Home Blog Page 1129

‘आजादी का हमारा सागर सिमट रहा है, धीरे-धीरे पर लगातार’

मुंबई या कहें महाराष्ट्र में कुछ लोगों ने खासी असहिष्णुता फैला रखी है। इससे डर यह ज़रूर लगता है कि साहित्य और विविध ललितकलाओं के संरक्षण और विकास के लिए मशहूर राज्य में कहीं रूढि़वादी ठहराव न आ जाए। असहिष्णुता से ताजा सामना पड़ा बालीवुड के नए सिनेमा दौर के नामी अभिनेता और मराठी रंगमंच पर आज भी सक्रिय कलाकार अमोल पालेकर का!

मुंबई नेशनल गैलरी ऑफ माडर्न आर्ट्स (एनजीएमए) में आमंत्रित अतिथि वक्ता के तौर पर अमोल पालेकर जब भाषण दे रहे थे तब उनके भाषण के दौरान कई बार टोका टोकी की गई। लेकिन रुकावट पहुंचाने वाली इन तमाम बाधाओं को उन्होंने बतौर उदाहरण अपने भाषण में शामिल करते हुए अपनी बात पूरी की।

कलाकार प्रभाकर बर्वे की याद में एनजीएमए में लगी प्रदर्शनी में अपनी बात अमोल पालेकर ने जब कहनी शुरू की तो एनजीएमए के ही लोगों ने उन्हें टोकना शुरू किया। अमोल पालेकर भाषण देते हुए रुके लेकिन मंच पर जमे रहे। उन्होंने गैलरी के बंगलुरू और मुंबई केंद्र में सलाहकार समितियों को भंग करने के मुद्दे पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की आलोचना की। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि मुंबई और बंगलुरू के क्षेत्रीय केंद्रों में कलाकारों की सलाहकार समितियां भंग कर दी गई हंै। उन्हें यह सुनकर आश्चर्य हुआ।

हालांकि अभी वे इस खबर की पुष्टि नहीं कर सके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यहां आए आप लोगों में कईयों को शायद यह जानकारी न हो कि स्थानीय कलाकारों की सलाहकार समिति द्वारा आयोजित अंतिम ‘शो’ हो सकता है। इसका आयोजन ‘मोरेल पुलिस’ या खास तरह की विचार धारा को बढ़ावा देने वाले सरकारी एजेंटों या सरकारी बाबुओं ने नहीं किया।

उनकी बात पूरी होती तभी एनजीएमए के मुंबई केंद्र की निदेशक अनिता रुपावतरम ने उन्हें टोका वे अपनी बात इस आयोजन के ही परिप्रेक्ष्य में रखें। इस पर पालेकर ने पूछा,’ मैं बात तो इस संदर्भ में रख रहा हूं। क्या आप सेंसरशिप लगा रही हैं। अमोल पालेकर ने अपनी बात रोकी नहीं। उन्होंने कहा, जहां तक उन्हें जानकारी है स्थानीय कलाकारों की सलाहकार समितियों के भंग करने के बाद संस्कृति मंत्रालय यह तय करेगा कि किस कलाकार की कला का प्रदर्शन हो और किसका नहीं। तभी उन्हें फिर एनजीएमए की ही एक महिला सदस्य ने टोका अभी यह सब कहने की ज़रूरत नहीं है। माफ कीजिए, यह आयोजन प्रभाकर बर्वे के बारे में है। कृपया उन्हीं पर बात कीजिए।

इस पर पालेकर ने कहा, बोलने पर यह जो सेंसरशिप है उसे हम यहां देख रहे हैं। कहा जा रहा है, यह मत बोलो, वह मत बोलो।, यह मत खाओ, वह मत खाओ।’ मैं तो सिर्फ यह कह रहा हूं कि एनजीएमए जो कला की अभिव्यक्ति और ललित कलाओं के संवर्धन का पवित्र स्थल रहा है उस पर यह किस तरह का नियंत्रण हो रहा है। अभी हाल किसी ने कहा भी है कि ‘मानवता के खिलाफ जो युद्ध चल रहा है उसकी यह सबसे ताजा त्रासदी है।

मैं इससे बहुत परेशान हूं। अब तो और ज़्यादा। यह सब कहां जाकर थमेगा। आजादी का हमारा सागर सिमट रहा है। अभी धीरे-धीरे, पर सिमटना लगातार जारी है। हम इस पर खामोश क्यों हैं? आश्चर्यजनक तो यह है कि जिन लोगों को इस आदेश की जानकारी है वे भी न तो खुल कर बात करते हैं न उस पर सवाल करते हैं और न उसका विरोध करते हैं।

