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बातचीत के दौरान वर पक्ष को जब ये पता चला कि हमारा कोई बेटा नहीं तो उन्होंने फोन उठाना ही बंद कर दिया…

aapbitiIllustrationweb एक साथ दो तरह की दुनिया में जीने के लिए मैं अभिशप्त हूं. एक विवाह से पहले की दुनिया, जहां मेरा जन्म हुआ, पढ़ाई-लिखाई के साथ मेरा बचपन बीता और दूसरी यानी विवाह के बाद की दुनिया. मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के एक छोटे-से कस्बे बहेड़ी में एक सुखी-संपन्न और समृद्ध व्यापारी परिवार में हुआ था, जहां मुझे हर सुख-सुविधा मिली हुई थी. मैं पढ़-लिख रही थी लेकिन पढ़ाई-लिखाई को लेकर परिवार का दृष्टिकोण बहुत पुरातन और संकीर्ण था. लड़काें को ज्यादा क्या पढ़ाना-लिखाना क्योंकि उन्हें तो विरासत में मिले व्यवसाय को संभालना है और लड़कियों को बस इतना पढ़ाना चाहिए कि किसी अच्छे घर में उनकी शादी हो जाए. यानी दोनों के लिए मैट्रिक या ग्रैजुएशन की शिक्षा के आगे कोई गुंजाइश नहीं थी. तब के समाज में पारिवारिक मर्यादा का उल्लंघन करना कम से कम किसी लड़की के लिए भारी पड़ सकता था. मैं पढ़ने-लिखने में न सिर्फ बहुत अच्छी थी बल्कि बहुत महत्वाकांक्षी भी थी. पढ़ाई ही मेरा सपना था. पारिवारिक विरोध के बावजूद मैंने एमए की पढ़ाई प्रथम श्रेणी में पूरी की. एमए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास होने के बाद परिवार के वे लोग जिन्होंने मेेरी उच्च शिक्षा का विरोध किया था वही गर्व के साथ पूरे कस्बे के लोगों को यह बात बता रहे थे. मैं थोड़ी जिद्दी भी थी और अपनी महत्वाकांक्षा को परवान चढ़ाने के लिए मैं यूपीएससी की परीक्षा में बैठ गई वह भी बिना किसी तैयारी के. परिवार के लोगों ने मेरा मजाक बनाते कहा- अब यह कलेक्टर-कमिश्नर बनकर रहेगी. होना-जाना कुछ नहीं था क्योंकि मेरी तो कोई तैयारी ही नहीं थी.

समाज के एक वर्ग की सोच मध्यकाल की है. ऐसी स्थिति में अगर कोई लड़की कुंवारी ही रहना पसंद करे तो हैरानी नहीं होगी

खैर, इसके बाद मेरी शादी करवाने को लेकर परिवार में बहस शुरू होने लगी. उच्च शिक्षा के लिए बेशक मैंने अपने परिवार से विद्रोह किया लेकिन शादी के लिए नहीं क्योंकि तब के परिवार और समाज में कुछ पारंपरिक मर्यादा के मूल्य बचे हुए थे. माता-पिता ही अपने बच्चों की शादी का निर्णय लिया करते थे, उनके भविष्य को ध्यान में रखते हुए मैंने शादी के लिए ‘हां’ कर दी. फिर अल्मोड़ा में मेरी शादी तय हुई और पहली दुनिया की मान-मर्यादा, गरिमा और सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए मैं शादी के बाद मैदान से एक पहाड़ी इलाके में पहुंच गई. सुखी-संपन्न घर-परिवार और अच्छा पति मिला. ससुराल में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई. इसके बाद अपनी दोनों बेटियाें- मानसी और सांची को हमने खूब पढ़ाया-लिखाया ही नहीं बल्कि उन्हें इस काबिल भी बनाया कि हमें उन पर गर्व है. बड़ी बेटी मानसी दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस से बीएससी आॅनर्स और सेंट स्टीफेंस से एमएससी करने के बाद आईआईटी दिल्ली से भौतिक विज्ञान में पीएचडी कर रही है तो छोटी बेटी सांची अभी बीए एलएलबी आॅनर्स. अब मेरे सामने दूसरी दुनिया का भयावह चेहरा सामने आने वाला था, जिसे देखने के बाद मैं हैरान रह गई थी. पिछले कुछ दिनों से मैं मानसी की शादी के लिए कोशिश कर रही हूं. मेट्रिमोनियल कॉलम के अलावा कड़ी मशक्कत के बाद कई जगह बात हुई. पिछले दिनों एक वर पक्ष के माता-पिता ने जब मुझसे पूछा- ‘क्या आपका कोई बेटा नहीं है?’ मेरे ‘न’ कहने पर उन्होंने फिर बातचीत ही नहीं की. यही नहीं, उन लोगों ने अपना फोन तक बंद कर दिया. मुझे तब और हैरानी हुई जब एक प्रतिष्ठित अखबार के वैवाहिक कॉलम में देखा कि एक वर पक्ष ने यह शर्त रखी है कि लड़की का भाई होना जरूरी है.’ यह सीधे-सीधे हमारे संविधान पर हमला था. यह सोचकर मैं परेशान हूं कि अब जो दुनिया मेरे सामने है उसकी मानसिकता तेजी से किस तरह बदल गई है. यह दूसरी दुनिया का एक डरावना सच है, जिससे मेरा सामना हुआ. क्या केवल बेटियों की मां होना गुनाह है? इस पर तो किसी का वश नहीं, यह तो प्रकृति का नियम है. यह स्थिति चिंताजनक है. सिर्फ मेरे लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए क्योंकि इसमें वर्ग या वर्ण के भीतर भी एक संकीर्ण और कुंठित ऐसा समाज है जिसकी मानसिकता में महिलाओं के लिए कोई सम्मान नहीं है. वे उसे परिवार में लड़का होने के वजन पर तौलते हैं. क्या यह बताने की जरूरत है कि 21वीं सदी के एक वर्ग की मानसिकता मध्यकाल की है? मुझे हैरानी नहीं होगी अगर कोई लड़की ऐसी स्थिति में आजीवन कुंवारी ही रहना पसंद करे. 

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कॉलेज में प्रोफेसर हैं)

इस क्रिकेट के साथ खेल क्यों ?

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वर्ष 2012 में भारत और पाकिस्तान के बीच बंगलुरु में पहले ब्लाइंड टी-20 विश्वकप का फाइनल खेला जा रहा था. पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत के तीन बल्लेबाज 42 रन तक पैवेलियन लौट चुके थे. यहां से केतनभाई पटेल ने भारतीय पारी को संभाला और 43 गेंदों पर 98 रन की पारी खेलकर टीम के स्कोर को 258 रन तक पहुंचाया. यह मैच भारत ने जीता और विश्वकप पर कब्जा जमा लिया.

उस समय तक ब्लाइंड क्रिकेट में पाकिस्तान को अजेय माना जाता था. लेकिन इसके बाद से भारत ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया. दो साल बाद 2014 में एकदिवसीय विश्वकप के फाइनल मुकाबले में पाकिस्तान को हराकर पहली बार  यह खिताब भी अपने नाम कर लिया. इसके बाद एशिया कप भी जीता. भारतीय ब्लाइंड क्रिकेट टीम विश्व की एकमात्र टीम बन गई जिसने ब्लाइंड क्रिकेट के तीनों बड़े खिताब अपनी झोली में डाले. इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करने के बाद भी आज भारतीय ब्लाइंड क्रिकेट विषम आर्थिक परिस्थितियों से जूझ रहा है. पैसे और संसाधनों के अभाव में खिलाड़ी प्रैक्टिस नहीं कर पा रहे हैं. प्रैक्टिस करना तो दूर कई खिलाड़ियों के पास घर चलाने तक के पैसे नहीं हैं.

टी-20 विश्वकप में जीत के हीरो केतनभाई पटेल 2006 से भारतीय टीम में ‘बी1’ श्रेणी के खिलाड़ी हैं. तीनों ही बड़ी जीतों के समय वे टीम का हिस्सा थे. गुजरात के वलसाड जिले के रहने वाले केतनभाई कुछ समय पहले तक एक स्थानीय कंपनी में पैकिंग का काम किया करते थे. उन्हें महज 50 रुपये प्रतिदिन का मेहनताना मिलता था. दिसंबर 2014 में जब भारतीय टीम एकदिवसीय विश्वकप खेलने दक्षिण अफ्रीका गई तब उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी थी. केतन बताते हैं, ‘विश्वकप जीतकर जब हम वापस लौटे तो हमारी उपलब्धि को देश भर में सराहा गया. भारत सरकार के खेल मंत्रालय ने पांच लाख रुपये और सामाजिक न्याय मंत्रालय ने दो लाख रुपये का इनाम दिया. वहीं गुजरात सरकार ने भी अपने राज्य के खिलाड़ियों को 10 लाख रुपये नकद और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की. लेकिन गुजरात सरकार से अब तक हमें न तो कोई राशि मिली और न नौकरी. हम अब भी उम्मीद लगाए बैठे हैं, कम से कम नौकरी तो मिल जाए. अगर नौकरी न मिली तो फिर से वही पैकिंग वाला काम करना पड़ेगा.’ कुछ ऐसे ही हालात केतनभाई के साथी खिलाड़ी गुजरात के ही गणेश मुंडकर के हैं. वे भी दिहाड़ी मजदूर हैं.

इनके विपरीत मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के सोनू गोलकर इंडियन ओवरसीज बैंक में काम करते हैं. लगभग डेढ़ दशक तक जोनल क्रिकेट खेलने के बाद पिछले वर्ष इंग्लैंड दौरे के लिए पहली बार उनका भारतीय टीम में चयन हुआ. वे बताते हैं, ‘क्रिकेट से कोई आय नहीं होती बल्कि जेब से निवेश ही हो जाता है. हमारे लिए न बुनियादी सुविधाएं हैं, न संसाधन और न हमें आर्थिक सहयोग मिलता है. हमें अपनी क्रिकेट किट खरीदनी होती है और सारे संसाधन खुद ही जुटाने पड़ते हैं. जब कुछ बड़े टूर्नामेंट होते हैं तभी बोर्ड अफोर्ड कर पाता है. वरना अगर हम जोनल स्तर पर खेल रहे हैं तो आना-जाना सब हमें ही इंतजाम करना होता है. रोजमर्रा के खर्चों में कटौती कर पैसा बचाकर रखते हैं यह सोचकर कि क्रिकेट खेल रहे हैं तो जरूरत पड़ने पर लगाना पड़ेगा.’

ब्लाइंड क्रिकेटरों को मिलने वाले मेहनताने की बात की जाए तो जब उनकी टीम कोई प्रतिस्पर्धा जीतती है तो उसमें मिलने वाली इनामी राशि ही उनका मेहनताना होती है जिसे वे आपस में बांट लेते हैं. जबकि कुछ समय पहले तक तो जीतने वाली टीम को कोई राशि नहीं मिलती थी

कुछ ऐसा ही हाल है टीम के कप्तान आंध्र प्रदेश के रहने वाले अजय रेड्डी का, जो स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद में काम करते हैं, वे बमुश्किल इतनी पगार पाते हैं कि अपने बीवी-बच्चों का पेट पाल सकें. वे बताते हैं, ‘हम पेशेवर क्रिकेटर नहीं हैं. खेल से हमको कोई कमाई नहीं होती. उल्टा हमें जेब से लगाना पड़ता है. मेरे एक बैट का खर्च 15 हजार रुपये आता है और जूतों का 8 से 10 हजार रुपये. इतनी मेरी तनख्वाह भी नहीं है. कम से कम छह महीने तक घर खर्च में कटौती करते हैं तब जाकर इतने पैसों का इंतजाम हो पाता है. बावजूद इसके क्रिकेट खेल रहा हूं तो सिर्फ इसलिए कि इस खेल से मुझे प्यार है, क्रिकेट के लिए जुनून है, देश गर्व कर सके ऐसा कुछ करने की इच्छा है.’

छठी कक्षा तक अजय की आंखें सामान्य थीं फिर उन्हें दिखना बंद हो गया तो ब्लाइंड स्कूल में उनका दाखिला करा दिया गया. वे क्रिकेट को बहुत पसंद करते थे और देश के लिए खेलना चाहते थे लेकिन दुर्भाग्य कि वे अपनी आंखें खो चुके थे. स्कूल में उन्होंने ब्लाइंड क्रिकेट के बारे में जाना. ऐसा सुना कि पाकिस्तान इस खेल का चैंपियन है. दो बार से वही विश्वकप जीत रहा है. यहां से उन्होंने यह ठानकर ब्लाइंड क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया कि भारत के लिए विश्वकप लाना है. ‘बी 2’ श्रेणी के खिलाड़ी अजय बताते हैं, ‘विश्वकप जीतकर बचपन का सपना तो पूरा कर लिया पर हमें कभी भी वो सम्मान नहीं मिला जिसके हम हकदार हैं. एक ओर जहां सामान्य क्रिकेटरों को खेलने के एवज में करोड़ों रुपये मिलते हैं तो वहीं हम खुद से पैसा लगाकर खेलते हैं. हमारे क्रिकेट में सामान्य क्रिकेट से ज्यादा एकाग्रता की जरूरत होती है. इसके अलावा संसाधनों का इतना अभाव है कि हम किसी भी बड़े टूर्नामेंट से पहले सिर्फ 15-20 दिन प्रैक्टिस कर पाते हैं. वहीं पाकिस्तान तीन महीने तक प्रैक्टिस कर मैदान में उतरता है. वहां ब्लाइंड क्रिकेट को बहुत समर्थन मिलता है. उनके लिए क्रिकेट अकादमी हैं. खिलाड़ियों को पगार भी दी जाती है. सरकार और मुख्य क्रिकेट बोर्ड पीसीबी का उन्हें पूरा समर्थन है. पर हमें न तो सरकार से मदद मिलती है और न बीसीसीआई हमें मान्यता दे रहा है.’

ओडिशा के जफर इकबाल भी इन सबसे जुदा नहीं हैं. वे 2006 से भारतीय टीम का हिस्सा हैं. ‘बी 1’ श्रेणी के खिलाड़ी जफर बताते हैं, ‘रोज प्रैक्टिस का मौका नहीं मिलता यही सबसे बड़ा दुर्भाग्य है क्योंकि ब्लाइंड क्रिकेट में कोई क्रिकेट अकादमी नहीं है. एक अकादमी अभी खुली है जो केरल में है तो मैं केरल तो जा नहीं सकता. अगर प्रैक्टिस करनी हो तो 500 रुपये एक दिन का खर्च करना पड़ता है वो भी तब जब ग्राउंड खाली मिल जाए. पहले ग्राउंड के लिए आग्रह करो फिर अकेले तो प्रैक्टिस कर नहीं सकता इसलिए लड़के जुटाने पड़ते हैं, उन्हें काॅलेज से लाओ और वापस पहुंचाओ. इसलिए जब कोई जरूरी सीरीज खेलनी होती है तभी प्रैक्टिस करते हैं. सबसे बड़ी समस्या यही है कि सभी राज्यों में कम से कम एक ब्लाइंड क्रिकेट अकादमी होनी चाहिए, जिससे इस क्रिकेट को बढ़ावा मिले. आप सामान्य क्रिकेट देखो, जगह-जगह अकादमी हैं. पर ब्लाइंड क्रिकेट में क्रिकेट क्लब और अकादमी कहीं नहीं हैं. जिससे हम भी प्रैक्टिस कर सकें. जब प्रैक्टिस ही नहीं होगी तो नए लड़के कैसे निकलेंगे?’

साथ ही वे बताते हैं कि उनके क्रिकेट को इतना बढ़ावा नहीं है कि वे इसे अपना पेशा बना सकें. जफर कहते हैं, ‘जब पेशा समझूंगा तभी रोज प्रैक्टिस कर सकूंगा. अभी तो स्थिति यह है कि जब क्रिकेट के टूर पर कहीं जाते हैं तो नौकरी से छुट्टी का पैसा कट जाता है. ऐसी परिस्थितियों में आखिर कब तक हम खेल पाएंगे और नई प्रतिभाएं कैसे सामने आएंगी?’ अगर ब्लाइंड क्रिकेटरों को मिलने वाले मेहनताने की बात की जाए तो जब उनकी टीम कोई प्रतिस्पर्धा में जीतती है तो उसमें मिलने वाली इनामी राशि ही उनका मेहनताना होती है जिसे वे आपस में बांट लेते हैं. लेकिन यह राशि भी बेहद मामूली होती है. जबकि कुछ समय पहले तक तो जीतने वाली टीम को कोई राशि मिलती भी नहीं थी.

विश्वकप विजेता टीम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मुलाकात की थी. बावजूद इसके ब्लाइंड क्रिकेट के आर्थिक हालात में कोई सुधार नहीं आया
विश्वकप विजेता टीम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मुलाकात की थी. बावजूद इसके ब्लाइंड क्रिकेट के आर्थिक हालात में कोई सुधार नहीं आया

देश में ब्लाइंड क्रिकेट का संचालन करने वाला बंगलुरु स्थित क्रिकेट एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड इन इंडिया (कैबी) भी आर्थिक रूप से उतना सक्षम नहीं है कि खिलड़ियों को खेलने के एवज में कोई आर्थिक राशि दे सके और न ही उसके पास इतने संसाधन हैं कि वह खिलाड़ियों की प्रैक्टिस के लिए सुविधाएं जुता सके. वह स्वयं उस ‘समर्थनम ट्रस्ट’ के सहयोग से चल रहा है जो दान पर आश्रित है. वह इतना भी मुश्किल से जुटा पाता है कि टीम को विदेशी दौरों पर भेज सके और देश भर में टीम चयन की प्रक्रिया चला सके.

कैबी के कोषाध्यक्ष ई. जॉन डेविड बताते हैं, ‘सभी खिलाड़ी सामान्य पृष्ठभूमि के हैं. कोई छात्र है तो किसी की बैंक में नौकरी है तो कोई खेती करता है तो कोई मजदूर है. क्रिकेट खेलकर इन्हें एक रुपया भी हासिल नहीं होता. हम उन्हें पैसा नहीं दे पाते, वे बस खेल के प्रति अपने जुनून और देशप्रेम की खातिर खेलते हैं. अगर उन्हें कुछ पैसा मिलता भी है तो वो बोनस मान लीजिए. वहीं इन लोगों को काम से छुट्टी मुश्किल से ही मिल पाती है, इसलिए हमें चयन का ट्रायल भी उस हिसाब से रखना पड़ता है कि ये लोग आ सकें. विश्वकप के समय ही खिलाड़ियों को लगभग 35 दिन देने पड़े थे. इतनी विषमताओं के बावजूद उनका प्रदर्शन विश्वस्तरीय से भी ऊंचा है.’ खिलाड़ी ही नहीं टीम के कोच सजु कुमार भी टीम को निःशुल्क प्रशिक्षण देते हैं. वे कहते हैं, ‘मेरा भुगतान यही है कि खिलाड़ी देश के लिए खेलकर सम्मान ला सकें और मैं उसमें भागीदार बन सकूं. हमें किसी की मदद नहीं मिलती. तब भी हम अपना सब कुछ खेल में झोंक देते हैं. मैदान पर अपना 100 नहीं 150 प्रतिशत देते हैं और आगे भी देते रहेंगे. देश के सम्मान के लिए खेलते रहेंगे और बार-बार जश्न के मौके लेकर आएंगे, फिर आर्थिक हालात साथ दें या न दें.’

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जानिए ब्लाइंड क्रिकेट के बारे में

टीम संयोजन

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ब्लाइंड क्रिकेट में खिलाड़ियों की तीन श्रेणियां होती हैं;

  • बी1 – वे खिलाड़ी जो बिल्कुल नहीं देख सकते.
  • बी2 – वे खिलाड़ी जो 3 मीटर तक देख सकते हैं.
  • बी3 – वे खिलाड़ी जो 6 मीटर तक देख सकते हैं.

ऐसा नियम है कि 11 खिलाड़ियों की एक टीम में कम से कम 4 बी 1 श्रेणी के खिलाड़ी अनिवार्य हैं, 3 खिलाड़ी बी2 श्रेणी से होने चाहिए और बी3 श्रेणी के अधिकतम 4 खिलाड़ी हो सकते हैं.

