कोई यौन उत्पीड़न करेगा ही क्योंकि आप बेहया हैं. वह यौन उत्पीड़न नहीं माना जाएगा. मैंने कहा कि यह फ्री सेक्स कोई चीज नहीं होती. या तो सेक्स है या तो बलात्कार है. फ्री है तो मर्जी से ही है. फ्रीडम से क्यों डर रहे हैं. लेकिन यह कहने के बाद भाजपा समर्थक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे कहा, आप आइए इंडिया गेट पर, आप फ्री सेक्स की पैरोकार हैं, आपके साथ फ्री सेक्स किया जाए. इश्यू तो यौन उत्पीड़न है, लेकिन इश्यू बना दिया गया फ्री सेक्स को, जिसके लिए गाली दी जा रही है. मैंने जिस इंडिया गेट पर महिलाओं के आंदोलन का नेतृत्व किया, जब मेरे साथ ऐसा कर रहे हैं तो आम महिलाओं के साथ क्या करते होंगे?’

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किसी भी मसले पर महिलाओं के चरित्र हनन की कोशिश समाज में आम है. लेकिन कविता कृष्णन कहती हैं, ‘समाज तो जैसा है वैसा है ही, लेकिन चिंता की बात ये है कि जो राजनीतिक गोलबंदी के तहत हो रहा है उसे आप समाज के कंधे पर नहीं धकेल सकते. अगर ये प्लान के तहत हो रहा है तो उसका आयोजक कौन है? ऐसा करने वालों का आत्मविश्वास यहां से आ रहा है कि प्रियंका चतुर्वेदी को बलात्कार की धमकी मिलती है तो भाजपा की मंत्री (स्मृति ईरानी) कह देती हैं कि तुम लोग तो अभी-अभी असम में हारे हो. तुम क्या शिकायत करोगी? सत्ता में जो लोग बैठे हैं, वो गोलबंदी के तहत ऐसा करा रहे हैं तो यह गंभीर मामला है. केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली कह रहे हैं कि इसके साथ जीना होगा.’

हाल ही में केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने गृह मंत्रालय को एक पत्र लिखकर ऑनलाइन अभद्रता की शिकार होने वाली महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए कदम उठाने की बात कही है. मेनका गांधी ने कहा, ‘महिलाओं को कई बार इंटरनेट पर क्रूरता का सामना करना पड़ता है. पहले इंटरनेट प्रदाता हमसे इस बाबत बात करने को तैयार नहीं थे लेकिन बाद में उन्होंने संबंधित विस्तृत जानकारी देने की बात मान ली.’ गांधी ने गृह मंत्रालय से कहा है कि सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ होने वाले बर्ताव को लेकर संहिता बनाई जाए.

हालांकि, पत्रकार प्रणव राय को दिए एक इंटरव्यू में केंद्रीय वित्त और सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ‘आॅनलाइन गाली देने वालों का पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है. ऐसा लोग निजी स्तर पर करते हैं. मैं नहीं समझता इस पर किसी तरह की सेंसरशिप संभव है. मेरे ख्याल से हमें इसके साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए. हमें उनको नजरअंदाज करना सीखना है, हमें उनको बर्दाश्त करना सीखना है, हमारी रणनीति हमें निर्धारित करनी है.’ 

कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी को ट्विटर पर एक व्यक्ति ने कहा, ‘आपके साथ बलात्कार करके निर्भया की तरह क्रूरता से आपकी हत्या करनी चाहिए. आप राहुल गांधी की लिव इन पार्टनर क्यों नहीं बन जातीं…’ इस पर प्रियंका चतुर्वेदी ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को टैग करके कहा, ‘उनके पास तो जेड सिक्योरिटी है, लेकिन मैं बलात्कार और हत्या की धमकियां झेल रही हूं.’ इस पर स्मृति ईरानी और प्रियंका चतुर्वेदी में ट्विटर वॉर भी हुआ.

