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ऐसी त्रासदी जिसे रोका जा सकता था

रामलीला का 10 दिन का लंबा आयोजन 19 अक्तूबर को रावण दहन के साथ धोबी घाट जोड़ा फाटक अमृतरसर में समाप्त हुआ। लेकिन यहां तेज गति से आती जलंधर-अमृतसर डीएमयू ट्रेन ने 62 लोगों को कुचल दिया और 70 लोगों को घायल कर दिया। यह एक ऐसी घटना थी जिसे रोका जा सकता था। यद्यापि ट्रेन का चालक हार्न बजा रहा था तो भी ट्रैक पर खड़ी उत्साहित लोगों की भीड़ ने रावण दहन के कारण हो रहे पटाखों के शोर और आनंद और उत्साह के शोर के कारण इसे नहीं सुना। ट्रेन चालक ने इस घटना को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया, क्योंकि वह बहुत मुश्किल स्थिति में था। एक छोटी दूरी में तेज गति से चलती ट्रेन को रोकने से ट्रेन पटरी से पलट सकती थी और यात्रियों के जीवन को खतरे में डाल सकती थी। ट्रेन चालक का सबसे प्रमुख कर्तव्य अपने यात्रियों की सुरक्षा है। यह एक वास्तविक सच्चाई है।

पहली नजऱ में यह बुनियादी मापदंडों के साथ भीड़ को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार की विफलता को दिखाता है। पिछले कई सालों से ऐसी जगह में रामलीला का आयोजन हो रहा था जो 2000 लोगों के लिए भी पर्याप्त नहीं थी। स्थानीय पुलिस ने 5000 लोगों को वहां इक_ा होने की अनुमति दे दी। आयोजन स्थल पर आधिकारिक निरीक्षण की कमी, पर्याप्त सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के प्रावधानों की कमी जैसी अनेक कमियां देखी गई। राज्य सरकार की मशीनरी समस्याओं को सही रूप से पहचानने में नाकाम रही। जैसे की पटरियों पर भीड़ का फैलना, भीड़ की निगरानी करना, भीड़ को नियंत्रित करना, आयोजन स्थल पर प्र्याप्त चिकित्सा और सुरक्षा संसाधनों की उपलब्धता जो कि दुर्घटना रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस संबंध में पंजाब सरकार मेजिस्ट्रेट से जांच करवा रही है जो एक महीने के अंदर सच को सामने लाएंगे। आधिकारिक तौर पर मेजिस्ट्रेट जांच में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों को कानून की प्रक्रिया के तहत दंडित किया जाएगा।

भारतीय संविधान की योजना और लोकतांत्रिक शासन के कानून व्यवस्था के अनुसार भूमि राज्य का विषय है, और ट्रेन रेलवे द्वारा राज्य सरकारों से लिए गए टै्रक पर चलती है। जिसके लिए रेलवे राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को वार्षिक किराया(लगान) चुका रहा है। इसलिए यह रेलवे की अपनी संपत्ति है। इनके अलावा इन टै्रक्स पर बिना सुरक्षा के कोई जाता है तो यह रेलवे की संपत्ति का अतिक्रमण और अवैध कब्जा होगा। ऐसे करने वाले अपराधी हैं। यदि अतिक्रमणकारी ट्रेन द्वारा कुचले जाते हैं तो रेलवे इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। इस संबंध में सुरक्षा का दायित्व अतिक्रमणकारियों पर ही है। कोई आश्चर्य नहीं कि रेलवे ने अपनी संपत्ति पर अतिक्रमण के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। यही कारण है कि रेलवे इस तरह की दुर्घटनाओं में पीडि़तों के रिश्तेदारों को मुआवजे का भुगतान नहीं करता है।

रेेलवे अधिनियम, रेलवे सुरक्षा अधिनियम और रेलवे सुरक्षा के विभिन्न नियमों में कई तरह की दुर्घटनाओं के बारे में उल्लेख किया गया है जैस- मानव विफलता, ट्रैक विफलता, यांत्रिक विफलता, टकराव, अवांछित घटनाएं जैसे तबाही, बम विस्फोट आदि। अमृतसर जैसा हादसा जो कि अतिक्रमण के कारण हुआ और रेलवे क्रासिंग पर सड़क उपयोगकर्ताओं या वाहन यातायात के कारण हुआ हादसा ये सब मोटर वाहन अधिनियम द्वारा नियंत्रित होते हैं जहां रेलवे ऐसी दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार नहीं है। रेल ट्रैक को पार करने या उपयोग करने से पहले आत्म सुरक्षा, और सावधानीपूर्वक कार्रवाई को समझा जाए।

जबकि हमारी शासन व्यवस्था में जहां लोग खुद स्वामी हैं केंद्र और राज्य दोनों सरकारें पीडि़तों के परिवारों और घायलों को मुआवजे का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार हंै। पंजाब सरकार द्वारा खोए गए प्रत्येक बहुमूल्य जीवन के लिए शोकग्रस्त परिवार को पांच लाख का मुआवजा और प्रधानमंत्री (केंद्र सरकार) द्वारा ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को दो लाख का मुआवजा बहुत कम है जो हमारे लोकतंत्र और लोगों के प्रति इसकी जवाबदेही का दिखावा करता है और इसलिए यह निदंनीय है। इस तरह ही दुर्घटनाओं को राजनीतिक नहीं बनाना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को एक दूसरे पर आरोप नहीं लगाने चाहिए।

अब तक तो मरे न जाने, कितने लेकिन दोषी कोई नहीं!

अमृतसर रेल हादसे जैसे हादसे यहां लगातार  होते रहते हैं। यदि आंकड़ों पर नजऱ डालें तो पाएंगे कि इस प्रकार का एक भयानक हादसा औसतन हर साल देश में हो जाता है। उसमें सैकड़ों लोग मरते हैं पर आज तक किसी अधिकारी , कर्मचारी या राजनेता को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया गया। किसी पर हादसे की जिम्मेदारी नहीं डाली गई। ऐसा लगता है कि देश में लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी की है ही नहीं। घटना के कुछ समय बाद तक तो मामला गर्म रहता है और चर्चा भी होती है। फिर धीरे-धीरे पीडि़तों की जिं़दगी पटरी पर आ जाती है। सरकार कोई भी कार्रवाई नहीं करती। यहां तक कि उस तरह की दुर्घटना दुबारा न हो  इस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता।

यदि पिछले 10 सालों को देखें तो पता चलेगा कि इस समयावधि में 10 बड़े हादसे हुए। इनमें 500 से ज़्यादा लोग मरे और 68 लोग अंधे हो गए। लेकिन इसके लिए कोई दोषी नहीं।

गुजरात में आए भयानक भूकंप के बाद जब हमने धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) के तत्कालीन जि़लाधीश से जानना चाहा कि भूकंप जैसी आपदा से निपटने के लिए उनके क्या आपात प्रबंध हैं तो वे साहब बिगड़ गए और गुस्से से बोले-‘हमें और भी काम है, भूकंप जब आएगा तो देख लेंगे। यहां यह बता देना ज़रूरी है कि धर्मशाला का इलाका ‘सिसमोलोजिकल जोन पांचÓ में आता है जहां भूकंप आने की संभावना सबसे ज़्यादा है। 1905 में यहां आए भूकंप में पूरा धर्मशाला ध्वस्त हो गया था और इसमें 20,000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे। इस एक घटना से अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रशासन और सरकार की नजऱों में इस प्रकार के हादसों और इंसानी जानों की क्या कीमत है।

