Home Blog Page 1278

चला गया विकास पुरुष

उत्तराखंड के ही नहीं बल्कि देश के विकास पुरुष हमारे बीच नहीं रहे। भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके द्वारा किये गये कार्यों को उत्तराखंड में याद किया जाएगा। नारायण दत्त तिवारी संयुक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। साथ ही केंद्र में कई ऐसे प्रमुख मंत्रालयों के मंत्री भी रहे जो विकास से सीधे जुड़े थे। उद्योग, और वित्त मंत्रालयों में वे खाली रस्मी मंत्री ही नहीं थे, उन्होंने उन मंत्रालयों में रह कर बखूबी उनके कार्यों को निपुणता से निभाया भी। भले ही उन पर व्यक्तिगत आरोप लगे हों, पर वे सार्वजनिेक जीवन में अपनी कार्यशैली से उत्कृष्ट पदों का कार्यभार बेहतरीन तरीके से निभाते रहे।

एक उद्योग विहीन राज्य उत्तराखंड के वे मुख्यमंत्री रहे। उद्योग खोलने के लिए जो प्रयोग उन्होंने किए वह यदि निरंतर उस गति से चलते तो उत्तराखंड आज उद्योगों में श्रेष्ठता लिए होता। सिडकुल की प्रदेश में स्थापना कर नारायण दत्त्त तिवारी ने एक अच्छी शुरुआत की, पर उनके उत्तराधिकारियों ने उनको वो गति नहीं दी, जिसकी उद्योगों को ज़रूरत थी। मेरा आशय यहां पर उत्तराखंड की कृषि की ओर ध्यान खींचना है, जिसमें तिवारी कोई ऐसा विशेष मील का पत्थर स्थापित नहीं कर पाये, जिसकी प्रदेश को बहुत जरूरत थी। पूरा प्रदेश पहले से ही कृषि आधारित रहा है। भले ही पर्वतीय इलाका अपने वर्ष भर की ज़रूरतों को पूरी नहीं कर पा रहा था। उस पर नारायण दत्त तिवारी का ध्यान था, पर उसको वह गति नहीं मिल पाई, मेरी उनसे काफी व्यक्तिगत मुलाकातें रहीं, जिसमें वे कृषि को उन्नत करने के लिए प्रयासरत रहते थे। उत्तराखंड की दुर्दशा में जो पलायन चल रहा है, उसका मुख्य कारण भी खेती को मुनासिब तव्वजो न देने का रहा है। उद्यान के क्षेत्र में कुछ काम तो हुआ, लेकिन यह अभी सीमित है। मेरा आशय यहां पर नारायण दत्त तिवारी के प्रयासों पर है। कुछ लोगों ने उनकी आलोचनाएं भी कि वे उत्तराखंड  बनाने के विरोधी थे, यदि ऐसा होता तो तब वे मुख्यमंत्री नहीं बनते, कांग्रेस ने प्रदेश को विकास की दिशा देने के लिए ही मुख्यमंत्री का पद उन्हें सौंपा था, उनकी उस विस्तृत दृष्टि का फायदा हर क्षेत्र में नहीं मिल पाया जिसकी प्रदेश को ज़रूरत थी। देश का कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर तरह तरह के प्रयोग खेती को उन्नत करने के लिए कर रहा है। ल्ेाकिन असली मुद्दा उत्तराखंड के पलायन को रोकने का है। इस पर जो काम होना था, वह हो नहीं पाया।

आज पूरा पर्वतीय प्रदेश पलायन के कारण उजाड़ होता जा रहा है। इस पर आपातकालीन कार्य करने के लिए खेतों को छोटे छोटे टुकड़ों से मुक्त करके चकबंदी पर कानून बनाने की ज़रूरत है। परिवार बढ़ रहे हैं और बंट रहे  हैं, उसी अनुपात में खेत भी बंट कर टुकड़े-टुकड़े होते जा रहे हैं। इनको और टुकड़ों से बचा कर सही खेती करने लायक बनाने की ज़रूरत है।

उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय भले ही अच्छी दिखती हो, लेकिन हकीकत यह है कि खेती पर निर्भर रहने वाले किसानों की हालात खराब होती जा रही है। प्रति व्यक्ति फसल से आय का हाल यह है कि पिछले पांच सालों में इसमें मात्र 400 रुपये का ही इज़ाफा हुआ है। प्रदेश में खेती पर कई संकट मंडरा रहे हैं। चिंताजनक यह है कि करीब दस लाख किसानों का योगदान प्रदेश की आय में न के बराबर है। अर्थ एवं संख्या निदेशालय ने फसल से आय के आधार पर किसानों की आय का आकलन किया तो बेहद निराशाजनक स्थिति सामने आई। फसल के आधार पर किसानों की प्रति व्यक्ति आय 2011-12 में मात्र 6451 रुपये थी। 2015-16 में फसल के आधार पर प्रति व्यक्ति आय 6886 रुपये आंकी गई और प्रति व्यक्ति आय 154818 रुपये पाई गई।

ऐसे हालात में उत्तराखंड राज्य को पूर्ण आत्म निर्भर बनाने के लिए नारायण दत्त तिवारी जैसे व्यक्ति की ज़रूरत है। उनकी विकास में समग्र दृष्टि थी। हालांकि कृषि उनसे कैसे चूकी इस पर शायद उनके पास समय कम रहा हो।

खेती जो खुशहाली लाए

इस और आने वाले लेखों के माध्यम से मैं आपको उत्तराखंड में पैदा होने वाली पारंपरिक फसलों के बारे में बताने जा रहा हूं। इसकी शुरुआत वहां पैदा होने वाली दालों व अन्य कैशक्राप से कर रहा हूं। इसकी पहली किस्त आपके सामने प्रस्तुत है-

जैसा कि आप जानते हैं कि उत्तराखंड विविध जैविक उत्पादों के लिए पूरे देश में ख्यात है। इस ओर आपका ध्यान इसलिए आकर्षित करना चाह रहा हूं, क्योंकि यहां से पलायन की मार से पूरा उत्तराखंड प्रभावित है। इसमें एक मुख्य मुद्दा जमीन का सही तरीके से उपयोग न होना है।साथ ही बटी खेती ने ऐसा रास्ता भी नहीं छोड़ा, जहां लोग वापस घर की तरफ रुझान कर सकें।

यहां पर मैं उत्तराखंड में पैदा होने वाली दालों पर आपका ध्यान खींच रहा हूं।

मसूर दाल

मसूर की दाल पहाड़ो में रवि की मुख्य फसल है। इस दाल को आप आसानी से पका सकते हैं। पहले जब प्रेशर कुकर नहीं होते थे मिट्टी और पत्थर के चूल्हे होते थे, लकड़ी ही ईंधन होता था, उस जमाने में हल्की सी आंच में मसूर की दाल आसानी से पक जाती थी। और पचाने में भी आसान होती है। यह दाल विशेष रूप से छोटे दानों वाली है। रंग इसका काला होता है। इस दाल को कई तरह से बनाया जा सकता है।

स्थनीय नाम भी इसका मसूर ही है।

इस दाल की कई किस्में पंतनगर विश्वविद्यालय ने तैयार कर ली हैं।

इसमें पौष्टिक तत्व हैं- 24 से 26 प्रतिशत प्रोटीन, वसा-1.3, कार्बोहाइड्रेट 57, फाइबर 3.2, कैलशियम-68 मिलीग्राम और फासफोरस -300मिली ग्राम होता है।

दूसरी पहाड़ में पैदा होनेवाली दाल तुअर है। यह पारपंरिक रूप से मुख्य फसलों में गिनी जाती है। इस दाल को उपजाने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है। यह खरीफ की फसल में आती है। यह बहुत ही पौष्टिक दाल है। इसमें प्रोटीन भरपूर मात्रा में होती है। यह कार्बोहाइडेऊट, फाइबर और खनिज से परिपूर्ण दाल है।

अब पूसा इंस्टीट्यूट ने इस दाल की कई किस्में विकसित कर ली हैं। इस दाल का विशेष अवसरों पर इस्तेमाल किय जाता है। मेहमान नवाजी में इसके बगैर कोई आंनद नहीं मिलता।

इसके स्थानीय उपज के छोटे पीले, नारंगी रंग के दाने होते हैं। तुअर को उबाल कर दाल की तरह खाया जाता है। यह दाल काफी पौष्टिक और स्वदिष्ट होती है।

काली सोयाबीन: पहाड़ों में काली सोयाबीन बहुतायत में होती है। यह फसल सितबंर अक्टूबर में तैयार होती है। यह बड़ी पौष्टिक दाल है। स्थानीय लोग इसके दानों को भून कर बड़े चाव से खाते हैं। पूरे उत्तराखंड में इसकी अच्छी पैदावार निकलती है। इस दाल को पैदा करने में ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं करनी पड़ती है। एक बार बोने के बाद गुडाई की ज्यादा जरूरत नहीं है। निराई करने भर से यह अच्छी फसल देती है। जिस खेत में ये दाल उगाई जाती है। वह भूमि भी उपजाऊ हो जाती है। क्योंकि वायुमंडल की नाइटोऊजन को यह मिट्टी को देता है। इस कारण दूसरी फसल पैदा करने के लिए जमीन उपजाऊ हो जाती है।

दूध देने वाले पशु भैंस को यदि काले भट्ट यानी सोयाबीन को भिगोकर और पीस कर खिलाया जाय तो भैंस खूब दूध देने लगती है।

सफेद सोयाबीन भी पहाड़ों में पैदा की जाती है। यह दाल भी पौष्टिक होती है। इसकी पैदावार 1000 से 1700 फुट समुद्रतल की  ऊंचाई पर की जाती है। इसे दाल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इससे सोया सास, सोया दूध, शिशुओं का आहार और तेल आदि बनाया जाता है।

कुल्थ या गहत: इस दाल को गहत नाम से जाना जाता है। इसके अलावा यह दाल एक दवा का काम भी करती है। इसके दानों को उबाल कर या दाल के तौर पर खाने से शरीर में बन रही पथरी को हर रोज कुल्थी की दाल खाने से खत्म किया जा सकता है। इसके इस गुण के कारण पहाड़ों में यदि इसे पैदा किया जाए और फिर इसका व्यापारिक तौर पर पैदावार की जाए तो किसानों को अच्छी आमदनी दे सकती है। इसकी खेती का समय जून जुलाई से लेकर सितंबर अक्टूबर तक का होता है। किसानों को इस फसल को पैदा करने में कोई अतिरिक्त काम नहीं करना पड़ता। यदि पर्याप्त वर्षा समय पर हो जाए तो यह अच्छी पैदावार देती है। खेतों को इस दाल के उगाने से दूसरी आने वाली फसल के लिए उपजाऊ खेत छोड़ती है।

इस दाल को 1200 मीटर से 1800 मीटर की  ऊंचाई पर पैदा किया जाता है। आज इस दाल को उगाने से पर्याप्त धन कमाया जा सकता है।

 उत्तराखंड की पहचान राजमा से भी होती है। इस प्रदेश में सौ से अधिक किस्म की राजमा पैदा की जाती है। यह मुश्किल से तीन महीने के भीतर तैयार की जानेवाली फसल है। आसानी से इसे पैदा किया जा सकता है। राजमा छोटी बेल के रूप में भी होती है। उत्तरकाशी जिले के हरसिल क्षेत्र में जो राजमा उगाई जाती है, उसका स्वाद ही विशिष्ट होता है। इसकी बाजार में मांग भी काफी है।

इस दाल को 1000 से 2000 मीटर समुद्र तल की ऊंचाई पर पैदा किया जाता है। राजमा की विशेषता है कि कच्ची फलियों के रूप में यानि फ्रेंचबीन के नाम से मशहूर यह सब्जी की तरह प्रयोग में लाई जाती है। राजमा पैदा करने के बाद खेत दूसरी फसल के लिए उपजाऊ हो जाते हैं। अक्सर फली पैदा करनेवाली फसल वायुमंडल से नाइटोऊजन को भूमि को देते हैं। कम समय में कैशक्राप के रूप में यह पैसा अर्जित करने का बेहतर विकल्प है।

