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‘वॉट्सऐप या मेल पर तलाक कैसे दे सकते हैं? क्या अल्लाह बैठकर वॉट्सऐप चेक कर रहे हैं कि किसने किसे क्या भेजा है?’

साभार : बीएमएमए
साभार : बीएमएमए
साभार : बीएमएमए

तकरीबन सारी दुनिया में, जिसमें मुस्लिम देश भी शामिल हैं, तीन तलाक का मौजूदा स्वरूप समाप्त हो चुका है. मेरा तो मानना है कि मुल्क में महिलाओं के लिए बराबर का अधिकार होना चाहिए. उनके लिए सक्रिय कानून होने चाहिए, जो एक स्तर पर हैं भी कि अगर आप चाहें तो उसके तहत विभिन्न कानून की धाराओं का इस्तेमाल करके कोर्ट जा सकते हैं. लेकिन अगर हम इस्लाम को भी नजर में रखकर देखें तो इस्लाम के अंदर या कुरान के अंदर तीन तलाक का कोई कॉन्सेप्ट नहीं है. ये तो जिस वक्त मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाया गया, उसमें इसका प्रावधान किया गया और इसे बनाने वाले कौन हैं? वे सब के सब पितृसत्तात्मक सोच वाले मर्द हैं.

हमारे पास घरेलू हिंसा के या आपसी विवाद के मामले आते हैं तो हम पहले दोनों के साथ बैठकर बातचीत करते हैं और सुलझाने की कोशिश करते हैं. अगर लगता है कि सुलझ रहा है तो लिखित में जिम्मेदारी लेने को कहते हैं. यही व्यवस्था कुरान में भी है कि पहले पति-पत्नी खुद सुलझाने की कोशिश करें. नहीं हो पाता तो दोनों तरफ के गवाहों से साथ बैठकर बातचीत हो. तब भी सुलह नहीं हो पाती तो सोचने के लिए दो महीने का टाइम दिया जाए. तीन तलाक की तीन महीने की प्रक्रिया है. एक ही बार में तलाक-तलाक-तलाक कह देना, इसका तो कोई वजूद ही नहीं है. यह बस बन गया है और अमल में लाया जा रहा है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसे खत्म किया जाना चाहिए. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) ने 50 हजार लोगों के साइन लिए हैं, यह तो बहुत ही कम लोगों तक पहुंचा है. लाखों महिलाएं हैं जो तीन तलाक को खत्म करने की पक्षधर हैं. धर्म के ठेकेदार धर्म की व्याख्या अपनी सुविधानुसार करते हैं. जिस वक्त उनको जो सुविधाजनक लगता है, वही बोल देते हैं. वॉट्सऐप पर या मेल पर तलाक कैसे दे सकते हैं? क्या अल्लाह वहां बैठकर वॉट्सऐप चेक कर रहे हैैं कि किसने किसे क्या भेजा है? मर्द वही करता है जो वह करना चाहता है, दो-चार मौलवी भी मिल जाते हैं जो उनको सपोर्ट कर देते हैं. जो पर्सनल लॉ बने वो अंग्रेजों के समय बने. उसमें बहुत कुछ ऐसा है जिसके आधार पर जायज-नाजायज का फैसला दे दिया जाता है.

धर्म के आधार पर समाज चलाना तार्किक तो बिल्कुल नहीं है, लेकिन समान नागरिक संहिता समेत तमाम चीजों का इस्तेमाल देश में सिर्फ राजनीतिक ध्रुवीकरण और माहौल बनाने के लिए किया जाता है. समान नागरिक संहिता का हमेशा उसी तरह इस्तेमाल हुआ है और यह दक्षिणपंथियों व भाजपाइयों ने किया है. जब भी मुसलमानों को गाली देनी हो, समान नागरिक संहिता की बात करने लगते हैं. अगर हम लैंगिक न्याय कानून की बात करें तो ये लोग सबसे पहले भागेंगे. अगर हम समान नागरिक संहिता की बात कर रहे हैं तो दलितों, महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों सबके लिए बराबरी की बात कैसे नहीं होगी? लेकिन भाजपा की विचारधारा में तो बराबरी है ही नहीं. वे तो वर्ण व्यवस्था की बात करते हैं. वे समान नागरिक संहिता का सिर्फ राजनीतिक इस्तेमाल करते हैं. इसका सबसे अच्छा तरीका मैं ये मानती हूं कि हर समाज में समय के साथ सुधार की जरूरत होती है. किसी भी समुदाय में जो भी समस्या है, उस पर आप कानून बनाइए और लागू कीजिए जिसमें विकल्प हो. जैसे, अगर मुसलमान औरत के साथ मारपीट हो रही है तो जरूरी थोड़े है कि वह मुस्लिम पर्सनल लॉ में ही जाए. वो घरेलू हिंसा कानून के तहत कोर्ट में जाए, उसे कोई रोक थोड़े सकता है! बहुत सारी मुसलमान औरतें गई भी हैं और न्याय मिला.

मैंने बच्चा गोद लेने के लिए आठ साल केस लड़ा. मैं हर मुसलमान से यह नहीं कह सकती कि तुम बच्चा गोद लो. लेकिन एक लड़ाई लड़कर एक कानून आ गया. अंडर जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में यह बात जोड़ दी गई कि अब कोई भी नागरिक बच्चा गोद ले सकता है. मुसलमान नहीं कर रहा तो नहीं कर रहा है. हो सकता है कि कभी यह डिबेट यहां तक पहुंचे कि बच्चा गोद लेना चाहिए. जब तक नहीं हो रहा, तब तक एक कानून लागू है. जिसको गोद लेना है, उसके लिए कानून मौजूद है. जरूरी है कि हमारे पास नागरिक कानून हों कि जो नागरिक चाहे, उसे इसका फायदा मिले. अभी ऐसा बहुत सारे मामलों में है, बहुत सारे मामलों में नहीं है. जहां तक मर्दों की ओर से तीन तलाक देकर महिला को छोड़ देने का मसला है तो यह ज्यादातर मुस्लिम देशों में भी खत्म हो चुका है. मुझे तो बहुत उम्मीद है कि अब यह केस सुप्रीम कोर्ट में है तो इसका कुछ न कुछ अच्छा ही नतीजा निकलेगा.

(लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

(बातचीत पर आधारित)

जब कुरान तीन तलाक की इजाजत नहीं देता तो पर्सनल लॉ बोर्ड कौन होता है इसकी पैरवी करने वाला : ज़किया सोमन

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बीएमएमए द्वारा प्रधानमंत्री को तीन तलाक पर बैन लगाने को लेकर पत्र लिखा गया था?

हां, पर उस पत्र में सिर्फ तीन तलाक की बात नहीं है बल्कि मुस्लिम फैमिली लॉ को विधिवत करने की बात है, उसमें सुधार लाने की जरूरत है तो ये सुधार क्या होंगे ये हमने सुझाया था. जैसे शादी के लिए एक उम्र सीमा तय हो, एकतरफा, जुबानी तलाक बंद हों, बहुविवाह पर रोक लगे. प्रधानमंत्री की तरफ से तो कोई जवाब नहीं आया पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दवे और जस्टिस गोयल की बेंच ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सरकार से पूछा है कि महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय खासकर मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे तीन तलाक पर उनकी क्या राय है. सरकार की तरफ से तो अभी प्रत्यक्ष रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई पर पिछले दिनों देश भर में हमने तीन तलाक पर कानूनी पाबंदी को लेकर एक अभियान चलाया जिस पर पूरे देश से सकारात्मक प्रतिक्रिया आई है, जिसके बाद हमने एक मेमोरेंडम तैयार करके राष्ट्रीय महिला आयोग में भेजा है. सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय महिला आयोग से भी उनकी इस मुद्दे पर स्पष्ट राय मांगी है. तो हमें वहां से आश्वासन दिया गया है कि वे लोग मुस्लिम महिलाओं की परेशानी समझेंगे और वे क्या चाहती हैं, उनकी मांगों को ध्यान में रहेंगे.

पर पिछले ही दिनों ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की एक महिला सदस्य ने इन सब मांगों को गलत बताया है. उन्होंने कहा कि वर्तमान के कानून मुस्लिम महिलाओं की भलाई के लिए हैं, अगर कोई व्हाट्सऐप पर तलाक भेजता है तो अच्छा है, महिलाओं के पास तलाक का सबूत तो रहेगा.

ये सब निहायत ही वाहियात और दकियानूसी बातें हैं. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बनाए कानून 1400 साल पुराने हैं, जिनका कुरान में कोई जिक्र नहीं है. आज देश की आजादी को भी सत्तर साल होने जा रहे हैं और देखिए अब भी तीन तलाक हो रहे हैं, हलाला हो रहा है. ये सदस्य महिला होकर भी ये पुरुषप्रधान सोच का समर्थन कर रही हैं, अन्य महिलाओं के अधिकारों के हनन पर चुप हैं तो इनका सिर्फ शरीर महिला का है, प्रतिनिधित्व ये उसी दकियानूसी पुरुषप्रधान सोच का कर रही हैं. जब कुरान तीन तलाक की इजाजत नहीं देता है तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कौन होता है इसकी पैरवी करने वाला? ये अपनी पितृसत्ता से भरी सोच को धर्म के नाम पर खपा रहे हैं.

धर्म के नाम पर कैसे?

कुरान के चार मूलभूत सिद्धांत हैं- इंसाफ, नेकी, रहमदिली और समझदारी. तो इन चारों को अपने व्यवहार में रखें. सब्जी ठीक नहीं बनी, नमक कम पड़ा, तूने मेरी बात नहीं मानी जा मैं तुझे तलाक देता हूं… ये सब कुरान में है ही नहीं. ये बेअक्ली है. ये किसी भी तरीके से न्यायिक नहीं है और जो बात न्यायिक नहीं है उसकी पैरवी न तो इस्लाम करता है न ही कुरान. इस्लाम का, इसकी शिक्षाओं का प्राथमिक स्रोत कुरान रहा है और दूसरा पैगंबर साहब की जिंदगी, उनका आचरण. पैगंबर साहब ने तीन तलाक देने पर कड़ी नाराजगी जताई है. इसे अल्लाह की मर्जी के खिलाफ बताया है. उन्होंने कहा है कि अल्लाह इससे नाखुश होता है. कुरान के मुताबिक शादी एक सामाजिक करार है जहां पति-पत्नी दोनों को अपनी शर्तें, अपनी मांगें सामने रखने का हक दिया गया है और जहां इन्हें लिखित रूप में दर्ज किया जाता है वो निकाहनामा कहलाता है. तो कुरान महिला पुरुष दोनों को बराबर के हक देता है. पर ऐसा समाज में होता नहीं है. वहीं कुरान में भी कई ऐसी आयतें हैं जहां साफ लिखा है कि छोटी-सी बात पर तलाक न करें. शादी एक गंभीर सामाजिक और जज्बाती रिश्ता है, इसे ऐसे खत्म न करें. अगर कोई अनबन है तो पहले बातचीत से मसले को सुलझाने की कोशिश करें. ये बातचीत, ये कोशिश कम से कम चार महीने तक होनी चाहिए. अगर ये कोशिश नाकाम होती है तो दोनों के परिवार से एक-एक सदस्य मध्यस्थ के रूप में आए और मामले को सुलझाने की कोशिश करें. अगर ये प्रक्रिया नाकाम रहती है, लगता है निबाह नहीं हो पाएगा तो अलग हो जाएं. तलाक के बाद पत्नी के जो भी अधिकार हैं वे उसे मिलें. तीन तलाक का कुरान में कोई जिक्र भी नहीं है.

तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा, आपके अनुसार इन गैर-कुरानी कानूनों को बनाए रखने की क्या वजह है?

चूंकि उन्हें अपना वर्चस्व बरकरार रखना है, इसलिए ये कानून थोपे जा रहे हैं. शायरा (बानो) पहले से ही कितनी प्रताड़ित रही हैं, उन्हें ये ऐसे कानूनों से और परेशान कर रहे हैं. वो बहुत हिम्मत वाली हैं जो इन सबसे लड़ रही है. हम भारत के संविधान के अनुसार नागरिक हैं, आप कौन होते हैं हमें कानून सिखाने वाले?

आपको बीएमएमए की मांगों पर उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया मिली?

प्रतिक्रिया सीधे तो नहीं मिली, पर टीवी डिबेट वगैरह में वे हमसे खूब तू-तू, मैं-मैं करते हैं. वो जानते हैं कि अगर कोई उनसे लड़ाई कर सकता है तो वो हम हैं. इसलिए अब वे हम पर निजी हमले भी कर रहे हैं. मेरे खिलाफ वॉट्सऐप पर एक मैसेज लगातार घूम रहा है जिसमें मुझे काफिर करार दिया गया है. मेरे पति और बेटे को भी इसमें घसीटा है. मेरी तस्वीर भी लगाई है और लिखा है हम इस्लाम के खिलाफ हैं. एक जगह नूरजहां को भी गाली दी है. ये पितृसत्ता और रूढ़ियों से भरे लोग हैं. इन्हें पढ़ी-लिखी, समझदार, एम्पावर्ड औरतों से डर लगता है. हम इन्हें चुनौती देते हैं कि आप बिचौलिए हैं और बिचौलियों के लिए हमारे मजहब में कोई जगह नहीं है.

 ऐसा भी कहा गया कि आप आरएसएस एजेंट हैं.

आरएसएस का एक उद्देश्य है यूनिफाॅर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता… अगर किसी ने खुलकर इसका विरोध किया है तो वो हम हैं. हम अगर आरएसएस के साथ होते तो इसका विरोध क्यों करते! हमने तो इस पर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली है, जिसमें साफ कहा गया है कि हम इस आइडिया को सिरे से खारिज करते हैं. हमारे मुताबिक ये हमारी यानी मुस्लिम महिलाओं की समस्याओं का हल नहीं है.

वो कैसे?

देखिए, आजादी के समय इसको लाने का माहौल और पृष्ठभूमि अलग थी. संविधान बना तो उसकी नजर में सब नागरिक एकसमान हो गए, पर हमारे समाज में धर्म की गहरी पकड़ है और महिलाओं को उन धर्मों के अनुसार विवाह, संपत्ति आदि में अधिकार नहीं थे. तब सोचा गया कि एक यूनिफाॅर्म सिविल कोड होना चाहिए पर संविधान सभा में संस्कृति को बचाने की बात कहकर हिंदुओं ने इसका काफी विरोध किया था. उस विरोध के चलते नेहरू और आंबेडकर को ये विचार छोड़ना पड़ा. पर फिर धीरे-धीरे कुछ ही सालों में हिंदू मैरिज ऐक्ट, हिंदू सक्सेशन ऐक्ट जैसे पारिवारिक और सामाजिक कानून बने, जो महिलाओं के पक्ष में थे. फिर सभी अल्पसंख्यक समुदायों, चाहे पारसी हो या क्रिशि्चयन सभी ने अपने-अपने धर्म के दायरे में ही औरतों के लिए कानून में सुधार किए, सिवाय इस्लाम के. इस्लाम में आज भी 1937 में बने कानून लागू हैं जो इन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड वालों की वजह से हुआ है. मुस्लिम महिलाओं को इतने सालों से उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है. हमें हमारे आधारभूत अधिकार नहीं प्राप्त हैं और आप एक नया कानून लाने की बात कर रहे हैं.  ये सिर्फ राजनीतिक दलों के चोंचले हैं.

तो आपके अनुसार ये सिर्फ कोरी राजनीति है.

बिल्कुल. 1986 (शाहबानो फैसले का समय) और 2016 में फर्क यही है कि आज मुसलमान जागरूक हो चुका है. वो सब समझता है. उसके पास जानकारी है. उसे बेवकूफ बनाना आसान नहीं है. अब वो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की सच्चाई अच्छी तरह से पहचान गया है कि वो अपने अलावा किसी की मदद नहीं करते हैं. ये गलत लोग हैं. उन्हें आम मुसलमान की भलाई से कोई लेना-देना नहीं है. मैं अहमदाबाद से हूं. दंगों के वक्त मैंने कितना काम किया है ये मुझे बताने की जरूरत नहीं है, पर सवाल ये है कि उस वक्त मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कहां था? वहां तो कोई नहीं आया, किसी को देखने तक नहीं भेजा गया कि वहां मुसलमानों का क्या हाल था. तो अब उनका फरेब और दकियानूसी बातें नहीं चलेंगी. हम पिछले दस साल से जो भी काम कर रहे हैं वो कुरान और इस्लाम के दायरे में ही कर रहे हैं.

‘मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का आम मुसलमान की भलाई से कोई लेना-देना नहीं है. मैंने अहमदाबाद दंगों के वक्त काम किया है, पर जरूरत के उस वक्त पर्सनल लॉ बोर्ड कहां था?’

पूरी दुनिया में मुहिम चल रही है ‘जेंडर जस्टिस इन इस्लाम’, उसमें दुनिया भर के कई विद्वान हैं जो कुरान को पढ़कर उसकी व्याख्याएं लिख रहे हैं, उसका अनुवाद कर रहे हैं. अब मुसलमान जान रहा है कि हमारे मजहब में ‘जेंडर जस्टिस’ की बात कही गई है. पर्सनल लॉ बोर्ड ने जो आयतों का अर्थ निकाला है वो झूठ है. उन्होंने आज तक सिर्फ इस्लाम का और मुसलमानों, दोनों का नुकसान किया है.

आपका अभियान लंबे समय से चल रहा है. मुस्लिम समाज की इस पर कैसी प्रतिक्रिया मिली?

आज की तारीख में मुझे दिन भर में कम से कम 15-20 ईमेल आते हैं मुसलमान लोगों से. छह से सात कॉल आते हैं कि हमने आपके बारे में फलानी जगह पढ़ा और हमारी ये आपबीती है. हमारी मदद कीजिए. सोशल मीडिया पर भी लोग लगातार जुड़ते हैं. ये सिर्फ मेरे पास का आंकड़ा है. नूरजहां और बाकी राज्यों के संयोजकों की गिनती अलग है. तो कहने का अर्थ यह है कि बदलाव की प्रक्रिया हमेशा लंबी होती है, लेकिन बदलाव की शुरुआत तो हो. बीएमएमए बस वही शुरुआत है. अब तक कोई नहीं था जो इस सबके खिलाफ खड़ा होता, पर अब हम हैं और उम्मीद है कि आने वाले दिनों और लोग भी साथ आएंगे जो तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाएंगे.

अपने अभियान की असली कामयाबी कब मानेंगी?

हम तो इसे ही कामयाबी मानते हैं कि महिलाएं खुद हक के लिए जागरूक हो रही हैं, उसके लिए लड़ रही हैं. हमने शायरा को नहीं कहा कि कोर्ट जाओ, वे खुद गई हैं. आफरीन को नहीं कहा. उसने कोर्ट जाने के बाद हमें बताया था. तो महिलाएं खुद के लिए खड़ा होना सीख रही हैं. दूसरी जरूरी बात है कि अब मुस्लिम समाज में ये पब्लिक ओपिनियन बन चुकी है कि तीन तलाक गैर-कानूनी है. यहां तक कि गैर-मुस्लिम भी समझ रहे हैं कि इस्लाम वो नहीं है जो अब तक बताया गया. इस्लाम भी महिलाओं की बराबरी की बात कहता है. हमारे लिए ये भी उपलब्धि है. हां, असली कामयाबी तो तब ही होगी जब तीन तलाक, हलाला आदि पर कानूनी तौर पर पाबंदी लगाई जाएगी.

तीन तलाक पर पाबंदी लगने की बहस शुरू होने के बाद उत्तर प्रदेश के एक मौलाना साहब ने कहा था कि ये इस्लाम का मजहबी मसला है, इस पर किसी को बोलने का हक नहीं है.

तो क्या हम सब महिलाएं मुसलमान नहीं हैं? हम कुरान में पूरा यकीन रखते हैं. और वैसे भी कुरान में किसी मौलाना को कोई विशेष स्थान नहीं है. हर मुसलमान और अल्लाह के बीच एक अपना रिश्ता है और वो मुसलमान कयामत के रोज अपने-अपने कर्मों का हिसाब उसे देगा. इसमें मौलाना कहीं नहीं है. किसी भी मौलाना को बोलने का उतना ही हक है जितना मुझे या किसी आम महिला को है.

