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अब तक का भारत का सबसे बढिय़ा प्रर्दशन

बहुत लम्बे आरसे के बाद यह पहला मौका था जब पोडियम पर दो भारतीय खिलाड़ी एक साथ खड़े थे। मंजीत स्वर्ण पदक और जिनसन जॉनसन रजत पदक के लिए। उधर पीवी सिंधु बैडमिंटन के फाइनल में हार गयी जिससे उन्हें रजत से संतोष करना पड़ा। भारत के एशियन खेलों में अब तक 9 स्वर्ण हो गए हैं। पुरुष हॉकी के पूल ‘ए’ के आखिरी मैच में भारत ने श्रीलंका को 20-0 से बुरी तरह हराया। मैच में कभी भी श्रीलंका भारत के लिए चुनौती पेश नहीं कर पाया। भारत एशियाई खेलों के 10वें दिन 9 स्वर्ण, 18 रजत और 22 कांस्य पदकों के साथ 9वें स्थान पर काबिज है।

एशियाई खेलों में भारत को नौवां गोल्ड मेडल मिला पुरुष वर्ग के 800 मीटर ट्रैक में। मंजीत सिंह ने स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया। उनके साथ भारत के ही जिनसन दूसरे स्थान पर रहे और सिल्वर मेडल भी देश के लिए जीता। शुरुआत में मंजीत पीछे थे लेकिन अंत में उन्होंने पूरा जोर लगाते हुए सभी अन्य धावकों को पीछे छोड़ दिया। मंजीत ने 1.46.15 का समय लेते हुए अन्य प्रतिभागियों को कोई मौका नहीं दिया।

शुरुआत में पीछे चल रहे मंजीत चौथे स्थान पर थे। अंतिम 50 सेकण्ड में उन्होंने अपना पूरा दमखम लगाते हुए गोल्ड जीतकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। जिनसन जॉनसन भी शुरू में तीसरे नम्बर पर थे लेकिन अंतिम समय में उन्होंने अपना अभियान दूसरे स्थान पर समाप्त किया।

बैडमिंटन फाइनल में पीवी सिंधु ने सिल्वर मेडल जीता। वे फाइनल में ताइ चु यिंग से हार गई। सिंधु को भले ही हार मिली लेकिन वो एशियाड में सिल्वर मेडल जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैं।

भारत ने महिला कंपाउंड आर्चरी में भी सिल्वर मेडल जीता है। वे फाइनल में वलर््ड चैंपियन साउथ कोरिया से हार गए। भारतीय टीम आखिर पलों मे लडख़ड़ा गई और 231-228 से हार गई। भारत को आखिरी शॉट में 10 की जरूरत थी लेकिन वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए। पुरुष आर्चरी टीम को भी फाइनल में हार मिली और वो गोल्ड से चूक गई।

उधर पुरुष आर्चरी टीम को भी सिल्वर मेडल मिला। इसके पहले हिमा दास और दुती चंद दोनों ने महिला 200 मीटर के सेमीफाइनल में प्रवेश कर लिया है। दुती ने अपनी हीट में टॉप करके क्वालीफाई किया वहीं हिमा ने लकी लूजऱ के तौर पर क्वालीफाई किया।

पुरुष टेबल टेनिस टीम ने भी ब्रॉन्ज मेडल जीतकर इतिहास रचा। भारत ने पहली बार एशियन गेम्स में मेडल जीता। वहीं कुराश में पिंकी बलहारा ने सिल्वर मेडल जीता और मलाप्रभा को ब्रॉन्ज मेडल हासिल हुआ। अनस, पूवाम्मा, हिमा दास और राजीव अरोकिया ने मिक्सड रिले रेस में सिल्वर मेडल जीता जबकि 4 गुना 400 मीटर रिले रेस में भी भारत ने रजत ही जीता।

कबड्डी में भारत का ताज छिना

भारतीय पुरुष कबड्डी टीम पहली बार बिना स्वर्ण पदक के घर लौटी है। 1990 से लेकर 2014 तक भारत ने पुरुष कबड्डी में सात स्वर्ण पदक जीते हैं। ईरान के हाथों भारत की सेमीफाइनल में हार से आम दर्शक सदमें में हैं। आखिर भारतीय कबड्डी को हुआ क्या है? क्या यह टीम में एक ‘अंहकार’ के कारण हुआ या फिर टीम के चयन में कुछ कमी रह गई।

भारत की कबड्डी टीम बहुत मज़बूत मानी जाती है। पर इस बार टीम की रक्षा पंक्ति काफी कमज़ोर साबित हुई। इनमें सुरजीत सिंह और सुरेंद्र नड्डा का न होना काफी भारी पड़ गया। ये दोनों खिलाड़ी ऐसे हंै जिन्होंने प्रो कबड्डी लीग और 2016 विश्व कप में शानदार प्रदर्शन किया था। इनके स्थान पर लिए गए राजू लाल चौधरी निरंतर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए। बीच-बीच में वह अच्छा खेले पर एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में तो खिलाड़ी को हमेशा ही अच्छा खेलना पड़ता है। असल में यह टूर्नामेंट किसी प्रकार के प्रयोग के लिए नहीं था। यहां भारत को अपनी सर्वश्रेष्ठ टीम लेकर ही आना चाहिए था।

दाएं छोर को सुरक्षित करने वाला मोहित छिल्लर शुरू से ही कमज़ोर साबित हो रहा था। बांग्लादेश जैसी टीम के खिलाफ भी वह प्रभावित नहीं कर पाया। यह पहला मैच था। टीम के साथ गए पदाधिकारियों को यह संकेत समझ लेना चाहिए था। पता नहीं वे लोग क्या अंदाजा लगाए बैठे थे। वैसे तो 2016 के विश्व कप में जब कोरिया ने भारत को 34-32 से हरा दिया था तो यह स्पष्ट हो गया था कि अब भारत का मुकाबला करने के लिए ईरान और कोरिया तैयार हैं। यदि लोगों को याद हो तो उस टूर्नामेंट के फाइनल में भी ईरान ने आधे समय तक बढ़त ले रखी थी। उस समय अजय ठाकुर ने शानदार ‘रेड्स’ डाल कर बहुत मुश्किल से टीम को जिताया था। भारत के लिए वह एक ‘वेकअप काल’ थी। पर भारत नहीं जागा।