खेल के नियम

  • खिलाड़ियों की  पहचान उनकी दाहिनी कलाई पर पहने गए बैंड से की जाती है. ‘बी1’ श्रेणी के खिलाड़ी मैदान पर सफेद रिस्ट बैंड पहनकर उतरते हैं, वहीं बी2 लाल और बी3 नीला. साथ ही बी1 खिलाड़ी काला चश्मा पहनकर उतरते हैं जो पूरी तरह से अपारदर्शी होता है. नियमानुसार इसे अंपायर की अनुमति के बगैर छुआ भी नहीं जा सकता.
  • ब्लाइंड क्रिकेट में बारहवें खिलाड़ी के तौर पर हर श्रेणी का एक खिलाड़ी रखा जाता है. मतलब तीन खिलाड़ी बारहवें खिलाड़ी के तौर पर खेलते हैं. कुछ इस तरह समझिए कि अगर कोई बी3 श्रेणी का खिलाड़ी मैदान के बाहर जाता है या बी1 श्रेणी का मैदान के बाहर जाता है तो समान श्रेणी का खिलाड़ी मैदान में उसकी जगह लेता है.
  • खेल में दो अंपायर और एक मैच रेफरी का प्रावधान है.
  • बी1 खिलाड़ी को बल्लेबाजी के दौरान रनर उपलब्ध कराया जाता है जबकि बी2 खिलाड़ी के पास विकल्प होता है कि वह चाहे तो रनर ले ले. लेकिन जो खिलाड़ी एक बार रनर ले लेता है तो वह किसी और के लिए रनर नहीं बन सकता.
  • रनर के नाम अंपायर को मैच शुरू होने से पहले देने होते हैं.
  • बी1 बल्लेबाज द्वारा बनाए गए हर रन को 2 रन के बराबर गिना जाता है.
  • क्षेत्ररक्षण के दौरान बी1 द्वारा एक बाउंस पर पकड़ी गई गेंद को कैच माना जाता है और बल्लेबाज आउट हो जाता है.
  • बॉलिंग अंडरआर्म की जाती है.
  • गेंद का बल्लेबाज तक पहुंचने से पहले पिच के बीच एक बाउंस लेना अनिवार्य है, अगर ऐसा नहीं होता तो वह नो बॉल मानी जाती है.
  • गेंद करने से पहले गेंदबाज बल्लेबाज से पूछता है ‘रेडी’, जब बल्लेबाज कहता है ‘यस’ तब वह ‘प्ले’ कहकर गेंद बल्लेबाज की ओर फेंक देता है.
  • गेंदबाजी के दौरान गेंदबाज को नॉन-स्ट्राइकर एंड का स्टंप छूने की इजाजत होती है ताकि वह अंदाजा लगा सके कि उसी लाइन में दूसरे स्टंप पर गेंदबाजी करनी है.
  • गेंद कठोर प्लास्टिक की बनी होती है जिसके अंदर छर्रे भरे होते हैं जिससे गेंद आवाज करती है. उसी आवाज के सहारे कानों से यह खेल खेला जाता है.
  • स्टंप के ऊपर गिल्लियां नहीं होतीं. जबकि स्टंप धातु के बनाए जाते हैं ताकि गेंद टकराने पर वे भी आवाज करें.
  • विकेटकीपर बी2 या बी3 श्रेणी का होता है. विकेटकीपर का सबसे अहम रोल होता है. गेंदबाजी के पहले वह बी1 खिलाड़ी को ताली देकर बताता है कि उसे किस लाइन में गेंदबाजी करनी है. वहीं बल्लेबाज द्वारा शॉट खेले जाने पर विकेटकीपर क्षेत्ररक्षण कर रहे खिलाड़ियों को बताता है कि शॉट किस दिशा में खेला गया है. उसके बाद खिलाड़ी गेंद की आवाज के सहारे उसे पकड़ लेते हैं.
  • पिच 22 यार्ड लंबी और 3 यार्ड चौड़ी ही होती है.
  • बाउंड्री विकेट से कम से कम 45 यार्ड और अधिकतम 50 यार्ड की होती है.
  • कुल ओवरों का 40 प्रतिशत बी1 गेंदबाजों से कराया जाना अनिवार्य होता है.
  • बाकी सभी वही नियम लागू होते हैं जो क्रिकेट के लिए एमसीसी द्वारा बनाए गए हैं.[/symple_box]

वर्ल्ड ब्लाइंड क्रिकेट काउंसिल, जिसका गठन 1996 में भारत में ही हुआ था, वह भी इतना आर्थिक सक्षम नहीं कि अपने सदस्य देशों की आर्थिक मदद कर सके. सच तो यह है कि जो भी देश मेजबानी करता है वही विजेता को दी जाने वाली इनामी राशि का इंतजाम भी करता है. भारत में ब्लाइंड क्रिकेट के ये हालात हाल ही में पैदा हुए हों ऐसा भी नहीं है. इसके ढाई दशक पुराने इतिहास पर गौर करें तो यह शुरू से ही उपेक्षा का शिकार रहा है. 90 के दशक के शुरुआती सालों में देश में यह खेल चलन में आया. 1990 में पहला नेशनल ब्लाइंड टूर्नामेंट खेला गया. 1998 में भारतीय टीम ने पहला अंतरराष्ट्रीय मैच खेला. उस समय देश में ब्लाइंड क्रिकेट को संभालने वाली संस्था दिल्ली स्थित एसोसिएशन फॉर क्रिकेट फॉर द ब्लाइंड इन इंडिया (एसीबीआई) हुआ करती थी. कहीं से कोई आर्थिक मदद न मिलने के कारण 2008 आते-आते ब्लाइंड किक्रेट अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने लगा.

समर्थनम ट्रस्ट के फाउंडर मैनेजिंग ट्रस्टी और कैबी के सचिव महांतेश जी. बताते हैं, ‘तब ब्लाइंड क्रिकेट मृतावस्था में था. इंग्लैंड से भारतीय टीम को खेलने बुलावा आया था पर एसीबीआई की हालत ऐसी नहीं थी कि वह टीम भेज सके. उस समय हमारे पास देश के दक्षिणी राज्यों के ब्लाइंड क्रिकेट की बागडोर थी. उन्होंने देश भर में ब्लाइंड क्रिकेट को पुनर्जीवित करने की जिम्मेदारी भी हमें सौंप दी. हमने टीम भेजी और 2010 में कैबी का गठन किया. हम तभी से प्रयासरत हैं कि ब्लाइंड क्रिकेट को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला सकें और खिलाड़ियों के लिए जरूरी संसाधन जुटाकर उन्हें खेलने का माहौल प्रदान कर सकें. फंड की समस्या तो अभी भी है. समर्थनम पैरेंट बॉडी है, जब तक कैबी आत्मनिर्भर नहीं होता है, तब तक समर्थनम सहायता कर रहा है और टूर्नामेंट प्रायोजित कर रहा है. पिछली बार जब दक्षिण अफ्रीका गए तब जरूर सरकारी मदद मिल गई थी वरना बहुत दिक्कत होती. लेकिन यह मदद स्थायी नहीं है. अभी बहुत सहयोग चाहिए. विशेषकर खिलाड़ियों के लिए आर्थिक सहयोग. वे बहुत ही विपरीत परिस्थितियों में खेलते हैं.’

ऐसी ही एक कहानी वेंकटेश की भी है जिन्होंने अपने क्रिकेट के जुनून के चलते पढ़ाई को कुर्बान कर दिया और आज महज पांच हजार रुपये मासिक तनख्वाह पर ठेका कर्मचारी के तौर पर काम कर रहे हैं. इंटर के बाद उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए एक प्रवेश परीक्षा देनी थी लेकिन परीक्षा और राष्ट्रीय टीम में चयन की तारीख एक ही दिन पड़ गई. ऐसे में उन्होंने क्रिकेट को चुना. बाद में उनके पिता की तबीयत बिगड़ गई और परिवार बिखर गया. फिर वे आगे की पढ़ाई के बारे में सोच भी नहीं सके और घर-परिवार की जिम्मेदारी उठाने में लग गए. पांच हजार रुपये की मामूली तनख्वाह में वे अपना घर चलाते है और जब क्रिकेट खेलने जाते हैं तो इस तनख्वाह से भी हाथ धोना पड़ता है.

पिछले दिनों कैबी को एक चंदा जुटाने वाली वेबसाइट पर विश्वकप की तैयारियों के लिए चंदा मांगते देखा गया. कैबी ने देश भर में चयन प्रक्रिया चलाने, खिलाड़ियों की यूनिफॉर्म, किट आदि के लिए पचास लाख रुपये चंदे की मांग की. लेकिन बस ढाई लाख रुपये का चंदा इकट्ठा हो सका

टीम के कप्तान अजय बताते हैं, ‘टीम का लगभग हर खिलाड़ी ऐसे ही बुरे हालात में है. केतन और गणेश दिहाड़ी पर काम करते हैं. रोज कमाते हैं तब घर चलता है. एक दिन न कमाएं तो पेट भरना भी मुश्किल हो जाता है. पर क्रिकेट खेलने के लिए वे एक महीना घर छोड़कर आते हैं, वो भी पैसा उधार लेकर. हमारा खेल कानों से खेला जाता है, इसलिए मानसिक एकाग्रता की बहुत जरूरत होती है. लेकिन हर वक्त दिमाग में यही रहता है कि घर पर लोग कैसे होंगे. खाना भी खा रहे होंगे या नहीं? बस जब मैदान में उतरते हैं तो यह सोचकर कि बाहर का बिल्कुल न सोचें, बाहर का सोचा तो खेल नहीं पाएंगे. मैच के बाद शाम को जब खाली समय मिलता है तब परिवार का हाल जानते हैं. बहुत मानसिक दबाव होता है हम पर जो हमारा ध्यान खेल से भटकाता है. लेकिन तब भी हम जब मैदान पर उतरते हैं तो ट्राफी लेकर ही आते हैं.’ वे पूछते हैं, ‘सामान्य क्रिकेटरों को इतना पैसा क्यों दिया जाता है? सिर्फ इसलिए कि वे चिंतामुक्त होकर पूरी एकाग्रता से खेल सकें. वो हम जैसे हालात का सामना नहीं करते. हमें ज्यादा नहीं बस खेल कोटे से एक नौकरी दे दी जाए और एक घर तो हम पूरा ध्यान खेल पर लगाकर और भी अच्छा कर सकेंगे और ये सरकार की जिम्मेदारी है कि वह खेलों को आगे बढ़ाए.’

इस सबके बीच केंद्र में नई सरकार का गठन ब्लाइंड क्रिकेट के लिए उम्मीद की एक नई किरण लेकर आया. टीम जब विश्वकप खेलने दक्षिण अफ्रीका जा रही थी तो भारत सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय द्वारा कैबी को 25 लाख रुपये की सहायता राशि स्वीकृत की गई. साथ ही टीम के विजेता बनकर वापस लौटने पर देश के प्रधानमंत्री ने टीम के साथ मुलाकात की और भारत सरकार के खेल मंत्रालय व सामाजिक न्याय मंत्रालय की ओर से विजेता टीम के हर खिलाड़ी को सात लाख रुपये की इनामी राशि दी गई. हालांकि यह राशि भी ब्लाइंड क्रिकेट की तस्वीर बदलने के लिए काफी नहीं है. महांतेश के अनुसार कैबी कम से कम भी खर्च करता है तो उसका साल भर का बजट डेढ़ से दो करोड़ रुपये बैठता है. इसमें भी खिलाड़ियों की फीस शामिल नहीं है. वहीं एक अन्य समस्या यह भी है कि सरकार से प्राप्त सहायता राशि न तो स्थायी है और न तुरंत मिलती है.

डेविड बताते हैं, ‘पहले हमें प्रस्ताव मंत्रालय भेजना पड़ता है. वहां से स्वीकृति मिलने के बाद यह राशि हमें केंद्रीय बजट के बाद मिलती है. तब तक हमें यहां-वहां से फंड जुटाकर या उधार लेकर काम चलाना पड़ता है.’ एक वाकया बताते हुए वे कहते हैं, ‘हमने नवंबर 2014 में विश्वकप में शामिल होने के लिए सहायता राशि का प्रस्ताव बनाकर सामाजिक न्याय मंत्रालय को भेजा था. 70 लाख का प्रस्ताव था, पर स्वीकृत 25 लाख रुपये हुए. पर यह पैसा तत्काल नहीं मिला. इसलिए टीम जब दक्षिण अफ्रीका जा रही थी तब हमारे पास एजेंट से अपने टिकट और पासपोर्ट लेने तक के पैसे नहीं थे. तब हमने और कुछ दोस्तों ने अपने-अपने क्रेडिट कार्डों से भुगतान किया और अफ्रीका पहुंचे. जून में हमें मंत्रालय से स्वीकृत सहायता राशि प्राप्त हुई. अगर हमें सरकार से मान्यता मिल जाए तो हमारे लिए बजट में एक स्थायी प्रावधान हो जाएगा. हमें इस तरह भटकना नहीं पड़ेगा और समय पर पैसा मिलता रहेगा.’ इन्हीं सब कारणों के चलते पिछले दिनों कैबी को एक चंदा जुटाने वाली वेबसाइट पर इसी साल दिसंबर में भारत में प्रस्तावित टी-20 विश्वकप की तैयारियों के लिए चंदा मांगते देखा गया. लगभग चार महीने चले इस अभियान में कैबी ने देश की जनता से खिलाड़ियों की यूनिफॉर्म, किट, यात्रा, क्रिकेट कैंप लगाने और देश भर में चयन प्रक्रिया चलाने के लिए 50,40,000 रुपये चंदे की मांग की थी. लेकिन बस 2,51,717 रुपये का चंदा जमा हो सका.

हालांकि 2014 की विश्वकप जीत के बाद ब्लाइंड क्रिकेट टीम को मिली प्रसिद्धी से परिस्थितियां थोड़ी सुधरी हैं लेकिन बदली नहीं हैं. सरकार से मिली सात लाख रुपये इनामी राशि से कई खिलाड़ियों को काफी मदद मिली है. वहीं डेविड बताते हैं, ‘इनामी राशि पाने वाले ऐसे कई खिलाड़ी हैं जिनके पास खाने के लिए तो दूर चाय पीने तक के पैसे नहीं थे. कई आंशिक अंधे थे और मजदूरी करते थे. ऐसे ही एक खिलाड़ी फरहान को केरल सरकार ने नौकरी और घर दिया है. जब फरहान को इनामी राशि मिली, उस समय उनकी बहन की शादी नजदीक थी और उनके पास शादी कराने तक के पैसे नहीं थे. लेकिन उनके लिए दोहरी खुशी की बात यह रही कि पूरे समुदाय ने तब उनकी मदद की और वे बहन की शादी धूमधाम से  करा सके. वहीं कर्नाटक सरकार ने अपने राज्य के हर खिलाड़ी को दस लाख रुपये दिए हैं. झारखंड सरकार ने भी हाल ही में गोलू कुमार को एक लाख रुपये की राशि दी है और भविष्य में खेल कोटे के तहत नौकरी देने का आश्वासन दिया है. वह अभी इंटर का छात्र है. इससे पता चल रहा है कि ब्लाइंड क्रिकेट को भी पहचान मिल रही है.’

वेंकटेश ने क्रिकेट के जुनून के चलते पढ़ाई कुर्बान कर दी. पढ़ाई के लिए एक प्रवेश परीक्षा देनी थी लेकिन परीक्षा और राष्ट्रीय टीम में चयन की तारीख एक ही दिन पड़ गई. ऐसे में उन्होंने क्रिकेट को चुना. बाद में उनके पिता की तबीयत बिगड़ गई और वे आगे की पढ़ाई के बारे में सोच भी नहीं सके 

दूसरी ओर विभिन्न राज्य क्रिकेट एसोसिएशनों से भी कैबी को थोड़ी-बहुत सहायता मिलने लगी है. कैबी के अनुसार कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन  ने खेलने के लिए स्टेडियम दे दिया. केरल क्रिकेट एसोसिएशन ने भी मैदान एक हफ्ते के लिए दे दिया था, जिसका कोई शुल्क भी नहीं लिया. उस मैदान का एक दिन का किराया पांच लाख रुपये है. कोलकाता बोर्ड से भी हमें मदद मिली. वहीं आंध्र प्रदेश क्रिकेट बोर्ड ने टीम के इंग्लैंड दौरे का हवाई किराया दिया. ओडिशा क्रिकेट एसोसिएशन ने भी स्टेडियम दिया.

अगर दूसरे देशों की बात करें तो वहां ब्लाइंड क्रिकेट को उनके देश के मुख्य क्रिकेट बोर्ड से पूरा समर्थन मिलता है. पर भारत में बीसीसीआई से कैबी को किसी भी प्रकार की कोई सहायता नहीं मिलती. इस पर महांतेश कहते हैं, ‘2012 में विश्वकप जीतने के बाद हमारी मुलाकात तत्कालीन बोर्ड अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन से हुई थी. तब उन्होंने हमें मान्यता देने का आश्वासन दिया था. इसके बाद 2014 विश्वकप के बाद अनुराग ठाकुर भी हमसे मिले, उन्होंने हमारी उपलब्धियां जानीं और हमारी मदद करने का यकीन दिलाया. जब वे बीसीसीआई में सचिव के पद पर थे तब उन्होंने बोर्ड की वर्किंग कमेटी में भी यह मुद्दा उठाया था, पर तत्कालीन बोर्ड अध्यक्ष जगमोहन डालमिया ने इसे बेतुका बताकर खारिज कर दिया. आज अनुराग ठाकुर अध्यक्ष हैं तो हमें पूरी उम्मीद है कि वे हमारे लिए कुछ करेंगे.’ समर्थनम के जनसंपर्क अधिकारी सतीश के. कहते हैं, ‘हमें बीसीसीआई से कोई बड़ी रकम नहीं चाहिए. हमारा गुजारा तो उतने पैसों में ही हो जाएगा जितना कि शायद आईपीएल की एक पार्टी में खर्च हो जाता है या फिर बोर्ड की एक एजीएम में.’ डेविड कहते हैं, ‘जैसे राज्य क्रिकेट एसोसिएशन हमारी मदद कर रहे हैं वैसे ही मान्यता न मिलने तक अगर कोई छोटी-मोटी मदद बोर्ड से मिल जाए तो काफी राहत मिले. पर बोर्ड अधिकारियों का कहना है कि उन्हें हमें दस करोड़ की राशि देने में भी कोई आपत्ति नहीं है, पर वे बोर्ड के संविधान और नियमावली से बंधे हुए हैं.’

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महांतेश कहते हैं, ‘अगर हमें बोर्ड का लोगो मिलता है तो हमारी बहुत-सी समस्याएं हल हो सकती हैं. सालाना अनुदान मिलने के साथ-साथ खेलने के लिए हमें मैदान उपलब्ध होंगे तो वहीं बीसीसीआई का नाम हमें स्पाॅन्सरशिप दिलाने में भी मदद करेगा. इस तरह हम आत्मनिर्भर बन सकेंगे. अपने खिलाड़ियों को भी आर्थिक मदद दे सकेंगे. आज स्पाॅन्सरशिप के लिए जाते हैं तो पहले यही पूछा जाता है कि बीसीसीआई से क्या आपको मान्यता प्राप्त है.’ वहीं सरकारी रुख पर उनका कहना है, ‘खेल मंत्री सर्वानंद सोनोवाल का रवैया हमेशा हमारे प्रति सहयोगात्मक रहा, वरना पिछली सरकार के खेल मंत्री अजय माकन ने तो कभी हमसे मिलने तक का समय नहीं निकाला था. सारी गड़बड़ी नौकरशाही के स्तर पर है. लालफीताशाही के चलते हमारी फाइल ही आगे नहीं बढ़ाई जाती. बार-बार नई शर्तें जोड़कर हमें चक्कर कटवाए जाते हैं. कभी हमसे कहा जाता है कि हम सबडिसेबल पैरास्पोर्ट से जुड़कर आएं तो कभी कहा जाता है कि क्रिकेट पैरास्पोर्ट का हिस्सा नहीं है.’