कुरान में आयतें हैं जहां साफ लिखा है कि महिला-पुरुष बराबर हैं. कुरान में जो मानव जाति की उत्पत्ति की परिकल्पना है वहां अल्लाह साफ कहता है हमने पृथ्वी पर मनुष्य का सर्जन किया और साथ में उसका एक जोड़ीदार भी बनाया. वहां स्त्री-पुरुष या कौन सुपीरियर, ऐसी कोई बात नहीं कही गई है. यहां सिर्फ मानव के सर्जन की बात है. हमने इन आयतों का जिक्र सुप्रीम कोर्ट में डाली गई याचिका में भी किया है. अमरीकी स्कॉलर अमीना वदूद ने कुरान पर काफी काम किया है. वो भी इसी बात का समर्थन करती हैं कि जब गैर-बराबरी का कोई जिक्र कुरान में नहीं है तो समाज में क्यों है.

इन सब बुराइयों के समाज में अब तक बने रहने का कारण अशिक्षा भी है. कई बार महिलाएं कोई आर्थिक संबल न होने के कारण अपमान झेलती रहती हैं.

ये बिल्कुल सही बात है. जब सच्चर समिति कहती है कि देश का मुसलमान समाज पिछड़ा है, गरीब है तो महिलाओं की हालत सोचिए. माइनॉरिटी विदइन माइनॉरिटी वाला मसला है. इस अशिक्षा और गरीबी का सबसे ज्यादा खामियाजा मुस्लिम महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है. औरत पति के अत्याचार इसीलिए सहती रहती है कि वो पढ़ी-लिखी नहीं है, अपने पैरों पर खड़ी नहीं है. ये तीन तलाक का मसला, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. पर बीएमएमए इस पर भी काम कर रहा है. देश के सात शहरों में हमारे ‘कारवां’ सेंटर हैं जहां महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जाता है. स्कूल में पढ़ने वाली बच्चियों को कंप्यूटर की ट्रेनिंग देते हैं. महिलाओं को कौशल

विकास और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है. उनको रोजगार के अवसर मुहैया कराए जाते हैं. पिछले दिनों भोपाल कारवां में महिलाओं ने तो अपने सिले गए कपड़ों की एक प्रदर्शनी लगाई थी जिससे उन्हें ठीक-ठाक आमदनी भी हुई. बीएमएमए के मिशन में दो ही बातें हैं- एक तो महिलाओं के नागरिक अधिकार दिलाना, दूसरे उनके कुरानी अधिकार दिलाना.

इस्लाम में महिला के अबॉर्शन करवाने को गलत माना गया है. अगर उसे लगता है कि उसे बच्चा नहीं चाहिए या वो उतनी सेहतमंद नहीं है जितना होना चाहिए तो क्या उसे ये फैसला करने का हक नहीं होना चाहिए?

मेरी जितनी इस्लाम की समझ है उसके मुताबिक विज्ञान और इस्लाम दोनों साथ-साथ चलते हैं. ऐसे में महिलाओं को परिस्थिति को देखते हुए समझदारी से फैसला लेना है कि उनके लिए क्या बेहतर होगा.

‘मुस्लिम मर्दों को अगर कोई चिंता है तो यह कि पत्नी पिटाई और महिला उत्पीड़न के नाजायज हक में कहीं कोई कमी न आ जाए’

Muslim brides sit as they wait for the start of a mass marriage ceremony in Ahmedabad

मुस्लिम महिलाएं सड़क-मुहल्लों से लेकर देश के स्तर तक मर्दों को मारने-पीटने वाले गिरोहों से लंबी लड़ाई लड़ रही हैं, और दूसरी तरफ मुसलमान मुल्ला-मर्द हैं जो घर के अंदर महिलाओं को पीटने और पीड़ित करने के हक को जारी रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं. मुजफ्फरनगर से लेकर गुजरात तक बलात्कार हुए लेकिन ये मुल्ला गिरोह इस मुद्दे पर कभी सड़कों पर नहीं उतरे, लेकिन तीन तलाक और बहुविवाह के अधिकार में कमी आए तो इनकी बर्दाश्त जरूर जवाब दे जाती है.

मुस्लिम मर्दों को अगर कोई चिंता एकजुट कर रही है तो यह कि घर में पत्नी पिटाई और महिला उत्पीड़न के नाजायज हक में कहीं कोई कमी न आ जाए. कहीं कोई ऐसा कानून न बन जाए जिससे उन्हें पत्नी उत्पीड़न के अधिकार से वंचित होना पड़े. तीन तलाक, हलाला, पत्नी पिटाई, पत्नी के साथ जबरन शारीरिक संबंध, बहुपत्नी प्रथा, लड़कियों का बाल विवाह जैसे मर्दवादी विशेषाधिकार पर चिंतित ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत, जमात, तंजीमें- सब मुस्लिम महिलाओं पर जुल्म को जारी रखने पर एकमत हैं. ये चालाक-चतुर सुजान टीवी की बहसों में गाल बजाते है कि तीन तलाक अपराध है, लेकिन इस अपराध को रोकने के किसी भी कदम का विरोध भी उसी सांस में करते हैं. तीन तलाक देने वाले पति की पिटाई कभी नहीं करते, लेकिन पत्नी पिटाई पर मूक सहमति जारी रखते हैं.

लेकिन हर खास-ओ-आम से मेरी गुजारिश है कि आप इन मुस्लिम मर्दों के गिरोहों से सिर्फ एक सवाल पूछिए कि भाईजान, आज तक आप लोगों ने मुस्लिम महिलाओं के उत्पीड़न के विरुद्ध कोई लड़ाई लड़ी है क्या? क्या तलाकशुदा बेसहारा महिलाओं के लिए कोई सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम शुरू किया है? या आपने सिर्फ पतियों को एकतरफा तीन तलाक पर समर्थन दिया है? क्या अधिक बच्चे पैदा करके अपनी सेहत गंवा रही मुस्लिम महिलाओं को फैमिली प्लानिंग अपनाने पर भी समर्थन दिया है? क्या एक पत्नी के रहते दूसरी-तीसरी शादी करने वाले अय्याश-संवेदनहीन पतियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है कभी? क्या तलाकशुदा पत्नी का हलाला के नाम पर पुनर्विवाह कराके उसे बार-बार नए मर्दों के हाथों में सौंपने के विरुद्ध कानून बनाने की बात की है आपने? क्या 18 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी पर कानूनी रोक की मांग की है? क्या कभी आपकी तंजीम ने मुस्लिम महिलाओं को घर के अंदर हक दिलाने की कोई लड़ाई लड़ी है?

तो सवाल ये है कि घर के बाहर इन्हें पीटने वालों से भी हम लड़ें और घर के अंदर हमें पीटने वालों से भी हम ही लड़ें? तो पहले किससे लड़ें?

(लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

‘मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल नहीं होना चाहिए’

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इस्लाम में तलाक का जो तरीका बताया गया है उसमें यह नहीं है कि एक बार में तीन तलाक दिया जाए. ये एक बार में तीन तलाक देने का जो तरीका लोगों ने अपना लिया है वह इस्लाम की शिक्षाओं और कुरान की हिदायतों के बिल्कुल खिलाफ है. इस्लाम ये कहता है कि अगर आपस में कोई विवाद हो जाए तो पहले शौहर और बीवी आपस में इसे सुलझा लें. अगर मामला नहीं बनता है तो किसी की मध्यस्थता से इसे ठीक करने की कोशिश करनी चाहिए. फिर भी अगर बात नहीं बनती है और दोनों अलग-अलग रहना चाहते हैं तो तरीका यह है कि पहले एक तलाक दिया जाए. एक महीने का इंतजार किया जाए. उस दरमियान बीवी पति के साथ ही रहे ताकि उनके बीच में सुलह हो सके. फिर एक महीने तक बात नहीं बनती है तो दूसरी बार तलाक दिया जाए. इस तरह से तीन महीने गुजर जाने के बाद तलाक की प्रक्रिया पूरी होती है. इस दौरान बीवी अपने शौहर के साथ रहे. इससे यह मौका मिलता है कि अगर आपने गुस्से में या किसी दूसरे ऐसे ही गैरजरूरी कारण से तलाक दिया है तो आपस में सुलह हो जाए. अगर ऐसा नहीं हो तो अलगाव हो जाना चाहिए. यही इस्लाम में तलाक का जायज तरीका है.

अब कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस तरीके को अपनाए बिना एक बार में तीन तलाक दे देते हैं. इस तरीके को हम गलत मानते हैं. यह इस्लाम विरोधी भी है. जिस बात को लेकर मतभेद है, वह यह है कि कुछ उलेमा कहते हैं अगर तीन तलाक एक बार में दे दिया जाए तो उसे एक ही मानना चाहिए. कुछ उलेमा यह मानते हैं कि अगर तीन तलाक एक बार में दिया जाए और देने वाला यह कहे कि हमने सोच-समझकर एक बार में तीन तलाक दिया है तो उसको तीन तलाक मान लिया जाए. अब तलाक को लेकर दो मत हैं और दोनों मतों को लेकर कुरान और हदीस की दलीलें मौजूद हैं. सबसे बड़ी बात है कि देश में दोनों तरीके प्रचलन में हैं और दोनों तरीकों से लोग तलाक ले रहे हैं.

जहां तक बात मामले के सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने की है तो ये बात सच है कि हमारे समाज में महिलाओं के साथ ज्यादती होती है. सही ये होगा कि गलत तरीकों को रोका जाए. उन्हें इज्जत दी जाए, लेकिन जो बहनें 50 हजार आॅनलाइन हस्ताक्षर के साथ सुप्रीम कोर्ट पहुंचकर मांग कर रही हैं कि तीन तलाक को एक कर दिया जाए, मेरे हिसाब से यह बात सही नहीं है कि दोनों मतों में से एक मत पर कानून के जरिये रोक लगा दी जाए. हम एक मत को मानने पर कानून के जरिये कोई बात थोप देंगे तो यह सही नहीं होगा. यह अदालत का मसला नहीं है. यह मामला लोगों को सही बात बताने का है. अगर अदालत तीन तलाक को एक मान भी लेगा तो जरूरी नहीं है कि औरतों के ऊपर अत्याचार बंद हो जाएगा. जो लोग इस बात को हवा दे रहे हैं वे लोग मुस्लिम पर्सनल लॉ को खत्म करना चाहते हैं और समान नागरिक आचार संहिता को लागू करवाना चाहते हैं. मुस्लिम समाज हमेशा कहता रहा है कि उसके पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. हमें संविधान के जरिये ये अधिकार दिया गया है. इस देश में हर आदमी अपने मजहब, अपने रीति-रिवाजों के साथ रह सकता है.

इसके अलावा जहां तक बीवी को हर्जाना देने की बात है तो इस्लाम में अगर तलाक हो गया, आप शौहर-बीवी नहीं रह गए तो इस्लामी कानूनों के हिसाब से आप शौहर के ऊपर हर्जाने के लिए दबाव नहीं डाल सकते हैं. यह इस्लाम के खिलाफ है. वैसे यह समाज की जिम्मेदारी है कि महिला का भरण-पोषण सही तरीके से हो. महिलाओं के पास इसके लिए मेहर की रकम की व्यवस्था की गई है. अगर महिलाओं को शादी के समय मेहर की रकम नहीं मिली है तो वह तलाक के समय दिलाई जाती है. इसके अलावा महिलाओं को जो संपत्ति में अधिकार मिले हैं वे उन्हें ले सकती हैं. इस्लाम में महिलाओं के लिए बहुत सारे प्रावधान हैं. खराब बात यह है कि लोग इस समय उन प्रावधानों को भूल रहे हैं. लोग इन सारे प्रावधानों पर जोर नहीं दे रहे हैं. उनका ध्यान सिर्फ इस बात पर है कि कैसे एक शौहर-बीवी जो अलग-अलग रह रहे हैं, उन पर हर्जाने का दबाव डाला जाए.

दरअसल, इस मसले को राजनीतिक फायदे के लिए उठाया जा रहा है. हाल ही में मेरी मुलाकात शायरा बानो से हुई जिन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. हमने उनसे पूछा कि क्या अगर सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक को एक मान लेता है तो वे अपने पति के साथ रहेंगी. उनका जवाब था नहीं. वैसे भी अगर किसी पुरुष ने महिला पर ज्यादती की है तो हमारे देश में कानून है. पर्सनल लॉ सिर्फ निकाह और तलाक के लिए है. अगर शारीरिक हिंसा, मानसिक हिंसा या उत्पीड़न का मामला बनता है तो इसके लिए आप कानूनी तरीके से शिकायत कर सकते हैं. तलाक की सजा सिर्फ औरत को मिलती है ऐसा नहीं है. पुरुष भी इसकी सजा भुगतते हैं. ये मसले इसलिए खड़े हुए हैं कि इस्लाम में महिलाओं को जो जगह दी गई है वह हमने अपने समाज में सही से लागू नहीं किया है. अगर ऐसा होता तो ऐसे मसले सामने ही नहीं आते.

(लेखक  जमात-ए-इस्लामी-हिंद के महासचिव हैं )

(बातचीत पर आधारित)

‘मुताह एक तरह की कानूनी वेश्यावृत्ति है, जिस पर मुस्लिम समुदाय को बात करने में भी शर्म आती है…’

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Photo : Tehelka Archives

तीन तलाक के खिलाफ अभियान से मुस्लिम समुदाय के लोगों या मौलवियों को आहत नहीं होना चाहिए क्योंकि जिस तरह से आज के दौर में तीन तलाक हो रहा है, वह पूरी तरह इस्लाम के खिलाफ है. इससे इस्लाम के जो पांच सिद्धांत हैं, जो हिदायत है, उसमें कोई तब्दीली नहीं होती. जो चीज थोड़ी-सी बदल रही है, वह शरीयत है. अब शरीयत बाद की चीज है, कुरान के डेढ़ सौ साल बाद की. उसका मकसद यही है कि कुरान को समझने और विश्लेषण करने में मदद करे. आज भी हम लोग कुरान को विश्लेषण कर सकते हैं कि आज के दौर में क्या जरूरी है. इस मामले में तो कुरान में बिल्कुल साफ निर्देश हैं कि तीनों तलाक के बीच में एक महीना दस दिन, एक महीना दस दिन का गैप होना चाहिए. तो इसमें समाज को आहत होने या तीन तलाक का बचाव करने की कोई गुंजाइश ही नजर नहीं आती.

एक चीज इसमें और जोड़ना चाहती हूं. इसके बिना ये मांग अधूरी  है. मेरे ख्याल से इस मांग में ये भी जोड़ा जाना चाहिए कि औरत को भी उतनी ही आसानी हो खुला लेने में, जितना कि मर्द को है. औरत भी तीन बार ये कह सके और तलाक हो जाए. क्योंकि औरत अगर खुला मांगती है तो अंतत: देता मर्द ही है. अगर वह नहीं चाहे तो उसे मनाना पड़ता है किसी बुजुर्ग से, दोस्त से, या समाज से दबाव डलवाना पड़ता है या कुछ संपत्ति वगैरह देकर मनाना पड़ता है. बच्चों से मिलने का अधिकार छोड़ना पड़ता है या मेहर की रकम छोड़नी पड़ती है. इस तरह कुछ चीजें छोड़कर महिला को तलाक मिलता है. इस सबके बावजूद जो फाइनल प्रोनाउंसमेंट है तलाक का, वह पुरुष ही देता है. महिला सब कुछ दे दे, तब भी तलाक-तलाक-तलाक का घोषणा पुरुष ही करता है. तो मैं समझती हूं कि इसके बिना बात अधूरी रहेगी. इसे न छोड़ा जाए. इस मांग में ये चीज जोड़ी जानी चाहिए कि औरत भी अगर तीन महीने का वक्त लेकर तीन बार तलाक कह दे तो उसे तलाक मान लिया जाना चाहिए.

औरत के खुला मांगने के मामले शायद ही कभी सुनने को मिलते हैं, क्योंकि उसमें वक्त बहुत लगता है. जब महिला को खुला लेना हो तो उसे एक से दूसरे मौलवी के पास जाना पड़ता है. कभी बरेलवी के पास, कभी दारुल उलूम के पास. वह मौलवी के पास जाती है तो वे हजारों वजहें पूछते हैं कि तुम क्यों खुला लेना चाहती हो. जबकि मर्द को कोई वजह नहीं देनी पड़ती. औरत वजह भी बताए तो उसे खारिज कर देते हैं कि ये वजह तो इस काबिल है ही नहीं कि तुम्हें खुला दिया जाए. इसमें आठ-साल दस साल लग जाते हैं.

मौलवी लोगों के फैसले ज्यादातर महिलाओं के खिलाफ इसलिए होते हैं क्योंकि वे मुख्य धर्मग्रंथ कुरान को मानते ही नहीं हैं. बुनियादी तौर पर यह लड़ाई तीन तलाक की लड़ाई नहीं है, यह कुरान शरीफ को आधार मानने की लड़ाई है. कुरान को मानने की जगह वह शरिया और क्या-क्या चलन है, ये सब बताया करते हैं. जैसे, जो निकाहनामा है उसमें ये लिखा होना चाहिए कि औरत भी अगर चाहे तो वह तलाक ले सकती है लेकिन उसे काट दिया जाता है. कहा जाता है कि निकाह के वक्त तलाक की बात करना अपशकुन है. वे असली कुरान कभी कोट ही नहीं करते.

मेरे पास जो भी है वह अल्लाह का दिया हुआ है. अगर अल्लाह की ये ख्वाहिश होती कि मैं इसे छिपाकर रखूं तो वे उसका कुछ न कुछ इंतजाम करते. मुझे सिर से अपना पूरा चेहरा ढककर रखने की क्यों जरूरत है? बुरके से ढकी हुई औरतें घर में भी कहां सुरक्षित हैं? वे कौन लोग हैं जो इस तरह के लिबास या रहन-सहन को ही इज्जत की नजर से देखते हैं?

औरत जात को बचपन से इतना डराया जाता है कि अगर वह शरीयत और मौलवी के खिलाफ जाती है तो ऐसा हो जाएगा, वैसा हो जाएगा. जबकि कुरान खुद सबसे पहले यह कहता है कि तुम खुद पढ़ो और समझो. लेकिन वहां तक बात पहुंचती ही नहीं है. मौलवियों ने व्याख्या करने की बात अपने हक में कर ली है. ईरान में एक बेचारी कुर्रतुल ऐन ने दावा किया था कि कुरान में लिखा है कि आखिरी नबी हजरत मुहम्मद होंगे लेकिन मैं तो नादिया (महिला नबी) हूं. उसके बारे में तो कुरान कोई बात कहता नहीं है इसलिए नादिया तो हो ही सकती है. लेकिन उस बेचारी को तो मार दिया गया.

अभी मैंने अपनी किताब ‘डिनाइड बाइ अल्लाह’ लिखी तो तलाक, हलाला, खुला, मुताह आदि पर सच्ची कहानियों के सहारे तमाम सारे सवाल उठाए कि कुरान क्या कहता है, शरीयत क्या कहती है, संविधान क्या कहता है और हो क्या रहा है, तो उस पर फतवा जारी हो गया कि ये तो मुसलमान हैं ही नहीं. इन्हें ये सब कहने का कोई हक नहीं है. हमारा तो कहना है कि हम मुसलमान हैं या नहीं हैं, लेकिन हमारे साथ जो हो रहा है उस पर हम क्यों टिप्पणी नहीं कर सकते. जब रूपकंवर को जलाया गया और उसे सती का नाम दिया गया, हम हर विरोध और हर जुलूस में शामिल थे. इस तरह अगर कोई हिंदू या ईसाई भी है तो वह क्यों नहीं बोल सकता?