प्रियंका चतुर्वेदी कहती हैं, ‘यह ट्रेंड बढ़ता जा रहा है. लग रहा था कि 2014 के चुनाव के बाद कम होगा. जो पार्टी सत्ता में आने की कोशिश कर रही थी, सोशल मीडिया जैसे माध्यमों पर ज्यादातर लोग इनके समर्थक थे. लग रहा था कि शायद सरकार बनने के बाद यह खत्म होगा, लेकिन यह बढ़ता ही जा रहा है. सारा संवाद जो ट्विटर पर होता है, वही अब चैनल पर होने लगा है. इससे सोशल मीडिया के ट्रॉल्स को और प्रोत्साहन मिलता है. वे देखते हैं कि किसी तरह की अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने पर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है. केंद्रीय मंत्री आकर कह देते हैं कि हमें उनके साथ ही रहना है. इससे उनको और प्रोत्साहन मिलता है. यह ट्रेंड खत्म होते नहीं देख रही हूं. अगर सभी दल मिलकर राजनीति से ऊपर उठकर इसका निदान ढूंढ़ पाते हैं, अगर केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री यह कहते कि हमें देखना है कि क्यों इस तरह से भाषा का स्तर गिर रहा है, क्यों बहसें नहीं हो पा रही हैं, हम इस पर ध्यान देंगे. लेकिन उन्होंने इसे नकार दिया. तो मैं तो इसे उनके लिए प्रोत्साहन ही समझूंगी जो ऐसी हरकतें करते हैं.’

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प्रियंका चतुर्वेदी कहती हैं, ‘हम तो 2014 से बोल रहे हैं कि भाषा का स्तर गिरता जा रहा है. महिलाओं पर अभद्र टिप्पणियां की जाती हैं. उनके साथ गाली-गलौज की जाती है. चरित्र हनन होता है. इस पर नियंत्रण जरूरी है. अब अगर सरकार निर्लज्ज-सी हो गई है, उनको लगता है कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है. हम इस मुद्दे को आगे भी उठाते रहेंगे. ऐसे प्लेटफाॅर्म पर भारत के संदर्भ में अलग से गाइडलाइन होनी चाहिए.’

सोशल मीडिया पर काफी अभद्रता और गाली-गलौज का सामना कर चुकीं आम आदमी पार्टी की नेता अलका लांबा कहती हैं, ‘यह ट्रेंड बहुत पुराना नहीं है. यह पिछले दो सालों से हो रहा है. इस बारे में मैंने साइबर क्राइम ब्रांच में करीब 40 एफआईआर करवाई हैं. मैंने स्क्रीन शॉट, फोटो सब दिए. इसे करीब दो साल होने जा रहा है, लेकिन साइबर क्राइम इस बारे में कार्रवाई करने में नाकाम रहा है. साइबर क्राइम ने हाथ खड़े कर दिए कि हम कुछ नहीं कर सकते. दो साल में चार्जशीट भी फाइल नहीं हुई. इससे लोगों के हौसले बढ़े हैं. कैसे ऐसे लोगों की पहचान की जो प्रधानमंत्री मोदी के लंच में शामिल हैं, उनसे हाथ मिलाते हुए फोटो है, वही लोग सोशल मीडिया पर गाली-गलौज कर रहे थे. उनकी पहचान होने के बाद भी भाजपा द्वारा उनके खिलाफ कार्रवाई न करना यह साबित करता है कि उन्हें खुली छूट दे दी गई है. हमारे फर्जी अकाउंट बनाकर भी ट्वीट किए गए. हमें बदनाम करने की कोशिश की गई. हमारे खिलाफ फैलाया गया कि मैं रैकेट चलाती हूं. ऐसे लोग हजारों की संख्या में हैं. सवाल उठता है कि अगर कोई व्यक्ति जिसकी पहचान हो जाती है, तब भी उस पर कार्रवाई क्यों नहीं होती.’