तीन अक्तूबर 2014 को बिहार की राजधानी पटना में रावण दहन के दौरान ऐसी ही घटना हुई थी। रावण का पुतला जलाने के बाद जब लोग लौट रहे थे तो वहां फाटक नंबर 10 पर एक तार गिर गई। अंधेरे की वजह से किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। इतने में किसी ने शोर मचा दिया कि यह बिजली की तार है और इसमें करंट है। इससे लोगों में भगदड़ मच गई और 33 लोग मारे गए। इस मामले में किसी अफसर की जिम्मेदारी तय नहीं हो पाई। जांच समिति भी गठित की गई पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इसी प्रकार मुंबई के एल्फिन्स्टन रोड़ रेलवे स्टेशन के फुट ओवर ब्रिज पर 29 सितंबर 2017 को मची भगदड़ में 23 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना को एक साल से अधिक हो गया है पर कोई नतीजा नहीं । इस महीने पुलिस ने इसकी जांच भी बंद कर दी। पुलिस का कहना है कि इस घटना के लिए कोई दोषी नहीं हैं यह केवल एक हादसा था।

राजस्थान में जोधपुर के मेहरानगढ़ के माँ चामुडा मंदिर में 30 सितंबर 2008 को भगदड़ मच गई थी। इसमें 216 लोगों की मौत हो गई। इस मामले की जांच हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जसराज चोपड़ा को सौंपी थी। उन्होंने अपनी रपट तीन साल बाद 2011 में सरकार को सौंपी। न्यायाधीश (सेवानिवृत) चोपड़ा ने रिपोर्ट में  बताया था कि दोषी कौन है। इसके बावजूद दो सरकारों का कार्यकाल पूरा हो गया लेकिन जांच रिपोर्ट का खुलासा नहीं हुआ और न ही किसी को दोषी करार दिया गया।

एक और रेल हादसा जो 2015 में चार अगस्त को मध्यप्रदेश में हुआ था, वह भी बहुत भयानक था। रात 11.30 हरदा जि़ले के खिरकिया और भिरंगी स्टेशनों के बीच काली माचक नदी का पानी रेलवे टै्रक पर आने के कारण यह हादसा हुआ था। इसमें कामायनी एक्सप्रेस के 11 डिब्बे और जनता एक्सप्रेस के आठ डिब्बे पानी में बह गए। इसमें 29 मुसाफिरों की जान चली गई।  रेलवे ने इस हादसे के लिए एक भी रेलकर्मी को दोषी नहीं माना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नदी में पानी का स्तर अचानक बढऩे से ट्रैक बह गया और यह दुर्घटना हुई। यह एक प्राकृतिक आपदा है।

आठ जून 2014 को हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जि़ले में लारजी पावर परियोजना से अचानक पानी छोड़े जाने से हैदराबाद में इंजीनियरिंग कर रहे 24 छात्रों की जान चली गई । एनडीआरएफ के 500 से भी ज़्यादा जवानों ने 15 दिनों तक छात्रों की तलाश की। चार साल बाद भी इसमें मरने वाले कुल 25 लोगों (एक व्यक्ति और भी था जो छात्र नहीं था) की जान जाने के लिए जिम्मेदारी तय नहीं हो पाई।

इनके अलावा और भी कई हादसे हैं जिनमें सैकड़ों जाने गई हैं पर कोई दोषी करार नहीं दिया गया। इस मुद्दे पर एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने बताया कि किसी जगह हुए किसी भी हादसे की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की होती है। डीएम और एसपी जि़ले में होने वाले हादसे के पहले जिम्मेदार माने जाते हैं। इसके बाद राज्य और केंद्र सरकार की जिम्मेदारी तय होती हैं नीति बनाना सरकार का काम है और उन्हें लागू करना प्रशासन का काम होता है। ऐसे में यह देखना ज़रूरी हो जाता है कि क्या खराब नीतियां हादसे की वजह बनी है या फिर उन्हें लागू करने में कोताही बरती गई।

मोदी सरकार के लिए सीबीआई का गौरव वापस लाने का सुनहरा मौका

याद करें 2013 को जब जस्टिस आरएम लोढा ने सीबीआई को ‘मालिक की आवाज’ कहा साथ ही इसे ‘पिंजरे में बंद तोता’ भी बताया था। अब ज़रा 2018 को याद करें ‘पिंजरे में बंद तोता तो पिंजरा भी खो चुका है और अपनी विश्वसनीयता भी।’ अब वह इस हाल में है कि इसके दो बड़े अफसरों को अपनी सेवा से मुक्त कर दिया गया है और अंतरिम निदेशक को नीतिगत फैसले लेने के अधिकार दिए गए हैं।

देश की सबसे महत्वपूर्ण जांच संस्था में क्या कुछ चल रहा है उसे बताने के लिए ‘दुर्भाग्य’ भी कहना बड़ा छोटा शब्द जान पड़ता है। इसके दूसरे बड़े अधिकारी एक दूसरे पर घूस लेने और दूसरे आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।

सीबीआई ने विशेष निदेशक (स्पेशल डायरेक्टर)राकेश अस्थाना पर एक मामले में घूस लेने के आरोप लगाए हैं जिसकी पड़ताल वे खुद कर रहे थे। अस्थाना के खिलाफ यह एफआईआर लगभग दो महीने बाद दायर की गई जब उन्होंने अपने ही अधिकारी और सीबीआई के निदेशक आलोक कुमार वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के ढेरों मामलों में शामिल होने के आरोप लगाए। केंद्रीय सतर्कता आयोग (सेंट्रल विजिलेस कमीशन) की सीबीआई के कामकाज पर नज़र रहती है। जिससे आरोपों की छानबीन के दौरान भ्रष्टाचार को रोका जा सके।

आधी रात के बाद जो कार्रवाई हुई उसमें आलोक वर्मा (सीबीआई निदेशक) और राकेश अस्थाना (विशेष निदेशक) को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया। नए कार्यकारी निदेशक एम नागेश्वर राय को कार्यकारी निदेशक बनाया गया। तेरह अधिकारियों का तबादला सीबीआई में हुआ। दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैबिलिशमेंट एक्ट में व्यवस्था है कि सीबीआई निदेशक के लिए दो साल काम करने की अवधि होती है। उसका तबादला भी एक हाईपावर कमेटी ही करेगी जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और देश के मुख्य न्यायाधीश भी होंगे। सीबीआई का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है। सुप्रीम कोर्ट का यह दूसरा सबसे बड़ा हस्तक्षेप है। वह देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के कामकाज पर नज़र रख रहा है। इसने जांच के इस काम को नियत समय में पूरा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एके पटनायक को जिम्मेदारी सौंपी। अदालत ने अंतरिम निदेशक को सिर्फ रोज़मर्रा के कामकाज तक ही  सीमित रहने को कहा है। साथ ही तमाम ब्यौरों को सीलबंद लिफाफे में मंगाया है।

ऐसे बदले हुए माहौल में न्यायिक हस्तक्षेप बहुत ज़रूरी हो गया था क्योंकि ऐसी भी खबरें आ रही थीं कि इंवेस्टीगेटिंग ब्यूरो के चार कर्मचारी आलोकवर्मा के सरकारी आवास के बाहर संदिग्ध अवस्था में देखे गए। उनको वर्मा के सुरक्षा दस्तों ने पकड़ा। हाल-फिलहाल हुए इस मामले से पहले भी सीबीआई के पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा पर आरोप थे कि उन्होंने कथित आरोपी को कई मामलों मेें मदद दी और उन्हें 2जी घोटाले से दूर रहने के लिए कहा गया। इसी तरह एक और निदेशक एपी सिंह को पिछले साल इसलिए धर-दबोचा गया क्योंकि गोश्त के निर्यातक मोइन कुरैशी से उनके संपर्क थे।