पहाड़ों को अत्मनिर्भर बनाने के लिए मटर की पैदावार अत्यंत फलदाई है। दो महीने के भीतर ही इसको पैदा करने और बाजार मिलने से किसान खुशहाल हो सकता है। इसलिए खेती को उपजाऊ रखने और मटर पैदा करने से सब्जी और दाल की कमी को पूरा किया जा सकता है। पहाड़ की भूमि इसके लिए उपयुक्त है। इसी तरह टमाटर की पर्याप्त खेती पहाड़ों में की जा सकती है। पिछले कुछ वर्षों में पहाड़ी किसानों ने टमाटर को पैदा करने से अच्छी रकम हासिल की है। टमाटर पैदा कर सीधे मंडी तक पहुंचाने का जरिया हो तो अच्छी आमदनी हो सकती है।

दालचीनी भी पहाड़ो में उगाई जा सकती है। उत्तरकाशी जिले में डुंडा क्षेत्र दालचीनी उगाने में अच्छा काम कर सकता है। यहां की जलवायु दालचीनी पैदा करने के लिए उपयोगी है। इस क्षेत्र में मैने वर्षों पहले देखा था कि खेतों के मेड़ो पर यह घास के तौर पर उगी होती थी। दाल चीनी के पत्ते तेज पत्ते कहलाते हैं, और इसकी छाल दालचीनी के सामान्य नाम से जानी जाती है। इतने उपयोगी पौधे की खेती की जा सकती है।

पहाड़ में आसानी से पैदा किये जाने वाली फसल आलू की है। यदि पर्याप्त कोल्ड स्टोर बना कर आलू की खेती में ध्यान केंद्रित किया जाए तो आमदनी का यह अच्छा स्रोत है। पहाड़ी आलू के नाम से बाजार में इसकी मांग बहुत होती है। पहाड़ी कास्तकारों को आलू पैदा करने की अच्छी शिक्षा दी जाए तो पैदावार अच्छी हो सकती है।

खेत मे न जाकर सिर्फ एक कमरे के भीतर मशरूम की खेती की जा सकती है। मशरूम को उगाने के लिए किसी बड़े तामझाम की जरूरत नहीं होती है। पहाड़ यानी उत्तराखंड की महिलाओं ने कुछ ही समय में सफलतापूर्वक मशरूम का उत्पादन कर, उसके लिए बाजार भी तलाशा है। इसमें एक नाम है- दिव्या रावत का, इस लड़की ने उत्तराखंड के हर किसान के लिए मिसाल छोड़ी है कि कैसे अपने पैरो पर खड़ा हो सकते हैं, बगैर किसी निवेश को तलाशने के, सौ रुपये से भी काम शुरू किया जा सकता है। और धीरे धीरे अच्छा कास्तकार बना जा सकता है। कहने का मतलब है कि प्रदेश की जनता को रोकने के लिए ऐसे कई प्रयोग हैं। इसके लिए थोड़ा टैक्निकल सहायता उन्हें दी जानी चाहिए जो अपने खेती के धंधे को शुरू करना चाहते हैं।

कुछ मायने में थोड़ी सी भूमि में वे अपना कौशल दिखा सकते हैं। बहुत सारे विषय हैं जिन्हें शुरू किय जा सकता है। उत्तराखंड में ऐसी कई वनस्पतियां हैं जिनको उगाया जा सकता है।

 एक पौधा है, जिसे एलोवेरा कहते हैं। इस पौधे को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं है। लेकिन कभी कभार इसे पानी मिलता रहे तो यह पौघा धन कमाने का अच्छा जरिया हो सकता है। बताते हैं कि इस पौधे में 18 प्रकार की प्रोटीन होती है। जो हमारे लिए भी जरूरी है। इस जरूरत को एलोवेरा की खेती करके पूरा किया जा सकता है। कहने का मतलब मेरा यही है कि कुछ पारंपरिक खेती को त्याग कर आधुनिक खेती को भी अपनाया जाय तो प्रदेश को आत्मनिर्भर होने में सफलता मिल सकती है।

बहुत सारे रसायनों से भरपूर जड़ीबूटियां हैं जिन्हें खेतों में उगाया जा सकता है। इसके लिए उन युवाओं, को ऐसा ज्ञान देने की विधि का इस्तेमाल हो, जिसमें वे आसानी से खेती करने के आधुनिक तरीकों को अपना सकें।

कुछ वर्षों से पारंपरिक खेती करने के लिए हल जोतने में लकड़ी के हल का प्रयोग किया जाता रहा है। और आज भी पहाड़ों के अधिकांश भागों में इसका प्रयोग हो रहा है। लेकिन उन्हें यह पता नहीं है कि अब धातु के हल भी बाजार में आ चुके हैं। कुछ स्थानों में सब्सिडाइज्ड रूप में इन धातु के हलों को किसानों को दिया जा रहा है, लेकिन लोग जिन्हें ऐसे हलों की जरूरत है, वे अनजान हैं। यह काम सरकार का है कि वे उन लोगों तक इस आधुनिक ज्ञान को पहुंचाये। इससे एक फायदा यह होगा कि हल को बनाने के लिए उपयोग में आने वाले बांझ जैसे अमूल्य वृक्षों को नष्ट होने से बचाया जा सकेगा।

चुनावी चाल में ‘चौकीदार’ पर बवाल

अजब-गजब शारीरिक भाव-भंगिमाओं के साथ कांग्रेस पर गंभीर घात करने वाली जुबानी तीरंदाजी पर गर्व करने और कांग्रेस मुक्त भारत का दंभ भरने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क्या अब अपने निकटतम प्रतिद्वन्दी राहुल गांधी पर उनसे ज्यादा तीखे तेवरों के साथ पलटवार की पटकथा लिखना चाहेंगे? इस बार चुनाव अजीबो-गरीब दौर से गुजर रहा है, ‘वार-पलटवार’ की प्रचलित कहानी से जातीय राजनीति और विकास का एजेंडा गायब है और एक जुदा नज़ारा देखने को मिल रहा है जिसमें अपने आपको देश का चौकीदार’ कह कर गर्वित होने वाले नरेन्द्र मोदी को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ‘चोर’ शब्द से लांछित करते हुए जमकर तंज कस रहे हैं कि, ‘एक आदमी ने देश के सभी चौकीदारों को बदनाम कर दिया और अब वही चौकीदार जनता से आंखे नहीं मिला पा रहा है। राहुल गांधी के धारदार तंज शुक्रवार 26 अक्टूबर को उस समय देश की राजधानी में जमकर बरसे जब उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को गुपचुप हटाने और इस मंशा के पीछे, ‘राफेल विमान सौदे में कथित भ्रष्टाचार उजागर होने के अंदेशों का गुबार छोड़ते हुए बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया। इससे पहले राजस्थान के दौरे से लौटने के फौरन बाद गुरूवार 25 अक्टूबर की शाम को राहुल गांधी ने प्रेस कांफे्रंस में सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने पर राफेल सौदे को सीधे-सीधे भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला बोला। राहुल ने आरोप लगाया कि, ‘वर्मा पर  कार्रवाई इसलिए हुई क्योंकि वे राफेल से जुड़े मामले की जांच करने वाले थे। राहुल ने बड़ी बेबाकी से आरोप लगाया कि, ‘राफेल से जुड़े सुबूतों को मिटाने के लिए यह काम रात को दो बजे किया गया। देश नरेन्द्र मोदी को छोड़ेगा नहीं, विपक्ष भी उन्हें नहीं छोड़ेगा। राहुल गांधी ने कहा कि ‘प्रधानमंत्री को अंदेशा था कि जिस दिन राफेल पर सीबीआई जांच शुरू होगी, उस दिन वे खत्म हो जाएंगे। देश को पता चल जाएगा कि , प्रधानमंत्री ने उद्योगपति अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाया। राहुल के आरोपों पर पलटवार करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावेड़कर ने कहा, ‘राहुल सिर्फ और सिर्फ झूठ फैलाते हैं। उधर सीबीआई के सूत्रों का कहना है कि, ‘आलोक वर्मा के पास राफेल सौदे से जुड़ी कोई फाइल ही नहीं थी, लेकिन सूत्र इस बात की सफाई नहीं दे पाए …..’तो फिर वर्मा की जासूसी क्यों की जा रही थी और क्यों कर ऐसा करते हुए आईबी के अफसरों को पकड़ा गया?

उधर वरिष्ठ पत्रकार रमण स्वामी की मानें तो, ‘सीबीआई संकट की पैदाइश के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अतिविश्वसनीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल दोषी है, जो रातों रात ‘सीबीआई तख्ता पलट में इतने आगे बढ़ गए गए कि उन्हें कानूनी औपचारिकताओं का भी ध्यान नहीं रहा। रमण स्वामी कहते हैं कि, ‘ऐसा पहली बार हुआ है,जब भाजपा में अजीत डोभाल के खिलाफ सुगबुगाहट सुनी जा रही है। मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री और भाजपा समर्थक भी सवाल कर रहे हैं कि क्या वह डोभाल ही थे, जिन्होंने 23-24 अक्टूबर की रात अपनी जिद और अकड़ से संकटग्रस्त हालातों को और बदतर बना दिया? रमण स्वामी कहते हैं, ‘अब डोभाल की गैर परम्परागत सोच मोदी के गले की घंटी बन गई है, सीबीआई निदेशक को हटाने का विवादास्पद मामला इसकी मिसाल है।

उधर लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने भी इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कड़े शब्दों में पत्र लिखा है। वरिष्ठ पत्रकार जाल खंबाता ने पत्र के खास मुद्दों का ब्यौरा देते हुए बताया है  कि अगर सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर संगीन आरोप थे तो चयन समिति की बैठक क्यों नहीं बुलाई गई? प्रधानमंत्री ने खुद ही फैसला क्यों कर लिया? सरकार यह मानती है कि वो सीबीआई निदेशक की न तो नियुक्ति कर सकती है और न ही हटा सकती है और न ही ट्रांसफर कर सकती है तो उन्हें लंबी छुट्टी पर भेजने और दूसरे अधिकारी को तैनात करने का अजीबो-गरीब फैसला कैसे ले लिया? खडग़े ने पूछा है कि प्रधानमंत्री, ‘इसका कारण बताए कि उन्होंने आईबी अधिकारियों को वर्मा के घर पर उन पर निगाह रखने और जासूसी करने के लिए क्यों भेजा? खडग़े ने मोदी से यह  सवाल भी किया कि, ‘वर्मा और अस्थाना को हटाने के बाद तीसरे नंबर के ए.के. शर्मा को नियुक्त क्यों नहीं किया? इसके विपरीत उनसे जूनियर, संयुक्त सचिव को क्यों निदेशक पद की जिम्मेदारी सौंपी गई? इस संदर्भ में प्रशांत भूषण का सवाल भी खासा मायने रखता है कि, ‘क्या विवादास्पद नागेश्वर राव को इसीलिए नियुक्त  किया गया, क्योंकि उन पर नियंत्रण रखा जा सकता है? अब देखना यह है कि सत्ताधारी दल विपक्ष के आरोपों से कैसे निपटता है?

