Home Blog Page 1346

‘नई पार्टी का गठन रमन सिंह के गांव में इसलिए किया ताकि शेर की मांद में घुसकर उसका शिकार करूं’

सभी फोटो : तहलका आर्काइव
सभी फोटो : तहलका आर्काइव
सभी फोटो : तहलका आर्काइव

तीस साल आपने कांग्रेस में बिताए फिर अचानक से पार्टी से मोहभंग होने का क्या कारण रहा?

किसी से कोई मोहभंग नहीं है. दो भावनात्मक कारणों से मैंने नया दल या नई राह पर चलने का फैसला किया. पहला कारण यह कि मुझे लगता है कि एक बेहद गरीब आदिवासी परिवार में पैदा होकर भी मुझे बहुत कुछ मिला. आईपीएस-आईएएस रहा, इंजीनियर, प्रोफेसर, वकील, राज्यसभा और लोकसभा सांसद रहने के अलावा कांग्रेस के अधिकांश बड़े पदों पर रहा. एक समय मैं पार्टी का इकलौता प्रवक्ता था. मुख्यमंत्री भी रहा. यह सब मुझे छत्तीसगढ़ की धरती से मिला. जहां मैं पैदा हुआ. जहां के लोगों ने मुझे इतना प्यार दिया तो जीवन के अंतिम कुछ वर्ष मैं छत्तीसगढ़वासियों को समर्पित करना चाहता हूं. इसलिए अखिल भारतीय भूमिका को छोड़कर केवल छत्तीसगढ़ पर ध्यान केंद्रित करने की ठानी है. यह तभी संभव था कि अपने नेतृत्व में एक आंचलिक दल का गठन किया जाए, जहां सारे निर्णय मैं ले सकूं और सत्ता हासिल करके वो सब किया जाए जो आज राज्य में नहीं हो रहा है. छत्तीसगढ़ के निर्णय छत्तीसगढ़ में नहीं लिए जाते. धान पैदा करने वाला प्रदेश है यह, एक ही उपज होती है लेकिन समर्थन मूल्य दिल्ली से तय होता है. राज्य की भाजपा सरकार ने घोषणा पत्र में तय किया था कि 2400 रुपये प्रति क्विंटल देंगे पर दिल्ली से 1450 रुपये का भाव तय हो गया. राज्य सरकार को मानना पड़ा. लेकिन जब एक आंचलिक सरकार होगी तो दिल्ली से चाहे जितना तय हो, हम राज्य के लिए जो उचित समझते हैं, अपने बजट से देंगे. इसके लिए जरूरी था कि कांग्रेस और भाजपा के अलावा कोई क्षेत्रीय विकल्प भी राज्य की जनता के सामने हो.

राज्य में एक बांध बन रहा है कोलावरम जिसका पूरा फायदा आंध्र प्रदेश को होगा. हमारे 40,000 आदिवासी विस्थापित होंगे, जिनमें दो ऐसी उपजातियां होंगी जो विलुप्त ही हो जाएंगी. इसका विरोध न भाजपा कर सकती है और न कांग्रेस क्योंकि केंद्र सरकार में रहते हुए दोनों ही दल इस बांध के निर्माण को स्वीकृति दे चुके हैं. लेकिन अगर राज्य में किसी तीसरे दल की सरकार होती तो विरोध कर सकती थी. ऐसे ही झारखंड में बन रहे कनहर बांध से छत्तीसगढ़ के 30-35 हजार आदिवासी प्रभावित होंगे. उसका भी हम विरोध नहीं कर सकते. ऐसे अनेकानेक उदाहरण हैं जिसमें राष्ट्रीय दल से बंधे होने के कारण इन दोनों दलों की स्थानीय सरकारें बहुत-सी चीजों का विरोध नहीं कर पातीं. इसी संदर्भ में नक्सलवाद को भी ले सकते हैं. मेरे कार्यकाल में छत्तीसगढ़ देश का सबसे कम नक्सल प्रभावित राज्य था पर आज सबसे अधिक नक्सली घटनाएं यहीं होती हैं. इन समस्याओं का समाधान कोई आंचलिक पार्टी की सरकार ही कर सकती है.

दूसरा कारण है कि छत्तीसगढ़ संसाधनों की दृष्टि से देश का सबसे धनाढ्य प्रदेश है. खनिज संपदाओं का भंडार और समृद्ध वनक्षेत्र है यहां. छत्तीसगढ़ ‘धान का कटोरा’ भी कहलाता है. बावजूद इसके लाभ विकास के सबसे निचले पायदान पर खड़े गरीब आदिवासी तबके तक नहीं पहुंच रहा है. हमारे संसाधनों की खुली लूट मची है. लोहा, पानी, बिजली, सीमेंट, स्टोन सब कुछ राज्य के बाहर जा रहा है पर हम जहां के तहां हैं. अब यह अडानी ले जाए या कोई और ले जाए, हमको क्या फायदा? अडानी ले जाए कोई दिक्कत नहीं पर वो कुछ ऐसा भी तो करे कि प्रदेश के ढाई करोड़ लोगों का जीवनस्तर सुधरे. कहते हैं कि हमारी जीडीपी बढ़ रही है पर वास्तविकता ये है कि उच्च तबके के 200-300 लोगों को छोड़ दें तो निचले तबके के लोग वहीं के वहीं हैं. नीचे के लोग वहीं के वहीं कायम हैं. सोनिया गांधी को यही दो कारण बताकर मैं कांग्रेस से स्वतंत्र हो गया. इसलिए मोहभंग जैसी स्थिति नहीं है.

आपकी पत्नी रेणु जोगी कांग्रेस से सदन में विपक्ष की उपनेता हैं. क्या ऐसा इसलिए ताकि कांग्रेस में वापसी के रास्ते खुले रहें?

मैं छत्तीसगढ़ के बाहर देखना ही नहीं चाहता. इसलिए किसी भी अखिल भारतीय भूमिका में नहीं रहना चाहता था. नतीजतन मैंने खुद को कांग्रेस से अलग किया. अब वापसी का कोई सवाल ही नहीं उठता. रहा सवाल मेरी पत्नी का तो यह मेरा फैसला है, उनका नहीं. उन्हें तो अाखिर तक मेरे इस फैसले की भनक तक नहीं थी. बाद में इस पर हमारे बीच बहस भी हुई.

सलवा जुडूम तो एक जन विरोधी फैसला था. ये एक बड़ी गलती थी जिसके कारण माओवाद ने राज्य में विकराल रूप धारण कर लिया, यह गांव-गांव तक फैल गया. आज हर गांव में कुछ नक्सली हैं

प्रदेश में नक्सलवाद एक बड़ी समस्या है. इससे निपटने का आपके पास क्या रोडमैप है?

तीन मोर्चों पर नक्सलवाद से एक साथ लड़ना होगा जो वर्तमान सरकार आज नहीं कर रही. पहला है, सामाजिक-आर्थिक मोर्चा. बस्तर का आदिवासी आज इस हालत में है कि वहां सड़क, पानी, बिजली कुछ नहीं है. स्कूल है पर शिक्षक नहीं हैं. अस्पताल है तो डॉक्टर नहीं. मुख्यधारा से वे कोसों दूर हैं. उन्हें लगता है कि वे भारत का अंग ही नहीं हैं. बेरोजगारी और अशिक्षा के चलते अतिवाद तो अपने पैर पसारेगा ही. इसलिए जब नक्सली आते हैं और उन्हें हालात सुधारने का आश्वासन देते हैं तो वे उनकी तरफ आकर्षित हो जाते हैं. पहले तो इस मोर्चे पर जमकर लड़ाई लड़नी होगी. मेरे मुख्यमंत्री रहते हुए सरकार की हर गांव तक पहुंच थी. मैं खुद वहां जाता था. इससे उनका विश्वास बनता था. समाज के लोगों को महसूस होना चाहिए कि वे मुख्यधारा के अंग हैं. लेकिन वर्तमान में आदिवासी ऐसा महसूस नहीं करता. वर्तमान सरकार इस ओर ध्यान न देकर बस बंदूक का मुकाबला बंदूक से करना चाहती है.

दूसरा मोर्चा है- राजनीतिक मोर्चा. नेपाल इसका उदाहरण है. वहां माओवादियों से राजनीतिक स्तर पर चर्चा करके समस्या का समाधान खोजा गया. माओवादी आज वहां प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन रहे हैं. हमारे यहां ऐसी राजनीतिक पहल कतई नहीं होती, न बातचीत की और न ही नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में किसी दूसरी विचारधारा को लाने की. वहां के आदिवासी को एक ही विचारधारा प्रभावित कर रही है, एक्सट्रीमिस्ट लेफ्ट या माओवाद की विचारधारा. उसको कोई ऐसी विचारधारा प्रभावित नहीं कर रही कि लोकतांत्रिक तरीके से भी आगे बढ़ा जा सकता है. ये विचारधारा वहां स्थापित की जाए और संभव हो तो बातचीत के दरवाजे खोले जाएं.

तीन में से सिर्फ एक मोर्चा खुला है, वह है- कानून और व्यवस्था यानी बंदूक का मोर्चा. मेरा मानना है कि यह मोर्चा भी जरूरी है. अगर वो बंदूक में विश्वास रखते हैं तो उसका जवाब तो देना पड़ेगा. पर इसमें भी विफल इसलिए हो रहे हैं कि वहां सुरक्षा बलों को स्थानीय निवासियों का सहयोग नहीं मिल रहा. अगर उत्तर में नक्सली डेरा डाले हुए हैं तो दक्षिण बताया जाता है क्योंकि लोगों में उनके प्रति सहानुभूति है. इसलिए ये मोर्चा खुला रहे पर स्थानीय लोगों का विश्वास भी हासिल करना चाहिए. तब सफलता हाथ लगेगी. जब इन तीनों मोर्चों पर लड़ेंगे तभी स्थितियां बदलेंगी.

सरकार तो कहती है कि सलवा जुडूम नक्सलवाद के खिलाफ स्थानीय लोगों का ही कार्यक्रम था और आप कह रहे हैं कि स्थानीय लोग सुरक्षा बलों की मदद को आगे नहीं आते?

देखिए, सलवा जुडूम का तो मैंने पहले ही दिन से विरोध किया था. कांग्रेस के महेंद्र कर्मा जिन्होंने भाजपा के शासनकाल में सलवा जुडूम की नींव रखी, वे मेरे कार्यकाल में मंत्री हुआ करते थे. मेरे समक्ष उन्होंने कई बार एक नक्सल विरोधी सशस्त्र जनांदोलन चलाने का प्रस्ताव रखा पर मैंने हमेशा उसे खारिज कर दिया. इसी कारण कि आम आदिवासी को एके 47 थमाकर नक्सलवादियों का सामना करने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता. उन्हीं महेंद्र कर्मा ने कम्युनिस्ट पार्टी में रहते हुए ऐसा ही एक जनांदोलन चलाया था. उसके आंकड़े मैंने उन्हें दिखाए कि उस जनांदोलन से जुड़ा कोई भी नेता नक्सलियों ने जीवित नहीं छोड़ा. मैंने समझाया था कि सलवा जुडूम का भी यही हश्र होगा और वही हुआ. मेरे ख्याल से सलवा जुडूम को समर्थन देने वाले 25 प्रतिशत ही नेता जीवित बचे होंगे. इसलिए मैंने छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक उसका विरोध किया था. पी. चिदंबरम तब हमारे गृहमंत्री थे. उनके साथ व्यक्तिगत मनमुटाव तक की स्थिति आ गई थी.

सलवा जुडूम के कारण 900 आदिवासी गांवों में कोई इंसानी वजूद नहीं रहा. जो आदिवासी सलवा जुडूम का हिस्सा बने, उन पर नक्सली घात लगाकर वार करते थे. पुलिस तो पूरे 900 गांवों में 24 घंटे रह नहीं सकती. इसलिए सरकार को ज्यादा मुफीद गांव खाली कराना लगा. करीब 900 गांवों के 77 हजार लोगों को विभिन्न कैंपों में बसा दिया. उनसे उनका जल, जंगल और जमीन छिन गया और वे युद्धबंदियों की तरह कैंपों में बसा दिए गए. इसलिए सलवा जुडूम तो एक जन विरोधी फैसला था. अगर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप न होता तो अब भी यह जारी रहता. भाजपा सरकार कांग्रेसी महेंद्र कर्मा के कंधे पर बंदूक रखकर चला रही थी और खुद को पाक-साफ बताने में लगी थी. महेंद्र कर्मा भी खुश था, ये भी खुश थे. मरता तो बस आदिवासी था. मानवाधिकारों की जमकर अनदेखी हुई. सलवा जुडूम वो बड़ी गलती थी जिसके कारण माओवाद ने राज्य में विकराल रूप धारण कर लिया, गांव-गांव तक वह फैल गया. आज हर गांव में कुछ न कुछ ग्रामवासी नक्सली हैं. शायद ही कोई गांव ऐसा हो जहां इस विचारधारा के लोग न हों.

मैंने इन गांवों में समय बिताया है इसलिए कह सकता हूं कि सुरक्षा बलों के लिए ये पहचानना कि ‘क’ नक्सली है और ‘ख’ नक्सली नहीं, असंभव है. गांववाले भी कुछ नहीं बताते. आदिवासी और नक्सली में भेद ही नहीं कर सकते इसीलिए मारने दो को जाते हैं और मार बीस को आते हैं. इस तरह मानवाधिकार नाम की तो वहां कोई चीज ही नहीं है. हमें लोगों में विश्वास बहाली की जरूरत है ताकि वे नक्सलियों की पहचान में मदद करें. वर्तमान में बस आदिवासी पिस रहा है. नक्सली आकर बोलता है, ‘मुझे खाना खिलाओ’ तो उसे खाना खिलाना पड़ेगा. खाना खाकर जब नक्सली आगे बढ़ जाता है तो पुलिस आती है और पूछती है, ‘उसे क्यों खाना खिलाया?’ अब पुलिस गोली मारेगी. अगर नक्सली को मना करेगा तो वो गोली मारेगा. आदिवासी तो दोनों तरफ से मरा न.

ये लुटेरों और भ्रष्टाचारियों की सरकार है. पिछले 13 साल में प्राकृतिक संसाधनों की बेतहाशा लूट हुई है. भ्रष्टाचार चरम पर है. सड़क, बिजली, पानी जैसी सुविधाएं तक दिखाई नहीं देतीं 

राज्य में आदिवासियों के अधिकारों का जमकर उल्लंघन होता है. उनकी एफआईआर तक नहीं लिखी जाती हैं.

पहली बात तो आदिवासी पुलिस के पास जाने की हिम्मत ही नहीं करता. पुलिस के पास जाएगा तो वह उल्टा मारेगी और नक्सलियों के पास जाएगा तो भी पुलिस आकर मारेगी. नक्सलियों की शिकायत पुलिस से करेगा तो भी नक्सली मारेंगे. वो तो हर क्षण अपनी जान को हथेली पर रखकर जी रहा है. और वही मैंने कहा कि सरकार सिर्फ बंदूक की लड़ाई लड़ रही है, बाकी उसे कुछ नहीं दिख रहा.

छत्तीसगढ़ में पहले भी कई क्षेत्रीय दल बन चुके हैं लेकिन किसी को कोई खास सफलता नहीं मिली.

तब के नेतृत्व और परिस्थितियों में आज के हिसाब से बहुत अंतर है. डॉ. खूबचंद बघेल ने ‘छत्तीसगढ़ भ्रातृ संघ’ बनाया. ठाकुर प्यारेलाल सिंह और पंडित सुंदरलाल शर्मा ने भी ऐसे ही प्रयास किए. और भी ऐसे कई विफल प्रयास हुए. कारण यह रहा कि लंबे समय तक कांग्रेस के साथ आजादी के आंदोलन का माहौल था. कांग्रेस खाली बिजली का एक खंभा खड़ा करके भी जीत सकती थी. इसलिए उस समय क्षेत्रीय दलों के उभरने की संभावना नगण्य थी. एक कोशिश विद्याचरण शुक्ल ने भी की. उन्हें इसलिए विफलता हाथ लगी कि चुनाव के महज छह महीने पहले उन्होंने पार्टी बनाई. छह महीने में क्या होता है, तीन महीने तो टिकट बांटने में लग जाते हैं. उन्होंने एक राष्ट्रीय दल छोड़ दूसरा दल भी राष्ट्रीय बनाया. क्षेत्रीय दल बनाते तो कुछ संभावना बनती. क्षेत्रीयता लोगों को लुभाती है. मैंने चुनाव के ढाई साल पहले पार्टी बनाई है ताकि उसे मजबूत करने के लिए पर्याप्त समय मिले.

नई पार्टी के नाम की घोषणा करने के लिए आपने मुख्यमंत्री रमन सिंह के गांव ठाठापुर काे ही क्यों चुना?

अपने घर में तो कोई भी भीड़ जमा कर सकता है. लोगों में संदेश तब जाता जब मैं मुख्यमंत्री के घर में अपनी लोकप्रियता साबित करूं. शेर की मांद में घुसकर शेर का शिकार करूं. रमन सिंह मेरे ठाठापुर जाने की खबर से सकपका गए. पंद्रह सालों में उन्होंने पहली बार वहां रात बिताई. आसपास के गांववालों से मेरी सभा में न जाने का आग्रह किया. फिर भी अभूतपूर्व भीड़ आई जिससे पूरे राज्य को संदेश गया कि अजीत जोगी, रमन सिंह के घर में सभा करके भी हजारों की भीड़ जुटा सकता है.

वर्तमान में कांग्रेस के कितने विधायकों का आपको समर्थन है?

संख्या तो मैं अभी उजागर नहीं करना चाहता. पर छत्तीसगढ़ का ट्रेंड है कि सिटिंग एमएलए नहीं जीतते. पिछले तीन चुनावों में साठ से सत्तर प्रतिशत सिटिंग एमएलए हारे हैं. पिछले चुनाव में 35 सिटिंग एमएलए को कांग्रेस ने टिकट दिया, 27 हार गए. जो आठ जीते उनमें से दो जोगी थे, वो पार्टी से लड़ें या न लड़ते, उनकी जीत तय थी. मतलब 35 में से केवल छह जीते. इसीलिए विधायकों को मैं खास महत्व नहीं देना चाहता. मैंने विधायकों से साफ कर दिया था कि मैं पार्टी का गठन सरकार बनाने के उद्देश्य से कर रहा हूं और एक भी सीट खोने का जोखिम नहीं लूंगा. इसलिए आपको टिकट मिलने की गारंटी नहीं देता. मुझे जब अंत के छह महीनों में आपके क्षेत्र में आपकी स्थिति मजबूत दिखेगी तभी मैं आपको टिकट दूंगा. वरना निष्कलंक, ईमानदार, लोकप्रिय, उत्साही नए चेहरों पर दांव लगाऊंगा.

अगर राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की बात करें तो आप वर्तमान में उसे कहां खड़ा पाते हैं? उसकी दुर्गति के पीछे क्या कारण रहे?

मैं अब छत्तीसगढ़ के बाहर न देखता हूं, न सुनता हूं, इसलिए कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा. बस इतना जरूर कहूंगा कि तथ्यों को देखिए. उसी से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी. आज लोकसभा में केवल 44 सीटें हैं. देश की महज सात प्रतिशत आबादी पर कांग्रेस का राज है, 93 प्रतिशत पर नहीं. इसके बाद पूछने या बताने लायक कुछ रह ही नहीं जाता.

राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी की बातें होती हैं. आपको लगता है कि वे कांग्रेस को उसका खोया वजूद लौटाने में सक्षम हैं?

मैं किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा. इसलिए कोई ऐसी बात नहीं कहना चाहता जिससे लगे कि कोई कड़वापन मेरे मन में है. मैं व्यक्ति विशेष से जुड़े किसी भी प्रश्न पर प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हूं. यही कहूंगा कि यह उनका पारिवारिक मामला है, वही लोग तय करें कि क्या सही है.

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भूपेश बघेल राज्य में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार का कारण आपको बताते हैं. उनके अनुसार आपके जाने से प्रदेश कांग्रेस मजबूत होगी. आपको क्या लगता है?

तीनों बार हार के कारण अलग रहे और कांग्रेस कभी अन्य राज्यों की तरह भारी अंतर से नहीं हारी. एक प्रतिशत या इससे भी कम वोटों के प्रतिशत से हारी होगी. पिछले चुनाव में 30-35 सिटिंग एमएलए को टिकट नहीं देते तो स्थिति अलग होती. तब मैंने विरोध भी किया था. उन्हें पिछले दो चुनावों के नतीजे भी बताए. फिर पार्टी में जैसे फैसले होते हैं, सबने मिलकर फैसला कर लिया और मेरी बात नहीं सुनी गई. 2003 में जरूर मेरी जवाबदारी थी क्योंकि मैं मुख्यमंत्री था. लेकिन तब पार्टी इसलिए हारी कि नक्सलियों ने 12 विधानसभा सीटों पर मतदाताओं को धमकी दे दी कि अगर वोट डालने गए तो हाथ काट देंगे. लोग वोट डालने नहीं आए फिर भी वहां 75 प्रतिशत वोटिंग हो गई. वास्तव में वोटिंग 30-35 प्रतिशत ही हुई थी. भाजपा ने धांधली की थी. केंद्र में तब उनकी सरकार थी. प्रदेश में केंद्रीय बलों की तैनाती का फायदा उठाकर उन्होंने बाजी मार ली. 90 सीटों का राज्य है, अगर 12 सीटें चली जाएंगी तो आप कैसे जीतोगे?

RamanCG

कहा जा रहा है कि रमन सिंह और आप साथ हैं और पार्टी का गठन आपने भाजपा को फायदा पहुंचाने और कांग्रेस का वोट काटने के लिए किया है.

रमन सिंह और मेरा नाता जान लीजिए. 2007 में रमन सिंह के निर्वाचन क्षेत्र राजनांदगांव में लोकसभा उपचुनाव था. मैंने अपने प्रत्याशी की बढ़त बना ली थी. प्रचार के दौरान रमन सिंह के इशारे पर एनसीपी नेता राम अवतार जग्गी की हत्या के फर्जी मुकदमे में पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया. राजनांदगांव से रायपुर लाते तब तक अदालत ने मुझे दोषमुक्त कर दिया. एक अन्य मामले में रमन सिंह ने मुझ पर डकैती का आरोप लगवाया. एफआईआर तो दर्ज हो गई. पर जब चार्जशीट फाइल करने से पहले गवाहों को सुना गया तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया.