‘तहलका’ ने उन दोनों में हुई बातचीत भी प्रकाशित की थी।

जनता उम्मीद करती है कि सीबीआई का देश में बना हुआ मानक कायम रहेगा। इसका गौरव फिर से बहाल किया जाएगा। नरेंद्र मोदी सरकार के पास अब भी मौका है कि वह सीबीआई की दक्षता और ईमानदारी को सुधारें।

सरकार शुरू करे राम मंदिर निर्माण

देर से मिला न्याय भी अन्याय सा ही: योगी

राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद टाइटिल सूट पर चल रही सुनवाई की अगली तारीख सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में रखी है। इस अदालती फैसले पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, ‘और भी रास्ते हैं। सबसे बढिय़ा विकल्प सोचेंगे। कभी-कभी देर से मिला न्याय भी अन्याय जैसा होता है।’ उन्होंने कहा, ‘रामजन्म भूमि से जो जुड़ा हुआ मामला है। वह माननीय उच्चतम न्यायालय में है। न्याय में देर, कभी-कभी अन्याय के समान हो जाती है। सर्वसम्मति से हो, तो सबसे उत्तम। उसके अलावा भी और ‘विकल्प’ हैं। इन सब में जो भी उत्तम होगा वहीं कदम उठाना चाहिए।’

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने जहां विज्ञान भवन में अपने तीन दिन के प्रबोधन में उदार रूप बताया था। उसके बाद ही उन्होंने पुस्तकों के विमोचन समारोह में यह भी कहा कि यदि मंदिर नहीं बना तो महाभारत।

अभी हाल उन्होंने अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए पूजन किया। अब सुप्रीम कोर्ट ने टाइटिल सूट भूमि विवाद पर सुनवाई के लिए अगली तारीख जनवरी में तय की है। इसे लेकर अब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री भाजपा के नेता और संघ परिवार के लोग यह कहने लगे है कि अदालत ही नहीं, और भी तरीके हैं, अयोध्या में राममंदिर बनाने की राह सुगम करने के। जबकि कांग्रेस विपक्ष की इच्छा यही है कि इस विवाद का समाधान अदालत के जरिए हो, क्योंकि वही है देश हित में।

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा,’ मैं चाहता हूं, यथा शाीध्र इसका समाधान हो जाए क्योंकि राम जन्मभूमि अयोध्या उत्तरप्रदेश में है। यूपी के अंदर कानून व्यवस्था का दायित्व हमारे ऊपर है। हम इस दायित्व को निभाएंगे।

राममंदिर निर्माण जल्द शुरू करने की मांग कर रहे साधु-संतों को उन्होंने सलाह दी है कि वे बेसब्र न हों। विपत्ति में व्यक्ति को धैर्य नहीं खोना चाहिए। स्थिर मन से आने वाली किसी भी चुनौती का सामना करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (29 अक्तूबर) को आदेश दिया था कि राम जन्मभूमि -बाबरी मस्जिद भूमि विवाद की सुनवाई एक उचित बेंच को जनवरी के पहले सप्ताह में करनी चाहिए।

जनवरी में उपयुक्त बेंच सुनवाई करेगी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के सोमवार (29 अक्तूबर) के फैसले से भाजपा, आरएसएस और संघ परिवार के सदस्यों में खासी निराशा है। उत्तरप्रदेश सरकार ने चाहा था कि टाइटिल सूट पर जल्दी ही सुनवाई हो जाए। लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत ने रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद टाइटिल मुकदमे जनवरी के पहले सप्ताह में उपयुक्त बेंच के सिपुर्द करने की बात अपने आदेश में कही।

उत्तरप्रदेश के सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायाधीश एसएम कौल और न्यायाधीश केएम जोसेफ की बेंच के सामने अपनी दलील रखी। उन्होंने कहा कि सौ साल से इस मुद्दे पर विवाद चल रहा है और इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालत दीवाली की छुट्टियों के तुरंत बाद इस मामले को प्राथमिकता दे। मेहता ने आज ही सुनवाई की तारीख तय करने की जब अपील की तो मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने कहा, हमारी अपनी प्राथमिकताएं हैं। सुनवाई जनवरी में या फरवरी में हो इसका फैसला एक उपयुक्त बेंच करेगी।

सुप्रीम कोर्ट राम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद भूमि विवाद के बारे में इलाहावाद हाईकोर्ट के आदेश पर दायर याचिकाओं पर सोमवार (29 अक्तूबर 2018) को सुनवाई कर रही थी। वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन रामलला वज्रमान, अयोध्या स्थल में शिशु राम का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उन्होंने भी अनुरोध किया कि नवंबर में ही  इस मामले की सुनवाई की जाए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने 2010 के फैसले में अयोध्या के विवादित 2.77 एकड़ की भूमि को तीन हिस्सों में विभाजित करते हुए इस भूमि का एक तिहाई हिस्सा निर्मोही अखाड़ा, और उत्तरप्रदेश के सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और रामलला वज्रमान को देने की बात कही थी।

इस साल 27 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने जिसमें तब के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र, न्यायाधीश अशोक भूषण और न्यायाधीश एस अब्दुल नजीर ने अपने दो-एक के फैसले में मांगों को रद्द कर दिया था। पूरे मामले को एक बड़ी बेंच के हवाले कर दिया था। साथ ही आदेश दिया कि भूमि विवाद संबंधी अपीलों पर सुनवाई 29 अक्तूबर को की जाए।

अपील करने वालों में कुछ ने यह मुद्दा उठाया था कि अदालत 1994 के आदेश पर भी गौर करे। यह  मामला डा. एम इस्माइल फारूकी व अन्य बनाम भारत सरकार था। इसमें संवैधानिक बेंच ने कहा था कि ‘इस्लाम धर्म के प्रचार और नमाज़ (प्रार्थना) अता करने की ज़रूरी जगह नहीं है। यह कहीं भी, यहां तक खुले में भी अता की जा सकती है।

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि अयोध्या मामले में आए पिछले फैसले पर इस्माइल फारूकी फैसले का प्रभाव है जिसमें अयोध्या कानून 1994 में संवैधानिक वैधता को चुनौती देने की याचिका दायर की गई थी। इसके तहत राम जन्म भूमि -बाबरी मस्जिद कांप्लेक्स के लिए 67.703 एकड़ ज़मीन ली गई थी।

इस तर्क को खारिज करते हुए और मामले को बड़ी बेंच के हवाले करते हुए मुख्य न्यायाधीश मिश्र और न्यायाधीश भूषण ने अपने फैसले में कहा था, इन टिप्पणियों की ज़रूरत नहीं है यह बताने के लिए कि इस्लाम धर्म के प्रचार का ज़रूरी हिस्सा मस्जिद नहीं है ।

‘सरकार ही लाए कानून, मंदिर निर्माण हो’

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) ने कहा है कि मंदिर तत्काल बनाया जाए। केंद्र कानून लाकर तमाम बाधाएं दूर करे। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) में भी केंद्र सरकार के कानून लाने की बात कही है। उसका कहना है कि मंदिर निर्माण का इंतजार शाश्वत नहीं हो सकता। केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने कहा कि राम मंदिर मुद्दे पर हिंदू अब बेसब्र हो रहे हैं। मुझे तो डर है कि यदि  ंिहंदुओं ने धैर्य खो दिया तो क्या होगा?

विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा मामले की सुनवाई टालने से हमारा इरादा और पुख्ता हुआ है कि यह कोई समाधान नहीं है कि बरसों पहले दायर  याचिकाओं पर सुनवाई के लिए शाश्वत इंतजार करना पड़े। हमने केंद्र सरकार से अनुरोध किया है कि वह राम मंदिर निर्माण के लिए कानून लाए। यह संसद के वर्तमान सत्र में ही किया जाए। विहिप इसके लिए प्रचार करेगी और सभी दलों के सांसदों से संपर्क रखेगी। फिर ये सांसद भी जो एनडीए के बाहर है। वे भी कानून बनाने का समर्थन करेंगे।

उन्होंने कहा,’हमको भी लगता है कि प्रधानमंत्री को अब कानून लाकर दिखाना चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि वे ऐसा करेंगे। उन्होंने कहा कि यदि संसद के शीत सत्र में राम  राम मंदिर निर्माण संबंधी कानून नहीं पास हुआ तो 31 जनवरी को कुंभ में धर्म संसद यह कानून पास करेगी। नवंबर में तीन और चार तारीख को अखिल भारतीय संत सम्मेलन भी हो रहा है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सूत्रों का कहना है कि यदि अयोध्या मुद्दे को अदालतों के भरोसे ही छोड़ा गया तो भाजपा के लिए 2019 में लोकसभा चुनाव जीत कर जनजीवन की तमाम व्याधियों को निर्मूल करने के मिशन 2022 को पूरा कर पाना कठिन हो जाएगा। ऐसी हालत में ज़रूरी है कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने पर जल्द फैसला लिया जाए। इसी साल नवंबर -दिसंबर  में संघ परिवार का इरादा कानून या अध्यादेश का इसलिए है क्योंकि इस साल पांच राज्यों में चुनाव नवंबर-दिसंबर में ही हंै।

राजस्थान और तेलंगाना में सात दिसंबर को ही चुनाव है। लोकसभा चुनाव अप्रैल मई 2019 में हैं। छह दिसंबर को भव्य समारोह भी होने हैं।

आरएसएस और संघ परिवार पहले ही इसी आशय के प्रस्ताव पास कर चुका है। अब भाजपा नेतृत्व मंदिर समर्थक चेतना को और अधिक व्यापक करने पर जुट गया है।

केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद केंद्र में विधिमंत्री भी हैं उन्होंने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि (अयोध्या मामलों) सुनवाई जनवरी में होगी। विधिमंत्री होने के कारण मुझे कुछ भी और नहीं कहना चाहिए। क्योंकि सीमाएं हैं। देश में ऐसे लोगों की भी बड़ी तादाद है जो इस मुद्दे पर सुनवाई जल्द खत्म होने की दुआ करते हैं।

भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने कहा,’यह सारा मामला भरोसे का है। अकेले अदालत के बस में इस मुद्दे पर फैसला ले पाना कठिन है। केंद्र सरकार को इस संबंध में अध्यादेश जारी करना चाहिए। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी इस पक्ष में है कि उचित कानून लाकर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण कार्य शुरू किया जाए।

‘राम मंदिर मुद्दे पर क्यों आना चाहिए अध्यादेश’

भाजपा हर बार पांच साल पर चुनाव के ऐन मौके पर उठाती है राममंदिर का मुद्दा। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भाजपा व संघ परिवार ने मांग भी की है कि केंद्र सरकार इस संबंध में अध्यादेश या कानून लेकर आए। इस मांग पर कांग्रेस और वामपंथियों ने पूछा है कि भारत क्या एक धार्मिक देश है।

कांग्रेस के वरिष्ठ सदस्य पी चिदंबरम ने कहा कि यह भाजपा की चिरपरिचित कहानी है  जिसमें हर पांचवें साल राम मंदिर को लेकर भाजपा और संघ परिवार देश में ध्रुवीकरण करता है। जबकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। ऐसे में जब तक सुप्रीम कोर्ट फैसला नहीं लेता तब तक इंतज़ार किया जाना चाहिए। उन्होंने  कहा,’कांग्रेस का मानना है कि जब राम मंदिर का मामला अदालत में है तो उसके फैसले के आने तक हर किसी को इंतजार करना चाहिए। जब उनसे अयोध्या  में राम मंदिर निर्माण के लिए

‘अध्यादेश’ लाने की मांग पर पूछा गया तो उन्होंने कहा, इसे लाने का फैसला नौकरशाही सरकार करती है। यदि कोई अध्यादेश लाने की मांग कर रहा है तो उस पर प्रधानमंत्री को फैसला करना है। वामपंथी नेता डी राजा ने कहा हम धर्म निरपेक्ष लोकतंात्रिक देश है। अध्यादेश लाना यों भी संविधान विरूद्ध है और संसदीय लोकतंत्र के भी।

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा ने कहा कि धर्म निजी आस्था का मुद्दा है। इसे वोट बैंक की राजनीति से जोडऩा देश के खिलाफ जाता है। संवैधानिक तौर पर हम धर्म निरपेक्ष राष्ट्र हैं। जिन्होंने भी शपथ लेकर सरकार में भागीदारी की है, चाहे वे केंद्रीय मंत्री हों, मुख्यमंत्री हों उन्हें शपथ और संविधान को आदर देना चाहिए। उन्हें संतुलित होकर बात कहनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को आदेश नहीं देने चाहिए।

राम मंदिर निर्माण के लिए प्रवीण तोगडिय़ा ने भी बजाया बिगुल

अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगडिय़ा ने राम मंदिर बनाने की मांग तेज कर दी है। उन्होंने 21 व 22 अक्तूबर को लखनऊ से आयोध्या तक जुलूस निकाला, प्रदर्शन किया। इसमें शामिल लोगों की सक्रियता और नाराजग़ी को देखते हुए अयोध्या पुलिस ने इन्हें राममंदिर की ओर नहीं जाने दिया। उन्हें अयोध्या में ही रोक दिया। जुलूस में शामिल श्रद्धालुओं और प्रवीण तोगडिय़ा ने राम मंदिर बनाने का संकल्प लिया।

भाजपा पूरे बहुमत से हासिल जीत के बाद भी राम मंदिर बनाने से क्यों हिचक रही है इसकी आलोचना प्रवीण तोगडिय़ा ने की। विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंहल के साथ उनकी राम मंदिर आंदोलन में खासी भूमिका रही है।

कहा जाता है कि प्रधानमंत्री और भाजपा के नेता नरेंद्र मोदी से प्रवीण तोगडिया में काफी असहमतियां हैं, इसलिए प्रवीण तोगडिय़ा अलग थलग भी हैं। भाजपा की केंद्र और राज्यों में सरकारें बनी लेकिन साथ ही प्रवीण की सक्रियता घटती गई। उन्हें बीमार, असंतुलित और निष्क्रिय मान लिया गया। लेकिन अक्तूबर में अयोध्या में पहुंच कर जिस तरह उन्होंने राम मंदिर बनाने के लिए जुलूस निकाला और प्रदर्शन किया उससे लगा कि प्रवीण तोगडिया अब स्वस्थ हैं और राम मंदिर बनाने के लिए पूरी तौर पर संघर्षशील रहेंगे।