तलाक तो एक अहम मुद्दा है कि जल्दबाजी में किसी ने तलाक दे दिया और उसे भी अलगाव मान लिया गया, लेकिन एक और मुद्दा जो इससे जुड़ा है, वो है हलाला. इसमें ये व्यवस्था है कि मर्द ने जल्दबाजी में तलाक दे दिया, अब वह पछता रहा है, अपना फैसला वापस लेना चाहता है तो वह ऐसा कर नहीं सकता. उस औरत की पहले किसी और से शादी हो और वह अमल में लाई जाए. फिर या तो उसका तलाक हो या वह मियां मर जाए, तब पहला शौहर उससे शादी कर सकता है. ये प्रथा बीते कुछ सालों में बहुत ज्यादा बढ़ गई है. एक बार तलाक हो गया और फिर मियां-बीवी चाहें तो भी उनके पास सूरत नहीं है, सिवाय एक प्रताड़ना भरी प्रक्रिया से गुजरने के. औरतों की वह प्रताड़ना जब बढ़ी है तो औरतें एक होकर आगे आ रही हैं. वे चाहती नहीं कि हड़बड़ी में तलाक हो जिसे सुधारने के लिए हलाला झेलना पड़ता है. ये बहुत शर्मनाक है कि अपने पति के पास ही वापस जाने के लिए एक रात किसी और मर्द के साथ रहें. इस पर बात होनी चाहिए. मुस्लिम महिलाओं की मानसिक बुनावट ऐसी है कि वे जल्दी आवाज नहीं उठातीं. अब सूरत ऐसी बन गई है कि पचास-साठ हजार पढ़ी-लिखी महिलाएं इकट्ठा होकर विरोध में आगे आ रही हैं.

दूसरी एक प्रथा है मुताह. वह एक तरह का फौरी विवाह है. उसके दिन तय होते हैं कि वह दस दिन, सौ दिन या कुछ निर्धारित दिन का हो सकता है. हालांकि, इसके ऐतिहासिक संदर्भ पर मुझे शक है लेकिन माना जाता है कि जब फौजें चलती थीं तो जहां फतह मिलती थी,  सैनिक वहां की औरतों से बलात्कार करते थे. अगर बच्चे हो जाते थे तो वे नाजायज कहे जाते थे. इसलिए फौरी विवाह का सिस्टम बनाया गया. इसमें जितने दिन का करार होगा, उसके बाद वह खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा. हाल में कई मामले ऐसे सामने आए हैं कि खाड़ी देशों से महीने-दो महीने के लिए मर्द वापस आते हैं तो उनको वक्त बिताने के लिए कोई चाहिए. जिम्मेदारी भी नहीं निभानी है. दूसरे उनको इस्लाम का भी डर है कि जन्नत मिलेगी कि नहीं मिलेगी. मजा भी करना है. तो वे यहां आकर इस तरह की फौरी शादियां करते हैं. इसमें तो एक बार कोई लड़की फंस गई तो उसकी शादी कभी नहीं होती. फिर उसे मुताही बोलते हैं. जैसे-जैसे उसकी जवानी ढलती है, उसके पैसे घटते जाते हैं. यहां तक होता है कि कई औरतों को सिर्फ खाने-कपड़े पर रखा जाता है, उनका यौन उत्पीड़न किया जाता है और  वे घर का काम भी करती हैं. यह एक तरह की कानूनी वेश्यावृत्ति है. इसमें मौलवी भी खबर रखते हैं कि किसके घर की लड़की सयानी हो गई है और किसके घर का लड़का लौटने वाला है. वे इसमें बिचौलिये की भूमिका निभाते हैं. अब ये सब मसले कभी नहीं उठते कि मुस्लिम समुदाय को भी इस पर बात करने में शर्म आती है. इसे सिर्फ महिलाएं झेलती हैं. 

तलाक के साथ एक अहम मुद्दा है हलाला. इसमें ये है कि मर्द ने जल्दबाजी में तलाक दे दिया, अब वह अपना फैसला वापस लेना चाहता है तो वह ऐसा कर नहीं सकता. उस औरत की पहले किसी और से शादी हो और वह अमल में लाई जाए. फिर या तो उसका तलाक हो या वह मियां मर जाए, तब पहला शौहर उससे शादी कर सकता है. ये बहुत शर्मनाक है

दूसरी बात ये है कि तलाक के अलावा जितनी रूढ़ियां हैं पर्दा वगैरह, इनको कभी तार्किक ढंग से चुनौती नहीं दी गई. आप सीधे-सीधे बहस में उतरिए, बातचीत कीजिए. मैं कहती हूं कि मेरे पास जो भी है वह अल्लाह का दिया हुआ है. अब उसको देखते हुए मेरा चेहरा तो अल्लाह ने दिया है. तो अगर अल्लाह की ये ख्वाहिश होती कि मैं इसे छिपा कर रखूं तो वे उसका कुछ न कुछ इंतजाम करते. मुझे सिर से अपना पूरा चेहरा ढंककर रखने की क्यों जरूरत है? ये सब बेकार की बातें हैं कि औरत घर में रहेगी तो सुरक्षित रहेगी, खुद को ढंककर रखेगी तो सुरक्षित रहेगी. बुरके से ढंकी हुई औरतें घर में भी कहां सुरक्षित हैं? हमारे समाज में मर्द कहता है कि तुम ऐसे रहो तो सुरक्षित हो. औरतों में आत्मविश्वास की कमी है, इसलिए वे भी मान लेती हैं कि हम इसी तरह सुरक्षित हैं. वे सोचती हैं कि जैसा कहा जा रहा है, वे वैसे ही रहेंगी तो उनको इज्जत की नजर से देखा जाएगा. वे कौन लोग हैं जो इस तरह के लिबास या रहन-सहन को ही इज्जत की नजर से देखते हैं? उनकी सोच और उनकी मानसिक बनावट पर कभी बात नहीं होती जो कहते हैं कि उसका मुंह खुला था, पहुंचा ऊंचा था या बाजू खुली थी, इसलिए उसे छेड़ा गया.

दो बातें मुसलमान औरतों के पक्ष में जाती हैं. वे बाकी समुदायों की औरतों के बराबर में रह रही हैं. आज उसके पास सब अधिकार हैं. संविधान हमें बराबरी देता है. जो हक हिंदू औरत को है, वही हक मुसलमान औरत को भी है और उसे यह मिलना चाहिए. हम अपनी लड़ाई इस्लाम के नजरिये से न लड़कर इस्लाम और संविधान दोनों के मद्देनजर लड़ेंगे. और संविधान कहीं भी कुरान के आड़े नहीं आ रहा है. वह कहीं से भी खतरे में नहीं आ रहा है.

आंबेडकर से किसी ने पूछा था कि पर्सनल लॉ का अलग से प्रावधान क्यों रखा गया है, क्या सभी के लिए एक-समान कानून अच्छा नहीं होगा? उसके जवाब में उन्होंने एक लेख लिखा जिसमें कहा कि समान नागरिक संहिता इतनी बेहतरीन चीज है कि समुदाय भी कुछ समय बाद इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि हमें समान नागरिक संहिता को अपनाना चाहिए, न कि पर्सनल लॉ को अपनाना चाहिए. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, अब वजह जो भी रही हो. कम से कम मुसलमानों में तो बिल्कुल नहीं हुआ. अब काफी सारी चीजें आज के दौर में देखते हैं कि काफी कुछ बदलाव शुरू हो गया था. उसे तगड़ा झटका लगा 1986 में, जब शाहबानो के केस को पलट दिया गया. उससे हम लोगों को बहुत नुकसान हुआ.

दो चीजें एक साथ हुईं. इधर शाहबानो के केस को पलट दिया गया. उधर पाकिस्तानी तानाशाह जियाउल हक ने 1981-82 में हुदूद कानून लागू किया. उसके तहत बहुत सारी ऐसी चीजें पाकिस्तान में हुईं जो औरतों के खिलाफ गईं. इससे यहां के मौलवियों को यह कहने का मौका मिला कि देखो पाकिस्तान में शरीयत मान ली गई है और तुम लोग नहीं मान रहे हो. शाहबानो का केस उसी का नतीजा था. जबकि आप नंदिता हक्सर की किताब पढ़िए तो सारी मुसलमान औरतें शाहबानो के पक्ष में खड़ी थीं कि उसे उसका हक मिलना चाहिए.

देखिए, धर्मगुरु किसी भी धर्म का हो, वह मौका लपकने की फिराक में रहता है. शाहबानो के समय का मौका भी मौलवियों ने लपक लिया. उस समय के मंत्री थे जेडआर अंसारी. उन्होंने धमकी दी कि मैं संसद के सामने आग लगा लूंगा तो सारे मर्द घबरा गए कि नहीं-नहीं, कुछ भी हो जाए लेकिन मर्द किसी कम्युनिटी का नहीं जलना चाहिए. औरतें दहेज के लिए या दूसरी वजहों से जलाई जाएं तो जलें. लेकिन मर्द नहीं जलना चाहिए. मौलवी लोग कहते हैं कि मुसलमान के मसले पर सिर्फ मुसलमान बोलें. शाहबानो के केस को कोर्ट में जस्टिस चंद्रचूड़ हेड कर रहे थे. वे जज हैं, इस्लामिक लॉ पर डिग्री है, लेकिन आप कहेंगे कि नहीं, वे हिंदू हैं इसलिए वे अथॉरिटी नहीं हैं. इससे काम नहीं चलेगा. बात-बहस से कोई रास्ता निकलेगा.

(बातचीत पर आधारित)

तीन तलाक विवाद : नाइंसाफी नाकुबूल

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पिछले साल अक्टूबर में उत्तराखंड के देहरादून की 35 साल की एक शायरा बानो की दुनिया उजड़ गई. उनके पति इलाहाबाद में रहते हैं. वे उत्तराखंड में अपने माता-पिता के घर इलाज के लिए गई थीं, तब उन्हें पति का तलाकनामा मिला, जिसमें लिखा था कि वे उनसे तलाक ले रहे हैं. अपने पति से मिलने की उनकी कोशिश नाकाम रही थी. तहलका से बातचीत में उन्होंने बताया, ‘तलाक भेजने के बाद रिज़वान ने अपना फोन बंद कर रखा था. मेरे पास उनसे संपर्क करने का कोई रास्ता नहीं था. मैं अपने बच्चों को लेकर चिंतित हूं. उनकी जिंदगी बर्बाद हो गई है. कोई भी हमारी मदद के लिए नहीं आया.’

शायरा बानो को उनके शौहर ने एक पत्र के जरिए सूचित किया कि उसने उन्हें तलाक दे दिया है. यह पत्र 10 अक्टूबर, 2015 को लिखा गया था. उन्हें उनके पति ने फोन पर बताया कि कुछ जरूरी कागज भेज रहा हूं. मगर जब शायरा ने इन कागजात को खोलकर देखा तो यह तलाकनामा था. इस दो पन्ने के पत्र में कई बातों के अलावा यह साफ-साफ लिखा था, ‘शरीयत की रोशनी में यह कहते हुए कि मैं तुम्हें तलाक देता हूं, तुम्हें तलाक देता हूं, तुम्हें तलाक देता हूं, इस तरह तिहरा तलाक देते हुए मैं मुकिर आपको अपनी जैजियत से खारिज करता हूं. आज से आप और मेरे दरमियान बीवी और शौहर का रिश्ता खत्म. आज के बाद आप मेरे लिए हराम और मैं आपके लिए नामहरम हो चुका हूं.’

इन सबसे निराश शायरा बानो ने फरवरी में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. इसमें उन्होंने तीन बार तलाक बोलकर तलाक देने की प्रक्रिया पर पूरी तरह से रोक लगाने की मांग की. उनका कहना है, ‘जब निकाह के वक्त शौहर और बीवी दोनों की रजामंदी की जरूरत होती है तो फिर तलाक के वक्त क्यों नहीं? मौजूदा हलाला की व्यवस्था औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ है, बहुविवाह के जरिए यह बताया जाता है कि मर्द के लिए औरत कितनी मामूली-सी चीज है.’ सुप्रीम कोर्ट में 23 फरवरी, 2016 को दायर याचिका में शायरा ने गुहार लगाई है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी)  के तहत दिए जाने वाले तलाक-ए-बिद्दत यानी तिहरे तलाक, हलाला और बहुविवाह को गैर-कानूनी और असंवैधानिक घोषित किया जाए. गौरतलब है कि शरीयत कानून में तिहरे तलाक को मान्यता दी गई है. इसमें एक ही बार में शौहर अपनी पत्नी को तलाक-तलाक-तलाक कहकर तलाक दे देता है. 

कुछ ऐसा ही किस्सा 28 साल की रहमान आफरीन के साथ हुआ. आफरीन उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली हैं. बचपन में ही आफरीन के अब्बू का इंतकाल हो चुका था. उनके बड़े भाई की भी मौत हो चुकी है. पढ़ने में हमेशा अव्वल रहने वाली आफरीन ने एमबीए करने के बाद एक वैवाहिक वेबसाइट के जरिए इंदौर के एडवोकेट से निकाह किया था. शादी के एक साल बाद ही उनकी अम्मी का भी इंतकाल हो गया. इसके बाद काशीपुर में उनका घर छूट गया. घर में किसी के न होने की वजह से जयपुर स्थित मामा का घर ही उनका मायका बन गया. मां की मौत के बाद जयपुर अपने मायके आईं आफरीन के पैरों तले जमीन तब खिसक गई जब उन्हें शौहर का भेजा हुआ स्पीड पोस्ट मिला. उसमें लिखा था कि मैं तुम्हें तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कहता हूं क्योंकि तुम मेरे घरवालों से ज्यादा खुद के घरवालों का ख्याल रखती हो और मुझे शौहर होने का सुख नहीं देती. अब आफरीन ने स्पीड पोस्ट से तीन बार तलाक लिखकर तलाक देने के पति के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई है.

आफरीन का आरोप है कि शादी के बाद से ही उनको दहेज के लिए ताने दिए जाते थे जो बाद में मारपीट में बदल गया. आफरीन की शादी 24 अगस्त 2014 को इंदौर के सैयद असार अली वारसी से हुई थी. 17 जनवरी, 2016 को शौहर ने स्पीड पोस्ट से तीन बार तलाक लिखकर भेज दिया. शायरा बानो के बाद आफरीन देश की दूसरी मुस्लिम महिला हैं जो इस तरह तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार, महिला आयोग समेत सभी पक्षों को इस मामले में नोटिस भेजकर जवाब मांगा है.

‘जब निकाह के वक्त शौहर और बीवी दोनों की रजामंदी की जरूरत होती है तो फिर तलाक के वक्त क्यों नहीं? मौजूदा हलाला की व्यवस्था औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ है’

उत्तराखंड की शायरा बानो और जयपुर की आफरीन का यह किस्सा केवल उनका नहीं बल्कि न जाने कितनी और उन मुस्लिम औरतों का दर्द बयां करता है जो तिहरे तलाक या हलाला का सामना कर चुकी हैं. तमिलनाडु के त्रिची की रहने वाली मरियम को उनके शौहर ने वॉट्सऐप के जरिए तलाक दे दिया. शरीयत में मर्द को दिए जुबानी तिहरे तलाक को आधार बनाकर इसे मंजूरी भी मिल गई. मरियम को न तो मेहर की रकम मिली और न ही किसी तरह का हर्जाना मिला. जबकि उनके निकाह में मेहर की रकम सिर्फ एक हजार रुपये थी. उनकी उम्र 29 साल है.

ऐसा ही कुछ तमिलनाडु के डिंडीगुल की एक मुस्लिम औरत फौजिया (बदला हुआ नाम) के साथ हुआ जिन्हें काजी के जरिए तलाकनामा भेज दिया गया. मेहर की करीब 550 रुपये की मामूली रकम भी उन्हें नहीं दी गई. किसी अन्य हर्जाने का तो जिक्र भी नहीं हुआ. मध्य प्रदेश के भोपाल जिले की 20 साल की शाइस्ता को भी जुबानी तलाक दे दिया गया. उन्हें भी मेहर की रकम और मेंटीनेंस नहीं मिला. गौर करने वाली बात यह है कि उनके पति खुद काजी थे. महाराष्ट्र की आर. अंसारी को भी एक दिन अचानक तलाक-तलाक-तलाक कहकर मेहर की 786 रुपये की मामूली रकम देकर उनके पति ने छोड़ दिया. तीन तलाक के दुरुपयोग के ये कुछ नमूने भर हैं. सूची और कहानी बहुत लंबी है. 

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व्यथा कथा : 1

‘जुबानी और एकतरफा तलाक जाहिलियत है जिस पर मौलाना-मौलवी भी मुहर लगाते हैं’

शारिब, रामपुर, उत्तर प्रदेश 

­­मैं दिल्ली में सरकारी नौकरी करता हूं. हम एक पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं. छोटा भाई भी इंजीनियर है और बहन फातिमा भी एमए, बीएड है और एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी. 2013 में फातिमा के लिए गांव के ही एक परिवार से रिश्ता आया. याकूब नाम का ये लड़का नोएडा में काम करता था. उसके पिता भी सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे. हमें परिवार पढ़ा-लिखा लगा तो हमने भी रिश्ता पक्का कर दिया. हम सभी शिक्षित थे तो दहेज या लेन-देन की कोई बात नहीं हुई. पर मंगनी चढ़ाने पर जोर देने से उनका लालच दिखने लग गया. उन्होंने दबे स्वर में कुछ मांग भी की पर हमने उस पर गौर करना जरूरी नहीं समझा. हम दहेज के पक्षधर नहीं हैं पर फिर भी हमने अपने सामर्थ्य के अनुसार घर का सारा सामान फातिमा को शादी में दिया. पर बाद में पता चला कि वो दहेज में कार चाहते थे. हम सब ठीक-ठाक ही कमाते हैं, पर शादी में 8-10 लाख रुपये का खर्च हुआ था, जिसके बाद हम कार नहीं अफोर्ड कर सकते थे. बहरहाल, फातिमा ससुराल पहुंची. याकूब नोएडा में ही रहता था और सिर्फ वीकेंड पर घर आया करता था. उसकी गैरमौजूदगी में फातिमा को उसकी सास और ननद परेशान किया करती थीं. दहेज के लिए बातें सुनाई जाती थीं. याकूब को उसके खिलाफ भड़काती थीं जिसके बाद वो फातिमा से झगड़ा करता था. हमने फातिमा को समझाया कि अभी रिश्ता नया है, कुछ समय दो. पर ऐसा चलता रहा. बहस से बात गाली-गलौज तक पहुंची और फिर शारीरिक हिंसा शुरू हुई. याकूब फातिमा से मारपीट करता था. इस बीच फातिमा को बेटा भी हो गया. वो कई बार गुस्सा होकर मायके आ जाती और फिर खुद ही चली जाती. याकूब कभी उसकी नाराजगी देखकर भी उसे मनाकर ले जाने नहीं आया. इस बीच अच्छी बात बस यही थी कि फातिमा ने नौकरी नहीं छोड़ी और अपने और बच्चे का खर्च खुद उठाती रही. पर फिर याकूब ने उसके स्कूल में जाकर भी उसे परेशान किया. इज्जत की परवाह के चलते फातिमा को नौकरी छोड़नी पड़ी. इनसे परेशान होकर हम सब घरवालों और बिरादरी के लोगों ने साथ बैठकर ये हल निकाला कि याकूब फातिमा को अपने साथ नोएडा ले जाए, हो सकता है कि साथ रहने से वो एक-दूसरे को समझने लगें.

इस बीच फातिमा कई बार इन लोगों की गाली-गलौज और बदतमीजी को अपने फोन में रिकॉर्ड कर लिया करती थी तो उन लोगों ने फातिमा का फोन भी छीन लिया. सामने वे दिखा रहे थे कि फातिमा को याकूब के साथ नोएडा रहने भेजेंगे पर पीछे से उन्होंने झूठे आरोप लगाकर फातिमा के खिलाफ महिला थाने में शिकायत दर्ज करवा दी कि ये घर अपने नाम करवाने के लिए षड्यंत्र कर रही है. पर थाने में भी लोग समझते हैं कि कौन किसे प्रताड़ित करता है तो उन्होंने याकूब के घरवालों को ही धमकाया और एसपी ऑफिस में समाधान केंद्र पर जाने को कहा. वहां समाधान दिवस पर एक सीओ लेवल अफसर बैठता है, जो दोनों पक्षों में सुलह करवाता है. ये सितंबर 2015 की बात है जब ये लोग वहां गए. पर वहां अधिकारी ने लड़के वालों को ही समझाया, जिस बौखलाहट में याकूब का परिवार बीच से ही वहां से चला आया और आकर घर पर ताला लगा दिया. उनके पड़ोसियों से हमें पता चला कि याकूब फातिमा के घर आने का इंतजार कर रहा है और मोहल्ले वालों के सामने उसे जलील करके तलाक देने की सोच रहा है. ये जानकर हमने फातिमा को वहां नहीं भेजा और उसे घर ले आए. कुछ दिनों बाद फातिमा के नाम से एक चिट्ठी घर पहुंची, ये याकूब की तरफ से थी. हम समझ गए कि उसने तलाक भेजा है पर हमने ये डाक रिसीव नहीं की. इस बीच हमने याकूब पर दहेज प्रताड़ना के लिए धारा 498 के तहत नोएडा में शिकायत भी दर्ज करवा दी, जिसमें उसे हिरासत में लिया गया. बाद में वो जमानत पर बाहर आ गया. फातिमा तब से अपने बेटे के साथ मायके में ही रह रही हैं. हमने इस एकतरफा तलाक को नहीं माना है. हमने इस मामले को कड़कड़डूमा कोर्ट में दायर किया है. वहीं मैंने सुप्रीम कोर्ट में जुबानी और एकतरफा तलाक, बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं को खत्म करने के लिए याचिका दायर की. इस तरह औरतों की बेइज्जती पर रोक लगनी चाहिए. ऐसा बताया जाता है जैसे मर्द कुदरत का कोई बेजोड़ नमूना है और औरत कोई दोयम दर्जे की चीज. मर्द उससे खिलौने की तरह खेलकर नहीं छोड़ सकता. औरतों के साथ ऐसा व्यवहार बंद होना चाहिए. ये जाहिलियत है जिस पर मौलाना-मौलवी भी मुहर लगाते हैं.