ऐसा ही एक फर्जी विवाद मेरी जाति को लेकर भी है. मैं आईएएस था, तब मेरी जाति पर किसी ने बात नहीं की. 1986 में कांग्रेस से जुड़ा तो हाई कोर्ट में मेरे खिलाफ याचिका लगाई गई कि मैं आदिवासी नहीं हूं. उसका फैसला मेरे पक्ष में आया. भाजपा फिर जबलपुर हाई कोर्ट पहुंची. पहले सिंगल बेंच ने फिर डबल बेंच ने भी फैसला मेरे पक्ष में सुनाया. 2003 विधानसभा चुनाव के ऐन वक्त आदिवासी आयोग ने मुझे गैर-आदिवासी घोषित कर दिया. आयोग के अध्यक्ष तब भाजपा सांसद दिलीप सिंह भूरिया थे. यह रमन सिंह के इशारे पर हुआ था. मैं इसके खिलाफ अदालत पहुंचा. तब भी फैसला मेरे पक्ष में ही हुआ. रमन सिंह ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. फिर मेरी जीत हुई. मेरे बेटे अमित जोगी पर भी हत्या का एक झूठा मुकदमा चलाया. वह निचली अदालत से बरी हुआ तो रमन सिंह हाई कोर्ट पहुंच गए, वहां से भी बरी हुआ तो सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. अब भी कहेंगे कि मेरे और उनके बीच सांठ-गांठ है! अगर भाजपा से मेरी दोस्ती होती तो देखिए मुझसे कितना प्यार करते हैं.

हाल ही में मैंने अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले की जांच कर रहे ईडी और सीबीआई को चिट्ठी लिखी है. रमन सिंह ने भी वही हेलीकॉप्टर खरीदे हैं और उसी आरोपी शख्स से खरीदे हैं. इसके सबूत देते हुए मैंने रमन सिंह व उनके बेटे को घोटाले में अभियुक्त बनाने की मांग की है. यह किसी दोस्ती का प्रमाण नहीं है. अगर दोस्ती का प्रमाण चाहिए तो छत्तीसगढ़ सदन में विपक्ष के कांग्रेसी नेता टीएस सिंहदेव, भूपेश बघेल और रमन सिंह की दोस्ती के लीजिए. 2003 से भूपेश बघेल पर भ्रष्टाचार के चार मुकदमे चल रहे हैं. अब तक रमन सरकार ने एक में भी चार्जशीट दाखिल नहीं की. वहीं टीएस सिंहदेव को अंबिकापुर में 150 से 200 करोड़ रुपये की 53 एकड़ जमीन गलत तरीके से आवंटित की गई है. ये मिले-जुले हैं या हम लोग मिले-जुले हैं?

वादा है कि सारे फैसले रायपुर से होंगे. केंद्र के फैसले हम खुद पर नहीं लादने देंगे. संसाधनों की लूट को रोकेंगे. संसाधन बाहर जा रहे हैं तो उसका लाभ प्रदेश को हो, ऐसा सुनिश्चित करेंगे

रमन सिंह से आपकी साठ-गांठ साबित करने के लिए अंतागढ़ उपचुनाव के टेपकांड की दलील दी जाती है.

जिस टेप का उल्लेख ये लोग करते हैं, उसमें जिस व्यक्ति से बातचीत है उसी व्यक्ति से भूपेश बघेल की बातचीत का एक और टेप है जिसमें भूपेश कह रहा है कि अजीत जोगी का इस तरह का टेप बनाकर दो, मैं तुम्हें दो करोड़ रुपये दूंगा और कांग्रेस पार्टी में महामंत्री बनाऊंगा. ये टेप हमारे तथाकथित टेप से पहले का टेप है. भूपेश बघेल ने भी स्वीकारा है कि टेप में उन्हीं की आवाज है. मैंने मामले में खुलासा करने वाले अंग्रेजी अखबार के खिलाफ अदालत में अवमानना का मुकदमा किया है. वो केस तो हम जीतेंगे ही, साथ ही अब भूपेश बघेल को भी मामले में अभियुक्त बनाने की अर्जी दी है. पहले कांग्रेस का हिस्सा होने के कारण मेरे हाथ बंधे थे, वह प्रदेश अध्यक्ष था.

वर्तमान राज्य सरकार के कामकाज को किस तरह देखते हैं?

ये लुटेरों और भ्रष्टाचारियों की सरकार है. पिछले 13 साल में प्राकृतिक संसाधनों की बेतहाशा लूट हुई है. भ्रष्टाचार चरम पर है. मेरे समय में 4 हजार करोड़ के सालाना बजट में सरकार चल रही थी, आज 73 हजार करोड़ का बजट है. फिर भी सड़क, बिजली, पानी जैसी सुविधाएं तक दिखाई नहीं देतीं. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं. किसी को परवाह नहीं. सब अपना हिस्सा बटोरने में लगे हैं. इसलिए ये नए दल के गठन का सबसे उचित समय था. जनता का मन बन गया है इस सरकार को उखाड़कर फेंकने का. पर उन्हें कोई विकल्प नहीं दिख रहा था, अब हमारी पार्टी ही विकल्प है.

कहा जा रहा है कि आपने पार्टी का गठन कांग्रेस से निष्कासित अपने बेटे अमित जोगी को स्थापित करने के लिए किया है.

निष्कासित तो वो बहुत पहले हो गया था और मैं चाहता तो वो बहाल भी हो जाता. मुझे बार-बार कांग्रेस की अंतरिम कमेटी के सामने उसे बुलाने को कहा भी गया. पर मैं ही तैयार नहीं हुआ. प्रश्न स्वाभिमान का था. प्रदेश कांग्रेस ने अमित का पक्ष जाने बिना ही उसे पार्टी से निकाला तो बिना बुलाए ही वापस लेना था. मेरी पार्टी के गठन का अमित से कोई लेना-देना नहीं है.

एक नई पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर जनता से क्या वादे करते हैं?

फिलहाल दो ही वादे करूंगा. पहला, राज्य के सारे फैसले रायपुर से होंगे. केंद्र के फैसले हम खुद पर नहीं लादने देंगे. संसाधनों की लूट को रोकेंगे. अगर हमारे संसाधन बाहर जा रहे हैं तो उसका लाभ प्रदेश की ढाई करोड़ आबादी को हो, ये सुनिश्चित करेंगे. देश की सबसे अमीर धरती के लोगों का सबसे गरीब होना विरोधाभास है.

रज्जाक भाई! आपका बहुत-बहुत शुक्रिया, मुझे मेरी ईदी देने के लिए…

AapBeetiweb
इलस्ट्रेशनः तहलका अार्काइव

ईद के दिन छुट्टी होती है लेकिन निजी क्षेत्रों में काम करने वालों को ये सौभाग्य कहां मिलता है. उस दिन मुझे एक जरूरी बिजनेस मीटिंग के लिए गाजियाबाद जाना था. दिन के करीब 11 बजे मैं गाजियाबाद पहुंचा. वहां एक वरिष्ठ साथी अपनी कार से आए. वे कार से बाहर निकले और हमारी बातचीत शुरू हो गई. इस दौरान मैंने अपना स्मार्ट फोन कार की छत पर रख दिया. थोड़ी देर बाद हम कार में बैठ गए और बातचीत में तय हुआ कि मेरे वरिष्ठ साथी मीटिंग में अकेले जाएंगे और मुझे उनका इंतजार गाजियाबाद ऑफिस में ही करना है.

इसके बाद कार से निकलकर मैं ऑफिस की ओर बढ़ चला. थोड़ी देर बाद अहसास हुआ कि मैं अपना फोन गंवा चुका हूं. लेकिन मुझे लगा कि मैंने फोन कार में छोड़ा होगा. मैंने फेसबुक पर अपने साथी को मैसेज छोड़ा लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया. घंटे भर बाद मैंने अपने नंबर पर फोन किया तो वह स्विच ऑफ मिला. इसके बाद मेरी चिंता थोड़ी बढ़ गई. हालांकि उस वक्त मैं यह भी तय नहीं कर पा रहा था कि मेरा फोन खो गया था या नहीं. मैंने याददाश्त को झकझोरा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. मैंने कई बार अपने नंबर पर फोन मिलाया पर वह स्विच ऑफ रहा. अब मुझे यकीन हो गया कि फोन खो गया था.

तनाव हावी हो रहा था क्योंकि इस महीने की तनख्वाह रूम के किराये और छोटी बहनों की स्कूल-कोचिंग फीस में खर्च हो चुकी थी. अब नए फोन के लिए पैसे बचे नहीं थे. एक अजीब-सी उदासी पसर रही थी. आज के समय में स्मार्ट फोन खोने का अपना दुख होता है. पूरा दिन निकल चुका था, शाम सात बजे घर पहुंचा लेकिन किसी को कुछ बताया नहीं. तभी छोटी बहन का फोन बजा, उस तरफ छोटा भाई था. उसने बताया कि मेरा फोन नोएडा सेक्टर 62 के किसी शख्स के पास है और वह उसे लौटाना चाहता है. उसका फोन कटते ही दोस्त बृजेश का फोन आया. वह एक सांस में बोलता चला गया, ‘कहां हो तुम, तुम्हारा फोन खो गया है. एक लड़का तुम्हारा फोन वापस करने के लिए आधे घंटे से खड़ा है. जाकर ले लो नहीं तो वो चला जाएगा.’

मेरा दिन जिस तरह से तनावग्रस्त था वह रात उतनी ही खुशनुमा हो गई थी. ईद पर मैंने जमकर सेवइयां खाईं और डिस्को गया

मैंने पूछा लड़का कहां है, मेरी उससे बात कैसे हो पाएगी. पता चला कि वह नोएडा सेक्टर 12-22 में एक मिठाई की दुकान के पास खड़ा है और जल्दी में है क्योंकि उसे किसी पार्टी में जाना था. दरअसल, शाम के 8 बज चुके थे. जिनके पास मेरा फोन था उन्होंने मेरे कई दोस्तों को फोन करके इस बारे में जानकारी दे दी थी. इस वजह से मुझे कहां जाकर उनसे मिलना है, इसे लेकर थोड़ा कन्फ्यूजन हो गया था. इसी कन्फ्यूजन में मेरी एक दोस्त दीपाली फोन लेने सेक्टर 62 पहुंच भी चुकी थी. बहरहाल मैं छोटी बहन का फोन साथ लिए सेक्टर 12-22 भागा. वहां पता चला कि उस मिठाई की दुकान की चार शाखाएं हैं. मैंने फोन लगाया तो उन्होंने एक एटीएम के पास वाली मिठाई की दुकान पर खड़े होने की बात कही. मैं वहां पहुंचा पर उनसे मुलाकात नहीं हो पाई. एटीएम के अंदर जाकर कुछ लोगों से पूछ डाला, ‘हाय, मैं जनार्दन, क्या आप मेरा फोन लौटाना चाहते हैं?’ पसीने से तरबतर बनी हुई शक्ल और ऐसे सवाल की वजह से लोग मुझे पागल समझ रहे थे. मैंने फिर उन्हें फोन लगाया और उसी के साथ उस फोन का बैलेंस भी खत्म हो चुका था. जल्दबाजी में बटुआ लाना भी भूल गया था. अजीब असहायों जैसी स्थिति हो गई थी. कुछ लोगों से एक कॉल करने का आग्रह भी किया लेकिन जवाब मिलता कि बैलेंस नहीं है.

कुछ देर की मशक्कत के बाद एक युवक ने मेरी मदद की. मैंने उस शख्स को फिर कॉल किया तो उन्होंने कहा, ‘भाई, तुझे फोन लेना है तो बता. कब से खड़ा हूं, तू आ ही नहीं रहा.’ खैर इसके बाद मेरी उनसे मुलाकात हुई. मेरा फोन मेरे हाथ में था और मैं उन्हें धन्यवाद दे रहा था. उनसे गले लगा और पूछा, ‘आपके लिए क्या कर सकता हूं?’ इस पर वे बाइक पर बैठते हुए बोले, ‘भाई, ईद की पार्टी में जा रहा हूं, तुझे चलना हो तो बता.’ उस शख्स का नाम रज्जाक है. फोन मिलने के बाद मैं उनके साथ ही चला गया. जमकर सेवइयां खाईं, कई और दोस्त मिल गए. सबको गले गलाया और फिर एक डिस्कोथेक गए. मेरा दिन जिस तरह से तनावग्रस्त था वह रात उतनी ही खुशनुमा हो गई थी. रज्जाक भाई, बहुत-बहुत शुक्रिया, मुझे मेरी ईदी देने के लिए.

लखनऊ का मतलब सिर्फ नवाब नहीं बल्कि कहार और ब्रास बैंड वाले भी हैं : नदीम हसनैन

NadeemHasnainWEB

लखनऊ पर जितनी किताबें हैं उतनी हिंदुस्तान के बहुत कम शहरों पर लिखी गई हैं. इन सबके बीच आपकी किताब किस तरह से अलग है?

दिल्ली और कलकत्ता जैसे शहरों के बारे में जो लिखा गया है उन्हंे मैंने उतनी गहराई से नहीं पढ़ा है. मगर यह काम चूंकि मैं एक रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत कर रहा था तो लखनऊ पर जो भी अहम लिखा गया है मैंने उसे पढ़ा है. यह किताब शोध का नतीजा है, कमरे में बैठकर कुछ सोचते हुए नहीं लिख दी गई. जब मैं इसकी आउटलाइन बना रहा था तब मेरे दिमाग में सबसे ज्यादा जो चीज घूम रही थी वह यह थी कि आज का जो लखनऊ है वह एक थका हुआ लखनऊ है. एक मरीज की तरह जिंदगी के लिए तरस रहा है. वह यह तो कह रहा है कि हम जो बदलाव हैं उनके साथ समझौता करने को तैयार हैं लेकिन हमारे अतीत को बिल्कुल दफन न करो. मैंने लखनऊ के बारे में इसके पहले जितना भी पढ़ा मेरे दिमाग में एक बड़ा प्रोटेस्ट जैसा होता था कि क्या लखनऊ का मतलब सिर्फ नवाब या पैलेस कल्चर या उनकी बेगमात या उनकी मुताही बीवियां या उनकी अय्याशियां या बटेरबाजियां ही हैं. क्या लखनऊ में सिर्फ यही सब था? या बहुत ज्यादा अगर कोई आगे बढ़ा तो उसने वाजिद अली शाह ने किस तरह इस शहर में एक सेकुलर कम्पोजिट कल्चर को जन्म दिया उस पर लिखा. क्या महलों के बाहर लखनऊ नहीं था? और लखनऊ था अगर तो आपने उस पर कुछ लिखने की जरूरत क्यों नहीं समझी? पैलेस कल्चर, नवाबी दौर के स्मारक, 1857 का गदर और खान-पान… इन्हीं पर ज्यादातर लिखा गया. इस वजह से दूसरी महत्वपूर्ण चीजें छूट गईं. इस किताब में उसी ‘अदर लखनऊ’ पर लिखने की कोशिश है.

तो आपके इस ‘अदर लखनऊ’ में कौन-कौन है?

बहुत सारे लोग हैं. बहुत सारी चीजें हैं जिन पर उस तरह नहीं लिखा गया जैसे लिखा जाना चाहिए था. मिसाल के तौर पर कहार मुझे हमेशा याद रहते हैं. इसलिए कि पचास के दशक में मेरी मां डोली से आती-जाती थीं. ये बहुत अहम लोग हैं. अच्छी-खासी आबादी है इनकी पर कभी कुछ नहीं लिखा गया. जो ब्रास बैंड प्लेयर है, वह बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना है. उस वक्त खुद उसकी जिंदगी में कितने गम हैं जब वो दूसरे की शादी में झूम-झूमकर बैंड बजा रहा है. लखनऊ की बात करते हुए हमको इन्हें भी याद रखना होगा. जो कनमैलिए और मालिशिए यहां आज भी दिख जाते हैं, उनके बारे में भी जानने की कोशिश करनी होगी. यहां के फेरी वाले दूसरी जगहों से एकदम अलग हैं… गस्साल और गोरकन (मुर्दे को गुस्ल देने वाला और कब्र खोदने वाला) इनके बिना क्या आपका काम चल सकता है? लखनऊ के समाज में इनका क्या दखल है इस पर भी बात होनी चाहिए. ये जो तमाम लोग हैं ये भी तो लखनऊ को बनाते हैं, इनके बारे में क्यों नहीं लिखा गया? इसके अलावा कला, संस्कृति और समाज से जुड़े बहुत सारे विषयों पर लिखा गया है. इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात मैं ये जोड़ दूं कि लखनऊ को लेकर जो ‘मुस्लिम-नेस’ है वह हमेशा बहुत हावी रही है, जिसमें शिया सबसे ऊपर रहे हैं, शायद इसलिए कि सत्ता यहां शियाअों की रही. मेरे दिमाग में ये भी था इसलिए जब मैंने इस किताब के लिए लेखिका सैंडि्रया फ्रिटैग से लखनऊ का सांस्कृतिक इतिहास लिखने को कहा तो मैंने खास तौर पर उनसे फरमाइश की थी कि मुझे लखनऊ का राजनीतिक इतिहास नहीं चाहिए. नवाबों का सत्ता संघर्ष, षडयंत्र, वो चालबाजियां, ये सब मुझे नहीं चाहिए. मुझे यह बताइए कि लखनऊ में किस तरह के सांस्कृतिक तंत्र विकसित हुए? उसकी वजहें क्या थीं? उन्होंने एक अलग नजरिये से बहुत ही उम्दा लेख लिखा है. पिछले दस-पंद्रह साल में लखनऊ में हुए विकास को अब तक किताबों में नहीं शामिल किया गया है, जैसे दलित कल्पनाओं का जो अध्याय मैंने लिखा है वह एकदम नई चीज है.

आपकी किताब पढ़ते हुए लखनऊ पर लिखी गई दो मशहूर किताबों की याद आती है- अब्दुल शरर की गुजि्शता लखनऊ और कदीम लखनऊ की आखिरी बहार. इन पर क्या राय है?

कदीम लखनऊ की आखिरी बहार तो मेरी बेहद पसंदीदा किताब है. उसमें जाफर हुसैन साहब के जो निजी तजुर्बे और किस्से हैं वे उस किताब को बहुत समृद्ध बना देते हैं. मैंने अपनी किताब में भी कुछ निजी अनुभवों के जरिए ऐसा ही करने की कोशिश की है. पर एक रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम करते हुए इसकी गुंजाइश बहुत ज्यादा नहीं थी. हालांकि निजी अनुभवों और किस्सों को डालने से कई जगहों पर पूर्वाग्रह आ जाने अथवा तथ्यात्मक तौर पर गलत हो जाने का खतरा भी रहता है, मगर जाफर हुसैन की किताब की सबसे बड़ी खूबी ये है कि लखनऊ के समाज पर लिखते हुए वो उस सेक्टेरियन बायस (सांप्रदायिक पूर्वाग्रह) यानी शिया-सुन्नी से मुक्त रहे जिसका शिकार लखनऊ पर लिखने वाले ज्यादातर लेखक आज भी हो जाते हैं. एक बात ये कि शरर और जाफर हुसैन की किताब को एक-दूसरे के समानांतर न रखकर एक-दूसरे के साथ समझा जाना चाहिए क्योंकि शरर जाफर हुसैन से पहले की बात कर रहे हैं. अगर ऐसा करेंगे तो पूरे सौ-डेढ़ सौ बरस की चीजें हमको मिल जाती हैं. तो पहले शरर को पढ़ना चाहिए और फिर जाफर हुसैन को.

TheOtherLucknowWEB

लखनऊ में हिंदू और मुस्लिम संस्कृतियां इस तरह घुलमिल गईं कि एक नई संस्कृति बनी जो न मुस्लिम है, न हिंदू. ये दोनों जहां मिलते हैं लखनवियत वहां से शुरू होती है. मगर लखनऊ पर लिखते वक्त एक चुनौती हमेशा रहती है कि उच्च वर्गीय मुस्लिम कल्चर या उसमें भी शिया कल्चर इतना उभरकर आता है कि बाकी चीजें दब जाती हैं. आपने इसे कैसे देखा?

ये बात सही है. इसलिए कि पुराने लिखने वालों की जो ‘मुस्लिमनेस’ थी वो ज्यादा थी या शायद उस जमाने में वो कल्चर सत्ता की वजह से ज्यादा प्रभावी भी था. खास तौर पर शियाओं की दुनिया में अवध को एक केंद्रीयता हासिल थी. तो लिखने वाला इस बात से एकदम बाहर नहीं निकल सकता था. मैं इसलिए लिख पाया कि हमारे वक्त के लोग शायद उस जादू से निकल चुके थे या उनके दौर में वो जादू नहीं बचा था. हमारी सोच भी पहले वालों से अलग थी. तब हाशिये के लोगों पर लिखने का रिवाज ही नहीं था. तो हमारी या हमसे बाद की पीढ़ी ने लखनऊ को उस वक्त देखा जब लखनऊ बिल्कुल बदल चुका था. इस दौर में लखनऊ की मुस्लिमनेस बहुत हद तक हल्की हो गई थी और एक नया का लखनऊ आ चुका था जिसमें पुराने दौर के लखनऊ की निशानियां पुराने लखनऊ में ही सिमट गई थीं. जैसा हैदराबाद में हुआ. लखनऊ के मामले में फर्क यह है कि यहां का नॉस्टेल्जिया हैदराबाद या दिल्ली से काफी मजबूत है. उसकी कई वजहें हो सकती हैं. दिल्ली तो कल्चरल एम्नीशिया (सांस्कृतिक भुलक्कड़ी) का शहर हो चुका है. वो अपने पुराने वैभव के बारे में सबकुछ भूल चुका है. अब एक बिजनेस की तरह उसे हैरिटेज वॉक वगैरह करके बाजार की मदद से रिवाइव किया जा रहा है. लखनऊ में अब भी हालात उतने खराब नहीं हुए हैं.

अगर हम चाह भी लें तो क्या संस्कृति को बदलने से रोका जा सकता है?

नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. बदलाव नहीं रोका जा सकता. सांस्कृतिक बदलाव तो होगा ही. आप यूं समझिए कि हम नई चीजों को अपना रहे हैं. नई संस्कृति, नया फैशन मगर उसके साथ ही हम अपने अतीत की अहमियत भी समझ रहे हैं, दूसरों को समझा रहे हैं. बीच-बीच में हम रिवायती चीजों पर भी तवज्जो दे रहे हैं. तो इस तरह से सांस्कृतिक ह्रास को कम किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए हमें बहुत प्रतिबद्धता और संजीदगी से काम करना होगा.

इस तरह के रिवाइवल में एक खतरा ये रहता है कि हम अतीत की बहुत-सी बुराइयों या बेकार चीजों को भी महिमामंडित करने लगते हैं, हो सकता है कि नवाबी दौर में वो उपयोगी रही हों मगर आधुनिक समाज में उनका महिमामंडन कैसे किया जा सकता है?

