Home Blog Page 1277

‘सबरीमाला पर मेरी बात पूरी तो सुनें’

लग रहा है कि केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अब मैदान में उतर गई हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उनके कुछ कहने का मतलब नहीं है क्योंकि मैं फिलहाल केंद्रीय मंत्रिमंडल में हूं। लेकिन एक आम बात ज़रूर कह सकती हूं कि क्या आप मासिक धर्म के दौरान रक्त से सनी सैनिटरी नैपकिन पहने मित्र के घर जाना चाहेंगे। आप नहीं जाएंगे। फिर क्या लगता है कि ईश्वर के घर पर उस तरह जाना उपयुक्त होगा।

पूजा-पाठ करना मेरा अधिकार है। मुझे उसे अपवित्र करने का अधिकार नहीं है। मेरा यह निजी विचार है।

ईरानी ने ब्रिटिश हाईकमीशन और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की ओर से आयोजित यू यंग थिंकर्से कांफ्रेस में यह टिप्पणी (11 अक्तूबर)की। ‘मी टू’ कार्यक्रम के तहत महिलाओं के यौन उत्पीड़त के खिलाफ चल रहे आंदोलन को उन्होंने अपना समर्थन दिया था। उन्होंने कहा, आज जो महिलाएं बोल रही हैं वे माताएं, बेटियां और पत्नियां हैं। वे बड़ा रिस्क ले रही हैं। ऐसा बोलना उनके लिए बहुत बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है।

सबरीमाला पर ईरानी ने जो टिप्पणी की वह उस संदर्भ में थी जिसमें ओआरएफ के अध्यक्ष समीर शरण ने एक सवाल पूछा था। इस पूरे कार्यक्रम के दौरान जिन मुद्दों पर बातचीत हुई उनमें शरणर्थियों के अधिकार, मौसम परिवर्तन आदि थे। पश्चिमी भारत में ब्रिटेन के उप उच्चायुक्त क्रिरीपन साइमन ने एक विषय सूची बनाने की बात कही थी जिस पर मंत्री की मौजूदगी में बात हो।

सबरीमाला मुद्दे पर बोलते हुए ईरानी ने अपने बहु जातीय परिवार का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि मैं खुद के बारे में अपने निजी जीवन के बारे में बताना चाहूंगी। मैं हिंदू हूं जिसकी शादी एक पारसी से हुई। मेेरे दोनों बच्चे पारसी हैं। वे इस धर्म का पालन करते हैं। पारसी धर्म का पालन करने का क्या मतलब है? दोनों बच्चे अग्नि मंदिर जाते हैं और प्रार्थना करते हैं। मंदिर चाहे मुंबई में हो, दिल्ली में हो या दुनिया के किसी भी हिस्से में हो। मां होने के कारण मेरे लिए इसका क्या मतलब है। जबकि एक राजनीतिक हूं केंद्रीय मंत्रिमंडल में हूं।  मेरे पारसी बच्चे और पारसी पति है। मैं बाहर ही खड़ी रहती हूं। सड़क किनारे या फिर अपनी कार में। मुंबई में अंधेरी में अग्नि मंदिर गई। जब मेरा बच्चा हुआ तो मैं उसे लेकर मंदिर गई। मंदिर के दरवाजे पर मैंने उसे अपने पति को दे दिया। क्योंकि मुझे कहा गया, कि यहां मत खड़ा रहो। ठीक? मैं मानती हूं कि पूजा का मेरा अधिकार है लेकिन मेरा अधिकार अपवित्रता का नहीं है। यही वह अंतर है जिसे हमें समझना चाहिए और सम्मान देना चाहिए।

ईरानी के बयान पर बहस शुरू हुई सोशल मीडिया पर। उन्होंने ट्वीट कर कहा, दो  तथ्यात्मक बयान हैं हिंदू धर्म में आस्था रखने वाली हिंदू की शादी पारसी धर्म मानने वाले से होती है। मुझे पूजा के लिए अग्नि मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। मैं पारसी समुदाय -पुजारियों के फैसले को आदर सम्मान देती हूं।

मैंने दो पारसी बच्चों की मां होने के नाते किसी अदालत में अपने अधिकार को पाने के लिए कोई याचिका कभी नहीं दी।

विरोध को नकारते हुए उन्होंने ट्वीट किया कि मेरी बात का जो गलत अर्थ निकाला जा रहा है वह अनुचित है। मैं आज तक कभी किसी ऐसे लोगों से महिला से नहीं मिली जो रक्तस्राव से डूबे हुए नैपकिन के साथ किसी दोस्त के घर जाना चाहे। क्या वह किसी को वह ‘नैपकिन’ देना चाहेगी। मुझे इस बात पर आश्चर्य है कि मैं एक महिला हूं फिर भी मुझे अपनी बात कहने की पूरी आजा़दी नहीं है। जब तक मैं अपना उदारवादी नजरिया रखती हूं मुझे माना जाता है। यह कैसी ‘उदारता’ है?

 

आश्चर्य होता है कि टेक्सटाइल्स मंत्री स्मृति ईरानी यह कहें कि कोई महिला रक्तस्राव से भरी सैनिटरी नैपकिन लेकर किसी दोस्त के घर नहीं जाती। शायद वह नहीं जानती कि एक सच्चा दोस्त वही है जो तमाम परेशानियों में भी साथ दे। यदि कोई दोस्त घायल हो जाएं तो क्या उसकी मदद के लिए दोस्त जाएगा नहीं। दरअसल ऐसा जान पड़ता है कि वह महिलाओं की ही बेइज्जती करने वाली महिला हैं। उन्हें रक्तस्राव से भरे नैपकिन अब खराब लग रहे हैं। इससे तो यही लगता है कि वह आधुनिक समाज में उस पुराने युग की बात कर रही हैं जब लड़कियों और महिलाओं को उनके मासिक धर्म के दिनों में अछूत मान कर व्यवहार होता था। मुझे उनकी सोच पर अफसोस है। डा. सतीश मिश्र

मैं आपसे पूरी तौर पर सहमत हूं। वह महिला होकर महिलाओं का अपमान कर रही हैं। वह कहती हैं कि महिलाएं पूजा जाप करें। लेकिन वे रक्तस्राव वाले नैपकिन पहने हुए देव दर्शन न करें। उस स्थल को अपवित्र न करें। वे यह भी कह रही हैं कि जिन महिलाओं को रक्तस्राव हो रहा हो उन्हेें अपने मित्रों के यहां भी नहीं जाना चाहिए। इतनी दकियानूसी और पिछड़ी सोच। एसके अग्रवाल

सबरीमाला मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का बयान अत्यंत मूर्खतापूर्ण है। यह बयान स्त्री विरोधी नीति का ही हिस्सा है। जिसे वे गर्व के साथ दे रही हैं। रजस्वला होने का अर्थ जानते हैं। रजस्वला होना जीवन का संगीत से भरा होना होता है। रजस्वला होकर ही एक स्त्री किसी को जन्म देने मेें समक्ष होती है। पहली बार रजस्वला होने पर कई भारतीय समुदायों में उत्सव मनाया जाता है। इस उल्लास की जड़ में जीवन की सुगबुगाहट है। जीवन का स्पंदन है। रजस्वला होना अपवित्र होना कैसे माना जा सकता है। रजस्वला स्त्री ईश्वर की पड़ोसी है जो सृजन की क्षमता संजोए इसी पृथ्वी को सुंदरतम करने में संलग्न है। सुशीला पुरी

सीबीआई बनाम सीबीआई रही सही विश्वसनीयता भी जाती रही

सीबीआई बनाम सीबीआई से जो बात बहुत साफ हुई है वह है इसकी विश्वसनीयता जो अब खत्म हो गई है, क्योंकि पहले यह पिंजरे में बंद थी अब यह भ्रष्ट तोते में तब्दील हो गई है।

यह अभूतपूर्व तनाव सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और सीबीआई विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच खड़ा हुआ है। अतत: देर रात हुई क्रांति में सीबीआई के दोनों बड़े अधिकारियों के अधिकार खत्म कर दिए गए। और एजेंसी के अंतरिम निदेशक एम नागेश्वर राव को नियुक्त कर दिया गया। सीबीआई की विश्वसनीयता भंग होने की यह एक अहम वजह है। हालांकि सीबीआई में चल रही समस्या का समाधान अभी नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई के लिए 12 नवंबर की तारीख नियत की है।

सीबीआई के निदेशक और विशेष निदेशक के बीच आरोपों और प्रत्यारोपों का जो सिलसिला है वह सरकार के भी खिलाफ जाता है। जिसे खुद सीबीआई निदेशक ले जाते हैं। इस पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सोने में सुहागा साबित भी हुए। उन्होंने इस मुद्दे पर देश भर में प्रदर्शन किया। राहुल को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया जब वे राजधानी में प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी मांग थी कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को फिर से बहाल किया जाए जिनसे तमाम प्रशासनिक अधिकार ले लिए गए हंै। और जिन्हें पिछले सप्ताह छुट्टी पर भेज दिया गया। राहुल गांधी को लोधी कालोनी पुलिस स्टेशन में बिठाए रखा गया। बाद में उन्हें रिहा किया गया।

राहुल गांधी ने अपने आरोप दोहराए: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में हर एक संस्था को नष्ट किया है। चाहे वह सीबीआई हो या चुनाव आयोग। कांग्रेस ने सीबीआई के मुख्यालय पर भारी प्रदर्शन किया जहां पहुंचे कांगे्रस के बड़े नेताओं ने प्रधानमंत्री से माफी मांगने की मांग की। कांग्रेस का यह आंदोलन दिल्ली में ही सीमित नहीं रहा बल्कि पूरे देश में सीबीआई के जहां-जहां दफ्तर हैं वहां भी जोरदार प्रदर्शन हुए।

विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर कांग्रेस का साथ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सेंट्रल विजिलेंस कमीशन (सीवीसी) निदेशक आलोक वर्मा और उनके साथी विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ चल रही अपनी जांच पड़ताल दो सप्ताह में पूरी कर ले। तीन जजों की इस बेंच की अगुवाई में भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपनी बैठक में वर्मा की याचिका सुनी जो भारत सरकार के आदेश को चुनौती देती है और इसने पूर्व न्यायाधीश एके पटनायक को सीवीसी की जांच की निगरानी करने को कहा।