इस पूरे मसले से जुदा राजस्थान के चुनावी मंजर की बात करें तो चुनावी राजनीति की अधिकांश कवायद राजनैतिक दलों के लिए अपना परम्परागत ‘कोर वोट बैंक’ को बनाए रखने की होती है। सियासत और उम्मीदों के बीच फंसा यह एक ऐसा ‘तुरूप का पत्ता’ है जिसे पार्टियां हरसंभव अपने साथ बनाए रखने की जुगत में रहती हैं। मसलन मुस्लिमों का हाथ परम्परागत रूप से कांग्रेस के साथ रहता आया है तो प्रदेश में राजपूत भाजपा के पाले में ही बने रहे हैं। लेकिन इस बार के चुनावों में दोनों ही दल अपने ‘तुरूप के पत्तों’ के प्रति आश्वस्त नहीं हैं। हर पल एक आशंका पार्टी नेताओं के धैर्य के पीछे थर्राती नजर आती है। मुस्लिम बहुल सीटों पर निर्दलीय मुस्लिम उम्मीदवारो को लेकर कांगे्रस के पाले में हताशा के अवशेष बिखरे हुए हैं, जो बेजा उम्मीदों से ज्यादा नुमायां हो रहे हैं।ं इस लिहाज से कांग्रेस की ताजा कोशिशों की सुन-गुन समझे ंतो पार्टी नेतृत्व मुस्लिम बहुल 15-20 सीटों पर पूरी तरह अपना फोकस बनाए हुए है, जिन्हें पिछले चुनावों में अतिविश्वास के कारण गंवा दिया था। पिछले चुनाव में अश्क अली टॉक तथा ब्रज किशोर शर्मा सरीखे दिग्गज निर्दलीय मुस्लिम उम्मीदवारों की वजह से ही चुनावी रण में खेत रहे थे, लगता है पार्टी ने इस बार खासा सबक ले लिया है और मुस्लिमों को अपने पाले में बनाए रखने के लिए पूरी तरह जद्दोजहद कर रही है। कांग्रेस अब इन्हें थामकर  आगे बढ़ऩे की रणनीति गढ़ रही है। भाजपा राजपूतों के मुद्दों पर एक बार फिर टूटे पंखों से उडऩे की उम्मीद कर रही है, लेकिन मानवेन्द्र सिंह के पाला बदलने से हालात सुधरने की बजाय टेढ़े हो गए हैं।

इस बीच इसी हफ्ते भाजपा के गढ़ और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के निर्वाचन क्षेत्र झालावाड़ में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने ‘संकल्प महारैली’ कर सेंध लगा दी है। रैली के बाद झालावाड़ के भाजपा हल्कों में जिस तरह सन्नाटा खिंच गया और लोग कांग्रेस का कीर्तन करते नजर आए उसने नई राजनीतिक फंतासियों को हवा दे दी कि वसुंधरा राजे अपने सुरक्षित माने जाने वाले गढ़ झालरापाटन को छोड़कर किसी दीगर सीट से चुनाव लडऩे का विकल्प तलाश रही है। पिछले तीन दशकों से लगातार इस क्षेत्र से चुनाव जीतती आ रही राजे की सकपकाहट चौंकाती है। सूत्रों का कहना है कि, ‘झालरापाटन में भाजपा के परम्परागत मतदाता रहे, सवर्णों और राजपूतों में वसुंधरा राजे के खिलाफ गुस्सा खौल रहा है, लिहाजा वे श्री गंगानगर अथवा राजाखेड़ा से चुनाव लड़ सकती है। सूत्रों का कहना है कि, ‘वसुंधरा राजे अगर अपनी जीत का ‘एपीसोड’निर्विध्न बनाए रखने के लिए दूसरा विधानसभा क्षेत्र तलाश रही है तो इससे भाजपा के हालात का अनुमान लगाया जा सकता है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि, ‘कांग्रेस की चुनावी रणनीति के मुताबिक जंग के दौरान वसुंधरा को उनकी परम्परागत सीट पर समेट देना है ताकि वो भाजपा केे चुनावी अभियान में शिरकत नहीं कर पाए? असल में प्रदेश में वसुंधरा भाजपा का इकलौता चेहरा है जो भीड़ जुटा सकती है, ऐसे में कांग्रेस अपनी चुनावी रणनीति के तहत उन्हें उनकी सीट तक महदूद कर देना चाहती है। बहरहाल एक बात तो हर जुबान पर है कि ‘राहुल गांधी की झालावाड़ रैली ने वसुंधरा राजे का तिलस्म तोड़ दिया है। कोटा में आयोजित ‘रोड शो’ में भी राहुल गांधी ने मोदी और वसुंधरा राजे को जमकर निशाने पर लिया। उधर जानकार सूत्रों का कहना है कि अगर वसुंधरा राजे झालावाड़ से ही चुनाव लड़ती है तो निर्दलीय के तौर पर आईपीएस पंकज चौधरी की पत्नी मुकुल भी उनको चुनौती दे सकती है। मुकल का कहना है, ‘यहां भाजपा ने झूठ की फसल बो रखी है, मैं उसकी जड़ें काटने आई हूं।

उधर आने वाले दिन प्रदेश में ‘तीसरे मोर्चे’ के लिए खास अहमियत दर्ज करने  वाले हैं। इसकी वजह है, अगले सप्ताह राजनीतिक दल ‘आप’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल और निर्दलीय कद्दावर नेता हनुमान बेनीवाल विराट

रैली आयोजित कर सकते हैं। जयपुर में आयोजित होने वाली इन रैलियों के बारे में राजनीतिक रणनीतिकारों का कहना है कि, ‘इससे तीसरे मोर्चे की ताकत का पता चल जाएगा वहीं भाजपा-कांग्रेस छोड़कर आने वाले दलों के नेताओं का रुख भी सामने आ जाएगा। बेनीवाल की

रैली में भारत वाहिनी के प्रदेश अध्यक्ष घनश्याम तिवाड़ी के जाने की बात चर्चा में है। लेकिन फिलहाल तिवाड़ी ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। इसी तरह ‘आप’ की रैली में ‘जमीदारा पार्टी के कुछ नेता शामिल हो सकतेे हैं। इस मामले में घनश्याम तिवाड़ी से बात करने पर उनका कहना था, ‘यह बात तो पार्टी की चुनाव समिति की बैठक में तय की जाएगी। जहां तक तीसरे मोर्चे का सवाल है वो तो बनेगा और जो लोग हमारे साथ आना चाहेंगे,उनका स्वागत है। उधर ‘आप’ पार्टी के समन्वयक देवेन्द्र शास्त्री का कहना है कि, ‘तीसरे मोर्चे पर हमारा दल गंभीरता से विचार कर रहा है। तीसरे मोर्चे के गिर्द बनती-बिगड़ती उम्मीदों को लेकर नागोर जिले के खींवसर से निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल का कहना है, ‘हम छत्तीस कौम के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाएंगे। हम चाहते हैं इस बार जाट कौम का शख्स मुख्यमंत्री बने। इस समुदाय का आज तक प्रदेश में मुख्यमंत्री नहीं बना। तिवाड़ी से बातचीत के बारे में पूछे जाने पर उनका कहना था, ‘इस मामले में उनसे बातचीत होती रहती है।

बेनीवाल ने इस सवाल को खारिज किया कि, ‘तीसरे मोर्चे के कर्णधार आगे चलकर भाजपा-कांग्रेस का दामन थाम लेते हैं? तीसरा मोर्चा धरातल पर उतरने की बजाय धरा का धरा रह जाता है? उनका कहना था, ‘इस बार ऐसा नहीं होगा। हम हर चुनौती का डटकर मुकाबला करेंगे। उन्होंने दावा किया कि, ‘गठबंधन हो जाने के बाद सब साथ बैठेंगे। सीटों को लेकर कोई विवाद नहीं  होगा। उधर राजनीतिक वनवास की संभावनाओं का सामना कर रहे एनडीए के पूर्व अध्यक्ष और युनाइटेड जनता दल के निष्कासित नेता शरद यादव भी इन दिनों राजस्थान में एक सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्र की तलाश में है। लेकिन अजीब बात है कि उन्होंने ‘तीसरे मोर्चे’ से दूरी बना रखी है और ‘एकला चलो’ की रणनीति पर चलना चाह रहे हैं।

फिलहाल चल रही टिकट वितरण की कवायद में समझा जाता है कि भाजपा मौजूदा 150 विधायकों के टिकट काट सकती है। उधर यह सवाल कांग्रेस हल्कों में भी मुखर है कि, ‘क्या कांग्रेस सभी मौज्ूादा विधायकों को टिकट देगी। कांग्रेस के फिलहाल विधानसभा में 25 विधायक है। हालांकि चर्चा यह भी सरगर्म है कि, ‘राजस्थान में विपरीत माहौल के बावजूद पहले 21 फिर उपचुनावों में चार विधायक जीत कर आए। ऐसे में इन्हें फिर मौका दिया जाए। लेकिन कई जगह की सर्वे रिपोर्ट तो चिंतन की तरफ इशारा करती है। उधर बीकानेर से सांसद चुने जाकर  केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री बने अर्जुनराम मेघवाल का दावा है कि, ‘भाजपा को गुड गवर्नेंस और डवलपमेंट पर वोट मिलेंगे। मेधववाल एंटी इंकबेंसी से साफ इन्कार करते हैं। उनका कहना है, ‘कोई नाराजगी है तो उसे दूर कर दिया जाएगा, लेकिन अब समय कितना बचा है फिर भाजपा नेतृत्व ने कितनों की नाराजगी दूर की है? इस सवाल पर उन्होंने संत कबीर का भजन दोहराया, ‘चदरिया मैली है तो उसे ज्यों की त्यों धर दो….जीवन मैला है तो उसे साफ करो।’’

बुन्देलखंड न बना राज्य और न हुआ विकास

बुन्देलखंड़ की अपनी ही व्यथा है पर सुनने वाला कोई नहीं है। बुन्देलखंड़ के विकास और समस्याओं के समाधान की चर्चा तब होती है जब चुनाव आते हैं। इस दौरान बुन्देलखंड के विकास और राज्य निर्माण की चर्चा ही नहीं होती है बल्कि वादे भी किये जाते है चुनाव जीतने पर बुन्देलखंड राज्य बनेगा पर ऐसा हो नहीं पाता है। इस समय मध्यप्रदेश में चुनाव है और चुनावी चर्चा के दौरान मध्य प्रदेश के हिस्से वाले बुन्देलखंड़ के निर्माण और विकास पर प्रत्याशी ताल ठोंक रहे है और दावा कर रहे हैं कि अब बुन्देलखंड को नजऱअंदाज नहीं किया जायेगा। बुन्देलखंड़ में तमाम समस्याओं के साथ -साथ पलायन की समस्या भी जोरों पर हैं अभी तक पलायन को रोकने के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाये गये हंै। इन्हीं तमाम मुद्दों पर तहलका की पड़ताल-

बुन्देलखंड के जहां अपने संसाधन है, जल, जंगल और जमीन है पर सरकार की उदासीनता के कारण संसाधनों का सही प्रयोग न होने कारण आज बुन्देलखंड पिछड़ा हुआ है।

मध्यप्रदेश के हिस्से वाले बुन्देलखंड में 30 विधानसभा सीटें हैं और  6 जि़ले हैं। अभी हाल ही में छठवां जि़ला निवाड़ी बना है। छत्तरपुर, पन्ना, सागर, दमोह ,टीकमगढ़ और निवाड़ी सागर संभाग में आते है जबकि दतिया ग्वालियर संभाग में है।

मौजूदा हालात में चुनावी बिसात बिछी हुई है। भले ही पूरे राज्य में कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला है पर बुन्देलखंड के पांच जि़ले पन्ना, छत्तरपुर टीकमगढ़, निवाड़ी और दतिया उत्तरप्रदेश से सटे है और उत्तरप्रदेश के विधायक और नेताओं के परिजन यहां पर चुनाव लड़ते है। इसलिये इन जिलों में कांग्रेस और भाजपा के साथ साथ सपा और बसपा के प्रत्याशी चुनावी समीकरण ही नहीं बिगाड़ते है। बल्कि चुनाव में जीत भी दर्ज कराते हंै।

इस बार चुनाव में बदलाव की बात ज़ोर शोर से चल रही है। यहां के स्थानीय नेताओं का कहना है कि कांग्रेस ने चुनाव की अहम् भूमिका प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और कांग्रेस के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप कर कांग्रेस में जान फूंक दी है क्योंकि कमलनाथ का प्रभाव पूरे प्रदेश में है तो ज्योतिरादित्य सिधिंया का अ़च्छा खासा प्रभाव बुन्देलखंड के चुनाव में पड़ेगा क्योंकि साफ-सुथरी छवि का नेता होने के कारण बुन्देलखंड के लोगों का झुकाव भी उनके साथ है।

मध्यप्रदेश में 15 सालों से भाजपा की सरकार है ऐसे में बदलाव की बातें चुनाव की तारीख घोषित होने के पूर्व उठती रही हैं। चुनावी बातों से लगता है कि जनता बदलाव के मूड में है पर जानकार लोगों का कहना है कि कांगेस का प्रत्याशी तो मजबूत चुनाव मैदान में उतरता है पर चुनावी संगठन मजबूत न होने के कारण कांग्रेस अभी हाल के चुनाव में पराजित हो रही है। दतिया के स्थानीय निवासी रमनलाल का कहना है कि केन्द्र सरकार की नीतियों के कारण मंहगांई बड़ी है और पेट्रोल – डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी हुई है ऐसे हालात् में बदलाव होना चाहिए। छत्तरपुर के अनुज शुक्ला का कहना है कि कांग्रेस आला कमान अगर पूरे चुनाव में संगठन को मजबूत रखने में मेहनत करें तो चुनाव जीता जा सकता है। पर कांगे्रस की चुनावी सभा में भले ही बड़े नेता एकजुट दिखते है पर आपसी खींचतान के कारण कांग्रेसी कार्यकर्ता उदास हैं।