उन्होंने कहा, अभी हाल मराठी साहित्य सम्मेलन से वरिष्ठ साहित्यकार नयनतारा सहगल को न्यौता भेजा गया। लेकिन आयोजन के अंतिम समय में उन्हें आने से मना कर दिया गया। क्यों ऐसा हुआ? इसलिए क्योंकि आज हम जिस परिस्थिति में रह रहे हैं उसका वे विरोध कर सकती थीं, और यहां भी हम वैसी ही परिस्थिति बना रहे हैं। अमोल पालेकर के भाषण के दौरान टोकाटोकी पर जब एनजीएमए की मुंबई केंद्र निदेशक से बातचीत की गई तो उन्होंने कहा जिन मुद्दों पर अमोल पालेकर ने अपनी बात रखी उस पर हमसे वे व्यक्तिगत चर्चा करते तो कहीं बेहतर होता।

बहरहाल एक कलाकार की हैसियत से अमोल पालेकर ने जो चिंता जताई उस पर उनका ध्यान बंटाने की जो कोशिश बार-बार की गई उसके पक्ष में शायद ही कुछ लोग हों।

जिग्नेश मेवानी के कारण रोका गया कार्यक्रम

वडनगर (गुजरात) के एचके आर्टस कालेज का सालाना उत्सव इसलिए रोक दिया गया क्योंकि वहां जिग्नेश मेवानी को मुख्य अतिथि बनाया गया था। इतना ही नहीं इसी मामले में कालेज के प्रिंसीपल और वाइस प्रिंसीपल दोनों ने इस्तीफा दे दिया। प्रिंसीपल हेंमत कुमार शाह और वाइस प्रिंसीपल मोहन भाई परमार दोनों ने अपने इस्तीफे कालेज के ट्रस्टियों को भेज दिए।

 कालेज के प्रिंसीपल हेंमत कुमार शाह ने बताया कि कालेज का सालाना समारोह सोमवार को होना था। जिग्नेश मेवानी को वहां मुख्यातिथि के तौर पर बुलाया गया था। ध्यान रहे जिग्नेश इसी कालेज में पढ़े हैं। लेकिन भाजपा, समर्थित कुछ युवा नेताओं ने कालेज के प्रिंसीपल, वाइस प्रिंसीपल और ट्रस्टी बोर्ड को धमकी देनी शुरू कर दी।

 प्रिंसीपल का कहना है कि ट्रस्ट ने भाजपा से जुड़े लोगों के आगे घुटने टेक दिए। धमकी देने वालों ने कहा था कि यदि वहां कोई समारोह हुआ तो वे  लोग वहां हुड़दंग मचाएगे फिर चाहे वहां पुलिस भी हो उसकी कोई परवाह नहीं। इस पर कालेज के ट्रस्ट ने यह समारोह रद्द कर दिया। प्रिंसीपल ने कहा कि मैंने यह इस्तीफा इसलिए दिया है क्योंकि इस स्थिति  में कोई भी होता वह ऐसा ही करता। उन्होंने ट्रस्ट के इस फैसले को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रहार बताया। उन्होंने यह भी कहा कि यह ऐसा राज्य है जहां शिक्षा को सरकार,विश्वविद्यालय और  यहां तक कि छात्र भी दबाने पर लगे हैं।

 उन्होंने कहा कि कुछ महीने पहले अहमदाबाद के कर्णावती विश्वविद्यालय में आयोजित ‘यूथ पार्लियामेंट’ में अमित शाह, सैम पित्रेदा, सुब्रामणियम स्वामी और दूसरे कई राजनैतिक लोगों को बुलाया गया था, तो लोग बडगांव के निर्वाचित विधायक को बुलाने के खिलाफ क्यों हैं।

माँ-बाप की सेवा न करने पर सज़ा बढ़ाने की तैयारी

एक अर्से से विभिन्न राज्यों से बूढ़े माँ-बाप की देखरेख न करने वाले बच्चों के लिए केंद्र सरकार अब सज़ा की मियाद बढ़ाने को है, क्योंकि पहले की कानूनी व्यवस्था पर शायद उचित अमल नहीं हो रहा था। गांवों, जि़लों और महानगरों से ऐसी ढरों घटनाएं सामने आ रही थी जिनमें असहाय वृद्धों को घर-घर भीख के लिए भटकना पड़ रहा था। जबकि उनके बच्चे उनकी देखरेख करने के लिए सामाजिक-आर्थिक तौर पर समर्थ थे।