सवांददाताओं से बातचीत करते हुए प्रवीण तोगडिय़ा ने कहा, भाजपा को 1984 की लोकसभा में सिर्फ दो सीटें मिली थी। तब भी पार्टी का यही कहना था कि सोमनाथ मंदिर की ही तरह अयोध्या में राममंदिर बनेगा। इसके लिए कानून की ज़रूरत होगी। कानून बनाने के लिए केंद्र में भाजपा की बहुमत की सरकार ज़रूरी होगी। 2014 में तो भाजपा की केंद्र में भारी बहुमत की सरकार भी देश की जनता ने बनवाई। फिर भी मंदिर नहीं बना। यह गलत बात नहीं है।

राममंदिर अयोध्या में बनेगा इस उम्मीद में हमने दो साल इंतज़ार किया। मुझे ही पार्टी ने बदलने की कोशिश की। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं खोई। मैं लगातार सक्रिय रहा। साधु-संतों की पहली धर्म संसद 1984 में हुई थी। तब से जब भी धर्म संसद हुई सभी संतों ने कहा कि कानून के जरिए राम मंदिर बनाने का फैसला लिया जाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनका सवाल रहा है कि उन्होंने जो वादे जनता से किए वे पूरे क्यों नहीं हुए। अगर तीन तलाक पर कानून बन सकता है तो राम मंदिर बनाने पर कानून क्यों नहीं बनवाया जा सकता। उन्होंने कहा कि दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी का दफ्तर तो पांच सौ करोड़ में बन गया। लेकिन राम मंदिर की सुध नहीं ली गई। जबकि राम जी 1992 के बाद से ही तंबू में ही बैठे हैं।

देश में हर व्यक्ति की प्रतिभा, परिश्रम और प्रतिष्ठा की इज़्जत होनी चाहिए जो आज नहीं है। यह देख कर अफसोस होता है। जब भाजपा सरकार बनी थी तो सबको उम्मीद थी कि संसद में कानून बना कर राम मंदिर का निर्माण होगा। लेकिन यह मुद्दा कहीं पीछे रह गया।

राम मंदिर आंदोलन में सैकड़ों लोग मारे गए। बार-बार भाजपा ने चुनावी भाषणों में कहा कि कानून बना कर राम मंदिर बनना चाहिए। कानून बनाने के लिए जनता बहुमत दिलाए तो

राम मंदिर बने। जनता ने अपार वोटों से आपकी सरकार केंद्र और राज्यों में बनवा दी। लेकिन आप फिर खामोश हो गए। यह तो रामजी के साथ धोखा है।

राम मंदिर जन्मभूमि में बनें: भागवत

दिल्ली के विज्ञानभवन में आरएसएस प्रमुख ने कई भाषण दिए थे। उनमें उन्होंने कहा था कि आरएसएस के स्वयंसेवी किसी भी पार्टी में शामिल हो सकते हैं। वे नहीं जानते इतने लोग क्यों सिर्फ भाजपा में ही आ रहे हैं। इस पहेली का जवाब जानने के लिए मोहन भागवत को विजयदशमी पर दिए जाने वाले खुद के भाषण का इंतजार कर लेना चाहिए था। विजयदशमी पर उन्होंने आज के तीन महत्वपूर्ण राजनीतिक विवादों पर अपना भाषण केंद्रित रखा। एक शहरी माओवादी (अर्बन माओइज्म), दो-सबरीमाला मंदिर में महिला प्रवेश और तीन राम मंदिर।

उन्होंने शहरी माओवादी का उपहास तक उड़ाया। सबरीमाला पर उन्होंने कहा कि हिंदु समाज पर बार-बार बेशर्मी से हमले होते हैं। उन्होंने मांग की एक कानून बने जिससे राम मंदिर ‘जन्मभूमिÓ में बने। इतने नज़रिया, इतने विचारों और इतनी आकांक्षाओं के चलते यह आश्चर्य ही होगा यदि आरएसएस का कोई स्वयं सेवक भाजपा के लिए साथ-साथ काम न करने लगे।

भागवत ने विजयदशमी के अपने भाषण का समापन भारतीय होने और हिंदू होने के एकात्मवाद पर किया। सितंबर में दिल्ली में हुई भाषण शृंखला के दूसरे दिन भी उन्होंने अपने लंबे भाषण में इसी तर्क पर ज़ोर दिया था। उस भाषण के बाद और अब दशहरा पर उनके भाषण को सुनने वाले को चाहे वे अंदर हों या बाहर यह आश्चर्य ज़रूर होता है कि आखिर यह विदा हिंदू क्यों है।

आरएसएस के वर्तमान प्रमुख अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में तीन तरह से अलग नज़र आते हैं। एक, संगठनात्मक विश्वास जिसे आरएसएस ने हासिल कर लिया है। इसे पता है कि इसके अपने सिद्धांतों को पहले की तुलना में अब ज्य़ादा मान्यता हासिल है। इस कारण इसे बौद्धिक तौर पर पहले की तुलना में ज्य़ादा दखल देना चाहिए। दूसरे, भागवत अनुकूल होने में पटु हैं। वे राजनीतिक विवादों को साधारण और मान्य संदेशों में बदल देते हैं। यह कला ज़रूर यह तय करती है कि स्वयं सेवी तक संदेश ठीक पहुंचे और उसी समय वे प्रभावशाली तरीके से विवाद को बड़े आकार में बदल लेते हैं। सितंबर महीने में उनके भाषणों को शीर्षकों में लिखा गया। इसकी वजह यह नहीं थी कि वे आरएसएस के मूल विचारों को दुहरा रहे थे बल्कि वे विविधता की बात कर रहे थे। उनका विविधता पर बोलना यह जता रहा था कि बौद्धिक सोच के कितने करीब वे पहुंच रहे थे और उसको वे एक अलग मायना दे रहे थे। तीसरे, गोलवलकर को खारिज करके भागवत खुद को ज्य़ादा ‘बोल्डÓ  बता रहे थे। उसमें भी उन्होंने आरएसएस के स्वयंसेवको को तरजीह दी। उन्होंने इसमें भी यह अंतर रखा संदर्भ और शाश्वत दिया कि गुरू जी गलत नहीं थे। जो कुछ गुरू जी ने कहा उसका भी संदर्भ था। तर्क के इस सिद्धांत से भागवत को र्शीषकों में वह महत्ता मिली मानों वे एक सुधारक हैं साथ ही उन्हेें यह अनुमति भी मिल गई कि वे ही मूल तौर पर उसे बनाने वाले हैं।

फिर मोहन भागवत का स्थान क्या होगा? विजयदशमी पर उनका भाषण और सितंबर में उनके व्याख्यानों की शृंखला से यह साफ हो गया था कि वे राजनीतिक तौर पर समझदार हैं साथ ही राजनीतिक तौर पर आरएसएस प्रमुख तो हैं ही इसमें वे बालासाहब देवरस के ही पदचिन्हों पर चल रहे हैं। भागवत की राजनीति विविध रही है। वह कांग्रेस से बातचीत के लिए रास्ते खुले रखना चाहते हैं। उन्हें अच्छी तरह आभास है कि भाजपा की आलोचना के खतरे क्या होंगे इसलिए वे सरकार की आलोचना करने से कतराते भी नहीं। यह है वह समय जब आरएसएस के लिए ज़रूरी है कि मजबूत भाजपा सरकार हो जो तमाम किस्म के हिंदुओं को एकजुट कर सके। इसीलिए उन्होंने दशहरा भाषण में यह भी कहा कि वोट न देना अच्छा मौका नहीं है।