इंटरनेट पर इस तरह के तत्व मौजूद हैं और हर महिला ऐसे बुरे अनुभव झेल चुकी है. पत्रकार सर्वप्रिया सांगवान कहती हैं, ‘औरतों को टारगेट करना बहुत आसान होता है. मेरे लिए किसी ने इसी तरह कमेंट किया तो मेरे पिता ने मुझे ही टोका कि तुम क्यों लिखती हो. आप किसी पुरुष के चरित्र पर बात करते हो तो फर्क नहीं पड़ता, लेकिन औरत के चरित्र पर उंगली उठा दो तो वह चुप हो जाएगी, डर जाएगी. रवीश कुमार के साथ भी गाली-गलौज होती है तो उनकी मां या बहन को गाली दी जाती है, उनकी पत्नी के लिए अपशब्द इस्तेमाल किया जाता है. महिला पत्रकारों को गालियां मिलती हैं, उनकी पत्रकारिता पर सवाल नहीं होते, उनके चरित्र पर सवाल होते हैं. इसने दो शादी की, उसने तीन शादी की, वह शराब पीती है. जबकि राजनीति पर लिखने वाली लड़कियां बहुत कम हैं. क्योंकि राजनीति पर बात करना बहुत कठिन है. हमारी परवरिश ऐसी है, कंडीशनिंग ऐसी है कि हम पर इस तरह हमले होते हैं तो हम बस चुप हो जाते हैं. दूसरी बात, नेता चैनल पर बैठकर भी अभद्रता कर जाते हैं तो कुछ नहीं होता. ऐसे में छिपी हुई पहचान और फेक आईडी पर कार्रवाई होनी तो और भी मुश्किल है. सब लोग इसके खिलाफ बोलेंगे तो शायद इस पर रोक लगे.’

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पत्रकार आशिमा का मानना है, ‘यह कोई अनोखी बात नहीं है. महान राजनेता बयान देते हैं कि हम हेमा मालिनी के गाल जैसी सड़क बनवाना चाहते हैं. हमारे समाज की संरचना में ये चीजें मौजूद हैं कि यह महिलाओं के प्रति अपमानजनक रवैया अपनाता है. हमें एक काउंटर समाज तैयार करना चाहिए. इसके खिलाफ भी लोग बोल रहे हैं. ऐसे लोग बढ़ेंगे तो यह व्यवहार कम होगा.’

साहित्यकार सुजाता तेवतिया कहती हैं, ‘आभासी दुनिया इसी दुनिया का हिस्सा है. स्त्री के लिए जितना विरोध और घृणा बाहर है उतनी ही यहां भी. फ्री सेक्स का ही मामला नहीं है औरत के लिए फ्री स्पीच और फ्री थिंकिंग को भी बर्दाश्त नहीं करता मर्दवादी समाज. स्त्री-देह पर प्रीमियम अपने आप साबित होता है जब आप सेक्स शब्द बोलते हुए भी स्त्री को बर्दाश्त नहीं कर सकते. भीड़ का हिस्सा होते ही कोई एक पत्थर उस औरत की तरफ मारने को उतावला है जो निडर, बेखौफ होकर अपनी बात सामने रख सकती है. विवेकशील और तार्किक होना स्त्री की बनावट के साथ नहीं जाता.’

सुजाता कहती हैं, ‘टेक्नीकली, यह हतोत्सहित करने का मामला है. स्पेस पर पहला दावा पुरुषवादी सत्ता अपना मानती है, आभासी स्पेस में भी स्त्री को औकात में रखने की कोशिशें होती हैं. भाषा पुराना हथियार रही है स्त्री के खिलाफ. वही स्त्री की भी ताकत है अब. भीड़ का हिस्सा होकर जितना आसान लगता है एक पत्थर औरत की तरफ फेंक देना वैसा है नहीं… सोशल मीडिया के पास अपनी तरह से निपटने के तरीके हैं. समाज आभासी ही सही… सिर्फ साक्षर नहीं पढ़ा-लिखा, यहां मौजूद है इसलिए ‘नेम एेंड शेम’ के जरिए, स्क्रीन शॉट्स लगाकर, स्त्री-विरोधी भाषाई व्यवहार के लिए पब्लिकली शर्मिंदा करना ज्यादा कारगर तरीके साबित होते हैं.’