ये बिल्कुल सही बात है. ये बहुत बड़ी मगर बहुत आम समस्या है. ये समस्या उन लोगों के साथ आती है जो किसी शहर को सिर्फ उसकी सामंती विरासत से जोड़कर देखते हैं. अच्छे-बुरे का चुनाव करना नहीं जानते. हैं. ये शहर को समग्रता में नहीं देख पाते. लखनऊ का दुर्भाग्य यही है. इसमें मैं सबसे ज्यादा दोष लेखकों को ही देता हूं. वे लखनऊ के कोठों, मुर्गबाजी, बेशुमार निकाहों को महिमामंडित कर रहे, इसके दूसरे पक्ष पर कुछ नहीं लिख रहे. इससे ये चीजें नई पीढ़ी के दिमाग में और मजबूत होती हैं. वो समझता है सिर्फ यही लखनऊ है. अरे कुछ और भी तो लखनऊ था न, मैंने उसी लखनऊ पर लिखने की कोशिश की है.

अनिल कुंबले : चुनौतियां ज्यादा, समय कम

All Photos : BCCI
All Photos : BCCI
All Photos : BCCI

अनिल कुंबले के नाम के जिक्र के साथ ही उनसे जुड़ी उपलब्धियां आंखों के सामने तैर जाती हैं. यह पूर्व लेग स्पिनर भारत का सर्वकालिक सफल गेंदबाज है. इंग्लैंड के जिम लेकर के बाद वे पारी के सभी दस विकेट चटकाने का अद्भुत कारनामा करने वाले विश्व के दूसरे और भारत के इकलौते गेंदबाज हैं. उन्हें 2002 में एंटीगुआ में वेस्टइंडीज के खिलाफ खेले टेस्ट मैच के लिए भी याद किया जाता है जब वे टूटे जबड़े के साथ मैदान पर गेंदबाजी के लिए उतर आए थे. 2008 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने वाले कुंबले आज फिर से भारतीय क्रिकेट टीम के ड्रेसिंग रूम का हिस्सा बन गए हैं. लेकिन इस बार एक नई और पहले से कहीं बड़ी जिम्मेदारी के साथ. एक लंबी चयन प्रक्रिया के बाद पिछले दिनों भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने अनिल कुंबले को अगले एक साल के लिए टीम का नया कोच नियुक्त किया है. उन्होंने अपना पदभार संभाल लिया है. वे टीम के साथ वेस्टइंडीज दौरे पर अपनी पहली चुनौती का सामना कर रहे हैं. क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में भारत को विश्व की नंबर एक टीम बनाने का सपना साकार करने में जुटे कुंबले के सामने कई चुनौतियां हैं लेकिन उनके पास उनसे पार पाने के लिए समय शायद कम है.

कोच के तौर पर कुंबले के साथ केवल एक साल का करार किया गया है ताकि उनकी काबिलियत को परखा जा सके. बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर कहते हैं, ‘इस एक साल के दौरान कुंबले को एक महान खिलाड़ी से एक महान कोच में खुद को ढालना है, ऐसी हम उम्मीद करते हैं. यह एक पेशेवर नियुक्ति है और ऐसी नियुक्तियां सभी संभावनाओं को ध्यान में रखकर की जाती हैं. कुंबले अब टीम ड्राइविंग की सीट पर हैं और एक साल के लिए हम उन्हें चाबी दे चुके हैं. अब उन्हें खुद को साबित करना है.’

इस एक साल के दौरान भारत को कुल 17 टेस्ट (चार वेस्टइंडीज में और 13 भारत में), घरेलू जमीन पर ही आठ एकदिवसीय और तीन टी-20 मैच खेलने हैं, साथ ही जून में इंग्लैंड में होने वाली चैंपियंस ट्रॉफी में भी भाग लेना है. लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि कुंबले पर भरोसा इसलिए जताया गया कि वे विदेशी जमीन पर भारतीय टीम को जीत दिला सकें. वहां भारतीय स्पिनरों के लचर प्रदर्शन को सुधार सकें. क्रिकेट सलाहकार समिति (सीएसी) के सामने कुंबले ने टीम के भविष्य की तैयारियों को लेकर जो प्रस्तुति दी, उसमें भी इसी बात पर जोर दिया कि कैसे गेंदबाजी के क्षेत्र में टीम को मजबूत बनाया जाए और युवा खिलाड़ियों को अंडर-19 स्तर से ही इस तरह तैयार किया जाए कि वे भविष्य में देश के लिए घरेलू पिचों पर ही नहीं, बाहरी पिचों पर भी निरंतर उम्दा प्रदर्शन कर सकें. उनका ज्यादातर जोर इसी बात पर रहा कि उपमहाद्वीपीय परिस्थितियों के बाहर टीम के प्रदर्शन को सुधारा जा सके, जो टीम की सबसे कमजोर पक्ष रहा है.

उपमहाद्वीप से बाहर की परिस्थितियों से तालमेल बिठाने में कुंबले भी अपने शुरुआती करिअर में जूझते नजर आए थे. उन्हें घरेलू शेर बताया जाता था

लेकिन उनके एक साल के कार्यकाल के दौरान टीम भारत के बाहर चार टेस्ट मैच ही खेलने वाली है. वह भी टेस्ट क्रिकेट में आठवें पायदान की उस कमजोर वेस्टइंडीज के खिलाफ जिससे 2002 के बाद से भारत कभी कोई द्विपक्षीय सीरीज नहीं हारा है. इसलिए कैरेबियाई दौरे पर शायद ही भारत को किसी चुनौती का सामना करना पड़े. इसके अलावा भारत को बांग्लादेश के खिलाफ एक टेस्ट, न्यूजीलैंड के खिलाफ तीन टेस्ट और पांच एकदिवसीय, इंग्लैंड के खिलाफ पांच टेस्ट और तीन एकदिवसीय व तीन टी-20 और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चार टेस्ट मैचों की मेजबानी करनी है. अगर घरेलू मैदानों पर टीम के पिछले छह सालों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो टीम ने कुल 26 टेस्ट मैच खेले हैं जिनमें से 18 में उसे जीत मिली, तीन में हार और बाकी ड्रॉ रहे हैं. वहीं पिछले दस टेस्ट से भारत अपराजित रहा है, इन 10 में से 9 मुकाबले बड़े अंतर से जीते गए हैं. इस दौरान उसने विश्व की चोटी की टीम दक्षिण अफ्रीका को जहां चार मैचों की सीरीज में 3-0 से पराजित किया तो वहीं मजबूत ऑस्ट्रेलियाई आक्रमण का 4-0 से सूपड़ा साफ कर दिया. वेस्टइंडीज और न्यूजीलैंड ने दो-दो टेस्ट मैचों की सीरीज खेली और उन्हें भी ह्वाइटवॉश झेलना पड़ा. केवल इंग्लैंड ही रहा जो अपनी इज्जत बचा सका और 2012 में 4 मैचों की टेस्ट सीरीज 2-1 से अपने नाम की. घरेलू मैदानों पर भारत के इस वर्चस्व में सबसे बड़ा योगदान भारतीय गेंदबाजी की ताकत उस स्पिन आक्रमण का रहा जो विदेशी मैदानों पर जाकर फिसड्डी साबित होता है. इंग्लैंड अगर सीरीज अपने नाम कर सका तो सिर्फ इसलिए कि उसकी ग्रीम स्वान और मोंटी पनेसर की स्पिन जोड़ी भारतीय स्पिनरों से बीस साबित हुई.

इसलिए बांग्लादेश, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया अपने आगामी भारत दौरे पर घरेलू जमीन पर भारत के वर्चस्व को चुनौती दे पाएंगे, ऐसा असंभव ही है. न्यूजीलैंड 1955 से ही आज तक भारत में कोई टेस्ट सीरीज नहीं जीत सका है और 1988 से पहली टेस्ट जीत के लिए तरस रहा है. ऑस्ट्रेलिया का भी यही हाल है, उसने 2004 के बाद से भारत की जमीन पर कोई टेस्ट मैच नहीं जीता है. एकदिवसीय में न्यूजीलैंड ने 1975 से अब तक भारत की जमीन पर कोई सीरीज अपने नाम नहीं की है. अब तक खेले कुल 27 में से 21 मुकाबलों में उसे यहां पटखनी खानी पड़ी है. वहीं इंग्लैंड भी 1985 के बाद से भारत में कोई एकदिवसीय सीरीज नहीं जीत सका जबकि पिछली तीन में से दो सीरीज में उसे व्हाइटवॉश का सामना करना पड़ा है. भारत में जीत के लिए जरूरी है विश्वस्तरीय स्पिन आक्रमण का होना और भारतीय दौरे पर कुंबले के एक साल के कार्यकाल के दौरान आने वाली किसी भी टीम के पास एक नियमित स्पिन गेंदबाज तक नहीं है. इसलिए भारत को अपनी जमीन पर तो कोई चुनौती मिलने वाली नहीं. कुंबले की अगर असली अग्निपरीक्षा होगी तो जून 2017 में इंग्लैंड में खेली जाने वाली चैंपियंस ट्रॉफी में, जहां भारत के सामने अपना खिताब बचाने की चुनौती होगी. इसके अलावा कुंबले का कार्यकाल बिना किसी चुनौती के ही बीतेगा. बतौर कोच उनकी काबिलियत अगर परखी जानी थी तो यह सिर्फ विदेशी दौरों पर ही संभव था. फिर कुंबले की काबिलियत कैसे परखी जाएगी यह एक बड़ा सवाल है.

वर्तमान में जितने भी तेज गेंदबाज भारतीय टीम का हिस्सा हैं या टीम से अंदर-बाहर होते रहे हैं, सभी दाएं हाथ के तेज गेंदबाज हैं

इसलिए इस लिहाज से तो कुंबले का एक साल चुनौतीपूर्ण नहीं रहने वाला और पूरा संभव है कि अगले साल उनका कार्यकाल बढ़ा दिया जाएगा. सीएसी के समक्ष दी गई कुंबले की प्रस्तुति से भी लगता है कि वे टीम के साथ एक लंबी पारी खेलने आए हैं. जहां उन्होंने एक लघुकालीन योजना के साथ 2019 विश्वकप तक की एक दीर्घकालीन योजना भी पेश की. हालांकि क्रिकेट विशेषज्ञों की नजर में जिन चुनौतियों का सामना कुंबले को करना है और जिन पर सबकी नजर रहेगी, उनका विश्लेषण जरूरी है.

विदेशी धरती पर अच्छा करने की चुनौती

पिछले पांच सालों में टीम का भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर टेस्ट क्रिकेट में लचर प्रदर्शन रहा है, जिसकी मुख्य वजह भारत की कमजोर गेंदबाजी रही. भारत की गेंदबाजी की ताकत स्पिनर रहे हैं लेकिन इस दौरान उनका प्रदर्शन औसत से भी निचले दर्जे का रहा. कुंबले को प्राथमिकता देने का कारण यही रहा कि विदेशी दौरों पर भारतीय स्पिनरों का प्रदर्शन सुधारा जा सके. 2011 से उपमहाद्वीप के बाहर खेले गए 21 टेस्ट मैचों में से महज एक मैच में भारत ने जीत का स्वाद चखा है और 16 में उसे हार मिली है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि टीम की तैयारियों में कहीं तो खामियां हैं. कुंबले के सामने चुनौती है कि वे इन खामियों को दूर करें.

सीमित ओवर क्रिकेट के प्रदर्शन में अस्थिरता

2011 विश्वकप जीत के बाद से ही एकदिवसीय और टी-20 के मुकाबलों में टीम का प्रदर्शन स्थिर नहीं रहा है. टीम अहम मौकों पर जाकर चूक रही है. अगर 2013 में जीते चैंपियंस ट्रॉफी के खिताब को छोड़ दिया जाए तो पांच साल के दौरान टीम ने कोई भी बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की है. 2012 के टी-20 विश्वकप में उसका प्रदर्शन निराशाजनक रहा, 2014 के टी-20 विश्वकप का फाइनल और 2015 के एकदिवसीय विश्वकप का सेमीफाइनल जरूर खेला लेकिन अहम मौकों पर मुंह की खानी पड़ी. ऑस्ट्रेलिया में टी-20 सीरीज में ऑस्ट्रेलिया को ह्वाइटवॉश जरूर किया लेकिन एकदिवसीय में शर्मनाक प्रदर्शन रहा. इंग्लैंड और वेस्टइंडीज में सीरीज अपने नाम की तो वहीं बांग्लादेश जैसी टीम से सीरीज में हार का मुंह देखना पड़ा. पिछले साल मजबूत अफ्रीकी टीम से घरेलू सीरीज गंवाई. 2016 का टी-20 विश्वकप भारत में आयोजित हुआ, पूरी उम्मीद थी कि 2011 की तरह ही भारत यह खिताब भी अपने नाम करेगा लेकिन फिर सेमीफाइनल में वेस्टइंडीज से हारकर सीरीज से बाहर हो गया. आखिर क्यों अहम मौकों पर भारतीय टीम चूक रही है? इसका जवाब भी कोच के तौर पर अनिल कुंबले को ही खोजना होगा. भारतीय टीम के पूर्व कोच रहे जॉन राइट और गैरी कर्स्टन इस काम को पहले बखूबी अंजाम दे चुके हैं. न्यूजीलैंड के जॉन राइट के रूप में जब भारतीय टीम के लिए पहली बार एक फुलटाइम कोच नियुक्त किया गया था, तब भारत को दक्षिण अफ्रीकी टीम के समान ही चोकर्स का तमगा हासिल था. उनके कार्यकाल में पहली बार इंग्लैंड में ऐतिहासिक नेटवेस्ट सीरीज में जीत से पहले भारत लगातार 15 से अधिक फाइनल मुकाबलों में हार का मुंह देख चुका था.

246887WEB

तेज गेंदबाजी की कुंद है धार

भारत को विदेशी जमीन पर जीत दिलाने के लिए तेज गेंदबाजी की धार तेज करनी होगी. स्पिन के बूते एशियाई टर्निंग पिचों पर तो मैदान मारा जा सकता है पर उपमहाद्वीप के बाहर घास भरे विकेटों पर नहीं. भारत का तेज गेंदबाजी का इतिहास चुनिंदा गेंदबाजों तक ही सिमटा हुआ है. कपिल देव के बाद जवागल श्रीनाथ ने भारतीय तेज गेंदबाजी का भार अपने कंधे पर उठाया था जिसमें वेंकटेश प्रसाद और अजीत अगरकर से बेहतरीन सहयोग मिला. श्रीनाथ के बाद जहीर खान पर तेज गेंदबाजी की कमान संभालने का भार आ गया. लेकिन जहीर खान की टीम से विदाई के बाद अब तक कोई ऐसा तेज गेंदबाज सामने नहीं आया जो यह जिम्मेदारी उठा सके. वर्तमान में जो इशांत शर्मा टेस्ट क्रिकेट में भारत के मुख्य तेज गेंदबाज हैं, उनकी गेंदबाजी में भी वह धार नहीं कि विपक्षी खेमे में खौफ पैदा कर सके. इसके अलावा दूसरे और तीसरे गेंदबाज के लिए भारत के पास कोई ऐसा नाम नहीं जिसका अंतिम एकादश में स्थान सुरक्षित हो. उमेश यादव समय-समय पर अपनी गेंद की तेजी से प्रभावित करने में सफल तो रहे हैं पर उनके प्रदर्शन में निरंतरता नहीं है इसलिए टीम से अंदर-बाहर होते रहते हैं. वरुण आरोन के साथ भी यही समस्या है. मोहित शर्मा अब तक कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाए हैं और एक औसत गेंदबाज बनकर रह गए हैं. भुवनेश्वर कुमार भी प्रदर्शन में निरंतरता न होने के कारण टीम से अंदर-बाहर होते रहे हैं, हालांकि उन्होंने अभी कम ही मैच खेले हैं. मोहम्मद शमी ने प्रभावित जरूर किया है लेकिन वे कब तक अपना प्रदर्शन दोहरा पाते हैं, यह चुनौती है. पहले भी मुनाफ पटेल, आरपी सिंह और प्रवीण कुमार ने प्रभावित तो किया था लेकिन अपने प्रदर्शन को बरकरार नहीं रख पाए और गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गए. इस साल वेस्टइंडीज दौरे पर पहले अभ्यास मैच में ही तेज गेंदबाजी की पोल खुल गई. इशांत, कुमार, शमी और उमेश ने 60 ओवर गेंदबाजी की और महज 3 विकेट चटकाए. तेज गेंदबाजी के मामले में भारत की दरिद्रता इसी से समझी जा सकती है कि चयनकर्ता आशीष नेहरा को उस उम्र में एकदिवसीय का स्ट्राइक गेंदबाज बनाकर टीम में वापस लाए हैं जब उन्हें क्रिकेट को अलविदा कह देना चाहिए था. विशेषज्ञों के मुताबिक विदेशी दौरों पर भारत के लचर प्रदर्शन का कारण भी यही है. तेज गेंदबाज भारत को अच्छी शुरुआत दे नहीं पाते जिससे दबाव स्पिन गेंदबाजी पर आ जाता है और वह भी दबाव में बिखर जाती है. ऐसे तेज गेंदबाज खोजना एक चुनौती है जो लंबे समय तक टीम में न सिर्फ बने रहें बल्कि अपनी रफ्तार और स्विंग से विपक्षी बल्लेबाजों की नाक में दम भी कर सकें.

टीम संयोजन के लिए बाएं हाथ के तेज गेंदबाज की जरूरत

बाएं हाथ का तेज गेंदबाज टीम संयोजन में एक अचूक हथियार की तरह होता है. उसकी मौजूदगी विपक्षी टीम पर दबाव बनाती है कि वह अपनी बल्लेबाजी की रणनीतियां बदलती रहे. जैसे बल्लेबाजी में दाएं-बाएं हाथ के बल्लेबाजों की जोड़ी गेंदबाजों की नाक में दम किए रहती है कुछ उसी तरह दाएं-बाएं हाथ के तेज गेंदबाज जब दोनों छोर से एक साथ गेंदबाजी करते हैं तो बल्लेबाज लगातार दबाव में रहता है. बार-बार बदलती गेंदबाजी की लाइन उसका ध्यान भंग करती है. मैच में नई गेंद ऐसी जोड़ी को थमाने पर शुरुआती सफलता जल्द मिलने की संभावना बढ़ जाती है. वसीम-वकार की ऐसी ही एक जोड़ी विश्व की सबसे घातक गेंदबाजी जोड़ियों में से एक मानी जाती है. लेकिन वर्तमान में जितने भी तेज गेंदबाज भारतीय टीम का हिस्सा हैं या टीम से अंदर-बाहर होते रहे हैं, सभी दाएं हाथ के तेज गेंदबाज हैं. गेंदबाजों की अगली खेप में भी कोई ऐसा नाम सुनने में नहीं आ रहा जो जहीर खान की बाएं हाथ की गेंदबाजी की विरासत संभाल सके. यही कारण रहा कि गेंदबाजी में विविधता लाने के लिए आशीष नेहरा को एकदिवसीय टीम में सालों बाद वापस बुलाया गया. उन्हें टेस्ट में जरूर आजमाया जाता लेकिन उन्होंने टेस्ट खेलने से इनकार कर दिया. नेहरा को टीम में लाने से भारतीय गेंदबाजी में सुधार भी नजर आया है. लेकिन टेस्ट में अभी भी सूनापन है और नेहरा भी अपने करिअर के अंतिम पड़ाव पर हैं. इरफान पठान और आरपी सिंह की वापसी की संभावनाएं कम ही नजर आती हैं. कुछ समय पहले भारतीय गेंदबाजी कोच भरत अरुण ने भी इस पर चिंता जताई थी.

विदेश में घूमती नहीं है स्पिनरों की गेंद

एशियाई टर्निंग विकेटों पर तो भारतीय स्पिनरों का कोई सानी नहीं. उनकी असली परीक्षा उपमहाद्वीप के बाहर होती है. एक तो स्पिन के अनुकूल परिस्थितियों का अभाव और दूसरा प्रभावहीन तेज गेंदबाजी के बाद सारा दबाव स्पिन गेंदबाजी पर आने से घरेलू मैदानों पर विश्वस्तरीय भारतीय स्पिनर औसत से भी कम दर्जे के नजर आते हैं. उदाहरण के तौर पर, भारतीय स्पिन गेंदबाजी की कमान संभालने वाले रविचंद्रन अश्विन के उपमहाद्वीप और उसके बाहर के आंकड़ों की ही तुलना करें तो स्थिति साफ हो जाती है. अश्विन ने अपने करिअर में खेले 32 टेस्ट मैचों में 25.39 के प्रभावशाली औसत से 176 विकेट चटकाए हैं लेकिन इनमें से उपमहाद्वीप के बाहर खेले नौ टेस्ट मैचों में 56.58 की महंगी औसत से सिर्फ 24 विकेट लिए हैं. रविंद्र जडेजा का भी कुछ यही हाल है. इसके अलावा समय-समय पर अमित मिश्रा, प्रज्ञान ओझा, अक्षर पटेल को भी आजमाया गया पर कोई भी खास प्रभाव नहीं छोड़ सका.
उपमहाद्वीप के बाहर की परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने की इसी समस्या का सामना कुंबले ने भी अपने शुरुआती आधे करिअर में किया था. उन्हें घरेलू शेर बताया जाता था. फिर उन्होंने वापसी की और भारत को विदेशी जमीनों पर भी अपनी फिरकी से जीत दिलाई. इसलिए कुंबले की सिर्फ तकनीकी सलाह ही काम नहीं आएगी, समान परिस्थितियों से जूझने का उनका अनुभव भी भारतीय स्पिनरों का मनोबल बढ़ाएगा.

कुंबले के लिए यह फैसला लेना सबसे चुनौतीपूर्ण होगा कि क्या भारत में भी तेज विकेट बनें जिससे विदेशी परिस्थितियों के हिसाब से खिलाड़ी खुद को ढाल सकें

बल्लेबाजी की रीढ़ भी कमजोर

बल्लेबाजी की बात करें तो टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाजी क्रम में संतुलन बनाने और विविधता लाने के लिए वर्तमान में भारत के पास शिखर धवन को छोड़कर कोई अन्य बाएं हाथ का विशेषज्ञ बल्लेबाज नहीं है. पिछली दो टेस्ट सीरीजों में चुनी गई टीम पर नजर डालें तो शिखर धवन के अलावा रविंद्र जडेजा दूसरे नाम थे जो बाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे. लेकिन न तो रविंद्र जडेजा विशेषज्ञ बल्लेबाज हैं और न ही उन्होंने बतौर ऑलराउंडर भी अपनी बल्लेबाजी से प्रभावित किया है. शिखर धवन के प्रदर्शन में भी निरंतरता नहीं है. वे टीम से अंदर-बाहर होते ही रहते हैं. यह स्थिति अभी आई हो ऐसा भी नहीं है. सौरव गांगुली के संन्यास और गौतम गंभीर के टीम से बाहर होने के बाद से ही भारत टेस्ट क्रिकेट में उनका विकल्प नहीं ढूंढ़ सका है. सुरेश रैना, युवराज सिंह, शिखर धवन, रविंद्र जडेजा विकल्प के तौर पर आजमाए गए, पर अब तक प्रभावित नहीं कर पाए हैं. समस्या यह है कि नई प्रतिभाएं भी दाएं हाथ से ही बल्लेबाजी करने वाली मिल रही हैं.

kumbleWEB

अस्थिर बल्लेबाजी क्रम में भी भरना होगा दम

सौरव गांगुली की कमी एक मायने में और खलती है. वे छठे क्रम पर बल्लेबाजी किया करते थे. टीम का शुरुआती बल्लेबाजी क्रम जब जल्द ढह जाता था तो वे आकर पारी संभाला करते थे. कभी शीर्ष क्रम और मध्यम क्रम के बल्लेबाजों के साथ तो कभी पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ मिलकर टीम के स्कोर को आगे ले जाया करते थे. उनके जाने के बाद से छठे और सातवें क्रम पर भारतीय बल्लेबाजी अस्थिर रही है. सुब्रमण्यम बद्रीनाथ, युवराज सिंह, सुरेश रैना, रविंद्र जडेजा, रोहित शर्मा, विराट कोहली तक को आजमाया गया. लेकिन कोई भी गांगुली जैसी स्थिरता दिखाकर उनकी जगह भर न सका. इसका असर सातवें क्रम की बल्लेबाजी पर भी पड़ा. धोनी ने एक क्रम ऊपर आकर छठे क्रम पर खेलना शुरू कर दिया. लेकिन इस कारण सातवें क्रम पर कोई उनकी जगह लेने वाला न मिलने से भारतीय बल्लेबाजी ढह जाती थी. वर्तमान की स्थिति यह है कि वेस्टइंडीज दौरे पर रोहित शर्मा को छठे और रिद्धिमान साहा को सातवें क्रम पर बल्लेबाजी के लिए भेजा जाएगा.