(सभी नाम परिवर्तित)[/symple_box]

भारत में लगभग 18 करोड़ मुसलमान रहते हैं. उनकी शादी और तलाक के मामले मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक तय होते हैं, जो जाहिर तौर पर शरिया कानून पर आधारित होते हैं. शायरा बानो ने अपनी याचिका में केवल तिहरे तलाक नहीं बल्कि हलाला और बहुविवाह जैसी व्यवस्था को भी चुनौती दी है. शरीयत कानून में हलाला एक तरह से तीन तलाक देने के बाद शौहर के लिए हराम हो चुकी उसी बीवी को दोबारा हासिल करने का तरीका है. यानी तीन तलाक देने के बाद अगर फिर शौहर का मन करे कि वह अपनी बीवी को वापस अपने साथ रखे तो पहले उस औरत का निकाह किसी दूसरे मर्द से करवाया जाता है. एक रात गुजारने के बाद औरत का दूसरा शौहर उसे तलाक दे देता है और फिर वह औरत अपने पहले शौहर के साथ निकाह कर लेती है. इस पूरी प्रक्रिया को हलाला कहते हैं.

इसके अलावा शरीयत कानून मुस्लिम पुरुष को चार निकाह की इजाजत देता है. हालांकि इसमें पति को अपनी पहली पत्नी से दूसरे निकाह की अनुमति लेनी होती है. शायरा बानो ने भारतीय संविधान में नागरिकों को दिए गए मूलभूत अधिकारों अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (धर्म, जाति, लिंग के आधार पर किसी नागरिक से कोई भेदभाव न किया जाए) और अनुच्छेद 21 (जीवन और निजता के संरक्षण का अधिकार) और अनुच्छेद 25 को आधार बनाते हुए कहा है कि भारतीय नागरिक होने के नाते मुस्लिम महिलाओं को भी ये अधिकार मिले हैं लेकिन उनके इन अधिकारों का हनन लगातार हो रहा है. लोकतांत्रिक देश में रहते हुए भी मुस्लिम महिलाएं दुर्व्यवहार और लैंगिक गैरबराबरी का सामना कर रही हैं.

ओडिशा की नगमा को उनके पति ने नशे में तलाक दे दिया. सुबह होश आया कि उसने गलती कर दी है. मगर धार्मिक गुरुओं ने उन्हें साथ रहने की इजाजत नहीं दी

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में शायरा के वकील बालाजी श्रीनिवासन का कहना है, ‘इस याचिका में शरीयत के दकियानूसी कानूनों को चुनौती दी गई है. इसलिए हंगामा हो रहा है. हमने याचिका में कुछ ठोस कानूनी मामलों का जिक्र किया है जिससे यह साबित होता है कि तिहरा तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह किस तरह से मुस्लिम औरतों को गुलाम बनाए रखने के तरीके हैं. साथ ही इस तरह के मामलों में आए कुछ मिसाल बने फैसलों का भी जिक्र किया है जो शायरा के केस में मददगार साबित हो सकते हैं. कुछ ऐसे विशेषज्ञों की टिप्पणियों और चर्चित सर्वे को भी दर्ज किया है जो इस ओर इशारा करते हैं कि इस तरह की प्रथाएं मुस्लिम औरतों पर एक तरह से हिंसा करने का एक जरिया बनी हुई हैं.’

गौरतलब है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में बहुविवाह को एक कुरीति माना गया है. हालांकि यहां यह सिर्फ मुसलमानों के लिए कानूनन जायज है. दुर्भाग्य से इक्कीसवीं सदी में भी ऐसी प्रथा को कानूनी मान्यता मिली हुई है जिससे मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, शारीरिक और भावनात्मक खतरा होता है. इमाम और मौलवी अपने पद का दुरुपयोग करके तलाक-ए-बिद्दत, हलाला और बहुविवाह जैसी प्रथाओं को न सिर्फ समर्थन देते हैं बल्कि फैलाते भी हैं.

ऐसे मामले में अगर हम बाकी समुदायों की चर्चा करें तो सरला मुद्गल बनाम केंद्र सरकार मामले में यह बात प्रकाश में आई कि ईसाइयों में दो विवाह को क्रििश्चयन मैरिज ऐक्ट 1872 के तहत दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया था, पारसियों में पारसी मैरिज ऐंड डिवोर्स ऐक्ट 1936 के तहत और हिंदू, बौद्ध, सिख व जैन धर्म में हिंदू मैरिज ऐक्ट 1955 के तहत इसे दंडनीय अपराध घोषित किया गया लेकिन मुस्लिमों में इस कुप्रथा को खत्म नहीं किया गया. इसके चलते भारत में दूसरे धर्म की महिलाओं के मूलाधिकार तो सुरक्षित किए गए मगर भारतीय मुस्लिम औरतें इस कुप्रथा को आज तक झेलने को मजबूर हैं.

इसके अलावा भारत सरकार की एक उच्चस्तरीय कमेटी ने वर्ष 2015 में इस मामले पर अपनी रिपोर्ट पेश की थी. इस रिपोर्ट का शीर्षक ‘वूमेन ऐंड द लॉ- एन असेसमेंट ऑफ फैमिलीज लॉ विद फोकस ऑन लॉ रिलेटिंग टू मैरिज, डिवोर्स, कस्टडी इनहैरिटेंस ऐंड सक्सेशन’ था. इस रिपोर्ट में मुस्लिम महिलाओं की बदहाल स्थिति का हवाला देते हुए तिहरे तलाक और बहुविवाह पर रोक लगाने की बात कही गई थी.

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व्यथा कथा : 2

‘मैं कोर्ट से सिर्फ  गुजारा-भत्ता नहीं बल्कि इस्लाम के मर्दवादी कानूनों में बदलाव चाहती हूं’

शायरा बानो, काशीपुर, उत्तराखंड

रिज़वान और शायरा के निकाह की तस्वीर
रिज़वान और शायरा के निकाह की तस्वीर

हम काशीपुर के साधारण परिवार से ताल्लुक रखते हैं. 2002 में मेरी शादी इलाहाबाद के रिज़वान से हुई, जो प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करते थे. पापा ने गहने, घर का सामान वगैरह मिलाकर लगभग तीन-चार लाख रुपये का दहेज दिया था. मेहर, जो कहा जाता है कि लड़की और उसके घरवालों की रजामंदी से तय होती है, उसे बिना हमसे पूछे तय कर दिया गया. बहरहाल, मैं ससुराल पहुंची पर निकाह के बाद से ही कम दहेज लाने को लेकर तानाकशी शुरू हो गई. घर में मेरी जेठानी भी थीं, जिन्हें भी कम दहेज के लिए परेशान किया जाता था पर क्योंकि वो मेरी सास की रिश्तेदार की बेटी थीं तो उन्हें कम परेशान किया जाता था. जैसे-तैसे दिन कट रहे थे. फिर परिवार में हुए एक घरेलू झगड़े के बाद रिज़वान मुझे लेकर अलग रहने लगे. इस दौरान मेरे दो बच्चे, एक बेटा और बेटी ही हो चुके थे. अलग रहने के बाद तो घर में झगड़े बढ़ते ही चले गए. वो बात-बेबात मुझ पर हाथ उठाते. इस बीच मुझे करीब 6-7 बार गर्भ ठहरा, पर उन्होंने गर्भपात करा दिया. और इसके लिए हम किसी डॉक्टर के यहां नहीं गए. रिज़वान कोई गोली लाकर खिला देते थे. इसके बाद से मेरी सेहत लगातार गिरने लगी और रिज़वान का मुझ पर गुस्सा बढ़ता गया. मेरी खराब सेहत का जिम्मेदार वो मुझे ही बताते, मुझे जरा-सी बात पर भी मारते-पीटते. बात ही बात में मुझे छोड़ने की धमकी देते. मैं भी हर मुस्लिम औरत की तरह तलाक की तलवार के साये में डर-डरकर जीती थी. मैंने आस-पास के कई घर ऐसे ही टूटते देखे थे. मायके वालों को भी इसी डर से ये सब नहीं बताया कि पता चलने पर न जाने रिज़वान क्या करें. मैं इसे अल्लाह की मर्जी समझ कर सब कुछ सहती रही. फिर हमारे समाज में किसी तलाकशुदा औरत को कैसे देखा जाता है, इससे हम सब वाकिफ हैं.

अप्रैल 2015 में उन्होंने मुझे इलाज करने के लिए मायके ले जाने को कहा पर फिर काशीपुर से पहले मुरादाबाद स्टेशन पर ही हमें छोड़कर चले गए. वहां से पापा हमें घर ले आए. फिर कुछ दिनों तक तो उनसे फोन पर बात हुई पर फिर उन्होंने फोन उठाना बंद कर दिया. कभी उठाते भी तो झिड़कते रहते. बच्चों के स्कूल शुरू होने थे सो पापा उन्हें इलाहाबाद छोड़ आए. मेरा इलाज उस वक्त तक चल ही रहा था तो मैं यहीं रह गई. बच्चों के वहां पहुंच जाने के बाद तो रिज़वान ने कोई खैर-खबर लेना, फोन उठाना सब ही छोड़ दिया. और फिर अक्टूबर में मेरे नाम से एक चिट्ठी घर पहुंची. जिस डर में मैं शादी के इतने साल घुट-घुटकर जीती रही थी, वही हुआ. रिज़वान ने डाक से तलाकनामा भिजवाया था. मेरी इतने सालों की चुप्पी भी हमारे रिश्ते को नहीं बचा पाई. मैं बुरी तरह टूट गई.

फिर भाई और पापा ने हिम्मत बंधाई और मैंने इंसाफ और मुस्लिम औरतों की इज्जत के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की ठानी. कैसी अजीब दुनिया है, कैसे अजीब नजरिये…औरत न हो गई पांव की जूती हो गई, जब तक काम दिया तो ठीक, फिर निकालकर फेंक दिया. मैं एमए तक पढ़ी हूं. मैं नौकरी भी करना चाहती थी पर रिज़वान को घर की औरतों का बाहर जाकर नौकरी करना गवारा नहीं था. सोचती हूं अगर अपने पैरों पर खड़ी होती तो शायद ये विरोध पहले कर पाती. जिंदगी के इतने साल किसी गुलाम की  तरह निकाल दिए. रिज़वान ने तलाक के बाद मेहर के 15 हजार रुपये भी भिजवाए पर क्या डर और दर्द में बीते मेरे उन 13 सालों की कोई कीमत लगाई जा सकती है?

वैसे इस तलाक ने मुझे उस डर से आजाद कर दिया है. मैं खुद पर हुए जुल्मों के खिलाफ लड़ने के लिए आजाद हूं. मैं कोर्ट से सिर्फ अपने बच्चे, अपना दहेज या गुजारा-भत्ता नहीं चाहती बल्कि इस्लाम के मर्दवादी कानूनों में भी बदलाव चाहती हूं. ये कैसा कानून है जहां निकाह औरत-मर्द दोनों की हामी से होगा पर तलाक सिर्फ शौहर की मर्जी से? शौहर तलाक भी दे फिर शरीयत की दुहाई देकर हलाला के लिए भी कहे. क्या ये औरतों की बेइज्जती नहीं है? कानून एकतरफा क्यों है? पर्सनल लॉ बोर्ड के लोग खुद को हमारा रहनुमा बताते हैं पर औरतों के हक के लिए कभी सामने नहीं आते. वहां की कुछ महिला मेंबरान ने तीन तलाक को जायज ठहराया है. मैं उनसे बस यही कहना चाहूंगी कि दूसरे के बारे में ऐसा बोलना आसान है, खुद पर गुजरे तब ही इस दर्द का एहसास होता है. मैं बस चाहती हूं कि मुस्लिम औरतों को भी इज्जत और बराबरी से जीने का हक दिया जाए.[/symple_box]

भारत में तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत का इस्तेमाल बहुत ही खतरनाक तरीके से हो रहा है. तकनीक के विकास के साथ-साथ यह भी हो गया कि मुस्लिम पति फोन, ईमेल या पत्र के जरिए भी अपनी पत्नियों को तलाक देने लगे हैं. इस संदर्भ में ओडिशा में नगमा बीवी का मामला चर्चित हुआ था. नगमा को उनके शौहर ने नशे की हालत में तलाक दे दिया था. सुबह उसे होश आया कि उसने गलती कर दी है. मगर मुस्लिम धार्मिक गुरुओं ने उन दोनों को साथ रहने की इजाजत नहीं दी. औरत को निकाह हलाला के लिए भेज दिया गया था. वैसे भी मुस्लिम पुरुष तलाक के बाद सिर्फ तीन महीने तक अपनी तलाकशुदा पत्नियों को गुजारा भत्ता देते हैं. उसके बाद वह भी बंद हो जाता है. शाहबानो ने इस गुजारा भत्ते के लिए ही केस लड़ा था जिसमें सुप्रीम कोर्ट में उनकी जीत हो गई थी. लेकिन मुस्लिम समुदाय के एक तबके के जबर्दस्त विरोध के सामने राजीव गांधी सरकार ने घुटने टेक दिए और द मुस्लिम वूमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स ) ऐक्ट, 1986 लाकर कानून ही बदल डाला.

इस तरह के मामलों को लेकर नवंबर, 2015 में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) नाम की संस्था ने एक सर्वे जारी किया. सर्वे में देश के दस राज्यों की तलाकशुदा करीब पांच हजार औरतों से बात की गई. सर्वे में तलाक के तरीके, उनके साथ हुई शारीरिक-मानसिक हिंसा, मेहर की रकम, निकाहनामा, बहुविवाह जैसे कई मुद्दों पर खुलकर बात हुई. जो नतीजे आए, वे बेहद चौंकाने वाले थे. रिपोर्ट में कहा गया कि 92.1 प्रतिशत महिलाओं ने जुबानी या एकतरफा तलाक को गैरकानूनी घोषित करने की मांग की. वहीं 91.7 फीसदी महिलाएं बहुविवाह के खिलाफ हैं. 83.3 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए मुस्लिम फैमिली लॉ में सुधार करने की जरूरत है.

तीन तलाक को लेकर शायरा बानो के सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद देश में भी तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म करने की आवाज तेज होने लगी है. इसके खिलाफ एक ऑनलाइन याचिका पर करीब 50,000 मुस्लिम महिलाओं ने हस्ताक्षर किए हैं. हस्ताक्षर करने वाले लोगों में बड़ी संख्या में मुस्लिम पुरुष भी शामिल थे. याचिकाकर्ता बीएमएमए चाहता है कि राष्ट्रीय महिला आयोग इसमें हस्तक्षेप करे. बीएमएमए ने महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम को लिखे पत्र में कहा कि उसने अपने अभियान के पक्ष में 50,000 से अधिक हस्ताक्षर लिए हैं. हमने यह पाया है कि महिलाएं जुबानी-एकतरफा तलाक की व्यवस्था पर पाबंदी चाहती हैं. ‘सीकिंग जस्टिस विदिन फैमिली’ नामक हमारे अध्ययन में पाया गया कि 92 फीसदी मुस्लिम महिलाएं तलाक की इस व्यवस्था पर पाबंदी चाहती हैं. इस मामले में ललिता कुमारमंगलम का कहना है कि आयोग सुप्रीम कोर्ट में शायरा बानो के मुकदमे का समर्थन करेगा. उनका कहना है, ‘राष्ट्रीय महिला आयोग पहले से ही इस मुकदमे का हिस्सा है. हम इस महीने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करेंगे. इस मांग का 200 फीसदी समर्थन करते हैं. जो भी बन पड़ेगा, हम करेंगे.’

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बीएमएमए ने इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी खत लिखा है. अपने खत में बीएमएमए ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए या तो शरीयत एप्लीकेशन लॉ, 1937 और मुस्लिम मैरिज ऐक्ट, 1939 में संशोधन किए जाए या फिर मुस्लिम पर्सनल कानूनों का एक नया स्वरूप लाया जाए. बीएमएमए ने मुस्लिम महिलाओं, वकीलों, धर्म के जानकारों से बातचीत और कुरान के सिद्धांतों के आधार पर मुस्लिम फैमिली लॉ का एक ड्राफ्ट तैयार किया है. इसमें कहा गया है कि निकाह के लिए लड़के और लड़की की आयु 21 और 18 वर्ष तय हो, मेहर की रकम लड़के की वार्षिक आय के बराबर हो, जुबानी तलाक खत्म हो, तलाक देने के लिए तीन महीने का समय तय हो यानी एक बार में तीन तलाक देना बंद हो, तलाक एकतरफा न हो, तलाक के बाद जरूरी तौर पर शौहर बीवी के भरण पोषण की जिम्मेदारी ले, हलाला व बहुविवाह को गैर-कानूनी घोषित किया जाए और तलाक के बाद गुजारा भत्ता मुस्लिम वूमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स ऐक्ट, 1986 के अनुसार दिया जाए.

भारतीय अदालतों ने भी तीन तलाक को खत्म करने की दिशा में कुछ अहम फैसले सुनाए हैं. 2008 के एक मामले में फैसला देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के एक जज बदर दुरेज अहमद ने कहा था कि भारत में तीन तलाक को एक तलाक (जो वापस लिया जा सकता है) समझा जाना चाहिए. इसी तरह से गुवाहाटी हाई कोर्ट ने जियाउद्दीन बनाम अनवरा बेगम मामले में कहा था कि तलाक के लिए पर्याप्त आधार होने चाहिए और सुलह की कोशिशों के बाद ही तलाक होना चाहिए. इस साल मई में सेना के एक जवान की ओर से पत्नी को बोले गए ‘तीन तलाक’ को कोर्ट ने खारिज कर दिया. मिलिट्री ट्रिब्यूनल ने कहा कि कोई भी व्यक्ति पर्सनल लॉ की आड़ में देश के संविधान के खिलाफ नहीं जा सकता है, जो सभी धर्म की महिलाओं के हक की सुरक्षा की बात करता है.

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आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल की लखनऊ बेंच ने कहा कि पर्सनल लॉ या भारत का संविधान भी किसी भी पति को यह हक नहीं देता कि वह अपनी बीवी को जुबानी, नोटिस भेजकर या मनमानी तरीके से बिना उसकी अनुमति के तलाक दे दे. बेंच ने कहा कि शादी महिला और पुरुष की स्वीकृति पर आधारित होती है. जब तक दो लोग सहमत नहीं होते हैं, तब तक कोई निकाह नहीं हो सकता. शादी एक तरह का कॉन्ट्रैक्ट है, जिसे एकतरफा तौर पर खत्म नहीं किया जा सकता.