प्रशासन के सामने यह बड़ी मानवीय समस्या हो गई थी कि शहरों में अकेले और असहाय बुजूर्गों के साथ लूटपाट, जालसाजी और हत्या के मामले तेजी से बढऩे लगे थे। ऐसी भी शिकायतें आ रही थी कि असहाय और अकेले वृद्ध जो अपने स्वास्थ्य और खान-पान की व्यवस्था करने में असमर्थ हैं पर उनके बच्चे देश के दूसरे शहरों में या विदेश में है। इस कारण उनकी जिंदगी बोझ बन गई है। ऐसी भी कई घटनाएं सामने आई जहां बुजुर्ग दंपति या अकेले वृद्धजन अपने खाने-पीने की समुचित व्यवस्था न कर पाने के कारण मौत का शिकार हुए।

ऐसी घटनाओं पर कुछ रोक लगे इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट ने उन बच्चों को सज़ा देने का प्रावधान किया है जो चाह कर या अनजाने में अपने ही माता-पिता की देखरेख करने से बचते हैं। ऐसे लोग जब पकड़ में आएंगे तो सज़ा की अवधि तीन महीने थी। इसे अब बढ़ा कर छह महीने करने और जुर्माना भी देना पड़ सकता है।

केंद्र के सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और कल्याण कानून 2007 में बच्चों की परिभाषा को भी विस्तार देने की सिफारिश की है। बच्चों की परिभाषा में अब दत्तक या सौतेले बच्चों, दामाद-बहुओं, पोते-पोतियों, नाती-नातिनों, और ऐसे नाबालिग भी शामिल करने की सिफारिश की गई है जिनका प्रतिनिधित्व कानूनी अभिभावक करते हैं। मौजूदा कानून में सिर्फ सगे बच्चे और पोते-पोतियां ही हैं। मंत्रालय ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और कल्याण कानून 2018 का मसविदा तैयार कर लिया है। कानूनी रुप मिलते ही इसे 2007 के कानून की जगह अमल में लाया जाएगा। नए संभावित कानून में मासिक देखभाल भत्ता की अधिकतम सीमा 10,000 रुपए मात्र भी खत्म कर दी गई है। यदि बच्चों को माता-पिता की देखभाल करने से इंकार करने का दोषी पाया जाता है तो उन पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

 एक ऐेसे ही मामले में कोर्ट के आदेश पर अपने मां-बाप को एक बच्चा तो ‘मेंटिनेंस’ देने लगा था लेकिन दूसरा राजी नहीं हो रहा था। बुजुर्ग मां-बाप ने सीआरपीसी की धारा 125(3) के तहत अनपेड अमाउंट पाने की याचिका हाईकोर्ट में लगाई थी। उस पर अदालत ने सज़ा दी। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट संजय मेहरा ने जानकारी दी कि अदालती आदेश के बाद भी मां-बाप को ‘मेंटिनेंस’- न देना अपराध है। इस पर धारा 125 सीआरपीसी, गुज़ारा भत्ता देने के लिए बना है। इसके तहत सुनवाई के बाद अदालत आदेश देती है। इसमें परेशान पत्नी अपने पति से, बच्चे पिता से और बुजुर्ग माता-पिता अपने बच्चों से गुजारा भत्ता ले सकते हैं।

 इसी तरह हिंदू दंपत्ति को पहली पत्नी के रहते हुए दूसरी पत्नी को गुज़ारा भत्ता नहीं मिल सकता। इसी तरह बिना तर्क संगत कारण के अलग रह रही पत्नी भी गुज़ारा भत्ता नहीं पा सकती है। हालांकि गुज़ारा भत्ता तय हो जान के बाद पति को छोड़कर मनमर्जी से अलग रह रही पत्नी के बच्चों को गुज़ारा भत्ता मिल सकता है। बशर्ते वह शारीरिक या मानसिक तौर पर खुद की देखभाल करने में असमर्थ हों। नए मसविदे के कानून बन जाने पर हजारों मजबूर बुजुर्गों को राहत उनके जीवन के संध्याकाल में मिल सकेगी।

क्या बेटी बचाओ योजना एक दिखावा है?