स्त्रियां इन तरीकों से भले ही यौन हमलों से निपट लें, या बर्दाश्त कर लें, लेकिन फिलहाल सरकार या कोई राजनीतिक पार्टी इस असामाजिक प्रवृत्ति पर रोक लगाने की पहल करती नहीं दिख रही है. इंटरनेट पर सूचनाएं रोकी नहीं जा सकतीं, लेकिन क्या सामाजिक और भाषाई रूप से अभद्र, आक्रामक और महिला विरोधी होते जा रहे समाज पर भी नियंत्रण नामुमकिन है?

मुर्गे पे भरोसा है तो ये दांव लगा ले…

छत्तीसगढ़ के सुदूर गांवों में मुर्गा लड़ाई के प्रति रहवासियों में खासा उत्साह देखा जा सकता है. तकनीक और मनोरंजन के किसी अन्य साधन से दूर दंतेवाड़ा के इन आदिवासी इलाकों में मुर्गों की लड़ाई की परंपरा रही है. इन मुर्गों को लड़ने के लिहाज से ही तैयार किया जाता है. हफ्ते में किसी एक दिन आसपास के किसी भी गांव या कस्बे में इन मुर्गों को लड़ाया जाता है. यहां के लोगों में इस खेल को लेकर कितना जुनून है यह यहां उमड़े हुजूम को देखकर पता चलता है. यह नजारा दंतेवाड़ा के पास मौजूद गिदम गांव का है.
साप्ताहिक बाजार करने आए इन दर्शकों में अपने पसंदीदा मुर्गे की जीत पर शर्तें लगती हैं. सैकड़ों की भीड़ इकट्ठा होने की वजह से मनोरंजन के अलावा यह खेल ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमंद होता है. नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र में इस खेल को लेकर इतना जुनून है कि कभी-कभी नक्सली और पुलिसवाले दोनों यह खेल देखने पहुंचते हैं और मुर्गों की ये लड़ाई पुलिस-नक्सली मुठभेड़ में तब्दील हो जाती है. वैसे मुर्गों की इस लड़ाई के खेल का नियम सीधा है, या तो खेल में जीत मिलेगी या मौत.

सभी फोटो :  विजय पांडेय

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मुर्गा मालिक इन मुर्गों की विशेष देखभाल करते हैं
मुर्गा मालिक इन मुर्गों की विशेष देखभाल करते हैं

 

दांव उसी मुर्गे पर सबसे ज्यादा लगता है जो दमदार होता है
दांव उसी मुर्गे पर सबसे ज्यादा लगता है जो दमदार होता है

 

मुर्गा लड़ाई के दौरान दर्शकों के लिए महुआ से बनी शराब का भी इंतजाम रहता हैै
मुर्गा लड़ाई के दौरान दर्शकों के लिए महुआ से बनी शराब का भी इंतजाम रहता हैै

 

मालिक अपने-अपने मुर्गों को मैदान में उतारते हैं और लड़ाई शुरू होती है
मालिक अपने-अपने मुर्गों को मैदान में उतारते हैं और लड़ाई शुरू होती है

 

हर हाथ में नोट इस खेल के प्रति जुनून को दिखाता है
हर हाथ में नोट इस खेल के प्रति जुनून को दिखाता है

 

इन मुर्गों के पैर में एक ब्लेड लगा रहता है जो प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ने में उनकी मदद करता है
इन मुर्गों के पैर में एक ब्लेड लगा रहता है जो प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ने में उनकी मदद करता है

 

लड़ाई के बाद हारे मुर्गे को विजयी मुर्गे का मालिक ले जाता है और उसे पकाकर खाया जाता है
लड़ाई के बाद हारे मुर्गे को विजयी मुर्गे का मालिक ले जाता है और उसे पकाकर खाया जाता है