वैसे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) तीन तलाक की प्रथा में किसी भी फेरबदल के खिलाफ अब भी अड़ा हुआ है. भारत में शरई कानूनों की हिफाजत के लिए बोर्ड ने लड़ाई का ऐलान किया है. पांच जून, 2016 को लखनऊ के मशहूर मदरसे नदवातुल उलूम में हुई बोर्ड की बैठक में हैदराबाद के सांसद मौलाना असदुद्दीन औवेसी भी शामिल हुए. बोर्ड ने एक साथ तीन तलाक को शरई एतबार से जायज करार दिया है. इसके अलावा तलाक, गुजारा भत्ता, चार शादियां आदि मामले में शरीयत कानून के खिलाफ आ रहे अदालती फैसलों को बोर्ड ने पर्सनल लॉ में दखलअंदाजी माना है. इस दौरान बोर्ड ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करके कहा कि इस मामले में प्रधानमंत्री से भी संपर्क करके कहा जाएगा कि शरई मामलों में दखल देने की कोशिशों पर विराम लगाया जाए. साथ ही बोर्ड ने भारत में शरई अदालतों (दारुल कजा) की तादाद में इजाफे का भी फैसला किया है. बोर्ड ने कहा कि यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि मुस्लिम औरतों की स्थिति ठीक नहीं है, जबकि वास्तविकता इसके एकदम उलट है. गौरतलब है कि शायरा बानो द्वारा दायर की गई याचिका में एआईएमपीएलबी भी पक्षकार है.

पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत तकरीबन 22 मुस्लिम देशों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तीन तलाक की प्रथा खत्म कर दी है. इस सूची में तुर्की और साइप्रस भी शामिल हैं

हालांकि इस मसले पर दुनिया जिस तरफ आगे बढ़ रही है, एआईएमपीएलबी का रुख उसके बिल्कुल उलट है. जानने वाली बात यह है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत तकरीबन 22 मुस्लिम देशों ने अपने यहां सीधे-सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से तीन बार तलाक की प्रथा खत्म कर दी है. इस सूची में तुर्की और साइप्रस भी शामिल हैं जिन्होंने धर्मनिरपेक्ष पारिवारिक कानूनों को अपना लिया है. ट्यूनीशिया, अल्जीरिया और मलेशिया के सारावाक प्रांत में कानून के बाहर किसी तलाक को मान्यता नहीं है. ईरान में शिया कानूनों के तहत तीन तलाक की कोई मान्यता नहीं है.

हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका में तकरीबन 10 फीसदी मुस्लिम आबादी है. वहां का कानून तुरंत तलाक वाले किसी नियम को मान्यता नहीं देता. मिस्र पहला देश था जिसने 1929 में कानून-25 के जरिए घोषणा की कि तलाक को तीन बार कहने पर भी उसे एक ही माना जाएगा और इसे वापस लिया जा सकता है. 1935 में सूडान ने भी कुछ और प्रावधानों के साथ यह कानून अपना लिया. आज ज्यादातर मुस्लिम देश- ईराक से लेकर संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन, कतर और इंडोनेशिया तक ने तीन तलाक के मुद्दे पर इस विचार को स्वीकार कर लिया है.

पाकिस्तान में भी तीन तलाक की प्रथा नहीं है. वहां कोई भी व्यक्ति ‘किसी भी रूप में तलाक’ कहता है तो उसे यूनियन काउंसिल (स्थानी निकाय) के चेयरमैन को इस बारे में जानकारी देते हुए एक नोटिस देना होगा और इसकी कॉपी अपनी बीवी को देनी होगी. यदि कोई व्यक्ति ऐसा करने में असफल रहता है तो उसे एक साल की सजा हो सकती है. 5000 रुपये का जुर्माना देना पड़ सकता है. चेयरमैन को नोटिस देने के 90 दिन बाद ही तलाक प्रभावी माना जाएगा. नोटिस पाने के 30 दिन के भीतर चेयरमैन को एक पंच परिषद बनानी होगी जो तलाक के पहले सुलह करवाने की कोशिश करेगी. यदि महिला गर्भवती है तो तलाक 90 दिन या प्रसव, जिसकी समयावधि ज्यादा हो, के बाद ही प्रभावी होगा. संबंधित महिला तलाक होने के बाद भी अपने पूर्व पति से शादी कर सकती है और इसके लिए उसे बीच में किसी तीसरे व्यक्ति से शादी करने की जरूरत नहीं है. बांग्लादेश में भी यही कानून लागू है.

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व्यथा कथा : 3

‘पांच साल से इंसाफ के लिए धक्के खा रही हूं; अफसरों, रक्षामंत्री और प्रधानमंत्री तक से गुहार लगा चुकी हूं’

अर्शिया इस्माइल, बरेली, उत्तर प्रदेश

बात 1999 की है. मैं शादी के एक बुरे अनुभव से गुजरकर तलाक ले चुकी थी. एक बेटी थी, जिसे मायके में रहकर ही पढ़ा रही थी. इसी बीच बच्ची के स्कूल के जरिए मेरी असरार (परिवर्तित नाम) से मुलाकात हुई जो कि एयरफोर्स के एक विंग कमांडर (हेलिकॉप्टर पायलट) थे और उस समय बरेली में ही पोस्टेड थे. असरार भी तलाकशुदा थे और हमारी बच्चियां साथ पढ़ती थीं. कुछ समय बाद हमने शादी करने का फैसला किया. 2000 में मेरा निकाह असरार से हुआ. मैं गैर-इस्लामिक धर्म से आती हूं, इसलिए मैंने धर्म परिवर्तन करके शादी की थी. बच्चियां आपस में दोस्त थीं तो जिंदगी की पटरी पर हमारी गाड़ी आराम से दौड़ रही थी.

18 अप्रैल, 2011 तक सब सही चल रहा था कि एक दिन असरार ने मुझसे कहा कि उन्होंने मुझे तलाक दे दिया है… मैं हैरान रह गई. मुझे पता चला कि असरार का कहीं अफेयर चल रहा है. उस समय उनकी पोस्टिंग हैदराबाद में थी. कुछ ही महीनों पहले एक दुर्घटना में मेरी बेटी की रीढ़ में गहरी चोट आई थी और वो बिस्तर पर थी. तलाक और असरार के अफेयर के बारे में जानकर मेरी परेशानी और बढ़ गई. हमने इस पर बात करने की कोशिश की पर कोई फायदा नहीं हुआ. मैंने उन्हें साफ मना कर दिया कि वो मुझे तलाक नहीं दे सकते वो भी ऐसे वक्त में. मैं अपनी ऐसी हालत में अपनी बेटी को लेकर कहां जाऊंगी. एक दिन असरार का फोन घर पर ही छूट गया और मैंने उनकी उस महिला दोस्त का कॉल रिसीव कर लिया और कहा कि उनकी वजह से ही हमारी जिंदगी में इतनी मुश्किलें हो रही हैं. तब तक असरार आ गए और उन्होंने मुझे बहुत मारा. मेरी बीमार बेटी ने ये देख लिया और जैसे-तैसे फोन करके उनके कमांडेंट की पत्नी को घर बुला लिया. वो भागते हुए हमारे यहां आईं. जब तक वे आईं तब तक मेरे चेहरे और शरीर पर काफी चोटें आ चुकी थीं. ये बात फिर उन्होंने अपने पति को बताई और कमांडेंट ने असरार को धमकी दी कि आगे कभी ऐसा हुआ तो वे इस मामले को सिविल कोर्ट में ले जाएंगे. उसके बाद असरार ने कहा कि वो ये तलाक वापस ले लेंगे. ये 26 अप्रैल का दिन था. उन्होंने अहले हदीस के एक स्थानीय इमाम से पूछा और वापस आकर साथ रहने लगे. कुछ दिनों बाद उन्होंने मुझसे कहा कि मैं दिमागी रूप से अब भी परेशान हूं तो क्यों न तुम कुछ वक्त बाहर कहीं रहो. दो-तीन महीने में मैं तुम्हें वापस बुला लूंगा. उन्होंने मुझे किराये के घर के लिए खर्च आदि देने की भी बात कही. मैं उस समय बस अपना घर टूटने से बचाना चाहती थी सो मैं इस पर भी राजी हो गई. मैं तीन महीने किराये के घर में रही और फिर उन्हें फोन किया पर उनका कोई जवाब नहीं मिला. इसी बीच मेरे भाई का इंतकाल हो गया और मैं बरेली आ गई. यहां से वापस पहुंची पर उन्होंने मुझे वापस अपने घर नहीं बुलाया.

नवंबर में एक दिन उन्होंने मुझे फोन करके कहा कि 18 अप्रैल को उनका दिया गया तलाक जायज है. उन्होंने जामिया निजामिया (एक मुस्लिम संस्था) से तलाक का एक फतवा बनवाकर एयरफोर्स अथॉरिटी में जमा करवा दिया है जिससे उनके रिकॉर्ड्स में अब मैं असरार की पत्नी नहीं हूं और इसलिए एयर फोर्स रेजीडेंसी में भी नहीं रह सकती. ये सरासर धोखा था. जाहिर है जामिया निजामिया का ये फतवा असरार ने गलत जानकरी देकर बनवाया था. मैंने उन इमाम साहब से बात की. उन्होंने मुझे वो कागज दिए जिस पर असरार ने तलाक वापस लेने की बात लिखी थी. पर एयरफोर्स ने उसे नहीं माना. मैंने एयरफोर्स के चीफ को चिट्ठी लिखी. उनके आदेश पर एक क्रिमिनल केस फाइल किया गया, पुलिस आई, सीआईडी ने जांच भी की और मेरे दावों को सही बताया. पर इसके बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ.

असरार ने सोचा तक नहीं कि एक बीमार बच्ची को लेकर मैं हैदराबाद जैसे इतने बड़े शहर में बिना किसी नौकरी के कैसे गुजारा करूंगी. मैंने कोर्ट में अर्जी डाली और बेबस होकर बरेली लौट आई. जनवरी 2015 में मैंने एयरफोर्स की एक महिला अधिकारी जिन्हें मैं पहले से जानती थी, उनसे संपर्क किया. उन्हें सारे कागज दिखाए और उन्होंने मेरी बात मानकर पूरा केस वहां खुलवाया. उन्हें अपने द्वारा की गई भूल का एहसास तो था पर वो इसे मानें कैसे? उन्होंने मुझसे कोर्ट से निर्णय लाकर देने को कहा. मेरे ये कहने पर कि असरार से कोर्ट के कागज क्यों नहीं मांगे थे जब उन्होंने कहा कि मुझे तलाक दे दिया है. इस पर उन्होंने मुझसे कहा कि आप ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से लिखवाकर लाइए तो हम आपको असरार की पत्नी मानकर वहां रहने की इजाजत दे देंगे. मैंने जैसे-तैसे भागदौड़ करके ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक जनरल सेक्रेटरी से मुलाकात की जिन्होंने बताया कि शरीयत के हिसाब से भी ये तलाक नाजायज है और मैं अब भी असरार की पत्नी हूं. उन्होंने ये बात लिखकर भी दी. इसे मैंने एयरफोर्स अथॉरिटी में जमा भी करवा दिया और उन्होंने आगे इस पर जांच करने की बात कही. इस बात को दस महीने हो चुके हैं पर अब तक उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया है. मैं सोचती हूं असरार ने इन झूठे कागजों से सिर्फ मुझे ही धोखा नहीं दिया है बल्कि जिस संस्थान में वो नौकरी करते हैं, यह उसके साथ भी धोखा है. इस सबके दौरान जब असरार से बात हुई तो उन्होंने कहा कि वो मुझे पत्नी नहीं मानते और मुझे गुजारे-भत्ते के नाम पर एक कौड़ी भी नहीं देंगे. ये वो शख्स कह रहा था जिसे मैंने अपनी जिंदगी के 11 साल दिए थे.

आज पांच साल से मैं इंसाफ के लिए धक्के खा रही हूं, पर कोई फायदा नहीं हुआ. बड़े-बड़े अधिकारियों से लेकर रक्षामंत्री और प्रधानमंत्री तक को लिखकर न्याय की गुहार लगा चुकी हूं. बरेली में भी कब तक रह सकती थी इसलिए दिल्ली में रहकर एक स्कूल में नौकरी करके बेटी को पढ़ाया है. ये दौर मेरी बेटी के लिए कितना मुश्किल रहा होगा, इसके बारे में कोई नहीं सोचता. हैदराबाद में कोर्ट में हमारे केस की सुनवाई चल रही है. अभी रीकंसीलिएशन (सुलह) का वक्त है. उन्हें यह एहसास हो चुका है कि वो गलत हैं. पिछली सुनवाई पर जब मैं वहां गई थी तब केस कमजोर पड़ता देख असरार ने मुझे इमोशनल ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया. उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मैंने केस वापस नहीं लिया और फैसला उनके पक्ष में नहीं गया तो वो खुद को गोली मार लेंगे. वो जानते हैं कि अब भी मैं उनकी परवाह करती हूं पर क्या उन्होंने बीते सालों में कभी हमारी परवाह की?[/symple_box]

इस्लाम में तलाक के तीन तरीके ज्यादा प्रचलन में हैं. इनमें से एक है तलाक-ए-अहसन. जानकारों के मुताबिक तलाक-ए-अहसन में शौहर बीवी को तब तलाक दे सकता है जब उसका मासिक चक्र न चल रहा हो (तूहरा की समयावधि). इसके बाद तकरीबन तीन महीने की समयावधि जिसे इद्दत कहा जाता है, में वह तलाक वापस ले सकता है. यदि ऐसा नहीं होता तो इद्दत के बाद तलाक को स्थायी मान लिया जाता है. लेकिन इसके बाद भी यदि यह जोड़ा चाहे तो भविष्य में शादी कर सकता है और इसलिए इस तलाक को अहसन (सर्वश्रेष्ठ) कहा जाता है.

   दूसरे प्रकार के तलाक को तलाक-ए-हसन कहा जाता है. इसकी प्रक्रिया की तलाक-ए-अहसन की तरह है लेकिन इसमें शौहर अपनी बीवी को तीन अलग-अलग बार तलाक कहता (जब बीवी का मासिक चक्र न चल रहा हो) है. यहां शौहर को अनुमति होती है कि वह इद्दत की समयावधि खत्म होने के पहले तलाक वापस ले सकता है. यह तलाकशुदा जोड़ा चाहे तो भविष्य में फिर से शादी कर सकता है. इस प्रक्रिया में तीसरी बार तलाक कहने के तुरंत बाद वह अंतिम मान लिया जाता है. तलाकशुदा जोड़ा फिर से शादी तब ही कर सकता है जब बीवी किसी दूसरे व्यक्ति से शादी कर ले और उसे तलाक दे. इस प्रक्रिया को हलाला कहा जाता है.

तीन तलाक पर मुस्लिम समाज बंटा हुआ है. बड़ी संख्या में उलेमा और अल्पसंख्यक संगठन इसके समर्थन में हैं तो समाज के एक तबके की नजर में यह पक्षपातपूर्ण है

 तीसरे प्रकार को तलाक-ए-बिद्दत कहा जाता है. इसमें तलाक की उस प्रक्रिया की बुराइयां साफ-साफ दिखने लगती हैं जिसमें शौहर एक बार में तीन तलाक कहकर बीवी को तलाक दे देता है. तलाक-ए-बिद्दत के तहत शौहर तलाक के पहले ‘तीन बार’ शब्द लगा देता है या ‘मैं तुम्हें तलाक देता हूं’ को तीन बार दोहरा देता है. इसके बाद शादी तुरंत टूट जाती है. इस तलाक को वापस नहीं लिया जा सकता. तलाकशुदा जोड़ा फिर हलाला के बाद ही शादी कर सकता है.

इस्लामी जानकार कहते हैं कि तलाक-ए-बिद्दत या एक साथ तीन बार तलाक कहकर तलाक देने की प्रक्रिया यह सुनिश्चित करने के लिए शुरू की गई थी कि जहां जोड़े के बीच कभी न सुधरने की हद तक संबंध खराब चुके हैं या दोनों का साथ रहना बिल्कुल मुमकिन नहीं हैं वहां तुरंत तलाक हो जाए. इस्लाम में प्रचलित चारों सुन्नी विचारधाराएं- हनफी, मलिकी, हंबली और शाफेई इस प्रक्रिया पर सहमति जताती हैं.

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तीन तलाक पर एआईएमपीएलबी और सुप्रीम कोर्ट की तकरार के बाद मुस्लिम समाज बंटता नजर आ रहा है. बड़ी संख्या में उलेमा और अल्पसंख्यक संगठन इसके समर्थन में हैं तो दूसरी ओर महिलाओं और समाज के एक तबके की नजर में यह पक्षपातपूर्ण है.

लखनऊ में ही हुई एआईएमपीएलबी की बैठक को संबोधित करते हुए बोर्ड की पदाधिकारी अस्मा जेहरा ने कहा, ‘इस्लाम में महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का हक दिया गया है. तलाक की समस्या बड़े शहरों में आ रही है. छोटे कस्बों में इस तरह की परेशानी नहीं है. जहां तक वॉट्सऐप और मैसेज के जरिए तलाक देने की बात है तो इसके बाद मुस्लिम महिलाओं के पास एक ऐसा साक्ष्य तो होता है कि वे तलाकशुदा हैं. इससे वह अपनी आगे की जिंदगी आसानी से शुरू कर सकती हैं. दूसरे समुदायों की महिलाओं को लंबे समय तक छोड़ दिया जाता है और उसके पास इस बात का कोई प्रमाण भी नहीं होता है. हमें इस बात की कोई चिंता नहीं है कि दूसरे देशों में क्या हो रहा है. भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां सभी धर्मों को बराबर अधिकार मिले हैं.’

अस्मा जेहरा के अनुसार, भारत में बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं इस तरह के कानूनों का पालन करना चाहती हैं. उन्होंने कहा, ‘99 फीसदी महिलाएं कुरान में उल्लिखित नियम और कानून का पालन करने की पक्षधर हैं. निकाह में सबसे पहले वधू की रजामंदी स्वीकार की जाती है. इसी तरह पुरुष तीन बार तलाक बोलकर अपने वैवाहिक संबंध समाप्त कर सकता है. महिलाओं को भी इस तरह का अधिकार दिया गया है. वे खुला या फसख-ए-निकाह बोलकर शादीशुदा जिंदगी से किनारा कर सकती हैं.’

इस दौरान बोर्ड की एक अन्य महिला सदस्य साफिया नसीम ने कहा, ‘मुस्लिम महिलाएं शरीयत कानून में किसी भी तरह की दखलंदाजी को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगी. शरीयत कानून पर गैरजरूरी सवाल उठाए जा रहे हैं जो अफसोसजनक हैं. संदिग्ध सर्वेक्षणों के जरिए मुस्लिम समाज को लेकर भ्रांति का माहौल खड़ा करने की साजिश रची जा रही है.’

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वहीं बोर्ड के सदस्य और ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा, ‘इस्लाम में तीन तलाक की व्यवस्था को जायज ठहराया गया है. कुरान शरीफ के अनुसार यह पद्धति न्यायसंगत है. बोर्ड की महिला सदस्यों ने भी तीन बार तलाक बोले जाने की प्रथा का समर्थन किया है. बोर्ड जल्द ही केंद्र सरकार से मांग करेगा कि वह भी पहले की सरकारों की तरह पर्सनल लॉ में दखलंदाजी न करे.’ 

‘कुरान के नाम पर डरा-धमकाकर पितृसत्ता को बढ़ावा दिया गया. उसमें ऐसा कुछ नहीं लिखा है. कुरान के गलत अर्थ निकालकर उसमें चालाकी से हेर-फेर किया गया है’

बीएमएमए की सह-संस्थापक नूरजहां सफिया नियाज़ कहती है, ‘तीन बार तलाक कहने से तलाक होने से बहुत सारी महिलाएं परेशान हैं. फोन पर तलाक हो रहे हैं, वॉट्सऐप पर हो रहे हैं और जुबानी तो हो ही रहे हैं. एक पल में महिला की जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है. जुबानी तलाक एक गलत प्रथा है और महिलाओं के सम्मान के लिए इसे खत्म करना जरूरी है. आप औरतों को कोई वस्तु नहीं समझ सकते. सोचिए ये सब 21वीं सदी में हो रहा है. यहां एक विधि सम्मत कानून की जरूरत है. जो कानून हैं, उनमें सुधारों की जरूरत है.’

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उन्होंने कहा, ‘कुरान के नाम पर, धर्म के नाम पर डरा-धमकाकर पितृसत्ता को और बढ़ावा दिया गया. कानूनी मसलों पर कुरान में ऐसा कुछ नहीं लिखा है. कुरान के गलत अर्थ निकाले गए हैं, उसमें चालाकी से हेर-फेर किया गया. दरअसल जिस भाषा में कुरान लिखी गई उसे लोग नहीं जानते थे तो इसका तर्जुमा किया गया और अपने हिसाब से अर्थ निकाले गए. हमने कुरान पढ़ा है और ये काफी प्रगतिशील है. उसमें कहीं बहुविवाह, जुबानी तलाक या हलाला की बात नहीं कही गई है.’