कैबी के पदाधिकारियों के अनुसार जरूर बीसीसीआई और वर्तमान सरकार का रुख अब तक ब्लाइंड क्रिकेट को लेकर सकारात्मक रहा हो लेकिन देखा जाए तो बावजूद इसके अब तक परिणाम नहीं आए हैं. सोचने वाली बात यह है कि जो बीसीसीआई अपने संविधान को अपनी सहूलियत के अनुसार वक्त-बेवक्त बदलता रहा है, उसके पदाधिकारी ब्लाइंड क्रिकेट की मदद करने में संविधान की दुहाई दे रहे हैं. वहीं विश्वविजेता टीम के साथ फोटो खिंचाने वाले और ‘मन की बात’ में ब्लाइंड क्रिकेटरों के कसीदे पढ़ने वाले देश के प्रधानमंत्री, जो अक्सर सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं, उनके कानों में इस बात का न पहुंचना कि विश्वविजेता टीम को अगला विश्वकप खेलने के लिए चंदा इकट्ठा करना पड़ रहा है, आश्चर्यचकित करता है. जफर कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री ने हमें बुलाया, हमसे मिले, ‘मन की बात’ में हमारा जिक्र किया, अच्छा तो लगा. लेकिन इतने से या सात लाख रुपये देने से सारा मसला हल नहीं होता. मुझे सात लाख दे दिए पर मैं हमेशा तो टीम में नहीं खेलता रहूंगा न. जब तक प्रदर्शन कर रहा हूं टीम में हूं. पर जो आने वाली पीढ़ी है वो कैसे आएगी? उसे तो कोई सुविधा ही नहीं है. वे हर दिन खेलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हमारी तरह उन्हें तब कुछ मिलेगा जब टीम में जाएंगे. लेकिन जाएंगे कैसे! उनके पास तो जाने के लिए न कोई सुविधा है और न संसाधन. इस बारे में प्रधानमंत्री को सोचना चाहिए.’

‘हम बिन पैसों के देश का झंडा ऊंचा रखने के लिए खेल रहे हैं. देश के लिए इतना कर रहे हैं लेकिन देश हमारे लिए कुछ नहीं कर रहा. फिर यह सोचकर कि जी तो देश में ही रहे हैं इसलिए अपनी इस कमी के बावजूद देश के लिए कुछ करना हमारा दायित्व बनता है’

बहरहाल कानों से खेले जाने वाले इस खेल  और देश के प्रति खिलाड़ियों का समर्पण देखते बनता है. यही कारण है कि जफर कहते हैं, ‘अगर पैसों के लिए खेलते तो इसे कब का छोड़ चुके होते. कोई हमें सामान्य क्रिकेटरों से भले ही कमतर आंके पर हम स्वयं को परफेक्ट मानते हैं और सोचते हैं कि हम भी देश के लिए खेलकर उसे गर्व का मौका दे सकते हैं. हमारे लिए सबसे बड़ी बात है कि हम भारत के लिए खेलते हैं. बस यह बात सालती है कि जब हम जीतकर आते हैं तो आप कहते हैं भारत जीता ये नहीं कहते कि जफर या अजय जीत गया. फिर भी हम वंचित क्यों हैं?’ वे आगे कहते हैं, ‘हमारी सबसे बड़ी ख्वाहिश यही है कि अगर सरकार और बीसीसीआई मदद दे तो हम पेशेवर के तौर पर खेल सकें. ज्यादा नहीं तो अगर खिलाड़ियों को एक सम्मानजनक नौकरी ही दे दी जाए या जो नौकरी कर रहे हैं उनकी नौकरी खेल कोटे में ले ली जाए तो हमें प्रैक्टिस के लिए मौका मिल जाएगा और खेलने के लिए छुट्टी का मसला नहीं रहेगा. वहीं इनामी राशि तो कभी भी खत्म हो सकती है.’ अजय कहते हैं, ‘कभी-कभी मन में ख्याल आता है कि हम बिन पैसों के देश का झंडा बुलंद रखने के लिए खेल रहे हैं, देश के लिए इतना कर रहे हैं लेकिन देश हमारे लिए कुछ नहीं कर रहा. फिर यह सोचकर कि जी तो देश में ही रहे हैं इसलिए अपनी इस कमी के बावजूद देश के लिए कुछ करना हमारा दायित्व बनता है. हम आस लगाते हैं कि देश हमारी प्रतिभा को पहचाने पर ऐसा होता नहीं है. हां, मीडिया ने हमें थोड़ी-बहुत पहचान जरूर दिलाई है लेकिन अब भगवान भरोसे हैं कि बोर्ड या सरकार कोई सुन ले. लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तब भी हम इसी जुनून के साथ खेलते रहेंगे.’

इस बीच देश में ब्लाइंड क्रिकेट के लिए उम्मीद की किरण यह भी हो सकती है कि जस्टिस लोढ़ा समिति द्वारा बीसीसीआई में सुधार के लिए दिए गए सुझावों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. इनमें एक सुझाव यह भी है कि बीसीसीआई देश में चल रहे हर प्रकार के क्रिकेट को समर्थन प्रदान करे. अगर सुप्रीम कोर्ट बीसीसीआई को सुझावों को मानने के लिए आदेश देता है तो ब्लाइंड क्रिकेट को स्वत: बीसीसीआई का साथ मिल जाएगा. बहरहाल ऊंट किस करवट बैठता है, यह तो भविष्य ही निर्धारित करेगा. 

किसी मुसलमान को यह हक नहीं है कि वह गलत काम करे और मजहब की आड़ में इसे छिपाए : नजमा हेपतुल्ला

फोटोः कृष्णकांत
फोटोः कृष्णकांत
फोटोः कृष्णकांत

अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री के रूप में आपके दो साल पूरे हो गए हैं. इस दौरान मंत्रालय की क्या खास उपलब्धियां रहीं?

पिछले दो सालों के दरमियान हमारे मंत्रालय को जितना बजट मिला है, हमने उसमें से 99 प्रतिशत पैसों को आवंटित कर दिया है. हमारे यहां अल्पसंख्यकों के छह समुदाय हैं. इन सबकी समस्याएं भी अलग-अलग हैं. हमने इन सभी के कल्याण के लिए अलग-अलग कार्यक्रम बनाए हैं. इसका कारण यह है कि एक ही कार्यक्रम सभी पर लागू नहीं किया जा सकता था. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के घोषणापत्र में शिक्षा पर सबसे अधिक जोर दिया गया है. इसका पालन करते हुए हमारे मंत्रालय ने अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों की शिक्षा के क्षेत्र में सबसे अधिक मदद और प्रोत्साहन की प्रक्रिया शुरू की है. इसमें हमें पर्याप्त सफलता भी मिली है. हमारा जोर सबका खासकर मुसलमानों का विकास करना है. इसका कारण यह है कि मुसलमानों में शिक्षा का अभाव है. इसके चलते वे विकास की दौड़ में शामिल नहीं हो पाते हैं. इसलिए अलग-थलग पड़ रहे हैं. उन्हें शिक्षा मुहैया कराकर हम मुख्यधारा में शामिल कर लेंगे.

मैं पार्टी के लोगों के साथ-साथ देशवासियों से भी यह कहना चाहती हूं कि अगर वे देश को आगे बढ़ाने में मदद नहीं कर पा रहे हैं तो कम से कम अड़चनें न पैदा करें. जो लोग आपत्तिजनक बयान दे रहे हैं, वे एक तरह से मोदी के विकास के एजेंडे में रुकावट ही पैदा कर रहे हैं

लाखों की तादाद में हम अल्पसंख्यक छात्रों को छात्रवृत्ति और फेलोशिप मुहैया करा रहे हैं. इसमें करीब 46 प्रतिशत महिलाओं की संख्या है. हमने 10वीं और 12वीं की मुस्लिम छात्राओं को मौलाना आजाद फेलोशिप के तहत छात्रवृत्ति दी है, ताकि उनकी पढ़ाई में किसी तरह की अड़चन न आए. अगला लक्ष्य कौशल विकास है. इसके लिए मौलाना आजाद नेशनल एकेडमी फॉर स्किल्स डेवलपमेंट के तहत विभिन्न कौशलों को बढ़ावा देने की प्रक्रिया शुरू की गई है. इससे बड़ी संख्या में अल्पसंख्यकों और मुसलमानों के बच्चे लाभान्वित हो रहे हैं. मदरसों में स्किल डेवलपमेंट के लिए हमने ‘नई मंजिल’ कार्यक्रम की शुरुआत की है. यह कार्यक्रम विश्व बैंक को बहुत ही पसंद आया है. उसने इस कार्यक्रम के लिए हमें लोन भी दिया है. साथ ही वह इसे अफ्रीकी देशों में लागू करने की योजना भी बना रहा है. इसके अलावा प्रधानमंत्री का नया पंद्रह सूत्री कार्यक्रम अल्पसंख्यकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.

मोदी सरकार पर मुसलमानों की उपेक्षा करने का आरोप लगता रहा है. अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री होने के नाते आप इन आरोपों से किस हद तक सहमत और असहमत हैं?

यह आरोप बिल्कुल गलत है. लोकसभा चुनाव के दौरान ही विपक्ष यहां तक आरोप लगाता रहा कि यदि मोदी सरकार आ गई तो मुसलमानों का कत्लेआम हो जाएगा. अल्पसंख्यक मंत्रालय खत्म कर दिया जाएगा. मुसलमानों पर ज्यादती होगी, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाएगा. लेकिन क्या ऐसा हुआ है? मोदी सरकार ने अल्पसंख्यक मंत्रालय को खत्म करने के बजाय इस साल के बजट में 90 करोड़ रुपये बढ़ा दिए हैं. इसके अलावा पिछली सरकारों द्वारा नेशनल माइनॉरिटीज डेवलपमेंट ऐंड फाइनेंस कॉरपोरेशन को आवंटित 1500 करोड़ का बजट भी खत्म हो गया था. पिछली सरकार के मंत्री जो आज हमारी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं उन्होंने कुछ भी नहीं किया. वे सिर्फ मोदी के नाम पर डराते रहे. हमने मंत्रिमंडल में इस प्रस्ताव को रखा और मंत्रिमंडल ने न सिर्फ इसके लिए फंड आवंटित किया बल्कि बजट बढ़ाकर 3000 करोड़ कर दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबका साथ, सबका विकास का नारा दिया है. हमारी सरकार समाज के सभी वर्गों के साथ बराबरी का रवैया अपनाए जाने के अपने वादे पर बखूबी काम कर रही है. जहां तक बात मुसलमानों के पिछड़ेपन की है तो वे आजादी के बाद से ही कांग्रेसी सरकारों की नीतियों की वजह से अलग-थलग पड़ गए थे. पिछली सरकारों ने उन्हें आर्थिक और शैक्षिक क्षेत्र में पीछे छोड़ दिया था, इसलिए अभी वे पिछड़े हैं लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं रहेगी. अब अन्य सभी वर्गों के साथ उन्हें भी समान अवसर प्रदान किए जा रहे हैं.

भाजपा के कुछ नेता अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के खिलाफ लगातार उल्टे-सीधे बयान देते रहते हैं, उन्हें पाकिस्तान भेजे जाने की बात करते हैं. इसे लेकर कोई खास कार्रवाई उन पर नहीं होती है. इसका क्या कारण है?

देखिए, अभी इस तरह के बयान देने वाले नेताओं ने चुप्पी साध रखी है. हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आचरण से ऐसे नेताओं की बोलती बंद कर दी है. जो ऐसा बयान दे रहे थे वे अब जान गए हैं कि उनकी सोच गलत थी और हमारे प्रधानमंत्री की सोच इससे अलग है. प्रधानमंत्री की सोच सबका साथ, सबका विकास है. वैसे भी हमारे देश की आबादी एक अरब से ज्यादा है. इसमें सब तरह के लोग होते हैं. ऐसे आलतू-फालतू बयान देने वाले लोगों को तवज्जो देने की जरूरत नहीं है. वैसे भी मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से सांप्रदायिक दंगों की संख्या में भारी कमी आई है. मैं पूरे विश्वास के साथ यह कहना चाहूंगी कि मोदी सरकार के इन दो सालों में मुसलमानों में विश्वास पैदा हुआ है. मोदी सरकार के प्रति चिंता और भय की जो भावनाएं थीं वे अब दूर हुई हैं  

हाल में दादरी में हुए गोमांस विवाद के बाद भी भाजपा नेताओं ने आपत्तिजनक बयान दिए. इस मामले की रिपोर्ट आ जाने के बाद भी यह जारी है. इस पर आपका क्या कहना है?

यह मामला कोर्ट के सामने है. मुझे इस बात पर फख्र है कि हमारी अदालतें ऐसी किसी भी बात से प्रभावित नहीं होती हैं. जो उसका फैसला आएगा, वह सब मानेंगे. अदालत के मामले में हमारा कुछ बोलना उचित नहीं है. जो लोग इस तरह की बातें कर रहे हैं, उनके लिए मेरा सिर्फ यही कहना है कि वे न तो देश का भला कर रहे हैं और न ही पार्टी का. अगर हमें देश को आगे बढ़ाना है तो हमें उस नेता का साथ देना होगा जो सबका साथ और सबका विकास के नारे के साथ देश को आगे ले जा रहा है. हमारे प्रधानमंत्री लगातार बिना थके इस काम में लगे हुए हैं. ऊपरवाले ने उन्हें बहुत ताकत दी है. मैं पार्टी के लोगों के साथ देशवासियों से कहना चाहती हूं कि अगर वे देश को आगे बढ़ाने में मदद नहीं कर पा रहे हैं तो कम से कम अड़चनें न पैदा करें. जो लोग आपत्तिजनक बयान दे रहे हैं, वे एक तरह से मोदी के विकास के एजेंडे में रुकावट ही पैदा कर रहे हैं. उन्हें सोचना चाहिए कि वे जिस डाल पर बैठे हैं उसी को काट रहे हैं.

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सबसे पहली बात यह है कि बड़ी संख्या में ऐसे युवक जब गिरफ्तार किए गए थे तब सरकार किसकी थी. उस समय उनकी सरकार थी जो आज मोदी और सरकार को सांप्रदायिक बताते हैं. उन लोगों ने बिना किसी सबूत के ऐसे लड़कों को गिरफ्तार किया जिनका जुर्म सिर्फ इतना था कि वे मुस्लिम थे

तीन तलाक को लेकर इन दिनों मुस्लिम समुदाय में खूब बहस हो रही है. बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं इसके विरोध में क्यों हैं? 

ये पुरुष प्रधान दुनिया है. हर मर्द अपने नजरिये से सोचता है. अगर धर्म और कानून को अलग रखकर भी हम बात करें तो एक मानवीय पक्ष भी होता है. अगर आपने किसी से शादी की है तो आप उसे ऐसे निकालकर फेंक देंगे. ये सोचने वाली बात है. इस्लाम में तलाक की इजाजत है पर यह जरूरी नहीं है और ऐसी बहुत सारी इजाजतें हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि उनका इस्तेमाल ही किया जाय. पैगंबर ने उनको अच्छा नहीं माना है. वैसे भी एक बार में तीन तलाक की व्यवस्था नहीं है. तलाक देने की पूरी प्रक्रिया को तीन महीने में पूरा होना है. अब अगर आप एक बार में तीन तलाक दे देते हैं और बाद में पता चलता है कि महिला गर्भवती है तब क्या होगा? इसलिए यह व्यवस्था की गई है कि तीन महीने तक इंतजार किया जाए. हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं. हमें समाज को देखकर बदलाव लाना होगा. किसी मुसलमान को यह हक नहीं है कि वह गलत काम करे और मजहब की आड़ में इसे छिपाए. कोई बुरा आदमी है और वह कत्ल करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए. अगर वह इसे धर्म की आड़ में छिपाना चाहता है तो यह गलत है. किसी धर्म में गलत बातों की इजाजत नहीं है. धर्म को इससे बाहर रखना चाहिए. दरअसल लोगों के लिए यह आसान होता है कि वे अपनी गलती छिपाने के लिए धर्म की चादर ओढ़ लेते हैं. ये जो हो रहा है इसके खिलाफ समाज में से ही आवाज उठेगी. अभी लड़कियां अपने हक के लिए आवाज उठा रही हैं. कुछ दिन में लड़के भी शिक्षित और समझदार हो जाएंगें और वे भी इसे मानने से इनकार कर देंगे.    

आतंकवाद के नाम पर बड़ी संख्या में फर्जी तरीके से गिरफ्तार किए गए मुस्लिम युवकों को कोर्ट ने रिहा कर दिया है. इन युवकों के कई कीमती साल बिना किसी जुर्म के जेल में बर्बाद हो गए. ऐसे युवकों के लिए मंत्रालय क्या कर रहा है?

सबसे पहली बात यह है कि बड़ी संख्या में ऐसे युवक जब गिरफ्तार किए गए थे तब सरकार किसकी थी. उस समय उनकी सरकार थी जो आज नरेंद्र मोदी और हमारी सरकार को सांप्रदायिक बताते हैं. उन लोगों ने बिना किसी सबूत के ऐसे लड़कों को गिरफ्तार किया जिनका जुर्म सिर्फ इतना था कि वे मुस्लिम थे. अब अदालत से सब साफ बरी हो रहे हैं.

अभी हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अमेरिका में साफ-साफ कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है. जहां तक मंत्रालय के काम का सवाल है तो हमारी इसमें कोई खास भूमिका नहीं है. हम कोई हर्जाना वगैरह तो दे नहीं सकते हैं. अगर ऐसे युवक अपने जीवन-यापन के लिए कोई स्किल सीखना चाहते हैं तो हम उन्हें प्राथमिकता देंगे. अगर वे कारोबार करना चाहते हैं तो हम उन्हें मंत्रालय से लोन दिलाएंगे. हमें उनके बेहतर भविष्य की चिंता है.

‘हां, मैं चाहती हूं कि चुनाव प्रचार की कमान कैप्टन अमरिंदर सिंह ही संभाले’

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आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत की क्या संभावनाएं देखती हैं?

कांग्रेस राज्य में सरकार बनाने के लिए तैयार है. जीत के लिए अच्छी संभावनाएं दिख रही हैं. पिछले चुनावों में भी करीब 20 विधानसभा क्षेत्रों में जीत का मार्जिन बहुत कम था. हम पंजाब चुनावों के इतिहास में सबसे सशक्त विपक्ष के रूप में सामने आए हैं. नौ साल तक सही से शासन न चलाने से अकाली दल की पोल खुल चुकी है. जनता उनसे निराश हो चुकी है. वे कृषि, बेरोजगारी, ड्रग्स और सबसे जरूरी कानून और व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर कुछ नहीं कर पाए. अनाज की खरीद-फरोख्त तो दूसरा मसला है.

कांग्रेस किसानों के लिए और उनके साथ हमेशा खड़ी रही है, वहीं जो लोग (बादल परिवार) किसानों का हितैषी होने का दावा करते थे, 1200 करोड़ रुपये के अनाज घोटाले के बाद उनकी भी असलियत सामने आ चुकी है. शिरोमणि अकाली दल व्यवस्थाओं में सुधार करने के बजाय अपनी सफाई पेश करने के लिए विज्ञापनों में फिजूलखर्च कर रहा है. वे क्या साबित करना चाहते हैं? क्या इतनी मात्रा में अनाज के गायब होने के बारे में रिजर्व बैंक झूठ बोल रहा है? या भारतीय स्टेट बैंक का पंजाब सरकार को दिए गए लोन को नॉन-परफॉर्मिंग एसेट की श्रेणी में डालना गलत है? सरकार किसे बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रही है? उन्हें समझना होगा कि जनता समझदार हो रही है और पहले की तरह वो इनके जाल में नहीं फंसेगी. पंजाब में परिवर्तन का एकमात्र विकल्प कांग्रेस है.

क्या आप मानती हैं कि अन्य राज्यों के चुनावों में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन का पंजाब में कोई असर होगा?

पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है और यहां मुद्दे बाकी राज्यों से काफी अलग हैं. हमारी यहां अच्छी पकड़ है. इसका अंदाजा हमारी रैलियों को मिलने वाली प्रतिक्रियाओं से लगाया जा सकता है. बल्कि अगर मैं कहूं कि पंजाब के परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर बदलाव लाएंगे, वो सही होगा. पंजाब चुनाव कांग्रेस के लिए गेम चेंजर साबित होंगे.

बड़ी चुनौती कौन है, अकाली दल या आम आदमी पार्टी?