अजय ठाकुर की चोट

भारतीय टीम का पूरा दारोमदार अजय ठाकुर पर था। एक बार चोट के कारण जब उन्हें बाहर जाना पड़ा तो पूरी टीम जैसे बिखर सी गई। इसके साथ ही यदि कोरिया के खिलाफ मैच की बात करें तो भी यह संकेत साफ थे कि भारत केवल अपने पुराने नाम के भरोसे नहीं जीत सकता। पूल मैच में कोरिया से हार में भी हमारी रक्षा पंक्ति का लचर खेल दिखा था। एक टीम जो पिछले 28 साल से नहीं हारी थी उसके लिए यह हैरानी भरा था कि उनके पास किसी खिलाड़ी का स्थान लेने वाला कोई दूसरा खिलाड़ी नहीं था।

एक कमी जो टीम में देखने को मिली वह थी अनुभव की। टीम में प्रदीप नरवाल, मोनू गोयट और राहुल चौधरी जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी थे, पर उनमें अनुभव की कमी साफ नजऱ आई। यह भी साबित हुआ कि प्रो कबड्डी लीग में खेलना और एक बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में खेलने में ज़मीन आसमान का अंतर है। इन खिलाडिय़ों को अभी उस स्तर पर खेलना सीखना होगा। यदि आप दुबई में आयोजित कबड्डी मास्टर्स पर नजऱ डालें तो पाएंगे कि इन खिलाडिय़ों ने वहां उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं किया जितना प्रो कबड्डी लीग में किया था। असल में भारत को एक संतुलित टीम चाहिए थी। ऐसी टीम जिसमें युवा और अनुभवी दोनों ही तरह के खिलाड़ी होते। टीम में पूर्व कप्तान अनूप कुमार और मनजीत छिल्लर की कमी महसूस की जा रही थी।

प्रो कबड्डी प्रीमियर लीग ने इस खेल को दुनिया भर में लोकप्रिय बना दिया। लोकप्रियता के साथ इसे पूरी गंभीरता से भी लिया जाना ज़रूरी था। इसी वजह से कोरिया और ईरान जैसी नई मज़बूत टीमें तैयार हो गई। भारत, पाकिस्तान और बंाग्लादेश जैसी टीमें जहां कबड्डी पारंपरिक रूप से खेली जाती है, अब पिछड़ते दिख रहे हैं। नए देशों के खिलाडी जब प्रो कबड्डी जैसी प्रतियोगिताओं में भारत या पाकिस्तान के खिलाडिय़ों के खिलाफ खेलते हैं तो उनकी सारी तदवीरें सीख लेते हैं। फिर वे भारत के खिलाफ अपनी रणनीति तैयार कर लेते हैं।

विश्व कप के बाद आयोजित कबड्डी मास्टर्स में कोरिया और ईरान ने अपनी दोयम दर्जे की टीमें उतारी थी। इन पर जीत में भारत को कोई कठिनाई नहीं हुई। इस वजह से भारत यह अनुमान नही लगा पाया कि इन दोनों देशों ने पिछले दो सालों में अपना स्तर कितना बढ़ा दिया है।

भारत को अब गंभीरता के साथ सोचने की ज़रूरत है। यह ठीक है कि इस टीम के आत्मविश्वास को एक झटका सा लगा है, लेकिन अभी सभी कुछ खत्म नहीं हुआ। इस हालत में उन्हें सही टीम तैयार करनी होगी। एक सही ‘कंबीनेशन’ के साथ। उन्हें यह भी मानना होगा कि अब कोई भी मुकाबला आसान नहीं है। भविष्य में बाकी देश और मज़बूत हो कर उभरेंगे। भारत को अपनी पुरानी निर्धारित पद्धति में नए हालात के अनुसार बदलाव भी करना पड़ेगा। नई रणनीति इज़ाद करनी होगी।

कबड्डी में खोए गोल्ड की कुछ भरपाई कर दी एथलीटों ने

कबड्डी और पुरुष हाकी के सेमीफाइनल में हारने की पीड़ा पर इस बार देश के एथलीटों ने काफी हद तक मरहम लगाने की काम किया है। विदेश की धरती पर 19 पदक भारत ने एथलेटिक्स में कभी नहीं जीते। भारत में दो बार आयोजित इन खेलों में 1951 में भारत ने 31 पदक जीते जिनमें 10 स्वर्ण पदक थे देश के लिए इतने पदक एथलेटिक्स में फिर कभी नहीं आए। 1982 में नौवें खेल फिर दिल्ली (भारत) में आयोजित किए गए। इस बार भारत ने एथलेटिक्स में कुल 20 पदक पाए जिनमें से चार स्वर्ण थे।

जहां तक स्वर्ण पदकों का प्रश्न है भारत ने 1951 के बाद 1978 बैकांक में सात, 1998 बैकांक में सात , 2002 बुसान में सात और 2018 में फिर सात स्वर्ण पदक जीते।

इस बार जकार्ता में जब देश ईरान के हाथों भारतीय पुरुषों की कबड्डी टीम की 18-27 की हार से उबरने की कोशिश में था तो उसी समय भारत के तेजिंदर पाल सिंह तूर ने गोला फैंक स्पर्धा में 20.75 मीटर गोला फैंक कर भारत को एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक दिला दिया। इसके बाद युवा एथलीट नीरज चोपड़ा ने भाला फैंक प्रतियोगिता में 88.05 मीटर तक भाला फैंक कर देश की झोली में दूसरा स्वर्ण पदक डाला।