उत्तर प्रदेश की पहली महिला काजी हिना जहीर नकवी ने भी तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग की है. उन्होंने कहा, ‘मैं तीन तलाक की कड़े शब्दों में निंदा करती हूं. यहां तक कि कुरान में इस तरह का कोई निर्देश नहीं दिया गया, जिससे मौखिक तलाक को बढ़ावा दिया जाए. यह कुरान की आयतों का गलत मतलब निकाला जाना है. इसने मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी को खतरे में डाल दिया है.’

ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर भी तीन तलाक का खुलकर विरोध करती हैं. वे कहती हैं, ‘तीन तलाक कुरान शरीफ के कानूनों के खिलाफ है. कुरान शरीफ में एक ही बार में तीन तलाक की बात नहीं कही गई है. ऐसा तरीका जो कुरान के हिसाब से जायज नहीं है उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा. जहां तक मामले के सुप्रीम कोर्ट में जाने की बात है, तो हमें देश की सर्वोच्च अदालत पर पूरा भरोसा है. यहां पर मुस्लिम पर्सनल लॉ को ध्यान में रखते हुए फैसले दिए जाते हैं.’

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एआईएमपीएलबी द्वारा तीन तलाक को जायज ठहराए जाने और खासकर उसकी महिला सदस्यों द्वारा इसकी पैरवी किए जाने के मामले पर शाइस्ता अंबर कहती हैं, ‘एआईएमपीएलबी के सदस्य जमीनी हकीकत से रूबरू नहीं हैं. हम पिछले कई सालों से इस मसले पर काम कर रहे हैं. हमें पता है कि वास्तविकता क्या है. बोर्ड में जो महिला सदस्य हैं उनके पास जमीनी हकीकत की कितनी जानकारी है इस पर सर्वे करने की जरूरत है. वैसे एआईएमपीएलबी से हमारी कोई लड़ाई नहीं है. हमारा मानना है कि जो भी कुरान शरीफ की गलत व्याख्या करेगा या उसका पालन नहीं करेगा, हम उसके खिलाफ हैं. फिर चाहे वो एआईएमपीएलबी ही क्यों न हो.’

जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्रा लुबना सिद्दीकी का कहना है, ‘हमारे देश में एक साथ तीन तलाक की जो व्यवस्था है और पर्सनल लॉ बोर्ड ने जिसे मान्यता दी है वो पूरी तरह कुरान व इस्लाम के मुताबिक नहीं है. कुरान में तीन महीने में तलाक की व्यवस्था की गई है. पुरुषवादी समाज ने तलाक की पूरी व्यवस्था को अपनी सहूलियत के हिसाब से बना दिया है. इसमें कुरान के मुताबिक संशोधन की सख्त जरूरत है.’

हालांकि मुस्लिम तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति के चलते राजनीतिक पार्टियों के नेता तीन तलाक के खात्मे के पक्षधर होने के बावजूद सीधी टिप्पणी करने से बचते हैं. कांग्रेस नेता मीम अफजल कहते हैं, ‘कुरान में तलाक की जो व्याख्या की गई है वह तीन तलाक से मेल नहीं खाती है. कुरान में साफ कहा गया है कि तलाक तीन महीने में होना चाहिए.

तीन तलाक को लेकर मुस्लिम महिलाओं को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. मेरा मानना है कि अब वक्त आ गया है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य इस पर बैठकर विचार करें और ऐसा फैसला लें जो सभी के हित में हो.’

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भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय प्रभारी फारूक खान का कहना है, ‘इस मसले पर पार्टी की राय मैं नहीं बता सकता, लेकिन मेरा अपना मानना है कि तीन तलाक प्रथा पूरी तरह से गैरइस्लामी है और इसका खात्मा होना चाहिए.’

वहीं अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नजमा हेपतुल्ला का कहना है, ‘इस्लाम में तलाक की इजाजत है पर यह जरूरी नहीं है. ऐसी बहुत सी इजाजते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि उनका उपयोग किया ही जाए. तलाक को पैगंबर ने भी अच्छा नहीं माना है. उन्होंने इसे नजरअंदाज करने को कहा है. वैसे भी एक बार में तीन तलाक का जिक्र कुरान में नहीं है. तो यह अपने आप खारिज हो जाता है.’

नीतीश कुमार : आधी छोड़, पूरी को धावे

फोटोः तहलका अार्काइव
फोटोः तहलका अार्काइव
फोटोः तहलका अार्काइव

 

पटना कुछ मायने में जानदार शहर है. जानदार होने का एक नमूना इस शहर में लगने वाली चौपालों में जाकर समझ सकते हैं. रोजाना बारहों मास यहां कई चौपालें लगती हैं. रोजाना गपबाजी पसंद करने वाले लोग बतकही के अड्डों पर जाना कभी भी नहीं भूलते. बतकही का विषय किसी न किसी रूप में राजनीति ही होता है लेकिन उसमें विषय रोजाना बदल जाता है. इन चौपालों में होने वाली बतकही की एक और खासियत होती है. ओसामा, ओबामा से लेकर किसी के मामा तक की भी बात होती है तो उसका बिहारी कनेक्शन जरूर निकाला जाता है और फिर घूम-फिरकर बात बिहार पर खत्म होती है. व्यस्त सड़क किनारे खड़े होकर घंटे भर में एक कप चाय सुड़कने वाले लोगों की चौपाल भी लगती है. इन चौपालों में जाकर लगेगा कि राजनीति कैसे यहां रग-रग में समाकर एक धर्म की तरह है. पिछले दिनों इनकम टैक्स गोलंबर वाली बतकही की चौपाल का हिस्सा बना. बातचीत नीतीश पर ही हो इसलिए एक साथी से बतकही की शुरुआत करवा दी और उसके बाद तो फिर अखाड़ा-सा ही सज गया. जिसने भी बात की शुरुआत की उसने बस इतना कहा, ‘बाप रे बाप. नीतीश कुमार का फिर से पीएम वाला रिकॉर्ड  बजना शुरू हुआ है. अभी उन्हें बिहार पर ध्यान देना चाहिए तो बिहार को भगवान भरोसे छोड़कर दिन-रात एक कर देश की राजनीति कर रहे हैं. शराबबंदी का पाठ गायत्री मंत्र बार-बार दोहरा रहे हैं.’

उन्हें पलटकर तुरंत जवाब मिला, ‘कहां बिहार को भगवान भरोसे छोड़ दिया है. नीतीश बिहार को भगवान भरोसे छोड़ने वाले नेता होते तो लोग फिर से इतना भरोसा न जताते. क्या नहीं कर रहे हैं. बिहार में शराबबंदी करवाना कोई मामूली काम था क्या? इसका असर नहीं दिख रहा है क्या? अपराध कम हुआ है, गरीब कमाई जमाकर आगे बढ़ रहे हैं और शांति बहाल हुई है.’ इसके तुरंत बाद पहले साथी सवाल उठा देते हैं, ‘सहिये कह रहे हैं आप. दो महीने में ही शराबबंदी का फायदा ये हो गया है कि गरीबों के पास पैसा बलबलाने लगा है. अरे यार, क्या फालतू बात कर रहे हो. शराबबंदी-शराबबंदी ही तो रट रहे हैं. जैसे कांग्रेस के राज में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने का राग छेड़े हुए थे. अब तो विशेष राज्य का नाम एक बार भी नहीं ले रहे हैं. ऐसे ही एक बार रट्टा लगा रहे थे- बस एक पेड़ लगाओ, जदयू की सदस्यता पाओ. यह राग भी बंद कर दिया. शराबबंदी वाला राग भी उन्हें रोकना पड़ेगा नहीं तो कल से सवाल पूछा जाएगा कि क्या शराबबंदी ही सब समस्या का समाधान है. और अगर यह तरक्की का रास्ता खोलता है तो फिर गुजरात के विकास मॉडल और आंकड़े का क्यों विरोध करते हैं. गुजरात में तो वर्षों से शराब बंद है तो फिर यह क्यों नहीं मानना चाहिए कि वहां सब फीलगुड-फीलगुड होगा? फिर तो नीतीश कुमार को यह भी बताना पड़ेगा कि बिहार में अब तक वे भूमि सुधार नहीं लागू करा सके हैं तो क्या उसके लिए भी केंद्र सरकार ही बाधा रही? कॉमन स्कूल सिस्टम पर बात करके चुप्पी साध ली तो क्या उसमें भी बाधक शराब ही है? कई सवालों के जवाब देने होंगे उन्हें, मुश्किल हो जाएगी.’ इस बात का झल्लाहट के साथ जवाब मिलता है, ‘मतलब क्या कहना चाह रहे हो, शराबबंदी नहीं होनी चाहिए थी. नीतीश कुमार ने गलत कर दिया है. क्या शराबबंदी का फायदा नहीं हो रहा?’ बहस आगे बढ़ती जाती है. एक-दूसरे की बातों को काटते हुए न जाने कितनी बातें एक-दूसरे से टकराने लगती हैं. तर्क ऐसे होते हैं कि बड़े-बड़े विश्लेषक भी पानी मांग लें. आखिर में यह बहस कई सवाल छोड़ जाती है. सबसे अहम मुद्दा यही होता है कि इस बार नीतीश कुमार ने जब से सत्ता संभाली है वे अपने को राष्ट्रीय फलक पर स्थापित करने में इतनी ऊर्जा लगा रहे हैं कि बिहार उनसे कहीं पीछे छूटता जा रहा है और यहां की समस्याएं-चुनौतियां दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं. चौपाल में  यह बात जब छेड़ी जाती है तो तथ्यों के बजाय तर्कों का सहारा लिया जाता है. ऐसा भी नहीं कि यह बात सिर्फ उस दिन की चौपाल में उठती है.

नीतीश उलझ गए हैं. उन्हें चुपचाप राज्य की ओर ध्यान देना चाहिए. बिहार ही नहीं संभाल पाएंगे तो उन्हें देश संभालने का मौका कौन देगा? उन्हें फिर किसी ने पढ़ा दिया है कि वे प्रधानमंत्री बन जाएंगे लेकिन स्थितियां उसकी इजाजत नहीं देतीं

बिहार में इन दिनों दो-तीन मुद्दे ही गांव-कस्बे की चौपालों से लेकर शहरों तक छाए रहते हैं. पहला  यह कि इस बार नीतीश लालू के साथ सत्ता में जब से आए हैं, तब से बिहार फिर से पुराने रास्ते पर आ गया है. दूसरा यह कि नीतीश राष्ट्रीय राजनीति में जाना चाहते हैं तो वे जा पाएंगे या नहीं. इन सवालों का जवाब तलाशना इतना आसान नहीं होता. तर्क कुछ और बताते हैं, तथ्य कुछ और होते हैं. हम इन सवालों का जवाब एक-एक कर तलाशने की कोशिश करते हैं. अब पहले सवाल की टोह लेते हैं. बिहार में क्या वाकई अपराध अभूतपूर्व तरीके से बढ़ गया है और यह सब इसलिए हुआ है कि लालू सत्ता में उनके साथ हैं और अपराधियों का मनोबल बढ़ गया है? इसे जायज ठहराने के पक्ष में तर्क चाहे जितने दिए जाएं, तथ्य उसका इस तरह से समर्थन नहीं करते. बिहार में इस बार नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद अपराध का चर्चित मामला दरभंगा में इंजीनियरों की हत्या के बाद सामना आया. उसके बाद एक से बढ़कर एक कांड होते गए. भाजपा नेताओं ने कहना शुरू किया कि बिहार में जंगलराज आ गया है जबकि आंकड़ों में जाते हैं तो मालूम होता है कि यह अपराध कोई एक दिन में नहीं बढ़ा बल्कि पिछले कई सालों से यह लगातार बढ़ रहा था. सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि बिहार में 2010 में अपहरण का जो आंकड़ा था वह पांच साल में बढ़कर करीब दो गुना हुआ. 2010 में अपहरण के 3,602 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2015 में 7,127 मामले दर्ज हुए. इसी तरह 2010 से 2015 आते-आते दोषसिद्धि की दर में 68 प्रतिशत की गिरावट हुई. यानी 2010 में 14,311 मामलों में दोषसिद्धि हुई जो 2015 आते-आते 4,513 पर आकर सिमट जाता है. इसी अवधि में अपराध दर में 42 प्रतिशत की वृद्धि भी हुई लेकिन हत्या जैसे अपराध को देखें तो 2012 से 2015 के बीच 12 प्रतिशत की गिरावट हुई. 2010 से 2015 के बीच दंगे में 73 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.

भाजपा नेता सुशील मोदी कहते हैं, ‘अब जब आंकड़े ही बता रहे हैं तो इसमें अपनी ओर से क्या बोलने की जरूरत है. सब साफ है कि जब से लालू यादव साथ हुए हैं, राज्य में अपराधियों का मनोबल बढ़ा है और बिहार अराजकता की ओर बढ़ा है.’ मोदी के जवाब में जदयू नेता चंद्रभूषण राय कहते हैं, ‘सुुशील मोदी जी को तो जो बोलना होता है बोल देते हैं लेकिन उन्हें यह देखना चाहिए कि मध्य प्रदेश में उनकी ही पार्टी का शासन वर्षों से है. बिहार की आबादी मध्य प्रदेश से 44 फीसदी ज्यादा है लेकिन अपराध यहां 35 फीसदी कम हैं.’ भाजपा हो या जदयू के नेता, सबके पास अपने तथ्य हैं और तर्क. सवाल यह है कि जब बिहार में दूसरे भाजपा शासित राज्यों की तुलना में अपराध ज्यादा है ही नहीं, बिहार में जब अपराध एकबारगी से इतना बढ़ा ही नहीं है तो फिर राज्य भर में यह बात अचानक फैली कैसे! अपराध विशेषज्ञ ज्ञानेश्वर वात्स्यायन कहते हैं, ‘अपराध का आंकड़ा क्या है यह महत्वपूर्ण नहीं है, जिस तरह से बिहार में सरेआम अपराध बढ़े हैं, उससे यह बात फैली है कि नीतीश कुमार की इस पारी में सब कुछ ठीक से नियंत्रित नहीं हो रहा और अगर ऐसा नहीं हो रहा तो फिर कोई न कोई गड़बड़ी अचानक तो हुई है.’ राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणि कहते हैं, ‘बिहार में क्या अपराध ऐसा हो रहा है कि जो कहीं नहीं होता या हुआ हो. यह किसी के बस की बात नहीं कि वह अपराध को पूरी तरह से रोक दे. इसके सामाजिक कारण होते हैं. असल में यह देखना होगा कि अपराध के बाद नीतीश कुमार एक्शन ले रहे हैं या नहीं. मैं तो यही कहूंगा नीतीश कुमार तुरंत एक्शन ले रहे हैं और एक सीएम यही कर सकता है.’ मणि की बातों का विस्तार करके देखें तो यह सच भी दिखता है. यह सच है कि बिहार में इन दिनों ऐसे कई चर्चित कांड हुए और विचित्र किस्म की घटनाएं घटीं जिससे नीतीश की साख को बट्टा लगा. दरभंगा में सरेआम इंजीनियरों की हत्या, भोजपुर में भाजपा नेता विशेश्वर ओझा की हत्या, मुजफ्फरपुर में व्यवसायी की हत्या, समस्तीपुर में डॉक्टर के घर पर गोलीबारी समेत तमाम ऐसी घटनाओं को छोड़ भी दें तो कई ऐसी घटनाएं और घटीं, जिनके कारण नीतीश कुमार की ज्यादा किरकिरी हुई.

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नीतीश, चौपाल और चर्चा

  • काहे नहीं देखेंगे पीएम का ख्वाब! क्या कमी है जी! तीन-तीन बार सीएम हुए, केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं, पूरे देश में प्रतिष्ठा है ही, नरेंद्र मोदी के अश्वमेधी घोड़ा को बिहार में रोककर साबित कर ही दिए कि उनमें दमखम है भाजपा का विरोध करने का और उससे लड़ने का भी तो फिर काहे नहीं पीएम का ख्वाब देखें और काहे नहीं बन सकते हैं!
  •  बकलोले हो का रे भाई. कौन कह रहा है कि ख्वाब नहीं पालना चाहिए और कौन कह रहा है कि वे नहीं बन सकते… अरे बनें, बनेंगे तो बढि़ए लगेगा न, कोई पीएम तो बना इहां का. बाकि हमरा कहना यह है कि नीतीश देश के पीएम तब न बनेंगे जब पहले अपना बिहार में अकेले दमखम दिखा देते, चाहे बिहार के पड़ोस में अपना जलवा दिखा देते. एक बार लोकसभा में अकेले मैदान में उतरे तो सिमट गए. बाकी तो लालू जी के साथ सफर शुरू किए, फिर वामपंथियों के साथ गए, फिर बात बनती न दिखी तो भाजपा के साथ हुए, भाजपा से अलग हुए तो अकेले ट्रायल किए, सिमट गए तो फिर लालू जी के साथ हो गए. और फिर ताकत का मतलब सीधे-सीधे संख्या बल से होता है. नीतीश को तो नंबर गेम में पिछड़ जाना पड़ेगा.
  •  अरे क्या तुमसे तर्क करें. तुम्हारा स्तरे तर्क करे लायक नहीं. बीपी सिंह का अकेले जनता दल का उतना सीट लाए थे कि देश में सरकार बना लेते बाकी जब मैदान में उतरे तो भाजपा से लेकर वामपंथी तक, सब एके घाट पर आके पानी पीया था कि नहीं. समर्थन देके बीपी सिंह को पीएम बनाया था कि नहीं. पूरा देश में प्रभाव की बात कर रहे हो तो देवगौड़ा और गुजराल का नामो तक जानता था आदमी, पीएम बन गए थे कि नहीं. चंद्रशेखरे के पास इतना नंबर गेम था कि बन गए थे पीएम. राजनीति में नंबर महत्वपूर्ण होता है बाकी सब नहीं होता है. रहा बात पड़ोसी इलाका में प्रभाव जमाने का तो करिए रहे हैं न कोशिश.
  • करें कोशिश, करें. तुम चाणक्य बूझ रहे हो अपना को तो बताओ जो पूछ रहे हैं. नीतीश कुमार जब खुद को राष्ट्रीय राजनीति का सिरमौर बनाने के लिए कोशिश करेंगे तो पहिला सवाल ईहे कि कौन उनका नेतृत्व उतना आसानी से स्वीकार कर लेगा. का ममता बनर्जी? उ तो खुदे कह चुकी हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में जिम्मेवारी मिले, निभाने के लिए तैयार हैं और उ तो साबित कर दीं खुद को कि कैसे वाम को उसके सबसे बड़े गढ़ में जड़ से खत्म कर सकती हैं. क्या जयललिता? वे कोई क्या कम बड़ी नेता हैं. नवीन पटनायक खुदे अपने को तीसमार खां समझते हैं. समझे भी काहे नहीं. जब पूरा देश में मोदी का आंधी था, तबो नवीन उड़ीसा में बीजू जनता दल का खंभा उखड़ने नहीं दिए. अब जरा ई भी तो बताओ कि भाजपा मुक्त भारत चाहे संघ मुक्त भारत का नारा तो बढि़या है नीतीश जी का लेकिन इसके नाम पर तो कोई एके साथ आएगा और हर जगह दुई खेमा है. तमिलनाडु में अगर जयललिता आएंगी तो करुणानिधि साथ नहीं रहेंगे. अगर वामपंथी साथ रहेंगे तो बंगाल से ममता नहीं रहेंगी साथ में. कांग्रेस अगर साथी बनती है तो नवीन जैसे नेता साइड रहेंगे. उत्तर प्रदेश में मायावती मुलायम में से कोई एक्के होगा, बताओ तो जरा चाणक्य बने हो तो.
  • अरे छोड़ो भइया. सब संगे आ जाएगा. एके साथ न आ गया था कांग्रेस के रोके के नाम पर कम्युनिस्ट और भाजपा. आ न गए नीतीश और लालू साथे, कोई विश्वास कर सकता था.  राजनीति में रणनीति परिस्थितियों का दास होती है. यही जानते हो नीतीश को. उनसे ज्यादा एडजस्टेबल कोई है क्या? उ हर बार एक नया वोट बैंक बना लेते हैं. पिछड़ा को अतिपिछड़ा किए, दलित को महादलित फिर महादलित-दलित एक हो गया, मुसलमानों में पसमांदा अलग किए. नीतीश जानते हैं कि उन्हें क्या करना है. पहिलका बारी आए तो लड़कियों को साइकिल बांट महिलाओं के दिल में जगह बनाए और अब शराबबंदी करवा के जात-पात का बंधन तोड़ सर्वमान्य रूप से महिलाओं का नेता बन गए हैं. बताओ का अइसा रणनीति बनाने वाला कोई नेता है. अरे, नीतीश को जानते कितना हो.[/symple_box] 