टीकमगढ़ जिले के राजेश शर्मा का कहना है कि बुन्देलखंड में सबसे विकट समस्या पानी की है राज्य बने या न बने पर पानी की समस्या पर किसी भी सरकार ने कोई ठोस पहल नहीं की है। सागर के विनोद गुप्ता का कहना है कि अप्रैल का महीना शुरू होते ही पानी के लिये हाहाकार होने लगता है। इस पर यहां 15 साल से भाजपा सरकार ने और केन्द्र की मोदी सरकार ने कुछ नहीं किया है। जबकि दमोह के मनीष असाटी ने बताया कि पलायन न रुकने के कारण बुन्देलखंड में भी मजदूरों का अकाल रहता है। सरकार को पलायन रोकने के लिये मजदूरों के लिये गांव – गांव में रोज़गार मुहैया कराना चाहिये अन्यथा यहां पर मजदूरों का संकट बड़ी मुसीबत बन सकता है।

अभी हाल ही में निवाड़ी जिले के बनने से भाजपा को यहां लाभ मिल सकता है क्योंकि वर्तमान विधायक अनिल जैन को और केन्द्रीय मंत्री बीरेन्द्र कुमार को इस जिले के बनवाने का श्रेय जनता दे रही है। निवाड़ी जिला बनने से दावा किया जा रहा है कि यहां पर विकास के तौर पर छोटे -छोटे कारखाने लगाये जाने है जिससे रोजगार को बढ़ावा मिलेगा और पलायनवाद पर रोक लगेगी। पन्ना निवासी और भारतीय कृषक समाज के राष्ट्रीय महामंत्री कपिल मिश्रा का कहना है कि केन्द्र और प्रदेश की सरकार ने तमाम विकास के कार्य  किये है जिसको जनता मानती है। चुनाव में भाजपा के कामों पर जनता वोट देती रही है और देगी। रहा सवाल बुन्देलखंड के विकास का तो विकास हो रहा है पलायन रोकने के लिये उचित व सही निर्णय लिये जा रहे हैं। कपिल मि़श्रा का कहना है कि निवाड़ी जिला सरकार की पहल का नतीजा है जो जनता की समस्याओं को देखते हुए ही बनाया गया है। अब वहां के लोगों को अपने निजी और सरकारी कामों के लिये दूर नहीं जाना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि महंगाई और भ्रष्ट्राचार को लेकर जो हल्ला विपक्ष कर रहा है वह सब बकवास है क्योंकि कांगे्रस के शासन काल में हुए भ्रष्टाचार के कारण आज देश काफी पीछे है। किसान नेता बेनी सिंह का कहना है कि मोदी सरकार और मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार मिलकर किसानों के लिये अलग से बोर्ड बना दें और किसानों के कजऱ् माफ कर दे तो ठीक है अन्यथा इस बार किसानों ने ठाना है जो सरकार किसान हित की बात करेगी और उनकी मांगों को तत्काल मानेगी किसान उसी के साथ खड़़े होंगे। किसान व दलित नेता बी डी अम्बेडकर का कहना है कि सरकार चुनाव के दौरान किसानों और दलितों के अधिकारों की बात करती है पर सच्चाई ये है चुनाव के बाद सारी बातों को भूल जाती है पर इस बार किसान और दलितों ने निर्णय लिया है कि वे उस नेता को चुनेगे जो उनकी सुनेगा।

बिखरे सपनों की दास्तां हैं एनआरआई से शादियां

यदि दिल्ली हवाई अड्डे पर पुलिस पूरी तरह सतर्क नहीं होती तो एक अप्रवासी भारतीय (एनआरआई) गुरमीत सिंह यहां भारत में अपनी पत्नी और बेटे को छोड़ कर भाग गया होता और जर्मनी में अपनी जि़ंदगी के मज़े ले रहा होता। लेकिन अब वह पंजाब की जेल में पड़ा है। यह उन हज़ारों में शामिल है जो यहां लड़की के मां-बाप को विदेशों के सपने दिखा कर उनकी बेटियों से शादी कर लेते हैं और फिर विदेश भाग जाते हैं, कभी न आने के लिए।

अधिकारियों के अनुसार गुरमीत सिंह अपना पासपोर्ट निलंबित किए जाने के बावजूद भारत से भागने की फिराक में था। उसकी पत्नी पृतपाल कौर जो कि पंजाब के समाना की रहने वाली है ने बताया कि उनकी शादी 2011 में हुई थी। उस समय गुरमीत सिंह जर्मनी में ‘शेफ’(रसोइया) के तौर पर काम कर रहा था। शादी के एक महीने के बाद गुरमीत जर्मनी लौट गया। इसके बाद वह कभी-कभी आ जाता। एक साल के बाद उनके घर में बेटे ने जन्म लिया। बेटे के पैदा होने के बाद ही पृतपाल को पता चला कि गुरमीत ने जर्मनी में शादी की हुई है और उसके बच्चे हैं।

इसके बाद पृतपाल पर अत्याचारों की झड़ी लग गई। उसके ससुराल वालों ने उसे घर से निकाला उसे  मानसिक और शारीरिक तौर पर प्रताडि़त किया और उस पर समझौता कर लेने का दवाब डाला। उसके बाद 2015 में गुरमीत ने किसी प्रकार पुलिस के साथ सांठगांठ कर के देश से भागने में सफलता प्राप्त कर ली। उसके बाद उसने कभी पृतपाल कौर के साथ बात नहीं की।

पिछले दिनों प्रीतपाल कौर को पता चला कि गुरमीत  नेपाल के रास्ते अपने देश आया है।  इस पर पुलिस ने उसे पकडऩे के लिए ‘लुक आऊट’ नोटिस जारी कर दिया। अच्छा हुआ कि क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय ने गुरमीत का पासपोर्ट निलंबित कर दिया और इसकी सूचना तुरंत हर स्थान पर पहुंचा दी गई। इस प्रकार गुरमीत दिल्ली हवाई अड्डे पर धरा गया।

क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय ने किया बचाव

इस बात को पक्का करने के लिए कि ये अप्रवासी दुल्हे और नुकसान न कर सकें क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय ने इन भगौड़ों को पहचानने और पकड़वाने की मुहीम छेड़ दी है। इस तरह की हज़ारों शिकायतें मिलने के बाद  चंड़ीगढ़ के क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय ने यह मामला अपने हाथ में लिया और अब तक 75 पासपोर्ट निलंबित कर दिए। यह प्रयास इस साल मई-जून के महीनों से शुरू हुआ और कार्यालय ने इसके लिए एक विशेष ‘हेल्प लाईन’ शुरू की है यह केवल उन पत्नियों  के लिए है जिनके पति उन्हें छोड़ कर चले गए या जो केवल ‘हनीमून पत्नियां’ ही बन पाई।  पंजाब के लिए यह कोई नई बात नहीं है। बहुत से पंजाबी किसी भी तरह विदेशों में बसने की कोशिश में लगे रहते हैं। हालांकि इस प्रकार के मामलों के बाद पैदा होने वाली समस्याएं निराली होती हैं।

एक अनुमान के अनुसार क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय चंडीगढ़ के पास इस प्रकार के 12,000 से अधिक मामले हैं। यहां कार्यालय में पंजाब के 24 जि़लों के अलावा हरियाणा और चंडीगढ़ के पासपोर्ट बनते हैं। पर पासपोर्ट का निलंबन एक लंबी प्रक्रिया है।

पासपोर्ट का निलंबन कैसे कार्य करता है, इस पर क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी सिवाश कबिराज ने बताया,’ पासपोर्ट का निलंबन बारीकी से की गई जांच और छानबीन के बाद 1967 में बने पासपोर्ट कानून के तहत किया जाता है और इसमें काफी कागज़ी प्रक्रिया और दस्तावेज़ लगते हैं। 1967 के कानून में निलंबन खत्म करने की प्रक्रिया भी बतलाई गई है , इसके तहत ही अप्रवासी भारतीयों और उन लोगों के पासपोर्ट निलंबित किए जाते हैं जो भगौड़े घोषित कर दिए गए हों।

कबिराज ने बताया कि कई बार जब पासपोर्ट निलंबन सही भी होता है, तब भी उसमें कई रुकावटें आ जाती हैं। जैसे कई मामलों में पीडि़त के पास वे असली दस्तावेज ही नहीं होते जिनकी ज़रूरत होती है। कई बार स्थानीय पुलिस की भागीदारी ज़रूरी होती है। हमारे स्टाफ के लोग ज़रूरी दस्तावेज़ लेने पुलिस तक पहुंचते हैं तब भी कई बार मामले खास धाराओं में पंजीकृत नहीं किए जाते। उन धाराओं के ‘वारंट’ जारी नहीं किए जाते।

इस प्रक्रिया के तहत अब क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय ने उन कंपनियों और फर्मों को सूचित करना शुरू कर दिया है, जिनमें धोखाधड़ी करने वाले लोग ‘कर्मचारी ‘ होते हैं। इसके साथ उन संबंधित देशों के दूतावासों को भी साथ जोड़ा जाता है जिन देशों में धोखाधड़ी करने वाला रह रहा होता है। अभी ऐसे  लोगों की एक विस्तृत सूची तैयार की जा रही हें ताकि उन्हें ‘काली सूची’ में डाल दिया जाए, और भारत लाया जाए। ऐसे लोग एक से ज़्यादा शादियां करने वाले होते हैं।

एक जुट हो कर हम कर सकते हैं। पीडि़त बने स्वंय सेवक:

लगभग 13 महीने पहले रूपाली अपने जीवन के सबसे खुशी वाले दिन यानी शादी के लिए तैयार हो रही थी। उसकी आंखों में अपनी खुशहाल जि़ंदगी को लेकर बेशुमार सपने थे। वह इस बात को लेकर काफी उत्सुक थी कि शादी के बाद उसका जीवन कैसे चलेगा। लेकिन अगले एक महीने में जो कुछ हुआ उसकी कल्पना कंप्यूटर में ‘एम टेक’ रूपाली और उसके माता-पिता ने सपने से भी नहीं की थी। उसे उसके अप्रवासी भारतीय पति और उसके मां-बाप के हाथों प्रताडि़त होना पड़ा और दो महीने में उसका पति त्रिलोचन गोयल कनाडा चला गया और फिर कभी नहीं लौटा। वह पहले से ही शादीशुदा था।

इसके पश्चात  रूपाली ने फेसबुक मीडिया और ट्वीटर वगैरा की सहायता ली तब उसे पता चला कि उस जैसी तो हज़ारों महिलाएं है जो इस तरह के धोखे का शिकार हो कर बैठी हैं। जो अभियान रूपाली ने एक छोटे से ग्रुप की शक्ल में चलाया था देखते-देखते वह एक बड़ा आंदोलन बन गया। इस तरह से एक सहायक ग्रुप- ”टू गैदर वी कैन’’ (एक जुट हो कर कर सकते हैं) बन गया। इसके बनाने वालों में रूपाली गुप्ता, (बठिंडा,पंजाब), अमृतपाल कौर (बुडलाडा पंजाब) और रीना चौहान (कैथल, हरियाणा) शामिल थी। पर धीरे-धीरे इस ग्रुप में और महिलाएं जुड़ती गई और यह एक शक्तिशाली संस्था बन गई।

रूपाली ने ‘तहलका’ के साथ बातचीत में बताया ”हम लोगों ने शुरूआत तो 10-12 की गिनती में की थी। ये सभी ऐसी महिलाएं थी जिनकी कहानी लगभग मिलती जुलती थी। किसी को उसके पति ने एक हफ्ते में छोड़ दिया था तो किसी को दो-तीन साल के बाद, कइयों के बच्चे थे। हम सभी एक ही धागे से आपस में बंधे थे। वह धागा था -दुख, तकलीफ, निराशा और उदासी का। हम सभी व्यक्तिगत तौर पर तो अपनी लड़ाई लड़ ही रहे थे, पर फिर हमने एक जुट हो कर इसे लडऩे का फैसला किया। आज हम 350 से ज़्यादा महिलाएं है, और हमने अपना एक ‘सेटअप’ क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय चंडीगढ़ में स्थापित कर लिया है। हम वहां अप्रवासी भारतीय हैल्पलाईन चला रही हैं और