इससे पूर्व भारतीय पहलवान बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट ने कुश्ती मुकाबलों में दो स्वर्ण पदक जीत कर देश पर परचम लहराया। देश के युवा निशानेबाज भी पीछे नहीं रहे। सौरव चैधरी ने 10 मीटर एयर पिस्टल निशानेबाजी में स्वर्ण पदक पर निशाना साधा तो महिला निशानेबाज राही सरनोबत ने 25 मीटर एयर पिस्टल में यह कमाल कर दिखाया। भारत को एक स्वर्ण पदक नौकायन और एक टेनिस के पुरुष युगल मुकाबलों में मिला। 30 अगस्त तक भारत की झोली में 13 स्वर्ण, 21 रजत और 25 कांस्य पदक यानी कुल 59 पदक पड़ चुके थे। इन 13 स्वर्ण पदकों में से सात स्वर्ण पदक अकेले एथलेटिक्स में आए थे। देश के लिए स्वपना बर्मन ने हेप्टथलॉन स्पर्धा में इतिहास रचा वह शाटपुट, हाई जंप और जैवलिन थ्रो में पहले लंबी कूद में दूसरे और 800 मीटर में तीसरे स्थान पर रही। उसने कुल 6026 अंक अर्जित किए जो उसे स्वर्ण पदक दिलाने के लिए काफी थे। इसके साथ ही अरपिंदर पाल सिंह ने त्रिकूट में 6.77 मीटर छलांग लगा कर देश को स्वर्ण पदक दिलाया।

पुरुषों की 800 मीटर दौड़ बहुत ही रोमांचक रही। इसके फाइनल में दो भारतीय धावक भी थे। इनमें जिंनसन जॉनसन को स्वर्ण पदक का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। दूसरे धावक मनजीत सिंह पर लोगों की निगाहें भी नहीं थी। दौड़ शुरू होते ही भारत के दोनों धावक पिछड़ गए लगते थे। मंजीत तो छठे स्थान पर था। आखिर मोड़ तक आते-आते भारतीय धावक आगे बढ़े। 750 मीटर की दौड़ पूरी होने तक मंजीत से पदक की कोई आस नही लग रही थी, लेकिन अंतिम 50 मीटर में मंजीत ने जो फर्राटा लगाया उसने न केवल सभी विदेशी धावकों को पीछे छोड़ दिया अपितु वह अपने साथी जिनसन जॉनसन को भी पछाड़ कर सोने का पदक ले उड़ा। जॉनसन को दूसरा स्थान मिला।

1500 मीटर में भी इन दोनों ने काफी जोर लगाया लेकिन इस दौड़ में जॉनसन की बढ़त को कोई कम नहीं कर सका और स्वर्ण पदक भारत के जॉनसन के गले की शोभा बना। मंजीत सिंह को चैथा स्थान मिला।

पुुरुष हाकी में निराशा

पूल मैचों में रिकार्ड तोड़ गोल दागने वाली भारतीय पुरुष हाकी टीम सेमीफाइनल में अंतिम क्षणों में सब कुछ ही गंवा बैठी। अंतिम पलों तक 2-1 की बढ़त पर चल रही भारतीय हाकी टीम ने मलेशिया के खिलाफ अंतिम पलों में पेनाल्टी कार्नर दे दिया और मलेशिया ने इसे गोल में डाल कर 2-2 की बराबरी हासिल कर ली। पर पेनाल्टी शूट आउट में 6-7 से हार कर न केवल स्वर्ण पदक की दौड़ से बाहर हो गया, बल्कि उसके 2020 के टोक्यो ओलंपिक में टीम के भाग लेने पर भी एक प्रश्न चिन्ह लग गया। ओलंपिक में खेलने के लिए अब उसे क्वालीफाइंग टूर्नामेंट खेलने होंगे। पुरुष तो दौड़़ ये बाहर हुए लेकिन महिलाएं चीन को 1-0 से हरा कर फाइनल में प्रवेश कर गईं। फाइनल में उसकी टक्कर जापान से है जिसने पांच बार के चैंपियन दक्षिण कोरिया को 2-0 से परास्त का दिया।

पुरुष हाकी टीम ने पूल के पांच मैचों में कुल 76 गोल किए थे, जबकि उनके खिलाफ मात्र तीन गोल हुए। महिलाओं ने पूल में खेले चार मैचों में 38 गोल किए जबकि उनके खिलाफ मात्र एक गोल हुआ। इसी दौरान पुरुषों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर के एक मैच में सर्वाधिक गोल करने का अपना रिकार्ड भी बेहतर किया 1932 में लास एजिंलेस ओलंपिक में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया था। इस बार उन्होंने हांगकांग को 26-0 से परास्त का नया रिकार्ड कायम किया है।

खेलों का छठा दिन देश के नौकायन के इतिहास में नया अध्याय लाया। चार सदस्यों वाली रोईंग टीम ने स्वर्ण पदक जीत लिया। इस टीम में स्वर्ण सिंह, दत्तू मोकनल, सुखमीत सिंह और ओमप्रकाश शामिल थे। इसके अलावा दुष्यंत चौहान ने लाइट वेट सिंगल स्कल मुकाबले में कांस्य और भगवान सिंह और रोहित कुमार ने लाइट वेट डबल स्कल में कांस्य पदक जीते। इस तरह रोइंग में उस दिन एक स्वर्ण और दो कांस्य पदकों के साथ भारत को तीन पदक मिल गए।

टेनिस में रोहन बोपन्ना और दिविज शारण ने देश को स्वर्ण पदक दिलाया। निशानेबाजी में हिना सिंधू ने 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा का कांस्य पदक जीता। कबड्डी के लिए यह दिन भी खराब रहा। भारतीय महिला टीम फाइनल में ईरान से पिट कर रजत पदक ही जीत पाई। टेनिस में ही एक कांस्य पदक प्राजनेश गुन्नेस्वरण को मिला। इसके साथ ही देश के 25 पदक हो गए।

सातवां दिन स्क्वैश का रहा। इस दिन भारत के सौरव घोषाल, दीपिका पालीकल और जोशना चिनअप्पा ने कांस्य पदकों पर कब्जा जमाया। पर इस दिन असली खबर एथलेटिक्स के मैदान से आई जहां तेजिंदर पाल सिंह तूर ने 20.75 मीटर गोला फेंक कर देश को एथलेटिक्स का पहला स्वर्ण पदक दिलाया।