 सीजर की पत्नी की तरह

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक के खिलाफ जांच के लिए सीवीसी को सिर्फ दो सप्ताह का समय देने का स्वागत करते हुए केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली नेे कहा कि किसी खास व्यक्ति में सरकार की कोई रुचि नहीं है। यह तो सिर्फ यही चाहती है कि जांच एजेंसी की विश्वसनीयता बनी रही। सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी से कहा है कि वह दो सप्ताह में सीबीआई प्रमुख के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच खत्म कर ले। यह बेहद सकारात्मक फैसला है जेटली ने कहा। उन्होंने कहा कि वर्मा और अस्थाना दोनों ने एक दूसरे पर आरोप लगाए थे। ऐसे में निष्पक्षता के लिहाज से इन आरोपों की जांच दोनों को ही छुट्टी पर भेज कर ही संभव थी। यह इसलिए भी ज़रूरी था क्योंकि यह उचित नहीं कि आप उस संस्थान मे ं रहें भी और संस्थान ही आपके व्यवहार की जांच करे। उनका कहना है कि सीवीसी की सिफारिशों पर ही कार्रवाई हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने तो आज अपनी निष्पक्षता को और भी मजबूती से रखा है। उन्होंने एक समय सीमा बांध दी है। यह एक सकारात्मक प्रयास है। ऊंचे दर्जों की जांच में निष्पक्षता को होना बहुत ज़रूरी है। इसलिए उन्होंने सेवानिवृत न्यायाधीश से यह जांच कराने को कहा हैै।

वित्तमंत्री ने कहा कि सिर्फ एक पड़ताल से ही सच सामने आ सकता है। सच का सामने आना भारत के व्यापक हितों के लिहाज से भी ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि सीबीआई के दो को छोड़कर बाकी सभी अधिकारी इतने ईमानदार हैं जिन पर संदेह नहीं किया जा सकता।

सीबीआई के खिलाफ मामले

सीबीआई में आज इतने महत्वपूर्ण मामले हैं। आईआरसीटीसी घोटाले से मोइन कुरैशी के मामले में घूस लेने, कोयला घोटाले में खुफिया रपट, जांच एजेंसी सीबीआई में नंबर दो बने विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने नंबर एक अधिकारी आलोक वर्मा पर आरोप लगाए है। उनकी जांच अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सेंट्रल विजिलेंस कमीशन (सीवीसी) कर रही है।

वर्मा के खिलाफ भी आरोप है कि वे आईआरसीटीसी घोटाले से जुड़े हैं जिसमें आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद उनकी पत्नी राबड़ी देवी और बेटे तेजस्वी यादव शामिल हैं। अस्थाना का आरोप है कि वर्मा ने उनसे आखिरी क्षणों में कहा कि जिन छापों को पटना में लालू के खिलाफ मारना है वे न मारे जाएं। अस्थाना ने बताया सीबीआई ने छापे फिर भी मारे और एक आरोप पत्र भी दायर किया ।

उनका दावा है कि रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी राकेश सक्सेना के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी। जबकि यह मामला आईआरसीटीसी का था। इसके अलावा उन पर बुरे बर्ताव, जांच पड़ताल में दखल देने और भ्रष्टाचार के भी नौ आरोप हंै। सीवीसी को इन सबका परीक्षण दो सप्ताह में कर लेना है।

वर्मा बनाम अस्थाना

सीबीआई निदेशक पद से छुट्टी पर भेजे जाने के पहले वर्मा ने अस्थाना के खिलाफ एक मामला दर्ज किया था कि कथित तौर पर उन्होंने सतीश बाबू को राहत देने के लिए पैसे लिए थे । जिनकी जांच सीबीआई मोइन कुरैशी के मामले में कर रही है। अस्थाना ने बदले की कार्रवाई के रूप में  कैबिनेट सचिव को 24 अगस्त को लिखे अपने पत्र के जरिए वर्मा के खिलाफ आरोप लगाए थे।

अस्थाना की शिकायत 31 अगस्त की सीवीसी को भेज दी गई थी जिसने अस्थाना को जांच के लिए 10 सितंबर को बुलाया भी था। अस्थाना ने सीबीआई निदेशक के खिलाफ अपने आरोप साबित करने के लिए संबंधित दस्तावेज सीवीसी को सौंपे भी थे। सीवीसी ने 11सितंबर को एक नोटिस भेजा जिसमें संबंधित फाइलें और दस्तावेजों की मांग की गई थी।

मुख्य आरोप जो अस्थाना का था वह यह है कि सतीश बाबू ने मोइन कुरैशी मामले से साफ बरी होने के लिए दो करोड़ रुपए वर्मा को दिए थे। उन्होंने दावा किया कि वर्मा ने चार दिन तक फाइल अपने पास रखी और उसे डायरेक्टर ऑफ प्रोसेक्युशन (डीओपी) को 24 सितंबर को दी और तमाम साक्ष्य की मांग की जो रिकार्ड में थे।

 अस्थाना ने यह भी बताया कि उनके अधीन जो टीम थी उसी ने सतीश बाबू के खिलाफ ‘लुक आउट सर्कुलरÓ जारी किया और विेदेश भाग जाने की उसकी कार्रवाई रोकने की पहल की थी। सीबीआई के विशेष निदेशक ने दावा किया कि फाइल वर्मा के पास तीन अक्तूबर को पेश की गई। इसमें डीओपी के उठाए गए सवालों के जवाब भी थे। वह फाइल लौट कर नहीं आई है।

सीवीसी को अपना जवाब देते हुए वर्मा ने अस्थाना के ही खिलाफ आरोप लगाए। उन्होंने अस्थाना पर ईमानदारी का भी मुद्दा उठाया। सीबीआई कहा कि वह आधा दर्जन मामलों में अस्थाना की भूमिका की पड़ताल कर रही है।

सीवीसी ने 23 अक्तूबर को अपने आदेश में कहा कि सीबीआई ने अनुरोध किया कि अस्थाना की शिकायत को इस तरह देखा जाए कि कथित तौर पर दोषी अधिकारी सीबीआई में ही दूसरे विभिन्न पदों पर काम कर रहे अधिकारियों को इस तरह डर दिखा रहे हैं। दस्तावेजों को उपलब्ध कराने के मुद्दे पर सीबीआई ने सीवीसी में अपने निदेशक की ओर से तर्क दिया कि रिकार्ड तो हजारों पन्नों में हैं लेकिन फाइलों की ज़रूरत विभिन्न शाखाओं, मालखानों और अदालतों में पड़ती है। इसलिए इनसे संबंधित तमाम सामग्री कमीशन में पेश करने में कम से कम तीन सप्ताह लग जाएंगे।

दूसरा कथित आरोप जो वर्मा पर था कि उन्होंने खुफिया जानकारियों के मिलने पर भी कोई कार्रवाई नहीं की। अस्थाना का कहना रहा है कि चेतावनी पाने पर भी संदीप और अशोक चतुर्वेदी जिन पर कोयला घोटाले के आरोप हैं, कोई लुकआउट नोटिस जारी नहीं किया।

जांच से संबंधित एक और आरोप है कि सीबीआई एक प्राथमिक जांच पहले करेगी। हरियाणा के नांगली, उभरपुर, टिगरा, उल्हवास आदि गांवों से भूमि अधिग्रहण किया गया। इसके तहत गुडगांव में आवासीय सेक्टर बनने थे। अस्थाना की शिकायत के अनुसार उन्हें जानकारी मिली थी कि तकरीबन छतीस करोड़ का लेनदेन हुआ जिससे जांच रोक दी जाए। लेकिन कोई भी अपराधिक जांचपड़ताल हुई ही नहीं। यह भी पता लगा कि तब के टाउन प्लैनिंग निदेशक और रियल एस्टेट कंपनी के मालिक का संयुक्त निदेेशक एके शर्मा और आलोक वर्मा से अच्छा संपर्क था। अस्थाना ने अपनी शिकायत में यह लिखा।

दुग्ध क्रांति का कड़वा सच

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडडर््स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) की ओर से पहली बार आए सर्वे से यह बात साफ हुई है कि दूध के 70 फीसद नमूनों से यह बात साबित हुई है पूरे देश में दूध की गुणवता के जो निर्धारित मानक है उन पर हम कहीं नहीं है। फेडरेेशन ऑफ इंडियन एनिमल प्रोटेक्शन आरगेनाइजेशन (एफआईएमीओ) के आंकड़े बताते हैं कि जो लोग दूध नियमित पीते है उसमें हृदय रोग, डायबिटीज, कैंसर और कई और रोग हो रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि देश के दस ऐसे प्रदेश जहां दूध सबसे ज्य़ादा होता हैं और जिनके 451 दूध उत्पादन कें द्र हैं। इन पर केंद्र और राज्य सरकारों को दूध उत्पादन करने वाली डेरियों पर तत्काल ध्यान देने की ज़रूरत है। एफआईएपीओ की जांच रपट से पता चलता है कि इन डेरियों में किस तरह का गाय का रख-रखाव है। ये गांए अपनी प्राकृतिक ज़रूरतें भी नहीं पूरी कर पातीं। मसलन गाय अपनी बछियों से प्यार और दुलार नहीं पाती। इन्हेें तो दूध देने वाली मशीनों की तुलना में कहीं बदतर तरीके से रखा जाता है। उनके शरीर के साथ गलत बर्ताव होता है। उन्हें दूध देने के लिए बछड़े बछिया जन ने के इंजेक्शन लगाए जाते हैं। फिर ढेरों एंटीबायोटिक्स और हारमोसे दिए जाते हैं। इस से ज्य़ादा से ज्य़ादा दूध दे सके। जब गायों को इस बुरी हालत में रखा जाएगा तो बछिया तो कमजोर पैदा होती रहेगी। ऐसी गायों को दिल के रोग, डायबिटीज, कैंसर और कई दूसरी बीमारियां जकड़ लेती है जो नियमित दूध पीने वालों को भी मिलती हैं।

दूध की सुरक्षा

डेरी उद्योग में पशुओं की अनिमयित देखरेख से दूध की सुरक्षा पर ज़रूर ऐसे सवाल उठते हैं जो इन डेरी में जुड़ते हैं। पशुओं को उनके बछड़ों से अलग रखा जाता है। जो बछड़े होते हैं उनको 25 फीसदी की तो पहले सप्ताह में ही मौत हो जाती है। इन्हें पशु चिकित्सक को दिखाया भी नहीं जाता और अवैध तौर पर मिली दवाओं के जरिए 50 फीसदी डेरी में दूध निकाला जाता है। जो जानवर दूध नहीं दे पाते उन्हें आर्थिक तौर पर कमजोर किसानों के सिपुर्द कर दिया जाता हैं। वे चाहें तो उन्हें निजी प्रयोग में लें या कसाई घरों में बेच दें। दोनों ही स्थितियों में कोई खास कमाई नहीं होती। दूध में मिलावट की जो तस्वीर हमें मिली वह तो दिल दहला देने वाली है। खास तौर पर द्रव्य दूध में खासी मिलावट मिलती है। एक तो हमारे देश में दूध के रख रखाव के दौरान हाइजिन और सैनीटेशन का ध्यान नहीं रखा जाता इसलिए पैकेजिंग के दौरान मिल्क में डिटरजेंट का इस्तेमाल होता है। सर्वे रपट के अनुसार ऐसे दूध का उपयोग जिसमें डिटरजेंट होता है वह स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक होता है। दूध के आठ फीसद नमूनों में डिटरजेंट मिला। मिलावट की दूसरी जो अन्य वस्तुएं दूध में मिली उनमें हैं ग्लूकोज, यूरिया, स्टार्च और फारपेलिन। मिलावटी दूध के 179 नमूने मिले।