मुझे तो कहीं भी कोई चुनौती नहीं दिखती. अगर शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन पंजाब में बेनकाब हो चुका है तो दिल्ली में आप की पोल खुल चुकी है. मुझे कोई एक सार्थक परिवर्तन बताइए जो आप सरकार दिल्ली में लाई हो. लोग इन्हें कभी माफ नहीं करेंगे कि ये कैसे अन्ना हजारे आंदोलन से एक राजनीतिक दल बनकर खड़े हुए थे और अब क्या कर रहे हैं. क्या अब भी इनकी वही विचारधारा है?

माना जाता है कि कांग्रेस में अंदरूनी कलह है.

यहां मैं ‘अंदरूनी कलह’ शब्द नहीं बल्कि ‘लोकतंत्र’ कहना चाहूंगी. ये किसी एक परिवार या एक व्यक्ति द्वारा चलाई जा रही पार्टी नहीं है जैसे अकाली दल में बादल हैं, आप में केजरीवाल या भाजपा में मोदी. हमारे पास बड़े नेता हैं जिन्होंने आड़े वक्त में खुद को साबित किया है. हम सबका अपना दृष्टिकोण है और यही लोकतंत्र है. अगर हमारे बीच कोई मतभेद रहा है, तो आपसी समझ से हम इसे समय-समय पर सुलझाते रहे हैं. इस समय पूरी पंजाब कांग्रेस एक साथ है और कहीं भी कोई मतभेद नहीं है. हमारा एकमात्र उद्देश्य राज्य से भ्रष्टाचार और वंशगत राजनीति को खत्म करना है.

पूर्व में आप कैप्टन अमरिंदर का विरोध कर चुकी हैं और इस बार आपने उनका पक्ष लिया.

हां, मैं चाहती हूं कि अमरिंदर सिंह ही इस बार प्रतिनिधित्व करें. वे पार्टी के बड़े नेता हैं उन्हें क्यों आगे नहीं आना चाहिए? जैसा मैंने आपसे पहले भी कहा कि विभिन्न मुद्दों पर हमारी राय अलग हो सकती है पर हम एक-दूसरे की बात का सम्मान करते हैं.

ऐसा भी सुना जाता है कि पार्टी हाईकमान के प्रभुत्व के चलते कैप्टन अमरिंदर सिंह को भी स्वतंत्र रूप से फैसले लेने का अधिकार नहीं है.

कांग्रेस एक राष्ट्रीय दल है. और ये तो सभी जानते हैं कि प्रदेश इकाइयां हमेशा हाईकमान के साथ मिलकर काम करती हैं. साथ ही, पार्टी हाईकमान यह भी सुनिश्चित करता है कि जिस भी व्यक्ति को जिम्मेदारियां दी जाएं, उसे रणनीतियों को लागू करने और अपने हिसाब से काम करने की आजादी भी मिले क्योंकि स्थानीय नेता ही राज्य और वोटरों की नब्ज जानता है. और फिर किसी महत्वपूर्ण फैसले में राष्ट्रीय नेतृत्व से मार्गदर्शन लेना तो प्रादेशिक इकाइयों के हित में भी होगा.

अकाली दल लंबी अवधि से सत्ता में है जिसका अर्थ है अकूत धन. पिछले कुछ सालों में उन्होंने हर तरफ से पैसा कमाया है. वे निश्चय ही सरकारी इकाइयों का अपने हित में इस्तेमाल करेंगे जैसा उन्होंने पहले भी किया है. यहां वोटरों को भी जागरूक होना पड़ेगा कि वे वादों और पैसों के लालच में न आएं

आगामी चुनावों के लिए बनी पार्टी की कार्यकारी समिति में 36 उपाध्यक्ष और 96 महासचिव हैं. क्या ये समिति छोटी नहीं होनी चाहिए थी?

मेरे ख्याल से ये फैसला पार्टी के हित को ध्यान में रखकर लिया गया है.

इस चुनावी अभियान में कांग्रेस का फोकस किस पर रहेगा, अकाली दल के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार पर या रोजगार उपलब्ध कराने और विकास की रफ्तार बढ़ाने पर?

हम सभी मुद्दों पर काम करेंगे पर प्रमुख एजेंडा विकास ही है. हालांकि जब भी चुनाव आते हैं, अकाली दल पंथ की बात करके समुदायों को बांटने की कोशिश करता है पर जनता इस बंटवारे की राजनीति से आजिज आ चुकी है. वैसे हमें अकालियों की सच्चाई उनके काले कारनामों के जरिए  सामने लानी होगी. बेरोजगारी भी एक बड़ा मुद्दा है जिससे राज्य जूझ रहा है. हम राज्य में निवेश लाकर रोजगार उत्पन्न करने के बारे में दृढ़ हैं.

चुनावों में  ‘एनआरआई’  फैक्टर कितना जरूरी है? क्या प्रवासी भारतीयों को लुभाने में समय और मेहनत लगाना सही है?

प्रवासियों को सिर्फ वोट बैंक के नजरिये से देखना सही नहीं है. वे इसी जमीन के बेटे-बेटियां हैं. इस जमीन से उनकी भावनाएं जुड़ी हैं, जो कभी नहीं बदलेंगी. उनके भी सरकार से जुड़े कुछ मुद्दे हैं और चुनावी प्रक्रिया में भाग लेकर प्रवासी भारतीय बदलाव ला सकते हैं.

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ऐसा कहा जा रहा है कि  ‘आप’  ने पंजाब के गांवों में अपनी पैठ बना ली है.

ये तो वक्त ही बताएगा. दिल्ली में आप के खराब शासन को तो हम देख ही रहे हैं. क्या आपको लगता है कि यहां लोग वैसी ही गलती दोहराना चाहेंगे?

पर  ‘आप’  का तो दावा है कि उन्होंने दिल्ली में बहुत कुछ किया है.

ऐसे खोखले दावों से उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा.

सत्तारूढ़ दल के खिलाफ आपकी क्या रणनीति रहेगी?

इसमें चुनाव आयोग की बड़ी भूमिका हो सकती है. अकाली दल लंबी अवधि से सत्ता में है जिसका अर्थ है अकूत धन. पिछले कुछ सालों में उन्होंने हर तरफ से सिर्फ पैसा कमाया है. वे निश्चय ही सरकारी इकाइयों का अपने हित में इस्तेमाल करेंगे जैसा उन्होंने पहले भी किया है. यहां वोटरों को भी जागरूक होना पड़ेगा कि वे वादों और पैसों के लालच में न आएं.

क्या चुनावों से छह महीने पहले ही उम्मीदवारों की घोषणा करना (जैसा अमरिंदर सिंह ने किया है) फायदेमंद होगा?

हां, जनता के सामने ये साफ रहेगा कि उनका प्रतिनिधि कौन होगा. बाकी पार्टियों जैसा नहीं जहां सिर्फ पैसा चलता है और आखिर तक कोई तस्वीर साफ नहीं होती. मैं अमरिंदर सिंह के इस कदम की तारीफ करती हूं.

क्या आपको लगता है कि कांग्रेस के लिए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन करना पार्टी के हित में होगा? बसपा को पिछली बार पांच फीसदी वोट मिले थे.

ये फैसला हम उचित समय आने पर करेंगे.

कैराना के मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है : हुकुम सिंह

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आपने अपने क्षेत्र कैराना के बारे में यह मसला उठाया था कि वहां से पलायन हो रहा है. असलियत क्या है?

आपको मौका लगे तो कैराना विजिट कर लीजिए. कैराना अब किसी भले आदमी के रहने लायक रहा नहीं. परिस्थिति जैसी उभर कर आ रही है, मौके पर उससे ज्यादा गंभीर है. मैंने 346 लोगों की लिस्ट दी थी, जो मुझको मिल सकी. हर चीज की कुछ बातें होती हैं. मैंने लिस्ट दी थी 346 की. अब इतना तो संभव है नहीं कि उनका आईडी कार्ड भी लेता. मेरे सामने एक रिपोर्ट आई कि यहां से पलायन हो रहा है. पलायन तो मेरे सामने बहुत समय से हो रहा था. यहां गुंडागर्दी का, अपराधीकरण का मामला इतना बढ़ गया था कि किसी भी व्यापारी के लिए वहां रहना मुश्किल था. उनका मुख्य टारगेट वहां का व्यापारी था क्योंकि व्यापारी कभी भी लड़ना नहीं चाहता, न लड़ना उसके वश का है. और लोग समझते हैं कि व्यापारी है, जल्दी पैसा दे ही देगा. तो उन्हीं को टॉरगेट किया गया. किसी से दो लाख, किसी से पांच लाख, किसी से दस लाख मांगे गए. जिसने दे दिया तो उसकी रकम और बढ़ा दी गई. फिर ये हुआ कि किसी ने कहा कि साब मैं तो दो ही दे पाऊंगा तो उन्हें सबक सिखाने और संदेश देने के लिए कि जो मेरी बात नहीं मानेगा, हम उसका इलाज ये करते हैं. फिल्मी स्टाइल में आकर कहते थे कि क्या हमारी औकात एक लाख की है. हमने तो इतने पैसे मांगे थे. हम उसी का सबक सिखाने आए हैं और उसे वहीं पर मार दिया, फिर हथियार लहराते हुए पूरे बाजार में घूमते हुए चले गए. इससे पूरे बाजार में क्या मैसेज जाएगा? इसके चलते लोग वहां से पलायन कर गए. अब लोग कह रहे हैं कि मुस्लिमों का भी पलायन हुआ. मैं जिम्मेदारी के साथ कहता हूं कि मुसलमानों का पलायन नहीं हुआ, क्योंकि वहां मुस्लिम व्यापारी नहीं थे. अगर रहे होते तो वे भी इसी तरह टारगेट बनते. सारा व्यवसाय वहां पर दो समाजों के लोग करते हैं, वैश्य समाज और जैन समाज. उन्हीं को निशाना बनाया गया. लोग वहां से गए और अभी और जाएंगे.

जब इस तरह सरेआम हत्या और फिरौती की घटनाएं हुईं तो ऐसे तत्वों को रोका क्यों नहीं गया? कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

हत्या हुई तो एफआईआर भी हुई. जहां तक पकड़े जाने की बात है तो मैं बता देता हूं कि कैराना में दो गैंग हैं. मुकीम और फुरकान. ये दो कुख्यात नाम हैं, जिन्होंने अपना माहौल बनाया. दोनों संयोग से मुस्लिम हैं इसलिए ये मामला सांप्रदायिक बनाया जा रहा है. मैं पहले दिन से कह रहा हूं कि यह सांप्रदायिक मामला नहीं है. हमें कम्युनल और क्रिमिनल में अंतर करना चाहिए. और ये भी मैं बता रहा हूं कि ये जो कम्युनल बनाने की साजिश है. इसमें एक तो मीडिया का हाथ है उसे छोड़ दीजिए, इसके पीछे का एक कारण ये भी है कि अगर कम्युनल बन गया तो इन दोनों गैंग्स को प्रोटेक्शन मिल जाएगा कि मुसलमान होने के नाते हमें फंसाया गया.

आपके प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद ही मीडिया में खबरें छपीं और यह संदेश प्रसारित हुआ कि मुसलमानों के खौफ से हिंदुओं का पलायन हो रहा है.

नहीं-नहीं, ये कहीं नहीं लिखा गया. मैं असहमत होने की इजाजत चाहता हूं. मेरा स्टैंड शुरू से ही यही रहा है कि अपराधियों के खौफ से लोग गए हैं और अपराधी संयोग से मुस्लिम हैं. मैंने अपना स्टैंड कभी नहीं बदला.

लेकिन स्पष्ट सूचना के साथ खबरें छपीं कि हिंदुओं का पलायन हो रहा है. कश्मीर से तुलना की गई.

मैंने नाम सब दिए हैं और वे सब नाम हिंदू हैं. अब उसको हिंदू पलायन लिखूं या न लिखूं, क्या फर्क पड़ता है. वे सभी हिंदू हैं, उनके नाम दिए हैं, उनका पेशा दिया गया है, मैंने पते दिए हैं उनके. सब हिंदू हैं तो हिंदू हैं.

जब लोगों ने, पत्रकारों ने वहां जाकर चेक किया तो सूची में गड़बड़ियां पाई गईं. आप पर आरोप लगा कि आप झूठ बोल रहे हैं और माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि विधानसभा चुनाव आ रहा है.

अगर अपराधियों के खिलाफ या अपराधियों के बारे में बात करूंगा तो कम्युनल माहौल बनेगा, मुझे तो यह विश्वास नहीं है, न कभी बना है आज तक. और रही चुनाव की बात, तो कम से कम मैंने उन अपराधियों को चैलेंज तो किया. वो अपराधी कुछ लोगों के काम आते होंगे चुनाव में, मैं तो उनसे काम लेना चाहता नहीं. मैं उनका विरोध आज भी कर रहा हूं, कल भी करूंगा. परिणाम जो भी हो. मैं चुनाव में बाहुबल की चिंता नहीं करता.

आप सांसद हैं. आप ही खौफ में रहेंगे तो जनता का क्या होगा?

यही तो मैं कह रहा हूं. खैर, ऐसी कोई बात नहीं है. आप भी जानते होंगे कि सांसद और विधायक भी कुछ ऐसे होते होंगे, हमारी असेंबली में ऐसे विधायक आज भी हैं जो मूंछें तानकर चलते हैं, जिनसे लोग घबराते हैं. वे जेल में आते हैं हाजिरी लगाने के लिए.

हमारा जो मुख्य सवाल है वो ये है कि चाहे कैराना हो या मुजफ्फरनगर हो, या कहीं भी हो, कोई व्यक्ति उगाही करता है, लोगों को धमकाता है तो पहला काम ये होना चाहिए कि उस पर कार्रवाई हो. उस पर मुकदमा होना चाहिए. ये तो हुआ नहीं. बदमाश तो बेखौफ रहे.

नहीं, ये हुआ है. मैं स्पष्ट कर देता हूं. मुकीम का नाम आया. पहली बार मैंने जब इसका नाम सुना तो सहारनपुर में पेट्रोल पंप पर लूट की थी. पुलिस को जानकारी मिल गई. गाड़ी में बैठकर भागा और पुलिस ने उसका पीछा किया. थोड़ी देर के बाद जब इसकी गाड़ी मुड़ रही थी, एक बहादुर सिपाही ने उतरकर उसको पकड़ना चाहा. इस आदमी ने फुर्ती दिखाई और उसको गोली मार दी. उसकी गन वगैरह भी छीन ली जो आज तक मिली नहीं. आपने कहा उसको पकड़ा जाना चाहिए. उसने कैराना में तो कुछ लोग मारे ही, धीरे-धीरे अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाया. हरियाणा की पुलिस इसके पीछे पड़ गई. वह इसका एनकाउंटर करना चाहती थी. मेरा आरोप ये है कि पुलिस ने किसी नेता के कहने से, मैं नाम नहीं लूंगा, आप दबाव भी मत बनाइए, दबाव बनाकर इसके सरेंडर की नौटंकी की और इसे जेल भिजवा दिया ताकि ये सुरक्षित रहे. जेल में जाकर वह सुरक्षित हो गया और वसूली का काम और तेज कर दिया. मोबाइल पर वो फोन करता था और किसी की औकात नहीं थी कि उसका मोबाइल सुनने के बाद उसे रकम न पहुंचाए. उसने वसूली के लिए अपने एजेंट छोड़ रखे थे. बहुत दिन तक ये क्रम चला. मैंने खुद इस बात की कई बार शिकायत की कि वह तो जेल जाकर और खतरनाक हो गया. मेरे कहने पर उसे जेल से ट्रांसफर किया गया. लेकिन जहां ट्रांसफर किया गया, वहां से भी वही क्रम चलता रहा.

लेकिन आप सांसदों और विधायकों के कहने से भी अगर किसी अपराधी पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है तो यह तो बड़ी गंभीर स्थिति है.

केंद्र सरकार को इसका संज्ञान लेना चाहिए. हमारी लीडरशिप को इसकी जानकारी है. निर्णय उनको लेना है. हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद इसका जिक्र कर चुके हैं राष्ट्रीय कार्यकारिणी में. अब राष्ट्रीय नेतृत्व की जानकारी में तो सारी बात है ही.

प्रशासन की जांच में तो आपकी बात खारिज कर दी गई है?

देखिए, प्रशासन की जांच में वहीं सामने आएगा जो उनके लखनऊ वाले आका चाहेंगे. अगर आपको असली हालात देखना है तो मैं आपको एक नाम बताता हूं. उनका नाम है सूर्य प्रताप सिंह. वो मुजफ्फरनगर में जिलाधिकारी थे. कैराना तब मुजफ्फरनगर का हिस्सा होता था. उन्होंने स्टेटमेंट जारी किया है कि मैं जिलाधिकारी था मुजफ्फरनगर का और कैराना की हालत ऐसी है जहां पर रात में तो छोड़िए, दिन में भी पुलिस की घुसने की हिम्मत नहीं है. कैराना के हालात इतने खराब हैं जिसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. वे प्रिंसिपल सेक्रेटरी के पद से अभी रिटायर हुए हैं. अब ये जो दो-दो महीने पहले आए हुए मजिस्ट्रेट हैं, इनकी जांच वह होगी जो इनको कहा जाएगा. हमने असेंबली में भी ये मुद्दा उठाया था, उसके बाद कुछ अधिकारी हटाए गए और जो अधिकारी आए उन्होंने कुछ करके भी दिखाया. जब तक वो रहे तो किसी की हिम्मत नहीं हुई वसूली करने की. लेकिन उनको एक-डेढ़ महीने में हटा दिया गया. अब इससे अधिकारी का मनोबल टूटेगा कि नहीं? स्थिति बड़ी गंभीर है. ऐसा नहीं है कि मेरे मन में कुछ है क्योंकि चुनाव आ रहा है. मैं 2013 से बराबर कह रहा हूं कि कैराना की हालत बहुत खराब है. कभी-कभी कार्रवाई भी हुई लेकिन ऐसा नहीं हो पाया कि हालत ठीक हो जाए.

लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया में इस तरह प्रसारित हो गया है कि यह सांप्रदायिक मसला है. इसका असर देश के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ेगा.

मैं बता रहा हूं आपको. मैं अपनी बात ही बता सकता हूं. यह पहले दिन से ही शुरू हो गया था और यह तो होना ही था. बहरहाल, रिपोर्ट रोचक तो तभी बनेगी जब उसमें पैबंद लगाए जाएंगे. हेरफेर किया जाएगा. अगर मेरा सीधा बयान ये हो कि अपराधियों ने अपराध कर दिए और लोग चले गए तो मेरे ख्याल से आधे कॉलम की, चौथाई कॉलम की न्यूज बनकर खत्म हो जाएगी. इसलिए उसे रंग दिया गया सांप्रदायिकता का. मैं पहले दिन से ही कह रहा हूं कि यह सांप्रदायिक मामला नहीं है. ये खाली अपराधियों का मामला है. यह संयोग की बात है कि जितने इसमें पीड़ित हैं वे सारे हिंदू हैं और जो क्राइम करने वाले हैं वे मुस्लिम हैं, लेकिन वे मुस्लिम नाम से हैं. वे मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि नहीं हैं. ये गुंडे-बदमाश, जिन्होंने जीना हराम कर दिया, वे समाज के प्रतिनिधि कैसे हो सकते हैं? मैं पहले दिन से कह रहा हूं लेकिन इस बात में आनंद तो नहीं आने का. जब तक ये न कहूं कि हिंदू मामला है. मैंने जो  बयान पहले दिन दिया था, अपने स्टैंड पर कायम हूं. एक इंच इधर से उधर नहीं होऊंगा.

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तो इसे सांप्रदायिक रंग किसने दिया?

अपने आप हो गया सांप्रदायिक रंग. (लोग) जो पढ़ेंगे, देखेंगे कहीं. लोग क्या देखते हैं, टेलीविजन. लोग पढ़ते क्या हैं, अखबार. वे मेरी रिपोर्ट थोड़े पढ़ते हैं.

लेकिन रिपोर्ट तो उसी आधार पर बनती है जो आप बोलते हैं.