एनडीए सरकार ने एक अनोखे ढंग से 2014-15 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बड़े पैमाने पर शुरू की गई ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं’ (सेव गर्ल चाइल्ड एजुकेट गर्ल) योजना के विज्ञापन और प्रचार पर आवंटित निधि का 56 फीसद से अधिक खर्च किया है। यह योजना पुरूषों और महिलाओं के बीच समानता , महिलाओं के सशक्तिकरण के अन्य मुद्दों को सुनिश्चित करने और बिगढ़ते लिंगानुपात को सही करने के लिए चलाई गई। धन का एक बड़ा हिस्सा प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में दिए गए विज्ञापन के भुगतान के लिए आवंटित किया गया यानी सार्वजनिक प्रचार, होर्डिंग्स सहित महिलाओं के सर्वांगीण विकास और समृद्धि के लिए जो प्रधानमंत्री को मसीहा के रूप में मनाते हैं। जबकि महिला और बाल विकास मंत्री इस तस्वीर में कहीं नहीं है जो कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए बुरी बात है।

भारत में कानून-आधारित लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है जिसमें नीतिगत निर्णय केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। एक बार नीतिगत निर्णय लेने के बाद संबंधित मंत्री इसके कार्यान्वयन की जिम्मेदारी लेता

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा 2014-15 में मुख्य योजना के लिए 648 करोड़ की राशि आवंटित की गई थी। इसमें से 56.27 फीसद प्रधानमंत्री द्वारा घोषित ”बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’’ योजना के प्रचार और विज्ञापन में खर्च किया गया। केवल 24.5 फीसद, 159.18 करोड़ के बराबर इस योजना के कार्यान्वयन के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वितरित किया गया था।

चालू वित्त वर्ष (2018-19) के दौरान बालिका के सर्वागीण विकास के लिए 280 करोड़ की राशि आवंटित की गई है। इसमें से 155.71 करोड़ रुपए दिसबंर 2018 तक विज्ञापन और प्रचार में खर्च किए गए। अभी सरकार ने 55.66 करोड़ लगभग 19 फीसद से अधिक जारी करना है।

इस योजना के लिए निर्धारित 200 करोड़ में से 68 फीसद के साथ पेड विज्ञापन सबसे अधिक था। जिसमें से 135.71 करोड़ रुपए विज्ञापनों पर खर्च किए गए थे। 2016-17 में योजना के लिए प्रदान की गई कुल राशि में से 29.79 करोड़ रुपए विज्ञापनों पर खर्च किए गए और शेष 2.9 करोड़ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस योजना को लागू करने के लिए दिए गए थे।

यह अब स्पष्ट हो गया है कि लड़कियों के समग्र उत्थान के लिए बनाई गई यह योजना प्रधानमंत्री के प्रचार के विज्ञापनो की बलिवेदी पर बलि चढ़ गई हैै। यह संघ परिवार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के खोखलेपन को बयां करता है जो व्यवहार में विकास और विकास के नाम पर महिलाओं को बदनाम कर रही है।

योजना की विफलता नीति लागू करने की कमी, अप्रभावी नियंत्रण तंत्र और धन का अभाव मुख्य कारण हंै। सरकार का दावा है कि 2018-19 तक देश के सभी 640 जिलों में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना के तहत कवर किया गया है परंतु यह दावा भी धराशायी हो गया है।

वन डे में न्यूज़ीलैंड पर फतेह टी-20 में मिली हार

आस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज और एक दिवसीय सीरीज जीतने के बाद न्यूज़ीलैंड की धरती पर भी भारतीय टीम का शानदार प्रदर्शन जारी है। भारतीय टीम ने न्यूज़ीलैंड में पांच मैचों की वनडे सीरीज 4-1 से जीत ली है। भारतीय टीम के 86 साल के इतिहास में न्यूज़ीलैंड में भारत की सबसे बड़ी जीत है। भारत ने न्यूज़ीलैंड में अपने दौरों की शुरूआत 1967 में की थी। इससे पहले भारत ने 2009 में वनडे सीरीज जीती थी। इसके साथ ही वेलिंगटन में भारत को 16 साल बाद जीत हासिल हुई है। भारत ने यहां अपना पिछला मैच 2003 में सौरभ गांगुली की कप्तानी में जीता था।

भारत ने पहले तीन मैच जीत कर 3-0 की बढ़त बना ली थी। 23 जनवरी को खेले पहले मैच में 8 विकेट से जीत हासिल की। इसके बाद 26 जनवरी को मेजबान टीम को 90 रनों से शिकस्त दी। 28 जनवरी को खेले गए तीसरे मुकाबले में भारत ने 7 विकेट से मैच जीत कर सीरीज पर कब्जा जमा लिया। परंतु 31 जनवरी को हैमिल्टन में खेले गए चैथे मैच में कीवी टीम ने भारत को 90 रन पर ढेर कर सबको चांैका दिया।