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इसमें एक बड़ा और चर्चित मामला तो जदयू की विधायक बीमा भारती के चर्चित पति अवधेश मंडल के पूर्णिया के मरंगा थाने से भाग जाने वाला मामला रहा, जिसमें यह आरोप लगा कि बीमा भारती ने ही भगाने में मदद की. हालांकि 48 घंटे में ही अवधेश फिर पुलिस की गिरफ्त में भी आ गए थे. नवादा के विधायक राजवल्लभ यादव का मामला भी उतना ही चर्चित हुआ, जिन पर एक नाबालिग लड़की के यौन शोषण का आरोप लगा और एक माह तक फरार रहने के बाद उन्होंने समर्पण किया. जदयू के विधायक सरफराज आलम का मामला कोई कम चर्चित नहीं रहा. उन पर बेटिकट यात्रा के साथ ही राजधानी एक्सप्रेस में एक महिला से छेड़खानी का आरोप लगा. उन्हें जदयू से निलंबित किया गया. जदयू से ही निलंबित एमएलसी मनोरमा देवी के बेटे रॉकी यादव का मामला तो देश भर में चर्चित रहा. रॉकी मनोरमा देवी और गया के चर्चित बिंदी यादव के बेटे हैं. पिछले दिनों उन्होंने आदित्य सचदेवा नाम के व्यक्ति की हत्या कर दी थी. बाद में मनोरमा देवी के यहां शराब भी बरामद हुई. इसके अलावा नीतीश कुमार के अपने विधायकों ने जितनी किरकिरी नहीं करवाई, उससे ज्यादा उनके सहयोगी दलों के नेताओं ने किरकिरी करवाई. राजद नेता शहाबुद्दीन का प्रकरण हालिया दिनों में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के बाद चर्चित रहा और सबने देखा कि कैसे शहाबुद्दीन जेल में ही दरबार लगा रहे थे. राजद नेता और मंत्री अब्दुल गफूर ने शहाबुद्दीन से जेल में जाकर मुलाकात करके सरकार की और किरकिरी करवाई. भाजपा के वरिष्ठ नेता और बिहार में नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार कहते हैं, ‘सब जानते हैं कि शहाबुद्दीन सीवान में कैसे और किस तरह का राज चला रहे हैं. वे जेल में जनता दरबार लगा रहे हैं तो यह बात सरकार को नहीं मालूम होगी, यह कैसे कहा जा सकता है. सरकार को सब मालूम है लेकिन सरकार मजबूर है.’ अपराध को लेकर बिहार के पुलिस महानिदेशक तक कह चुके हैं, ‘अपराध कब नहीं था, कहां नहीं है, रामराज्य में भी अपराध था.’ पुलिस महानिदेशक की यह बात कहीं न कहीं से नीतीश की ही किरकिरी कराने वाली होती है. राजद के नेता तसलीमुद्दीन अपनी पुरानी बात ही दोहराते हैं और जोर देकर कहते हैं, ‘हमने जो बात कही थी वह हवा में नहीं कही थी. नीतीश कुमार के इस बार के राज में जंगलराज ही नहीं महाजंगलराज हो गया है और अगर वे सत्ता नहीं संभाल पा रहे तो फिर उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए.’ तसलीमुद्दीन जैसे वरिष्ठ राजद नेता भी ऐसे बयान देकर नीतीश की ही किरकिरी करवाते हैं. हम नेताओं की बात छोड़कर दूसरे लोगों से बात करते हैं. राजनीतिक संस्था ‘बागडोर’ के समन्वयक इंजीनियर संतोष यादव कहते हैं, ‘सवाल यह नहीं कि अपराध कितना बढ़ा, उसके आंकड़े क्या कह रहे हैं. अपराध आंकड़ों के जाल में उलझकर रह जाता है लेकिन बिहार के सामाजिक न्याय के साथ जो दूसरे पहलू जुड़े हुए हैं उस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए. जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य बुनियादी सवाल हैं.’ संतोष का इशारा बोर्ड के रिजल्ट में टॉपरों के हाल की ओर है, जिससे सरकार की देश भर में किरकिरी हुई. राजनीतिक विश्लेषक प्रो. नवल किशोर चौधरी कहते हैं, ‘नीतीश कुमार पीएम-पीएम के शोर में उलझ गए हैं. इधर, बिहार का नुकसान हो रहा है. उन्हें चुपचाप राज्य की ओर ध्यान देना चाहिए. बिहार ही नहीं संभाल पाएंगे तो उन्हें देश संभालने का मौका कौन देगा? नीतीश कुमार को फिर से किसी ने भ्रम का पाठ पढ़ा दिया है कि वे प्रधानमंत्री बन जाएंगे लेकिन स्थितियां उसकी इजाजत नहीं देतीं. नीतीश खूब अच्छे से जानते हैं कि अभी लालू अपने बच्चों को सेटल कराने में लगे हुए हैं, इसलिए चुप हैं लेकिन वे जब सक्रिय होंगे तो फिर नीतीश के प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब को वही चकनाचूर करे देंगे. पूरा बिहार गंवाकर किसी तरह कांग्रेस के सहयोग से चौधरी चरण सिंह या चंद्रशेखर जैसा प्रधानमंत्री बनकर ही अगर नीतीश को अपना ख्वाब पूरा करना है तो करें, लगा दंे बिहार को दांव पर, रोका किसने है.’ प्रो चौधरी बिहार में बढ़ते अपराध से लेकर दूसरी किस्म की समस्याओं के लिए नीतीश कुमार के राष्ट्रीय राजनीति वाले अभियान को कसूरवार ठहराते हैं.

नीतीश कुमार संघ मुक्त भारत का नारा भी लगा रहे हैं. लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि संघ परिवार के लिए भी उत्तर भारत बहुत खास इलाका है और वह इतनी आसानी से इस इलाके को अपने से मुक्त नहीं होने देगा

बात फिर घूम-फिरकर नीतीश कुमार के प्रधानमंत्री बनने वाले ख्वाब तक आ जाती है और फिर एक साथ कई सवाल सामने खड़े हो जाते हैं.  इस राह को मजबूत बनाने के लिए वे दो मुद्दों को भुनाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं. पहला बिहार में शराबबंदी और दूसरा संघ मुक्त भारत. हालांकि राज्य के राजनीतिक विश्लेषक इन दोनों ही मुद्दों से उन्हें बहुत ज्यादा फायदा मिलने की उम्मीद नहीं देख रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘नीतीश कुमार पर शराबबंदी का नशा चढ़ा हुआ है और साथ ही वे संघ मुक्त भारत का नारा भी लगा रहे हैं. संघ मुक्त भारत एक प्रमुख नारा हो सकता है लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि संघ परिवार के लिए भी उत्तर भारत बहुत खास इलाका है और वह इतनी आसानी से अपने से इस इलाके को मुक्त नहीं होने देगा. संघ को मालूम है कि बिहार और उत्तर प्रदेश, सिर्फ ये दोनों राज्य 120 सांसद की हैसियत रखते हैं. संघ मुक्त भारत के जरिए नीतीश कुमार अगर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पैठ बनाएंगे तो यह आसानी होगी लेकिन संघ की काट सामाजिक न्याय की राजनीति को परवान चढ़ाकर की जा सकती है, जिसमें नीतीश कुमार अपेक्षा की कसौटी पर खरे नहीं उतरे रहे. सामाजिक न्याय के एजेंडे को उन्हें सबसे पहले बिहार में ही सही तरीके से लागू करके दिखाना होगा और पूरे देश में उसे मॉडल की तरह पेश करना होगा लेकिन नीतीश कुमार ऐसा करते हुए नहीं दिखते. हिंदू जातियों में जो विभाजन है, वही भाजपा या संघ परिवार के लिए ताकत भी है और कमजोरी भी. नीतीश को अगर कहीं से गठजोड़ बनाने की शुरुआत करनी है तो उन्हें अपने बिहार में ही करनी चाहिए. रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी जैसे तीन प्रमुख नेता अभी भाजपा के पाले में हैं. सामाजिक न्याय की ताकतों को साथ लाने की कोशिश नीतीश कुमार को करनी चाहिए. भाजपा के खिलाफ अटैक करना हो तो सामाजिक न्याय के मसले पर करना ज्यादा आसान होगा, क्योंकि भाजपा बुनियादी तौर पर सामाजिक न्याय के विरोध की पार्टी है. लेकिन नीतीश कुमार देश भर में इस पर नहीं बोल पाते. उनसे ज्यादा लालू प्रसाद यादव बोल लेते हैं. इसलिए जब संघ मुक्त भारत की बात सामने आएगी तो लालू प्रसाद खड़े होंगे तो उनमें चैंपियन बनने की संभावना ज्यादा है, यह बात अलग है कि लालू प्रसाद अब राष्ट्रीय राजनीति में वह भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं दिख रहे.’

फोटो साभार : पटना व्यू डॉट ब्लॉगस्पॉट
फोटो साभार : पटना व्यू डॉट ब्लॉगस्पॉट

राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणि कहते हैं, ‘नीतीश कुमार की ओर से बिहार के नेतृत्व और खुद के प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब का घालमेल करना ठीक नहीं. बिहार विकल्पहीन है और सक्षम विकल्प नहीं होने के कारण जनता ने उन्हें फिर से सीएम बनने का अवसर दिया. लेकिन वे बिहार से बाहर अपने विस्तार के लिए जिस तरह से शराबबंदी को सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बना रहे हैं, वह उनका नुकसान ही करेगा. संघ मुक्त भारत तक का अभियान तो फिर भी एक राजनीतिक एजेंडे की तरह लगता है लेकिन वे पूरे देश में शराबबंदी के मॉडल को अपनाने के लिए रोज-रोज बात कर अति करके रहे हैं और यह अति अब उनके लिए हानिकारक होने वाली है.’ नीतीश कुमार इन दिनों जितने जोर-शोर से शराबबंदी को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वह उनका अब नुकसान करने वाला साबित हो रहा है. भाजपा लचर विपक्ष की भूमिका में है वरना शराबबंदी के इस अभियान को राजनीतिक एजेंडे की तरह पेश करने पर ढेरों सवाल उठते हैं.

महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘इसमें कोई संदेह नहीं कि नीतीश कुमार 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में एक मजबूत दावेदार की तरह होंगे. भाजपा विरोध की राजनीति में देश भर में तीन चेहरे प्रमुख हैं. एक राहुल गांधी, दूसरे अरविंद केजरीवाल और तीसरे नीतीश कुमार. इसमें नीतीश कुमार ज्यादा दमदार और भरोसेमंद लगते हैं लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है. अभी तो बहुत कुछ देखा जाना बाकी है. नीतीश कुमार राष्ट्रीय स्तर पर गठजोड़ बनाने का प्रयास लगातार कर रहे हैं लेकिन अभी तक संगी-साथी के तौर पर झारखंड से बाबूलाल मरांडी मिल सके हैं. राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश कुमार का कद कितना बढ़ेगा, यह उत्तर प्रदेश के चुनाव पर निर्भर करेगा. मायावती अगर जीत हासिल करती हैं तो उनकी राह अलग होगी. अगर मुलायम सिंह की पार्टी जीत हासिल करती है तो फिर मुलायम अपनी आकांक्षा-इच्छा जाहिर कर चुके हैं और इसीलिए वे नीतीश-लालू से मेल-मिलाप के लिए तमाम वादे करके बीच में ही हट भी गए थे. रही बात नीतीश कुमार के संघ मुक्त भारत और शराब मुक्त भारत वाले नारे की तो यह सब नारा तब काम करेगा जब नीतीश कुमार पहले अपने घर यानी बिहार को मजबूत करेंगे. शराब मुक्त भारत का नारा देकर नीतीश कुमार देश भर में इसे बिहार मॉडल के तौर पर स्थापित करने में ऊर्जा लगाए हुए हैं. उनकी यह ऊर्जा व्यर्थ जा रही है. एक तो यह पहले से ही कई राज्यों में लागू है. दूसरा यह कि यह सभी राज्यों को ही सूट नहीं करेगा लेकिन क्षेत्रीय दलों के नेताओं के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है िक वे अपने सम्मोहन से बाहर नहीं निकल पाते. नीतीश कुमार भी उसी सम्मोहन के शिकार हैं. उन्हें लगता है कि शराबबंदी का एेलान करके और कुछ कानून बनाकर उन्होंने अभूतपूर्व काम किए हैं. सच यही है कि अगर दूसरे राज्यों में ज्यादा वे इस विषय पर बोलेंगे तो इन्हें सहयोगी मिलना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि क्षेत्रीय क्षत्रप जो दूसरे राज्यों के सीएम हैं, उनके पास अपने मॉडल हैं और अगर उनके राज्य में जाकर नीतीश कुमार बिहार मॉडल-बिहार मॉडल की बात करेंगे तो उनमें से कोई भी नीतीश के करीब आना पसंद नहीं करेगा.’            

गुलबर्ग मामले में 11 को उम्रकैद

एक विशेष एसआईटी अदालत ने गुलबर्ग सोसाइटी कत्लेआम मामले में 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है. वहीं 12 दोषियों को सात साल जबकि एक अन्य को 10 साल की सजा सुनाई गई. 2002 के गुजरात दंगों में गुलबर्ग सोसाइटी में कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी समेत 69 लोगों की हत्या कर दी गई थी. इससे पहले दो जून को विशेष अदालत ने हत्या और अन्य अपराधों के लिए 11 लोगों को दोषी ठहराया था जबकि विहिप नेता अतुल वैद्य सहित 13 अन्य हल्के अपराधों के तहत दोषी ठहराए गए थे. अदालत ने मामले में 36 अन्य को बरी कर दिया था. बड़े अपराधों के लिए दोषी ठहराए गए लोगों में मुख्य आरोपियों में से एक कैलाश धोबी भी शामिल है, जिसने 13 जून को अदालत में आत्मसमर्पण किया. उसे 2002 में गिरफ्तार किया गया था. इस साल वह फरवरी में अस्थायी जमानत पर रिहा होने के बाद फरार हो गया था. गुलबर्ग सोसाइटी दंगा 28 फरवरी, 2002 को हुआ था. उस वक्त नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. इसने पूरे देश को दहला दिया था क्योंकि तकरीबन 400 लोगों की भीड़ ने अहमदाबाद के केंद्र में स्थित सोसाइटी पर हमला किया था और जाफरी समेत अन्य निवासियों की हत्या कर दी थी.

पाक-बांग्लादेश के हिंदू बनेंगे भारतीय!

मोदी सरकार पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से पलायन करके भारत आने वाले हिंदुओं की नागरिकता संबंधी अपने चुनावी वादे को पूरा करने जा रही है. इन लोगों को जल्द ही भारतीय नागरिकता मिल सकती है. गृह मंत्रालय ने भारतीय नागरिकता कानून, 1955 में प्रस्तावित संशोधन का मसौदा तैयार कर लिया है. मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, जल्द ही इसे कैबिनेट से मंजूरी मिल जाएगी. यह विधेयक इसी मानसून सत्र में संसद में पेश किया जा सकता है. इसमें भारत आने वाले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू नागरिकों को अवैध आप्रवासी नहीं कहा जाएगा. नए कानून से इन देशों के दो लाख से ज्यादा हिंदुओं को लाभ होगा. पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के हिंदुओं की अक्सर यह शिकायत होती है कि उनके साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार किया जाता है. उनके साथ हिंसा की भी आशंका बनी रहती है. वे अक्सर ईशनिंदा कानून के जाल में भी फंस जाते हैं. केंद्र सरकार ने एक ओर जहां हिंदू अल्पसंख्यकों की मदद करने का फैसला लिया है तो दूसरी ओर आर्थिक वजहों से बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले मुस्लिम प्रवासियों को हतोत्साहित किया जा रहा है.

आज के समय में बैंडिट क्वीन बन ही नहीं पाती : गोविंद नामदेव

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फिल्म  ‘सोलर एक्लिप्स’  से आपने भी हॉलीवुड की ओर कदम बढ़ा दिया है. इन दिनों हॉलीवुड जाने की होड़ मची हुई है. एक भारतीय कलाकार के लिए हॉलीवुड की फिल्म करना बड़ी बात क्यों है?

ये बिल्कुल वैसे है जैसे कोई छोटे शहर से बड़े शहर जाना चाहता है. हॉलीवुड फिल्म निर्माण का मक्का है. हिंदुस्तान में बहुत अच्छी-अच्छी फिल्में बन रही हैं, लेकिन हॉलीवुड वालों ने जिस तरह का काम अपने अतीत में किया है और अभी कर रहे हैं उन्होंने साबित किया है कि वे और लोगों से बहुत बेहतर हैं. सो हर एक की इच्छा होती है चाहे वो एक्टर हो, डायरेक्टर हो, टेक्निशियन हो कि वहां जाकर काम करे और उनका काम पूरी दुनिया देखे. उसी के तहत मैंने हॉलीवुड की फिल्म ‘सोलर एक्लिप्स’ चुनी. 

इस फिल्म की क्या कहानी है? आपने ये फिल्म क्यों चुनी?

फिल्म ‘सोलर एक्लिप्स’ हॉलीवुड और बॉलीवुड दोनों का प्रोजेक्ट है. पंकज सहगल भारतीय हैं, दुबई की एक कंपनी इसकी प्रोड्यूसर है और शूटिंग श्रीलंका में हुई है. तकरीबन 70 प्रतिशत एक्टर और टेक्निशियन हॉलीवुड से और 30 प्रतिशत भारतीय हैं. ये फिल्म उस कालखंड की कहानी है जब गांधी जी की हत्या करने की कोशिश की जा रही थी और 1948 में उनकी हत्या कर दी गई थी. महाराष्ट्र उस समय बॉम्बे स्टेट था और वहां साजिश रची गई. मोरारजी देसाई जो उस समय वहां के गृहमंत्री थे उनका किरदार मैं निभा रहा हूं. चूंकि यह एक हॉलीवुड प्रोजेक्ट था और दूसरा मोरारजी देसाई का ऐतिहासिक किरदार था इसलिए मुझे ये फिल्म करनी ही थी.

गांधी, रामानुजन, बाल गंगाधर तिलक पर फिल्में भी हॉलीवुड की ओर से आ रही हैं. आपको नहीं लगता कि हमारे ऐतिहासिक नायकों पर बॉलीवुड से ज्यादा हॉलीवुड में काम हो रहा है. इसकी क्या वजह देखते हैं?

जैसा मैंने बताया कि हॉलीवुड में जो भी विषय चुना जाता है, वह बहुत ही रिसर्च के बाद दर्शकों के सामने रखा जाता है. उनकी तैयारी बहुत बड़े स्तर पर होती है. कहानी, किरदार, सीन, उसका प्रभाव आदि पर खूब चर्चा और शोध किया जाता है. इसमें कभी-कभी कई सालों का वक्त लग जाता है. उनका टेबल वर्क बहुत अच्छा होता है. उसके बाद वे फिल्म बनाना शुरू करते हैं. इस दौरान भी वे बहुत ही पेशेवर तरीके से काम करते हैं. ऐसे माहौल में काम करने का एक अलग मजा होता है. ऐसे में एक कलाकार जिम्मेदारी महसूस करने लगता है और पूरा फोकस उसका काम पर होता है. बॉलीवुड में भी ये हो रहा है. अभी संजय लीला भंसाली ने फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ बनाई जो विश्व स्तर की है. इस तरह के प्रयास बॉलीवुड में होने शुरू हो गए हैं. लोगों का ध्यान इस ओर गया है. अब ऐसे विषयों और किरदारों को खंगाला जा रहा है. मैंने एक नाटक लिखा था, ‘मधुकर शाह बुंदेला’. मुझसे उनके बारे में पूछा गया. माना जाता है कि पहला गदर 1857 में हुआ लेकिन उससे पहले 1842 में एक विद्रोह हमारे बुंदेलखंड में सागर के आसपास हुआ था. अंग्रेजों के खिलाफ पूरा ठाकुर समुदाय खड़ा हो गया था. एक बड़ा विद्रोह हुआ. इसके नायक मधुकर शाह बुंदेला थे. इस विद्रोह को उन लोगों ने बुरी तरह से दबा दिया और दूसरों को इसकी कानोंकान खबर भी नहीं हुई. मधुकर शाह को सागर जेल में ही फांसी दे दी गई थी. पूछा गया मुझसे कि क्या इस पर फिल्म बन सकती है. ये आपके ही सवाल का जवाब है कि बॉलीवुड में भी लोग ऐसे विषयों, कहानियों और किरदारों में रुचि लेने लगे हैं. हर एक का अपना स्तर है काम करने और फिल्म बनाने का.