भागवत सिर्फ आरएसएस के कार्यकर्ता से वोट मांगने तक सीमित नहीं है बल्कि उनका तरीका सावरकर के विचारों की तरह है जहां उनके विचारों को मानने पर ज़ोर होता है। वे घुमावदार तरीके से, विवादी फिर भी साफ संदेश देते हैं कि हिंदुत्व के मायने क्या है? विजयदशमी के भाषण में भी ज्य़ादातर बातें सामान्य ही थीं मसलन सैनिक तैयारी में सुरक्षा और आत्म निर्भरता आदि जो ताकतवर संदेश था वह ‘हमÓ हिंदुओं के लिए था। महत्वपूर्ण शब्द थे ‘स्वÓ जो राष्ट्र के लिए और हिंदू पहचान के लिए था। यह बात और ज्य़ादा साफ होती है जब सितंबर में दूसरे भाषण में यह ज्य़ादा साफ होता है।

व्यंग्य ही सही, पर आरएसएस प्रमुख ने अपनी चतुराई से दूसरे भाषण पढ़ते हुए आलोचकों पर्यवेक्षकों को अपने वैविधापूर्ण भाषण से चमत्कृत कर दिया। उनके दूसरे भाषण को बड़े ही ध्यान से यदि रखा जाए तो जाहिर होता है कि वह लगातार हमारी परंपरा को याद करते हैं कि भारत के सभी धर्म हमारी परंपरा से उपजे हैं। सभी भारत से निकले संप्रदायों का जो सामूहिक मूल्य बोध है उसका नाम हिंदुत्व है। हिंदुत्व नाम है उस सामूहिक विचारधारा का जो भारत में पनपा। यानी हिंदू बहुत बाद की विचार है। वे इंडिक, भारत और आर्य से उसकी तुलना करते हैं। वे इतनी विविधता लिए हुए बाहु परंपरा और वर्ग का उल्लेख विशाल ‘हिंदूÓ राष्ट्र में करते हैं। इसका कुल उद्देश्य है कि इन परंपराओं और विधियों को ‘हिंदूÓ में समाहित करना। यानी एक ऐसी अखिल हिंदू पहचान बनाना जो विविधता से परिपूर्ण है।

हिंदुत्व की राजनीति ही बड़ी राजनीति है। इसके जरिए दो चुनौतियों के समाधान का प्रयास होता है। एक ओर तो यह वहां जन्मे संप्रदायों में ‘एकाÓ की बात करते है। जैसा मोहन भागवत जी ने सवाल-जवाब के दौर में विज्ञान भवन  में कहा था। हर एक (आदिवासी भी) हिंदू है। कुछ इसे जानते-मानते हैं और गर्व से कहते भी हैं। कुछ हैं जो इसे जानते तो हैं लेकिन वे इसे स्वीकार करनें में हिचकिचाते हैं। और कुछ हैं जो इसे जानते ही नहीं है। इस कारण बनाया जाता है ‘हिंदुत्वÓ यानी भारत में शामिल सभी भारतीय संप्रदाय आस्थाएं और विचार। फिर उन्हें ‘हिंदुत्वÓ के ताने-बाने में शामिल कर लिया जाता है और उसे एक ताकतवर राजनीतिक पहचान दी जाती है।

दूसरी ओर, इस राजनीति के जरिए यह बताया जाता है ‘हिंदुत्वÓ का धर्म (आस्था, रीति-रिवाज पूजापाठ) से कोई लेना-देना नहीं बल्कि सिर्फ राष्ट्र से है। इस कारण ‘जो हिंदू हैं कहने से हिचकिचातेे हैंÓ उन्हें प्रेरित किया जाता हैं कि वे किसी भी आस्था पर आधारित नहीं राष्ट्रीय हिंदू की पहचान ले लें। लेकिन यह एक चाल है। यदि कोई यहीं जन्मे किसी धर्म-संप्रदाय को नहीं मानता तो भी उसे मानना होगा कि गाय पवित्र है। भले ही मुंह पर कहा जाता है कि गौ रक्षकों  के समूह को सजा दी जाएगी। भागवत ने विज्ञानभवन में कहा था कि हर हाल में गाय पारपंरिक विश्वास का मुद्दा है (परंतु गाय परंपरा श्रद्धा का विषय तो है ही)। भागवत हिंदुओं की धार्मिक भावना से हिंदू-भारतीय राष्ट्रवाद को अलग नहीं कर पाते। इसी कारण उनके नवीनतम भाषण में अयोध्या की विवादित भूमि पर श्रीराम की जन्म भूमि पर भव्य राममंदिर बनाने की बात उठाई जाती है क्योंकि श्रीराम ही देश की जीवन ऊर्जा के व्यक्तित्व पुंज हैं।

विज्ञानभवन से रेशिमबाग तक वही कसिस्टैंटिली, कन्फयूजिंग राजनीति मुखर होती रहती है जो आरएसएस की कोर परियोजना है। मोहन भागवत को शायद इसलिए याद किया जाए क्योंकि वे अपनी बात साफ-साफ कहने वाले और साहसी प्रवक्ताओं मेें एक हैं। साफ और स्पष्ट कहना भी उनका शौर्य प्रयास है जिसमें वे बताते है कि हिंदुत्व का धर्म से कोई लेना-देना नहीं और इसकी तात्पर्य उस दावे से ही संबंधित है कि हिंदुत्व धार्मिक भावना और परंपरा है।

यानी आरएसएस बदल रहा है। आरएसएस बदल भी नहीं रहा है।

साभार: इंडियन एक्सप्रेस

भगवान के ही देश में हावी वोटों की राजनीति

यह दुखद है कि भगवान का अपना देस अभी हाल की प्रचंड बाढ़ में बर्बाद हुआ। अब इस पर धर्म के नाम पर निहायत गरीब प्रदेश ही बने रहने का दबाव है। यहां के लोगों को वोट की राजनीति के चलते जाति, वर्ग,लिंग और धर्म के आधार पर बांटने में तमाम राजनीतिक दल अपने वोट पाने की खातिर जुट गए हैं।

देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने देश में कभी सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे राज्य की आधी आबादी को सबरीमाला परिसर में जाने और मंदिर में दर्शन करने के आदेश दिए थे। अदालत ने चाहा था कि माहवरी में भी यदि महिला है और वह मंदिर जाना चाहे तो उसे जाने दिया जाए। सबरीमाला मंदिर के पुजारी चाहते हैं कि सदियों से चली आ रही परंपरा है कि किसी अशुद्ध महिला को मंदिर में प्रवेश न करने दिया जाए। यह कानून भगवान अय्यप्पा के नाम पर पुजारी कहते रहे हैं। उन्होंने इसके पीछे तर्कों का जो मसाला बनाया है, उसमें महिलाओं में धर्म के प्रति आस्था, विश्वास, तर्क, उनकी उर्वर  क्षमता, धार्मिक पितृत्व निषेध, लिंगीय असमानता और जाति आदि तर्क हैं। इनके चलते जहां मीडिया में टीवी, अखबारों में सार्थक बहस नहीं दिखी वहीं प्रगतिशील विचारों की पार्टियों ने अपनी वोट राजनीति के चलते अपना मुंह नहीं खोला।

अदालत ने महिलाओं पर लगी पाबंदियों को खारिज कर दिया। उसके विरोध में ऊँची जातियों की महिलाएं और पुरूष सड़कों पर आ गए। जाहिर है उनके पीछे कोई ताकत है। इस हो हल्ले के कारण निचली जातियों में भी अब खासा विभाजन हो गया है। यही भाजपा-आरएसएस परिवार चाहता रहा है। जिससे एक दिन केरल प्रदेश में उनकी सरकार बने। एक देश,एक दल, एक राज की कामयाबी केरल से ही संभव है।