अंतिम पांचवा वन डे वेलिंगटन में खेला गया। यहां चौथे वनडे की हार से उबरते हुए भारत ने शानदार प्रदर्शन किया। भारत ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला लिया। पहले बल्लेबाजी करने उतरी टीम इंडिया की हालात एक समय चैथे वनडे की तरह ही दिखाई दे रही थी। उसने 18 रन पर चार विकट गंवा दिए थे। इनमें कप्तान रोहित शर्मा (02), शिखर धवन (06) शुभमन गिल(07) और धोनी (01) के विकेट शामिल थे। इसके बाद रायडू ने शंकर के साथ मिलकर मोर्चा संभाला और पांचवे विकेट के लिए 98 रनों की महत्वपूर्ण साझेदारी करते हुए टीम को मुश्किल स्थिति से बाहर निकाला। शंकर के बाद रायडू ने जाधव (34) के साथ छठे विकेट के लिए 74 रनों की साझेदारी की। जाधव को हेनरी ने आएट किया। इसके बाद हार्दिक पांडया ने भुवनेश्वर (06) के साथ मिल कर ताबड़तोड़ बल्लेबाजी की और आठवें विकेट के लिए (45) रन जोड़े। पांडया ने पांच छक्कों और दो चैकों की मदद से 45 रन बनाए। पांडया ने एस्टल के ओवर में तीन गेंदों पर तीन छक्के जड़े। इस तरह भारत ने 252 रन बनाए।

न्यूज़ीलैंड की पारी

लक्ष्य का पीछा करने आई कीवी टीम को कोलिन मुनरो (24), हेनरी निकोलस (08) ने अच्छी शुरूआत देने की कोशिश की। लेकिन मोहम्मद शमी ने 18 के स्कोर पर निकोलस को आउट कर कीवी टीम का पहला विकेट गिराया। इसके बाद शमी ने मुनरो को आउट कर कीवी टीम को दूसरा झटका दिया। अनुभवी खिलाडी रॉस टेलर (01) भी कुछ खास नहीं कर पाए। तीन विकेट गवाने के बाद कप्तान केन विलियमसन (39) ने टॉम लाथन (37) के साथ 67 रन की साझेदारी कर स्कोर को 100 के पार पहुंचा। केदार जाधव ने विलियमसन को आउट कर न्यूज़ीलैंड को चौथा झटका दिया। चहल ने कोलिन डिग्रैडहोम(11) को आउट किया। इस तरह चहल ,जाधव ने मध्यक्रम के बल्लेबाजों को पारी संवारने का मौका ही नहीं दिया। हार्दिक पांडया ने मिशेल सेंटनर (22) को आउट किया। इस तरह कीवी टीम 44.1 ओवर में 217 रन पर ही सिमट गई और भारत ने सीरीज 4-1 से जीत ली।

इस मैच में अंबाती रायडू को मैन ऑफ इ मैच चुना गया। उन्होंने 90 दन की शानदार पारी खेली। मोहम्मद शमी को मैन ऑफ द सीरीज का खिताब मिला। विराट की कप्तानी में टीम ने विदेश में तीसरी वन डे सीरीज जीती हैं इससे पहले भारत ने अफ्रीका में 5-1, आस्ट्रेलिया में 2-1 से सीरीज जीती है।

हार्दिक ने लगाई छक्कों की हैट्रिक

निलंबन खत्म होने के बाद दूसरे ही मैच में हार्दिक पांडया ने शानदार प्रदर्शन किया। पांडया ने एस्टल के 47 वें ओवर की दूसरी,तीसरी और चौथी गेंद पर तीन छक्के लगाए। इससे पहले भी विभिन्न प्रारूपों में वह चार बार ऐसा कर चुके हैं।

टी-20 सीरीज में हार

वनडे सीरीज के बाद तीन मैचों की टी-20 सीरीज खेली गई। परंतु इसमें भारत वनडे की तरह प्रदर्शन नहीं कर सका। टी-20 का पहला मैच वेलिंगटन में खेेला गया। इस मैच में भारत को टी-20 की सबसे बड़ी हार झेलनी पड़ी थी। इसमें न्यूज़ीलैंड ने 210 बनाए। भारतीय टीम 139 पर ही ढेर हो गई इस प्रकार भारत ने 80 रन से यह मैच हारा था।

दूसरा मैच ऑकलैंड में खेला गया। गेंदबाजों के बेहतरीन प्रदर्शन और जबरदस्त बल्लेबाजी के दम पर भारत ने न्यूज़ीलैंड को सात विकेट से मात दी। ऑकलैंड में टॉस जीत कर कीवी टीम ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 8 विकेट पर 156 रन बनाए। जवाब में भारतीय टीम सात गेंदें शेष रहते हुए यह मुकाबला अपने नाम कर लिया।