आधार… आधार जितना है वह तथ्यात्मक है. ये आदमी है पीड़ित और ये है अपराधी. मैंने इतना बता दिया. ये तथ्य हैं. लेकिन वह आकर्षक न्यूज नहीं है. फिर वो मुझसे सवाल करेंगे कि आप तो सारी घटना का सांप्रदायिकीकरण कर रहे हैं क्योंकि चुनाव आने वाले हैं. आपके राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा है कि हम मुद्दा बनाएंगे. उन्होंने जो कहा है वो ये कहा है कि कैराना और मथुरा में जो कानून व्यवस्था चौपट हुई है, उसको मुद्दा बनाएंगे. मथुरा में तो कोई सांप्रदायिकता नहीं थी न. लेकिन बात आगे तभी बढ़ेगी जब कहा जाएगा कि भाजपा ये कर रही है, वो कर रही है. भाजपा इसको भुनाना चाहती है.

मैं पूछता हूं कि जितने आप लोगों ने वेरीफाई कर लिए होंगे, दस परिवार भी किए होंगे, मेरा सवाल बस इतना है कि क्या उन दस परिवारों को वापस लाने का प्रयास किया और ये आश्वासन दिया कि हम आपको सुरक्षा देंगे? उस तरफ तो एक कदम नहीं बढ़ा. मेरी लिस्ट को कैसे छोटा करें, सारा प्रयास इस पर है.

क्या जिस इलाके में दंगा हो चुका है, हजारों लोग विस्थापित हो चुके हैं, ऐसे संवेदनशील इलाके में ऐसा मसला उठाते हुए सावधानी नहीं रखनी चाहिए?

अब इससे ज्यादा सावधानी क्या हो सकती है कि मैं पहले दिन से कह रहा हूं कि यह सांप्रदायिक मसला नहीं है? जो बात आपने कही, ये मेरे दिमाग में भी थी. मैंने बोलना यहीं से शुरू किया कि यह सांप्रदायिक मसला नहीं है. अभी तक सिर्फ एक मसला पता चला है जहां मुस्लिम परिवार से रंगदारी मांगी गई थी और उनको जाना पड़ा. बाकी कोई मुस्लिम परिवार नहीं गया. वहां पर ऐसा भी हो रहा है कि सारा जिला प्रशासन लगाकर फर्जी आदमी खड़े करके उनसे कहलवाया जा रहा है कि मैं तो यहीं हूं जी. मैं तो कहीं गया नहीं. मैं वहां पर सांसद हूं, लेकिन मैं वहां पर सरकार नहीं हूं. मैं किस-किसको झूठा साबित करूंगा. मैं तो बस ये उम्मीद कर रहा हूं कि सुरक्षा की व्यवस्था कर दीजिए. लेकिन यहां तो चुनाव का मामला है, कोई कुछ कह रहा है कोई कुछ. चल रहा है, ऐसे ही चलता रहेगा.

मैं ये जानना चाहता हूं कि आपके संसदीय क्षेत्र में अगर इस तरह अपराध बढ़ता है, प्रशासनिक समस्या आती है तो किस हद तक आप जा सकते हैं, कितना हस्तक्षेप कर सकते हैं?

पूरा हस्तक्षेप, जिस हद तक जाना उचित हो, उस हद तक जाऊंगा.

तो ये अभी तक कैसे चलता रहा कि लंबे समय से वहां गुंडे उगाही करते रहे?

हम उठाते रहे बात को. कुछ गंभीर घटनाएं भी हुईं जब महिलाओं को घर से खींचकर बलात्कार किया गया. गैंगरेप के बाद मर्डर किया गया. तब कोई विकल्प नहीं रह गया था सिवाय इस बात के कि खड़े हो जाओ, एक्सपोज करो. जो होगा देखा जाएगा. 

ये तो प्रशासनिक स्तर पर कोशिश करके आपको रुकवाना चाहिए था. आपने प्रयास किया, प्रशासन ने प्रयास किया लेकिन वह सब तो रुका नहीं और लोग वहां से जा रहे हैं.

प्रशासनिक स्तर पर सहयोग भी हमेशा देता हूं, खड़ा करने की कोशिश भी करता हूं लेकिन जब इतने कमजोर अधिकारी आ जाएंगे कि बदमाशों को सरेंडर कराएंगे तो क्या होगा.

मुद्राराक्षस : एक योद्धा लेखक का चले जाना…

मुद्राराक्षस (21 जून, 1933 - 13 जून, 2016), फोटो साभार : पत्रिका
मुद्राराक्षस (21 जून, 1933 - 13 जून, 2016), फोटो साभार : पत्रिका
मुद्राराक्षस (21 जून, 1933 – 13 जून, 2016), फोटो साभार : पत्रिका

प्रख्यात नाटककार, कथाकार, जाने-माने संस्कृतिकर्मी और चिंतक मुद्राराक्षस का बीते 13 जून को लखनऊ में देहावसान आज के इस आक्रांता समय में हिंदी समाज के एक बुलंद प्रतिरोधी स्वर का मौन हो जाना है. दरअसल मुद्राराक्षस मात्र एक लेखक न होकर एक ऐसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी थे जो हाशिये के समाज के मुद्दों, मुहिम और संघर्षों के सक्रिय सहभागी थे. मार्क्सवाद, लोहियावाद और आंबेडकरवाद से अपनी वैचारिक मनोभूमि निर्मित करते हुए उन्होंने अंततः अपने व्यक्तित्व को ‘आॅर्गेनिक इंटलेक्चुअल’ की जिस भूमिका में ढाला था वह उनका अपना चयन था. यह करते हुए बिना किसी बड़े ओहदे और कुलीन विरासत के मुद्रा जी ने हिंदी के वृहत्तर समाज में अपनी जो गहरी पैठ बनाई थी वह विरल है. विवाद, आमने-सामने की मुठभेड़, महानताओं का मर्दन, सत्ता-प्रतिष्ठान का प्रतिपक्षी होना उनके व्यक्तित्व की कुछ खास विशेषताएं थीं. अज्ञेय, दिनकर से लेकर धर्मवीर भारती और नामवर सिंह तक से वैचारिक समर करते हुए उन्होंने कुलीन संस्कृति और सुखासीन समाज का जो प्रतिपक्ष रचा वह उनकी मौलिकता थी. आज से 55 वर्ष पूर्व 1961 में जब मुद्रा जी मात्र 27 वर्ष के युवा थे तब डॉ. नामवर सिंह ने अपने एक पत्र में उन्हें लिखा था, ‘आपमें ‘प्रतिभा’ है, इसे कई लोग मानते हैं, लेकिन ‘प्रतिभा’ की अपनी व्याधियां भी होती हैं. भुवनेश्वर भी तो ‘जीनियस’ थे. उग्र भी किसी समय ‘जीनियस’ कहे जाते थे. इसलिए जब किसी को ‘जीनियस’ कहलाते देखता हूं तो अंदर ही अंदर आत्मा कांप उठती है. किसी युवक की कलम से उग्रता और तीक्षणता देखकर प्रायः लोग उसे ‘जीनियस’ की संज्ञा प्रदान करते हैं ताकि जल्द ही उस तेज धार पर वह स्वयं कट मरे. एक मित्र के नाते मेरा आपसे अनुरोध है कि आप हमेशा के लिए नहीं तो कुछ दिनों के लिए ही सही सामाजिक विकृतियों के उद्घाटन का मसीहाई बाना उतार दीजिए. कलकत्ता आप छोड़ेंगे नहीं, मैं कहूंगा भी नहीं… लेकिन ऐसा लगता है कि कलकत्ते की ही कुछ खूबी है जो हिंदी के सशक्त लेखकों को ‘जीनियस’ बना देता है.’ यहां डॉ. नामवर सिंह के पत्र के अंतर्निहित संकेत मुद्रा जी के व्यक्तित्व को समझने की कुंजी है.

मुद्राराक्षस के ‘जीनियस’ होने का जो संकेत डॉ. नामवर सिंह के इस पत्र में संकेतित है वह उस दौर के कलकत्ता की पृष्ठभूमि पर लक्षित है जो उन दिनों राजकमल-मलयराय चौधरी की मंडली के प्रतिष्ठान विरोधी और नकारवादी आंदोलनों का गर्भगृह थी. अपनी चर्चित कविता ‘मुक्तिप्रसंग’ में राजकमल चौधरी ने मुद्रा जी को संदर्भित भी किया है. हालांकि लखनऊ छोड़ने के पूर्व ही मुद्रा जी ने अपने साहित्यिक जीवन के पहले ही लेख द्वारा अज्ञेय के ‘तारसप्तक’ को अमेरिकी प्रयोगवादी कवियों के संग्रह ‘एक्सपेरिमेंटल राइटिंग इन अमेरिका’ की नकल सिद्ध करके जिस तरह से ध्वस्त किया था उससे उनके ‘जीनियस’ होने का प्रमाण समूचे हिंदी जगत को मिल गया था. मुद्राराक्षस के शिक्षक उस दौर के प्रख्यात आलोचक व दर्शनशास्त्रवेत्ता डॉ. देवराज ने अपनी पत्रिका ‘युगचेतना’ में उस लेख को मुद्रा जी के वास्तविक नाम सुभाष चंद्र आर्य के नाम से न प्रकाशित करके छद्मनाम ‘मुद्राराक्षस’ के साथ प्रकाशित किया. यह लेख इतना चर्चित और विवादित हुआ था कि डॉ. देवराज द्वारा प्रदत्त छद्मनाम ही ‘मुद्राराक्षस’ के वास्तविक नाम के रूप में स्वीकृत हो गया. कलकत्ता में ‘ज्ञानोदय’ में सहायक संपादक की नौकरी के बाद जब वे साठ के दशक के अंतिम वर्षों में आकाशवाणी की नौकरी के सिलसिले में दिल्ली बसे तो ‘नकारवादी’ मुहावरे के बावजूद उनकी वैचारिकता सकारात्मक मूल्य चेतना से युक्त हो चुकी थी. अमेरिकी साम्राज्यवाद विरोधी वियतनामी संघर्ष और नक्सलवादी संघर्ष चेतना से स्वयं को संबद्ध करते हुए उन्होंने जो सत्ता विरोधी राह चुनी उसकी अंतिम परिणति हाशिये के समाज की जिस उग्र पक्षधरता में हुई वह उनका व्यक्तित्वांतरण सरीखा था. दलित समाज और बुद्धिजीवियों के बीच उनकी जो स्वीकार्यता और लोकप्रियता थी वह अभूतपूर्व थी. यद्यपि वे स्वयं जन्मना दलित नहीं थे लेकिन दलित और आंबेडकरवादी संगठनों ने उन्हें ‘शूद्राचार्य’ और ‘आंबेडकर रत्न’ की उपाधि और सम्मान से विभूषित किया था.

मुद्रा जी जिस नैतिक आभा और स्वाभिमान के साथ जिए वह हिंदी समाज में विरल है. वे जैसे थे अद्वितीय थे. नाम के छद्म के अतिरिक्त उनका समूचा जीवन एक खुली किताब था

लखनऊ में उनकी शवयात्रा के दौरान ‘जय भीम’, ‘लाल सलाम’ और ब्राह्मणवाद-साम्राज्यवाद विरोधी नारे जिस ओज और बुलंदी के साथ लगे वह किसी गैर-दलित लेखक के लिए संभवतः पहली बार था. मुद्राराक्षस के व्यक्तित्व में मार्क्सवाद और आंबेडकरवाद का जो सम्मिश्रण था उसकी भरपूर बानगी इस अवसर को यादगार बना रही थी. यह दृश्य मगहर में कबीर की भी याद दिला रहा था क्योंकि जहां मुद्रा जी के मार्क्सवादी मित्र और प्रशंसक उनकी नास्तिकता के अनुकूल बिना किसी कर्मकांड के उन्हें अंतिम विदा देना चाहते थे वहीं कुछ दलित बुद्ध अनुयायी बौद्ध रीति का भी निर्वहन करना चाहते थे और उन्होंने किया भी. इस तरह अपने अंतिम प्रयाण में भी ‘लाल सलाम’ और ‘जय भीम’ के नारों के बीच मुद्रा जी लाल और नीले की एकता का सूत्र पिरोकर गए.

यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि दलित समाज और संगठन मुद्राराक्षस को अपने अघोषित बौद्धिक प्रवक्ता के रूप में मानते थे. ‘हिन्दू धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ’ उन्होंने जिस बेबाकी और नए तर्कों के साथ किया वह उनके गहन अध्ययन और बौद्धिक मेधा का परिचायक था. समाज के सर्वाधिक शोषित मुसहर समुदाय पर केंद्रित उनका उपन्यास ‘दंडविधान’ तब प्रकाशित हुआ था जब हिंदी में दलित विमर्श शुरू भी नहीं हुआ था. उग्र हिंदू सांप्रदायिकता पर डेढ़ दशक पूर्व लिखित उनकी कहानी ‘दिव्यदाह’ तो जैसे आज की स्थितियों का पूर्वकथन ही हो. अपने विपुल वैचारिक और साहित्यिक लेखन के माध्यम से मुद्रा जी ने हिंदी की मुख्यधारा के वैचारिक और साहित्यिक चिंतन की रिक्तियों की जो भरपाई की वह उनका अप्रतिम योगदान है.

अपने समूचे व्यक्तित्व और कृतित्व में मुद्राराक्षस वाद-विवाद-संवाद के ज्वलंत उदाहरण थे. वामपंथी होने के बावजूद वे वामपंथ की सीमाओं को उजागर करने और उस पर बहस करने में कभी संकोच नहीं करते थे. अपने अंतिम उपन्यास ‘अर्धवृत्त’ में जहां उन्होंने उग्र हिंदू सांप्रदायिकता को ‘हिंदू कसाईबाड़े’ के रूप में प्रस्तुत किया है वहीं वामपंथ की दलित ‘दृष्टिबाधा’ को भी लक्षित किया है. कई बार वे बौद्धिक अतिवाद को भी अपनी तर्क पद्धति में अपनाने से पीछे न रहते थे. जब दलित लेखकों के एक वर्ग ने प्रेमचंद को खारिज करने का अभियान शुरू किया तब मुद्रा जी ने प्रेमचंद के विरुद्ध जो तर्क दिए उससे प्रगतिशील लेखकों का बड़ा समूह उनसे अप्रसन्न हुआ, लेकिन मुद्रा जी इससे बेपरवाह अपने तर्कों पर अंत तक कायम रहे. मुद्रा जी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी किक वे बौद्धिक असहमति का सम्मान करते थे. उनसे कटुता की सीमा तक असहमत होते हुए भी मैत्रीपूर्ण संबंध रखे जा सकते थे. वर्ष 2005 में जब उन्होंने प्रेमचंद की 125वीं जयंती के अवसर पर एक दलित लेखक संगठन द्वारा ‘रंगभूमि’ को जलाने और प्रेमचंद को दलित विरोधी सिद्ध करने के अभियान का समर्थन किया तो मेरी उनसे तीव्र असहमति हुई. मैंने उन दिनों ‘कुपाठ और विरोध के शोर में प्रेमचंद’ और ‘प्रेमचंद के निंदक’ शीर्षक दो लंबे लेख लिखे जो मुद्रा जी के तर्कों की काट ही नहीं करते थे बल्कि ध्वस्तकारी भी थे. मेरे उस लेख से मुद्रा जी आहत तो अवश्य हुए थे लेकिन जब उनकी 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक पत्रिका ने अपना अंक केंद्रित किया तो उन्होंने शर्त रखी कि पत्रिका में मेरे द्वारा लिखित वह ध्वस्तकारी लेख जरूर शामिल किया जाए. मुद्रा जी द्वारा असहमति और विरोध का यह सम्मान सचमुच विरल था.

वीपी सिंह की मौजूदगी वाले एक जलसे में सुरक्षा जांच किए जाने के बाद नाराज मुद्रा जी ने कहा, ‘जिस दल के नेता को मुझसे ही सुरक्षा का खतरा है, उस दल में रहने का क्या अर्थ!’

मुद्राराक्षस के लिए आपातकाल उनकी रचनात्मकता का ही नहीं बल्कि जीवन का भी नया प्रस्थानबिंदु था. उन्हें अपने व्यवस्था विरोधी विचारों के चलते आकाशवाणी की नौकरी के साथ-साथ दिल्ली भी छोड़नी पड़ी थी. लखनऊ में उनकी घरवापसी एक लेखक और संस्कृतिकर्मी के रूप में उनका पुनरोदय भी थी. ‘मरजीवा’, ‘तिलचट्टा’ और ‘तेंदुआ’ सरीखे पश्चिम की ‘एब्सर्ड’ नाट्य-विधा और ‘मेरा नाम तेरा नाम’ सरीखे उपन्यास के आक्रामक हवाई मुहावरे को तिलांजलि देकर यह उनके नए रचनाकार व्यक्तित्व के पुनराविष्कार का वह समय था जब उन्होंने ‘हम सब मंसाराम’, ‘शांतिभंग’ और ‘दंडविधान’ सरीखे उपन्यास लिखे और विपुल वैचारिक लेखन किया. आपातकाल की पृष्ठभूमि पर केंद्रित उनका उपन्यास ‘शांतिभंग’ सत्ता के निरंकुश स्वरूप को बेपर्दा करने के साथ-साथ सामान्यजन की जिजीविषा और संघर्ष चेतना को भी लक्षित करता है. यह अनायास नहीं है कि उत्तर आपातकाल के ही इस दौर में उन्होंने दलित, स्त्री और अल्पसंख्यक के मुद्दों को अभियान की हद तक वैचारिक और रचनात्मक स्वर प्रदान किए. उन्होंने अपने इस दौर के लेखन में हिंदी साहित्य की प्रभुत्वशाली धारा और समृद्ध समाज को हाशिये के लोगों की निगाह से देखने का जो जतन किया उसने जहां दलित समाज के बौद्धिकों और सामान्य पाठकों के बीच उन्हें चर्चित और लोकप्रिय बनाया वहीं सत्ता प्रतिष्ठान, अभिजन समाज और प्रभुत्वशाली लेखकों के कोपभाजन के भी वे शिकार हुए. इस सबसे आह्लादित और विचलित हुए बिना साम्राज्यवाद, सांप्रदायिकता, सामंतवाद और अभिजनवाद का सतत विरोध एवं उसके बरक्स परिवर्तनकामी प्रगतिशील मूल्य चेतना उनके समूचे वैचारिक चिंतन का मूल आधार रही. उन्होंने अपनी वैचारिक निष्पत्तियों द्वारा धर्म, पूंजी, साम्राज्यवाद और वर्णाश्रमी-जातिश्रेष्ठता के अंतर्संबंधों का खुलासा जिस सहज पदावली में किया उससे उनकी सामान्य पाठकों में गहरी पैठ बनी. अखबारों-पत्रिकाओं में उनके लेखों और स्तंभों का बड़ा पाठक वर्ग था. समसामयिक मुद्दों पर वे जिस तीखे, बेलाग और प्रहारात्मक शैली में लिखते थे उससे उनकी जो जनपक्षधर, निडर, साहसिक और सत्ता विरोध की बौद्धिक छवि बनी वह उनके व्यक्तित्व की अलग पहचान थी.

संभवतः मुद्राराक्षस हिंदी के उन गिने-चुने लेखकों में थे जिनका देश के शीर्ष बुद्धिजीवियों और राजनेताओं से एक साथ संवाद रहा था. आकाशवाणी की ट्रेड यूनियन के गठन और नेतृत्व के दौरान वे शीर्ष कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे के संपर्क में आए तो डॉ. राममनोहर लोहिया का सानिध्य उन्हें दिल्ली के काफी हाउस व गुरुद्वारा रकाबगंज के नजदीक लोहियाजी के निवास की बैठकी और समाजवादी पत्रिकाओं  ‘जन’ और ‘मैनकाइंड’ में लेखन के दौरान मिला. उत्तर आपातकाल के जनता दल के शासन के दौरान वे पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के संपर्क में आए और कुछ समय तक स्थानीय जनता दल के अध्यक्ष भी रहे. लेकिन एक बार हुआ यह कि लखनऊ में जनता दल के एक जलसे में विश्वनाथ प्रताप सिंह आए हुए थे, मुद्राराक्षस को आयोजन की अध्यक्षता करनी थी.  पूर्व प्रधानमंत्री की उपस्थिति के चलते आयोजन में शिरकत करने वालों को मेटल डिटेक्टर से होकर गुजरना था. मुद्रा जी ने सुरक्षाकर्मियों को बताया कि उन्हें ही जलसे की अध्यक्षता करनी है लेकिन फिर भी उन्हें मेटल डिटेक्टर से होकर गुजरना पड़ा. सुरक्षा जांच के बाद मुद्रा जी ने कहा, ‘हो गई, सुरक्षा जांच. अब मैं वापस जा रहा हूं. जिस दल के नेता को मुझसे ही सुरक्षा का खतरा है, उस दल में रहने का क्या अर्थ!’ वापस होते मुद्रा जी पर विश्वनाथ प्रताप सिंह की भी निगाह पड़ी. लोग उन्हें रोकने के लिए दौड़े, लेकिन मुद्रा जी थे कि यह जा, वह जा और ओझल हो गए. उसके बाद जनता दल से भी उन्होंने मुक्ति पा ली. वे दो बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव भी लड़े एक बार लोकसभा का और दूसरी बार विधानसभा का. दोनों चुनावों में उनकी जमानत जरूर जब्त हुई लेकिन बाबा नागार्जुन, डॉ. नामवर सिंह से लेकर कुंवर नारायण तक उनके इस अभियान में शामिल हुए थे. जितना प्रचार प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को मिला था, उससे कुछ कम मुद्रा जी के हिस्से में नहीं आया था. हम सब उनके इस अभियान के सहभागी थे.