घुड़सवारी में भारत को रजत पदक दिलाया फौद मिजऱ्ा ने । ध्यान देने की बात यह है कि 1982 के दिल्ली एशियाड के बाद घुड़सवारी में भारत का यह पहला व्यक्तिगत पदक है। इसके बाद मिजऱ्ा, राकेश कुमार, आषीश मलिक और जतिंदर सिंह ने घुड़सवारी की टीम स्पर्धा में भी रजत पदक जीत लिया। ट्रैक से एक अच्छी खबर आई और हिमा दास ने राष्ट्रीय रिकार्ड तोड़ते हुए महिलाओं की 400 मीटर दौड़ में रजत पदक जीता। मोहम्मद अनास ने भी 400 मीटर की दौड़ में रजत पदक जीता। ट्रैक का तीसरा रजत दुत्तीचंद ने 100 मीटर की दौड़ में पाया। 100 मीटर महिला दौड़ में यह पदक 20 साल के बाद आया है। इसके साथ देश को दो कांस्य पदक ब्रिज में मिले।

अगले दिन भारत को सायना नेहवाल से फाइनल में पहुंचने की उम्मीद थी पर वह ताय तेजु यिंग जैसी मज़बूत दीवार को नहीं लांघ पाई और उसे कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा। देश को 11 वां रजत पदक धरुन अप्पासामी ने पुरुषों की 400 मीटर बाधा दौड़ में दिलवाया। उसने 48.96 सेकेंड का समय निकाल कर राष्ट्रीय रिकार्ड भंग किया। यह दिन सुधा सिंह का भी था। उसने महिलाओं की 3000 मीटर स्टीपल चेज़ में दूसरा स्थान प्राप्त कर रजत पदक जीत लिया। जबकि लंबी कूद का रजत पदक भारत की नीना वराकिल ने पाया। भारत के शिविर में उस समय खुशी की लहर दौड़ गई जब नीरज चोपडा ने आशा अनुसार प्रदर्शन करते हुए भाला फेंक स्पर्धा में 88.06 मीटर की थ्रो के साथ राष्ट्रीय रिकार्ड तोड़ते हुए स्वर्ण पदक जीत लिया।

खेलों के 10 वें दिन पीवी सिंधू से स्वर्ण पदक की आशा टूट गई और यिंग के खिलाफ वह आसानी से हार गई। उसे रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा। उधर भारतीय पुरुष और महिला तीरांदाजी टीमों के तीर बहुत नाजुक समय पर निशाना चूके और उन्हें रजत पदक ही हासिल हुए।

नए खेल ‘कुराशÓ में 53 किलोग्राम भार वर्ग में पिंकी बलहारा ने चांदी का मेडल पाया। इसी स्पर्धा के पुरुष वर्ग में एमवाई जाधव ने कांस्य पदक पाया। उस दिन का चमत्कारी प्रदर्शन तो पुरुषों की 800 मीटर दौड़ में हुआ जहां भारत में मंजीत सिंह ने अप्रत्याशित रूप से स्वर्ण पदक जीत लिया। लगभग 750 मीटर तक पदकों की दौड़ से बाहर लग रहे मंजीत ने अंतिम 50 मीटर में अपने साथी जिनसन जॉनसन समेत चार धावकों को काटकर यह पदक जीता। इस स्पर्धा का रजत पदक जिनसन जॉनसन को मिला। भारत की 4 400 मीटर मिश्रित रिले की टीम भी रजत पदक लेने में कामयाब रही। इस दौड़ में भारत की ओर से मोहम्मद अनास, हिमादास, पुनामा राजू और राजीव अरोकिया ने भाग लिया था।

तुम्हें याद हो कि न याद हो

एक पुरानी हिंदी फिल्म बसंत बहार (1956) के गाने के बोल याद आ रहे हैं ‘सुर न सजे क्या गाऊं मैं, सुर के बिना जीवन सूना…’ कितना सही कहा है। सुर के बिना जीवन में कुछ नहीं सिवाए एक सूनेपन के, एक खला है। तभी तो भारतीय सिनेमा की आत्मा भी इन सुरों में ही समा कर रह रही है।

हमारे देश में फिल्मों और गानों का चोली दामन का साथ रहा है। शुरू शुरू में तो कुछ फिल्मों की कहानी ही गानों के माध्यम से कही गई। 1932 में बनी फिल्म ‘इन्द्रसभा’ में तो तकरीबन 70 गाने थे लेकिन धीरे-धीरे गाने कम होते गए और संवाद मुख्य भूमिका में आते गए। गाने फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने और मनोरंजन प्रदान करने की भूमिका निभाने लगे।

1970 व 80 के दशक भारतीय फिल्म संगीत का स्वर्णिम युग रहा है। जब साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आज़मी, शकील दायुनी, हसरत जयपुरी, शैलेंद्र, राजामेहदी अली खान और जानेसार अख्तर जैसे गीतकार, जैसे खून-ए-जिगर में कलम डुबोकर गीत लिखते थे। उसी समय ओपी नैय्यर, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, सरदार मलिक, हेमंत कुमार, एस डी बर्मन, नौशाद, सलिल चौधरी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्याण जी आन्नद जी जैसे संगीतकार उन्हें संगीत में पिरोकर उनकी माला सजाते थे। तलत मेहमूद, मन्ना डे, मुहम्मद रफी, लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, आशा भोंसले, मुकेश किशोर दा जैसे फनकारों की आवाज़ सोने पर सुहागे का काम करती थी।

उस समय के गाने मुख्यता रागों पर आधारित थे और अपनी लेखनी की वजह से फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने का काम करते थे।

पहले फिल्म की कहानी लिखी जाती थी उसके बाद ज़रूरत अनुसार गानों की ‘सिचुएशन’ निकालते थे। फिर हालात व माहौल के मुताबिक गाने लिखवाए जाते थे। ये गाने कहानी का एक हिस्सा बनकर फिल्म को चार चांद लगा देते थे।