सीरीज का तीसरा और अंतिम मैच हेमिल्टन में खेला गया । भारत यह मैच 4 रन से हार गया और उसका जीत की नई इबारत का सपना अधूरा रह गया। भारत ने टॉस जीत कर पहले गेंदबाजी का निर्णय लिया । कीवी टीम ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 4 विकेट पर 212 रन बनाए। कीवी खिलाडी कोलिन मुनरो ने 72 रन की शानदार पारी खेली और मैन ऑफ द मैच बने। जवाब में भारत 6 विकेट पर 208 रन ही बना पाया। भारतीय टीम की तरफ से विजय शंकर ने 43 रोहित शर्मा ने 38 और ऋषभ पंत ने 28 रन की पारी खेली। इस तरह तीन महीने से जारी भारत का अजेय रथ यहां थम गया।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने जीती वन डे सीरीज

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने न्यूज़ीलैंड में तीन मैचों की वन डे सीरिज पर जीत दर्ज की। भारतीय टीम ने पहला मैच 9 विकेट से जीता था । दूसरा मुकाबला भारतीय टीम ने 8 विकेट से जीत कर सीरीज पर अपना कब्जा कर लिया था। इस तरह टीम ने 2-0 की अजेय बढ़त ले ली थी। सीरीज के अंतिम मैच में भारत को शिकस्त का सामना करना पड़ा। भारतीय टीम ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 44 ओवर में 140 रन बनाए। लक्ष्य का पीछा करने आई न्यूज़ीलैंड की टीम ने 29.2 ओवर में दो विकेट खोकर यह लक्ष्य हासिल कर लिया। न्यूज़ीलैंड की सूजी बेट्स (57) और कप्तान ऐीम सेटरवेट (66) की अर्धशतकीय पारी खेली।

भारतीय कप्तान मिताली राज के लिए यह मैच बेहद खास रहा। मिताली 200 वन डे खेलने वाली विश्व की पहली महिला क्रिकेटर बन गई हैं। भारत के लिए दीप्ति शर्मा ने 52 रन की पारी खेली। भारतीय टीम ने विदेशी पिच पर एक साल में दूसरी वन डे सीरीज अपने नाम की है।

टी-20 सीरीज में मिली हार

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने न्यूज़ीलैंड में तीन मैचों की सीरीज खेली।

सीरीज का पहला मैच वेेलिगटन में खेला गया। भारत ने टॉस जीत कर पहले गेंदबाजी करने का फैसला लिया। न्यूज़ीलैंड की टीम ने निर्धारित 20 ओवर में 4 विकेट के नुकसान पर 160 रन बनाए। जवाब में भारतीय टीम 19.1 ओवर में 135 रन ही बना सकी। भारत की स्मृति मंधाना ने 58 रन बनाए। भारत इस मैच में 23 रन से हार गया।

इस सीरीज का दूसरा मैच ऑकलैंड में खेला गया। टॉस जीत कर पहले बल्लेबाजी करते हुए भारतीय टीम ने 20 ओवर में छह विकेट खोकर 135 दन बनाए। जेमिमा रॉड्रिग्ज ने सर्वाधिक 53 गेंदों में 72 रन की ताबड़तोड़ पारी खेली। न्यूज़ीलैंड ने 20 ओवर में 136 रन बना कर यह मैच जीत लिया। इस जीत के साथ ही न्यूज़ीलैंड ने तीन मैचों की सीरीज में 2-0 की बढ़त लेकर सीरीज पर अपना कब्जा कर लिया।

सीरीज का अंतिम मैंच हेमिल्टन में खेला गया। यहां न्यूज़ीलैंड ने भारत को 2 रन से हरा कर मैच जीत लिया। टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए न्यूज़ीलैंड ने सात विकेट पर 161 रन बनाए। प्लेयर ऑफ द मैच सोफी डिवाइन ने 72 रन की शानदार पारी खेल कर न्यूज़ीलैंड को 3-0 से सीरीज जीता दी। लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम कीे स्मृति मंधाना ने एक बार फिर तूफानी शुरूआत दिलाई। स्मृति ने सर्वाधिक

86 रन बना कर अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ स्कोर बनाया। मंधाना की 86 रन की पारी के बावजूद भी भारत यह मैच जीतने में नाकामयाब रहा।

‘वीणावादिनी’ (सरस्वती वंदना)

  1. वर दे, वीणावादिनि वर दे !