हमें हर रोज़ लगभग 50 कॉलस आती हैं और अब अधिक से अधिक महिलाएं खुल कर सामने आ रही हैं। असल में ये सभी महिलाएं अब लगातार अपने गांवों से चंडीगढ़ आती-जाती रहती हैं। इनमें से कोई  न कोई ‘कॉलस’ लेने के लिए वहां मौजूद रहती है। इसके अलावा जो लोग वहां आकर बात भी करते हैं उनके सवालों के जवाब भी वहां दिए जाते हैं।

रूपाली ने बताया कि जब से हैल्पलाईन की शुरूआत की गई है तब से उसके फोन की घंटी बजने से नहीं रुकती। सभी महिलाएं एक दूसरे से पूछती रहती हैं कि इन मामलों को आगे कैसे बढ़ाया जाए? न्याय कैसे लिया जाए? कई बार वे एक-दूसरे के केस को मजबूती देने के लिए सूचनाओं का आदान-प्रदान करती हैं। पुलिस  से किस प्रकार निपटा जाए या उनसे कैसे काम लिया जाए जैसे मुद्दों पर भी बातचीत चलती है।

यह पूछे जाने पर कि यह सब करने के लिए वे लोग पैसा कहां से लाती हैं? रूपाली ने बताया कि इसके लिए वे अपने परिवारों पर निर्भर रहती हंै। हम में से कई चंडीगढ़ में नही रहती। हमें अपने ‘केसों’ के मामले में पुलिस थानों के चक्कर काटने पड़ते हैं। पर मैं यहां चडीगढ़ में कोई नौकरी तलाश कर रही हूं। इस समय वह इस स्वंय सेवी काम को चलाने के लिए ‘पेंइग गेस्ट’ के तौर पर रह रही है।

रूपाली दावे के साथ बताती है,” इस प्रकार का पहला मामला 1996 में सामने आया। फिर कुछ सौ मामले आए और अब यह गिनती हज़ारों में है। यदि कानून का पालन सख्ती से किया गया होता और कसूरवार पकड़े गए होते तो हालात आज जितने खराब नहीं होते। पर, मुझे उम्मीद है कि हमारे संयुक्त प्रयासों से हम कुछ परिवारों के दर्द तो कम कर पाएंगे ही’’।

जिन परिवारों का जि़क्र आया वे सभी पीडि़त एक सा ही उदगार जाहिर  कर रहे हैं। 30 साल की दर्शना जिसकी शादी दो साल पहले हुई थी उसका कहना है,” यह सब केवल लड़की ही नहीं भोगती है बल्कि उसका पूरा परिवार दुख उठाता है। कई सामाजिक टिप्पणियां लड़की पर की जाती हैं और कुछ लोगों के लिए लड़की पर इल्ज़ाम लगाना आसान हो जाता है बजाए उसके पति के। हमारा समाज ऐसा ही है। यही वजह है कि कुछ लड़कियों ने अपने मां-बाप के पास वापिस जाने की बजाए अपने दर्द को छुपा कर अकेले सहने का मन बना लिया। उन्हें पता है कि उन्हीं पर सारी उंगलियां उठेंगी उन्हीं का कसूर निकाला जाएगा और उसके परिवार को भी बहुत कुछ सहना होगा’’।

आगे की राह

बहुत सी पीडि़तों का कहना है कि आगे की राह बहुत कठिन है । हालांकि सरकार का दावा है कि वह अपना काम बखूबी कर रही है। इन मामलों को सुलझाने के लिए इससे जुड़े सभी को जिनमें राज्य सरकारें, अप्रवासी भारतीय आयोग, महिला आयोग, अदालतें और पुलिस वगैरा शामिल हैं को एकजुट हो कर लगना पड़ेगा। ”केवल सख्त कानून नहीं बल्कि हमें उन्हें लागू करने वाली प्रभावशाली मशीनरी भी चाहिए। इसके साथ ही इन मामलों का निपटारा शीध्र होना भी ज़रूरी है। एक और पीडि़ता दीपिका गहलोत ने बताया,” बहुत से मामलों को पुलिस लटकाए रहती है और इस बीच आरोपी किसी और को भी अपना शिकार बना लेते हैं’’।

उसने कहा,” यह सही है कि इस तरह के ज़्यादातर मामले पंजाब से हैं पर पड़ोसी राज्यों हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली में भी कई पीडि़त परिवार हंै, इसलिए इन मामलों को देखने के लिए एक सांझा प्राधिकरण तैयार किया जाए’’।

दिल्ली की पीडि़ता शिखा का कहना है कि जब अप्रवासी भारतीयों के लिए विवाह को पंजीकृत करवाना अनिवार्य बना दिया जाएगा तो इस तरह के मामलों में कमी आएगी। अभी बहुत से लोग अपने विवाह को अप्रवासी भारतीय आयोग में पंजीकृत करने के लिए आगे नहीं आते, इसी का फायदा ये अप्रवासी भारतीय उठाते हैं।

वर्तमान राजनीति और सरदार पटेल

31 अक्टूबर 1984 को सरदार पटेल की जयंती थी और उसी समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का शरीर उनके ही अंग रक्षकों ने छलनी कर दिया था। अगले दो-तीन दिन में देश में 3000 से ज़्यादा सिक्खों की वीभत्स हत्या हुई। झवेर भाई पटेल के पुत्र सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म दिन मेरा भी है। मैं हमेशा इस बात से बहुत उत्साहित होता था, और यह बहुत दुखद दिन की तरह भी याद रहेगा।

उनके ऊपर नर्मदा घाटी की हत्या आरोपित कर दी गई है। संसार के बड़े पुतलों में उनका पुतला शुमार होगा मगर उनके नाम पर बने बांध से नर्मदा घाटी के हज़ारों गांव और उनके पुतले के आसपास के छह आदिवासी गांव उजड़ गए। वे अपने सरदार को याद रखेंगे मगर आज देश के सरदार ने उनके साथ धोखा किया है। सरदार पटेल की शख्सियत पूरी तरह उलटने का काम देश का सरदार ही कर रहा है।

सरदार पटेल के जीवन और जीवन चरित्र के बारे में लिखना शुरू किया जाए तो नागपुर झंडा सत्याग्रह 1923, मुंड कर का आंदोलन 1924, गुजरात बाढ़ का संकट 1927, बारडोली सत्याग्रह 1928 और इन सब में से गुजरते हुए देश के गृहमंत्री का पद संभालने की यात्रा एक असाधारण योग्यता वाले व्यक्ति का दर्शन कराती है। सैकड़ों रियासतों में बटे देश को एक सूत्र में बांधना और एक मजबूत गणतंत्र के रूप में देश को खड़ा करने में उनकी भूमिका अतुलनीय ही है।

इन सब परिपेक्ष्य में 3500 करोड़ की लोहे की उनकी मूर्ति नर्मदा घाटी के छह से ज़्यादा आदिवासी गांवों को पर्यटन के नाम पर उजाड़ कर खड़ी की गई। 31अक्टूबर को सरदार पटेल की आत्मा चीन से बन कर आई मूर्ति के आसपास होगी या सरदार सरोवर बांध से प्रभावित उजड़े लाखों आदिवासी किसानों की पीड़ा के आस पास होगी। इसमें कोई सोचने की बात नहीं जिसने अपना पूरा जीवन किसानों और देश की समृद्धि में लगाया वह अपने बड़े पुतले में तो कभी नहीं हो सकती।

मोदी जब 31 अक्तूबर को उनकी चीन से बनवाई मूर्ति का अनावरण करेंगे तब भी सरदार की आत्मा नर्मदा जिले के उन 72 आदिवासी गांव के हज़ारो घरों में ही होगी जो उस दिन विरोध दिखाते हुए चूल्हा नहीं जलाएंगे।

एक ओर सरदार सरोवर से विस्थापित प्रभावितों के पुनर्वास स्थलों तक पीने का पानी भी नहीं पहुंचा है, और दूसरी ओर ”नर्मदा” सूखा और बाढ़ के चक्र में फंसी है। साथ ही पानी रुकने से प्रदूषित होकर जलकुम्भी से ढकती जा रही है। पशुओं के शव तक तैरते पाए गए हैं। पानी पीने लायक नहीं रह गया है। नर्मदा के लोग कहते हैं कि मातेसरी की यह हालात हमें मंजूर नहीं है। सरदार सरोवर बांध के नीचे नदी सूखने से

समुंदर 80 किलोमीटर तक अन्दर आकर खेत, भूजल, नदी को खारा कर गया है। यह कैसा विकास?

लगभग 35000 परिवारों का पूर्ण पुनर्वास होना भी बाकी है। सर्वोच्च अदालत के आठ फरवरी 2017 के फैसले का भी पूर्णपालन नहीं हुआ है। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश के पहाड़ी आदिवासियों को वनअधिकार और पुनर्वास के अधिकार आधे अधूरे मिले हैं… कईयों को घर-प्लॉट या आवास योजना का अनुदान मिलना बाकी है। पुनर्वास स्थलों पर शालाएं स्थानांतरित की गयी हैं लेकिन हजारों बच्चे मूल गांवों में हैं, जिनकी शाला छुड़वाने का काम सर्व शिक्षा अभियान का डिंडोरा पीटने वाली वर्तमान सरकार ने किया है। बिना पुनर्वास आदिवासियों के सैकड़ों घर, भी तोड़े या डूबाए गए… लेकिन 35000 परिवार मूल गांवों में आज भी हैं।

इतिहास कैसे करवट बदलता है और शूद्र राजनीति कैसे किसी महान नेता को अपने मनचाहे प्रतीक के रूप में बदलती है। सरदार वल्लभ भाई पटेल से ज़्यादा बड़ा उदाहरण देश की राजनीति में नहीं मिलता है।

यह साजिश तब शुरू हुई जब देशभर में सरदार पटेल की मूर्ति के लिए किसानों से उनके हल और अन्य काम की चीजों द्वारा लोहा इक_ा करने का अभियान शुरू किया गया। वो लोहा कहां गया? यह जांच का विषय है जो आज के देश की सरकार की बहुत सी जांचों में से एक जांच होगी।

नेहरू और पटेल के संबंधों को कटु दिखा कर ही यह संभव हो सकता है ऐसा आर एस एस ने जान लिया था। इसलिए सरदार पटेल व नेहरू की संबंधों में भ्रांतियां फैलाना उनका काम रहा है। राजीव भाई मणि भाई पटेल हिंद के सरदार किताब के अंत में लिखते है की आंतो की बिमारी से पीडि़त सरदार को जब मुंबई इलाज के लिए 12 दिसंबर 1950 को भेजा जा रहा था तो प्रधानमंत्री राष्ट्रपति सभी उनको विदा करने हवाई अड्डे पर गए थे। अलग होते समय सरदार इतना ही बोले थे जवाहर लाल के सर पर बहुत बड़ा बोझ है।

यह बात भी सरकारी फाइलों में सुरक्षित है कि नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी सुरक्षा की चिंता सरदार पटेल को कितनी थी? नेहरू की जानकारी के बिना ही प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके लिए तीन मूर्ति भवन पटेल ने ही केबिनेट नोट द्वारा पास करवाया था। प्रतीकों को छीनना उनको अपने अनुसार बदलना आरएसएस की फौज का एक लक्ष्य है। स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी न होने के कलंक को मिटाने का उनका यह एक तरीका है। सरदार पटेल के गरिमामय आदर्शों की झलक कहीं नजर नहीं आती।

गांधी के प्रति उनका आंतरिक प्रेम और सम्मान का रिश्ता समय के इन दो छोरों पर घटी घटनाओं से मालूम पड़ता है। 1928 में बारडोली सत्याग्रह अपने चरम पर था। महात्मा गांधी वहां पहुंचे पर लोगों के बहुत आग्रह पर भी गांधी ने किसी सभा में भाषण नहीं दिया। उन्होंने कहा सरदार का हुक्म है उनके सिवा कोई भाषण नहीं देगा और गांधी ने उसका पालन किया।