यही वजह है कि वे गाने आज भी अक्सर हमारे होठों पर आ ही जाते हैं।

बारीकी से अध्यन करें तो पता चलता है कि ये गाने फिल्म में कई तरह की भूमिका निभाते थे। जैसे नायक और नायिका का चरित्र उभारने के लिए। ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा’, ‘ठाड़े रहिओ ओ बांके यार’ और ‘मौसम है आशिकाना’ जैसे गाने अगर न होते तो मीना कुमारी शायद कभी पाकीज़ा नहीं बन पातीं।

यही बात ‘उमराव जान’ व ‘मिजऱ्ा गालिब’ जैसी फिल्मों पर भी लागू होती है।

नायक नायिका की मनोदशा को कुछ ही शब्दों में प्रभावपूवर्क बयान करना, गाने के ही बस की बात है। फिल्म ‘हीर रांझा’ में ‘ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं’ जैसे गाने से चार मिनट में नायक की मनोदशा का वर्णन शायद संवाद द्वारा संभव ही नहीं था। जब जब फूल खिले में ‘परदेसियों से न अखियां मिलाना’ हो या ताज महल का ‘जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा’ जैसे गीत इस बात का जीता जागता सूबूत हैं। मन में अचानक उठी उमंग की परिणिति फिल्म गाइड के गाने ‘आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है’ में है। हकीकत के गाने ‘हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा’ में फौजी जवानों की मनोदशा का सजीव चित्रण करता है। जिसने दर्शकों को रु ला के रख दिया था।

कुछ गानों का इस्तेमाल फिल्म में लंबे कालांतर को थोड़े समय में दिखाने के लिए बखूबी किया गया। फिल्म गाईड में नायिका का एक गुमनाम और अनाम कलाकार से लेकर एक सुप्रसिद्ध नृत्यांगना बन जाने तक का सफर एक गाने ‘पिया तोसे नैना लागे रे, जाने क्या हो अब आगे रे…’ में सफलतापूर्वक दिखा दिया गया।

इसमें तो कोई शक नहीं कि फिल्मों में गानों का इस्तेमाल आमतौर पर नायक नायिका के प्रेम संबंधों को प्रदर्शित करने के लिए ही होता रहा है। कब तक बेचारा नायक नायिका को यह बताने के लिए उसके आगे पीछे घूमता रहेगा कि वह उससे प्यार करता है और कब और कैसे नायिका बताएगी कि वह भी उसे चाहने लगी है। दोनों ने मिलकर एक गाना गाया नहीं और सबको पता चला नहीं कि लो भाई, हो गया। फिल्म संगम में तो नायक ने नायिका से सीधा ही पूछ लिया था, ‘बोल राधा बोल, संगम होगा कि नहीं’।

एक गंभीर और संवेदनशील कहानी में कुछ अंतराल के बाद या मारा-मारी से भरे दृश्यों के बाद दर्शक के दिमाग को थोड़ा सकून देने के लिए तो गाना ज़रूरी होता ही है। कहने का अभिप्राय यही है कि जो गाना एक खास माहौल बनाने या कहानी को आगे बढ़ाने के लिए बनाया हो वह कभी भूलता नहीं और वर्षों तक दर्शकों के दिमाग में ताज़ा रहता है। 50 साल पुरानी फिल्म नील कमल का गाना ‘बाबुल की दुआंए लेती जा…’ आज बेटी की विदाई के समय का थीम सांग बनने के साथ हमारी संस्कृति में भी समा गया है।

इसके साथ ही फिल्म 1977 में आई फिल्म ‘आदमी सड़क का’ का गाना ‘आज मेरे यार की शादी है’ या ‘मेरा यार बना है दूल्हा और फूल खिले है दिल के, मेरी भी शादी हो जाए दुआ करो सब मिल के…’ (फिल्म चौदहवीं का चांद 1960) भी भारतीय शादियों की शोभा बनते हैं। शायद बहुत से लोगों को यह पता भी नहीं होगा कि ये गाने फिल्मी हैं। उनके लिए ये शायद हमारे लोकगीत ही हों।

और आज का संगीत..? संगीत कभी बुरा नहीं होता। लेकिन आज की फिल्मों के अधिकतर गाने हमें याद क्यों नहीं रहते? सिनेमा हाल से घर तक के सफर में ये गाने गुम क्यों हो जाते हैं? कारण यह नहीं कि उनका संगीत अच्छा नहीं होता बल्कि यह है कि ये गाने फिल्म की कहानी में पिरोए हुए नहीं होते। कहानी को आगे नहीं बढ़ाते। कुछ कहते नहीं हैं। बस जबरी डाले हुए होते हैं, न भी होते तो चल सकता था। और हां… रैप भी एक तरह का संगीत ही है। लेकिन इसे किसी भी गाने में डाल देने से मुझे लगता है, गाने की गंभीरता खत्म हो जाती है क्योंकि हम लोग असली जि़न्दगी मेें ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कभी नहीं करते जो रैप में होता है। शायद इसीलिए हमें उसके बोल याद नहीं रहते।

आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कुछ निर्माता फिल्म की कहानी लिखवाने से पहले ही गाने रिकार्ड करवा लेते हैं। फिर उन गानों को कहानी में फिट करने के लिए कहानी लेखक से कहा जाता है कि इसके लिए ‘सिचुएशन’ बनाइए। ऐसे प्रयास अक्सर फिल्म के पटकथा को कमज़ोर और खराब कर देते हैं।

आप खुद सोचिए कि ऐसे गाने कितनी देर याद रहेंगे जिनका कहानी के साथ लेना देना ही न हो। इस चीज़ को जि़न्दगी के साथ जोड़ें। हम रेल या बस में सफर करते हैं। कितने नए लोगों से हमारा परिचय होता है, बातचीत होती है, लेकिन कुछ समय बाद हमें उनकी शक्लें भी याद नहीं रहतीं।