              प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव

              भारत में भर दे !

  1. काट अंध-उर के बंधन-स्तर

              बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;

              कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर

              जगमग जग कर दे !

  1. नव गति, नव लय, ताल-छंद नव

              नवल कंठ, नव जलद-मन्द्र रव;

              नव नभ के नव विहग-वृंद को

              नव पर, नव स्वर दे !

              वर दे, वीणावादिनि वर दे।

नेहरू और निराला: रामचंद्र गुहा

कई सालों पहले, समाजशास्त्री त्रिलोकी नारायण पाण्डेय ने मुझसे एक घटना का जि़क्र किया था, जो जवाहरलाल नेहरू और हिंदी के प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ से जुड़ी हुई थी। प्रधानमंत्री नेहरू तब अपनी चीन की  यात्रा से लौटे ही थे और अपने गृहनगर इलाहाबाद में एक सभा को संबोधित कर रहे थे। वह इलाहाबाद, जहाँ तब निराला रहा करते थे और त्रिलोकी पाण्डेय तब छात्र हुआ करते थे। निराला सभा में अगली पंक्ति में बैठे हुए थे, खुला हुआ सीना, जिस पर अभी-अभी तेल की मालिश हुई थी। ऐसा लगता था जैसे निराला, जो कुश्ती के दाँव-पेंच में भी महारत रखते थे, सीधे अखाड़े से होकर सभा में चले आए हों। निराला अपनी उस अनूठी मुद्रा में सबके आकर्षण का केंद्र थे। नेहरू ने अपना भाषण शुरू करने से पहले अपने कुछ प्रशंसकों द्वारा पहनाई जा रही मालाओं को स्वीकार किया।

और फिर अपना भाषण शुरू करते हुए नेहरू ने एक किस्सा सुनाया, ‘मैं चीन से लौटा हूँ और वहाँ मैंने एक कहानी सुनी। एक महान राजा और उसके दो बेटों की कहानी। एक चतुर और दूसरा मूर्ख। जब ये बेटे बड़े हो गए, तो राजा ने कहा कि मेरा मूर्ख बेटा राजा बनेगा, क्योंकि वह सिफऱ् शासक बनने लायक ही है। पर मेरा चतुर और विद्वान बेटा कवि बनेगा क्योंकि वह महान कार्य करने के लिए बना हुआ है’। यह कहकर नेहरू ने अपने गले से माला उतारी और श्रद्धाभाव से निराला के पैरों की तरफ उछाल दिया।

कुछ दस्तावेज़

हाल ही में, मुझे कुछ ऐसे दस्तावेज़ मिले जो यह प्रमाणित करते हैं कि वास्तव में नेहरू निराला के प्रशंसक तो थे ही, उन्हें निराला से गहरा स्नेह भी था। यह प्रमाण मुझे मिला, डी.एस. राव द्वारा लिखे गए साहित्य अकादेमी के इतिहास, ‘फ़ाइव डिकेड्स’ के परिशिष्ट में। साहित्य अकादेमी का औपचारिक उद्घाटन संसद के केंद्रीय हाल में 12 मार्च, 1954 को हुआ था। अगले ही दिन यानी 13 मार्च को प्रधानमंत्री नेहरू ने साहित्य अकादेमी के नवनियुक्त सचिव कृष्ण कृपलानी को निराला के बारे में एक ख़त लिखा। नेहरू ने लिखा कि ‘निराला पहले भी काफी सृजनात्मक लेखन कर चुके हैं और आज भी जब अपने रौ में लिखते हैं तो कुछ बेहतर लिखते हैं’। निराला की किताबें तब लोकप्रिय थीं और पाठ्य-पुस्तकों के रूप में भी उन्हें पढ़ा जाने लगा था। पर नेहरू के शब्दों में, ‘निराला ने अपनी किताबों को महज़ 25, 30 या 50 रूपये पाकर प्रकाशकों को दे दिया, लगभग सारी किताबों के कॉपीराइट वे (निराला) प्रकाशकों को दे चुके थे’। नतीजा यह कि ‘प्रकाशक तो निराला की किताबों को बेचकर अच्छा-ख़ासा धन कमा रहे थे, पर निराला मुफ़लिसी में जी रहे हैं’।