दूसरी बात 28 जनवरी 1948 की है। गांधी जी की सभा में बम फटा था पटेल और नेहरू बापू को समझाने गए थे कि उन्हें सुरक्षा लेनी होगी। गांधी अडिग थे उनकी सभा में आने वाले किसी भी व्यक्ति की जांच नहीं होगी। पटेल उस बूढ़े की लिए बहुत चिंतित थे क्या करें? और कैसे समझाएं? देश का गृहमंत्री कसमसा रहा था। उन्होंने नेहरू के बहुत से निर्णयों पर भी अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी। किंतु संसद और देश के इतिहास में यह कहीं नहीं है कि उन्होंने कांग्रेस छोड़ी या मंत्रिमंडल से अलग हुए।

वह एक परिपक्व नेता थे जो देश को आगे रखते थे और नेहरू के नेतृत्व में विश्वास भी रखते थे।

शुद्र राजनीति के निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए देश के सरदार का सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ यह स्वार्थी अन्याय न तो इतिहास माफ करेगा न ही सरदार वल्लभ भाई पटेल की आत्मा। जो देश के किसानों में बसी है।

मी टू के बहाने मानव पर हावी होना

भारत में मी-टू अभियान के आगमन के साथ ही स्त्री-पुरुष संबंधों में हो रहे घालमेल और यौन शोषण को लेकर तीखी बहस के साथ, आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरु हो गया है। गंभीरता से शुरु हुआ यह अभियान धीरे-धीरे फूहड़ता की ओर अग्रसर है, क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज इतनी गहरी और सीधी चोट सह पाने की स्थिति में नहीं है। वहीं कुछ दिन पहले लिव-इन को लेकर चली बहस भी कमोवेश बिना किसी नतीजे के हल्ले गुल्ले की भेंट चढ़ गई थी। उपरोक्त दोनों ही परिस्थितियों अर्थात ”मी-टू और लिव-इन’’ को क्या नई चेतना की अनिवार्यताओं के तौर पर देखा जा सकता है ? मी-टू एक ऐसा आंदोलन है जो समाज में परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। वही लिव-इन व्यक्तिगत आंकाशओं को मूर्तरूप देने का प्रयोग है। समाज में आ रहा खुलापन जितना व्यापक दिखाई पड़ रहा है, उतना वास्तव में है नहीं, साथ ही इसमें वैचारिक स्पष्टता का अभाव नजर आ रहा है और यह तात्कालिक अभिव्यक्ति अधिक प्रतीत हो रहा है।

ऐसे तमाम महान लोग जिनके बारे में हम लगातार चर्चा करते रहते हैं, उनमें गांधी ही एकमात्र व्यक्ति नजर आते हैं, जो कि अपने यौन जीवन को लेकर चर्चा करते हैं। उस पर सार्वजनिक तौर पर बहस भी करते हैं और जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में ब्रह्मचर्य को लेकर बेहद गंभीरता से व्यावहारिक प्रयोग भी करते हैं ! इस वजह से वह निंदा के पात्र भी बनते हैं। वे विवाह को बहुत आवश्यक नहीं समझते और विवाह के भीतर रहते हुए भी ब्रह्मचर्य की वकालत करते हैं और एक हद तक उसका पालन भी करते हैं। वे कहते हैं कि व्यभिचार के लिए किसी बाहरी साथी की आवश्यकता नहीं है और यह विवाह के भीतर भी संभव हो सकता है। वे केवल सन्तोत्पत्ति के लिए ही यौन संबंधों की आवश्यकता महसूस करते हैं। उनका मानना था, ”ब्रह्मचर्य का अर्थ है, मन-वचन-काया से समस्त इन्द्रियों का संयम। इस संयम के लिए ऊपर बताये (आँख, कान, भोजन संबंधी) त्यागों की आवश्यकता है, इसे मैं दिन प्रतिदिन अनुभव करता हूँ। त्याग के क्षेत्र की सीमा ही नहीं है, जैसे ब्रह्मचर्य की महिमा की कोई सीमा नहीं है। ऐसा ब्रह्मचर्य अल्प प्रयत्न से सिद्ध नहीं होगा। करोड़ों लोगों के लिए वह सदा केवल आदर्श रूप रहेगा।’’ वे तो यहां तक कहते हैं कि ”जब तक विचारों पर इतना अंकुश प्राप्त नहीं होता कि इच्छा के बिना एक विचार भी मन में न आए, तब तक ब्रह्मचर्य सम्पूर्ण नहीं कहा जा सकता।’’ यहां यह उल्लेख भी आवश्यक है कि गांधी सत्य व अहिंसा के बाद तीसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्रत ब्रह्मचर्य को ही मानते हैं। उनके अनुसार किसी ने भोग-विलास से सत्य पाया हो ऐसी एक भी मिसाल हमारे सामने नहीं है। वे कहते हैं कि पूर्ण अहिंसा का पालन भी ब्रह्मचर्य के बिना संभव ही नहीं है। 5 अगस्त 1930 को यरवदा जेल, जिसे उन्होंने यरवदा मंदिर का नाम दिया था में ब्रह्मचर्य पर प्रवचन देते हुए कहते है, ”जनन-इन्द्रिय (लिंग-योनि) के विकारों पर काबू पाना ही ब्रह्मचर्य का पालन है, ऐसा माना गया है। मुझे लगता है यह अधूरी और गलत व्याख्या है। तमाम विषयों पर रोक, काबू ही ब्रह्मचर्य हैं जो दूसरी इंद्रियो की हवसों को जहां तहां भटकने देता है और एक ही इन्द्रिय को रोकने की कोशिश करता है, वह निकम्मी कोशिश करता है, इसमें क्या शक है ?’’

हम मी-टू जैसे अभियानों की विवेचना करते हैं तो पाते हैं कि यह अंतत: एक मनुष्य की दूसरे मनुष्य पर सत्ता बनाए रखने की प्रवृत्ति का ही परिणाम है। दुखद तो यह है कि अब इस मी-टू अभियान में पुरुषों की व्यथा भी सामने आने लगी है। उनके यौन शोषण के किस्से पहले सुनने में तो आते थे पर मी-टू के बाद कुछ पुरुष पीडि़त भी खुलकर सामने आए हैं। इसने इस समस्या को नया स्वरूप प्रदान कर दिया है। उधर यदि हम तमाम सामाजिक सर्वेक्षणों एवं राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो पाते हैं कि भारत के 50 प्रतिशत से ज़्यादा बच्चे कभी न कभी (18 वर्ष की उम्र के पूर्व) यौन शोषण एवं यौन प्रताडऩा का शिकार हुए हैं। इससे हमें समझना चाहिए कि भारत की आधी से ज़्यादा आबादी आज प्रत्यक्ष तौर पर मी-टू आंदोलन का हिस्सा है। यह अलग बात है कि पारिवारिक व सार्वजनिक वर्जनाएं उन्हें अपने ऊपर हुए अत्याचार की अभिव्यक्ति का मौका नहीं देती। परंतु यह एक कटु सत्य है।

गांधी जिस संयम व यौन पवित्रता के हिमायती रहे हैं, उसमें संभवत: लिव-इन जैसे किसी संबंध की कोई गुंजाइश ही नहीं है। उनका पहला बड़ा अनशन (7 दिन) दक्षिण अफ्रीका में उनके अपने बेटे एवं एक विवाहित स्त्री के यौन संबंधों के खिलाफ ही था। भारत में साबरमती आश्रम में भी उन्होंने इसी बात को लेकर दो दिन का अनशन किया था। यह तय है कि समय के साथ स्थितियां बदलती हैं, लेकिन जीवनमूल्य तो शाश्वत बने रहते हैं। जहां एक मत यह मानता है कि किसी एक के साथ बंधे रहना, भले ही वह विवाह ही क्यों न हो, मानव स्वभाव के सर्वथा अनुकूल नहीं है। ऐसा मत अधिकतर यौन इच्छाओं को लेकर दिया जाता है। वहीं गांधी कहते हैं कि सम्पूर्ण मानवता से प्रेम करना हो तो आप किसी एक के ही साथ हमेशा के लिए प्रेम में बंध कर नहीं रह सकते। हमें अपने प्रेम का विस्तार करना होगा। माक्र्स कहते हैं, ”दुनिया में शोषण की शुरुआत पुरुष द्वारा स्त्रियों के शोषण से हुई है।’’ मी-टू अभियान इसे आज प्रमाणित भी कर रहा है। आखिकार सारा खेल अपनी सत्ता को स्थापित करने का ही है। मी-टू को लेकर जो तमाम उदाहरण अभी हमारे सामने आ रहे हैं, वे काफी पढ़े-लिखे व प्रभावशाली लोगों के हैं और आरोपी भी वैसे ही वर्ग के हैं। परन्तु यह स्थिति वहीं तक सीमित नहीं है। कभी अपने शहर के उस चैराहे पर जाइए जहां मजदूर सुबह काम की तलाश में झुण्ड में खड़े रहते हैं। वहां ध्यान से सुनिए कि जो लोग मजदूर लेने वहां आते हैं, वे महिला श्रमिकों के लिए किस तरह की भाषा का खुलकर सार्वजनिक तौर पर प्रयोग करते हैं और उनसे मजदूरी के अलावा और क्या-क्या उम्मीद रखते हैं। यह पूरा मामला आखिर पुरुष वर्चस्व का ही तो है। जबकि गांधी कहते हैं, ”स्त्रियों के अधिकारों के सवाल पर मैं किसी तरह का कोई समझौता नहीं कर सकता। मेरी राय में उन पर ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए जो पुरुषों पर न लगाया गया हो। पुत्रों और पुत्रियों में किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। स्त्री पुरुष दोनों के साथ समानता का व्यवहार किया जाना चाहिए।’’ परंतु यह समानता आज भी दुर्लभ ही है।

आज हम जिस समय में रह रहे हैं उसमें किसी भी प्रकार के नियंत्रण फिर वह यौनेच्छा पर ही क्यों न हो, को अप्रासंगिक मान लिया गया है। ऐसे में गांधी का ब्रह्मचर्य का विचार क्रांतिकारी नहीं बल्कि दकियानूसी की श्रेणी में आ जाता है। परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। गांधी स्वयं मानते रहे कि पूर्ण ब्रह्मचर्य बहुत थोड़े से लोगों के लिए संभव हो सकता है। परंतु यदि हम इसे संयम का नाम देें तो काफी हद तक लोग इसका पालन कर पाएंगे। आज हम जो कुछ प्रचार माध्यमों आदि के द्वारा देख व सुन रहे हैं, वह हमें विचलित कर रहा है। हमारा वर्तमान आहार, बदलाव की अपेक्षा कर रहा है। हमारी दिनचर्या भी बदलाव की मांग कर रही है। तमाम बीमारियां हमें इसी अनियमितता की वजह से घेर रही हैं। और वैश्विक व भारत के स्तर पर बढ़ती मानव तस्करी, पोर्नोग्राफी, यौन पर्यटन, बच्चों का दैहिक शोषण जैसी तमाम व्याधियां हमें समझा रहीं है कि वस्तुत: हमारा जीवन संयम में ही सुरक्षित रह सकता है। गांधी जी ने कभी नहीं कहा कि उनके पास भारत की सभी समस्याओं का हल है। परंतु वे अपनी तरफ से समाधान सामने रखते रहे। उनके पोते गोपाल कृष्ण गांधी उनकी जिन अनूठी विशेषताओं का जि़क्र करते हैं, उनमें प्रमुख है, ”उन्हें मृत्यु से भय नहीं था। वे पराजय से डरते नहीं थे। उन्हें मूर्ख दिखने में भी भय नहीं लगता था और चौथी व सर्वाधिक महत्वपूर्ण कि उन्हें अपनी गलती मानने में डर नहीं था।’’ गांधीजी ने ब्रह्मचर्य की अपनी बात को कभी गलत नहीं माना था। हम आज अपने असंयमित व्यवहार, आचरण व उपभोग से इस पृथ्वी के लिए जोखिम बढ़ाते जा रहे हैं। गांधी को नकारना और स्वीकारना दोनों ही फैशन बनते जा रहे है। जबकि आवश्यकता उनके विचारों को अपनाने की है। हमारा नज़रिया क्या हो, कैसा हो यह महत्वपूर्ण है। वे ऐसी दुनिया की कल्पना करते थे जिसमें न्यूनतम विवाद हों। और यदि होते भी हैं तो उनका अहिंसात्मक समाधान निकल सके। वे चाहते थे कि स्त्री-पुरुष दोनों एक दूसरे की ”मुक्ति’’ में सहयोगी बने! ब्रह्मचर्य का प्रयोग इसी हेतु उठाया गया प्रयास था। भगवान सिंह, गांधी और दलित भारत जागरण में लिखते हैं, ”भारत में बेटे को ही बुढ़ापे का सहारा माना जाता रहा है। लेकिन, गांधी ने जीवन के अंतिम दिनों में चलने के लिए आभा एवं मनु का सहारा लेकर इस स्त्री विरोधी समाज को यह संदेश दिया कि लड़कियां भी लड़के की तरह बुढ़ापे का सशक्त सहारा हो सकती हैं। फिर जो राष्ट्रपिता (गांधी) को सहारा दे सके, ऐसी शक्ति भला राष्ट्र के निर्माण में कैसे उपेक्षित की जा सकती है।’’