दूसरी तरफ एक ऐसा इन्सान, जो हमारी जि़न्दगी की कहानी को एक गीत की तरह एक पल के लिए भी छू कर चला गया हो, वह हमें ताउम्र नहीं भूलता। बस इतनी सी बात है चाहे जि़न्दगी से जोड़ लो चाहे फिल्म से क्योंकि फिल्में ही तो जि़न्दगी और समाज का आइना होती हैं।

टांग खिंचाई में कोई जवाब नहीं हमारा

वैसे तो खेलों और खेल भावना से हमारा दूर-दूर तक का कोई रिश्ता नहीं था, पर क्या करें मज़बूरी है। पूरी दुनिया दौडऩे कूदने में लगी है। सोने और चांदी के पदक जीत रही है। देश की प्रतिष्ठा और झंडे का सम्मान खिलाडिय़ों की जीत-हार के साथ जोड़ कर देखा जाने लगा है। हम सैद्धांतिक तौर पर इन सभी बातों से सहमत नहीं है, पर सियासत में सब को साथ लेना पड़ता है। वोट जो लेने हैं।

चलो हम मान लेते हैं कि खेलों में भाग लेना चाहिए, तो भाई आर्थिक खेल खेलो, सामाजिक खेल खेलो या फिर संप्रदायिक खेलों की तरफ जाओ। इन खेलों में जीतोगे तो सोने-चांदी के नकली पदक नहीं बल्कि असली सोना-चांदी मिलेगा। अपनी तिजोरी जितनी चाहे भर लो। फिर उस धन को काले से सफेद बनाने के लिए इन ‘नकली’ खेलों के प्रायोजक बन जाओ।

अपन लोग पदक तालिका में नौवें स्थन पर हैं। यदि कबड्डी जैसे टांग खिंचाई के खेल में हमने खिलाडिय़ों को भेजने की बजाए अपने छुट भैया नेताओं या नौकरशाहों को भेजा होता तो ‘गोल्ड मैडल’ पक्का था। टांग खिंचाई के मामले में इन दो प्रजातियों का कोई मुकाबला नहीं। मजाल है किसी को तरक्की करने दें या ऊपर उठने दें। एक उठेगा तो दूसरा उसकी टांग खींच कर नीचे ला देगा। टांग पकड़ कर खीचनें में हमारा जवाब नहीं। फिर यदि टांग पकड़ कर काम न चले , तो ये लोग पैर पकडऩे में भी देरी नहीं लगाते। ये टांग घसीटेंगे या तलवे चाटेंगे। इन खेलों में हमारे पदक पक्के। इसी टांग खिंचाई की वजह से बास्केटबाल में हम फिसड्डी। ऊपर ‘रिंग में गेंद डालने जाते हैं तो दूसरा ‘जंप’ लेते ही टांग पकड़ कर नीचे ले आता है।

एक मुकाबला झूठ बोलने का होता तो उसकी व्यक्तिगत और टीम स्पर्धाओं के स्वर्ण पदक सभी हमारी झोली में होते। सरेआम दिन को रात बताने और फिर उस बात पर लोगों को सहमत करा लने की जो खूबी हम में है वह विश्व के किसी देश में नहीं। हमारे यहां तो शैक्षणिक योग्यता के प्रमाणपत्र भी घर बैठे मिल जाते हैं। यहां कई ‘डिग्री होल्डर’ ऐसे भी हैं जिनका न तो कभी कोई सहपाटी रहा और न ही ऐसा कोई शिक्षक मिला जिसने उसे पढ़ाया, डिग्री भी छुट्टी वाले दिन जारी कर दी गई। है न कमाल। अब यह कोई आसान काम तो है नहीं, इस तरह की जाली डिग्री बनवाने में कितने जोखिम हैं। खैर पदक जीतना हो तो जोखिम तो उठाना ही पड़ता है।

एक प्रतियोगिता होनी चाहिए थी ‘कुर्सी के लिए दौड़’ यानी ‘रन फॉर चेयर’ मजाल हमारे अलावा कोई और उसमें स्वर्ण पदक जीत पाता। साहब कुर्सी की ‘आस’ में तो हमारे राजनेता 80-90 साल की उम्र में भी आत्मसम्मान को दरकिनार कर अपने से कहीं कनिष्ठ और कम उम्र नेताओं के हाथ-पैर जोड़ते रहते हैं। न हाथ जोडऩे वालों को कोई शर्म महसूस होती है और न जुड़वाने वालों को। कई बूढ़े बेचारे कुर्सी का अरमान दिल में वाले इस दुनिया से कूच कर जाते हैं। कुर्सी केवल बैठने या आपको अधिकार देने की चीज़ नहीं अपितु कई बार हमने इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल होते देखा है। क्या निशाना ताड़-ताड़ कर कुर्सी फैंकी जा रही थी। साथ ‘माईक’ भी थे, पर ‘माईक’ में वह प्रहार क्षमता कहां तो कुर्सी में है।

जकार्ता में खेली गई एशियायी खेल प्रतियोगिता के निशानेबाजी के मुकाबलों में हमें उतने पदक नहीं मिले जितनी आस थी। अरे भई मिलते कैसे? आपने सभी निशानेबाज भेजे एक भी तो राजनेता नहीं भेजा। एक भी राजनीतिज्ञ होता तो मजाल है एक भी निशाना चूकता। हमने देखा है इन लोगों को दूसरों पर निशाना साधते। चाहे ये दूसरों पर पत्थर उछालें या तानाकशी करें निशाना सही लगेगा। ये तो ऐसे लोग हैं जो टारगेट को उस स्थान पर ला कर खड़ा कर दें जहां निशाना लगा है। जब तक जांच दल रपट देगा कि टारगेट के साथ छेड़-छाड़ की गई थी, तब तक तो अगले मुकाबले का समय आ जाएगा।