पिचों का स्वभाव बदलने की चुनौती

भारत के सामने चुनौती है कि विदेशी जमीन पर अच्छा करे और कुंबले की जिम्मेदारी है कि वे इस हिसाब से खिलाड़ियों को तैयार करें. तैयारी अभ्यास से आती है और खिलाड़ियों को तेज विकेटों पर खेलने का अभ्यास हमारे यहां बनने वाले धीमे टर्निंग विकेटों पर मिल नहीं पाता. टर्निंग विकेट पर हम स्पिन के बूते दौरे पर आई टीमों को तो हरा देते हैं पर न तो अपने तेज गेंदबाजों को अंतरराष्ट्रीय बल्लेबाजों के सामने अपनी गेंदबाजी की धार परखने का मौका मिल पाता है और न ही बल्लेबाजों को विश्वस्तरीय तेज गेंदबाजी खेलने का. स्पिन के बूते हम आसानी से विपक्षी खेमे के सभी विकेट झटक मैच एकतरफा जीत लेते हैं, कोई चुनौती ही नहीं मिलती. दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेली गई पिछली टेस्ट सीरीज का उदाहरण लें. भारतीय स्पिनर सीरीज में पूरी तरह हावी रहे. विपक्षी टीम कहीं मुकाबले में नजर ही नहीं आई. हम सीरीज तो जीत गए पर हुआ यह कि न तो हमारे बल्लेबाजों को डेल स्टेन और मोर्ने मोर्केल जैसे विश्व के चोटी के तेज गेंदबाजों का सामना करने का मौका मिला और न ही हमारे तेज गेंदबाजों को पर्याप्त गेंदबाजी का मौका मिला. इसलिए कुछ महीने बाद जब हम ऑस्ट्रेलिया गए तो यह कमी वहां अखरी. न हमारे बल्लेबाज ऑस्ट्रेलिया की गेंदबाजी का सामना कर सके और न तेज गेंदबाज उनकी बल्लेबाजी को ध्वस्त कर पाए (स्पिनर तो बेअसर रहे ही). ऐसा इसलिए हुआ कि तेज विकेटों पर गेंदबाजी का न तो हमारे गेंदबाजों को अभ्यास था और न तेज विकेट पर विश्वस्तरीय तेज गेंदबाजी खेलने का हमारे बल्लेबाजों को. एक कोच के तौर पर कुंबले के लिए यह फैसला लेना सबसे चुनौतीपूर्ण होगा कि क्या भारत में भी ऐसे तेज विकेट बनाए जाएं जिससे विदेशी परिस्थितियों के हिसाब से खिलाड़ियों को ढलने का अभ्यास हो.

सौरव गांगुली के संन्यास और गौतम गंभीर के टीम से बाहर होने के बाद से ही भारत टेस्ट क्रिकेट में उनका विकल्प नहीं ढूंढ़ सका है

दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पिछले साल भारत में ही खेली गई एकदिवसीय सीरीज के फाइनल मैच में ऐसा ही एक तेज विकेट बनाया गया था जहां भारतीय गेंदबाजी और बल्लेबाजी पूरी तरह बिखर गई. इस पर टीम डायरेक्टर रवि शास्त्री और पिच क्यूरेटर के बीच कहासुनी भी हो गई थी. बाद में हुई पूरी टेस्ट सीरीज में स्पिन फ्रेंडली विकेट बनाए गए और भारत एकतरफा जीत हासिल कर सका. बिना मुकाबले के जीतना न जीतने के बराबर माना गया.

पूर्व भारतीय क्रिकेटर मनिंदर सिंह के मुताबिक, ‘हम घरेलू टूर्नामेंट में भी ऐसे ही स्पिन फ्रेंडली विकेट बनाते हैं जिस पर मैच तीन दिन में खत्म हो जाते हैं. तेज गेंदबाजों को गेंदबाजी का मौका नहीं मिलता. बल्लेबाजों को बल्लेबाजी का मौका नहीं मिलता. जब खिलाड़ियों की मैच प्रैक्टिस ही नहीं होगी तो वे कैसे प्रतिस्पर्धात्मक प्रदर्शन करेंगे. घरेलू क्रिकेट में तेज गेंदबाज प्रैक्टिस नहीं कर पा रहे, बल्लेबाज तेज गेंदबाजों को नहीं खेल पा रहे. विदेशी टीम भारत दौरे पर आएं तो हम स्पिन फ्रेंडली विकेट के सहारे तीन दिन में मैच जीत जाते हैं. न उनके तेज गेंदबाजों को खेलते हैं और न अपने तेज गेंदबाजों को गेंदबाजी का मौका देते हैं. तेज गेंदबाजी की परिस्थितियों में खेलने का अभ्यास ही नहीं होता. तेज गेंदबाजी से हमारे बल्लेबाजों का पाला सीधा विदेशी दौरों पर पड़ता है. वहीं गेंदबाजों को सीधा वहीं बॉलिंग का मौका मिलता है. अब बताइए इस तरह हम क्या विदेशों में जीतेंगे?’ क्या कुंबले भारतीय विकेटों के साथ प्रयोग का साहसिक कदम उठा सकेंगे? देखना रोचक होगा.

तुनकमिजाज विराट कोहली, कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी

विराट कोहली- टेस्ट कप्तान. महेंद्र सिंह धोनी- एकदिवसीय और टी-20 कप्तान. एक तुनकमिजाज, दूसरा शांत दिमाग. अलग फॉर्मैट में अलग कप्तान की वर्तमान थ्योरी भारतीय क्रिकेट में कुंबले के कप्तान रहने के दौरान ही आई थी. आज वही थ्योरी कोच कुंबले के लिए एक चुनौती बन बैठी है. उन्हें एक-दूसरे से एकदम विपरीत स्वभाव रखने वाले इन दो कप्तानों के साथ तालमेल बिठाते हुए आगे बढ़ना है. दोनों के ही लिए ही उन्हें अलग रणनीतियां बनानी होंगी क्योंकि दोनों का ही कप्तानी का अंदाज जुदा है. कोहली जहां आक्रामकता दिखाकर विपक्षी पर हावी होना चाहते हैं, वहीं धोनी ठंडे दिमाग से मैच बनाते हैं. इंग्लैंड जैसे देशों में अलग फॉर्मैट के अलग कप्तान होना पुरानी बात है पर वहां अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जो खिलाड़ी जिस फॉर्मैट में कप्तानी करता है वह दूसरे फॉर्मैट में नहीं खेलता है. जैसे वर्तमान में इंग्लैंड के कप्तान एलिएस्टर कुक हैं जो सिर्फ टेस्ट खेलते हैं, वहीं सीमित ओवरों के कप्तान इयॉन मोर्गन हैं जो सिर्फ सीमित ओवरों की टीम का हिस्सा हैं. लेकिन जब अलग-अलग फॉर्मैट के कप्तान एक-दूसरे की कप्तानी में खेलते हैं तो स्वाभिमान वाली बात आगे आ जाती है. पिछले डेढ़ साल में कई बार भारतीय ड्रेसिंग रूम से ऐसी अफवाहें उड़ती रही हैं कि कोहली सीमित ओवरों में भी भारत की कप्तानी चाहते हैं. कप्तानी के इस द्वंद्व से निपटना किसी चुनौती से कम नहीं.

जाति, रंग, धर्म और गरीबी संबंधी फब्तियां भी रैगिंग

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जूनियर छात्र की जाति, रंग और धर्म पर फब्तियां कसना भी अब रैगिंग की श्रेणी में आएगा. इतना ही नहीं, आर्थिक आधार पर मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना भी रैगिंग कहलाएगी. यह प्रावधान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षा संस्थानों में रैगिंग अपराध निषेध विनियम 2016 में किया है. यूजीसी ने प्रदेश सहित देश भर के शिक्षण संस्थानों को नए नियमों का पालन कड़ाई से करने के निर्देश भी दिए हैं. शिक्षण संस्थानों में रैगिंग के बढ़ते मामलों को देखते हुए यह संशोधन किया गया है. अभी तक छात्रों को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करने, अपशब्द कहने, किसी छात्र पर दबाव बनाकर किसी अन्य छात्र को कुछ कहलवाने आदि को रैगिंग की श्रेणी में रखा गया था, लेकिन यूजीसी के पास पहुंचने वाली शिकायतों में रंगभेद और जातिगत टिप्पणियों की शिकायतें आ रही थीं. लिहाजा, यूजीसी ने एंटी-रैगिंग कमेटी की सिफारिशों के मद्देनजर किसी छात्र को राष्ट्रीयता, क्षेत्रीयता, जन्म स्थान और निवास के आधार पर परेशान करने को रैगिंग में शामिल करके संशोधित नियम लागू कर दिया है.

अरुणाचल प्रदेश विवाद

State-Logoweb

क्या है मसला?

सुप्रीम कोर्ट ने 13 जुलाई को अपने फैसले में अरुणाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार को बहाल करने का आदेश दिया. जनवरी 2016 को प्रदेश की तत्कालीन नबाम तुकी सरकार के गिरने के लिए जिम्मेदार राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा के सभी फैसलों को रद्द करते हुए अदालत ने कहा कि ये फैसले संविधान का उल्लंघन करने वाले थे. राज्य में तब राजनीतिक संकट गहरा गया था जब 60 सदस्यीय विधानसभा में सत्तापक्ष कांग्रेस के 47 में से 21 विधायकों ने मुख्यमंत्री को हटाने की मांग की थी. गतिरोध को देखते हुए केंद्र सरकार ने 24 जनवरी को वहां राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी थी. कई सप्ताह चली राजनीतिक उठापटक के बाद राज्यपाल राजखोवा ने कांग्रेस के बागी गुट के नेता कालिखो पुल को 19 फरवरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी. कालिखो को भाजपा के 11 विधायकों का समर्थन हासिल है.

क्याें छिड़ा विवाद?

पिछले साल नवंबर में कांग्रेस विधायकों ने राज्यपाल से विधानसभा उपाध्यक्ष को हटाने के लिए प्रस्ताव पेश करने की मंजूरी मांगी. वहीं भाजपा विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए प्रस्ताव पेश करने की इजाजत मांगी. इसके बाद नौ दिसंबर को राज्यपाल ने विधानसभा सत्र 14 जनवरी, 2016 के स्थान पर करीब एक महीने पहले 16 दिसंबर को बुलाया. इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष नबाम रेबिया ने कांग्रेस के 21 बागी विधायकों में से 14 की सदस्यता समाप्त करने का नोटिस जारी किया. इस पर विधानसभा उपाध्यक्ष ने 21 में से 14 विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का आदेश खारिज किया. इसके बाद नबाम तुकी सरकार ने विधानसभा भवन पर ताला जड़ा. विधानसभा की बैठक दूसरे भवन में हुई, जिसमें 33 विधायकों ने हिस्सा लिया. रेबिया को विधानसभा अध्यक्ष के पद से हटाने का प्रस्ताव पारित किया गया. बागियों ने होटल में विधानसभा सत्र बुलाया, तुकी के खिलाफ मतदान किया और कालिखो पुल को मुख्यमंत्री चुना. मामला गुवाहाटी हाई कोर्ट पहुंच गया. बाद में 26 जनवरी को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की. इसके खिलाफ तुकी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. 19 फरवरी को कोर्ट ने शक्ति परीक्षण संबंधी कांग्रेस की याचिका खारिज की जिसके बाद राष्ट्रपति शासन समाप्त हो गया और 20 फरवरी को पुल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. अब 13 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को असंवैधानिक बताया और कांग्रेस सरकार की बहाली का आदेश दिया.

आगे क्या होगा?

अरुणाचल प्रदेश में संवैधानिक स्थिति स्पष्ट हो चुकी है लेकिन राजनीतिक स्थिति दुविधापूर्ण बनी हुई है. प्रदेश के मुख्यमंत्री नबाम तुकी ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया है. वहीं कांग्रेस विधायक दल ने पेमा खांडू को नेता चुन लिया है. खांडू ने कहा कि उन्होंने राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है. पेमा अभी तक बागी गुट में शामिल थे. वे पूर्व मुख्यमंत्री दोरजी खांडू के पुत्र हैं. अरुणाचल के प्रभारी राज्यपाल तथागत रॉय ने कहा कि वे दाखिल किए गए कागजात का अध्ययन करेंगे और उसी के अनुसार शपथ ग्रहण का दिन तय किया जाएगा.

दिल्ली का कश्मीर की जनता से कोई संवाद ही नहीं हो रहा

सभी फोटो : फैसल खान
सभी फोटो : फैसल खान

कश्मीर में 2010 में जैसे हालात बने थे, अब परिस्थिति उससे ज्यादा कठिन और ज्यादा विकट हो गई है. ऐसा इसलिए हुआ है कि 2008-09 और 10 में जो घटनाएं हुई थीं, उससे न मनमोहन सरकार ने, न ही मोदी सरकार ने कोई सबक सीखा. सितंबर, 2010 में हमारी वार्ताकार समिति ने जब काम शुरू किया था, हमें एक साल के अंदर रिपोर्ट देनी थी. हम जम्मू और कश्मीर के हर जिले में गए थे. हम करीब 700 डेलीगेशन से मिलेे यानी छह हजार से ज्यादा लोग. सिर्फ हुर्रियत से हमारी बात नहीं हुई. जहां-जहां हम जाते थे, उसकी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को देते थे. पुलिस अफसरों और सीआरपीएफ के लोगों से भी हमारी बातचीत हुई थी.

इसके बाद हमने सबसे पहली जो रिपोर्ट दी थी, उसमें कहा था कि जन प्रदर्शन को रोकने के लिए न अधिकारियों की सुनवाई का तरीका सही है, न प्रदर्शन रोकने की उनकी कार्रवाई पर्याप्त है, इसके लिए कुछ कीजिए. उसके बाद थोड़ी-बहुत कार्रवाई हुई थी, लेकिन जिस तरह से अब (बुरहान वानी प्रकरण के बाद) लोग मारे गए हैं, मुझे नहीं लगता कि वहां उस सिफारिश पर अमल हुआ है. शुरुआत यहां से है कि कैसे आप जन प्रदर्शन को हैंडल करते हैं. दूसरे, जन प्रदर्शन में भी अब काफी परिवर्तन आया है. पहले सिर्फ पत्थरबाज थे, लेकिन अब प्रदर्शनकारी सुरक्षा बलों के सामने औरतों और बच्चों को भेजते हैं. उनकी हत्या करते हैं, उन पर अटैक करते हैं. पहली बार हमने देखा है कि पुलिस स्टेशन और कई सुरक्षा संस्थानों पर हमले हुए हैं. प्रदर्शन में ये बदलाव आया है. मिलिटेंसी में तो काफी बड़ा परिवर्तन आया है. एक तो ये जो 18 से 23-24 साल वाला आयुवर्ग है, ये बच्चे मध्यम वर्ग से आते हैं, स्कूलों में और कॉलेजों में पढ़ते हैं. प्रोफेशनल बनना चाहते थे. ये सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय हैं, जो कि पहले नहीं था. और ये बहुत अतिवादी हुए हैं. ये जो तीन-चार फैक्टर नजर आ रहे हैं, उसका विश्लेषण ठीक से हुआ है या नहीं हुआ है. लेकिन मैं समझता हूं कि 2010 में जो स्थिति थी, अब उससे ज्यादा उलझाव आ गया है.

पहले आतंकियों के समर्थन में थोड़े-बहुत गांववाले आते थे, लेकिन अभी जिस संख्या में लोग आ रहे हैं, पचास हजार से दो लाख बताया जा रहा है. एक रिपोर्ट आई है कि सिर्फ सात हजार लोग थे. आंकड़ों के बारे में मैं सुनिश्चित नहीं हूं, लेकिन अचानक इतनी बड़ी तादाद में किसी आतंकी के अंतिम संस्कार में जिस तरह लोग आ रहे हैं, यह भी एक नया फैक्टर है.

पी. चिदंबरम ने मुझसे कहा था कि इस रिपोर्ट पर कैबिनेट में डिस्कस किया जाएगा, उसके बाद वह रिपोर्ट संसद में पेश की जाएगी. सभी पार्टियां उस पर बहस करेंगी. लेकिन उस रिपोर्ट पर न कोई बात हुई, न संसद में पेश की गई

Faisal-Khan-(9)WEB

कश्मीर में हालात सुधरने की जगह और बिगड़ रहे हैं, क्योंकि अभी तक जो अप्रोच रही है दिल्ली की, वह डबल अप्रोच है. हमने कहा था कि एक तो आतंकवाद को खत्म करने के लिए जितना फोर्स इस्तेमाल कर सकते हो, करो. बॉर्डर पर पाकिस्तान के जो हमले हैं उस पर जल्दी से रोक लगाओ. दूसरा, मिलिटेंसी को जल्दी से जल्दी पूरे स्टेट से हटाने का प्रयास करो. यह एक पक्ष होगा. तीसरा, विकास पर फोकस करो. ये त्रिपक्षीय कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन उसके साथ ही साथ जो भावनात्मक जुड़ाव वाले राजनीतिक मुद्दे हैं, उन पर अगर ध्यान नहीं दिया तो इस तरह के मसले खड़े होते रहेंगे. थोड़ी शांति हो जाएगी तो दोबारा कहीं न कहीं और विरोध फूट पड़ेगा. यह भी देखना चाहिए.

हमने रिपोर्ट में भी कहा था कि सबसे गंभीर परिस्थिति घाटी में है, लेकिन अगर आपको सचमुच संपूर्णता में स्थिति देखनी है तो लद्दाख और जम्मू के लोगों की भी काफी आकांक्षाएं हैं, उसकी ओर भी ध्यान देना चाहिए. यह गौर करने लायक है कि पंडितों के बारे में सालों से कहा जा रहा है कि उनके लिए कुछ करो, किसी सरकार ने थोड़ा-बहुत आवंटन बढ़ा दिया, किसी ने ये कर दिया, किसी ने वो कर दिया, लेकिन असली बात ये है कि पंडितों को भी नजरअंदाज किया गया है. सिर्फ पंडित ही नहीं, वहां से काफी सिख परिवार भी बाहर निकल गए हैं, कई मुस्लिम परिवार भी निकल गए हैं. आप जितना नजरअंदाज करोगे, वह उत्प्रेरक का काम करेगा. उसकी राजनीतिक प्रतिक्रिया होगी. अगर इस पर आप ध्यान नहीं देंगे तो इस तरह की समस्या तो होगी ही.

Tehelka-(3)WEB

हमारे यहां जिस तरह से लोग उग्रवाद की ओर बढ़े हैं, जिस तरह से इनके वैश्विक संपर्क सामने आ रहे हैं, पूरे मुस्लिम जगत से उग्रवादी तत्व उभर कर आ रहे हैं, इनके क्या संपर्क हैं, इन बातों का क्या असर होगा? बांग्लादेश में तो आप देख ही रहे हैं. हमारे यहां भी अलग-अलग हिस्सों में स्लीपर सेल की बात हो रही है. मैं समझता हूं कि आज मोदी जिस परिस्थिति का सामना कर रहे हैं, वह उस परिस्थिति से ज्यादा गंभीर है जिसका सामना मनमोहन ने किया था.

कश्मीर की असली समस्याएं दो हैं. यह बंटवारे की विरासत है. पाकिस्तान कभी नहीं मानेगा कि एक मुस्लिम बहुल राज्य भारत का हिस्सा हो सकता है. दूसरा, कोई रास्ता नहीं है कि भारत की कोई भी सरकार स्थिति में बदलाव के लिए यथास्थिति बनी रहने देना चाहेगी. यह हो ही नहीं सकता. तो मूलत: ये समस्या है. वहां पहुंच बनाने की जरूरत है. आज (14 जुलाई को) छह दिन हो चुके हैं लेकिन कोई विधायक अपने क्षेत्र में जाकर लोगों से बात नहीं कर रहा. कोई राजनीतिक दल वहां नहीं जा रहा है. सिविल सोसाइटी, बिजनेस कम्युनिटी, छात्रों का समूह कोई वहां जा ही नहीं रहा है. राजनीतिक संस्थाओं का लोगों के साथ जुड़ाव होना चाहिए, लेकिन वो नहीं हो रहा है. दिल्ली में और कश्मीर में भी, वहां के लोगों से क्या जुड़ाव है, उनसे क्या संवाद हो रहा है, किसी को पता नहीं है. वहां स्थिति मुश्किल है यह सब मानते हैं, लेकिन आप कहीं से शुरुआत तो कीजिए.

कश्मीर में पहुंच बनाने की जरूरत है. कोई विधायक अपने क्षेत्र में जाकर लोगों से बात नहीं कर रहा. कोई राजनीतिक दल वहां नहीं जा रहा है. सिविल सोसाइटी, बिजनेस कम्युनिटी, छात्रों का समूह कोई वहां जा ही नहीं रहा है

कश्मीर पर सिर्फ हमारी रिपोर्ट नहीं थी. मनमोहन सिंह ने छह और वर्किंग ग्रुप बनाए थे. उनकी रिपोर्ट है सरकार के पास और उनमें बड़े-बड़े लोग थे. सी रंगराजन, एमएम अंसारी जैसे लोगों की भी रिपोर्ट है. लेकिन उन रिपोर्टों पर कोई कार्यान्वयन नहीं हुआ. मुझे पता नहीं है कि उन्हें किसी ने देखा भी है कि नहीं. एक नेता का मुझे फोन आया कि आपकी रिपोर्ट कहां मिलेगी. हमने कहा आप ही के मंत्रालय में मिल जाएगी. आप वहां पर देखिए. बहुत सारी रिपोर्टें इंटरनेट पर भी हैं. मेरी पूरी रिपोर्ट पीडीएफ फॉर्म में इंटरनेट पर पड़ी हुई है.