अदालत ने पाबंदी हटाने की वजहें गिनाते हुए कहा था कि शताब्दियों पुरानी परंपरा को श्रद्धा का हिस्सा नही माना जा सकता। इस लिंग भेद को आधार मान कर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने कानून और संविधान के आधार पर सभी पक्षों की बातें सुनकर अपना फैसला लिया। सबसे बड़ा खतरा अब आस्था और धार्मिकता का है।

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की सहयोगी संस्था स्वदेशी जागरण मंच के लोगों ने एपेक्स कोर्ट को यह कहते हुए चेताया कि केरल में पिछले दिनों आई बाढ़ की वजह भी अदालत का यह फैसला था कि सबरीमाला में दस से पचास साल की उम्र तक की किशोरियां और महिलाएं मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं।

इसे सांप्रदाियक धार्मिक राजनीति या अंधविश्वास कहें, अदालत के फैसले के बाद राज्य में हुई घटनाओं को धर्म के अंध भक्तों ने जनता में गलत तरीके से प्रचारित किया। लेकिन राज्य में शासन संभाल रहीं वाम मोर्चा सरकार ने कुछ भी नहीं किया। कोल्लम जि़ले में एक मलयाली फिल्म अभिनेता और भाजपा सदस्य ने विरोध मार्च में शामिल एक महिला से कहा कि,’यदि मंदिर में प्रवेश किया तो दो हिस्सों में तुम्हें चीर देंगे। एक हिस्सा केरल के मुख्यमंत्री को भेज देंगे जो सबरीमाला रक्षा रैली में भाषण देता रहा है और दूसरा हिस्सा दिल्ली भेज देंगेÓ।

अय्यप्पा धर्म सेना के अध्यक्ष राहुल ईश्वर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से देव प्रतिमा की आत्मा की बेचैनी बढ़ गई है। त्रवणकोर देवासम बोर्ड जो मंदिर की देखरेख करता है उसके पूर्व अध्यक्ष गोपाल कृष्ण ने कहा कि यदि सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की लड़कियां और अधेड़ आने लगी तो यह थाईलैंड जैसा बन जाएगा। थाईलैंड कहने से उनका आशय क्या था यह तो वही साफ करें। लेकिन उन्होंने यह ज़रूर कहा कि मंदिर में महिला प्रवेश हुआ तो भगवान अय्यप्पा की ताकतें क्षीण हो जाएगी। सवाल है कि भगवान क्या इतने कमज़ोर हो सकते है? उन्होंने यह चेतावनी दी कि मंदिर तक पहुंचने का रास्ता बीहड़ जंगल के बीच से जाता है। महिला भक्तों को बाघ या आदमी उठा ले जा सकता है। ये सारे वे बयान हैं जो भगवान अय्यप्पा और उनके भक्तों को अपमानित भी करते हैं। अभी हाल में शिवसेना की केरल इकाई ने चेतावनी दी कि यदि कोई युवा महिला मंदिर में जाने का दुस्साहस करेगी तो हमारे कार्यकर्ता आत्महत्या कर लेंगे। यह कहना था सेना के सदस्य पेरिंगमाला अजी का।

कंाग्रेस और भाजपा इस मुद्दे पर एकमत हैं कि युवा स्त्रियों को मंदिर में नहीं जाने दिया जाए। कांग्रेस उदार हिंदुत्व का अपना मुखौटा छोडऩा नहीं चाहती और भाजपा भक्तों में विभाजन करके धु्रवीकरण का हर संभव प्रयास कर रही है। उधर राज्य में सरकार चला रहे वामपंथियों के सामने आगामी चुनावों में वोट न गंवाने की चाह है।

केरल में हिंदू वोट गंवाने की हिम्मत अब वाममोर्चा में नहीं है। इसलिए वह बड़े संतुलित तरीके से चलने की कोशिश में है। जबकि भाजपा उसका संतुलन बिगाडऩे पर पूरी तरह आमादा है। जिससे मंदिर में हिंसा हो तो राज्य में उस पार्टी को बदनाम किया जा सके। भाजपा अदालत के फैसले को आधार बनाते हुए परंपरा, आस्था के नाम पर पुजारियों, बड़ी जातियों को साथ लेकर सबरीमाला मंदिर में जबरदस्त विवाद जारी रखने में कामयाब रही। अब उसे पूरी उम्मीद है कि राज्य के हिंदू उसके साथ हो जाए।

सबरीमाला मंदिर आंदोलन पूरी तौर पर अंधविश्वास और राजनीति का केंद्र बना हुआ दिखा। यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।

भाजपा को माकपा ने केरल में हावी होने की राह दी

वामपंथी हमेशा किताबों में आज के मसलों का हल ढूंढने के लिए जाने जाते हैं। बंगाल, त्रिपुरा में पराज्य के बाद अब केरल में वे भाजपा के हावी होने की राह बनाने में जुटे हैं। सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भाजपा-आरएसएस ने रणनीति बना कर इस्तेमाल किया। उसका साथ कांग्रेस ने दिया जो उदार हिंदुत्व और धर्म-निरपेक्षता का मुखौटा साथ-साथ लेकर अब चलती है। माकपा और वाममोर्चा के घटकों ने दो कदम पीछे और चार कदम आगे की अपनी ही नीति को नज़रअंदाज किया। वामपंथी दलों की महिला शाखाएं वहां भाजपा-आरएसएस परिवार के बाहुबलियों के खिलाफ मंदिर में दीवार बन कर सक्रिय हो सकती थीं। वे भी पितृसत्ता, परंपरा और राजनीतिक पहल के चलते पीछे रह गईं और भाजपा-आरएसएस परिवार को अब केरल ही नहीं दक्षिण भारत में धर्म के जरिए पनपने की राह ज़रूर मिल गई।

तेलंगाना में मुख्यमंत्री केसीआर और उनकी पार्टी भाजपा के समर्थन में ही रहे हैं। आम चुनाव के पहले दोनों पार्टियों में सीटों पर तालमेल नहीं होता तो भी केरल में सबरीमाला मंदिर के जरिए हासिल जीत से भाजपा-आरएसएस परिवार तेलंगाना में इस बार जीत हासिल करने को है। पुलिस, प्रशासन में अपनी जडें जमा कर अपना दायरा बढ़ाने वाली भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं को तैनात कर सबरीमाला में लगाताार पांच दिन तक केरल की पुलिस और प्रशासन को नाकारा बताते हुए हिम्मत करके सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास करने वाली नौ महिलाओं को बिना दर्शन के वापस लौटने पर मजबूर कर दिया। मीडिया कर्मियों के साथ बदसलूकी हुई। सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवमानना  खुलेआम पुलिस-प्रशासन ने की। राज्य सरकार और राज चला रही पार्टी और उसके नेता भी इसमें लाचार ही दिखे। कांग्रेस और वामपंथियों ने वोट-राजनीति के चलते यह भी ठीक वह भी ठीक को अपनाया। देव दर्शन को आई महिला श्रद्धालु बिना दर्शन लौट गईं। पुलिस और प्रशासन पूरी तौर पर नाकाम रहा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना होती रही।

सुप्रीमकोर्ट ने फैसला दिया था मंदिर के उस पारंपरिक नियम के खिलाफ जिसके तहत 10 साल से ऊपर और 60 से नीचे तक की महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं। इस नियम का केरल में महिलाएं पालन करती हैं। मंदिर  के पुजारी और मंदिर चलाने वाला बोर्ड कथित नियम में बदलाव का विरोधी है। यानी कोई भी महिला यदि उसे मासिक स्राव होता है और वह दस साल से ऊपर और 60 साल से नीचे है तो वह इस मंदिर में नहीं जा सकती। केरल के पुलिस प्रशासन और राज्य सरकार ने मंदिर में नर-नारी समान अधिकार  के तहत सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनसुनी की। कम तादाद में मंदिर में पुलिस की मौजूदगी, किसी भी कार्रवाई से प्रशासन अधिकारियों में हिचक और राज्य सरकार की मायूमी 21वीं सदी के भारत के विकास की असलियत बयान करते हैं।