निर्भया फंड का इस्तेमाल न होने पर केंद्र को फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म की शिकार महिलाओं की सहायता व पुनर्वास के लिए बने निर्भया फंड का इस्तेमाल नहीं होने पर केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगाई है. कोर्ट ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है. न्यायमूर्ति पीसी पंत और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में इसे लेकर अलग-अलग योजनाएं हैं. बलात्कार पीड़िताओं को कितना मुआवजा मिलना चाहिए, इसे लेकर कोई राष्ट्रीय योजना नहीं है. निर्भया फंड पर्याप्त नहीं है. पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यौन अपराध पीड़ितों को पर्याप्त सहायता मिले. पीठ ने केंद्र और सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को नोटिस जारी करते हुए सीआरपीसी की धारा 357(ए) के प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन को लेकर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है. पीठ ने सभी से यह भी पूछा है कि पीड़ितों को मुआवजा देने संबंधी योजनाओं की स्थिति क्या है और कितने पीड़ितों को मुआवजा दिया गया है. अदालत ने कहा कि कुछ राज्य तो महज एफआईआर दर्ज होने पर ही पीड़ितों को मुआवजा देते है. पीठ ने कहा कि दिल्ली में अलग योजना हैं, उत्तर प्रदेश में अलग जबकि इसे लेकर एक राष्ट्रीय योजना होनी चाहिए.

देश भर के जलाशयों में बचा महज 17 फीसदी पानी

केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार देश भर के 91 बड़े जलाशयों में केवल 17 फीसदी पानी शेष है. रिपोर्ट के मुताबिक 26 मई को खत्म हुए सप्ताह में इन जलाशयों में सिर्फ 268.16 लाख घन मीटर पानी उपलब्ध था. इन जलाशयों की कुल क्षमता 1577.99 लाख घन मीटर पानी की है. मंत्रालय के अनुसार, पानी का यह भंडार पिछले साल की तुलना में 45 फीसदी कम है. पिछले 10 साल के औसत भंडार से भी यह 21 फीसदी कम है. हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल की स्थिति ज्यादा खराब है. इन राज्यों में पिछले साल इसी अवधि की तुलना में कम पानी बचा हुआ है. सिर्फ आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा और राजस्थान में पिछले साल से ज्यादा पानी उपलब्ध होने की रिपोर्ट है.

नीट पर विवाद खत्म

Medical-Admission

क्या है विवाद?

डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए पूरे देश में एक ही प्रवेश परीक्षा को लेकर हुआ विवाद अब खत्म हो गया है. राष्ट्रपति ने इस आशय की अधिसूचना पर हस्ताक्षर करके राष्ट्रीय पात्रता एवं प्रवेश परीक्षा (नीट) को एक साल तक लागू न करने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव को मान्यता दे दी. नीट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश की वजह से विवाद गहरा गया था जिसमें अदालत ने देश भर में निजी और सरकारी सभी मेडिकल काॅलेजों में एक ही प्रवेश परीक्षा कराने का आदेश दिया था. नीट का 15 राज्यों ने विरोध करके केंद्र सरकार को इसे तत्काल प्रभाव से लागू करने पर रोक लगाने के लिए विवश कर दिया. अध्यादेश के मुताबिक 24 जुलाई, 2016 तक नीट प्रभावहीन माना जाएगा. इस अवधि में सभी राज्यों को यहां तक कि निजी मेडिकल कॉलेजों को अगले सत्र के लिए दाखिला प्रक्रिया पूरी करनी होगी.

क्यों है राज्यों का विरोध?

दरअसल राज्यों का विरोध अगले सत्र के लिए होने वाली परीक्षा को नीट में शामिल करने को लेकर था. उनका कहना है कि परीक्षा को लेकर सारी तैयारियां हो गई हैं. नीट लागू करने का सीधा असर सत्र को शुरू करने पर पड़ेगा. केंद्र की मोदी सरकार ने नीट को तत्काल प्रभाव से लागू करने पर अगला सत्र देर से शुरू होने की समस्या को व्यावहारिक मानते हुए इसे अगले साल से लागू करने का फैसला किया. हालांकि दिल्ली सहित कुछ राज्य इसे तत्काल प्रभाव से लागू करने की वकालत कर रहे हैं. दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने तो इसे शिक्षा माफिया से जोड़कर राष्ट्रपति से अध्यादेश पर दस्तखत नहीं करने तक की अपील कर डाली. इनकी दलील है कि मेडिकल परीक्षा को लेकर देश भर के निजी मेडिकल कॉलेज भारी-भरकम डोनेशन लेकर सीटें भरते हैं. इसके अलावा शिक्षा माफिया सिर्फ निजी कॉलेजों में ही नहीं, राज्य सरकारों द्वारा आयोजित मेडिकल प्रवेश परीक्षा में पेपर लीक कराने से लेकर फर्जी दाखिला कराने तक अपना प्रभावी दखल रखते हैं.    