असली स्थिति तो यह है. हम सबने जो सिफारिशें की थीं, उन पर कुछ भी नहीं हुआ. पी चिदंबरम ने मुझसे कहा था कि इस रिपोर्ट पर कैबिनेट में बात की जाएगी, उसके बाद वह रिपोर्ट संसद में पेश की जाएगी. सभी पार्टियां उस पर बहस करेंगी. हमने उनसे कहा था कि भाई सिफारिशें हमारी हैं लेकिन आपको जो बातें उनमें से ठीक लगें, वह ले लीजिए. जो अच्छा न लगे, उसे हटा दीजिएगा. न उस रिपोर्ट पर कोई बात हुई, न वह संसद में पेश ही की गई. अब कश्मीर के अलगाववादी और आतंकवादी कह रहे हैं कि हमें पता है कि आपको क्यों नियुक्त किया गया था. सरकार का मकसद सिर्फ मसला टालना था, इसलिए आपको नियुक्त किया गया था. मेरी धारणा यह है कि अगर आपने कुछ किया ही नहीं तो उनका आरोप सच हो जाता है. मैं नहीं मानता कि यह सच है, लेकिन उनकी राय ऐसी बनी है, वह भी एक तथ्य है.

(लेखक जम्मू कश्मीर पर मनमोहन सरकार द्वारा 2010 में नियुक्त वार्ताकार समिति के सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

‘बिहार में लालू-नीतीश से ही पिछड़ों-दलितों की राजनीति की शुरुआत नहीं होती. मैं पिछड़े जमात से बना पहला मुख्यमंत्री था’

IMG-20160523-WA0083WEB

आप तो बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं. राज्य में अधिकांश लोग जानते तक नहीं कि मांझी, लालू, राबड़ी, जगन्नाथ मिश्र के अलावा आप भी यहां के मुख्यमंत्री रहे हैं. जो आपको जानते हैं वे कहते हैं कि आप तो दो से तीन दिन के मुख्यमंत्री थे.

चलिए कोई दो दिन का मुख्यमंत्री कहता तो है न, बाकी ज्यादातर तो एक दिन का ही कहकर निपटा देते हैं और मैं तो अपने बारे में यही जानता हूं कि मैं 27 जनवरी, 1968 से पांच फरवरी, 1968 तक बिहार का मुख्यमंत्री था और पिछड़े समुदाय से आने वाला पहला सीएम था. वैसे अब उम्र 83 साल की हो गई है और अब तो ये इच्छा भी नहीं रही कि लोग मुझे जानें.

आप राजनीति में कैसे आए और मुख्यमंत्री कैसे बने? क्या आप किसी राजनीतिक परिवार से हैं?

मेरा पारिवारिक परिवेश और वह भी राजनीतिक! बाप रे बाप, क्या कह रहे हैं आप. हुआ ऐसा था कि हम बड़े घराने से ताल्लुक रखते हैं. खगड़िया जिले में गांव है मेरा. गांव का नाम था कुरचक्का. एक बार बाढ़ में बह गया उसके बाद 1976 में उसको फिर से बसाया गया था. तो उसका नाम लोगों ने खुद से ही ‘सतीश नगर’ कर दिया है यानी मेरे ही नाम पर. तो हुआ ऐसा कि मैंने अंतरजातीय विवाह कर लिया था तो घर से लोगों ने मुझे निकाल दिया. भाइयों ने मुझसे किनारा कर लिया. हम लोगों के पास 400 बीघा की जोत थी. उसका बंटवारा हो गया. मैं उस समय बीएससी में पढ़ रहा था. हमारी एक चैरिटेबल डिस्पेंसरी भी चलती थी. अगले साल विधानसभा चुनाव था तो मैंने अपने हिस्से का खेत बेचा और परबत्ता क्षेत्र से स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ गए. राजनीति में आया तो घरवालों ने कहा कि कुलअंगार घर से निकल गया. नाश कर देगा सब. बहरहाल, चुनाव में कुल 17 हजार वोट मिले और मैं कांग्रेस की सुमित्रा देवी से चुनाव हार गया. फिर 1964 में उपचुनाव हुआ तो निर्दलीय खड़ा हुआ. इसमें दो हजार वोट से हार गया. घर में भाई से लेकर बाहर तक सब लोग कुलअंगार कहते रहे और मैं खेत बेच-बेचकर राजनीति करता रहा.

1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने मुझसे संपर्क किया. इस बार 20 हजार वोट से जीत मिल गई. बात जहां तक मेरे मुख्यमंत्री बनने की है तो महामाया बाबू बिहार के मुख्यमंत्री थे. रईस आदमी थे. हमारे स्वास्थ्य विभाग में मेरे एक परिचित डॉक्टर थे. उन्हें प्रोफेसर बनना था लेकिन बनाया नहीं गया. तब मैंने 17-18 विधायकों को जुटाया और महामाया बाबू के यहां पहुंच गया कि उन्हें उनका अधिकार नहीं मिला तो विरोध करेंगे. इसके बाद मेरे परिचित डॉक्टर को प्रोफेसर बना दिया गया. यह बात धुरंधर नेता केबी सहाय तक पहुंची तो उन्होंने मुझे मिलने को बुलाया. मैं गया तो उन्होंने कहा कि थोड़ा और मेहनत कीजिए सतीश बाबू. 16-17 विधायक जुटा ही ले रहे हैं तो यह संख्या 35-36 कर दीजिए, फिर राज्य के मुखिया आप! मैं बोला कि क्या फालतू बात कर रहे हैं. 318 विधायक में 35-36 से क्या होगा. वे बोले कि 156 मेरी ओर से आपका साथ देंगे, हमारे विधायक हैं. इसके बाद मैंने मेहनत करके 36 विधायक जुटा लिए. इसके बाद उनकी सरकार गिर गई और मैं मुख्यमंत्री बन गया. 27 जनवरी, 1968 से पांच फरवरी, 1968 तक.

इतने दिनों के मुख्यमंत्री काल में आप क्या कुछ कर भी सके?

तगाबी नाम का ऋण हुआ करता था, उसे हटवा दिया. और अगर मेरे मुख्यमंत्री रहते हुए मेरे असर की बात करते हैं तो इतना जान लीजिए कि मैं मुख्यमंत्री बना तभी बिहार में पिछड़ों-दलितों के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हुआ. मेरे बाद भोला पासवान शास्त्री, कर्पूरी ठाकुर आदि पिछड़े समुदाय से मुख्यमंत्री बने. मेरे बाद के 12 मुख्यमंत्री तो अब दुनिया से विदा हो चुके हैं. और मेरे मुख्यमंत्री बनने या राजनीति में आने का असर जानना चाहते हैं तो सुनिए, जिस मंडल कमीशन की रिपोर्ट के बाद देश की राजनीति बदली और मंडलवादी राजनीति की शुरुआत हुई, उस मंडल कमीशन के अध्यक्ष बीपी मंडल का समय तो खत्म हो चुका था और समय बढ़ नहीं रहा था. मैंने इंदिरा जी से व्यक्तिगत आग्रह करके मंडल कमीशन की रिपोर्ट को पूरा करवाने के लिए छह माह का समय बढ़वाया था. आज नीतीश और लालू कूद रहे हैं और कह रहे हैं कि जो किया सब उन्हीं दो लोगों ने किया लेकिन इसमें बहुतों का योगदान रहा है.

राजनीति में आया तो घरवालों ने कहा कि कुलअंगार घर से निकल गया. नाश कर देगा सब. लेकिन मैं खेत बेचकर राजनीति करता रहा. 1967 में 20 हजार वोट से जीत मिल गई

नीतीश-लालू कूद रहे हैं और क़ह रहे हैं कि जो किया उन्होंने किया, आपकी इस बात का क्या आशय है?

मैं बस सच्चाई बता रहा हूं. सामाजिक न्याय की लड़ाई को 1990 से देखा जाता है और मीडिया भी दिखाती है लेकिन सबको यह जानना चाहिए कि लालू से पहले बिहार में मैं, दारोगा प्रसाद राय, भोला पासवान शास्त्री, बीपी मंडल, रामसुंदर दास, कर्पूरी ठाकुर जैसे लोग मुख्यमंत्री बन चुके थे. सब पिछड़े और दलित वर्ग से ही थे. लोगों को यह जानना चाहिए कि लालू प्रसाद के आने या नीतीश के आने के बाद सामाजिक न्याय का यह अध्याय बिहार में शुरू नहीं हुआ है. राममनोहर लोहिया 1967 में ही ‘सौ में पिछड़ा पावे साठ’ का नारा देकर माहौल बदल रहे थे. इसलिए बार-बार लालू-नीतीश का नाम ले रहा हूं, नहीं तो ऐसा कोई शौक नहीं मुझे. इन लोगों ने भ्रम फैलाया है. अरे इन लोगों ने तो लोहिया जी का मूल सिद्धांत ही खत्म कर दिया. लोहिया जी ने नियम बनाया था कि कोई भी विधान पार्षद, पार्टी का वरिष्ठ पदाधिकारी, राज्यसभा सांसद मुख्यमंत्री या मंत्री नहीं बनेगा लेकिन देखिए इन लोगों को विधानसभा चुनाव तो लड़ते ही नहीं और मंत्री बन जाते हैं. एक बार बिहार सरकार में रामानंद तिवारी, भोला सिंह और बीपी मंडल मंत्री बने तो तीनों में से कोई विधायक नहीं था. हम लोगों ने तब लोहिया जी से शिकायत की कि आपका बनाया गया नियम तोड़ा जा रहा है. मैंने उसी समय उनसे कह दिया था कि पार्टी का नियम टूट रहा है मैं विरोध करूंगा और मैंने किया भी.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और लालू यादव से आप नाराज नजर आ रहे हैं. इसकी क्या वजह है?

वजह क्या है? अरे, दोनों से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी थोड़े ही है. व्यक्तिगत दुश्मनी होगी भी क्यों? न कभी बात-मुलाकात है, न मेरी उनसे कभी कोई अपेक्षा रही है. नाराजगी तो है कि राजनीति में अजीब सड़ांध मचाए हुए हैं और जो सड़ांध है, उससे आगे क्या होगा राजनीति में. आजकल दोनों का पसंदीदा काम भाजपा को गाली देना है और दोनों ही भाजपा के सौजन्य से बिहार की सत्ता संभाल चुके हैं.

लालू प्रसाद यादव भी भाजपा का सहयोग लेकर सत्तासीन हुए और नीतीश कुमार तो लंबे समय तक राज किए. अब भाजपा सांप्रदायिक लग रही है. फिर क्या हुआ कि नीतीश कुमार दस साल तक लालू को गाली देते रहे और जब सत्ता पाने में संकट मंडराने लगा तो उन्हीं के साथ मिल गए. अब देखिए, नई कहानी. नीतीश कुमार दस साल तक गांव-गांव शराब की दुकान खुलवाते रहे और अब रोज ढिंढोरा पीट रहे हैं कि शराबबंदी करवाकर उन्होंने ऐतिहासिक काम किया है. ये कह रहे हैं कि पूरा देश उनके मॉडल को क्यों नहीं मान रहा है. शराबबंदी अच्छी बात है लेकिन नीतीश इतना अकुला क्यों रहे हैं. पहले दस साल में बिहारियों को शराब की जो लत लगवाए हैं, उसे पहले बिहार में तो बंद ठीक से करवा दें, फिर देश भर में अपने मॉडल को स्थापित करवाने के लिए परेशान हों.

लालू और नीतीश तो कहते हैं कि सांप्रदायिकता से बिहार को बचाने के लिए और सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए एक हुए. अब तो नीतीश को फिर से पीएम प्रत्याशी की तरह पेश किया जा रहा है!

सांप्रदायिकता को वो लोग क्या दूर करेंगे जो खुद भाजपा की मेहरबानी से बिहार में सत्तासीन हुए हैं और राज भोग रहे हैं. रही बात सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ाने की तो उसमें दोनों लोग पिछड़ी जाति का ढिंढोरा पीटते हैं. पिछड़ी जाति से तो बिहार का पहला मुख्यमंत्री मैं था. कर्पूरी ठाकुर से भी पहले मैं मुख्यमंत्री बना था. पिछड़ी जाति की राजनीति में कैसे उभार किया जाता है, उसमें लोहिया जी सबसे तेज नेता थे लेकिन नीतीश हों चाहे लालू, लोहिया जी के विचार को तो ताक पर रख दिया गया. और आप कह क्या रहे हैं, पिछड़ा-पिछड़ा का राग गाएंगे और नरेंद्र मोदी बन जाएंगे तो नींद हराम हो जाएगी. नीतीश कुमार को फिर से पीएम प्रत्याशी की तरह पेश किया जा रहा है. अखबार में मैं भी ये सब पढ़ रहा हूं. अब चाहूं तो मैं भी खुद को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करवा सकता हूं. कोई रोक-टोक नहीं है, लेकिन नीतीश कैसे बनेंगे प्रत्याशी पहले ये स्पष्ट कर दें. कांग्रेस तो इनको अपनी पार्टी से प्रत्याशी बनाएगी नहीं. भाजपा भी ऐसा ही करेगी. तो ले-देकर मोर्चा बनाना ही एक विकल्प है. मोर्चा तीन साल से बना रहे हैं. संयोजक बनाए मुलायम सिंह यादव को, लेकिन
वे पहले ही अलग हो चुके हैं. बताइए, संयोजक भाग जाए तो मोर्चा कैसा बनेगा समझ सकते हैं. बिहार में तो मोर्चा इसलिए बन गया क्योंकि लालू चुनाव लड़ने के योग्य रह नहीं गए थे, नहीं तो नीतीश कभी उनसे गठबंधन नहीं करते.

लालू-नीतीश से इतना ही नाराज हैं तो बताइए कि दूसरा कौन-सा नेता आपको दिखता है जो उम्मीद जगाता है? क्या बिहार में भाजपा का राज आ जाता तो आपको शिकायत नहीं रहती?

मेरे कहने का ये मतलब नहीं है और न ही मैं किसी से नाराज हूं. मुझे लगता है बिहार को नई राजनीति चाहिए. वैसे लोग जब खुलकर राजनीति करेंगे, जो राजनीति में तो रुचि रखते हैं लेकिन आर्थिक कारणों से या दूसरी वजहों से राजनीति में नहीं आ रहे, तब सब कुछ बदलेगा. नहीं तो अब यही होगा कि जिसके पास पैसा होगा वह अपना तिकड़म भिड़ा लेगा. प्रशांत किशोर को लेकर आएगा और फिर पैसा झोंक देगा. राजनीति में विचार या सिद्धांत भी एक चीज होती है, वह खत्म हो जाएगा और सारा जोर किसी तरह बस चुनाव जीतने भर का रहेगा, जो बिहार के लिए खतरनाक होगा.

आप तो बाद में कांग्रेसी भी हो गए थे.
हां, कांग्रेस से तो मैं एक बार खगड़िया का सांसद भी रहा. भारी वोट से जीता था. हुआ यह कि 1980 में लोकसभा चुनाव होने वाला था. मेरे कई दोस्तों ने बोला कि तुमको इंदिरा जी जानती ही हैं, टिकट के लिए अप्लाई कर दो तो मैंने कर दिया. जगन्नाथ मिश्र नहीं चाहते थे कि मुझे टिकट मिले. कांग्रेसी नेता दिल्ली जाकर मिल रहे थे. वे हमारा नाम कटवाना चाह रहे थे लेकिन इंदिरा जी ने पूछ लिया कि इस समय वहां से कौन प्रत्याशी है तो कोई कुछ बताने की स्थिति में नहीं था. इंदिरा जी ने मुझसे पूछा ‘चुनाव लड़ोगे?’ मैंने हां कहा तो उन्होंने पूछा, ‘जीत जाओगे?’ मैंने कह दिया, ‘जी.’ इसके बाद चुनाव लड़ा और जीत गया.

राजनीतिक और सामाजिक तौर पर सक्रिय रहना था, इसलिए सोचा कि फिल्म बनाई जाए. इसके बाद मैंने ‘जोगी और जवानी’ नाम से एक फिल्म बनानी शुरू की जो कभी भी रिलीज नहीं हो सकी

आपने बीच में फिल्म निर्माण में भी हाथ आजमाया था. एक फिल्म भी बनाई थी. इसकी वजह?

हां, बनाया था न. लेकिन वह फिल्म कहां थी, खबर में बने रहने के लिए ऐसा किया था. जगजीवन राम के एक चेले हरिनाथ मिश्रा ने मेरे खिलाफ केस दर्ज करवा दिया था. धनबाद में पाटलीपुत्र मेडिकल कॉलेज खुला था. मैं उसके संस्थापकों में था. उसी कॉलेज के ट्रस्ट के सचिव की मदद से मेरे खिलाफ केस दर्ज करा दिया गया. आर्यावर्त अखबार और इंडियन नेशन में इसकी खबर भी प्रकाशित कर दी गई. मुझ पर गड़बड़ी का आरोप लगाया गया था. इसके बाद मुझे लगा कि अब तो मेरे खिलाफ अखबार में छप गया है, अब तो लोग मुझे भूल जाएंगे. राजनीतिक और सामाजिक तौर पर सक्रिय रहना था, इसलिए सोचा कि फिल्म बनाई जाए. इसके बाद मैंने ‘जोगी और जवानी’ नाम से एक फिल्म बनानी शुरू की जो कभी भी रिलीज नहीं हो सकी.

बाकी सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को तो आलीशान बंगला मिला हुआ है. आपको तो एक कोने में डाल दिया गया है और स्टाफ भी नहीं हैं. क्यों?

अरे, मुझे तो जो मिला, वह भी ले लिया गया. मेरा पटना में अपना कोई घर है क्या? नहीं. मैं तो ज्यादातर गांव या फिर दिल्ली में अपने बच्चों के पास रहता हूं. पटना में अपना कोई घर नहीं बनाया. सरकार की ओर से सबको जमीन भी मिली है, मेरे पास तो कोई जमीन भी नहीं है. और यह जो आवास है, वह तो मुझे सब पूर्व मुख्यमंत्री लोग के लालच के चलते मिल गया है.

जगन्नाथ मिश्र ने सबसे पहले यह व्यवस्था की कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास मिलेगा. लालू आए तो उन्होंने व्यवस्था कर दी कि उसी को मिलेगा जो कम से कम पांच साल रहा हो. अब उसमें खाली लालू ही फिट बैठते थे लेकिन उनकी चाल सफल नहीं हुई. राज्यपाल ने इस फैसले को नहीं माना. बाद में नीतीश को लगा तो उन्होंने किसी भी पूर्व मुख्यमंत्री के लिए मुख्यमंत्री आवास के साथ आठ स्टाफ और 12 हाउस गार्ड वाला प्रावधान जोड़ दिया. जीतन राम मांझी को मिला तो मुझे भी मिल गया. मुझे जो आवास मिला वह तो सबकी आपसी लड़ाई की वजह से मिला. इससे पहले मुझे कभी कोई आवास या स्टाफ वगैरह नहीं मिला था सो जो मिला तुरंत आकर रहने लग गया.

अब करते क्या हैं? समय कैसे काटते हैं?

अब तो गांव जाता हूं, खेती करता हूं. कुछ समय किताबें पढ़ने में बिताता हूं. हालांकि ज्यादातर समय खेती करने में ही लगाता हूं. कुछ दिन पटना में रहता हूं. फिर दिल्ली बच्चों के पास चला जाता हूं.

आपके बच्चों में से कोई भी राजनीति में नहीं आया.

यह सवाल ही नहीं पैदा होता. यह मुझे पसंद भी नहीं कि अनुकंपा पर बच्चे राजनीति करें और मैं नेता था तो मेरा बेटा मेरा उत्तराधिकारी बने. कोई कह नहीं सकता कि कभी मैंने अपने लिए या अपने बेटे के लिए कुछ भी मांग की हो. मैंने कभी किसी से नहीं कहा कि मुझे फलां पद दे दीजिए या कहीं एडजस्ट करवा दीजिए.

कैसे उत्तर प्रदेश में भाजपा किसी भी कीमत पर जीत को बेकरार है…

BJPWEB

भाजपा ने 2014 में लोकसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की. इस चुनाव में उसने उत्तर प्रदेश की कुल 80 सीटों में से 71 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था. अब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने में एक साल से कम समय बचा है. अगली सर्दी के मौसम में राज्य में चुनावी माहौल पूरी तरह से गर्म होगा. यह चुनाव भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर आएगा. प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है. मुख्य विपक्षी बसपा भी जोर-शोर से मैदान में है. इसके बावजूद इस समय भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद उसका अपना प्रदर्शन है, जो उसने लोकसभा चुनाव में दिखाया है. इसलिए हाल में जब उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक इलाहाबाद में हुई तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ. इस बैठक में एक तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य में चुनाव अभियान का श्रीगणेश ही कर दिया.

इस बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा, ‘बदलाव होते रहते हैं, लेकिन हमें आगे बढ़ते रहना चाहिए. हमें हमेशा नए आइडिया पर विचार करते रहना चाहिए. जो कार्यकर्ता हमारे साथ जुड़ा है, उसको एकजुट करके आगे बढ़ना है. हमारे देश में 80 करोड़ युवा हैं. उनके मन को पढ़ते हुए जरूरी बदलाव करना होगा.’ उन्होंने कहा, ‘प्रयाग का नाम ही सबसे बड़ा है. यहां बहुत बड़ा यज्ञ होने की वजह से ही नाम प्रयाग पड़ा था. अब यहां फिर से विकास का यज्ञ होगा. विकास का यज्ञ अहंकार, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, अनैतिकता, बेईमानी की आहुति लेकर सफल होता है.’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दौरान कार्यकर्ताओं व पार्टी नेताओं को सेवाभाव, संतुलन, संयम, समन्वय, सकारात्मकता, सद्भावना और संवाद कायम रखने संबंधी सात मंत्र भी दिए. वहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा, ‘उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतना होगा. यहां कानून का नहीं माफिया का राज चल रहा है. उत्तर प्रदेश सरकार कानून व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम साबित हुई है. मथुरा और कैराना का मामला सबके सामने है. इसमें सीधा दोष राज्य सरकार का है.’ इस बैठक में यह भी साफ हो गया कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बीच का श्रम विभाजन स्पष्ट है. मोदी विकास के मंत्र का जाप करेंगे और शाह मथुरा, कैराना जैसे भावनात्मक मुद्दों को उछाल कर जनता का समथन हासिल करने की कोशिश करेंगे.