राज्य के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन बार बार यह ज़रूर कहते रहे कि जो महिलाएं देवदर्शन को जाना चाहती हैं उन्हें पुलिस पूरी सुरक्षा देगी। लेकिन पुलिस के अधिकारी कतई तैयार नहीं थे कि वह लाठीचार्ज करें या नारेबाजी कर रहे, छींटाकसी कर रहे और भद्दे इशारे कर रही उत्तेजित भीड़ को हटा  सकें। मंदिर में प्रवेश करने वाली महिलाओं को पूरी सुरक्षा प्रदान कर सकें। पांच दिन खुले मंदिर मेें नौ महिलाओं ने पुलिस सुरक्षा में कोशिश की। लेकिन शोर-शराबे और धमकियों के चलते वे लौटती रहीं।

अभी हाल में राज्य में आई बारिश और बांधों को खोल देने से हुई बाढ़ में केरल में बड़े पैमाने पर बर्बादी हुई। इस भयानक त्रासदी को भगवान का प्रकोप बना कर भाजपा-आरएसएस परिवार के समर्थकों ने सबरीमाला में महिलाओं के सुप्रीमकोर्ट के प्रवेश के आदेश को भी संभावित विपदा की वजह बताते हुए खूब प्रचारित किया। जिस पर केरल के आधे घर यानी लड़कियों और महिलाओं ने भरोसा कर लिया।

मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के लिए इस आंदोलन को हल करने की बजाए  ‘नव केरलÓ  निर्माण के लिए खाड़ी के देशों में काम कर रहे भारतीयों लोगों से धनराशि की व्यवस्था करनी ज्य़ादा ज़रूरी थी। उन्होंने उद्योगमंत्री ईपी जयराजन को ज़रूर इस बड़ी जिम्मेदारी से निपटने का मौका सौंपा। यह फैसला खासा चुनौती भरा था। उद्योगमंत्री उसमें नाकाम रहे। वजह माकपा के आला पदाधिकारियों की वोटों की

राजनीति। केरल की भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस नेताओं ने सुप्रीमकोर्ट के फैसले का विरोध अपनी प्रचार रैलियों में किया। देश मेें आज भी केरल ऐसा प्रमुख राज्य है जहां सबसे ज्य़ादा दहेज की मांग होती है। कहा जाता है कि यहां मातृसत्तात्मक समाज है। लेकिन देश की आज़ादी के बाद ऐसा लगा नहीं। कांग्रेस और माकपा ने महिलाओं की परंपरावादी सोच को बदलने के लिए प्रेरित नहीं किया।

सुप्रीमकोर्ट ने चार साल की सुनवाई के दौरान राज्य की तमाम राजनीतिक, धार्मिक-सांस्कृतिक सामाजिक संगठनों से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर बात की थी। लेकिन अब उसके ही फैसले को ताक पर रख कर भाजपा-आरएसएस ने यह भांपा कि इस विवाद से तो राज्य में हिंदुत्व जगाया  जा सकता है। साथ ही पूरे दक्षिण भारत में जमा जा सकता है।

भाजपा के महासचिव के सुरेंद्रन ने कहा, ‘पुलिस या कोई भी पार्टी इस मंदिर प्रवेश के महिलाओं के अभियान को समर्थन नहीं दे सकती। हमारी पार्टी मूक दर्शक नहीं।’  यह पूरा मामला पारंपरिक धार्मिक विश्वास का है।

समाचारों के अनुसार कांगे्रस के राज्य अध्यक्ष के सुधाकरण ने तो प्रदर्शनकारियों का पूरा साथ दिया। नीलाकल में वे तमाम विरोध प्रदर्शनों में रहे जिनमें हिंसा भी हुई।

ऐसा लगता है कि राज्य सरकार ने मंत्री, नौकरशाह और पुलिस को सख्ती न बरतने की हिदायत थी। यह यदि मान भी लें कि प्रशासन मंदिर परिसर में लाठीचार्ज, आंसूगैस, फायरिंग से बच रहा था जिससे जनता में व्यापक विरोध न हो तो दूसरी राजनीतिक पार्टियां मसलन कांगे्रस और भाजपा ने उसे सहयोग क्यों नहीं दिया।

बहरहाल, राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार एक लंबे अर्से से भाजपा को केरल में एक ऐसे मुद्दे की तलाश भी थी जिसके जरिए वह राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण हो। सबरीमाला से उसे एक मौका मिल गया। इसमें राज्य के मंदिरों के पुरोहितों, बड़ी जातियों, महिलाओं और संघ परिवार के लोगों ने सक्रिय भूमिका निभाई।

एक आकलन के अनुसार केरल में कांग्रेस के पिछले राज से ही पांच हज़ार शाखाएं नियमित लगती हैं। केंद्र में भाजपा सरकार के आने के बाद यह संख्या और बढ़ी है। राज्य की वाम मोर्चा सरकार या माकपा ने इसके समानांतर शिक्षा-सुरक्षा-अनुशासन केंद्र न तो खोले हैं और न कोई योजना है। ऐसी हालत में प्रतिरोध के अभाव में केरल से भाजपा सांसदों की जीत की संभावना ही बढ़ रही है।

जानकार सूत्र यह संकेत देते हैं कि दक्षिण भारत में भाजपा ने अपना पांव प्रसारने के लिए नैय्यर समुदाय को साथ लिया है। केरल में नैय्यर बारह फीसद हैं जबकि ईझावा 21 फीसद हैं। भाजपा के इशारे पर भारत धर्म जनसेना नाम से ईझावा समुदाय के वेल्लापल्ली नटेशन ने एक दल बना लिया है। भाजपा का वोट शेयर जो 2011 विधानसभा चुनावों में मात्र 6.1 फीसद था। वह 2016 में बढ़ कर 15.3 फीसद हो गया। यानी पहले कांग्रेस, वामपंथियों में ऊंची जातियों और नैय्यर समुदाय के जो वोट बंटा करते थे वे अब भाजपा की ओर जा रहे हैं। जिसमें ईझावा भी सबरीमाला में भक्त विवाद के बाद से दिलचस्पी लेने लगे हैं।

देश में कभी सबसे ज्य़ादा शिक्षित, सुसंस्कृत और प्राकृतिक तौर पर सुंदर माना जाने वाला केरल अब दूसरे राज्यों की ही तरह अभी हाल के प्रलय के बाद तो अविकास, अशिक्षा, कुपोषण का राज्य बनता जा रहा है। यहां भी अब 21वीं सदी में ईश्वरीय ताकतों में जनता का भरोसा बढ़ाया जा रहा है। मंदिर में स्त्री-

पुरु ष समान तौर पर न जा सकें जैसे रूढि़वादी कायदे-कानून लोगों के दिमाग में ठूंसे जा रहे हैं क्योंकि इससे राजनीतिक लाभ भाजपा-आरएसएस परिवार और कांग्रेस को आने वाले दिनों में मिलता रहेगा। जनता को स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के वादों के साथ लोकतंत्र में आस्था रखने और अपना प्रतिनिधि चुनने के लुभावने अवसर दिए जाते रहेंगे।