पानी एक ऐसा द्रव्य पदार्थ है जो दूध में आमतौर पर मिलाया ही जाता है। यह दूध की पोषकता कम करता है। उससे उपभोक्ता को समस्या होती है। पांच केंद्र शासित राज्यों और 28 राज्यों से मंगाए ब्यौरे में ही बताते हैं कि इनमें सबसे खराब राज्य हैं बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिसा, पश्चिम बंगाल, मिजोरम, उत्तराखंड और दमन व वयू। इनमें आहार में शुद्धता का दावा 100 फीसद तो था लेकिन वह सही नहंी। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि मांग ज्य़ादा है और सप्लाई कम। फिर जो 250 नमूने पूर्वी राज्यों मे लिए गए उनमें गोवा और पुडूचेरी में तो 100 फीसद मिलावट थी। तकरीबन 70 फीसद नमूनों में तो दूध के मानकों की खासी अनदेखी थी। करीब 46 फीसद ‘सॉलिड नॉट फै टÓ (एसएनएफ) तो निहायत कम था। और इसकी बजाए दूध में पानी की खासी मिलावट थी। कहा जाता है कि दूध में जितनी ज्य़ादा मिलावट होती है उतना ही ज्य़ादा आमदनी होती है। स्किमड मिल्क यानी मक्खन निकाले हुए दूध से परिणाम बढ़ाया जाता है दूध का इसमें ग्लूकोज डाला जाता है। इस सर्वे में यह भी जानकारी हुई कि दूध में न्यूट्रिलाइनर्स, एकिडिटी हाईड्रोजन पेरोक्साइड, चीनी, स्टार्च, नमक, डिटर्जेंट, पारमेलिन और वेजेटेबल साल्ट का इस्तेमाल आमतौर पर किया ही जाता है। अध्ययन से पता चलता है कि नमक, डिटर्जेंट और फार्मेलिम, ग्लूकोज से दूध में गाढ़ापन, और चिपचिपापन बढ़ता है। वहीं स्टार्च से दूध की जमना तक बंद हो जाता है। दूसरे जो सिंथेटिक कंपाउंड दूध में मिलाए जाते हैं उनसे दिल संबंधी बीमारियों कैंसर और मौत तक संभव है।

पंजाब का भी हाल बुरा

एक जमाना था जब भारत में दूध उत्पादनक राज्यों में 36 मिलियन लीटर दूध रोज उत्पादित होता था और प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता प्रतिदिन 1,035 मिलीलीटर होती थी। यानी 60 फीसद दूध और दूग्ध उत्पादन के नमूने अब मिलावट के मिलते हैं। फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के कमिश्नर केएस पन्नू और तंदुरु स्त पंजाब मिशन के निदेशक ने एक व्यापक मुहिम मिलावट के खिलाफ चला रही है। उन्होंने इस को सही माना कि राज्य में अब दूध और दूध उत्पादन मिलावटी माने जाते हैं। एक बड़ी तादाद में पंजाब में ऐसी इकाइयां हैं जो गुणवत्ताहीन है, गलत ब्रांड बना कर मिलावटी दूध और उत्पाद बेच रही हैं। अब तक 1,424 नमूने पकड़े गए इनमें 60 फीसद तो गुणवत्ता जांच में नाकाम रहे। उन्होंने कहा कि गैर मिलावटी आहार, खास तौर पर दूध और दूध के उत्पाद तंदुरूस्त पंजाब मिशन के मुख्य हिस्से हैं। शुद्ध आहार, हर नागरिक का अधिकार है।

पंजाब सरकार कानून की समीक्षा कर रही है। कानून के सभी पहुलुओं का आकलन करके कायदे कानून न मानने वालों पर कार्रवाई होगी। यह पूरा मामला केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। यहां 150 मिलियन टन उत्पादन होता है। दुनिया में दूध उत्पादन करने वाले देशों में भारत 1997 से ही नंबर एक है। भारत ने 2014 में पूरे यूरोपीय संघ को परास्त किया। देशों के हिसाब से भारत के बाद अमेरिका में दूध का सबसे ज्य़ादा उत्पादन होता है। चीन तीसरे स्थान पर है।

31 अक्तूबर 1984 का वह दिन!

देखने में 31 अक्तूबर 1984 का दिन आम दिनों की तरह था। लोग काम-धंधों पर निकल रहे थे। उनमें से बहुत से ऐसे थे जो काम तो गए पर कभी घर लौट कर नहीं आए। कुछ लोग और सैनिक अपनी छुट्टियां बिताने दूर दराज की रेलगाडिय़ों पर चढ़े पर कभी घर नहीं पहुंचे। इस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों ने कर दी थी। सुबह हुई इस वारदात के बाद दोपहर तक लोगों में ऊहापोह की स्थिति रही। दोपहर को जब राजीव गांधी देश लौटे तो हालात बिगडऩे लगे। देश की राजधानी दिल्ली समेत कई शहरों मेें सिखों की मारकाट शुरू हो गई। सबसे ज्य़ादा नुकसान दिल्ली और कानपुर में हुआ। गुंडों-बदमाशों की भीड़ ने सिखों के घरों को आग लगा दी परिवार के मर्दों को सड़कों पर जिंदा जलाया और महिलाओं की अस्मत लूटी। दिल्ली की पुलिस केवल तमाशबीन ही नहीं बनी रही बल्कि वह दंगाइयों की मदद करती नज़र आई। कुछ सिख परिवार जिनके पास हथियार थे और वे अपनी रक्षा कर रहे थे, पुलिस ने उनसे हथियार लेकर उन्हें भीड़ के हवाले कर दिया। सिखों के लिए अपनी जान-माल को बचाना लगभग असंभव था।

दिल्ली के तिलकनगर इलाके में काफी सिख परिवार थे। उनके पास हथियार थे। पुलिस के लाख धमकाने पर भी उन्होंने अपने हथियार नहीं दिए। नतीजा यह हुआ कि कोई भी दंगई वहां पहुंच ही नहीं पाया। वे सुरक्षित रहे। गुरूद्वारों में शरण लेने वाले सिख भी बच गए। उनका सभी कुछ लुटा गया पर जान बच गई। रेलगाडिय़ों मेें सफर कर रहे सैंकड़ों सिख यात्रियों को दंगाईयों ने मार दिया। कई फौजी जो छुट्टी काट कर लौट रहे थे या छुट्टी जा रहे थे वे भी भीड़ कर शिकार बने।

ये हालात और भी खराब हो गए होते अगर हिंदू परिवारों और पड़ोसियों ने सिखों को न बचाया होता। उस तनाव के समय में भी आम लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द नज़र आया। लोग दंगाईयों से डरे तो थे पर फिर भी चोरी छुपे सिखों की मदद कर रहे थे। दिल्ली के नेहरू विहार में रहने वाले दर्शन सिंह बताते हैं कि उनके परिवार को पड़ोसियों ने तीन दिन तक अपने छोटे से घर में बंद रखा। उनके बेटे के बाल काट दिए और फिर बड़ी मुश्किल से वे सुरक्षित गुरूद्वारा बंगलासाहिब पहुंचे। इस प्रकार की कई और भी घटनाएं हैं।

आज इस घटना को 34 साल हो गए हैं। दिल्ली का जीवन अपनी रफ्तार पकड़ चुका है पर जो लोग उस समय दिल्ली और दूसरे शहरों से उजड़ कर पंजाब आ गए थे वे आज भी जीवन को पटरी पर नहीं ला पाए हैं। उनमें से इक्का दुक्का लोगों को छोड़ कर कोई वापिस लौटा नहीं है। उनमें बहुत से ऐसे भी हैं जिन्होंने 1947 का बंटवारा देखा है। उस समय हुए दंगों को देखा और भोगा है। दंगों के दौरान दिल्ली में सबसे ज्य़ादा मारकाट  यमुना पार त्रिलोकपुरी में हुई। वहीं से उजड़ कर अब पंजाब में मोहाली मेें रह रही नरिंदर कौर पप्पी के लिए आज भी वे यादें ताज़ा हैं।

उसका पति सर्वजीत सिंह एक प्रैस में कार चालक था। जब दंगे शुरू हुए उस समय वह अपनी ड्यूटी पर था। वह तीन दिन से लगातार काम पर था इसलिए अपने घर नहीं गया था। उसे पता भी नहीं चला कि क्या हो गया है। उसे दंगे होने का गुमान तक नहीं हुआ। जब शाम को वह अपने कार्यस्थल से बाहर निकला तो रास्ते में कुछ खास नहीं था। पर आगे आने पर उसे कुछ लोग मिले तो उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी के सिख अंगरक्षकों ने उन्हें गोली मार दी है और अब लोग सिखों को मार रहे हैं आप भी ध्यान से घर जाना। उसके बाद सर्वजीत ने घर की बजाए गुरूद्वारे का रु ख कर लिया। रास्ते में कुछ दंगाइयों ने उस पर लोहे की सलाख से हमला किया। उसके सिर पर चोट आई पर पगड़ी के कारण जख्म गहरा नहीं था। इस कारण वह भाग कर अपनी जान बचाने में सफल रहा। उसकी किस्मत अच्छी  थी कि आगे उसे कुछ ऐसे लोग मिल गए जो थाने जा रहे थे। वह भी उनके साथ हो लिया। थाने वालों ने उसे ट्रक में बिठा कर गाज़ीपुर भेज दिया। वहां से वह पैदल शकरपुर पहुंचा। उस समय त्रिलोकपुरी में सबसे ज्य़ादा दंगे हो रहे थे। वहीं उसका घर था।  बड़ी मुश्किल से वह अपने घर पहुंचा। उसके पीछे काफी लोग लग गए थे। वहां से वह अपने सुसराल चला गया। उसका ससुराल हिंदू परिवार था। ससुराल वालों ने उसे एक पेटी में बंद रखा। बाद में भारी मात्रा में पुलिस, सेना के जवानों, नागरिक एकता पार्टी के सदस्यों और प्रैस के लोगों के आने पर वह बाहर निकला और उसे एक शिविर में पहुंचा दिया गया। जब यह घटना हुई उस समय सर्वजीत की पत्नी आठ महीने की गर्भवती थी।