इलाहाबाद के सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर प्रदीप सिंह प्रयाग में भाजपा कार्यकारिणी की बैठक पर कहते हैं, ‘भाजपा की इस कार्यकारिणी में शामिल होने संगम आए नेता पुण्य कमाते नजर आए. ज्यादातर नेताओं ने संगम में स्थान, बनारस में बाबा विश्वनाथ के दर्शन और विंध्याचल में मां विंध्यवासिनी की पूजा की. इन नेताओं ने पुण्य चाहे जितना कमाया हो पर सियासी रूप से कार्यकारिणी का कोई बड़ा फैसला नहीं दिखा. प्रधानमंत्री मोदी विकास की माला जपते रहे तो अध्यक्ष अमित शाह कैराना और मथुरा के इर्द-गिर्द ही सिमटे रहे. उत्तर प्रदेश के चुनाव के लिए किसी ठोस घोषणा या भावी मुख्यमंत्री के उम्मीदवार का नाम तक इस कार्यकारिणी में तय नहीं हो पाया.’

‘हमारा अभी का नारा ‘हर बूथ पर बीस यूथ’ का है. इसी नारे पर काम चल रहा है. इसके तहत एक बूथ अध्यक्ष और 20 युवाओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है. इसके अलावा अनुभवी और पुराने कार्यकताओं को भी जोड़ा गया है. इसके बाद हम हर गांव में कम से कम 20 समर्पित युवाओं को पार्टी के प्रचार की कमान सौंपेंगे. अभी राष्ट्रीय अध्यक्ष पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर इन बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं में जोश भर रहे हैं’

गौरतलब है कि भाजपा के कट्टर समर्थक भी यह मानते हैं कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव से काफी भिन्न होंगे. लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी जब चुनाव प्रचार के लिए उतरे थे, तब वे मतदाताओं से कोई भी वादा करने के लिए स्वतंत्र थे. उन्होंने इस दौरान ढेर सारे वादे भी किए. विदेशों से काला धन वापस लाकर हर देशवासी की जेब में 15 लाख रुपये डालना, भ्रष्टाचार मिटाना और तेजी के साथ देश की अर्थव्यवस्था का विकास, युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करना और कीमतें घटाने का वादा उनमें से प्रमुख हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव आते-आते मोदी सरकार के कार्यकाल के भी लगभग तीन साल पूरे होने वाले होंगे. इस दौरान सरकार का प्रदर्शन भी जनता के सामने होगा और जनता इस आधार पर अपना निर्णय सुनाएगी.

भाजपा को दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम से बड़ा सबक भी मिल चुका है. दिल्ली में उसने लोकसभा की सातों सीटें जीती थीं लेकिन एक साल के भीतर ही उसकी यह हालत हो गई कि विधानसभा चुनाव में उसे 70 सीटों में से केवल तीन पर सफलता मिल सकी. बिहार में बड़े जोर-शोर से प्रचार और पूरे संसाधन झोंक देने के बाद भी उसे हार का सामना करना पड़ा. इसलिए उत्तर प्रदेश में वह बहुत सावधानी के साथ कदम बढ़ा रही है.

BJPweb2

प्रदीप सिंह कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव में भाजपा की सफलता का कारण मोदी-केंद्रित प्रचार था. इससे सबसे अधिक प्रभावित और उत्साहित नौजवान हुए थे क्योंकि उन्हें लगा था कि भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, उनका रोजगार पाने का सपना पूरा होगा, कीमतों में कमी आ जाएगी, महंगाई खत्म होगी. अब तीन साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में वही नौजवान मतदाता देखेगा कि कितने रोजगार पैदा हुए. कीमतों में कितनी गिरावट आई, भ्रष्टाचार में कितनी कमी आई.’
जानकार कहते हैं कि इसी डर के चलते भाजपा विकास के साथ उन मुद्दों को भी नहीं छोड़ना चाहती है जिससे मतदाताओं को सांप्रदायिक आधार पर बांटा जा सके. इसके संकेत भी इलाहाबाद में हुई कार्यकारिणी की बैठक में मिल चुके हैं. हालांकि इसमें प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की मौन सहमति भी उसे मिल रही है. समाजवादी पार्टी को यह लगता है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की स्थिति में उसे भी फायदा होगा क्योंकि सुरक्षा की तलाश में मुसलमान उसकी शरण में आएंगे. पर अभी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे मायावती की बहुजन समाज पार्टी के पास नहीं जाएंगे.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर आफताब आलम कहते हैं, ‘अल्पसंख्यकों में वोट को लेकर अभी भ्रम की स्थिति है. अभी वे सपा से नाराज हैं, कांग्रेस के पास जाने का विकल्प सुरक्षित नहीं है. क्योंकि अल्पसंख्यक मतदाताओं की दिक्कत यह है कि वे उसी पार्टी को एकमुश्त वोट देते हैं जो सरकार बनाने की स्थिति में होती है. कांग्रेस इस स्थिति में अभी दिखाई नहीं दे रही है. ऐसे में बसपा बेहतर विकल्प है. लेकिन जिस तरह की परिस्थितियां अभी चल रही हैं उस हिसाब से लगता है कि प्रदेश में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने जा रहा है. लंबा वक्त है, अगर प्रदेश में चुनाव से पहले गठजोड़ बनता है जैसे बसपा और कांग्रेस के बीच में तो स्पष्ट है मुसलमान मतदाता इस ओर आकर्षित होंगे.’

‘उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत की संभावना तो है. लोकसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन बेहतरीन रहा है. हम अगर लोकसभा से विधानसभा चुनाव में करीब दस प्रतिशत वोट की गिरावट मानें तब भी भाजपा फायदे में है. अब हमें यह देखना होगा कि राज्य में मुकाबला कैसे होता है. विपक्ष एकजुट होता है या नहीं. अगर मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय रहा तो निश्चित रूप से भाजपा को फायदा होगा’

हालांकि ऐसी परिस्थितियां अभी भाजपा के लिए फायदेमंद दिख रही हैं. कांग्रेस अभी इस स्थिति में नहीं है कि वह प्रदेश की राजनीति में कोई जादू दिखा सके. उसकी समस्या दोनों स्तरों पर है. कार्यकर्ताओं की कमी के साथ-साथ प्रदेश में पार्टी के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं है जो उम्मीद जगा सके. चुनावी मैनेजमेंट के गुरु प्रशांत किशोर की सेवाएं भी स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को लुभाने में असफल रही हैं. प्रदेश की जनता ने पिछली दो विधानसभा चुनावों में दोनों बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों का भी कार्यकाल देख लिया है. दोनों के शासनकाल में कुछ बेहतर होने के साथ बहुत कुछ बुरा भी रहा है. लेकिन, लगता है भाजपा उत्तर प्रदेश की लड़ाई के लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रही. पार्टी उत्तर प्रदेश में जीत के लिए निर्णायक मुद्दा और निर्णायक चेहरा ही नहीं तलाश पा रही है लेकिन पार्टी के नेता इस बात से इनकार कर रहे हैं. वे कह रहे हैं कि अभी हमारे पास वक्त है और पार्टी अपनी कमियों को दूर करने की दिशा में तेजी से बढ़ रही है.

भाजपा ने अगले साल यूपी विधानसभा चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए कई प्लान बनाए हैं. इस पर काम भी जारी है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि चुनाव में जीत के लिए पूरे राज्य को छह हिस्सों में बांटा गया है- अवध, कानपुर-बुंदेलखंड, गोरखपुर, बृज, काशी और पश्चिम. इसके लिए हर क्षेत्र में एक अध्यक्ष होगा. इसके लिए आरएसएस बैकग्राउंड रखने वाले भाजपा नेताओं को चुना गया है. इसके साथ ही संघ का महासचिव इनका नेतृत्व करेगा. इनका चुनाव हो गया है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक रत्नाकर पांडे (काशी), शिवकुमार पाठक (गोरखपुर), बृज बहादुर (अवध), ओम प्रकाश (कानपुर-बुंदेलखंड), भवानी सिंह (बृज) और चंद्रशेखर (पश्चिम) कमान संभालेंगे. इनमें से ज्यादातर नेताओं ने एबीवीपी के लिए काम किया है.

इसके अलावा पार्टी का लक्ष्य राज्य के हर चुनावी बूथ पर अपनी पकड़ मजबूत करना है. इस काम में अमित शाह खुद दिलचस्पी ले रहे हैं. इसमें उनका साथ पार्टी के राज्य प्रभारी ओम प्रकाश माथुर और प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य दे रहे हैं. पार्टी से जुड़े लोगों का कहना है कि पूरे राज्य में हर बूथ के अध्यक्ष और 20 समर्पित कार्यकर्ताओं की सूची तैयार हो गई है. अब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उन्हें आगे की रणनीति समझा रहे हैं. इसके लिए कानपुर, बाराबंकी, बस्ती समेत कई जगहों पर बूथ स्तरीय बैठकें हो चुकी हैं.

‘जब तक बाबरी मस्जिद बनी हुई थी तब तक वह इसके नाम पर लोगों को एकजुट कर लेती थी. जब से यह मस्जिद गिरी है तब से इसके नाम पर वोट लेने की क्षमता भी घटती गई है. आज की स्थिति यह है कि अयोध्या के नाम पर वोट मिलना संभव नहीं है. भाजपा इस मुद्दे का जितना दोहन कर सकती है वह कर चुकी है. अब लोग मंदिर के नाम पर जान नहीं देने वाले हैं. ऐसे में भाजपा के पास मुद्दे की कमी है’

कौशांबी के सरसवां ब्लॉक के पूर्व प्रमुख और भाजपा नेता लाल बहादुर कहते हैं, ‘पार्टी का मुख्य जोर संगठन को मजबूत करने का है. हम हर बूथ पर करीब 20 ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज तैयार कर रहे हैं जो लोगों को पार्टी के पक्ष में मतदान करने के लिए प्रेरित कर सकें. हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष इस काम में जोर-शोर से लगे हैं. हर दिन रैलियां हो रही हैं. जनता पूरे उत्साह में है. हमारा मुख्य मुकाबला सपा से है और इस बार हम उसकी सरकार को उखाड़ फेंकेंगे.’

वहीं उत्तर प्रदेश भारतीय जनता युवा मोर्चा के सोशल मीडिया संयोजक और बस्ती के रहने वाले भावेश पांडेय कहते हैं, ‘पार्टी के कार्यकर्ताओं में भरपूर ऊर्जा है. हमारा अभी का नारा ‘हर बूथ पर बीस यूथ’ का है. इसी नारे पर काम चल रहा है. इसके तहत एक बूथ अध्यक्ष और 20 युवाओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है. इसके अलावा अनुभवी और पुराने कार्यकर्ताओं को भी जोड़ा गया है. इसके बाद हम हर गांव में कम से कम 20 समर्पित युवाओं को पार्टी के प्रचार की कमान सौंपेंगे. अभी राष्ट्रीय अध्यक्ष पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर इन बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं में जोश भर रहे हैं. हम प्रदेश की अपनी सफलता को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं.’
पार्टी ने लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया के सहारे जीत हासिल की थी. इस बार भी वह इसी फिराक में है. कार्यकर्ताओं और नेताओं को इस बारे में संकेत दिए जा चुके हैं. भावेश कहते हैं, ‘हमारी सोशल मीडिया पर तगड़ी पकड़ है. राज्य के कोने-कोने में हमारा कार्यकर्ताओं से संवाद हो रहा है. सबसे अच्छी बात है कि ये पेड वर्कर नहीं हैं जैसे कांग्रेस में लोगों को भर्ती किया जा रहा है. ये लोग अपना पैसा खर्च करके हमसे जुड़ रहे हैं. यह हमारी ताकत है. इसी के सहारे हम 2017 में मिशन 265 प्लस को साकार करेंगे.’

Cover1web

Cover2web

प्रदेश भाजपा से जुड़े एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि चुनावी तैयारियों में पार्टी का ध्यान पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर ज्यादा है. पार्टी ने लोकसभा चुनावों में यहां बेहतर प्रदर्शन किया था. अब उसे दोहराने की कोशिश भी जारी है. इस तरफ के नेता इस तरह की तैयारियों में लगे हुए हैं. इसकी कमान कैराना से सांसद हुकुम सिंह, केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा, आगरा के सांसद रामशंकर कठेरिया, मुजफ्फरनगर सांसद संजीव बालियान और सरधना से विधायक संगीत सोम ने संभाल ली है. इन सभी नेताओं की पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर अच्छी पकड़ है. ये नेता अलग-अलग मुद्दों के आधार पर पार्टी की जीत के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में आखिरी बार भाजपा की सरकार 2002 में थी. 08 मार्च, 2002 को पार्टी नेता राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद से प्रदेश में कभी कमल नहीं खिल पाया है. अभी अपने हाल के भाषणों में राजनाथ सिंह बार-बार जनता से 14 साल के वनवास को खत्म करने की मांग करते हुए नजर आए हैं. पार्टी के कार्यकर्ताओं में भी इस बार उत्साह दिख रहा है. विश्लेषक इसके पीछे कुछ कारण बताते हैं. दरअसल केंद्र में पहली बार भाजपा की बहुमत वाली सरकार आई है. इसमें उत्तर प्रदेश की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर पार्टी के कार्यकर्ता जनता के बीच जा रहे हैं. इलाहाबाद कार्यकारिणी की बैठक में मोदी ने भी पार्टी नेताओं से कहा है कि वे सरकार की गरीबों और आम लोगों से जुड़ी योजनाओं को सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक के जरिए फैलाएं.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग के विभागाध्यक्ष एचके शर्मा कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में जो समीकरण बन रहे हैं उससे भाजपा को फायदा मिल रहा है. राज्य में क्षेत्रीय पार्टियों सपा और बसपा का जो हालिया शासन रहा है वह बहुत ही स्वेच्छाचारी रहा है. इस दौरान प्रदेश का विकास पूरी तरह से ठप रहा है.

मतदाताओं के दिमाग में यह बात है कि हमने केंद्र में भाजपा को एक बार मौका दिया है तो राज्य में भी यह दिया जाना चाहिए. भाजपा को वोट देने का फायदा यह है कि अगर प्रदेश का नेतृत्व सही ढंग से काम नहीं कर रहा है तो केंद्र का मजबूत नेतृत्व उसे दुरुस्त कर देगा. उस पर अंकुश लगाएगा. भाजपा के पास बहुत अच्छा केंद्रीय नेतृत्व है जिससे लोगों को बहुत उम्मीद है. अभी तक भ्रष्टाचार का कोई मामला केंद्रीय सरकार के खिलाफ नहीं आया है. इसका फायदा निश्चित रूप से राज्य के चुनाव में मिलेगा.’

भाजपा जब उत्तर प्रदेश में पहली बार सत्ता में आई थी तो उसका नारा था कि वह औरों से अलग है लेकिन बाद में पार्टी ने राज्य में सरकार बनाने के लिए गठबंधन से लेकर दूसरी पार्टियों में तोड़-फोड़ तक का सहारा लिया. इससे उसकी छवि को बट्टा लगा. बाद में जमीनी नेता कल्याण सिंह के पार्टी से अलगाव ने भाजपा का बंटाधार कर दिया. वे पिछड़े वर्ग के नेता थे और उनका राज्य में बेहतर जनाधार था

उत्तर प्रदेश में चार प्रमुख दलों भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा के बीच मुकाबला होने की उम्मीद है. विश्लेषक कहते हैं कि अगर चुनाव पूर्व भाजपा विरोधी दलों के बीच किसी तरह का गठबंधन नहीं होगा तो इसका फायदा मिलेगा. अभी प्रदेश में जो हालात हैं उसे देखकर यही लग रहा है कि सभी दल अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरेंगे. कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि सपा जितनी मजबूती से चुनाव लड़ेगी उतना ही फायदा भाजपा को होगा, क्योंकि इससे बसपा और कांग्रेस का सीधा नुकसान होगा.

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत की संभावना तो है. लोकसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन बेहतरीन रहा है. हम अगर लोकसभा से विधानसभा चुनाव में करीब दस प्रतिशत वोट की गिरावट मानें तब भी भाजपा फायदे में है. अब हमें यह देखना होगा कि राज्य में मुकाबला कैसे होता है. विपक्ष एकजुट होता है या नहीं. अगर मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय रहा तो निश्चित रूप से भाजपा को फायदा होगा.’

वहीं जानकार अमित शाह के चुनावी प्रबंधन को भाजपा की मजबूती बताते हैं. उनका मानना है कि अमित शाह किसी भी चुनाव में अपना सब कुछ झोंक देते हैं. वे इस विधानसभा चुनाव की तैयारी लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद से कर रहे हैं. इसी योजना के तहत प्रदेश से बहुत सारे नेताओं को मंत्री बनाया गया. वे लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहे थे. तब समर्पित कार्यकर्ताओं की बनाई गई सूची को उन्होंने अब और विस्तार दे दिया है.

भाजपा कार्यकर्ता और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के नेता राघवेंद्र सिंह कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव में एक बार जब अमित शाह उत्तर प्रदेश आ गए तब से वे वापस नहीं गए हैं. उनकी सबसे अच्छी खूबी यह है कि वे कार्यकर्ताओं से सीधे जुड़ रहे हैं. उनका मैनेजमेंट लाजवाब है. दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद विरोधी भले ही उन पर सवाल उठाएं लेकिन इससे पहले भाजपा के चुनाव प्रचार में कभी इतना उत्साह नजर नहीं आता था.’

राघवेंद्र की इस बात से नीरजा चौधरी भी सहमत हैं. वे कहती हैं, ‘भाजपा जमकर चुनाव मैदान में उतर रही है. यह उसके लिए फायदेमंद है. यह चुनाव उनके लिए जीने-मरने वाली बात है. यह विधानसभा चुनाव अगले लोकसभा चुनाव की दिशा को तय करेगा. अगर भाजपा इसमें बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाती है तो पार्टी के अंदर से भी लोग छूरियां निकाल लेंगे. मोदी-शाह की जोड़ी पर सवाल उठना शुरू हो जाएगा.’

BJPweb3

हालांकि सारे लोग इससे सहमत हों ऐसा नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि आज की स्थिति में उत्तर प्रदेश में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने जा रहा है. ऐसा भी नहीं है कि भाजपा नंबर एक पर आने वाली है. हाल में उन्होंने जिस तरह की राजनीति की है उससे तो मामला और भी खराब हुआ है. उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिकता के आधार पर आप सरकार नहीं बना सकते हैं. बस वोट में बढ़ोतरी हो सकती है. योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज और अमित शाह स्वयं इसी तरह की राजनीति करते नजर आ रहे हैं. जबकि मोदी ने जब 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा था तो उन्होंने स्वयं इस तरह की कोई राजनीति नहीं की थी. उन्होंने विकास और भ्रष्टाचार जैसे मसले उठाए थे.’

भाजपा जब उत्तर प्रदेश में पहली बार सत्ता में आई थी तो उसका नारा था कि वह औरों से अलग है लेकिन बाद में पार्टी ने राज्य में सरकार बनाने के लिए गठबंधन से लेकर दूसरी पार्टियों में तोड़-फोड़ तक का सहारा लिया. इससे उसकी छवि को बट्टा लगा. बाद में जमीनी नेता कल्याण सिंह के पार्टी से अलगाव ने भाजपा का बंटाधार कर दिया. वे पिछड़े वर्ग के नेता थे और उनका राज्य में बेहतर जनाधार था. उनके बाद कोई उतना बड़ा जनाधार वाला नेता भाजपा में सामने नहीं आया. इसके अलावा भाजपा में जो भी बड़े नेता थे वे सिर्फ कागजी शेर थे या फिर क्षेत्र विशेष या जातीय नेता के रूप में ही स्थापित होते रहे.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जात और जमात एक हकीकत है. ऐसे में हर पार्टी को इस हिसाब से अपनी रणनीति बनानी होती है. भाजपा इसमें बुरी तरह से असफल रही. वह अब भी ठाकुरों, ब्राहमणों और बनियों की पार्टी बनी हुई है. बीच-बीच में उसका यह जनाधार भी खिसकता रहा. इसका सीधा असर पार्टी के प्रदर्शन पर दिखता है. 1991 में पार्टी ने 221 सीटों पर जीत दर्ज की थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने थे. करीब डेढ़ साल बाद बाबरी मस्जिद विध्वंस की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने त्यागपत्र दे दिया. इसके बाद 1993 में हुए चुनाव में पार्टी सपा और बसपा के गठजोड़ को भेद पाने में असफल रही और 177 सीटों पर जीत हासिल की. हालांकि प्रदेश में सरकार सपा और बसपा की बनी. 1996 के चुनाव में भाजपा को 174 सीटें मिलीं. इस दौरान उसने बसपा के साथ गठबंधन और बाद में बसपा में तोड़फोड़ करके राज्य में सरकार बनाई. हालांकि इस दौरान कल्याण सिंह, राम प्रकाश गुप्त और राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने. इसके बाद 2002 के चुनाव में पार्टी की बुरी गत हुई. उसे मात्र 88 सीटों पर जीत हासिल हुई. इस चुनाव के बाद से पार्टी कभी लय नहीं पकड़ पाई. 2007 के चुनाव में पार्टी ने 51 तो 2012 के चुनाव में मात्र 47 सीटों पर जीत दर्ज की.

उत्तर प्रदेश में बन रही सांप्रदायिक छवि से बड़ी समस्या राज्य में भाजपा के खुद के चेहरे की है. पार्टी में इस बात को लेकर स्पष्टता नहीं है. भाजपा का एक धड़ा उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा घोषित किए बिना ही नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने की बात कर रहा है. इस धड़े का मानना है कि इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह रहेगा और एकजुटता भी मजबूत होगी

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, ‘जब तक बाबरी मस्जिद बनी हुई थी तब तक वह इसके नाम पर लोगों को एकजुट कर लेती थी. जब से यह मस्जिद गिरी है तब से इसके नाम पर वोट लेने की क्षमता भी घटती गई है. आज की स्थिति यह है कि अयोध्या के नाम पर वोट मिलना संभव नहीं है. भाजपा इस मुद्दे का जितना दोहन कर सकती है वह कर चुकी है. अब लोग मंदिर के नाम पर जान नहीं देने वाले हैं. ऐसे में भाजपा के पास मुद्दे की कमी है. अब कभी वह लव जिहाद, कभी मुजफ्फरनगर, कभी गोहत्या या फिर सांप्रदायिकता बढ़ाने वाले दूसरे मुद्दे उठा रही है लेकिन इससे जनाधार में इजाफा होता नजर नहीं आ रहा है.’
भाजपा द्वारा सांप्रदायिकता के मुद्दे को भुनाने की कोशिश पर ज्यादातर विश्लेषक सहमत दिखते हैं. लखनऊ यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर मुकुल श्रीवास्तव कहते हैं, ‘भाजपा की संभावना पूरी तरह से ध्रुवीकरण पर आधारित है. अगर वह यह कराने में सफल रहती है तो उसकी सरकार बनेगी. उत्तर प्रदेश में अभी विकास मुद्दा नहीं है. भाजपा के पास न तो सपा, बसपा से इतर कोई मुद्दा है और न ही कोई चेहरा है. विकास की बातें सारी पार्टियां करती हैं. जातीय राजनीति में भी भाजपा सपा और बसपा से पीछे है.’ वहीं एचके शर्मा कहते हैं, ‘भाजपा अब भी ध्रुवीकरण की राजनीति से बाहर नहीं आई है. यह स्पष्ट तौर पर भाजपा को नुकसान पहुंचाएगा. दूसरी बात प्रदेश में भाजपा का संगठन अब भी बहुत मजबूत नहीं है. यहां कार्यकर्ताओं की कमी है. कार्यकर्ताओं के लिए भाजपा अब भी संघ पर निर्भर है. हमें यह ध्यान रखना होगा कि संघ के कार्यकर्ता भाजपा के साथ पहले भी रहे हैं लेकिन इससे मत प्रतिशत में कोई खास इजाफा नहीं हुआ है.’