इन महान लोगों से ‘खिलाड़ीपन’ की भावना सीखने की ज़रूरत है। ये उस आदमी के जनाजे में सबसे अधिक रोते हुए मिलेंग , जिसकी हत्या इन्होंने खुद की हो। अब इससे अधिक ‘स्पोर्टस मैन्स स्पिरट’ क्या होगी। मेरी बिरादरी के सभी लोग जल्दी ही अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी (आईओसी) के पदाधिकारी से मिल कर उन खेलों को ओलंपिक खेल चार्टर में डलवाले का प्रयास करेंगे, जिसमें भारत को पदक मिलने की पूरी उम्मीद हो। इन खेलों में ‘घूस देना लेना’ को भी एक स्पर्धा के रूप में शमिल किया जा सकता है। फिर देखते हैं पदक तालिका में कौन माई का लाल हमसे आगे निकलता है।

बेगूसराय से लोक सभा चुनाव लड़ सकते है कन्हैया कुमार

जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन (जेएनयूएसयू) के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार बेगूसराय से भाकपा के उम्मीदवार के तौर पर महागठबंधन (राजद, कांग्रेस, हम और राकांप) के सहयोग से 2019 में लोकसभा चुनाव लड़ेंगे।

बता दें कि कन्हैया बेगूसराय जिला के बरौनी प्रखंड अंतर्गत बिहट पंचायत के मूल निवासी हैं जबकि उनकी मां एक आंगनवाड़ी सेविका तथा उनके पिता एक छोटे किसान हैं।

न्यूज़ एजेंसी भाषा की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भाकपा के राज्य सचिव सत्यनारायण सिंह ने कहा है कि उनकी पार्टी सहित सभी वामदल चाहते हैं कि कन्हैया कुमार बेगूसराय से 2019 में लोकसभा चुनाव लड़ें।

सत्यनारायण सिंह ने यह भी बताया कि राजद और कांग्रेस जैसे अन्य दल भी चाहते हैं कि वह चुनाव में हिस्सा लें।

राजद प्रमुख लालू प्रसाद के भी इस संबंध में अपनी सहमति दिए जाने की चर्चा के बारे में सत्यनारायण ने कहा कि पूर्व में उनसे हुई वार्ता के दौरान वह एक सीट कन्हैया कुमार के लिए छोड़ देने को लेकर राजी थे ।

उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी ने अगले आम चुनाव में बिहार में छह लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है लेकिन इस बारे में अंतिम निर्णय हमख्याल दलों के साथ वार्ता के बाद लिया जाएगा।

रिपोर्ट्स के अनुसार जिन छह सीटों पर भाकपा अपना उम्मीदवार उतारना चाहती है, उनमें बेगूसराय, मधुबनी, मोतिहारी, खगड़िया, गया और बांका शामिल हैं।

न्यूज़ एजेंसी भाषा के इस सवाल पर कि क्या कन्हैया कुमार ने बेगूसराय से चुनाव लड़ने को लेकर अपनी सहमति दी है तो सत्यनारायण ने कहा कि इसके लिए वह राजी हैं।

हरियाणा से भाजपा सांसद राजकुमार सैनी ने बनाई नयी पार्टी

कुरुक्षेत्र से भाजपा सांसद राजकुमार सैनी ने न सिर्फ पार्टी से बगावत कर दी है बल्कि लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी नाम से एक नई पार्टी बनाने का भी ऐलान कर दिया है।

याद करा दें कि 2014 के आम चुनाव में भाजपा के टिकट पर लड़े राजकुमार सैनी उद्योगपति नवीन जिंदल को हराकर लोकसभा पहुंचे थे.

उन्होंने जाट आरक्षण का खुलकर विरोध किया था और पिछले काफी समय से उन्होंने अपनी ही पार्टी के साथ-साथ दूसरी राजनीतिक पार्टियों के ख़िलाफ़ भी मोर्चा खोल रखा है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ सैनी ने कहा है कि वह अन्याय के खिलाफ कुछ भी सहने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यदि वह गलत हैं तो उनको पार्टी (बीजेपी) से निकाला जा सकता है।

सैनी ने यह भी कहा कि बीजेपी के शासनकाल में प्रदेश में एक विशेष वर्ग के लोगों ने जो हालात पैदा किए, उससे दुखी होकर उन्होंने यह कदम उठाया।

सैनी ने यह भी कहा है कि अगर प्रदेश की जनता ने उनकी पार्टी को सत्ता में लाने का काम किया तो वह 6 महीने के अंदर ही प्रदेश को विकास के पथ पर आगे ले जाने के लिए पांच प्रमुख मुद्दों पर काम करेंगे।

इन पांच मुद्दों में जनसंख्या के आधार पर 100 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था, हर घर में एक रोजगार की नीति, किसानों और मजदूरों की नीति को मनरेगा के साथ जोड़ने की नीति, हम दो और हमारे दो की नीति को प्रभावी रूप से लागू करना राज्यसभा को समाप्त करने की नीति शामिल है।

सैनी ने कहा कि राज्यसभा की व्यवस्था देश हित में नहीं है।

पेट्रोल डीज़ल के साथ साथ अब घरेलू सिलिंडर भी हुआ महंगा

जहां पेट्रोल और डीज़ल की कीमत ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है वहीं तेल कंपनियों ने घरेलू श्रेणी के 14.2 किग्रा भार वाले सिलेंडर की कीमत 31 रुपये और व्यावसायिक श्रेणी के 19 किग्रा वाले सिलेंडर की कीमत 47 रुपये बढ़ा कर जनता की जेब पर फिर से चोट की है।

मासिक रेट रिवीजन के बाद एक सितंबर से लागू दरों के अनुसार घरेलू सिलेंडर 828 के बजाय 859 रुपये मिलेगा। सब्सिडी की रकम खाते में आएगी।

रिपोर्ट्स के अनुसार आईओसी के एक प्रवक्ता के बताया है कि व्यावसायिक सिलेंडर अब 1,446 के बजाय 1493 रुपये में मिलेगा।

इधर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में पहले ही आग लगी हुई है। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत में 16 पैसे की बढ़ोतरी हुई है जिसकी वजह से अब कीमत 78.84 रुपये लीटर पर पहुंच गई है।  डीजल में 34 पैसे का इजाफा होने के कारण नई कीमत 70.76 पर पहुंच गई है।