विराट की कहानी, आंकड़ों की जुबानी

भारतीय क्रिकेट कप्तान विराट कोहली ने खुद को इस पीढ़ी का एक महान बल्लेबाज स्थापित कर लिया है। उसने टेस्ट मैचों, एक दिवसीय मैचों और टी-20 में जो रिकार्ड स्थापित किए है वे हैरान करने वाले हैं।

24 अक्तूबर 2018 को विराट एक दिवसीय मैचों में सबसे तेज 10,000 रन बनाने वाले बल्लेबाज बन गए। उन्होंने 10,000 रन बनाने के मात्र 205 पारियां खेलीं। इससे पूर्व सचिन तेंदुलकर ने 259 पारियां में यह लक्ष्य पूरा किया था। इन रनों को बनाने में उन्होंने 10 साल और 317 दिनों में पूरे किए थे। इनते रन बनाने में विराट ने 10,813 गेंद खेलीं।

श्रीलंका और वेस्टइंडीज़ के खिलाफ लगातार तीन शतक बनाने वाले विराट पहले बल्लेबाज बने।

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे तेज़ किसी और कप्तान ने 8000 रन पूरे नहीं किए। उन्होंने यह उपलब्धि 137 पारियों में पूरी की। विराट पहले ऐसे कप्तान भी हैं जिन्होंने पांच अक्तूबर 2018 को लगातार तीन सालों तक हर साल में 1000 से अधिक रन बनाए। उन्होंने कप्तान के तौर पर सबसे तेज़ 65 पारियों में 4000 रन बना कर वेस्ट इंडीज़ के ब्रायन लारा का 71 पारियों का रिकार्ड तोड़ा।

विराट कोहली ने 20 अगस्त 2018 को 200 रन बना कर टेस्ट क्रिकेट में बतौर कप्तान 10वीं बार दोहरा शतक बना कर अपना नाम रिकार्डस की किताबों में दर्ज करवा लिया। 2018 की दक्षिण अफ्रीका यात्रा के दौरान विराट ने छह एक दिवसीय मैचों में 186 की औसत से 558 रन बनाए। उनका स्ट्राइक रेट 99 रहा। एक दिवसीय सीरिज़ में 500 से ज्य़ादा रन बनाने वाले विराट पहले बल्लेबाज़ बने। विराट ने एक दिवसीय मैचों में कप्तान के तौर पर सबसे तेज़ 3000 रन बनाने का भी रिकार्ड अपने नाम किया। उन्होंने अपने 3000 रन केवल 49 पारियों में पूरे किए जबकि इतने ही रन बनाने के लिए एबी डिविलियर्स को 60 पारियां खेलनी पड़ीं।

विराट कोहली और रोहित शर्मा के बीच अब तक चार बार 200 से ऊपर की साझेदारी हुई है। एक दिवसीय मैचों में यह भी एक रिकार्ड है। विराट ने एक दिवसीय मैचों में 9000 रन अपनी 194वीं पारी में पूरे कर लिए। उसने एबीडिविलियर्स के 205 पारियों के रिकार्ड को पीछे छोड़ा।

कोहली दुनिया के पहले बल्लेबाज़ हैं जिन्होंने चार टेस्ट मैचों मेें चार दोहरे शतक जड़े। ऐसा करते हुए उन्होंने राहुल द्रविड़ और डॉनब्रेडमैन को पीछे छोड़ दिया। इसके अलावा उन्होंने क्रिकेट के इतिहास में बतौर कप्तान खेलते हुए अपनी पहली तीन पारियों में तीन शतक जड़ दिए। यह कारनामा आज तक कोई और खिलाड़ी नहीं कर पाया। क्रिकेट के तीनों रूपों के कप्तान के रूप में खेलते हुए 93 पारियों में विराट ने 20 शतक जमा दिए। पोटिंग 20 शतकों के लिए 164 पारियां खेलीं और स्मिथ ने यह उपलब्धि 227 पारियों में अर्जित की।

विराट कोहली एक मात्र ऐेसे बल्लेबाज हैं जिसने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 50 से ज्य़ादा की औसत से 15,000 रन बनाए।

भारत और पाकिस्तान संयुक्त विजेता

बारिश ने पांचवी एशियन चैंपियन ट्राफी के फाइनल का मज़ा खराब कर दिया। मस्कट में खेली गई इस प्रतियोगिता में भारी बारिश के कारण भारत और  पाकिस्तान के बीच फाइनल मैच नहीं खेला जा सका। ये दोनों देश इस ट्राफी को दो-दो बार जीत चुके हैं। इस बार भी मामला बराबरी का रहा। आयोजकों ने मैच के निर्धारित समय से एक घंटा बाद तक इंतजार किया और फिर प्रतियोगिता के निदेशक ने भारत और पाकिस्तान के प्रशिक्षकों के साथ बातचीत करने के बाद दोनों टीमों को संयुक्त विजेता घोषित कर दिया।

पिछली विजेता भारत की टीम ही एक ऐसी टीम थी जिसने टूर्नामेंट में कोई मैच नहीं हारा। उन्होंने 20 अक्तूबर को खेले राउंड-रोबिन मैच में पाकिस्तान को 3-1 से परास्त किया था।

इससे पूर्व तीसरे स्थान के लिए खेले गए मुकाबले में मलेशिया ने एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता जापान को शूट आउट में 3-2 से परास्त कर तीसरा स्थान पा लिया। निर्धारित समय तक दोनों टीमें 2-2 की बराबरी पर थीं। इस प्रकार मलेशिया ने एशियाई खेलों के फानइल में जापान के हाथों मिली हार का बदला भी ले लिया।

सेमीफाइनल में भारत को जापान पर 3-2 से जीत दर्ज करने में काफी संघर्ष करना पड़ा। दूसरी ओर पाकिस्तान ने मलेशिया को शूट आउट में  3-1 से परास्त किया।

टूर्नामेंट मेें भारत की शुरूआत शानदार रही। पहले ही लीग मैच में भारत ने मेजबान ओमान को 11-0 से परास्त कर दिया। इस मैच में भारत पहले क्वार्टर में कोई गोल नहीं कर पाया था। पर दूसरे क्वार्टर में भारत चार गोल कर गया। इस प्रकार हाफ टाइम तक वह 4-0 में आगे था। भारत ने तीसरे क्वार्टर में दो गोल कर 6-0 की ज़ोरदार बढ़त बना ली। भारत के पांच गोल अंतिम क्वार्टर में आए।

अपने दूसरे मैच में भारत की टक्कर पाकिस्तान के साथ थी। इस मुकाबले में भारत 3-1 से विजयी रहा। भारत के लिए मनप्रीत सिंह, मनदीप सिंह और दिलप्रीत सिंह ने गोल किए। पाकिस्तान ने अपना गोल पहले ही मिनट में दाग दिया था। पहले क्वार्टर में पाकिस्तान इसी गोल के बल पर 1-0 की बढ़त लिए था। पाकिस्तान को अपने पहले ही हमले में पेनाल्टी क्वार्टर मिल गया। भारत के गोल रक्षक पीआर श्रीजेश ने ‘ड्रैग फ्लिक’ को तो बचा लिया पर लौटती गेंद को मोहम्मद इरफान जूनियर ने गोता लगाते हुए एक हाथ में ही गोल की ओर मोड़ दिया। 18वें मिनट में पाकिस्तान ने एक सुनेहरी मौका खो दिया। जब मोहम्मद ज़ुबायर गोल पर निशाना लेने में चूक गया।

भारत के आकाशदीप सिंह ने 24वें मिनट में बराबरी हासिल करने का अवसर गंवा दिया। पर इसी मिनट में भारत का शानदार गोल देखने को मिला। कप्तान मनप्रीत ने पाकिस्तान के तीन रक्षकों को काट कर ‘स्लैप पुश’ से गेंद गोल में पहुंचा दी पाक गोलकीपर के पास उसे रोकने का कोई मौका नहीं था (1-1)

इसके साथ ही नीलकांत शर्मा के पास भारत को हाफ टाइम से पहले 2-1 की बढ़त दिलाने का मौका आया पर उसका शाट गोल पोस्ट से बाहर चला गया।

हाफ टाइम के दो मिनट बाद मनप्रीत सिंह ने एक गोल कर दिखाया जिसकी कल्पना किसी को नहीं थी।  ‘ऑफ द बॉल रन’ का पूरा लाभ मनदीप ने उठाया। दौड़ लगा कर उसने ‘डी’ में स्थान बनाया और फिर आकाशदीप से मिली गेंद को पूरी महारत के साथ गोल में डाला। हालांकि गोल पोस्ट की तरफ उसकी पीठ थी, फिर भी उसने अपनी दोनों टांगों के बीच से गेंद गोल में पहुंचा दी। युवा खिलाड़ी दिलप्रीत ने ट्रर्नामेंट में अपना चौथा गोल किया। जबावी हमला इस बार भी आकाशदीप ने बनाया, और अपने दाएं ओर चल रहे ललित उपाध्याय को गेंद थमा दी, जिसने मध्य में चल रहे दिलप्रीत को

सटीक पास दिया और दिलप्रीत ने गोल करने में कोई $गलती नहीं की और भारत 3-1 से यह मैच जीत गया। अपने तीसरे मुकाबले में भारत ने एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता जापान को हाकी खेलना सिखा दिया। भारत ने यह मैच एक तरफा बना कर 9-0 से जीत लिया। जापान की टीम एक भी गोल नहीं कर पाई। भारत के लिए ललित उपाध्याय, हरमनप्रीत ङ्क्षसह और मनदीप सिंह ने दो-दो गोल किए।

इस मुकाबले में ‘मैन ऑफ दा मैच’ आकाशदीप ने हमलों की शुरूआत की। हमलों से जापानी शिविर में खलबली मचाने वाले आकाशदीप सिंह ने 35वें मिनट में खुद भी एक गोल दागा। उनके अलावा गुरजंट सिंह (8वें मिनट) और कोठाजीत सिंह (42वें मिनट) ने भी गोल बनाए। इस साल की एशियाई खेलों मेें भी मूल स्तर पर भारत ने जापान को 8-0 से हराया था। पर बाद में जापान ने स्वर्ण पदक जीता और भारत कांस्य पदक ही ले पाया।

‘घर का दीपक’

आज श्रवणलाल की नींद जल्दी खुल गई। सुबह के छह बज गये थे। शीला गहरी नींद में सो रही थी। अभी पत्नी को जगाना उसने उचित नहंी समझा। बिस्तर पर से उठकर सबसे पहले वह मंदिर में गया। नतमस्तक होकर उसने भगवान को प्रणाम किया। फिर दैनिक कार्यों से निपट कर उसने रसाई घर का दरवाजा खोला। गैस का चूल्हा जलाकर चाय बनाई और दोनों हाथों में चाय के कप उठाकर वह बेडरूम में आया। ऊंचे स्वर में उसने पत्नी को पुकारा।

‘उठो शीला, सुबह के सात बज गए हैं। आज दीपावली है और तुम अभी तक सो रही हो!’