जानकार इस मुद्दे पर भाजपा को नुकसान होने की संभावना जता रहे हैं. आफताब आलम कहते हैं, ‘भाजपा के साथ दिक्कत यह है कि वह अभी सपा सरकार को घेरने के लिए कोई खास मुद्दा तलाश नहीं पाई है. अभी उनका पूरा ध्यान सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर है. वह इसी को आगे बढ़ा रही है. योगी आदित्यनाथ, हुकुम सिंह, संगीत सोम, साक्षी महाराज जैसे लोग इस पर लगातार बोल रहे हैं. मजेदार यह है कि जब ये लोग कुछ उल्टा-सीधा बोल देते हैं तो पार्टी इसे इनका निजी बयान बताकर पीछे हट जाती है. यह एक तरह से टेस्टिंग करती है कि यह उसके लिए कितना फायदेमंद है. यह मसला उसकी छवि को नुकसान पहुंचा रहा है. दरअसल भाजपा के पास विकास का कोई ऐसा मॉडल नहीं है जिसके सहारे वह प्रदेश में अपनी राजनीति चमकाए.’

उत्तर प्रदेश भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा की प्रभारी रुमाना सिद्दीकी इससे इनकार करती हैं. वे कहती हैं, ‘उत्तर प्रदेश की जनता सपा सरकार की गुंडागर्दी से त्रस्त हो चुकी है. इस बार प्रदेश में भाजपा की सरकार आएगी. जहां तक हमारे ऊपर आरोप लगता है कि हम सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर रहे हैं तो यह बिल्कुल बेबुनियाद और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है. भाजपा इस तरह की राजनीति में बिल्कुल विश्वास नहीं रखती है. हम मुस्लिम हैं और हमने आज तक ऐसा नहीं देखा कि पार्टी में सांप्रदायिक बातों को बढ़ावा दिया जाता हो. दूसरी पार्टी वाले कुछ भी बोलें और चिल्लाएं इससे हमें फर्क नहीं पड़ता है.’

हालांकि उत्तर प्रदेश में बन रही सांप्रदायिक छवि से बड़ी समस्या राज्य में भाजपा के खुद के चेहरे की है. पार्टी में इस बात को लेकर स्पष्टता नहीं है. भाजपा का एक धड़ा उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा घोषित किए बिना ही नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने की बात कर रहा है. इस धड़े का मानना है कि इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह रहेगा और एकजुटता भी मजबूत होगी. लेकिन पार्टी में ज्यादातर कार्यकर्ताओं की इच्छा है कि उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री के नाम पर उसके पास एक चेहरा जरूर हो. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ही इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग मौके पर अलग-अलग राय जाहिर कर चुके हैं. इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में और भी कनफ्यूजन पैदा हो रहा है. पार्टी के कुछ लोग कहते हैं कि अभी वे अपने नए प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य का चेहरा जनता के बीच ले जाना चाहते हैं. अगर अभी ही मुख्यमंत्री का चेहरा सामने आ गया तो मौर्य का प्रभाव फीका पड़ जाएगा.

Cover3web
उत्तर प्रदेेश में भाजपा नेताओं के समर्थकों ने मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर फेसबुक पर अभियान चला रखा है.

मुकुल श्रीवास्तव कहते हैं, ‘भाजपा ने अभी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. उसे इसका नुकसान होगा. राज्य की जनता ने अखिलेश और मायावती दोनों का राज देखा है. इन दोनों के शासनकाल में कुछ कमियां सामने आईं तो कुछ खूबियां भी रही हैं. मायावती को आज भी लोग कानून व्यवस्था के लिए याद करते हैं. अखिलेश यादव की व्यक्तिगत तौर पर छवि बहुत अच्छी है. पार्टी के बाहर के भी लोग उन्हें पसंद करते हैं. वहीं उत्तर प्रदेश में भाजपा अब भी राम मंदिर के लिए याद की जाती है, जबकि इस मुद्दे को देखते-सुनते एक पूरी पीढ़ी जवान हो गई है. पार्टी के जितने भी चेहरे हैं वे सब गुटबंदी के शिकार हैं. अगर राजनाथ सिंह उम्मीदवार बनते हैं तो खेल पलट सकता है. लेकिन जाति का मसला फंसेगा.’

भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिए चेहरे का सवाल उठते ही अलग-अलग कोनों से अलग-अलग चेहरों की बात सामने आने लगती है. कभी बेहद बुजुर्ग हो चुके राज्यपाल कल्याण सिंह की बात आती है तो कभी तेजतर्रार स्मृति ईरानी की. उमा भारती वाला दांव तो पिछले विधानसभा चुनाव में ही फुस्स हो गया था. हालांकि उनके समर्थक मानते हैं कि उन्हें सही तरीके से जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी इसलिए ऐसा हुआ है. इस बार उनके नाम पर माहौल बन सकता है. इसके अलावा गोरखपुर के योगी आदित्यनाथ और सुल्तानपुर के वरुण गांधी को लेकर उनकेे समर्थक बहुत उत्साहित हैं. दावेदारों में केंद्र सरकार में मंत्री मनोज सिन्हा, कलराज मिश्र और महेश शर्मा से लेकर राज्यसभा सांसद विनय कटियार तक का नाम चर्चा में है. लेकिन इनमें से कोई भी चुनावी कुंभ में बसपा और समाजवादी पार्टी के नेतृत्व जितना वजनी नहीं है, ऐसी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व के ही एक वर्ग की राय है.

वैसे मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा में एक बड़ा नाम राजनाथ सिंह का भी है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में और प्रदेश अध्यक्ष के रूप में वे अपना राजनीतिक कौशल दिखा भी चुके हैं. हालांकि राजनाथ सिंह स्वयं इस दावेदारी को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं. इस प्रश्न के उत्तर में अब तक उन्होंने जो कुछ भी कहा है उससे ऐसे ही संकेत मिलते हैं. हाल ही में उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ही काम करना चाहते हैं. जहां-जहां वे जाएंगे वहां-वहां हम भी जाएंगे.
ऐसे में यह माना जा रहा है कि केंद्रीय राजनीति का आनंद ले रहे राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश की राजनीति में वापसी के लिए जरा भी उत्सुक नहीं हैं और शायद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी इस स्थिति में नहीं हैं कि उन्हें इसके लिए निर्देशित कर सकें. इन स्थितियों और भीतरी अंतर्द्वंद्वों के कारण उत्तर प्रदेश में चेहरा चुनने और न चुनने के मुद्दे ने भाजपा के लिए ऊहापोह की स्थिति बना दी है. हालांकि भाजपा नेतृत्व का कहना है कि उत्तर प्रदेश में वह मुद्दों पर आधारित चुनाव लड़ेगी न कि चेहरे पर आधारित. मगर बिहार में चेहरा न चुनने के नुकसान और असम में चेहरा चुन लेने के फायदे देख चुकी भाजपा उत्तर प्रदेश के लिए तो फिलहाल चेहराविहीन ही दिख रही है.

‘भाजपा ने अभी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. उसे इसका नुकसान होगा. राज्य की जनता ने अखिलेश और मायावती दोनों का राज देखा है. इन दोनों के शासनकाल में कुछ कमियां सामने आईं तो कुछ खूबियां भी रही हैं. मायावती को आज भी लोग कानून व्यवस्था के लिए याद करते हैं. अखिलेश यादव की व्यक्तिगत तौर पर छवि बहुत अच्छी है. पार्टी के बाहर के भी लोग उन्हें पसंद करते हैं’

शरत प्रधान कहते हैं, ‘जहां तक मुख्यमंत्री के चेहरे का सवाल है तो पार्टी इस स्थिति में है ही नहीं कि वह अपने दम पर सरकार बना सके. इसके बाद उसके पास राजनाथ सिंह के अलावा ऐसा कोई विश्वसनीय चेहरा भी नहीं है जो कुछ उम्मीद जगा सके. योगी आदित्यनाथ, स्मृति ईरानी, वरुण गांधी जैसे जो बाकी नाम अभी चल रहे हैं वे सर्वमान्य नहीं हैं. अब राजनाथ सिंह के सामने समस्या यह है कि वे खुद को दिल्ली की राजनीति से बाहर नहीं करना चाहते हैं. शायद दिल्ली में बैठे उनके विरोधी उन्हें वहां से बाहर करने के लिए ये चाल चल रहे हैं. अगर वे मुख्यमंत्री बन भी जाते हैं तो वे उत्तर प्रदेश में ही रह जाएंगे और हार जाते हैं तो फिर भी वह दिल्ली से बाहर हो जाएंगे. उनकी राजनीति खत्म हो जाएगी.’

वे आगे कहते हैं, ‘जहां तक फायदे-नुकसान की बात है तो यह चेहरे पर निर्भर करता है. अगर उन्हें बेहतर चेहरा नहीं मिलता है तो वे बिना किसी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के मैदान में जाएं. खराब उम्मीदवार को चेहरा बनाने से पार्टी का भला नहीं होने वाला है. ऐसा नहीं है कि भाजपा किसी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाती है तो रसातल में चली जाएगी या किसी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बना देगी तो वह बड़ी जीत हासिल कर लेगी.’

हालांकि भाजपा नेतृत्व उत्तर प्रदेश में मिशन 265 प्लस पूरा करने के लिए सुयोग्य चालक की तलाश भले ही नहीं कर पा रहा है लेकिन मुख्यमंत्री उम्मीदवार को लेकर अभी से नेता अपनी-अपनी दावेदारी पेश करते हुए नजर आ रहे हैं. हालांकि, यह दावेदारी नेता सीधे तौर पर पेश नहीं कर रहे, बल्कि उनके समर्थक इस काम में लगे हुए हैं. हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक सुल्तानपुर से भाजपा सांसद वरुण गांधी के समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने की मांग कर रहे हैं.

उनके समर्थकों का दावा है कि भाजपा-आरएसएस के सर्वे में वरुण गांधी मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं. वरुण पिछले एक साल से राज्य में दौरा कर रहे हैं और अलग-अलग जिलों के गांवों में बैठक कर रहे हैं. हालांकि उनके सहयोगी आधिकारिक तौर पर इससे इनकार कर रहे हैं कि वे मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी के समर्थन के लिए दौरे कर रहे हैं. कुछ दिन पहले ऐसे ही कुछ पोस्टर इलाहाबाद में भी नजर आए थे. जिनमें लिखा था, ‘स्मृति ईरानी हुई बीमार. उत्तर प्रदेश की यही पुकार, वरुण गांधी अब की बार.’ इतना ही नहीं वरुण के कुछ सहयोगी फेसबुक अकाउंट बनाकर वरुण को भाजपा सीएम उम्मीदवार बनाए जाने के लिए समर्थन भी मांग रहे हैं.

BJP_25web

हालांकि सोशल मीडिया पर सिर्फ वरुण गांधी के समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की मांग नहीं कर रहे हैं बल्कि योगी आदित्यनाथ, स्मृति ईरानी, केशव प्रसाद मौर्य समेत सभी नेताओं के समर्थक ऐसी बातों को हवा दे रहे हैं.

इन सबसे इतर उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण को सही तरीके से सेट करने में भाजपा बुरी तरह से असफल रही है. हालांकि भाजपा नेताओं को अब भी यह भरोसा है कि उसके साथ प्रदेश में अगड़ी जाति के लोग बने हुए हैं. यह वही वोट बैंक है जिसने 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को एकमुश्त वोट दिया था. इसके अलावा भाजपा को यह भी लगता है कि प्रदेश का बनिया वर्ग भी उसके ही साथ है. भाजपा को यह भरोसा है कि इन सभी वर्गों के लोगों के सामने सपा-बसपा के साथ जाने का विकल्प नहीं है इसलिए यह वोट बैंक तो उसके हाथ में है ही.

लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को यह भी एहसास है कि सिर्फ इसी वर्ग के बूते वह सूबे में अपनी सरकार नहीं बना सकती. इसलिए भाजपा अपने लिए नए समर्थक वर्गों की तलाश में भी है. इसका कारण यह है कि 2007 में मायावती ने दलित और ब्राह्मण का मेल बनाकर सफलता पाई तो 2012 में अखिलेश यादव की युवा छवि के साथ पिछड़ा और मुसलमान गठजोड़ ने सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी.

हालांकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस दिशा में एक कदम भी उठा लिया है. शाह का जोगियापुर में बिंद परिवार के यहां जाकर भोजन करना उसी दिशा में एक अहम कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. बिंद सहित 17 जातियां ऐसी हैं जो उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ा वर्ग में हैं. इन जातियों के बारे में कोई पार्टी यह दावा नहीं कर सकती कि वे उसकी प्रतिबद्ध वोटर हैं. जहां मायावती दलितों के बीच मजबूत हैं तो वहीं मुलायम सिंह की मुस्लिम और यादव समुदाय में गहरी पैठ है. लेकिन 17 जातियों का यह वोट बैंक अभी किसी दल के साथ एकमुश्त नहीं जुड़ा है.

भाजपा को प्रदेश में यहीं अपने लिए एक अवसर दिख रहा है. उसे लगता है कि अगर कोशिश की जाए तो इन 17 जातियों के एक बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ा जा सकता है और अगर ऐसा हो सका तो 2017 के विधानसभा चुनावों में वह सपा-बसपा को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में रहेगी. संभावना जताई जा रही है कि इस वर्ग को अपने साथ लाने की कोशिश में आने वाले दिनों में भाजपा इन जातियों से जुड़े कुछ मुद्दे प्रमुखता से उठाएगी.

हाल ही में राजनाथ सिंह ने पिछड़ों और दलितों के आरक्षण को दो-दो श्रेणियों पिछड़े व अति पिछड़े और दलित व अति दलित में बांटने के बात कही. मऊ में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, ‘आरक्षण समाज के सभी वर्गों को मिलना चाहिए बशर्ते वह तार्किक हो. हम सरकार नहीं, समाज बनाने के लिए राजनीति करते हैं. हमारी सरकार गरीबों, दलितों, पिछड़ों को समर्पित है.’

‘भाजपा को सभी वर्गों और जातियों का समर्थन मिल रहा है. प्रदेश ने दलित नेता मायावती का बदतर शासनकाल देख रखा है. भाजपा से ज्यादा अनुसूचित जातियों के हितों के लिए किसी पार्टी ने काम नहीं किया है. इस बार हमारी लहर है, जनता हम पर भरोसा जताएगी. प्रदेश में हम अपनी हार से उबर चुके हैं. हमारी सबसे अच्छी बात यह है कि हमने उत्तर प्रदेश में कभी जातीय राजनीति नहीं की है’

दरअसल गृहमंत्री के इस बयान के पीछे असल मंशा मुलायम और मायावती को कमजोर करने की है. भाजपा को लगता है कि पिछड़े तबके के 27 फीसदी आरक्षण कोटे का असली फायदा यादव उठा रहे हैं जिनकी आबादी करीब 10 फीसदी है. इसी तरह दलित आरक्षण का फायदा मुख्य रूप से जाटव जाति के लोग उठा रहे हैं. वाल्मीकि, मेहतर, डोम, खटीक आदि जातियों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण कोटे का लाभ नहीं मिल पाता है.

अमित शाह ने भी इसके संकेत दिए. सिर्फ जोगियापुर जाकर ही नहीं बल्कि इलाहाबाद से लौटकर बनारस में उन्होंने जो बैठकें कीं उनमें भी. इन बैठकों में शामिल भाजपा नेता बताते हैं, ‘उन्होंने साफ तौर पर तो यह नहीं कहा कि हमें किस-किस वर्ग को आधार बनाकर चुनावी रणनीति तैयार करनी है लेकिन इस बारे में स्थानीय नेता उन्हें सुझाव देते रहे और इन सब पर उन्होंने एक तरह से सहमति व्यक्त की. देखने वाले को यह लग सकता है कि वे यही सब सुनना चाहते थे. उन्होंने जो कहा उससे यह तो स्पष्ट है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व यह चाहता है कि पार्टी सिर्फ खास वर्गों में ही सिमटी नहीं रह सकती बल्कि उसे अपने आधार का विस्तार करना होगा. जाहिर है कि पार्टी का आधार तब ही बढ़ेगा जब पार्टी और नेता पार्टी के परंपरागत समर्थक वर्ग के दायरे से बाहर निकलेंगे.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘बिंद समाज लंबे समय से खुद को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग करता रहा है. संभव है भाजपा के बड़े नेताओं की ओर से आने वाले दिनों में यह कहा जाए कि अगर वे सत्ता में आए तो यह काम कर देंगे. ऐसी ही कुछ और कोशिशें आपको आने वाले दिनों में दिख सकती हैं.’

इन संकेतों को आपस में जोड़ें तो पता चलता है कि जिस मकसद से भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष का पद ब्राह्मण समुदाय के लक्ष्मीकांत वाजपेयी से लेकर पिछड़े वर्ग के एक नेता केशव प्रसाद मौर्य को दिया था, उसे अब वह जमीन पर उतारने में लग गई है. जब मौर्य अध्यक्ष बनाए गए थे तब भी कई जानकारों ने संभावना जताई थी कि भाजपा उत्तर प्रदेश का चुनाव सिर्फ अगड़ों के बूते नहीं बल्कि पिछड़ों को साथ लाने की कोशिश करते हुए लड़ेगी. अब अमित शाह के समरसता भोज और इसके बाद पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं को उनके द्वारा दिए जा रहे निर्देशों ने इस बात की पुष्टि कर दी है.

हालांकि इन कोशिशों से भाजपा को कितना फायदा होगा यह तो वक्त बताएगा लेकिन भाजपा नेताओं से बात करने पर तो ऐसा लगता है कि उन्हें अमित शाह की इन कोशिशों से काफी उम्मीदें हैं. इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रभारी गौतम चौधरी कहते हैं, ‘भाजपा को सभी वर्गों और जातियों का समर्थन मिल रहा है. प्रदेश ने दलित नेता मायावती का बदतर शासनकाल देख रखा है. भाजपा से ज्यादा अनुसूचित जातियों के हितों के लिए किसी पार्टी ने काम नहीं किया है. हमने एक पौधा जनसंघ के जमाने में लगाया था, अब यह बड़ा हो गया है. इस बार हमारी लहर है जनता हम पर भरोसा जताएगी. प्रदेश में हम अपनी हार से उबर चुके हैं. हमारी सबसे अच्छी बात यह है कि हमने उत्तर प्रदेश में कभी जातीय राजनीति नहीं की है. हमारा फोकस विकास और गुड गवर्नेंस पर हमेशा रहा है.’

प्रदीप सिंह कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में भाजपा जीत के लिए सब कुछ झोंक रही है. इसके लिए वह सांप्रदायिकता से लेकर जातीय कार्ड खेल रही है. विकास का नारा दे रही है और गुड गवर्नेंस का वादा कर रही है लेकिन अब भी जनता उसमें विश्वास नहीं जता पा रही है. इसका कारण उसके पास समर्पित कार्यकर्ताओं और सही मुद्दों की कमी है. अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि भाजपा अभी हवाई प्रचार में ही सिमटी दिख रही है. आम आदमी तक उसकी बात पहुंच नहीं पा रही है. यह उसके लिए नुकसानदेह है. भाजपा को अगर मिशन 265 को पूरा करना है तो इन बातों पर गंभीरता से विचार करना होगा. युवाओं को साथ जोड़ना होगा. हमें याद रखना होगा अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है.’

‘बे’ रंगमंच!

TheatreWEB
फोटोः तहलका अार्काइव

सतीश मुख्तलिफ पिछले 15 सालों से रंगमंच से जुड़े हैं. काफी समय से दिल्ली में जुंबिश आर्ट्स नाम का समूह बनाकर नाटक कर रहे हैं. इनका नाटक ‘एकलव्य उवाच’ काफी चर्चित भी रहा है. लेकिन इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोधार्थी सतीश के किसी नाटक का मंचन दिल्ली में थियेटर का गढ़ कहे जाने वाले मंडी हाउस में नहीं हुआ. क्यों? सतीश बताते हैं, ‘ये तो सभी जानते हैं कि थियेटर में पैसा नहीं है. लोग इसे अपने जुनून की वजह से ही कर पाते हैं. ऐसे में यदि नाटक के मंचन के लिए किसी ऑडिटोरियम को 30-50 हजार रुपये किराये में देने पड़ें तो हम जैसे छोटे ग्रुप के लिए ये कैसे संभव है? हम यूनिवर्सिटी कैंपस में चंदा लेकर नाटक कर सकते हैं पर चंदे से मंडी हाउस पहुंचना मुमकिन नहीं है. शो करना तो दूसरी बात है, हमारे पास रिहर्सल करने की भी जगह नहीं है. मैं अपनी स्कॉलरशिप से मिले पैसों से थियेटर कर रहा हूं.’ सतीश दिल्ली के ऑडिटोरियम के बढ़ते किराये से परेशान होने वालों में अकेले नहीं हैं. दिल्ली के चर्चित ‘बहरूप’ थियेटर ग्रुप से लंबे समय से जुड़े हादी सरमादी भी सतीश की बात से इत्तफाक रखते हैं. हादी बताते हैं, ‘शौकिया तौर पर नाटक करने वाले किसी ग्रुप का तो मंडी हाउस पहुंच पाना मुमकिन ही नहीं है. अगर हम बहरूप की ही बात करें तो हमने स्वतंत्र रूप से लगभग तीन साल से मंडी हाउस में कोई नाटक नहीं किया है. किसी महोत्सव के चलते ही हमारे नाटक वहां हुए हैं. वजह सिर्फ वहां के ऑडिटोरियमों का आसमान छूता किराया है. कुछ सालों पहले तक जब किराया 10 से 15 हजार रुपये के बीच होता था तब हम किसी तरह वहां तक पहुंच जाते थे पर 50 हजार रुपये देना हमारे बस की बात नहीं है. बहरूप अपने नाटकों में टिकट नहीं रखता है. हमारे लिए ये आमदनी का जरिया नहीं है.’