सर्वजीत अब मोहाली में है वह बताता है कि जब वह छुपते-छुपाते घर जा रहा था तो उसने रास्तें में दंगाइयों को सिखों के घरों में आग लगाते और उनकी हत्या करते देखा। सिखों के घरों में दरवाजों को खुलवा कर या तोड़ कर उन पर एक खास प्रकार का पाऊडर डालते थे जो एकदम आग पकड़ लेता। दंगाइयों के पास अजीब तरह की तलवारें-बरछे थे जैसे उसनेपहले कभी नहीं देखे थे। बाद में हरचंद सिंह लौंगोवाल और सुरजीत सिंह बरनाला त्रिलोकपुरी आए और उनकी मदद से वहां से उजड़े परिवारों को पंजाब लाने का रास्ता साफ हो गया।

नरिंदर कौर पप्पी ने बताया कि बाहर से

विस्थापित हो कर लौटे सिख परिवारों के लिए सबसे पहला शिविर आनंदपुर साहिब में लगाया गया था। कुछ लोगों को मोहाली के फेज़-11 में भी रखा गया। उस समय की पंजाब सरकार ने कहा था कि सभी विस्थापितों को घर, नौकरी और कारोबार करने के लिए बूथ भी ‘अलॉटÓ किए जाएंगे। उस समय हम संत गुरूगोबिंद सिंह भवन मेें रहे। इसके बाद हमें कपड़े वगैरा की सहायता तो मिली लेकिन हमारी ज़रूरत के अनुसार वह बहुत कम था। देखा जाए तो सरकार की तरफ से व्यवहारिक रूप से कोई मदद नहीं आई न ही कोई नेता हमारी मदद को आया। वे हमारे सिर पर केवल राजनीति ही खेलते रहे।

मनमोहन सिंह की कांग्रेस सरकार आने के बाद हमें दो लाख रु पए की मदद मिली। बादल सरकार ने वह पैसा भी हमसे यह कह कर ले लिया कि आपको मकान दिए गए हैं। एक मकान की कीमत 33,000/- रु पए थी फिर उस पर ब्याज लगा दिया और हमसे लगभग डेढ लाख रु पए तक ले लिए गए। हमें नोटिस आ रहे थे कि जल्दी पैसे भरो नहीं तो घर से निकाल देंगे। असल में जिनकी कुछ जान पहचान सरकारी अफसरों या नेताओं के साथ थी उन्हें कुछ लाभ मिल गया। उनके ‘रेड कार्डÓ भी बन गए। कई तो दो-दो कार्ड भी बना ले गए। नौकरी भी उन्हीं को मिली जिनकी सिफारिश थी या जो पंजाब के नेताओं और अफसरों के जानकार थे। जो लाभ हमें मिलने थे वे सभी कुछ खास लोगों को दे दिए गए। हमारे मकान की किश्त 184 रु पए महीना तय की गई थी जबकि मेरे पति की आय 450 रुपए प्रति माह थी। उसे शिवालिक पब्लिक स्कूल में नौकरी मिली गई। लगभग ऐसी ही कहानी मनमोहन सिंह, कुलबीर सिंह, प्रभजीत सिंह, सुखबीर कौर, मोहिंदर सिंह, भूपेंद्र सिंह और बलबंत सिंह की है। ये सभी परिवार  आजकल मोहाली में रह रहे हैं।

दिल्ली के रहने वाले तेजा सिंह और उसका परिवार भी इस हादसे से गुजर चुका है। तेजा सिंह का परिवार दिल्ली के तिलक नगर में रहता था। उनके तीन बेटे और एक बेटी थी। उनके घर के पास में बहुत से सिख लोगों को टायर गले में डाल कर जिंदा जलाया जा रहा था। तेजा सिंह की पत्नी ने अपने पति और तीन बेटों को बाल काट दिए थे और एक पेटी में बंद कर दिया। उनके आसपास वाले लोग ज्य़ादातर हिंंदू परिवार थे। आसपास हिंदू परिवार वालों उनकी बहुत मदद की थी और अपने घर में रखा था। नहीं तो उनके परिवार वालों को दंगाइयां ने मार डालना था। आजकल यह परिवार चंडीगढ़ में रहता है। उनके दो बेटे दिल्ली में ही रहते है। इस परिवार को भी वह दिन कभी नहीं भूलते। आज भी दिल्ली के दंगों की यादें ताज़ा है।

इनके जख्मों को अभी तक पूरी तरह से सहलाया नहीं गया है। आज 34 साल बीत जाने के बाद भी इस जनतांत्रिक देश में हज़ारों लोगों के किसी एक भी हत्यारे को सज़ा नहीं हुई है। ये लोग आज भी न्याय के लिए भटक रहे हैं। पर उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है।

बेटी बचाओ

बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ। पढऩे में यह नारा काफी सुन्दर और आकर्षक लगता है। लेकिन बेटी बचाने की जब बारी आती है तो परिभाषा बदल जाती है। गुडिय़ा से बेरहम रेप और उसकी हत्या को लेकर आज तक तस्वीर साफ नहीं हो पाई। असल अपराधी कौन है, यह आज तक साफ नहीं हो पाया। और यदि प्रदेश में पिछले आधे साल से भी कम समय के आंकड़े देखें तो ”बेटी बचाओ” का नारा और भी थोथा लगने लगता है। करीब पांच महीनों में प्रदेश में रेप के 156 मामले दर्ज हुए और महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 375 मामले दर्ज हुए। इस से साफ हो जाता है कि वास्तव में देव भूमि में महिलाओं की क्या स्थिति हो रही है।

सरकार का पुलिस पर असर कितना कमजोर है यह भी इन घटनाओं से साबित हो जाता है। कुछ मामले तो ऐसे भी होते हैं जहाँ राजनीति से जुड़े ताकतवर लोग ही आरोपी, अपराधी होते हैं। शिमला के एक गाँव में गुडिय़ा से जो हुआ था उसे सुनकर रूह काँप जाती है लेकिन आज तक इस जघन्य मामले में जो कुछ हुआ उससे यही साफ नहीं होता कि वास्तव में असल अपराधी है कौन। सीबीआई जैसी देश की आला एजेंसी ने इस मामले की जांच की लेकिन कोई नतीजा नहीं  निकला।

मामलों की जांच कितने कमजोर तरीके से होती है इसके कई उदहारण हैं। कई मामलों में सालों तक अपराधी का ही पता नहीं चलता। कुछ मामलों को  कोर्ट में इतना कमज़ोर बनाया जाता है कि आरोपी सूली पर चढऩे के बजाए मौज करते हैं। क्या मंत्रियों-अफसरों का पुलिस-जांच अधिकारियों पर कोई बस नहीं। लगता तो यही है।

स्थिति वास्तव में खराब है। विधानसभा के मानसून सत्र में भी यह मसला उठा। नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने आंकड़ों के आधार पर बताया कि बीते सात महीने में (उस वक्त तक) सूबे में 64 हत्याएं, 283 रेप, 283 अपहरण, 333 छेडख़ानी, महिला उत्पीडऩ के 98 मामले सामने आए हैं। इसके अलावा, प्रदेश में नशा भी अपनी जड़े फैला रहा है। सात महीने में 800 मामले नशे से जुड़े पकड़े गए हैं। मुकेश ने बताया कि कांगड़ा में सबसे अधिक 17 हत्याएं, शिमला में 12, ऊना में 10 लोगों की हत्या कर दी गई वहीं, रेप के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं। कांगड़ा में रेप के 30, कुल्लू में 18, मंडी में 32, शिमला में 21, सोलन में 13, सिरमौर में 24, जबकि ऊना में 15 रेप की घटनाएं सामने आई हैं।

यदि विधानसभा में यह मसला उठ रहा है तो जाहिर है कहीं न कहीं चिंता है। चिंता जनता में है। उन्हें अपनी बेटियों की आबरू खतरे में दिखती है।

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह कहते हैं कि हमारे प्रदेश में महिलाओं को बहुत इज्जत की नजर से देखा जाता रहा है। ”यह कानून से ज़्यादा सामाजिक व्यवस्था का मसला है यानी हमारी परम्पराओं को जीवित रखने का भी मुद्दा है। लेकिन दुर्भाग्य है कि यह घटनाएं पिछले सालों में बढ़ी हैं”। यह पूछने पर कि शिमला का गुडिय़ा मामला उनकी सरकार के समय में ही हुआ, सिंह ने कहा – ”हमने एक हफ्ते के भीतर इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई से जांच की सिफारिश की। उसने इस मामले की जांच की है। अब हमारी सरकार नहीं लेकिन हम चाहते हैं कि उस बच्ची से बर्बरता करने वालों को कड़ी सजा मिले”।

प्रदेश में सामाजिक संगठन सक्रिय हैं। महिलाओं के अधिकारों को लेकर जागरूकता भी पिछले दशकों में बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एड्स जैसे विषय पर काम कर चुकीं सारिका कटोच कहती हैं कि पिछले सालों में प्रदेश में महिलाओं पर अत्याचार बढ़े हैं। ”इसमें भी दुष्कर्म की घटनाओं की बाढ़ सी आ गयी है। हर रोज कोई न कोई मामला सामने आ रहा है। यह व्यवस्था की नाकामी का प्रमाण है। व्यवस्था में असामाजिक तत्वों की घुसपैठ बढ़ी है। राजनीति और प्रशासन दोनों की मार्फत। यह बहुत चिंता की बात है क्योंकि इससे असामाजिक तत्व निडर हो गए हैं”।

आंकड़े देखें तो कांग्रेस और भाजपा दोनों की सरकारों के समय प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ ज्यादती की घटनाएं हुई हैं। नशे के बढ़ते मामलों ने रेप जैसे अपराध में बढ़ोतरी की है। नगर परिषद, रामपुर की  महिला मंडल प्रधान रुक्मणी देवी कहती हैं कि वे पुलिस को नशे के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम में बराबर सहयोग दे रही हैं। ”हमारे इलाके में रोजाना नशेडिय़ों का जमावड़ा लगा रहता है। इसके चलते हमने नशे के खिलाफ विशेष अभियान छेडऩे की गुहार लगाई और सहयोग का भरोसा दिया है”। रुक्मणी मानती हैं की नशे के बढ़ते चलन से महिलाओं की दिक्कतें बढ़ी हैं और उनके खिलाफ यौन अपराध बढ़े हैं।

मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर स्वीकार करते हैं कि महिलाओं को लेकर समाज में विकृति आई है। ”पहले ऐसा नहीं था। खुलेपन की कुछ तत्वों ने गलत परिभाषा निकाली है और इंटरनेट के विस्तार ने भी किसी हद तक समाज में विकृति पैदा की है। ऐसे तत्व संख्या में कम हैं लेकिन महिला से जब भी कोई गलत बात होती है समाज में इसका व्यापक असर पड़ता है”।