अब हीरो के ऊपर वैसा दबाव नहीं होता कि वो खलनायक बनेगा तो उसकी छवि खराब हो जाएगी. अभी अक्षय कुमार ‘रोबोट 2’ में खलनायक बनकर आ रहे हैं. तो समय बदल गया है. उनके पास अपनी प्रोडक्शन कंपनी है तो वे जैसे चाहें चीजों को घुमा सकते हैं

फिल्मों में निभाए गए नकारात्मक चरित्रों में आप ज्यादातर भ्रष्ट नेता या फिर पुलिसकर्मी के किरदार में नजर आते हैं, कोई  खास वजह?

नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है. फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में मैं डकैत बना हूं. उसके बाद फिल्म ‘प्रेमग्रंथ’ का खलनायक अलग तरह का है. फिर ‘विरासत’ आई, फिर ‘सरफरोश’, ‘सत्या’, ‘गॉडमदर’, ‘लावारिस’ आईं. ये सभी किरदार अलग तरह के हैं. आज समाज में खलनायक कौन है? या तो राजनेता हैं या फिर पुलिस. अब खलनायक राजनेता है तो मैं राजनेता का रोल करूंगा ही, खाकीवाले हैं तो पुलिसवाला बनूंगा ही.

भारतीय सिनेमा सौ साल का हो चुका है. क्या आपको लगता कि समय के साथ सिनेमा में परिपक्वता आई है?

फिल्म निर्माण में बहुत सारा पैसा लगता है. कोई अच्छा विषय ले आता है तो फिल्म से जुड़े कई लोग यही सलाह देते हैं कि इसमें गाने डाल दो, ग्लैमर डाल दो. इस वजह से वो पूरा विषय ही मर जाता है. हॉलीवुड की तरह बॉलीवुड अभी परिपक्व नहीं हुआ है. हॉलीवुड में जितना पैसा लोगों के पास है उतना यहां नहीं है. यहां पर अभी कुछ ही लोग ऐसे हैं जिनका उद्देश्य है कि उन्हें अर्थपूर्ण फिल्में ही बनानी हैं. लोगों के सामने कुछ अच्छे मुद्दे लाने हैं. हालांकि इसकी भी अपनी सीमाएं हैं. मुझे लगता है कि अभी दस फीसदी ऐसे हैं जो अपने रिस्क पर फिल्मों का निर्माण करते हैं ताकि लोगों में गंभीर सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूकता फैलाई जा सके. अब जैसे प्रकाश झा हैं, वे मुद्दा आधारित फिल्में बनाते हैं. उनके पहले महेश भट्ट भी ऐसी ही फिल्में बनाने के लिए जाने जाते थे. वहीं बाकी के लोग इस नजरिये से फिल्में बनाते हैं कि लोगों का मनोरंजन भी हो जाए और मुनाफा भी. ये है कि बॉलीवुड में अभी भी करोड़ों रुपये दांव पर लगाने वाले कम हैं. कुछ निर्देशक हैं जैसे कि संजय लीला भंसाली, राजकुमार हिरानी और विशाल भारद्वाज जो खास विषयों के साथ आते हैं और विश्व स्तर का सिनेमा बनाते हैं.

Govind-Namdevआजकल की फिल्मों में खलनायकों की जगह बहुत सीमित हो गई है. आज नायक ही खलनायक हैं. आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

हर दशक में बदलाव हुए हैं. नायक का ही खलनायक बन जाना, ये भी एक तरह का बदलाव है. उद्देश्य ये होता है कि लोगों के सामने अलग तरह से कहानी को रखा जाए. क्या शाहरुख कर सकते हैं खलनायक का किरदार? अभी अक्षय कुमार रजनीकांत की फिल्म ‘रोबोट 2’ में खलनायक बनकर आ रहे हैं. तो समय बदल गया है, अब हीरो के ऊपर वैसा दबाव नहीं होता कि वो खलनायक बनेगा तो उसकी छवि खराब हो जाएगी. बड़े कलाकारों के पास अपनी प्रोडक्शन कंपनी है तो वे जैसे चाहें चीजों को घुमा सकते हैं. ये जरूर है कि जो सिर्फ खलनायक का किरदार निभाते आ रहे थे उनके पास अब ज्यादा काम नहीं है. मेरे लिए तो स्थिति उस तरह की नहीं है क्योंकि मैं बीच-बीच में सकारात्मक किरदार भी निभाता चला आ रहा हूं.

अभी तक आपने जो भी किरदार निभाए उसमें आपका पसंदीदा कौन-सा है? ऐसा कौन-सा किरदार रहा जो चुनौतीपूर्ण था?

ऐसे पसंदीदा एक-दो किरदार हैं. जैसे फिल्म ‘विरासत’ का खलनायक एक लकवाग्रस्त व्यक्ति है. उसे करते हुए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी और फिल्म में निरंतरता बनाए रखने के लिए खूब अभ्यास भी करना पड़ा. इस किरदार की लोगों ने बहुत तारीफ की थी. ‘बैंडिट क्वीन’ के बाद ‘प्रेमग्रंथ’ आई और उसके बाद ‘दिल है तुम्हारा’ का खलनायक एक पहाड़ी व्यक्ति है. ‘ओह माई गॉड’ का किरदार, ये सब मेरे लिए पसंदीदा और हमेशा के लिए यादगार किरदार हैं. ‘बैंडिट क्वीन’ का किरदार इतना दबंग, निर्दयी और क्रूर है. ऐसा मैंने देखा नहीं था. एक छोटा-सा संदर्भ है. जब हम इस फिल्म की शूटिंग कर रहे थे तो फूलन देवी ग्वालियर की जेल में बंद थीं. जो भी शूटिंग होती थी उसके बारे में फूलन देवी को बताने के लिए हमारी टीम हर 10 से 15 दिन में जेल जाती थी. एक बार मेरी मित्र कलाकार और फैशन डिजाइनर डॉली अहलूवालिया जो कि फिल्म की कॉस्ट्यूम डिजाइनर थीं, वे भी हमारे साथ गईं.

फूलन देवी ने डांटते हुए कहा, ‘ये तो कुछ भी नहीं है. बाकी बताऊं.’ ऐसा बोलकर उन्होंने ब्लाउज खोलकर छाती दिखाई जहां जख्म से बने हुए गड्ढे थे और बताया कि ये ठाकुरों ने मुझे रेप करते हुए नोचा है. ये क्रूरता जब डॉली ने मुझे सुनाई तो मैं सिहर गया

उन्होंने फूलन देवी से पूछ लिया कि क्या हुआ था और कैसे हुआ था. तकरीबन 45 मिनट तक फूलन ने अपनी कहानी सुनाई तो डॉली रोने लगीं. इस पर फूलन देवी ने डांटते हुए कहा, ‘ये तो कुछ भी नहीं है. बाकी बताऊं.’ ऐसा बोलकर उन्होंने अपना ब्लाउज खोलकर अपनी छाती दिखाई जहां जख्म से बने हुए गड्ढे थे और बताया कि ये ठाकुरों ने मुझे रेप करते हुए नोचा है. ये क्रूरता जब डॉली ने मुझे सुनाई तो मैं सिहर गया. मैंने सोचा कि परदे पर वो किरदार उतना ही निर्दयी और क्रूर दिखाई देना चाहिए कि लोग उसके ऊपर थू-थू करें. ये कुछ किरदार हैं जिन्हें करके मुझे बहुत संतुष्टि हुई. आने वाली पीढ़ी जब हमारे काम को देखेगी तो लगेगा उनको कि कुछ ढंग का काम किया गया.

आपने एनएसडी से प्रशिक्षण लिया और फिर 12-13 साल तक इसी से जुड़े रहे? इस दौरान आपने किस तरह का काम किया? आम तौर पर एनएसडी के बाद लोग सीधे मुंबई भागते है. आपने इतना समय दिल्ली में ही क्यों बिताया?

1975 से 1978 तक मैंने एनएसडी में कोर्स किया. 1978 में एनएसडी की रेपर्टरी कंपनी की ओर से एक साल की फेलोशिप मिल गई. इसमें पेशेवर कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिलता है. यह कंपनी अच्छे नाटक तैयार करती है. यह देश भर में थियेटर को बढ़ावा देने का काम करती है. कोर्स खत्म करने के बाद सवाल था कि मैं अब कहां जाऊं. सतीश कौशिक और अनुपम खेर मेरे साथ के लोग हैं. अनुपम खेर ने तय किया कि वे लखनऊ जाएंगे और एक साल वहां थियेटर के बारे में सिखाएंगे. कुछ लोग सीधे मुंबई चले आए. मुझे लगा कि अभी मेरे अभिनय में उतनी परिपक्वता नहीं आई है. इसलिए मैंने वो फेलोशिप ले ली. इसके बाद काम करते-करते मुझे समझ में आया कि अभी तो अपने अभिनय पर बहुत काम करने की जरूरत है. फिर अपने वरिष्ठों के बारे में पता चला कि फलां ने आठ साल थियेटर किया, किसी ने 10 साल. इसे देख मैंने भी निर्णय किया कि मैं भी आठ से 10 साल थियेटर करूंगा. मन में ये था कि जब मैं ऋषि कपूर या किसी ऐसे ही बड़े कलाकार के सामने परफॉर्म करूं तो उसे देखकर मुझे और दो-चार काम मिल जाएं. उस स्तर की परिपक्वता मुझे अपने अभिनय में चाहिए थी. काम करते-करते मुझे रेपर्टरी कंपनी में रेगुलर कर दिया गया और तकरीबन 11 साल थियेटर से जुड़ा रहा. जर्मनी, पोलैंड और लंदन जाकर हमने शो किए. बहुत कुछ हासिल किया, सीखा. ये मेरा गोल्डन टाइम था और आज भी मुझे रोमांचित करता है. 1990 में लगा कि अब मुंबई जा सकता हूं. मेरा नाम मेरे पहुंचने से पहले ही मुंबई पहुंच गया था इसलिए मुझे ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा. श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी साहब जैसे निर्देशक मुझे पहले से जानते थे.

आपने थियेटर, धारावाहिक व फिल्म में काम किया है. तीनों में क्या अंतर पाया?

इन तीनों विधाओं की अपनी-अपनी चुनौतियां हैं. किसी के बारे में ये नहीं कह सकते कि ये बेस्ट है. थियेटर में आप गड़बड़ी नहीं कर सकते हैं और अगर गड़बड़ी की तो परफॉर्म करने के दौरान ही उसे ठीक करना होता है. फिल्मों के लिए अभिनय करते हुए आपको 100 फीसदी नेचुरल व वास्तविक रहना होता है और साथ-साथ अपना 100 फीसदी इमोशन भी देना होता है. अब इमोशन को लाना और वास्तविक रहना, ये फिल्मों की चुनौती है. फिल्में आपको अमर कर देती हैं. 100 साल बाद भी आपको देखा जा सकता है. फिल्मों में जाने का एक मोह भी था. इसी तरह टीवी गांव-गांव में देखा जाता है. यहां हर कोई सिनेमा देखने हॉल में नहीं जाता है. इसलिए तीनों विधाओं की अपनी चुनौतियां हैं और अपने फायदे हैं.

हाल ही में आप फिल्म  ‘प्रोजेक्ट मराठवाड़ा’  में नजर आए. किसानों की समस्याओं पर बनी फिल्में किस हद तक उनके लिए मददगार साबित होती हैं?

इस तरह की फिल्में अगर अच्छे ढंग से रिलीज हो जाएं और लोगों तक पहुंच जाएं तो निश्चित रूप से इसका असर पड़ता है. आजकल लोगों को पता ही है कि किसान किस तरह की जिंदगी बसर करते हैं. फिल्म ‘प्रोजेक्ट मराठवाड़ा’ एक किसान की जिंदगी की व्यथा को बहुत ही सशक्त ढंग से रखती है. किसान जो देश भर को रोटी देता है उसी के घर में खाने को नहीं है. नीति निर्धारकों ने ये कैसी व्यवस्था दी है? ऐसे नीति निर्धारकों को धिक्कार है. फिल्म देखकर ऐसा महसूस किया जा सकता है. लोगों तक अगर आपकी फिल्म पहुंचती है तो उसका असर होता ही है और ऐसे विषयों पर फिल्में बननी भी चाहिए.

किसानों की आत्महत्या के विरोध में फिल्म इंडस्ट्री से जिस तरह से नाना पाटेकर सामने आए हैं, महाराष्ट्र का बड़ा मुद्दा होने के बावजूद दूसरे कलाकार उस तरह से सामने नहीं आए.

नहीं, कई लोग मदद के लिए आगे आए हैं. आमिर खान ने एक गांव को गोद लिया है. जिनके हाथ में जो है वे वैसा कर रहे हैं. हां, बड़े संगठन सामने नहीं आ रहे हैं. जैसे- प्रोड्यूसर्स गिल्ड है, आर्टिस्ट एसोसिएशन है, ये सामने नहीं आ रहे हैं. समाज में एक तरह का स्वार्थ घर कर गया है, जिसमें सिर्फ अपनी जेब भरने की मानसिकता है. इसमें राजनेता, नौकरशाह जैसे तमाम लोग शामिल हैं. भ्रष्टाचार सिस्टम का हिस्सा बन गया है. इस वजह से किसान आत्महत्या कर रहे हैं. उन्हें बुरी तरह से प्रताड़ित किया जाता है. इन स्थितियों काे देखकर बहुत दुख होता है.

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आपने  ‘बैंडिट क्वीन’  जैसी फिल्म की है और अभी सेंसर बोर्ड की जो स्थिति है कि उसे तकरीबन हर फिल्म से आपत्ति है. फिल्म  ‘उड़ता पंजाब’ विवादों में है. आपको क्या लगता है आज के समय में ‘बैंडिट क्वीन’  रिलीज हो पाती?

नहीं हो पाती… बिल्कुल भी नहीं हो पाती. अगर बनती तो रिलीज नहीं हो पाती. उसकी तो शुरुआत ही गाली से होती है. ये सनसनी फैलाने के लिए नहीं किया गया था. एक औरत के साथ पूरा गांव रेप करता है. आप इसे देख हैरान होते हो, गुस्से से भर उठते हो. सेंसर बोर्ड को थोड़ा उदार होना पड़ेगा. ये एक रचनात्मक काम है. अगर हम बुराई दिखा रहे हैं तो इसलिए दिखा रहे हैं ताकि लोगों में इस बात की चेतना जगे कि ये बुराई मुझमें नहीं आनी चाहिए, मेरे समाज और शहर में नहीं आनी चाहिए. सेंसर बोर्ड को उस उद्देश्य के बारे में सोचना चाहिए कि फिल्म में कोई सीन या संवाद किसलिए रखा गया है. ‘उड़ता पंजाब’ में कट की बात करें तो आपको बताना चाहिए कि आप ये क्यों कर रहे हैं. वो दूसरे की संपत्ति है. पंजाब में इतना सब कुछ हो रहा है तो सामने आना चाहिए. यहां का युवा नशाखोर हो गया है! अगर ये बात ही फिल्म से हटा दी जाएगी तो फिल्म बनाने का उद्देश्य खत्म हो जाएगा. अगर शीर्षक से ‘पंजाब’ हटा दिया जाए तो किसकी बात हो रही है कैसे पता चलेगा. ये स्थितियां दुखद हैं.

‘वर्ष 1896 में पूना में जब प्लेग फैला था तो अंग्रेजी हुकूमत ने लोगों का दमन शुरू कर दिया था. होता ये था कि जिस घर में प्लेग होता था उस घर को अंग्रेज खाली कराकर कब्जा कर लेते थे, यह दावा करते हुए कि इससे प्लेग आगे नहीं फैलेगा’

आप अपनी आने वाली फिल्म- ‘चापेकर बंधु’  और अन्ना हजारे पर एक फिल्म में राजनीतिक और ऐतिहासिक किरदारों में नजर आएंगे. इनके बारे में कुछ बताइए.

मेरी एक फिल्म आ रही है ‘चापेकर बंधु’ जिसमें मैं बाल गंगाधर तिलक का किरदार निभा रहा हूं. वर्ष 1896 में भारत में जब प्लेग फैला था तो अंग्रेजों ने लोगों का दमन शुरू कर दिया था. होता ये था कि जिस घर में प्लेग होता था उस घर को अंग्रेज खाली कराकर कब्जा कर लेते थे, यह दावा करते हुए कि इससे प्लेग आगे नहीं फैलेगा. अंग्रेजों की ओर से ये भारतीयों की संपत्तियां हड़पने की एक साजिश थी. उस वक्त ऐसा हो गया था कि जिस घर में प्लेग हो जाता था भारतीय डर के मारे बताते भी नहीं थे. इसके खिलाफ भारतीय क्रांतिकारी एकजुट हुए. तीन भाइयों- दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर ने एक दल बनाया और पूना के प्लेग कमिश्नर डब्ल्यूसी रैंड की हत्या की साजिश रची गई. तीनों भाइयों ने मिलकर रैंड की हत्या कर दी. उसके बाद अंग्रेजों ने इन तीनों भाइयों को एक-एक कर फांसी दे दी. ये तीनों भाई अनसंग हीरो हैं, जिनके बारे में महाराष्ट्र तक में लोगों को कम जानकारी है. इस दृष्टिकोण से भी ये फिल्म बनाई गई है ताकि लोगों को चापेकर बंधुओं के बारे में पता चल सके. एक फिल्म ‘दशहरा’ आ रही है, जो बिहार के एक भ्रष्ट राजनेता की कहानी है. रावण का अंत दशहरा पर हुआ था. इसलिए इसे ये नाम दिया गया.

आपकी पृष्ठभूमि और अभिनय से जुड़ाव की कहानी क्या है?

मैं सागर में सातवीं कक्षा तक पढ़ा. मन में हमेशा ये रहा कि मुझे बड़ा आदमी बनना है इसलिए बड़े शहर में रहना और पढ़ना है. यही विचार मुझे दिल्ली ले आया. यहां आठवीं से स्नातक तक एक रिश्तेदार के यहां रहकर पढ़ाई की. इस दौरान सांस्कृतिक गतिविधियों में काफी सक्रिय रहा. तो लोगों की तारीफें मिलनी शुरू हो गईं. लोग कहने लगे तुम्हें मुंबई जाना चाहिए, अभिनय करना चाहिए. जहां पढ़ाई करता था, उसके बगल में ही नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा स्थित था. इससे भी माहौल बना. थियेटर की ओर झुकाव होने लगा और मैंने एनएसडी का फॉर्म भर दिया. इसके बाद  मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

सागर से ही आशुतोष राणा और मुकेश तिवारी भी हैं. वे भी खलनायक के रूप में ही प्रसिद्ध हैं. सागर की मिट्टी में कुछ खास है क्या?

ये लोग मेरे बाद सागर से यहां आए. मुंबई पहुंचने तक मेरी तरह इनकी भी हीरो बनने की उम्र निकल चुकी थी. इसलिए इन्हें भी खलनायक का रोल ही मिला होगा. सागर की बात करें तो हम लोग बुंदेलखंडी हैं. वहां के पानी में जोश तो है. एक योद्धा होने की सोच हमेशा जेहन में रहती है. खलनायकों की तरह दादागीरी की बात नहीं है, ये स्वाभिमान की बात होती है. ये तो हमारे अंदर है. थोड़ा एक्स्ट्रा स्वाभिमान जिनके अंदर होता है तो वो दादागीरी में आ जाता है (हंसते हुए) तो जो दादागीरी कर रहा है वो है विलेन.