साहित्य, रंगमंच से लेकर राजनीति तक विस्तृत मुद्राराक्षस का वैविध्यपूर्ण व्यक्तित्व समय-समय पर विवादों और बहसों का केंद्र रहा, लेकिन उन्होंने कभी भी अपने व्यक्तित्व को उपेंद्रनाथ अश्क की तर्ज पर परचून की दुकान खोलने की नाटकीयता के साथ दयनीय नहीं बनाया. वे न कभी अपनी किताबों की सरकारी खरीद के लिए प्रयत्नशील हुए और न कभी पद, प्रतिष्ठा, पुरस्कार के लिए सरकार के मुखापेक्षी ही हुए, जबकि आजीविका का एकमात्र साधन स्वतंत्र लेखन होने के चलते उनकी स्थिति ‘रोज कुआं खोदने और पानी पीने’ सरीखी थी. सही अर्थों में उनके जीवन का प्रेरणा सूत्र ‘न दैन्यं न पलायन’ था. मुद्रा जी जिस नैतिक आभा और स्वाभिमान के साथ जिए वह हिंदी समाज में विरल है. स्वीकार करना होगा कि वे जैसे थे एकमात्र और अद्वितीय थे. नाम के छद्म के अतिरिक्त उनका समूचा जीवन एक खुली किताब था. उनकी अनुपस्थिति को समूचा हिंदी समाज लंबे समय तक महसूस करेगा. वे सचमुच योद्धा लेखक थे. उन्हें अंतिम सलाम!

(लेखक साहित्यकार आैैर आलोचक हैं)

‘दुर्भाग्य से हमारे पास इतनी पावर नहीं है कि हम किसी की गिरफ्तारी की सिफारिश कर सकें या किसी को नोटिस भेजकर यहां आने पर मजबूर कर सकें’

LalithaKumarmangalmWeb

सोशल मीडिया पर प्रतिष्ठित महिलाओं के साथ गाली-गलौज की जाती है, मारने या बलात्कार करने की धमकियां दी जाती हैं. क्या महिला आयोग इस पर संज्ञान लेकर कोई कार्रवाई कर रहा है?

यह महिलाओं की गरिमा का अपमान है. कार्रवाई तो हम कुछ नहीं कर सकते. स्वत: संज्ञान भी हम कहां से लें? कैसे लें? हाल ही में जो कविता कृष्णन के साथ हुआ, उस मामले में कानूनी तौर पर हम क्या कर सकते हैं? अगर हम कुछ कहें तो ‘फ्रीडम आॅफ स्पीच’ की बात आ जाती है. संविधान में फ्रीडम आॅफ स्पीच है, लेकिन संविधान में ये भी लिखा है कि महिला के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचानी चाहिए. अब कोर्ट तो हम नहीं जा सकते, लेकिन अगर कविता जाना चाहती हैं तो हम उनका सपोर्ट करेंगे. लेकिन एक मसला यह भी है कि अगर कोई मसला कोर्ट में विचाराधीन है तो हम हस्तक्षेप ही नहीं कर सकते. हमें इसकी इजाजत नहीं है. कोर्ट में जो मामला है, वह सिर्फ कोर्ट ही देखती है. हमने ऐसी घटनाओं की निंदा की है, उससे ज्यादा क्या कर सकते हैं?

मुझे नहीं पता कि महिलाएं इतना क्यों बर्दाश्त करती हैं. उनको कोर्ट जाना चाहिए. कविता से मैंने इस बारे में बात तो नहीं की है, लेकिन कल तक मुझे ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली कि वे कोर्ट गईं या नहीं. अगर वे कोर्ट जाना चाहती हैं तो हमारा सपोर्ट रहेगा. दुर्भाग्य से हमारे देश में किसी भी मामले में तुरंत मानवाधिकार, फ्रीडम आॅफ स्पीच वगैरह आ जाता है. तथाकथित उदारवादी बनाम अनुदारवादियों का मामला बन जाता है. मुद्दों के राजनीतिकरण से मूल मुद्दा कमजोर हो जाता है और राजनीति शुरू हो जाती है.

लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसे मामले में मानवाधिकार या फ्रीडम आॅफ स्पीच का मुद्दा उठेगा. गाली देना तो कोई आजादी नहीं है? सागरिका घोष और प्रियंका चतुर्वेदी को बलात्कार करने की धमकी दी जाती है. यह तो साफ तौर पर अपराध है?

हां, यह अपराध है और उनको शिकायत करनी चाहिए. वे शिकायत करें तो फिर हम कुछ जरूर करेंगे. समस्या ये हो जाती है कि अगर मैं खुद से उनके पास जाती हूं तो वाम बनाम दक्षिण बनाम ये बनाम वो… हम ये भूल जाते हैं कि ये मसला कितना गंभीर है. मैं बार-बार यही कहती हूं कि कृपया इस मसले पर राजनीति न करें. आप किसी पार्टी से, किसी भी विचारधारा से हों, पर हम सब हैं तो महिलाएं ही. अगर इतनी बड़ी-बड़ी महिलाएं सागरिका जी या कविता जी वगैरह असुरक्षित हैं तो इस देश में सुरक्षित कौन है? अगर हम सब एक साथ जुड़ते हैं तो इसमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. जब तक मैं महिला आयोग में हूं, मैं निश्चिंत कर दूं कि मैं राजनीति नहीं कर सकती हूं, खास तौर से ऐसे मुद्दों पर. राजनीति छोड़कर सारी महिलाओं को एकजुट हो जाना चाहिए, जैसे निर्भया के बाद किसी ने राजनीति नहीं देखी क्योंकि जनता का दबाव आ गया था. इसलिए मेरी निजी राय है कि जनता की ओर से दबाव उत्पन्न कीजिए, इस हद तक कि कोई भी ऐसा करने से डरे. अभी वे ऐसा इसलिए करते हैं कि वे जानते हैं कि बच जाएंगे. 

मैं मानती हूं कि सोशल मीडिया पर महिलाओं को गाली-गलौज, धमकी और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, असहिष्णुता भी है. मैं अगर कहूं कि आप जो कह रहे हैं वह गलत है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपको धमकी दूं या बुरे-बुरे शब्द इस्तेमाल करूं.

क्या महिला आयोग इस मसले पर अपनी तरफ से कोई पहल कर सकता है? स्वत: संज्ञान ले सकता है? कार्रवाई कर सकता है? या फिर सरकार को कोई मशविरा भेज सकता है कि इस चलन को रोकने की कोशिश की जाए?

नहीं. देखिए, सिर्फ कानून इस मामले में कुछ कर सकता है और कानून की बहुत लंबी प्रक्रिया है. हमने पहले भी इनडीसेंट रिप्रेजेंटेशन आॅफ वूमेन (प्राेहिबिशन) ऐक्ट को लेकर बहुत सारी टिप्पणियां की हैं. अध्ययन किया है. सरकार को भेजा भी है. कंसल्टेशन वगैरह की भी कोशिश की है. अभी न्यू ड्राफ्ट वूमेन पॉलिसी में भी ये मुद्दा आया है. तो यह विचार-विमर्श में तो है. हम महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को भी अपनी टिप्पणी भेज रहे हैं. हम सूचना प्रसारण मंत्रालय के भी पास जाएंगे. अब मसला ये है कि विभिन्न मंत्रालयों का झंझट  है. मंत्रालयों को सिर्फ नेता नहीं चलाते, नौकरशाह चलाते हैं. फाइल में कोई कुछ लिख देगा, तो क्या करेंगे? जैसे निर्भया फंड के मामले में असली कहानी यह है कि किसी ने उसकी फाइल पर लिख दिया कि सीसीटीवी कैमरे जेंडर सेंसिटिव होने चाहिए. अब आप बताइए कि कैमरा कभी जेंडर सेंसिटिव हो सकता है? कैमरा लगाने का मतलब ये है कि लोगों के मन में डर पैदा हो कि महिला के साथ कुछ करते हैं तो वह रिकॉर्ड हो जाएगा. अब ऐसे कारणों से फाइल रुक जाती है और यह किसी मंत्री ने नहीं लिखा है. लेकिन आरोप मंत्री पर आएगा फिर राजनीति शुरू हो जाएगी. महिला आयोग किसी भी पीड़ित महिला को सपोर्ट करने का इच्छुक है, लेकिन पहल उनको करनी होगी.

असहमति के नाम पर किसी को सार्वजनिक मंच पर गाली देने से खराब कुछ हो नहीं सकता. इसे कैसे रोका जा सकता है?

मैं मानती हूं कि मैं किसी से असहमत हो सकती हूं लेकिन गाली-गलौज नहीं होनी चाहिए. लेकिन अब इसका क्या करें? अब जो हो सकता है वह कानून की मदद से या फिर संसद में कानून बनाया जा सकता है. लेकिन कानून बनाने की लंबी प्रक्रिया है. तब तक क्या करें? चुप रहने से तो कुछ नहीं होने वाला, क्योंकि जहां तक मुझे मालूम है, यह सब और बढ़ रहा है. हम एक मीटिंग बुलाकर लोगों के साथ इस पर चर्चा भी करेंगे कि क्या किया जा सकता है. प्रतिष्ठित महिलाओं और आम महिलाओं को साथ लेकर एक दबाव समूह तैयार किया जा सकता है जो ऐसा करने वालों पर दबाव डाले, जो सरकार के मंत्रियों से जाकर मिले, उनसे कहे कि सर आप ऐसा कर सकते हैं और कीजिए, यह जरूरी है. ऐसा करने पर जरूर कुछ होगा.

दुर्भाग्य से हमारे पास इतना पावर नहीं है कि हम किसी की गिरफ्तारी की सिफारिश कर सकें या किसी को नोटिस भेजकर यहां आने पर मजबूर कर सकें. अगर हम किसी आरोपी को एक दफा सार्वजनिक तौर पर बुला पाएं तो भी उन पर दबाव बनेगा. महिला आयोग ने मांग रखी है कि हमें कम से कम उतना अधिकार दे दीजिए, जितना मानवाधिकार आयोग को है कि हम किसी की गिरफ्तारी की सिफारिश कर सकें. महिला आयोग महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए जो कुछ हो सकता है, वह जरूर करेगा.

मानसिक अस्पतालः अपनों का इंतजार

सभी फोटोः प्रतीक गोयल
सभी फोटोः प्रतीक गोयल
सभी फोटोः प्रतीक गोयल

बीस महीने पहले पश्चिम बंगाल के बर्धमान की रहने वाली 24 वर्षीय सोहिनी जब सपनों के शहर मुंबई कुछ कर गुजरने के लिए पहुंची थीं तो उनकी जिंदगी में सब ठीक-ठाक चल रहा था. वे एक बीमा कंपनी में काम कर रही थीं और हॉस्टल में रहा करती थीं, लेकिन उनकी कम तनख्वाह उनकी परेशानियों का सबब बनती चली गई. मुंबई में गुजर-बसर करना मुश्किल होता चला गया. इन मुश्किलों को वे झेल नहीं पाईं और मानसिक अस्पताल जा पहुंचीं. तकरीबन डेढ़ साल इलाज चलने के बाद अब वे ठीक हैं लेकिन त्रासदी यह है कि उनकी मां उन्हें अपनाना नहीं चाहतीं और उन्हें अस्पताल में ही रखने की पैरवी करती हैं.

किसी भी तरह की मानसिक बीमारी के शिकार लोग अक्सर ऐसी त्रासदी झेलने को मजबूर होते हैं, जिसमें उनके परिवारवाले उनसे किनारा कर लेते हैं. ऐसे लोग अस्पताल में इस आस से दिन गुजारते हैं कि एक दिन परिवारवाले उन्हें अपने साथ घर ले जाएंगे. ‘तहलका’ ने मुंबई के नजदीक ठाणे स्थित प्रादेशिक मानसिक अस्पताल में छोटी-बड़ी उम्र के ऐसे कई लोगों से बातचीत की जो कई सालों से इस आस में हैं कि एक न एक दिन उनके परिवारवाले उन्हें फिर से अपना लेंगे.

70 एकड़ में फैले 115 साल पुराने इस मानसिक अस्पताल में जब हम पहुंचे तो दिन का तकरीबन एक बज रहा था. महिला वार्ड की सभी रहवासी नीली वर्दी पहने दोपहर का भोजन कर रही थीं. इसी वार्ड में रहने वाली नीता सिंघानिया (बदला हुआ नाम) बड़ी कुशलता से दूसरों को भोजन परोस रही हैं. नीता यहां तीन साल पहले आई थीं, वे अपना मानसिक संतुलन खोने के बाद सड़क पर भटकते हुए पाई गई थीं. आज नीता पूरी तरह से स्वस्थ हैं लेकिन उनके घरवाले उन्हें अपनाना नहीं चाहते. वे कहती हैं, ‘मैं अपने पिता जी के साथ उल्हासनगर में रहती थी. उनकी मृत्यु के बाद मैं अपना मानसिक संतुलन खो बैठी और सड़कों पर रहने लगी थी. इलाज के बाद मैं अब पूरी तरह से ठीक हूं लेकिन घरवालों ने नहीं अपनाया. अफसोस होता है कि पिछले तीन सालों में मेरी दोनों बहनें एक दफा भी मुझसे मिलने नहीं आईं.’ नीता को अस्पताल में पुलिस ने भर्ती करवाया था. वे कहती हैं, ‘मेरा उल्हासनगर में एक कमरा है, वहां रहकर मैं पापड़ बेचने का व्यवसाय कर अपना गुजारा कर सकती हूं. अस्पतालवालों ने मेरी बहनों को बहुत समझाया कि वे मुझे अपने साथ ले जाएं लेकिन मानसिक रोग होने के बाद दोनों में से कोई भी मुझसे संबंध नहीं रखना चाहता.’

हमारे समाज में मानसिक रोग एक कलंक के रूप में देखा जाता है और यह किसी जाति, समुदाय, मत विशेष तक सीमित नहीं है बल्कि इस रोग के प्रति नकारात्मक दृष्टि रखने में या इसे एक कलंक समझने में सभी लोग एक हो जाते हैं. पूरा समाज इस रोग से ग्रसित व्यक्ति का बहिष्कार करने एकजुट-सा नजर आता है. 34 साल की सुरैया अख्तर (बदला हुआ नाम) अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी आश्रयों या सुधारगृहों में गुजार चुकी हैं. पैसों की कमी के चलते उनके माता-पिता उनका पालन-पोषण नहीं कर पा रहे थे और कुछ मानसिक समस्याओं के कारण महज 12 साल की उम्र में ही उन्होंने सुरैया को डोंगरी स्थित सुधार गृह में भेज दिया था. गुजरते वक्त के साथ सुरैया मुंबई, सोलापुर, हैदराबाद जैसे शहरों के सुधार गृहों में रहीं और साल 2008 में कर्जत स्थित गवर्नमेंट रिसेप्शन सेंटर द्वारा ठाणे के मानसिक अस्पताल में भर्ती कराई गई. अस्पताल के दस्तावेजों में सुरैया के परिवार का कोई अता-पता नहीं है. उनसे आज तक कोई मिलने-जुलने भी नहीं आया है. सुरैया को आज भी लगता है कि उनके माता-पिता उन्हें अपनाएंगे. वे कहती हैं, ‘मैं अपने माता-पिता के पास जाना चाहती हूं, वे मुंबई में रहते हैं. उनका पता सोलापुर के सुधार गृह के रजिस्टर में लिखा हुआ है.’

मुंबई के विक्रोली इलाके की रहने वाली 44 साल की कविता मुले (बदला हुआ नाम) मराठी में कहती हैं, ‘मला घरी जायचा आहे (मैं घर जाना चाहती हूं).’ कविता को जुलाई 2015 में एक स्थानीय गैर-सरकारी संस्था ने मानसिक अस्पताल में भर्ती कराया था. उनकी दिमागी हालत अब पूरी तरह से ठीक है, लेकिन उनके दोनों बेटे उन्हें अपने साथ घर नहीं ले जाना चाहते. उन्होंने अपना पता भी बदल लिया है ताकि कविता उनसे किसी भी तरह का संपर्क न साध पाएं. कविता कहती हैं, ‘मैं किसी गैर-सरकारी संस्था के सुधार गृह में नहीं जाना चाहती हूं, मैं सिर्फ अपने घर जाना चाहती हूं. मेरे बेटे देखने में तो अच्छेे हैं लेकिन किसी काम के नहीं हैं वे अपनी मां को घर वापस नहीं ले जाना चाहते.’

ठाणे के इस अस्पताल में चंद लोग ऐसे भी हैं जो ठीक होने के बावजूद घर नहीं जाना चाहते. उन्हीं में से एक हैं मध्य प्रदेश  के खंडवा की रहने वाली भानुमति बाई (बदला हुआ नाम) जो एचआईवी संक्रमित हैं. वे कहती हैं, ‘मैं घर नहीं जाना चाहती, मुझे यहीं रहना हैं.’ हालांकि भानुमति का परिवार उनसे कभी-कभार मिलने आता है. सिर्फ गरीब परिवारों में ही नहीं, पढ़े-लिखे और अमीर परिवारों में भी मानसिक रोग से पीड़ित रहे लोगों को ठीक होने के बावजूद अपनाया नहीं जाता.

कोलकाता के श्याम बाजार इलाके की निलांबन स्ट्रीट की रहने वाली शोमा रे (बदला हुआ नाम) ठाणे मानसिक अस्पताल में पिछले एक साल से रह रही हैं. उनके दो बच्चे हैं जो तलाक के बाद उनके पति के साथ रहते हैं. एक नाकाम संबंध के चलते शोमा ने कोलकाता से मुंबई की ओर रुख किया था. वे एक समाजसेविका को मुंबई के रेड लाइट इलाके कमाठीपुरा की सड़कों पर असामान्य हालत में भटकती हुई मिली थीं, जिसके बाद उन्हें मानसिक अस्पताल में भर्ती कराया गया था. शोमा फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती हैं. वे कहती हैं, ‘मैं अपने घर जाना चाहती हूं लेकिन मेरी मां मुझे वापस घर ले जाना नहीं चाहती हैं. मेरी मदद कीजिए घर जाने में.’ अस्पताल की ओर से कई बार दरख्वास्त करने पर भी शोमा की मां उनको वापस अपनाना नहीं चाहतीं. उनकी मां के अनुसार वह शोमा का खर्च नहीं उठा सकतीं और चाहती हैं कि वे मानसिक अस्पताल में ही रहें. 

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मानसिक रूप से ठीक हो चुके पुरुष वार्ड के मरीजों की कहानी भी महिला वार्ड से अलग नहीं है. वृद्ध पुरुषों के वार्ड में रहने वाले 62 साल के एन. प्रभाकर (बदला हुआ नाम) सिकंदराबाद के रहने वाले हैं और एक जमाने में कामयाब व्यवसायी रहे हैं. इस उम्र में भी उनकी याददाश्त तेज है और वे फर्राटे से अपने रिश्तेदारों के नाम, पते और टेलीफोन नंबर बताते हैं. 25 साल पहले प्रभाकर को उनकी पत्नी और बच्चे छोड़कर चले गए थे. उसके बाद अपने जीवन के 23 साल उन्होंने हैदराबाद के दिलसुखनगर इलाके के वेंकटाद्री सिनेमाहॉल के प्रांगण में गुजारे. दो साल पहले शिर्डी जाते समय वे मुंबई में उतर गए थे और रेलवे स्टेशन पर भटकते हुए मिले थे, जिसके बाद उन्हें मानसिक अस्पताल लाया गया था. प्रभाकर की हालत अब ठीक है लेकिन उनके रिश्तेदार उन्हें अपनाना नहीं चाहते. प्रभाकर एक रईस परिवार से आते हैं. उनकी सात बहनें और एक भाई हैं, जो अब उनसे किसी भी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहते. प्रभाकर बताते हैं कि वे व्यापारी थे और उनका मूंगफली और मिट्टी के तेल का कारोबार था. सिकंदराबाद में एक पेट्रोल पंप भी था.