क्या इसके लिए राजनीति दोषी है, इस पर जय राम कहते हैं कि सिर्फ राजनीति के ही लोग  जिम्मेवार नहीं हैं। ”हर वो व्यक्ति जिम्मेवार है जो महिलाओं का सम्मान नहीं करता। ऐसे व्यक्ति हर वर्ग में हैं”। यह पूछने पर कि पुलिस ज्यादातर मामलों अपराधी तक पहुँचाने में नाकाम रहती है तो क्या सरकार, मंत्रियों और उच्चाधिकारियों का पुलिस पर बस नहीं, मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसा नहीं है। हो सकता है निचले स्तर पर कुछ फेवर हो जाती हो, सरकार ऐसे किसी भी मामले का सख्त संज्ञान लेती है। ज़्यादातर मामलों में पुलिस कार्रवाई करती है और कम मामलों में ऐसा होता है कि अपराधी पकड़ में नहीं आते।”

सरकार का यह भी तर्क रहा है कि हिमाचल में महिला अपराध के मामलों में बाहरी तत्व ज़्यादा संलिप्त पाए जाते रहे हैं। स्थानीय लोगों की भूमिका भी रही है लेकिन अपेक्षाकृत कम। सीमावर्ती इलाकों में ज्यादा मामले हुए हैं। पुलिस का रिकार्ड देखें तो कांगड़ा जिला महिला अपराध में सबसे आगे रहा है। पंजाब की सीमा से लगते कांगड़ा जिले में अकेले इस साल के पहले 10 महीनों में रेप की तीन दर्जन से ज्यादा घटनाएं हुई हैं।

गुडिय़ा मामले में ‘न्याय’ का इन्तजार

डेढ़ साल हो चुका है। शिमले के बहुचर्चित गुडिय़ा रेप-मर्डर मामले में सीबीआई ने एक आरोपी को गिरफ्तार किया है। इस मामले से जुड़े कोटखाई लॉकअप केस में 9 पुलिस वालों को गिरफ्तार किया गया है। दोनों मामलों में चालान पेश किए गए हैं। फिर भी पता नहीं क्यों लोगों को लगता है कि गुडिय़ा मामले के असली अपराधी बचा लिए गए। पिछले साल 4 जुलाई को गुडिय़ा स्कूल से घर लौटते समय लापता हो गई थी। इसके दो दिन बाद उसका शव स्थानीय जंगल में पड़ा मिला था। उसका रेप के बाद मर्डर कर दिया गया था लेकिन डेढ़ साल पूरा हो जाने के बाद भी दरिंदगी का शिकार हुई मासूम को न्याय नहीं मिल पाया। केंद्रीय जांच ब्यूरो भले ही एक आरोपी को पकड़ कर मामला सुलझाने का दावा कर चुकी हो लेकिन गुडिय़ा के परिजनों के जहन में ऐसे कई सवाल हैं, जिनका जवाब उन्हें अभी तक नहीं मिल पाया है। गुडिय़ा के परिजनों की मानें तो इस वारदात में एक व्यक्ति से अधिक संलिप्त थे।

गुडिय़ा केस की जांच के लिए विभाग ने जिस एसआईटी का गठन किया था, सीबीआई ने मामले की छानबीन में पाया कि एसआईटी ने गलत व्यक्तियों को मामले में गिरफ्तार किया। एक आरोपी सूरज की हत्या का आरोप का षड्यंत्र रच राजू पर डाला जबकि उसकी हत्या पुलिस की पिटाई से हुई। आज वो एसआईटी ही खुद न्यायिक हिरासत में चल रही है। गुडिय़ा केस से जुड़े पुलिस लॉकअप सूरज हत्याकांड मामले में आईजी जैदी, शिमला के पूर्व एसपी डीडब्ल्यू नेगी, डीएसपी मनोज जोशी और अन्य छह पुलिस कर्मी न्यायिक हिरासत में चल रहे हैं। सभी आरोपी पुलिस अधिकारियों और  कर्मचारियों के खिलाफ अदालत में चालान पेश किया जा चुका है।

जो कुछ किया सरकार ने

महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर का दावा है कि उनकी सरकार बनने के बाद उठाये यह कदम महिलाओं के लिए बहुत उपयोगी साबित हो रहे हैं। राज्य सरकार ने इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर महिलाओं के विरूद्ध अपराध रोकने  के लिए ‘पहलÓ योजनाओं की शुरूआत की। ‘शक्ति बटन एप्पÓ किसी भी प्रकार के असामाजिक तत्वों से महिलाओं की सुरक्षा के लिए राज्य सरकार की प्रमुख पहलों में एक है। यह एप्प राष्ट्रीय सूचना केन्द्र हिमाचल प्रदेश ने पुलिस के लिए तैयार की है। एप्प हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में है और प्रयोग करने में सरल है। कोई भी महिला किसी भी आपात अथवा संकट की स्थिति में एप्प का लाल बटन दबा सकती है। बीस सेकेण्ड के भीतर यह एप्प संकट अथवा हमले की स्थिति में महिला,लड़की का नाम, फोन नंबर और स्थान संबंधित जिला के पुलिस नियंत्रण कक्ष और केन्द्रीय नियंत्रण कक्ष को भेज देगा। वहां पीडि़ता का संदेश पुलिस स्टॉफ प्राप्त करेगा और पीडि़ता को तत्काल राहत के लिए संबंधित पुलिस स्टेशन अथवा पुलिस पोस्ट को निर्देश जारी करेगा। केवल यही नहीं, एप्प छीना-झपटी के दौरान फोन गिर जाने पर भी संदेश भेज देगी। पुलिस के अलावा पंजीकृत दो या तीन करीबी रिश्तेदारों के नंबर पर भी तुरन्त े संकट की स्थिति की सूचना प्राप्त हो जाएगी। इस एप्प की विशेषता यह है कि इसके लिए इंटरनेट कनेक्टिविटी की आवश्यकता नहीं पड़ती। शक्ति बटन एप्प को किसी भी एंडरायॅड फोन पर गुगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। ”गुडिय़ा हैल्पलाईन” के नाम से एक अन्य हैल्पलाईन किसी भी आपातकाल में महिलाओं को तुरन्त सहायता प्रदान करने के लिए शुरू की गई है। इसके लिए टॉल फ्री नम्बर 1515 स्थापित किया गया है, जो महिलाओं को तुरन्त सहायता प्रदान करने के लिए 24 घण्टे क्रियाशील है। पुलिस इस नम्बर पर मदद के लिये गुहार लगाने वाली महिला के पास तत्काल पहुंच जाएगी। यह पीडि़ता के मोबाइल पर छेडख़ानी की घटना की ऑटोमेटिक वीडियो और ऑडियो रिकार्डिंग करेगी, जिसे बाद में अपराधी के विरूद्ध बतौर साक्ष्य उपयोग किया जा सकता है। इन पहलों के अलावा अन्य आपात हैल्पलाईन नम्बर: 94591-00100  है, जिसमें महिला किसी भी आपातकालीन की स्थिति में वाट्सएप अथवा एसएमएस के माध्यम से सम्पर्क कर सकती है। फोन करने वाले की सूचना दर्ज कर ली जाएगी और कानून के अनुसार त्वरित कार्रवाई के लिए सम्बन्धित अधिकारी को प्रेषित किया जाएगा।

और जब अंधेरा होता…

31 अक्तूबर 1984 – मैं अपने कुछ दिल्ली और पंजाब के साथियों सहित मद्रास से एक मीटिंग अटैंड करके वापिस चंडीगढ़ आ रहा था। शाम का सयम था एकाएक रेल के डिब्बे के माहौल में तबदीली आ गई। हुआ क्या था? नहीं मालूम। लेकिन एक तनाव कुछ चिंता की लकीरें कुछ लोगों के चेहरों पर देखी जा सकती थी। खैर हमने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो एक दम से खबर फैल गई कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर उनके ही सिख सुरक्षागार्डों ने गोली चला दी है। खबर महत्वपूर्ण थी, व और ज़्यादा जानने की उत्सुकता जगा रही थी। आपस में काफी देर इसी पर चर्चा होती रही। इस बीच शाम ढलने लगी और एक दो जगह पर गाड़ी अनजान स्टेशनों पर भी रुकी या चेन खींच कर रुकवाई गई। खैर – झटका तो उस वक्त लगा जब एक मित्र ने बाथरूम से वापिस आकर बताया कि यह गाड़ी तो लगभग खाली हो चुकी है। हर डिब्बे में इक्का दुक्का परिवार या सवारियां बची थी। हैरानी और उत्सुकता दहशत में बदलने लगी जब कुछ एक जगह पटरी के दोनों और खड़ी भीड़ ने चलती गाड़ी पर पत्थर बाजी शुरू कर दी। हमने भी डिब्बा बंद कर लिया और चौकस होकर बैठ गए। फल काटने के लिए रखा चाकू हथियार लगने लगा। सफर कर रहे एक दो सिख परिवार न जाने कब और कहां उतर गए थे।

कोई खाना नहीं आया, न कोई चाय कॉफी वाला और भूतिया ट्रेन मजऱ्ी से चलती, रुकती, आउटर दिल्ली पहुंच गई। बहुत धीमी गति से चलती ट्रेन में से कुछ घर व फैक्टरियों में से ऊँची लपटें व धुंआ उठता नजऱ आने लगा। आगे आए तो सड़कों पर कई जगह ऑटो रिक्शा, टैक्सी, स्कूटर इत्यादि जलते हुए नजऱ आए। सड़कें सूनी थी जैसे कफ्र्यू लगा हो। रब-रब करते हुए नई दिल्ली स्टेशन पर उतरे तो एक रेलवे कर्मचारी से पता लगा कि दंगा फैल गया है। दिल्ली जल रही है। पंजाब जाने वाली कई ट्रेनें रद्द हो गई हैं। पंजाबियों, खासकर सिखों को मारा जा रहा है। उसने कहा कि जल्दी से यहां से चले जाओ न जाने कब दंगई यहां भी आ धमकें। अचानक मुझे अपने साथ आया अपना वर्षों पुराना सिख दोस्त भार लगने लग गया।

न जाने कब अपने आप हमारी भाषा बदल गई थी। कोई पंजाबी नहीं बोल रहा था। प्लेटफार्म के बाहर कदम रखा तो सुनसान, अंधेरा, दहशत भरा माहौल, कोई पुलिस या सुरक्षा कर्मचारी नहीं था। न ही टैक्सी या ऑटो। रात दो बजे का समय था। कहां जाएं सोच ही रहे थे कि दूर से स्पीकर की आवाज़ सुनाई दी कि दिल्ली के पानी में ज़हर मिला दिया गया है। कोई भी नल या टैंकों का पानी न पिए। सुनकर जिस्म में सनसनाहट सी फैल गई। एक दोस्त को याद आया कि रेलवे कालोनी में ही हमारे एक पंजाबी दोस्त के भाई का घर है। वहां पहुंच कर दरवाजे पर दस्तक दी तो पहले तो जवाब ही नहीं आया। दो तीन बार नाम लेकर आवाज़ लगाई तो अंदर से एक डरी हुई कंपकंपाती आवाज़ आई, कौन?