रंगमंच को अभिनय की पाठशाला माना जाता है. हर साल देश में रंगमंच के कई आयोजन होते हैं जहां देश के कई हिस्सों से रंग समूह आकर अपने नाटकों का प्रदर्शन करते हैं, सम्मान भी दिए जाते हैं. लेकिन देश की राजधानी में रंगमंच का गढ़ माने जाने वाले मंडी हाउस और बाकी ऑडिटोरियमों में किसी रंग समूह के लिए अपने नाटक का प्रदर्शन करके जनता के बीच पहुंच पाना इतना आसान नहीं है. कला में अर्थ यानी धन के बढ़ते प्रभुत्व ने रंगकर्मियों और दर्शकों के बीच एक खाई खड़ी कर दी है. अगर शुरुआत से देखा जाए तो रंगकर्म का उद्देश्य कभी पैसा या मुनाफा कमाना नहीं रहा. रंगकर्मी सामाजिक सरोकारों से जुड़े संदेशों के वाहक के रूप में ही काम करते रहे हैं, पर पिछले कुछ सालों में जिस तरह से थियेटर का बाजारीकरण हुआ है उसका सबसे ज्यादा नुकसान रंगकर्मियों को ही उठाना पड़ा है.

गौरतलब है कि मंडी हाउस के प्रसिद्ध ऑडिटोरियमों में किराये की रकम काफी ज्यादा है जिसके चलते रंगकर्मियों के एक बहुत बड़े वर्ग का दिल्ली के नाट्य प्रेमी दर्शकों से नाता टूट-सा गया है. लिटिल थियेटर ग्रुप (एलटीजी) हो या श्री राम सेंटर, सभी जगह किराये की न्यूनतम राशि 15 से 20 हजार रुपये है, जिसे बिना किसी बाहरी आर्थिक सहायता के वहन करना इन थियेटर समूहों के लिए संभव नहीं है.

पर क्या इन ऑडिटोरियमों के बढ़ते किराये के कारण वहां नाटकों का मंचन होना बंद हो गया है? ‘नहीं,’ बहरूप से जुड़े जेएनयू के एक छात्र चंद्रभान बताते हैं. वे कहते हैं ‘ऐसा नहीं है कि वहां नाटक नहीं हो रहे हैं. ऐसे कई थियेटर समूह हैं जिनके पास अच्छा-खासा पैसा है और वे खास तरह के दर्शकों के लिए नाटक कर रहे हैं. ऐसे दर्शक जिनके लिए थियेटर देखना स्टेटस सिंबल है. वे ऐसे हल्के-फुल्के विषयों या अंग्रेजी में नाटक करते हैं जिसे कुछ लोग पसंद करते हैं. टिकट लेकर देखने आते हैं और फिर कुछ समूहों के पास स्पॉन्सर भी हैं.’ तो क्या इन समूहों की प्रस्तुति को रंगकर्म नहीं माना जा सकता? चंद्रभान इस तरह के नाटक करके धन कमाने को गलत नहीं मानते. उनका मानना है, ‘अभिनय या ड्रामा का प्रशिक्षण लिए व्यक्ति के पास आजीविका कमाने के लिए नाटक करने के अलावा और कोई साधन नहीं होता, ऐसे में वे क्या करें? तो अगर किसी भी तरह का नाटक करना उसको आमदनी देता है तो मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ बुरा है.’

चंद्रभान की बात हादी सरमादी आगे बढ़ाते हैं, ‘देखिए, जब हम कोई अच्छा संगीत सुनते हैं, कोई अच्छी कला देखते हैं तो हमारे दिमाग में कुछ तब्दीलियां आती हैं और यही उस कला का असर होता है. तो अगर कोई कला ये असर नहीं डालती तो कहीं तो कुछ गलत है. यहां लोगों के पास पैसा तो है पर कहने को कुछ नहीं है. वे कुछ पुराने नाटकों को ही मुंबई के किसी बड़े अभिनेता को बुलवाकर करते हैं और मुनाफा कमाते हैं. मैं ये मानता हूं कि थियेटर एक तरह का पॉलिटिकल स्टैंड है. जितनी समस्याएं सामाजिक या राजनीतिक नाटक करने वालों को पेश आती हैं, बाकी किसी को नहीं होतीं और कहीं न कहीं ये हुक्मरानों की गलती है.’ सतीश का अनुभव भी कुछ यही कहता है, ‘थियेटर को केवल मनोरंजन का माध्यम मान लिया गया है. ऐसा सोच लिया गया है कि ये एंटरटेनमेंट से ज्यादा कुछ नहीं है. ऑडियंस भी यही चाहती है कि कुछ ऐसा देखा जाए जो सोचने पर मजबूर न करे. हम सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर नाटक करते हैं. तो हमारे लिए इस पैमाने पर खरा उतर पाना संभव नहीं है. एक रंग महोत्सवों का ही सहारा है पर वहां भी आपके नाटक के थीम को देखकर ही नाटक की अनुमति मिलती है. आपके नाटक का थीम वहां की समिति में बैठे लोगों की मानसिकता के अनुसार होना चाहिए. कुछ समय पहले मैंने देश के एक बड़े रंग महोत्सव में आवेदन किया था. यह नाटक जातिवाद पर आधारित था. जाहिर है मैं वहां नहीं पहुंच पाया.’

‘सरकार द्वारा सस्ती जमीन देकर कमानी और श्री राम सेंटर जैसे ऑडिटोरियम बनाए गए. इनका किराया 80-90 हजार रुपये तक हो गया है. ये पैसा कहां जाता है?’

यहां ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि केंद्र सरकार की ओर से हर साल कुछ निश्चित राशि रंगकर्मियों को अनुदान के रूप में दी जाती है. इस पर सतीश बताते हैं, ‘इसके लिए आपके रंग समूह को रजिस्टर करवाना पड़ता है जो देश में होने वाले हर सरकारी काम की कागजी प्रक्रिया की तरह बहुत जटिल काम है. मैं मूल रूप से हरियाणा का हूं तो जब मैं दिल्ली में रजिस्ट्रेशन के लिए गया तब मुझे हरियाणा का मूल निवासी होने की बात कहकर वापस भेज दिया गया. पर जब मैं हरियाणा में अपने थियेटर ग्रुप को रजिस्टर करवाने पहुंचा तो उन्होंने कहा कि आप दस साल से राज्य से बाहर रह रहे हैं, दिल्ली में ही रंगकर्म करते हैं तो दिल्ली में ही रजिस्ट्रेशन होगा. इस तरह की मुश्किलों का कोई अंत नहीं है.’

थियेटर में अनुदान की प्रक्रिया पर अभिनेता और रंगकर्मी मानव कौल कहते हैं, ‘अनुदान की सबसे ज्यादा जरूरत उन्हें है जो युवा हैं, मेहनत से अपना पैसा लगाकर थियेटर कर रहे हैं. ऐसे कल्पनाशील युवा रंगकर्मी जहां कहीं भी काम कर रहे हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि उन्हें किस तरह का अनुदान चाहिए. कुछ समय पहले एक नाटककार ने कश्मीर पर एक नाटक किया. अब अगर वह वहां रहकर कुछ रिसर्च करना चाहता है तो क्या उसके लिए हमारे यहां कोई अनुदान है? यहां नाटककार से पूछा जाना चाहिए कि आपको किस तरह का अनुदान चाहिए. पर होता क्या है, आप उस नाटककार को यह समझाने में लग जाते हैं कि यह कागज चाहिए, वह कागज चाहिए. मेरे जैसे लोगों के लिए यह प्रक्रिया तकलीफदेह है, इसलिए मैंने कभी किसी अनुदान के लिए आवेदन नहीं किया. यहां अनुदान पाने की पूरी प्रक्रिया ऐसी है जो किसी सार्थक काम करने वाले रंगकर्मी को हतोत्साहित करती है.’

राजेश चंद्र पिछले दो दशकों से रंगमंच से जुड़े हैं. वे नाटककार होने के साथ-साथ आलोचक भी हैं. साथ ही रंगमंच पर एक त्रैमासिक पत्रिका ‘समकालीन रंगमंच’ का प्रकाशन भी करते हैं. उनके अनुसार मंडी हाउस इलाके के ऑडिटोरियमों के किराये का बढ़ना एकदम अतार्किक है. ऐसा कहा जाता है कि सरकार द्वारा इन ऑडिटोरियमों के लिए ये जमीनें बहुत ही न्यूनतम मूल्य पर कला की उन्नति के लिए लीज पर दी गई थीं पर अब ये कॉरपोरेट हितों के लिए काम करते हुए रंगमंच और कला की ही जड़ों को खोखला कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘ऑडिटोरियम मालिकों की सामाजिक जवाबदेही बनती है. वे बिना किसी क्राइटेरिया के किराया बढ़ा रहे हैं. अगर देखा जाए तो ये सत्ताधारियों की थियेटर को कंट्रोल करने की कोशिश है क्योंकि उनकी शह पर ही ऑडिटोरियम मालिक किराया बढ़ा सकते हैं. रंगमंच हमेशा से एक स्थायी प्रतिपक्ष के रूप में काम करता आया है. यहां दो धाराएं काम करती हैं, एक सत्तापक्षीय दूसरी विरोधी. सरकार की कुछ अघोषित नीतियां हैं. अगर आप उनके अनुसार चलेंगे तो शायद आपको कोई परेशानी न हो पर यदि आप सवाल खड़े करते हैं, खुशामद नहीं करते हैं तो आपके लिए ही मुश्किलें बढ़ेंगी.’

[symple_box color=”yellow” text_align=”left” width=”100%” float=”none”]
सरकार को बुनियादी सुविधाएं देनी चाहिए तभी आगे बढ़ेगा थियेटर

Manav-Kaulwebमानव कौल, अभिनेता और रंगकर्मी
मैं ऐसा मानता हूं कि दिल्ली महानगर को किसी नाट्य महोत्सव की जरूरत नहीं है. चाहे वो भारत रंग महोत्सव हो या महिंद्रा फेस्टिवल. सरकारी सहयोग से होने वाले सभी नाट्य महोत्सव हमेशा छोटे शहरों में होने चाहिए. इससे छोटे शहरों के रंगकर्मियों को देश के सर्वश्रेष्ठ रंगमंच को देखने का मौका मिलेगा और उस शहर की जनता थियेटर करना शुरू करेगी. विश्व में कहीं भी देख लीजिए थियेटर के जितने बड़े महोत्सव हैं वे हर साल अलग-अलग शहरों में आयोजित होते हैं. हम अपने सभी बड़े महोत्सव महानगरों में आयोजित करते हैं और खुद ही अपनी पीठ थपथपा लेते हैं. इन महोत्सवों को एक भी नया दर्शक नहीं मिलता और न ही इससे थियेटर की सेहत पर कोई प्रभाव पड़ता है. छोटे शहरों में थियेटर को प्रोत्साहित करने की जरूरत है.
दूसरी समस्या है कि हमारे पास राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) जैसा कोई अन्य राष्ट्रीय प्रशिक्षण संस्थान मौजूद ही नहीं है. यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि जिन रंगकर्मियों को यहां प्रवेश नहीं मिल पाता वे क्या करें. मुझे ऐसा लगता है कि जिन रंगकर्मियों को एनएसडी आने का अवसर नहीं मिल पाता उनके लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि अगर वे नियमित रंगमंच करते हैं तो उन्हें साल में एक निश्चित राशि अनुदान के रूप में दी जाए. किसी अनुदान का आधार इसे न बनाया जाए कि वह रंगकर्मी एनएसडी से प्रशिक्षित है या नहीं. उनके काम को ही अनुदान का आधार बनाया जाना चाहिए.
रंगमंच में अभ्यास बहुत मायने रखता है. आज कई महानगरों में रंगकर्मियों के पास पूर्वाभ्यास की कोई जगह नहीं है और अगर जगह है तो उसका खर्च भी बहुत है. सरकारी स्कूल हर जगह हैं तो सरकार क्यों न ये प्रावधान करे कि शाम के समय इन स्कूलों का कोई हॉल या बड़ा कमरा नाट्यदलों को अभ्यास के लिए दे. सरकार को थियेटर को ऐसी बुनियादी सुविधाएं देनी चाहिए तभी थियेटर आगे बढ़ेगा. अनुदान या पुरस्कार का उद्देश्य भी प्रोत्साहन देना ही होता है पर आप किसी को बुढ़ापे में पुरस्कार दे रहे हैं तो इसका कोई मतलब नहीं है. आम तौर पर जिन रंगकर्मियों को अवाॅर्ड मिलता है, थियेटर उनके जीवन से जा चुका होता है. जब आपके जीवन में, आपके खून में, दिनचर्या में थियेटर बस रहा है, आप सबसे ज्यादा काम कर रहे हैं, आपको उसी वक्त सहयोग और सम्मान की जरूरत रहती है. अगर उस वक्त रंगकर्मियों को प्रोत्साहित किया जाए तो आप देखिएगा कि एक साल में ही वह अपने काम से देश का नाम रोशन कर देगा. आप उसे तब पूछते हैं जब वह खत्म हो चुका होता है, जब उसके पास नया कुछ रचने की ऊर्जा और साहस नहीं होता.

(समकालीन रंगमंच पत्रिका में छपे लेख से साभार)[/symple_box]

रंगमंच में हमेशा से दो धाराएं रही हैं. एक पूंजीवादी जिसके पास संसाधन हैं पर कहने को सार्थक कुछ नहीं है न ही उसका कोई असर होता है. वहीं दूसरी धारा के पास कोई संसाधन नहीं है बस कथ्य है और सामाजिक जिम्मेदारी है. वैसे इन रंगकर्मियों का यह भी मानना है कि सरकार से अनुदान मिलने के बाद रंगकर्मी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूलकर सिर्फ धन के बारे में ही सोचते हैं. हादी सरमादी कहते हैं, ‘जब आपको किसी भी रूप में पैसा मिलेगा, चाहे वो अनुदान हो या स्पॉन्सर तब आप क्यों बेहतर करने की सोचेंगे? न ही फिर आप अपने साथियों की सोचेंगे जिनकी संसाधनों तक कोई पहुंच नहीं है.’ राजेश भी यही कहते हैं, ‘अनुदान के प्रलोभन में फंसते ही रंगकर्मी सरकार पर आश्रित होकर दर्शकों व अपने रंगकर्म के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी भूल जाता है और उसका सारा ध्यान ज्यादा से ज्यादा अनुदान हासिल करने में लगा रहता है. उसके नाटकों की धार कम हो जाती है, उनका स्वर मंद हो जाता है और वे ऐसे नाटकों से पूरी तरह पीछा छुड़ा लेता है जो व्यवस्था पर सवाल उठाते हों.’

अनुदान की वर्तमान स्थिति बताते हुए राजेश कहते हैं, ‘सरकारी या गैर-सरकारी अनुदान की बैसाखियों पर खड़े होकर औने-पौने दल भी नगरों-महानगरों में नाट्योत्सव आयोजित कर रहे हैं जिनमें ‘बैंड-बाजा-बाराती’ सभी हैं- सिवाय उस अवाम को छोड़कर जिसे लेकर दावेदारी की जाती है. अनुदान की लालसा ने नाटककार को ‘मैनेजर’ और नाटक को ‘ब्रोशर एक्टिविटी’ तक सीमित कर दिया है. ये नाट्योत्सव जनता के पैसों से जनता के नाम पर मध्यवर्ग की गुदगुदाहट का सामान बनकर रह गए हैं. भूख और रोटी का जिक्र भी यहां इस तरह होता है कि ये बेचैनी की जगह मनोरंजन का सबब बनकर रह जाते हैं.’ सतीश भी इस बात का समर्थन करते हैं. वे कहते हैं, ‘इन सबकी प्रक्रिया में घुल पाना ही मुश्किल है. हम इस तरह की ‘मैनेजरी’ ही करते रहेंगे तो थियेटर कब करेंगे? जो सिर्फ बेहतर काम करना चाहता है उसके लिए बस परेशानियां ही परेशानियां हैं.’

राजेश की पत्रिका का एक अंक रंगमंच में अनुदान की स्थितियों पर ही केंद्रित था जहां देश के विभिन्न वरिष्ठ रंगकर्मियों ने इस विषय पर अपना नजरिया साझा किया. एक लेख में देश के प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी अनुदान से रंगमंच पर पड़ने वाले प्रभाव की बात पर बाकियों से अलग राय रखते हुए कहते हैं, ‘हमारे यहां मनोरंजन और प्रश्न की जो परंपरा थी वह मनोरंजन और प्रश्नवाचकता को गूंथकर चलती थी. पंडवानी में तीजनबाई को देखें तो वे कथा महाभारत की कह रही हैं पर कहते-कहते वे आसपास की जिंदगी-राजनीति पर टिप्पणी भी करती चलती हैं. अगर अनुदान से इस तरह की प्रश्नवाचकता पर कोई दृष्टिगत प्रभाव पड़ता है तो अनुदान की बंदिश उतनी नहीं है जितना स्वयं रंगदलों की अपनी कमजोरी है कि उन्होंने मान लिया है कि ऐसा करने से शायद अनुदान के लिए उनकी अनुकूलता बढ़ जाएगी.’

रंगकर्मियों की परेशानियों में ऑडिटोरियम के बढ़े किराये, रिहर्सल के लिए उपयुक्त जगह न होना, नाटकों के मंचन से पहले ड्रामेटिक परफॉरमेंस ऐक्ट के तहत पुलिस से अनुमति लेना, प्रशिक्षण संस्थानों की कमी, नाट्य विद्यालय से निकलने के बाद आजीविका के स्रोत जैसी तमाम दिक्कतें शामिल हैं पर इनका कोई समाधान नहीं ढूंढ़ा गया है. सरकार के स्तर पर बात करें तो राष्ट्रीय बजट का नाममात्र अंश संस्कृति के हिस्से आता है.

प्रख्यात रंगकर्मी रामगोपाल बजाज एक लेख में कहते हैं, ‘संस्कृति के हिस्से में राष्ट्रीय बजट का एक प्रतिशत भी नहीं आता. जिस उद्देश्य से सरकार द्वारा सस्ती जमीन देकर कमानी और श्री राम सेंटर जैसे ऑडिटोरियम बनाए गए, वह आज पूरा नहीं हो रहा है. इनका किराया बढ़कर 80-90 हजार रुपये तक हो गया है. पर न सरकार टोकती है न लोग. ये लोग इन ऑडिटोरियमों के मालिक बने बैठे हैं. ये ट्रस्ट के तहत बनाए गए थे. ये पैसा जमा होकर कहां जा रहा है, इसकी तहकीकात होनी चाहिए. आज मोदी जी कह रहे हैं कि हम देश में इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करेंगे तो क्या उस इंफ्रास्ट्रक्चर में सब वाणिज्य और सिनेमा के लिए ही होगा? मॉल ही बनेंगे? फिर संस्कृति का क्या होगा? संस्कृति मंत्रालय को मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के अंतर्गत होना चाहिए क्योंकि संस्कृति शिक्षण और नाट्य-कर्म मानव विकास का हिस्सा हैं.’

रंगकर्म के लिए बनाई गई संस्थाओं का भी इन समस्याओं के प्रति गंभीर न होना इसका एक बड़ा कारण है. सतीश और राजेश तो यही मानते हैं. सतीश कहते हैं, ‘बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग जब तक गंभीर नहीं होंगे तब तक कोई बदलाव नहीं हो सकता. और बदलाव को लेकर अगर कोई बात उनके कानों तक पहुंचती भी है तो बदलाव के नाम पर अगले रंग महोत्सव का डेकोरेशन बदल देते हैं! उनके लिए यही बदलाव है. असल में वे लोग इस क्षेत्र के हैं ही नहीं इसलिए उनकी थियेटर में कोई दिलचस्पी ही नहीं है.’ राजेश बताते हैं, ‘कुछ समय पहले दिल्ली सरकार की साहित्य कला परिषद ने एक रंग महोत्सव में दो साल तक एक बड़े निर्देशक द्वारा चार करोड़ रुपये के दो नाटक करवाए. निर्देशक के चुनाव में कोई पारदर्शिता नहीं बरती गई और नाटकों में भी कोई नवीनता नहीं थी. बस पुराने नाटकों को भव्यता के साथ दिखाया गया. इसका काफी विरोध भी हुआ था. जानकारों की मानें तो इस तरह के रंग महोत्सव इन संस्थानों को मिले बजट की अधिकांश राशि खपाने के लिए किए जाते हैं. दिल्ली सहित देश में बड़ी तादाद ऐसे रंगकर्मियों की है जिनके पास न नाटकों की रिहर्सल के लिए जगह है, न प्रदर्शन के लिए कोई उपयुक्त और सस्ती जगह. पर इससे किसे सरोकार है? बिना खुशामद के सिर्फ अपना काम करने वाले के लिए तो ऐसी व्यवस्था है कि वह संसाधनों तक पहुंच ही न सके. आपके पास दो विकल्प हैं- या तो बाजार के हिसाब से चलिए या सरकार के संस्थानों के हिसाब से.’

ये सब परेशानियां लंबे समय से थियेटरकर्मियों के सामने हैं पर क्या कभी उन्होंने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाई? सतीश के अनुसार रंगकर्मियों का एकजुट होना मुश्किल है. वे कहते हैं, ‘देखिए सबका अपना दायरा होता है. जिसे मौका मिल रहा है, वो क्यों शिकायत करेगा? गैर-राजनीतिक या हल्के-फुल्के नाटक करने वालों को कभी परेशानी नहीं होती. जो ग्रुप किसी रंग महोत्सव में शामिल हो चुका है तो उसे वहां न पहुंचने वाले की चिंता क्यों होगी?’ राजेश का कहना है कि सबसे पहले तो तो सरकार द्वारा कोई सांस्कृतिक नीति बनाई जानी चाहिए. साथ ही संसाधनों का विकेंद्रीकरण करना भी जरूरी है पर इसके लिए एक मंच पर सभी रंगकर्मियों का साथ आना सबसे बड़ी शर्त है जो पूरी नहीं होती.

हादी सरमादी का भी ऐसा ही मानना है. वे कहते हैं, ‘सब जानते हैं कि बिना एकजुट हुए कोई परिवर्तन नहीं हो सकता पर यहां तो हाल ये है कि दिल टूटने पर दिल के इतने टुकड़े नहीं होते होंगे जितने यहां रंगकर्मियों के बीच हो गए हैं. यहां हाल कम्युनिस्ट पार्टी जैसा है. हर समूह समझता है कि इंकलाब आएगा तो सिर्फ हमारे झंडे के तले आएगा, अगर दूसरे के झंडे तले आया तो असली इंकलाब वो नहीं होगा. कुछ लोग मठाधीश बनने की कोशिश करते हैं. ऐसे में कैसे किसी एक मुद्दे को लेकर एकमत या फिर एकजुट होंगे, कैसे कोई मुहिम छेड़ी जाएगी?’