वे हंसते हुए कहते हैं, ‘मैंने 17 साल तक व्यवसाय किया लेकिन जब मेरी मानसिक हालत बिगड़ी तो सबने मुझे छोड़ दिया, यहां तक कि मेरी बीवी-बच्चों ने भी. मैं सिनेमा हॉल के प्रांगण में और उसके आसपास भटकता रहता था और कुछ लोग-बाग जो भी खाने को दे देते थे, खा लेता था. पिछले दो सालों से में यहां रह रहा हूं. इतने सालों में आज तक मेरे परिवार से कोई भी मुझसे मिलने नहीं आया.’ ठाणे मानसिक अस्पताल में बतौर मनोचिकित्सक कार्यरत सुरेखा वाठोरे कहती हैं, ‘प्रभाकर एक अच्छे परिवार से आते हैं, लेकिन उनका कोई भी रिश्तेदार उनकी जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहता. उनकी पत्नी और बच्चों का तो हम पता नहीं लगा पाए लेकिन उनके एक भांजे से हमारा संपर्क हुआ है, लेकिन वह भी उनकी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता.’

बिहार के अररिया जिले के तीरा खर्डा गांव के रहने वाले 35 वर्षीय दलजीत कुमार (बदला हुआ नाम) पिछले डेढ़ साल से ठाणे मानसिक अस्पताल में रह रहे हैं. दलजीत मजदूरी करने के लिए अपने गांव से हरियाणा जाने का विचार कर रहे थे. उस वक्त उनकी मानसिक हालत ठीक नहीं थी लेकिन उन्होंने हरियाणा जाने की योजना नहीं बदली, जिसके बाद से उनकी जिंदगी बदल गई. उन्हें जिस ट्रेन से हरियाणा जाना था उसकी जगह कोई दूसरी ट्रेन पकड़ ली और मुंबई पहुंच गए. वे स्टेशन पर असामान्य हालत में भटकते हुए मिले थे. दलजीत कहते हैं, ‘मैं अपने बीवी-बच्चों को अपने ससुराल नेपाल छोड़ने के बाद मजदूरी करने हरियाणा के जाखल मंडी जाने वाला था. लेकिन गलत ट्रेन में चढ़ गया था. मेरे चाचा से अस्पतालवालों ने संपर्क साधा लेकिन अब तक उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया है.’

दलजीत का इलाज कर रहे मनोचिकित्सक गोपाल घोड़के कहते हैं, ‘दलजीत कुछ ही महीनों में ठीक हो गया था लेकिन फिर भी वह यहीं है. उसके घर से भी आज तक यहां कोई नहीं आया. उसके पिता की मृत्यु के बाद उसकी मां ने किसी और से विवाह कर लिया था और हरियाणा चली गई थीं, इसीलिए उनसे भी हमारा संपर्क नहीं हो पाया था. हालांकि उसके चाचा से हमारा संपर्क हो चुका है, जिनसे हमने कहा है कि गांव के सरपंच का एक पत्र हमें भेज दे जिसमें लिखा हो कि दलजीत उनके गांव का है. लेकिन अब तक वहां से कोई संदेश नहीं आया.’

‘मैंने 17 साल तक व्यवसाय किया लेकिन जब मेरी मानसिक दशा बिगड़ी तो सबने मुझे छोड़ दिया, यहां तक कि मेरी बीवी-बच्चों ने भी. मैं एक सिनेमा हॉल के प्रांगण के आसपास भटकता रहता था. लोग-बाग जो दे देते थे उसे खा लेता था’ 

‘तहलका’ ने कुछ मरीजों के परिवारों से भी संपर्क साधा और यह जानना चाहा कि आखिर क्यों वे अपने ही लोगों को नहीं अपना रहे. सोहिनी की मां कहती हैं, ‘मेरी तबीयत अब ठीक नहीं रहती, मुझे आंखों से भी कम दिखता है, मैं कैसे उसका ख्याल रखूंगी? अस्पतालवालों को उसे वहीं रखना चाहिए और वहीं-कहीं उसे नौकरी दिलवा देनी चाहिए.’ सोहिनी के चाचा की भी राय उनकी मां से मेल खाती है. वे कहते हैं, ‘उसकी मां बहुत गरीब है और बीमार रहती है. मैंने अस्पताल के लोगों से गुजारिश की है कि वे उसे मुंबई में ही कोई काम दिलवा दें. हम गरीब लोग हैं. हम उसे वापस नहीं बुला सकते, उसे वहीं काम करना चाहिए.’ एन. प्रभाकर के भांजे, जो उन्हें हैदराबाद में कुछ पैसे देकर मदद करते थे, कहते हैं, ‘उनकी मानसिक बीमारी के चलते उनकी पत्नी ने उन्हें तलाक दे दिया था और छोड़ गई थीं. उनके भाई ने उनकी पूरी जायदाद पर कब्जा कर लिया है और अब वह उनसे कोई संपर्क नहीं रखता है. मैं तो बस एक रिश्तेदार हूं. जब उनके सगे ही उनका ध्यान नहीं रख रहे, तो मैं कैसे उनका ध्यान रखूं.’   

ठाणे के इस मानसिक अस्पताल में 1500 मरीज हैं जिनमें से 290 दिमागी रूप से ठीक हो चुके हैं और अपने परिवारों के पास जा सकते हैं. मनोचिकित्सक-समाजसेविका सुरेखा वाठोरे पिछले 30 साल से यहां काम कर रही हैं और अब तक तकरीबन 1000 मरीजों को सकुशल उनके घर पहुंचा चुकी हैं. वे कहती हैं, ‘मानसिक अस्पताल में लोग सबसे अंत में पीड़ित व्यक्ति को लेकर आते हैं. सबसे पहले वे उन्हें जादू-टोने से ठीक करने की कोशिश करते हैं, फिर निजी मनोचिकित्सक और अंत में हमारे पास लाते हैं. इस प्रक्रिया में कई वर्ष गुजर जाते हैं और इस देर के कारण बीमारी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है.’ सुरेखा आगे बताती हैं, ‘हमारे समाज में पागलपन के मरीजों के प्रति एक नकारात्मक रवैया है, उन्हें एक कलंक के रूप में देखा जाता है. अगर कोई व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है या फिर मानसिक अस्पताल में है तो उसके घरवाले यह बात सबसे छिपाने की कोशिश करते हैं. उन्हें हमेशा डर बन रहता है कि अगर यह बात उजागर हो गई तो समाज में उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाएगी, उनके परिवार से कोई रिश्ता नहीं बनाएगा. इन्हीं कारणों के चलते लोग पूरी तरह से ठीक हो जाने के बावजूद इन मरीजों को नहीं अपनाते. हमारे पुरुष-प्रधान समाज में महिलाओं के मुकाबले मानसिक रोगी रहे पुरुषों को ज्यादा अपनाया जाता है. एक बात यह भी गौर करने वाली है कि गरीब परिवार मानसिक रोग से पीड़ित सदस्यों को आसानी से अपना लेते हैं लेकिन यह बात मध्यमवर्गीय और अमीर परिवारों में देखने को नहीं मिलती.’

साल 2011 में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने ठाणे के इस मानसिक अस्पताल में रह रहे मरीजों के पुनर्वासन के लिए ‘तराशा’ नाम से एक परियोजना चलाई है. इस मुहिम के तहत 15 महिलाओं का पुनर्वासन करने की कोशिश की गई थी. इस परियोजना की संचालक अश्विनी सुरवासे कहती हैं, ‘पुनर्वासन के लिए चुनी गई 15 लड़कियों में से 11 प्रिंटिंग प्रेस और रिटेल के व्यवसाय में काम कर रही हैं, दो अपने परिवार के साथ हैं और दो को वापस अस्पताल भेज दिया गया है क्योंकि उनको अभी और इलाज की जरूरत है.’ वे आगे कहती हैं, ‘हम मानसिक अस्पताल जाकर मरीजों से समूह में और अकेले मिलते हैं. उनसे बात करते हैं, उनका आकलन करते हैं. इसके बाद मनोचिकित्सक और व्यावसायिक डॉक्टरों की राय लेते हैं और फिर लड़कियों को अस्पताल से निकाल लेते हैं. इस प्रक्रिया के बाद उन्हें संस्था से जुड़े वर्किंग वुमन हॉस्टल में रखा जाता है और चार महीनों का साइकोसोशल रिकवरी (मनोसामाजिक पुनःप्राप्ति) का कोर्स करवाया जाता है जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़े. इसके बाद उन्हें चार महीनों की अवधि का ही एक वोकेशनल ट्रेनिंग कोर्स कराया जाता है जिसके बाद उन्हें नौकरी दी जाती है.’

ठाणे मानसिक अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट राजेंद्र शिरसाठ कहते हैं, ‘मरीजों के परिवार उनके पूर्व में किए हुए व्यवहार से घबराकर और समाज में मानसिक रोगियों के प्रति हीन दृष्टिकोण के चलते उन्हें अपनाने से कतराते हैं. मानसिक रोग और उससे जूझते लोगों के प्रति सामाजिक जागरूकता लाना बहुत जरूरी है. जब तक समाज में इनके प्रति सकारात्मक रवैया नहीं बनेगा तब तक इन्हें कोई नहीं अपनाएगा.’          

बीमारी की तरह फैल रहा है सोशल मीडिया का दुरुपयोग : ओम थानवी

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जब नई तकनीकें आती हैं, तो वे अपने साथ वरदान भी लेकर आती हैं और अभिशाप भी. आपको उसके फायदे नजर आते हैं और नुकसान भी. यहां तक कि लोकतंत्र के भी अपने फायदे और नुकसान हैं और तानाशाही के भी अपने फायदे-नुकसान हैं. ये होता है कि तानाशाही में नुकसान बहुत ज्यादा होते हैं और लोकतंत्र में फायदे बहुत ज्यादा होते हैं. लेकिन ऐसा कहना कि तानाशाही में फायदे नहीं होंगे, एक तरह का अनुशासन तो आ ही जाता है, लोकतंत्र में नुकसान है कि एक तरह की अराजकता आ ही जाती है.

सोशल मीडिया की जो तकनीक आई है ​ये अपने साथ बहुत अच्छाई लेकर आई है. संचार तुरंत होने लगा है- ज्ञान का, जानकारी का. लोग संचार माध्यमों- अखबार और टीवी के भरोसे नहीं हैं. सोशल मीडिया के ​जरिए आपको बारिश तक की जानकारी तुरंत मिलती है. अखबारों और टीवी चैनलों के भी पोर्टल बने हुए हैं जिनके जरिए तुरंत जानकारियां मिलती हैं. पर यह तकनीक जो अभिशाप लेकर आई है, वह है कि आप उसका इस्तेमाल देश में आग लगाने के लिए भी कर सकते हैं, दंगे भड़काने के लिए भी कर सकते हैं, चरित्र हनन के लिए भी कर सकते हैं. ये इसका अभिशाप है. इसे शत-प्रतिशत तो काबू नहीं कर सकते हैं, लेकिन बिल्कुल काबू नहीं कर सकते, ऐसा भी नहीं है. इसकी कोशिश भी हमारे यहां बहुत अधिक नहीं हुई है. एक कानून बन गया, लेकिन हमारे यहां लोग आम तौर पर कानूनी झमेले में पड़ते नहीं हैं. लेकिन कभी भी किसी की भी टोपी उछाली जा सकती है, कभी भी दंगे भड़काने की कोशिश की जा सकती है. संगठित तौर पर जो राजनीतिक दल हैं, हम जानते हैं कि चुनाव लड़ने के लिए मोदी जी ने सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया. जाहिर है ​यह अमेरिकी कंपनी की सलाह होगी जो उन्होंने हायर की थी. बड़ी तादाद में लोगों को हायर किया गया जो बाकायदा फौज की तरह उनके लिए लड़ने का काम कर रहे हैं. और जैसा कहा जाता है कि प्यार और युद्ध में सब जायज है तो लड़ाई में दुश्मनों पर हमला, झूठी तस्वीरें बनाकर प्रचार करना, उनके बारे में झूठी जानकारियों का प्रसार करना, ये सारा शुरू हुआ है. मोदी जी के चुनाव में यह सिलसिला शुरू हुआ, उसके बाद यह एक आदत में तब्दील हो रहा है. दूसरे दल भी कर रहे हैं. अगर आप कहें कि दूसरे दल नहीं कर रहे हैं तो यह भूल होगी.

सोशल मीडिया पर लिखने को पत्रकारिता मैं नहीं मानता. यहां तथ्य चेक करने का प्रावधान नहीं है. पत्रकारों की ट्रेनिंग होती है कि वे सूचनाओं को चेक करें

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आपको जिस तरह की अफवाहें गांधी और नेहरू के बारे में मिलेंगी, तस्वीरें जिस तरह से तोड़-मरोड़कर बनाई हुई मिलती हैं, जिसमें गांधी जी आपको कैबरे करते हुए मिल जाएंगे. नेहरू जी स्वीमिंग पूल में सुंदरियों के साथ नहाते हुए मिल जाएंगे. जाहिर ​है कि ये नकली तस्वीरें हैं. इस तरह से दीनदयाल उपाध्याय के बारे में ऐसी जानकारियां, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में, गोलवलकर के बारे में आपको मिल जाएंगी. ये चीजें सोशल मीडिया के प्रसार के साथ एक बीमारी या बुराई की तरह फैल रही हैं.

एक सीमा तक तो आप कह सकते हैं कि कोई भी मान नहीं सकता कि गांधी जी कैबरे करते थे या कोई मान नहीं सकता कि नाथूराम गोडसे पुण्यपुरुष था. इस तरह की चीजों को तो आप चाहकर भी स्थापित नहीं कर सकते. ऐसी चीजों को लोग समझ जाते हैं और उन्हें नजरअंदाज करते हैं. लेकिन जैसा मुजफ्फरनगर में हुआ, दंगे भड़काने के लिए जिस तरह सोशल मीडिया का इस्तेमाल हुआ, ऐसी चीजें चिंताजनक हैं. चरित्र हनन के लिए जो लोग इस दुनिया में नहीं हैं, उनको छोड़ें, पर जो लोग मौजूद हैं, उनके बारे में गैरजिम्मेदारी के साथ कुछ उछाल दिया जाता है. ये उम्मीद करना कि हमने तो कानून बना रखा है, वह आदमी अदालत जा सकता है, इतना ही समस्या का निराकरण नहीं है. इससे अधिक इसकी निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए. अब क्या निगरानी हो सकती है, तकनीकी जानकारी रखने वाले लोग इसका रास्ता निकालेंगे.

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फेसबुक पर आजकल मैं नहीं हूं क्योंकि समय बहुत जाता है. गाली वहां बहुत पड़ती रही, उसकी मैंने कभी परवाह नहीं की. आपने सबके सामने खड़े होकर एक संवाद शुरू किया है तो इस तरह का भी काम होता है. उनकी मंशा ये होती है कि वो आपको बदनाम करें, डराएं ताकि आप उनके बारे में ऐसी टिप्पणियां करना बंद कर दें जिससे उनको लगता है कि नुकसान है क्योंकि आपकी साख ज्यादा है. वह उनकी लड़ाई का एक हिस्सा है. उसे मैंने कभी सफल नहीं होने दिया. मैं कम से कम विचलित नहीं हुआ हूं. हां, एक मर्यादा के बाद गाली-गलौज पर लोगों को ब्लॉक जरूर कर दिया है. लेकिन ऐसे लोगों की तादाद बहुत अधिक है. ब्लॉक करने पर यह कहा गया कि यह व्यक्ति तो ब्लॉक कर देता है, लेकिन आपको यह अधिकार हासिल है कि किसी को अपने घर में आने दें. आप अपनी वॉल पर बात करते हैं, कोई सुने या न सुने. यह सब मुझे बुरा नहीं लगा.

अफवाह फैलाने की घटना का एक उदाहरण है. डॉ. नामवर सिंह के जन्मदिन के वक्त मैं एक कार्यक्रम में गया था. वहां दो वरिष्ठ संपादक थे विष्णु नागर और पंकज बिष्ट, दो कवि थे, बड़े कथाकार थे. उनके बीच कोई भी अफवाह फैलाना लगभग असंभव बात है. लेकिन अफवाह फैला दी गई कि मेरे साथ झगड़ा हो गया और मारपीट की गई. सबसे अजीब बात ये थी कि जिम्मेदार लोग जिनसे आप जिम्मेदारी की अपेक्षा करते हैं, टीवी या अखबारों के संपादक उन्होंने ऐसा किया. जी न्यूज के संपादक हैं सुधीर चौधरी. उन्होंने भी ट्वीट किया कि संपादक ने कोई हल्की बात की, इसलिए उनकी पिटाई हो गई. अगर ऐसा है तो बुरी बात है. ‘अगर ऐसा है’ कहकर संपादक बात कर रहा है. अरे भाई, फोन करके मुझसे पूछ लीजिए. चार लोग वहां मौजूद हैं, उनसे पूछ लीजिए कि वो क्या कहते हैं. बाद में समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट ने एक लंबा लेख लिखा कि सोशल मीडिया मूर्खों का अड्डा बन गया है जिसमें संपादक के बारे में एक चीज चल गई. जबकि वहां कई लोग मौजूद हैं, लेकिन वह बात चल गई तो कई लोग लिख रहे हैं. इस अफवाह में दूसरा नाम था दूरदर्शन के एक अधिकारी कृष्ण कल्पित. हालांकि बाद में यह मसला ठंडा इसलिए पड़ गया ​कि जो लोग वहां मौजूद थे, उन्होंने इससे इनकार किया कि वहां कुछ ऐसा हुआ. लेकिन लोगों ने इस तरह चरित्र हनन की कोशिश की. बहरहाल वह बात ज्यादा नहीं चल पाई क्योंकि झूठ ज्यादा दिन तक नहीं चल सकता. अब देखिए कि एक कवि और दूसरा चैनल का संपादक, अगर वही ऐसी अफवाह फैलाता है, चरित्र हनन की कोशिश करता है तो आप मानिए कि इस तरह की अफवाहों में बड़े लोग भी शामिल हैं. आप सिर्फ यह नहीं कह सकते कि बीजेपी या कांग्रेस ने कुछ ऐसे लोग हायर कर रखे हैं जो अफवाहें फैलाने का काम करते हैं. जिम्मेदार लोग भी ऐसा कर रहे हैं. जबकि पत्रकारों की ट्रेनिंग ही यही होती है कि सूचनाओं को चेक करें. यह पत्रकार को सिखाया जाता है. इसलिए मैं सोशल मीडिया पर लिखने को पत्रकारिता नहीं मानता. सोशल मीडिया में तथ्य चेक करने का कोई प्रावधान नहीं है. दूसरी बात, जो लिखता है वही उसको प्रसारित कर देता है, जबकि पत्रकारिता में एक दूसरा व्यक्ति होता है, जिसे आप संपादक कह सकते हैं, जो उसको जांचता है. वह नैतिक रूप से, कानूनी रूप से उसका जिम्मेदार होता है. अखबार में छपा होता है कि कानूनी रूप से संपादक खबरों के चयन के लिए जिम्मेदार है. लिखने वाला जिम्मेदार नहीं है. सोशल मीडिया में तो कोई संपादक है नहीं, वह खुद ही लेखक है, खुद ही संपादक है. ऐसे में उस माध्यम के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है. लेकिन ऐसे मामलों में जब जिम्मेदार लोग उसका दुरुपयोग करते हैं, किसी पर हमला करने के लिए, दुष्प्रचार के लिए, किसी से दुश्मनी निकालने के लिए, तब मानना चाहिए कि सोशल मीडिया जो ज्ञान, सूचना, समझ और जानकारियों को साझा करने के लिए बेहतर माध्यम बन सकता है, वह माध्यम बन जाता है बुराइयों के संप्रेषण का. इसको कैसे चेक किया जाए, सरकार को इस पर सोचना चाहिए. समाज को भी सोचना चाहिए ताकि मिलकर कोई रास्ता निकले.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(बातचीत पर आधारित)  

उपभोक्ता फोरम : ग्राहकों का मरहम

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एस्कार्ट हार्ट इंस्टिट्यूट ऐंड रिसर्च सेंटर (हॉस्पिटल) देश के नामचीन अस्पतालों में शुमार है. यहां एक महिला के पैर में खून का प्रवाह रुकने पर उसके दिल का ऑपरेशन किया गया. बावजूद इसके महिला के पैर का दर्द कम होने के बजाय बढ़ता ही गया. तबीयत बिगड़ने पर उनके इलाज के लिए होम्योपैथी का सहारा लिया गया लेकिन हालत नहीं सुधरी और महिला को अपना एक पैर गंवाना पड़ा. इसी बीच वर्ष 2010 में महिला की मौत हो गई.