भाई साहब हम जगदीश के मित्र हैं मद्रास से वापिस आ रहे हैं। वगैरा-वगैरा एक दो प्रश्न पूछने के बाद उन्होंने दरवाजा खोला। फटाफट हमें अंदर लिया और एक कमरे में चार गद्दे फैला दिए। हम बिना कुछ बोले व कहे सुने लेट गए। भाई साहब ने बताया कि कैसे सिखों को चुन- चुन कर हजारों की संख्या में मारा जा रहा है। गले में टायर डाल कर जलाया जा रहा है। हम सब अगले दिन पंजाब कैसे पहुंचेगें के बारे में सोचने लगे। नींद कोसों दूर थी।

कभी-कभी ऐसी आवाजें आती थी जैसे किसी हिंसक भीड़ द्वारा किसी पर हमला किया जा रहा हो। उसके बाद चीखने की दर्दनाक आवाज़ें। फिर एकदम सन्नाटा। हे भगवान ये सब क्या हो रहा था। जैसे तैसे वो काली रात खत्म होने को आई। अभी अंधेरा ही था कि भाई साहब ने भी हमें चाय पिला कर जैसे माफी मांग ली कि अब जाइए ऐसा न हो कि कोई सोचे कि उन्होंने कुछ पंजाबियों को घर में शरण दे रखी है। उन हालात में वो भी अपनी जगह सही थे।

दिल्ली वाले तो प्रस्थान कर गए। उनके साथ मेरा सिख दोस्त भी चला गया। वह दिल्ली का ही रहने वाला था। जब वह गया तो हम सोच रहे थे पता नहीं अब उससे कभी मुलाकात होगी भी या नहीं। पर बाद में पता चला कि वह उन दंगों में बच गया था। पंजाब वाले हम तीन लोग ही बचे थे। इसलिए डर और बढ़ गया था। भाई साहब रेलवे में ही कार्यरत थे उन्होंने फोन पर पता किया कि एक टे्रन चंडीगढ़ जा रही है आधे घंटे में। हम भागते हुए स्टेशन पर पहुंचे। और एक डिब्बे में बैठ गए जो तकरीबन खाली था। एक साथी ने अखबार खरीद लिया था उसे मिलकर सब पढ़ रहे थे, कि एक सुरक्षा कर्मचारी ने आकर अखबार ले ली। अजीब स्थिति थी। बहस करना भी मुनासिब नहीं था। शायद इसलिए कि अखबार देखकर पंजाब में हिंसा न भड़क जाए। यह ख्याल आते ही जिस्म में जैसे एक कंपकंपी फैल गई। मेरे माता-पिता लुधियाना के एक कस्बे में रहते थे। उन पर न कोई आफत आ जाए। यह सोचा हुआ आखिर चंडीगढ़ उतरा। घर जाने की बजाए सीधे टैक्सी करके माता-पिता को लेने चल पड़ा और गांव पहुंचा। यह लिखते हुए शर्म आती है कि मैंने खासतौर पर देखा था कि चालक हिंदू है। पिताजी ने 1947 का समय देखा हुआ था। बिना देरी किए वो भी ज़रूरी नकदी गहना वगैरा लेकर मेरे साथ पंचकूला आ गए। दुख-सुख में हम अक्सर नाडा साहब गुरूद्वारे जाया करते थे, लेकिन इस बार हम बिना एक दूसरे से कुछ बोले मनसा देवी मंदिर में माथा टेक आए।

घटना आम है। न जाने मेरे जैसे कितनों के साथ घटी होगी। लोग भूल भी चुके होंगे। लेकिन मेरे लिए यह घटना कुछ ऐसे सवाल छोड़ गई जो मुझे आज भी व्यथित करते हैं। जैसे कि वर्षों पुराना हमारा सिख मित्र जो उस दिन हमारे साथ सफर कर रहा था रातों-रात टे्रन में हमें बोझ क्यों लगने लगा गया था? गांव जाते हुए मुझे क्यों इस बात की संतुष्टि महसूस हुई कि टैक्सी ड्राइवर हिंदू है? क्यों वापिस पंचकूला आकर हम हमेशा की तरह गुरूद्वारे न जा कर मंदिर चले गए? अगर ऐसी घटनाओं का पढ़े-लिखे इन्सान पर जो कि पंजाब में ऐसे हिंदू परिवार में जन्मा व पला बढ़ा हो जिस परिवार के आधे रिश्तेदार सिख हैं, ऐसा प्रभाव हो सकता है तो एक आम साधारण कम पढ़ा-लिखा इन्सान किस हद तक जा सकता होगी।

शायद ऐसा ही होता हो जब ”अंधेरा होता है’’।

असमंजस!

आज कल के समाचार नाम बदलने की सरकारी नौटंकियों से भरे पड़े हैं। इसी कड़ी में अगला शिकार हो रहा है शिमला। शिमला को किसी भी तरह ‘श्यामला’ करने की कोशिश शुरू हो गई है। मुझे बताइये कि क्या नाम बदलने से इस पहाड़ी नगर में लोगों के लिए जन सुविधाएं बढ़ जाएंगी, क्या बंदरों का आतंक कम हो जाएगा या उन्हें पूरा पानी मिलने लगेगा।

शिमला जो किसी समय पहाड़ों की रानी के नाम से विख्यात था अब केवल गलत कारणों से जाना जाने लगा है। अब इसका नाम बदलने का झटका दिया जा रहा है। जरा आराम से बैठ कर सोचें इस के परिणाम क्या होंगे- शिमला समझौता क्या श्यामला समझौता बन जाएगा। आपको अपनी यात्रा के लिए कुछ अतिरिक्त शब्दों का बोझ भी ढोना पड़ेगा। आप कहोगे श्यामला – पहाड़ी स्टेशन। लोगों के किए कई प्रकार की दुविधाएं पैदा हो जाएगी।

पता नहीं हमारी मौजूदा सरकार क्यों शहरों, कस्बों और गावों के नाम बदलने की लगी है। शायद लोगों का ध्यान ज़मीनी हकीकतों से भटकाने के लिए। भ्रष्ट अनुबंध और विकासहीनता की तस्वीर को छुपाने की कोशिश भी इसके तहत की जा रही है। अपने भ्रष्ट कार्यों को छुपाने के लिए यह कदम एक और चादर का काम करेगा। यदि यह दक्षिण पंथी सरकार संस्थाओं और विभागों के नाम तक बदल दे तो भी कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। इसकी शुरूआत वे सीबीआई का नाम बदलने से भी कर सकते हैं। इसके माध्यम से वे हमारा ध्यान उस भारी भ्रष्टाचार से हटाने की कोशिश कर सकते हैं तो अब सरेआम उजागर हो रहा है।

मोदी सरकार में मंत्री गिरिराज जैसे लोग सांप्रदायिक ज़हर उगलने के साथ उन गली, मोहल्लों और सड़कों के उन नामों को बदलने में लग गए है जिनमें मुगलों की तरह के नामों की महक आती है। यह एक बड़ा झड़का हो सकता है। जब फासीवादी ताकतें सत्ता में हों तो उनसे और क्या अपेक्षा की जा सकती है। जब गिरिराज जैसे लोग भड़काऊ बातें करते हैं और उन्हें रोकने के लिए कोई आगे नहीं आता तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं होती।

कल को ये उन्मादी शासक अल्प संख्यक लोगों पर यह कहते हुए हमले कर सकते हैं कि उनके नाम और उपनाम ‘विदेशी’ हैं। आपको याद होगा कि इन लोगों ने सैफ अली खान और करीना के बेटे का नाम तैमूर रखने पर कितना बवाल किया था। हैरानी की बात है इस मुद्दे पर हमारे टेलिवीज़न पर कई बार  बहस सुनने को मिली। एक हिंदुवादी ने तो यहां तक कहा कि बच्चे का नाम समीर होना चाहिए। क्यों? क्योंकि यह नाम हिंदू भावना के भी अनुकूल है।

यदि नाम बदलने की इस नौटंकी को जल्दी ही बंद नहीं किया गया तो देश में आराजकता फैल जाएगी। यदि यह राजनीतिक, माफिया ताजमहल, फतेहपुर सीकरी, हमायुं का गुंबद, लाल किला, पुराना किला, जामा मस्जिद, वगैरा के नाम बदलवाने पर भी उतारू हो गया तो क्या होगा? यह सूची लंबी है क्योंकि मुगल बदशाहों ने यहां हमलावर विजेताओं की तरह शासन नहीं किया बल्कि उन राजाओं की तरह किया जो यहां की माटी और लोगों  के साथ जुड़े रहे। उनके द्वारा विभिन्न शहरों और कस्वों में बनाए गए शानदार स्मारक और बाग बगीचे इस बात का प्रमाण है कि वे लोग भारत की माटी से जुड़ गए थे। क्या दक्षिण पंथी शासक मशहूर स्थलों से मुगल गार्डन हटा देंगेऔर राष्ट्रपति भवन में मुगल गर्डन का भविष्य क्या होगा?

नाम बदलने की तबाही उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज कर रहे हैं। इसके अलावा उनकी सूची में और भी कई नाम हैं। मुगल स्मारकों के प्रति योगी सरकार की घृणा इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि 2017-18 के सालाना बजट में ‘हमारी सांस्कृतिक विरासत’ के तहत ताज महल का जि़क्र तक नहीं है। वित्तमंत्री के 63 पन्नों के भाषण में एक स्थान पर भी ताजमहल का नाम नहीं आया। ताजमहल  के प्रति यह घृणा उस समय है जब यह स्मारक दुनियां के सात अजूबों में शामिल है और इसे देखने हर साल लाखों पर्यटक आते है और इससे सरकार को करोड़ों रु पए की आय होती है। योगी आदित्यनाथ ने कई बार  सरेआम कहा है कि मुगल बादशाह शाहजहां ने जो यह ताजमहल बनाया है वह भारत की पुरानी संस्कृति को प्रतिबिंधित नहीं करता। उन्होंने यह भी कहा कि यहां आने वाले विदेशी गणमान्य व्यक्तियों को ताजमहल के स्वरूप भेंट नहीं किए जाएंगे। इसके बदले उन्हें हिंदू शास्त्रों की प्रतिलिपियां दी जाएंगी।

और राजस्थान में तो सरकार की मुगलों के प्रति अपनी घृणा इस हद तक दिखा दी वहां की सरकार ने तो छात्रों को $गलत इतिहास पढऩा शुरू कर दिया। उन्होंने इतिहास में लिखा कि लगभग 450 साल पहले हल्दीघाटी में जो युद्ध हुआ था उसने राजपूत राजा महाराणा प्रताप ने अकबर की सेना को हरा दिया था। यह तथ्यात्मक और ऐतिहासिक रूप से $गलत है। इतिहासकार इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण देते हैं कि मेवाड़ का राजा महाराजा प्रताप उस लड़ाई से भाग गया था, हालांकि उसने बाद में मुगलों के खिलाफ गुरीला लड़ाई जारी रखी।