पत्नी ने आंखें खोली। एक लम्बी जम्हाई ली और पलंग पर उठ बैठी। श्रवणलाल के हाथ में से चाय का कप पकड़कर उसने गहरी नि:श्वास छोड़ी।

‘हां, परंतु हमारी क्या दीपावली। हमारे घर का दीपक तो रूठ गया है हमसे। मन में दीपावली मनाने की इच्छा ही नहीं होती है।’

‘तुम ठीक कहती हो शीला, मन में कोई उत्साह, उमंग नहीं है लेकिन साल का बड़ा त्यौहार है कुछ तो करना ही पड़ेगा।’

पति की बात का कोई उत्तर नहीं दिया पत्नी ने। आंखे मूंदकर वह चुपचाप चाय सुड़कने लगी। श्रवणलाल ने चाय का कप टेबल पर रखा और आज का अखबार खोलकर कुर्सी पर बैठ गया। चाय के साथ वह अखबार पढऩे लगा। शीला ने चाय खत्म की और दोनों कप उठाकर किचन में चली गई। श्रवणलाल का मन आज पढऩे मेें नहीं लगा। नज़रें शब्दों पर से हट गई। वह निर्वात में ताकने लगा। क्षणमात्र में ही उसका मन उड़कर जीवन के तीन दशक पार कर गया।

श्रवणलाल ने जब इस शहर में कदम रखा था। तब उसकी उम्र केवल सत्रह साल की थी। गांव के स्कूल से उसने दसवीं कक्षा पास की थी और रोज़गार की तलाश में इस शहर में चला आया था। सड़कों पर दौड़ती रंग बिरंगी मोटरें, ऊंची ऊंची आलीशान इमारतें, धुआं उगलती बड़ी बड़ी फैक्ट्रियां। रात में बिजली के बल्बों की रोशनियों में चमकते हुए इस शहर की वैभवता को देखकर उसकी आंखें फटी रह गई थी। उनमें रंगीन सपने तैरने लगे थे।

थोड़े से ही प्रयास में श्रवणलाल को नायलोन फैक्ट्री में हेल्पर की नौकरी मिल गई। फैक्ट्री के पीछे ही गांधीनगर कच्ची बस्ती में उसने एक किराये का कमरा ले लिया था। जिसकी छत टिन की चद्दरों की थी और फर्श लाल पत्थरों का बना हुआ था। दिनभर वह फैक्ट्री में मेहनत से काम करता था और रात को  इस कमरे में आकर सो जाता। उसका जीवन मशीन की तरह चलने लगा था।

वह कमाने लगा तो एक वर्ष बाद ही माता पिता ने शीला के साथ उसका विवाह कर दिया था। काली आंखों वाली दुबली पतली लम्बी शीला को पत्नी के रूप में पाकर वह प्रसन्न हो गया था। शीला ने यहां आकर कुछ ही दिनों में उसके घर को संवार दिया था। वह सुबह शाम उसके लिए खाना बनाती थी और दिनभर घर के कामों में लगी रहती थी। घर में एक एक वस्तु को वह व्यवस्थित सजाकर रखती थी। मिट्टी और पत्थरों की इस झोपड़ी को भी शीला ने स्वर्ग सा सुंदर बना दिया था। शाम को वह फैक्ट्री से घर लौटता तो दरवाजे पर हंसकर वह उसका स्वागत करती। शीला की काली आंखों में देखकर ही उसकी दिनभर की थकावट दूर हो जाती थी।

शीला घर में आ गई तो उसकी किस्मत भी खुल गई थी। फैक्ट्री में उसकी नौकरी पक्की हो गई थी और हेल्पर से प्रमोशन पाकर वह मैकेनिक बन गया था। कुछ समय बाद शीला गर्भवती हो गई थी। अब वह पत्नी का विशेष खयाल रखने लगा था। वह उसे समय समय पर नर्सिंग होम ले जाता था और डॉक्टर से चेकअप करवाता था। वह उसे दवाइयां लाकर देता था, उसके खाने पीने पर भी पूरा ध्यान देने लगा

था।

उस दिन दीपावली थी। शाम का समय था। पूरा शहर रंगबिरंगी रोशनियों से जगमगा उठा था। यत्र तत्र शहर में पटाखों के धमाके गंूजने लगे थे। वह नार्सिंग होम के बाहर बैंच पर बैठा था बेचैन और व्याकुल। ऑपरेशन थियेटर के अन्दर शीला प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। कुछ समय बाद ही नर्स ने बाहर आकर उसे खुशखबरी सुनाई थी – ‘आपके घर में दीपक आया है।’ यह सुनकर वह प्रसन्नता से उछल पड़ा था।

सात दिन बाद घर में सूरज पूजन का कार्यक्रम हुआ था। बेटे के जन्म की खुशी में उसने मिठाइयां बंटवाई थी। घर के द्वार पर ढोल बाजे बजवाए थे और उन्होंने अपने बेटे का नाम रखा था दीपक।

हंसी खुशी के माहौल में समय तेजी से गुजर गया। दीपक बड़ा हो गया। 12वीं कक्षा पास करते करते कद मेें वह श्रवणलाल से भी लम्बा निकल गया। पढ़ाई में भी बेटे ने उसकी नाक ऊंची कर दी। गांधी नगर के सरकारी स्कूल में वह प्रथम स्थान पर रहा था। वह 84 प्रतिशत अंकों से पास हुआ था। यह खबर सुनकर श्रवणलाल का सीना गर्व से फूल गया था।

श्रवणलाल को अपना सपना साकार होते हुए नज़र आने लगा था। आगे पढ़ लिखकर वह डॉक्टर बनना चाहता था। एक ऐसा डाक्टर जो $गरीबों की सेवा करे। रोगियों और दुखियों का इलाज करके उनका दुख दूर करे। परंतु माता पिता की गरीबी के कारण यह संभव नहीं हो सका था। उसे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी थी। समुचित इलाज के अभाव में ही उसके माता पिता का असमय देहांत हो गया था। उसी समय श्रवणलाल ने मन ही मन अपने बेटे को डॉक्टर बनाने का निश्चय कर लिया था।

बाहरवीं कक्षा पास करने के बाद उसने बेटे दीपक का दाखिला स्टार कोचिंग सेंटर में करवा दिया था। वहां वह पीएमटी की कोचिंग लेने लगा था। दीपक को मन मांगी मुराद मिल गई थी। वह मन लगाकर पीएमटी की तैयारी में जुट गया था। देखते ही देखते एक साल गुज़र गया। वह दीपक को पीएमटी की परीक्षा दिलवाने जयपुर ले गया। एक महीने बाद ही इस परीक्षा का परिणाम घोषित हो गया था। दीपक का नाम मैरिट में नहंी आया था। यह देखकर उसके पूरे घर में निराशा छा गई थी। परंतु वह निराश नहीं हुआ था। निराशा में डूबे हुए बेटे को वह हिम्मत बंधाने लगा था। धीरे-धीरे उसने दीपक को एक साल और कोचिंग में पढऩे के लिए तैयार कर लिया।

उस वर्ष उसके जीवन में दो बड़ी खुशियों ने कदम रखे थे। एक तो लाटरी में उसके नाम हाऊसिंग बोर्ड का यह मकान आ गया था और दूसरा दीपक का चयन पीएमटी में हो गया। उसे इतनी अच्छी रैंक मिली थी कि उसका एडमिशन मुंबई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज में हो गया। श्रवणलाल स्वयं मुंबई गया था और बेटे का एडमिशन मेडिकल कॉलेज मेें करवा कर लौटा था।

अपने स्वयं के घर में आकर श्रवणलाल व शीला खुश हो गये थे। हर महीने वह आसान किश्तों में इस मकान की कीमत चुकाने लगा था। बेटा दीपक मुंबई में डॉक्टरी पढऩे लगा था। जब भी मौका मिलता माता पिता से मिलने वह घर आ जाता था। एक दो दिन उनके साथ रहकर वह वापिस लौट जाता था। हर वर्ष दीपावली की छुट्टियों में दीपक घर अवश्य आता था। दीपावली के साथ श्रवणलाल व शीला बेटे का जन्मदिन भी धूमधाम से मनाते थे। इस घर का कोना कोना खुशियों से भर उठता था।

इसी तरह छह साल का समय आसानी से गुजर गया था। दीपक की डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी हो गई थी। बेटे की एमबीबीएस की डिग्री देखकर श्रवणलाल की आंखों में खुशी का पानी छलछला आया था। हर्षित होकर उसने दीपक को गले लगा लिया था।

श्रवणलाल व शीला की उम्र अब ढल गई थी। उनके शरीर दुर्बल व कमज़ोर हो गये थे। वे दोनों चाहते थे कि बेटे की शादी हो जाये और अब वह उनके पास ही आकर रहे। लेकिन एक दिन बेटे ने जब मुंबई छोड़कर यहां आने से और शादी से इंकार कर दिया तो उन दोनों को पैरों तले की ज़मीन खिसक गई थी। पिछली बार जब दीपक घर आया था तो श्रवणलाल ने बेटे को समझाने का प्रयास किया था।

‘बेटा तू अब बड़ा और समझदार हो गया है, डॉक्टर बन गया है। तुझे अपने कंधों पर अब कुछ जिम्मेदारियों उठाने की ज़रूरत है। अब तुझे शादी करके अपनी गृहस्थी बसाने की आवश्यकता है। हमारे गांव के लोग बहुत बीमार व दुखी हैं, तुझे उनकी सेवा करने की आवश्यकता है। मैं और तेरी मां बूढ़े हो गये हैं। हमें भी अब तेरे सहारे की ज़रूरत है बेटा।’

उसके इन शब्दों में दीपक पर विपरीत असर किया था। उसकी बात को सुनकर वह भड़क उठा था।

‘ये आदर्श की बातें आप अपने पास रखिए पापा। आपके समाज से मुझे कोई लेना देना नहीं है। मेरा समाज तो मुंबई में है। आप मुझे इमोश्नल ब्लेकमेल करने की कोशिश मत कीजिए पापा। मैं आज ही मुंबई चला जाऊंगा।’

और उसी दिन उनका दीपक घर छोड़कर मुंबई चला गया था। वह उससे इतना अधिक नाराज़ हो गया था कि उसने उसके मोबाइल के नम्बर को भी बलाक कर दिया था। अब वह मोबाइल पर भी उससे बात नहीं कर सकता था। महीनों गुजर गये थे। कभी कभी वह मां से अवश्य बात कर लेता था। इस बार उसने दीपावली पर घर आने से भी इंकार कर दिया था।

‘कहां खोये हुए हैं आप, लीजिए चाय पीजिए।’

अचानक शीला की पुकार सुनकर उसके विचारों का प्रवाह टूट गया। अपने अतीत में डूबा हुआ श्रवणलाल वर्तमान में लौट आया। पत्नी के हाथ में से चाय का कप पकड़ कर वह बोला-

‘दीपक को मुझे कुछ नहीं बोलना चाहिए था शीला। अगर मैं उसे दो बात नहीं सुनाता तो आज दीपावली के दिन हमारा घर सूना नहीं रहता, दीपावली मनाने वह घर पर अवश्य आता।’

‘आपने तो सच बात बोली है उसे। अगर बेटा बेटी को माता पिता की बात ही कड़वी लगे तो हम क्या कर सकते हैं। आप परेशान मत होइये, यूं समझ लीजिए की हमारी किस्मत में औलाद का सुख लिखा ही नहीं है।’

अब दोनों पति पत्नी के बीच में वार्तालाप बंद हो गया। उनके बीच में गहरी खामोशी छा गई। भारी मन से दोनों चुपचाप चाय पीने लगे। कुछ क्षणों के बाद ही सहसा घर के द्वार पर घंटी बज उठी – ‘टिंग…टोंग…।’

चाय के खाली कपों को टेबल पर रखकर दोनों उठ खड़े हुए। धीरे-धीरे वे दरवाजे की ओर बढ़े। जैसे ही उसने दरवाजा खोला सामने अपने दीपक को खड़ा  हुआ देखकर दोनों चौंक पड़े। दूसरे ही क्षण बेटा आगे बढ़ा और माता पिता के चरणों में आ झुका।

‘आप मुझे क्षमा कर दें मम्मी पापा, आप मुझे क्षमा कर दें। मैं रास्ता भटक गया था। मुंबई को मैं हमेशा के लिए छोड़ आया हूं। अब जैसा आप चाहेंगे, मैं वैसा ही करूंगा।’

बेटे के शब्दों को सुनकर श्रवणलाल व शीला हार्षित हो उठे। कदमों से उठाकर उन्होंने दीपक को गले लगा लिया। उनकी आंखों में खुशी का पानी छलछला गया।