इस मामले में अब दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने डॉक्टरों द्वारा इलाज के दौरान अपनाए गए तरीके को जानलेवा लापरवाही माना है. आयोग ने एस्काॅर्ट अस्पताल पर ब्याज सहित एक करोड़ 15 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. इलाज में लापरवाही पर दिल्ली के इस अस्पताल पर लगा यह सबसे बड़ा जुर्माना है. आयोग ने एक करोड़ 15 लाख रुपये की रकम में से 75 लाख रुपये उपभोक्ता कल्याण फंड में जमा कराने के निर्देश अस्पताल को दिए हैं. जबकि ब्याज समेत 40 लाख रुपये मृतक महिला के पति और मामले के शिकायतकर्ता केसी मल्होत्रा को देने के आदेश दिए गए हैं. इतना ही नहीं, वर्ष 2008 से अब तक इस मुकदमे पर शिकायतकर्ता द्वारा खर्च किए गए 50 हजार रुपये का भुगतान भी अस्पताल को करना होगा.

इस मामले में आयोग ने एक और बात को स्पष्ट किया. दरअसल अस्पताल प्रशासन की तरफ से कहा गया था कि पीड़ित महिला की मौत हो चुकी है. ऐसे में मुआवजे की मांग अनुचित है. हालांकि आयोग ने साफ किया कि उपभोक्ता के कानूनी वारिस अथवा प्रतिनिधि भी मुआवजा मांगने के हकदार होते हैं. इसलिए इस मामले में पीड़ित महिला के पति की मांग जायज है.

उपभोक्ताओं के हितों से संबंधित एक ऐसा ही मामला दिल्ली विकास प्राधिकरण से जुड़ा है. दरअसल 30 साल पहले हजारों लोगों ने घर का सपना देखा था. लेकिन दिल्ली विकास प्राधिकरण (स्लम एवं जेजेआर विभाग) और दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड की लापरवाही की वजह से उनका सपना अब तक पूरा नहीं हुआ है. इन लोगों ने वर्ष 1985 में निकाली गई एक आवासीय योजना के तहत अपनी मेहनत की कमाई घर की कीमत के तौर पर डीडीए को जमा करा दी थी. तीन दशक बीत जाने के बाद भी 12 हजार से ज्यादा लोगों को घर नहीं मिला है. ये सभी बोर्ड की प्रतीक्षा सूची के तहत मकान पाने का इंतजार कर रहे हैं. दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने डीडीए और बोर्ड के इस रवैये को उनकी सेवा में कोताही माना है. अब आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड पर करीब एक करोड़ रुपये का जुर्माना किया है.

Consumer

इस मामले में दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग के न्यायिक सदस्य एनपी कौशिक की पीठ ने कहा कि वर्ष 1985 में मकान की कीमत चुकाकर घर का सपना देख रहे हजारों लोगों में से महज 2,650 लोगों को अब तक मकान मिल पाया है. जबकि उपभोक्ता आयोग में शिकायत दाखिल करने वाले सुंदरनगरी निवासी देशराज का नाम प्रतीक्षा सूची में 12,929 नंबर पर है. आयोग के समक्ष बोर्ड के अधिकारी ने खुद यह बात कबूली है. आयोग ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि अगर घर देने की यही रफ्तार रही तो शिकायतकर्ता देशराज को 150 साल और इंतजार करना होगा.

इसी तरह के एक और मामले में उपभोक्ता आयोग ने ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण व एसबीआई पर 65 लाख रुपये जुर्माना लगाया है. दरअसल प्राधिकरण ने फ्लैट वापस करने पर तीन आवंटियों की बयाना राशि की 50 फीसदी रकम जब्त कर  ली थी. मामले में आयोग ने कहा है कि प्राधिकरण व बैंक ने बड़ी चालाकी से आवंटियों को धोखे में रखा. उन्होंने आवंटियों को सोचने-विचारने का मौका ही नहीं दिया और जबरन उनकी 50 फीसदी रकम काट ली. इसके लिए प्राधिकरण व बैंक पूरी तरह जिम्मेदार हैं.

दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने ग्राहकों में अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञता का जिक्र करते हुए अपने एक आदेश में कहा है कि देश भर के आंकड़े बताते हैं कि महज 0.3% लोग अपने अधिकारों के लिए उपभोक्ता अदालत पहुंचते हैं

मामला यह था कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने 8 नवंबर, 2010 को ग्रेटर नोएडा के विभिन्न सेक्टरों में फ्लैट आवंटन योजना निकाली थी. इस योजना के तहत भारतीय स्टेट बैंक ने सौ फीसदी का ब्याज देने का विज्ञापन अखबारों में दिया. पूर्वी दिल्ली निवासी तीन आवेदकों राजीव सिंह, मनोज कुमार शर्मा और सुमन लता ने स्टेट बैंक से बयाना रकम 3 लाख 90 हजार रुपये ब्याज पर लेकर फाॅर्म भरा.  24 जनवरी, 2011 को ड्रॉ निकाला. इस ड्रॉ में ये तीनों आवेदक सफल रहे. 11 फरवरी, 2011 को प्राधिकरण ने स्टेट बैंक को इन आवेदकों का आवंटन पत्र भेज दिया. लेकिन बैंक ने इसकी जानकारी इन आवेदकों को दो महीने बाद दी. आवंटन पत्र में लिखा था कि 30 दिन के भीतर फ्लैट को लेने अथवा वापस करने का समय है. बैंक से अप्रैल 2011 में आवंटन पत्र के बारे में सूचना मिलने के बाद इन तीनों आवेदकों ने पहले दूसरे बैंकों से अलग-अलग बयाना रकम ब्याज पर उठाई और स्टेट बैंक को चुकता करके आवंटन पत्र ले लिए. इसके बाद इन आवेदकों ने प्राधिकरण को लिखित में सूचना दी कि वे यह फ्लैट नहीं लेना चाहते. प्राधिकरण ने उनकी तीन लाख 90 हजार रुपये की राशि में से उन्हें सिर्फ एक लाख 95 हजार रुपये लौटाए. ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण का तर्क था कि उन्होंने एक महीने का तय समय गुजर जाने के बाद फ्लैट वापस किए हैं. इसलिए उनकी 50 फीसदी रकम काटी गई है.

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कोचिंग पर तीन लाख जुुर्माना

मुंबई के एक कोचिंग सेंटर पर एक उपभोक्ता अदालत ने 3.64 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. अदालत ने माना कि कोचिंग सेंटर 2013 में एक 12वीं की छात्रा को वादे के मुताबिक सेवाएं देने में नाकाम रहा. मीडिया में आई खबरों के मुताबिक, इस महीने की शुरुआत में जज एमवाई मनकर और एसआर संदीप ने अंधेरी के लोखंडवाला कॉम्प्लेक्स स्थित कोचिंग सेंटर ऑक्सफोर्ड ट्यूटर्स अकादमी को निर्देश दिया कि वे छात्रा को न केवल फीस के 54 हजार रुपये लौटाएं, बल्कि  लड़की और उसके परिवार के मानसिक उत्पीड़न के लिए 3 लाख रुपये का मुआवजा दें. इसके अलावा, अदालती प्रक्रिया में हुए खर्च के लिए भी दस हजार रुपये चुकाएं. बता दें कि ऑक्सफोर्ड ट्यूटर्स अकादमी- एसएससी, एचएससी, सीबीएसई और आईसीएसई के छात्रों को घर पर कोचिंग की सेवा देती है. रिपोर्ट के अनुसार, विज्ञान की छात्रा अभिव्यक्ति वर्मा अपनी एचएससी परीक्षाओं की तैयारियां कर रही थीं. 2013 में उन्होंने गणित और रसायन के लिए कोचिंग ली.

ऑक्सफोर्ड ट्यूटर्स अकादमी यह दावा करती है कि उसके पास अनुभवी शिक्षकों की फैकल्टी है. उसे अभिव्यक्ति के घर ट्यूटर भेजने थे, लेकिन एक महीना बीतने के बावजूद वे केमिस्ट्री का टीचर मुहैया कराने में नाकाम रहे. इसके अलावा, गणित का भी शिक्षक हिंदी माध्यम का था, जो अभिव्यक्ति को इंग्लिश मीडियम में पढ़ा नहीं पाया. अभिव्यक्ति की मां नीना एक वकील हैं. उन्होंने कोचिंग सेंटर से कई बार एक केमिस्ट्री टीचर भेजने की मांग की. कोचिंग सेंटर ने जिस टीचर को भेजा, वह आईसीएसई में आठवीं दर्जे के छात्रों को पढ़ाता था. नीना को डर था कि उनकी बेटी पढ़ाई में पिछड़ जाएगी. उन्होंने एक बार फिर कोचिंग सेंटर से बीते साल नवंबर में संपर्क किया.

  तब सेंटर ने एक आईआईटी स्टूडेंट को भेजा, जिसने क्वेश्चन पेपर बैंक सॉल्व करने में मदद की. हालांकि, वह भी अभिव्यक्ति की मदद करने में नाकाम रहा. इस दबाव में एसएससी में 83 प्रतिशत नंबर पाने वाली अभिव्यक्ति फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में मिलाकर 60 प्रतिशत अंक लाने में नाकाम रही. दरअसल, वे हैदराबाद के एक कॉलेज में दाखिला लेना चाहती थीं, जहां मेरिट के आधार पर एडमिशन मिलता है. हालांकि बाद में मैनेजमेंट से बातचीत के बाद उन्हें कॉलेज में एक सीट मिल ही गई. अभिव्यक्ति का कहना है कि वे कोचिंग सेंटर की ओर से की गई देरी की वजह से अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकीं. नीना ने 2015 में ऑक्सफोर्ड ट्यूटर्स अकादमी के खिलाफ कोर्ट में केस किया और खुद अपने मामले की पैरवी की. कोचिंग सेंटर ने कोर्ट के नोटिस पर जवाब नहीं दिया.[/symple_box]

ऐसा नहीं है कि आयोग सिर्फ बड़े मामलों में ही उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करता है. हम लोग हर दिन कुछ न कुछ सामान दुकानों से खरीदते रहते हैं. ऐसे में अगर हमारे पास उसका पक्का बिल है और हमारे सामान में कुछ गड़बड़ी है तो भी हम उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं. आयोग ने हाल ही में एक ऐसे मामले में जहां ‘बिग बाजार’ ने ग्राहक से सिर्फ 90 रुपये ज्यादा वसूली की थी अपना फैसला सुनाया है. पूर्वी दिल्ली में रहने वाली सरिता नारायण 13 जून, 2012 को किराने का सामान खरीदने बिग बाजार गई थीं. उन्होंने 3,512 रुपये का सामान खरीदा. घर जाकर बिल देखा तो पाया कि 500 ग्राम के बाबा रामदेव की पतंजलि कंपनी के हल्दी पाउडर पर एमआरपी (तय अधिकतम कीमत) 90 रुपये अंकित था. जबकि बिल में इसकी कीमत 160 रुपये वसूली गई थी. वहीं बृज देव एसएनडीएल साबुन पर एमआरपी 30 रुपये अंकित था और दो साबुन के एवज में 80 रुपये वसूले गए थे. महिला के बिल में कुल 90 रुपये की गड़बड़ की गई थी. महिला ने इसके खिलाफ उपभोक्ता अदालत में शिकायत की.

इस पर पूर्वी दिल्ली के सैनी एनक्लेव स्थित उपभोक्ता विवाद एवं निपटारा फोरम के अध्यक्ष एनए जैदी एवं सदस्य पूनम मल्होत्रा की पीठ ने शिकायतकर्ता सरिता नारायण के पक्ष में फैसला सुनाते हुए महिला को उनकी रकम 12 फीसदी ब्याज सहित लौटाने के आदेश दिए हैं. इतना ही नहीं, अदालत ने आयकर विभाग और कारोबार एवं कर विभाग को कंपनी के खातों की जांच करने को कहा है ताकि इस कंपनी द्वारा उपभोक्ताओं को पहुंचाए जा रहे नुकसान का विवरण मिल सके. साथ ही कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सके.

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उपभोक्ता अदालतों द्वारा सुनाए गए ऐसे फैसले ग्राहकों के हितों को लेकर एक उम्मीद जगाते हैं लेकिन बड़ी संख्या में अब भी लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हो पाए हैं. दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने उपभोक्ताओं में अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञता का जिक्र करते हुए हाल ही में अपने एक आदेश में कहा है कि देश भर के आंकड़े बताते हैं कि महज 0.3% लोग अपने अधिकारों के लिए उपभोक्ता अदालत पहुंचते हैं.

गौरतलब है कि देश में उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिए कानून को आए हुए तीन दशक से ज्यादा बीत चुके हैं. इसके लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था की गई है. देश में एक राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग है. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का गठन किया गया है. इस आयोग में एक अध्यक्ष (जो  सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस होते हैं) और 11 सदस्य मनोनीत किए जाते हैं. आयोग में देश भर से उपभोक्ताओं द्वारा राज्य उपभोक्ता आयोग के निर्णयों पर पुनर्विचार व आदेश में संशोधन के लिए आवेदन किया जाता है.

इसके अलावा प्रत्येक राज्य में एक उपभोक्ता आयोग होता है. राज्य उपभोक्ता आयोग में एक अध्यक्ष (जो हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज होते हैं) व चार मनोनीत सदस्य होते हैं. यह आयोग संबंधित राज्य के उपभोक्ता के हक संबंधी मामलों पर सीधे सुनवाई अथवा जिला उपभोक्ता आयोग के निर्णयों पर पुनर्विचार अथवा आदेश में संशोधन के मसलों पर सुनवाई करता है.

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वहीं हर राज्य के हर जिले में एक उपभोक्ता विवाद निपटारा फोरम होता है. यह फोरम संबंधी जिले के लोगों की शिकायतों पर सुनवाई करता है. फोरम में एक अध्यक्ष व दो सदस्य होते हैं. अध्यक्ष सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश अथवा उच्च पद पर आसीन रह चुके अधिकारी हो सकते हैं. इसके अलावा अन्य सदस्य भी सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश होते हैं. उपभोक्ता फोरम में ग्राहक अपने सामान में खामी को लेकर शिकायत करता है. प्राथमिक स्तर पर पहले ग्राहक के मामले की सुनवाई उपभोक्ता फोरम में ही होती है.

उपभोक्ता अदालतें दीवानी अदालत की तरह होती हैं. किसी भी पक्षकार को समन कर तलब करना अथवा जुर्माना आदि करने का अधिकार इन अदालतों को है लेकिन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत इन अदालतों को एक विशेष प्रावधान के तहत पक्षकार के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है. जैसे कि प्रतिवादी द्वारा उपभोक्ता अदालत द्वारा दिए गए निर्णयों को नहीं मानने पर उसकी गिरफ्तारी के आदेश उपभोक्ता अदालत दे सकती है. तब तक उक्त प्रतिवादी एवं पक्षकार को जेल से रिहाई नहीं मिल सकती, जब तक वह उपभोक्ता अदालत के निर्णय का पालन नहीं कर लेता.

हालांकि ऐसा नहीं है कि देश भर में उपभोक्ता अदालतें बहुत ही बेहतर तरीके से काम कर रही हैं. प्रावधानों के मुताबिक उपभोक्ता आयोग को तीन महीने के भीतर मामले का निपटारा करना होता है पर कई बार ऐसा नहीं हो पाता है. आईटी सेक्टर में काम करने वाले दीपक चौबे ऐसी ही एक समस्या से जूझ रहे हैं. वे कहते हैं, ‘एक शोरूम से लिए गए मोबाइल में परेशानी आने के बाद उन्होंने उपभोक्ता फोरम में शिकायत की थी पर तीन महीने से ज्यादा का वक्त बीत जाने पर भी मामले का निपटारा नहीं हो पाया है. अक्सर स्टाफ की कमी की शिकायत की जाती है.’

कुछ ऐसी ही शिकायत मीडिया इंडस्ट्री में काम करने वाले प्रदीप कुमार की है. उनका कहना है कि तीन महीने में मामले का निपटारा हो जाना चाहिए था, लेकिन एक  चाइनीज मोबाइल कंपनी के खिलाफ पूर्वी दिल्ली के सैनी एनक्लेव स्थित उपभोक्ता विवाद एवं निपटारा फोरम में करीब चार महीने पहले की गई अपील पर अभी तक फैसला नहीं आ पाया है. इस मामले की पहली सुनवाई के बाद से ही स्टाफ की कमी का मामला सामने आ गया था. अभी तक चार बार मामले की  सुनवाई हो चुकी है पर कुछ भी हल नहीं निकल पाया है.

दिल्ली जैसे बड़े शहरों की बात छोड़ दी जाए तो छोटे शहरों में उपभोक्ता अदालतें बहुत ही बदतर स्थिति में हैं. इनके पास स्टाफ की समस्या के साथ-साथ संसाधनों की बेहद कमी है. इसके अलावा लोगों के कम जागरूक होने के चलते कम मामलों की सुनवाई भी होती है.

उपभोक्ता अधिकारों को लेकर काम कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता जेपी बंसल कहते हैं, ‘सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग जागरूक नहीं हैं. उन्हें अपने अधिकारों के बारे में जानकारी नहीं है. कई बार लोग कहते हैं कि पैसों की बात नहीं लेकिन अदालतों के चक्कर में कौन फंसे. अब जब लोग जागरूक नहीं हैं तो मामले कम संख्या में दायर होते हैं. ऐसे में सरकारें भी उदासीन हैं. उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा उसके एजेंडे में खास जगह नहीं पा रही है. अब दिल्ली के जिला उपभोक्ता फोरम में कई बार स्टाफ की समस्या रहती है. क्लर्क वगैरह बहुत कम हैं. संसाधन बहुत सीमित हैं. कई बार फोरम के अध्यक्ष का पद कई महीनों तक खाली रहता है. ऐसे में सुनवाई समय पर पूरी नहीं हो पाती है. यह दिल्ली का हाल है. बाकी बाहर तो हाल और भी बुरा है. छोटे-छोटे जिलों में तो महीनों स्टाफ ही नहीं रहता है. कुल मिलाकर मामला जागरूकता है. हम ही जागरूक नहीं है तो सरकार और ज्यादा उदासीन है.’

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दरअसल बढ़ते बाजारवाद के दौर में उपभोक्ता संस्कृति तो देखने को मिल रही है, लेकिन अब भी जागरूक उपभोक्ताओं की कमी है. आज हर व्यक्ति उपभोक्ता है, चाहे उसका व्यवसाय, आयु, लिंग, समुदाय तथा धार्मिक विचारधारा कोई भी हो. चाहे वह कोई वस्तु खरीद रहा हो या फिर किसी सेवा को प्राप्त कर रहा हो. वस्तुओं में मिलावट और निम्न गुणवत्ता की वजह से जहां उन्हें परेशानी होती है, वहीं सेवाओं में व्यवधान या पर्याप्त सेवा न मिलने से भी उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.

हालांकि भारत सरकार कहती है कि जब आप पूरी कीमत देते हैं तो आपको गुणवत्ता भी पूरी मिलनी चाहिए यह सुनिश्चित करने के लिए कानून है, लेकिन इसके बावजूद उपभोक्ताओं से पूरी कीमत वसूलने के बाद उन्हें सही वस्तुएं और वाजिब सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं. यह परेशानी की बात है.