राजस्थान सरकार की मुगलों के प्रति घृणा इस बात से भी झलकती है कि उसने पिछले साल स्कूल की किताबों में परिवर्तन करके सम्राट अकबर के नाम से पहले लगने वाला शब्द ‘महान’ हटा दिया। इसी प्रकार उसने दुनिया भर में मशहूर ‘अजमेर का किला’ का नाम ‘अकबर का किला’ से बदल कर ‘अजमेर का किला व संग्राहालय’ रख दिया। इस फैसले में किसी इतिहासकार और शिक्षाविदों की समिति को शामिल नहीं किया। यह काम राजस्थान के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी के आदेश पर हो गया। यह किला बादशाह अकबर ने 1570 में बनाया था। इसे राठौरों, मराठों और अंग्रेज़ों ने भी नहीं छेड़ा।

इस किले का असली नाम दिसंबर 1968 को जारी सरकारी ‘गजेट नोटिफिकेशन’ में ‘अकबर का किला’ या ‘दौलत खाना’ दिया गया है। इसका यह नाम तब तक जारी रहा जब तक दक्षिण पंथी सरकार ने इसे नहीं बदला।

महाराष्ट्र सरकार ने तो इतिहास की किताबों से मुस्लिम शासकों ने नाम हटा ही दिए। यह भी उस समय जब भारत में इतिहास में मुगलों के शासन की महत्वपूर्ण भूमिका है। क्या हम इन ऐतिहासिक तथ्यों को मिटा सकते हैं? पानीपत की तीसरी लड़ाई जिस में अफगानिस्तान ने दुर्रानी साम्राज्य ने मराठों को हराया था। मराठाओं ने शाहआलम का साथ दिया था। असल में शाहआलम मराठों के हाथ की कठपुतली था। फिर 1772 में उसने अफगानों से उनके द्वारा किए गए अत्याचारों का बदला लेने के लिए सेना का नेतृत्व किए। उन्होंने अफगानों से युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई करवाई। महाराष्ट्र की नई किताबों में दिल्ली सल्तनत और सूर्य वंश को निकाल दिया गया है। इनके बिना भारत का इतिहास अधूरा रह जाता है। बीजापुर सल्तनत पर बात किए बिना औरगज़ेब का उत्थान समझ में नहीं आ सकता।

ज़्यादातर लोग नाम बदलने के विरोधी

शिमला, उत्तर प्रदेश और अन्य प्रदेशों में जगह के नाम बदलने की कवायद के बीच पहाड़ी सूबे हिमाचल की राजधानी शिमला का नाम बदलने की भी चर्चा है। यह अलग बात है कि ज़्यादातर लोगों ने शिमला का नाम बदलकर श्यामला रखने का विरोध किया है।

भाजपा सरकार की तरफ से औपचारिक तौर पर यह नाम बदलने की कोई घोषणा तो नहीं हुई, भाजपा के ही लोगों ने इसे हवा दी है। मीडिया में अपने बयानों में भाजपा के लोग शिमला का नाम श्यामला करने का समर्थन कर रहे हैं। इसके आलावा बिलासपुर का नाम ब्यासपुर करने की भी बात वे कर रहे हैं।

चूँकि भाजपा की सरकारें दूसरे प्रदेशों में भी इस तरह की कवायद कर रही हैं, हिमाचल में भी भाजपा की सरकार होने के कारण लोगों में इसे लेकर चर्चा है। अभी तक जो कुछ सामने आया है उससे तो यही लगता है यह नाम बदलने का लोग जबरदस्त विरोध कर रहे हैं। ‘तहलका’ ने लोगों से इस मसले पर उनकी राय जानने के लिए उनसे बात की। दिलचस्प यह है कि शिमला में तो ज़्यादातर निगम पार्षद ही इसका विरोध कर रहे हैं। पार्षद कमलेश मेहता ने कहा शिमला नाम दुनिया भर में मशहूर है। शिमला ही हिमाचल की पहचान है। ‘यदि यह नाम बदला जाता है तो दोबारा इसकी पहचान नए नाम से बनाने में सालों लग जाएंगे’।

शिमला के पुराने बस अड्डे के पास पिछले 17 साल से मज़दूरी कर रहे अब्दुल ने कहा कि शिमला बहुत प्यारा नाम है। इसे बदला नहीं जाना चाहिए। मूल रूप कश्मीर के बारामुल्ला के रहने वाले अब्दुल ने कहा – ‘शिमला पर्यटक स्थल है। नाम बदला तो इसका नुकसान होगा। फिल्मों में भी शिमला ही मशहूर है’।

शिमला की ढली सब्जी मंडी में काम करने वाले राम सिंह राक्टा ने कहा कि शिमला का नाम बदलने की जगह भाजपा सरकार को विकास के कामों पर फोकस करना चाहिए। ‘यदि नाम बदला जाता है तो इसका यहाँ के टूरिस्म पर बुरा असर पडेगा। मुझे तो लगता है शिमला का नाम बदलने के पीछे कोई षडय़ंत्र है’।

पार्षद दिवाकर देव ने कहा कि जिस तरह इलाहबाद का नाम बदलकर करोड़ों खर्च हो गए वैसे ही शिमला का नाम बदलने पर भी होगा। बेहतर होगा यह पैसा विकास में खर्च किया जाए। ‘हिमाचल की आर्थिक हालत अच्छी नहीं और हम पर 50,000 करोड़ का कर्ज चढ़ा हुआ है’।

गृहिणी सलोचना सूद ने कहा कि शिमला एक ऐतिहासिक नाम है। ‘शिमला समझौता’ ऐतिहासिक है। ‘क्या आप यह नाम बदलकर इस इतिहास को बर्बाद कर देना चाहते हैं?’

उधर बिलासपुर शहर में दुकान चला रहे सुभाष चंदेल ने कहा कि उन्होंने अखबारों में पढ़ा है कि बिलासपुर का नाम ब्यासपुर किया जा रहा है। ‘सरकार फिजूल के कामों में उलझी है। नाम बदलने की जगह शहर की तस्वीर बदलनी चाहिए। लोगों को गंदगी और तंग सड़कों से निजात दिलानी चाहिए’। हालांकि कालेज छात्र विकास धर्माणी ने कहा कि ब्यास हमारी संस्कृति से जुड़ा नाम है। ‘ब्यासपुर एक अच्छा नाम होगा। मैं इसका समर्थन करता हूँ’।

सुजानपुर की सुषमा शर्मा ने हिमाचल में किसी भी जगह का नाम बदलने का विरोध किया। उन्होने कहा कि भाजपा विकास में फेल हो रही है इसलिए लोगों का ध्यान भटकाने के लिए ऐसा कर रही है। कांग्रेस से जुड़ीं सुषमा ने कहा कि पार्टी इसका विरोध करती है।

हमीरपुर में भाजपा से जुड़े दुकानदार गौतम ने कहा कि ऋषि-मुनियों के नाम पर जगह का नाम रखने में कोई बुराई नहीं। ‘हमें क्यों अंग्रेजों के रखे या मुगलों के रखे नाम चलाने चाहिए। हमारी अपनी समृद्ध संस्कृति है। उससे जुड़े नाम रखना तो गौरव की बात है।’

पर खामोश नहीं हुई जिंदान की जुबां

दिन में 10- 11 बजें के बीच सबसे पहले उसे लाठियों से पीटा गया। इतना पीटा गया कि वह बेहोश हो गया, फिर बेहोशी की हालत में उसे सड़क पर लिटा कर उस पर से ‘स्कार्पियो’ गाड़ी एक नहीं तीन बार चढ़ाई गई। यह सारी घटना बिहार या उत्तरप्रदेश की नहीं बल्कि ‘देवभूमि’ कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की है। शिलाई तहसील के बरकास गांव की यह घटना है। इस घटना स्थल के बिल्कुल सामने एक स्कूल और शिक्षा विभाग का एक दफ्तर है किसी ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की, इतना ही नहीं कोई भी व्यक्ति इस मामले में बोलने तक को तैयार नहीं। दूरदराज के इस क्षेत्र में दबगों का एकछत्र साम्राज्य है। उनके डर से वहां कोई भी सामने आने की कोशिश नहीं करता। जिस आदमी की इतनी बेरहमी से हत्या की गई, वह एक दलित और आरटीआई कार्यकर्ता था। उसका नाम था केदार सिंह जिंदान। वह 43 साल का वकील था जो शिमला हाईकोर्ट में प्रैक्टिस भी करता था। उसके परिवार में उसकी पत्नी हेमलता और दो बेटियां हैं। उसकी एक बेटी 10वीं और दूसरी 12 वीं कक्षा में पढ़ती है। जिंदान ने अपनी जान दे दी पर दबंगों की धमकियों से खामोश नहीं हुआ।

जिंदान पिछले 10-15 सालों से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों के लिए लड़ता रहा था। वह उन लोगों की मदद भी करता था जो अंतरजातीय विवाह करना चाहते थे। उसने खुद भी अंतरजातीय विवाह किया था। वह खुद ‘कोली’ बिरादरी से था जबकि उसकी पत्नी रोहड़ू क्षेत्र की एक उच्च जाति से संबंध रखती है। इस बात से उसके क्षेत्र शिलाई के उच्च जाति के लोग खफा थे। फिर जब उसने आरटीआई को हथियार बना कर वहां पंचायत में चल रहे बीपीएल घोटाले को उजागर किया तो पंचायत के ही कई लोग उसके खिलाफ हो गए और उसे जान से मार देने की धमकियां देने लगे। इस कारण पंचायत का उपप्रधान जय प्रकाश खासतौर पर गुस्से में था क्योंकि उसने हेराफेरी करके अपने उन रिश्तेदारों के भी बीपीएल कार्ड बनवा दिए थे जो कि काफी समृद्ध थे। जिंदान के कारण उसे भारी नुकसान हो रहा था।

जानकारी के अनुसार हरिजनों और दलितों पर होने वाले अत्याचार के 168 मामलों में उसने दखल देकर पुलिस केस दर्ज करवाए थे। इसके अलावा उसने 32 अंतरजातीय विवाह करवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इन तीन मुख्य कारणों से शिलाई इलाके के कुछ दबंग और उच्च जाति के लोग उसके खिलाफ थे। वे उसे रास्ते से हटाने के कई प्रयास कर चुके थे। उन्हें फोन पर बार-बार धमकी मिल रही थी। इसकी शिकायत उन्होंने राज्य के पुलिस प्रमुख से भी की थी। जबकि सिरमौर जि़ला एसपी रोहित मालपानी का कहना है कि उनके पास जिंदान की तरफ से पुलिस सुरक्षा की कोई औपचारिक अर्जी नहीं आई है। मतलब यह कि पुलिस की तरफ से उन्हें सुरक्षा नहीं दी गई।