मुंबई में पेट्रोल में 16 पैसे की बढ़ोतरी के बाद नई कीमत 86.25 रुपये लीटर पर पहुंच गई है।  वहीं डीजल में 36 पैसे का इजाफा हुआ है और नई कीमत रिकॉर्ड बनाते हुए 75.12 रुपये लीटर पर पहुंच गई है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बढ़ती कीमतों की मार सीएनजी और पीएनजी पर भी पड़ी है। दिल्ली में सीएनजी की कीमत में शनिवार को प्रति किलोग्राम 63 पैसे और पाइपलाइन रसोई गैस (पीएनजी) की कीमत में 1.11 रुपये का इजाफा किया गया।

2021 की जनगणना में अन्य पिछड़े वर्गों के आंकड़े भी होंगे एकत्रित

साल 2021 की जनगणना में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) से संबंधित आंकड़े भी एकत्रित किये जाएंगे। ऐसा आज़ादी के बाद  पहली बार हो रहा है।

देश में 1931 की जनगणना में आखिरी बार एकत्रित किए गए जातिगत आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई मंडल आयोग की सिफारिशों पर तत्त्कालीन वी पी सिंह सरकार ने ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 2021 की जनगणना के लिए तैयारियों की समीक्षा की जिसके बाद ओबीसी आंकड़े एकत्रित करने के फैसले के बारे में बताया ।

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन की एक शाखा राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) ने 2006 में देश की आबादी पर नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट की घोषणा की और कहा कि देश में ओबीसी आबादी कुल आबादी की करीब 41 फीसदी है।

एनएसएसओ ने ग्रामीण इलाकों में 79,306 परिवारों और शहरी इलाकों में 45,374 परिवारों की गणना की।

भाषा की एक रिपोर्ट के अनुसार सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 2019 के लोकसभा चुनावों में 2021 जनगणना में ओबीसी आंकड़े एकत्रित करने के फैसले का उल्लेख कर सकती है क्योंकि कई ओबीसी संगठन लंबे समय से इसके लिए मांग कर रहे हैं।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) ने 2011 में सामाजिक आर्थिक एवं जाति जनगणना कराई थी और मौजूदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने तीन जुलाई 2015 में इसके नतीजों का ऐलान किया।

इसके बाद 28 जुलाई 2015 को सरकार ने कहा था कि जाति जनगणना के संबंध में कुल 8.19 करोड़ गलतियां पाई गई हैं जिनमें से 6.73 करोड़ गलतियां सुधार दी गई। हालांकि 1.45 करोड़ गलतियों में अभी सुधार नहीं किया गया है।

गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि जनगणना 2021 तीन वर्षों में पूरी हो जाएगी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ समीक्षा बैठक में गृह मंत्री ने इसके रोडमैप पर चर्चा की। इस बात पर भी चर्चा हुई कि डिजाइन और तकनीकी चीजों में सुधार पर जोर दिया जाए ताकि जनगणना करने के तीन साल के भीतर आंकड़ों को अंतिम रूप दे दिया जाए।

बता दें किअभी तक पूरे आंकड़े जारी करने में सात से आठ साल का समय लग जाता है। इस बड़ी कवायद के लिए 25 लाख से अधिक कर्मियों को प्रशिक्षित किया जाता है।

आईटीआर भरने वालों की तादाद में 71 फीसदी की वृद्धि

आयकर रिटर्न (आईटीआर) भरने की आखिरी तारीख , जो 31 अगस्त थी, तक वित्त वर्ष 2017-18 के लिए कुल 5.42 करोड़ लोगों ने रिटर्न भरा।
आंकड़े के अनुसार आईटीआर भरने वालों की तादाद में 71 फीसदी की वृद्धि हुई जबकि पिछले साल 3.17 करोड़ रिटर्न भरे गए थे।
अगस्त 2017 तक  ई-फाइल के जरिये प्रीसंप्टिव टैक्स योजना का लाभ उठाते हुए 14.93 लाख लोगों ने रिटर्न भरा था जबकि इस बार यह संख्या 1.17 करोड़ हो गई है।
इस प्रकार इसमें आठ गुना वृद्धि हुई है।
वित्त मंत्रालय के मुताबिक, 31 अगस्त वैसे कारोबारियों और वेतनभोगियों के लिए आईटीआर भरने की आखिरी तारीख थी, जिन्हें ऑडिट करवाने की जरूरत नहीं है।
इस दौरान वेतनभोगियों द्वारा ई-फाइलिंग में 54 फीसदी की वृद्धि देखी गई। इससे कर संग्रह में बड़ी वृद्धि हुई है और इससे सरकारी खजाना भी बढ़ेगा।
माना जा रहा है कि ये सब 31 अगस्त के बाद रिटर्न भरने वालों के लिए जुर्माना लगाने के सरकार के फैसले का असर था ।
मंत्रालय के बयान में कहा गया है किआयकर दाताओं की संख्या से रिटर्न भरने वालों की संख्या बहुत अधिक है।
इस साल सीबीडीटी (सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज) ने इनकम टैक्स रिटर्न भरने की आखिरी तारीख 31 जुलाई से बढ़कर 31 अगस्त तक कर दी थी यानी टैक्सपेयर्स को रिटर्न फाइल करने के लिए पूरे एक महीने का अतिरिक्त समय दिया गया था।
सैलरीड क्लास के साथ वो कारोबारी या प्रोफेशनल्स जिन्हें ऑडिट कराने की जरूरत नहीं है उनके लिए आईटीआर फाइल करने की आखिरी तारीख 31 अगस्त 2018 तय की गई थी।
पिछले साल 1 जुलाई से जीएसटी लागू करने के चलते भी इनकम टैक्स भरने के लिए कारोबारियों को और ज्यादा समय की जरूरत थी लिहाजा इसी को ध्यान में रखते हुए 31 अगस्त तक रिटर्न फाइल करने की सुविधा दी गई।