क्यों पड़ी नीट की जरूरत?

मेडिकल कॉलेजों में पैसे के बल पर अयोग्य छात्रों की पहुंच बढ़ने की शिकायतों को सही पाए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी मेडिकल कॉलेजों के लिए एक ही मेडिकल प्रवेश परीक्षा आयोजित कराने की व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से लागू करने का आदेश दिया. नई व्यवस्था के तहत राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा की तर्ज पर एक केंद्रीय एजेंसी को सभी कालेजों को अपनी सीटों की संख्या बतानी होगी. केंद्र व राज्य सरकारों और निजी मेडिकल कॉलेजों की कुल सीटों के लिए वह एजेंसी देशव्यापी स्तर पर परीक्षा कराएगी.

फ्रांस में नए श्रम कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन

फ्रांस में नए श्रम कानूनों को देशव्यापी विरोध का सामना करना पड़ रहा है. इस दौरान पेरिस में पुलिस तथा नकाबपोश युवकों के बीच संघर्ष की घटनाएं भी सामने आई हैं. तेल रिफाइनरियों, परमाणु बिजलीघरों, बंदरगाहों और परिवहन केंद्रों के कर्मचारियों के हड़ताल में शामिल होने से स्थिति और खराब हो गई है. कर्मचारी यूनियनों के अनुसार, नए श्रम कानूनों के अंतर्गत कंपनियों को अपनी मर्जी से नौकरी देने और निकालने का अधिकार होगा. कंपनियां काम के घंटे प्रति सप्ताह 35 से बढ़ाकर 46 घंटे तक कर सकती हैं. कंपनियों को वेतन कम करने की भी अधिक आजादी देने का प्रावधान है. सार्वजनिक व कानूनी छुट्टियों में कर्मचारियों की सहमति से कटौती के भी अधिकार देने की बात है. फ्रांस यूरो फुटबॉल चैंपियनशिप, 2016 का आयोजक है. ऐसे में फ्रांसीसी सरकार अत्यधिक दबाव के बावजूद नए श्रम कानून को लागू करने पर अड़ी है. 

भारत-ईरान के बीच चाबहार समझौता

भारत और ईरान के बीच रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह को विकसित करने को लेकर समझौता हो गया है. भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की रेल कंपनी इरकॉन ईरान के चाबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान तक 500 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछाएगी जिस पर 1.6 अरब डॉलर की लागत आने का अनुमान है. यह रेल लाइन ईरान के दक्षिणी तटीय इलाके से अफगानिस्तान के जाहेदान तक बिछाई जाएगी. हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली ईरान यात्रा के दौरान इन समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए. भारत-ईरान के बीच यह करार ईरान के दक्षिणी तट पर चाबहार बंदरगाह के पहले चरण के विकास के बारे में है. इसे भारत के साथ एक संयुक्त उद्यम के जरिए विकसित किया जाएगा. इसमें चाबहार बंदरगाह के दो टर्मिनलों और पांच गोदी का 10 साल तक विकास एवं संचालन किया जाएगा. इसके लिए एक्जिम बैंक और ईरान के पोर्ट्स एेंड मैरीटाइम आॅर्गेइजेशन के बीच 15 करोड़ डॉलर के ऋण के लिए एमओयू समझौता भी शामिल है. एक्जिम बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ ईरान के बीच एक स्वीकृति वक्तव्य पर भी हस्ताक्षर किए गए जिसमें स्टील रेलों के आयात और चाबहार बंदरगाह के क्रियान्वयन के लिए 3000 करोड़ रुपये तक की ऋण उपलब्धता के लिए स्वीकृति दी गई है. सार्वजनिक क्षेत्र की नाल्को ने चाबहार मुक्त व्यापार क्षेत्र में 5 लाख टन क्षमता का एल्युमीनियम स्मेल्टर लगाने की संभावना के लिए एमओयू पर दस्तखत किए हैं.