इस बीच एक दिन शाम चार बजे सतौन बस अड्उे पर 50-60 लोगों की एक भीड़ ने उसे बस से बाहर खींच कर बुरी तरह पीटा। लोग लगभग आधा घंटे तक उसे पीटते रहे पर कोई न तो बचाने आया और न ही किसी ने पुलिस को सूचित किया। उस भीड़ ने जब समझा कि वह मर गया है तो उसे रेत के एक ढेर पर छोड़ कर चले गए। एक घंटे तक वह वहीं पड़ा रहा। कोई उसे उठाने तक नहीं आया। एक घंटे के बाद जब उसे होश आया तो वह पानी की गुहार लगाता रहा, पर किसी ने उसे पानी नहीं दिया। वह खून से तरबतर सड़क पर था, पर किसी वाहन ने उसे ‘लिफ्ट’ नहीं दी। काफी देर बाद पुलिस वहां पहुंची और उसे अपनी जीप में नाहन के अस्पताल ले गई।

जिंदान की पत्नी हेमलता का कहना है कि जिंदान ने 35 लोगों की एक सूची बना कर पुलिस को सौपी थी जिनसे उसे और हमारे परिवार को खतरा था, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। यदि पुलिस ने समय पर कार्रवाई की होती तो आज यह नौबत नहीं आती।

 इस प्रकार केदार सिंह जिंदान भी उन लोगों की सूची में शामिल हो गया जिन्होंने अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठाकर अपनी जान दे दी। गौरी लंकेश, एमएस कुलबर्गी, गोबिंद पनेसर और नरेंदर डाभोलकर के साथ अब केदार सिंह जिंदान का नाम भी जुड़ गया है। गौरी लंकेश ने दक्षिण पंथी हिंदुत्व की हमेशा खुलकर आलोचना की थी। यह बात कुछ कट्टरपंथी लोगों को पसंद नहीं आई और बंगलुरू में उनकी हत्या कर दी गई।

इसी कड़ी में 2014 में एक और प्रगतिशील सोच के सामाजिक कार्यकर्ता गोबिद पनेसर को कोहलापुर में गोली मार दी गई थी। वह सवेरे की सैर करके अपने घर लौट रहे थे, जब दो अनजान लोगों ने उन पर गोली चला दी। इस मामले में पुलिस ने सनातन संस्था के एक सक्रिय कार्यकर्ता समीर गायकवाड़ को गिरफ्तार किया था पर बाद में उसे ज़मानत मिल गई।

नरेंदर डाभोलकर को 20 अगस्त 2013 को गोली मारी गई। डाभोलकर रूढि़वादी सोच के सख्त खिलाफ थे। जून 2014 में यह केस सीबीआई को सौंपा गया और उसने पिछले साल सितंबर में दक्षिणपंथी संस्था सनातन संस्था के दो लोगों अकोलकर और पवार के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।

इनके अलावा रंजन राजदियो जो कि एक दैनिक अखबार ‘हिंदुस्तान’ के सीवान (बिहार) ब्यूरो को देख रहे थे की हत्या पिछले साल मई में कर दी गई थी। मोटर साइकिल पर सवार दो लोगों ने बहुत करीब से उन पर गोली चलाई थी। उन दिनो रंजन ने श्रीकांत भारती के मामले को खूब उठाया था। भारती भाजपा के सांसद ओम प्रकाश का साथी था।

आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमलों की तादाद में महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और बिहार अग्रणी है। यदि सरकारी आंकड़ों पर नजऱ डालें तो महाराष्ट्र में छह, गुजरात में चार, राजस्थान में तीन झारखंड में तीन और बिहार में भी तीन आरटीआई कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं। ये सभी सरकारी आंकड़ें हैं जबकि असली गिनती इससे कहीं अलग हो सकती है। इनके अलावा छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, मुंबई, तमिलनाडु, हरियाणा, आंध्रपदेश, और पश्चिम बंगाल में भी आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई हैं। इस प्रकार कुल मिला कर देश भर में 30 से ज़्यादा आरटीआई कार्यकर्ता मारे जा चुके है। जो ऐसे हमलों में बच गए उनकी गिनती इनसे कहीं ज़्यादा है।

हिमाचल प्रदेश में हर मुद्दे पर एक दूसरे पर प्रहार करने वाले दो प्रमुख दल कांग्रेस और सत्ताधारी भाजपा का कोई नेता जिंदान की हत्या पर एक शब्द नहीं बोला। इस इलाके में जहां जिंदान रहता था और उसकी हत्या हुई, उस क्षेत्र के कांगे्रसी विधायक हर्षवर्धन सिंह का कोई बयान तक नहीं आया। वहां अगर किसी विधायक ने जा कर इस मामले को उठाया तो वह थे विधानसभा में माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के एकमात्र विधायक राकेश सिंघा। राकेश सिंघा मौके पर पहुंचे और इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की। उन्होंने जिंदान की अंतेष्टि में भी भाग लिया, जबंिक दबंगों की दहशत के कारण बहुत से गांव वासी भी वहां नहीं गए थे। इन दबगों ने सिंघा के खिलाफ भी नारेबाजी की। उन्होंने सिंघा से कहा कि वह तो खुद राजपूत हैं तो वह दलितों की हिमायत क्यों कर रहे हैं। लोगों के ऐसे विरोध के बावजूद सिंघा ने कहा की कि इस मामले को दबाने नहीं दिया जाएगा।

चुनावी धुरंधर को ही नीतीश ने सौंप दी पार्टी

नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी को हर तरह से ताकतवर बनाने की मुहिम तेज कर दी है। इस बावत उन्होंने पार्टी के तमाम नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारी भी सौंप दी है। जिन नेताओं पर ज़्यादा भरोसा है, उन्हें ज़्यादा और जिन नेता पर कम भरोसा है, उन्हें कम जिम्मेदारी सौंपी गई है। सबसे ज्यादा भरोसा प्रशांत किशोर पर है, उन पर ही ज्यादा जिम्मेदारी डाली गई है। नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद भी सौंपा है। प्रशांत किशोर को एकाएक पार्टी का सदस्य बनाया गया और फिर एकाएक राष्ट्रीय उपाध्याक्ष भी बना दिया गया। प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के आवास में रह कर ही नीतीश कुमार के निर्देशों पर अमल कर रहे हैें।

नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं ही, अपनी पार्टी जद (एकी) के राष्ट्रीय अध्य्क्ष भी हैं। आने वाला लोकसभा चुनाव और उसके बाद विधानसभा चुनाव उनकी ही अगुवाई में लड़ा जाएगा। पार्टी की स्थिति को सभी दूसरी पार्टियों से सबसे ज़्यादा ताकतवर बनाने की बड़ी जिम्मेदारी है। 2005 से लगातार जद (एकी) सबसे बड़ी पार्टीं रही है। लेकिन 2015 में जद (एकी) का दूसरा स्थान हो गया। राजद सबसे ज़्यादा ताकतवर बन कर उभरा। राजद ऐसे वक्त में सबसे ज्यादा ताकतवर बन कर उभरा, जब राजद और जद (एकी) एक साथ थे और उन्होंने एक होकर विधानसभा चुनाव लड़ा। अब जद (एकी) राजद से अलग है और भाजपा के साथ है। फिर नीतीश कुमार शरद यादव को दरकिनार कर खुद अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। जब शरद यादव पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे या उसके पहले जब जार्ज फर्नाडींज राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तो वे नीतीश कुमार को किसी मुद्दे पर टोक सकते थे। लेकिन अब पार्टी में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो उन्हें टोके। नीतीश कुमार पार्टी में जो चाहे, वह फैसला कर सकते हैें। जद (एकी) की दशा वैसी है, जैसी राजद की रही है। राजद के बारे मेें यह कहा जाता रहा है कि राजद का मतलब लालू प्रसाद और लालू प्रसाद का मतलब राजद। यही बात जद (एकी) और नीतीश कुमार के साथ भी कही जाने लगी है।

जानकारों के मुताबिक प्रशांत किशोर पिछले विधानसभा चुनाव के कुछ महीने पहले नीतीश कुमार के करीब हुए। नीतीश कुमार को इसका फायदा हुआ। पिछले लोगसभा चुनाव के कुछ समय पहले वे भाजपा के संपर्क मेें आए थे और पार्टी को सलाह देने से लेकर प्रचार के काम में सहयोग करने की जिम्मेदारी उन्होंने संभाल ली। भाजपा को कामयाबी मिली। लेकिन बाद में भाजपा और प्रशांत किशोर के बीच टकराव हो गया। प्रबंध करने मेें प्रवीण माने जाने वाले प्रशांत किशोर ने पंजाब और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव मेें कांग्रेस की मदद की। लेकिन प्रशांत किशोर को तरजीह नहीं मिली। फिर वे नीतीश कुमार की शरण में आ गए। जद (एकी) के नेताओं को प्रशांत किशोर को पार्टी में एकाएक लाना और ऊंचे पद पर बैठा देना अखरा तो है, लेकिन उनकी हिम्मत यह नही कि उनके खिलाफ नीतीश कुमार को कुछ बोल सके। फिर, नीतीश कुमार ने खुद ही प्रशांत किशोर को खास जगह दी है।

प्रशांत कुमार फिलहाल पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं की लगातार बैठकें कर रहे हेैं। पार्टी को ताकतवर बनाने के मकसद से वे युवकों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। उनके जरिए आम युवकों के बीच पार्टी का प्रचार-प्रसार करेंगे।

राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि प्रशांत किशोर को पिछले विधानसभा में जिस तरह कामयाबी मिल सकी थी, क्या उसी तरह इस लोकसभा चुनाव में कामयाबी मिल पाएगी? पिछले विधानसभा चुनाव के वक्त उन्हें भाजपा के खिलाफ रणनीति अख्तियार करनी पड़ी थी। इस बार नीतीश कुमार की पार्टी और भाजपा एक साथ हंै। नीतीश कुमार को लाभ का मतलब भाजपा का भी फायदा और भाजपा को फायदा मिलने का मतलब नीतीश कुमार को भी फायदा। वे भाजपा के साथ थे और अभी नहीं है। लेकिन उन्हें भाजपा के प्रति अपना रुख नरम करना पड़ेगा। जानकारो का तो यह भी कहना है कि प्रशांत कुमार जद (एकी) और भाजपा के बीच लोकसभा सीटों के बंटवारे में अच्छी भूमिका निभा सकते हैं। वे खुद बिहार के हैं और बिहार के हर चप्पे की राजनीतिक स्थिति की उन्हें जानकारी है।