नेहरू द्वारा अकादेमी को दिये गए सुझाव

नेहरू ने अपने ख़त में लिखा कि ‘निराला का उदाहरण प्रकाशकों द्वारा एक लेखक के शोषण का ज्वलंत उदाहरण हैं’। नेहरू ने अकादेमी से आग्रह किया कि वह कॉपीराइट कानून में कुछ ऐसे बदलाव करे, जिससे भविष्य में भारतीय लेखकों का कोई शोषण न हो। आगे नेहरू ने लिखा:  ‘इस दौरान निराला को कुछ आर्थिक मदद जरूर दी जानी चाहिए। यह आर्थिक मदद सीधे तौर पर निराला के हाथ में नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि वे तुरंत ही इसे किसी दूसरे जरूरतमंद को दे देंगे। असल में, वे अपने कपड़े और सारी चीजें ऐसे ही लोगों को दे दिया करते हैं’।

उस समय महादेवी वर्मा और इलाहाबाद के एक साहित्यिक संगठन से जुड़े सदस्य निराला की जरूरतों का खयाल रखते थे और उनकी आर्थिक मदद भी किया करते थे। नेहरू ने अकादेमी को सुझाव दिया कि निराला को सौ रुपए की मासिक वृत्ति दी जाय, और यह रकम निराला के एवज में महादेवी वर्मा को दी जाय। 16 मार्च 1954 को अकादेमी के सचिव ने नेहरू को जवाबी ख़त लिखा। सचिव ने लिखा कि उन्होंने अपने मंत्रालय के प्रमुख मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से बात की है और उन्होंने इस बात के लिए अपनी सहमति दे दी है कि ‘निराला को सौ रूपये की मासिक वृत्ति दी जाए और यह रकम महादेवी वर्मा को सौंपी जाए’।

सरकारी कामों और निर्णय लेने की गति को ध्यान में रखें तो यह सब कुछ मानो प्रकाश की गति से हुआ, तीन दिनों के भीतर निर्णय भी ले लिए गए और उनका क्रियान्वयन भी कर दिया गया! आज के भारत यह सोचना भी असंभव है कि एक कवि की तंगहाली से चिंतित होकर, कोई प्रधानमंत्री उसे आर्थिक मदद देने की बात सुझाते हुए ख़त लिखेगा और यह भी बताएगा कि यह किसके हाथों में या किसके जरिए दी जाय। पर यह उस हिंदुस्तान में बिलकुल संभव था जो नेहरू और आज़ाद का हिंदुस्तान था। और यह प्रवृत्ति सिफऱ् कांग्रेस पार्टी तक ही नहीं सीमित थी। डी.एस. राव ने साहित्य अकादेमी के अपने इतिहास में, कम्युनिस्ट सांसद हीरेन मुखर्जी और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के खतों का भी हवाला दिया है, जो साहित्य अकादेमी के आरंभिक वर्षों में उसकी गतिविधियों और कार्यों पर की गई टिप्पणियाँ थीं।

निराला का कवित्व

कवि निराला के प्रशंसकों में अरविंद कृष्ण महरोत्रा और विक्रम सेठ सरीखे साहित्यकार भी रहे हैं। निराला की कविताओं का अँग्रेजी में अनुवाद करने वाले डेविड रूबिन ने ‘सेलेक्टेड पोयम्स ऑफ निराला’ में लिखा है कि ‘निराला के काव्य में जितनी विविधता है, वह 20वीं सदी के हिंदी के किसी भी दूसरे कवि से कहीं ज्यादे और समृद्ध है’। निराला ने प्रकृति, राजनीति, गरीबी, मिथक, भाषा और प्रेम जैसे विविध विषयों पर कविताएं लिखीं।

निराला की एक कविता ‘वन-बेला’ का यह अंश जैसे ख़ुद इस लेख पर भी एक टिप्पणी है-

फिर लगा सोचने यथासूत्र मैं भी होता

यदि राजपुत्र मैं क्यों न सदा कलंक ढोता,

ये होते जितने विद्याधर मेरे अनुचर,

मेरे प्रसाद के लिए विनत-सिर उद्यत-कर;

मैं देता कुछ, रख अधिक, किन्तु जितने पेपर,

सम्मिलित कंठ से गाते मेरी कीर्ति अमर, जीवन चरित्र

लिख अग्रलेख, अथवा छपते विशाल चित्र।

प्रस्तुति: वाचस्पति उपाध्याय

कंगना को गुस्सा क्यों आता है?

फिल्म मणिकर्णिका की मुख्य अभिनेत्री और सह निर्देशक कंगना रानौट की फिल्म वैसे तो बॉक्स ऑफिस पर कामयाब रही लेकिन कई मुद्दों पर वे काफी नाराज हैं। दरअसल बॉलीवुड में महिला ओैर पुरूष को उनकी कला प्रदर्शन पर अलग-अलग भुगतान, फिल्म उद्योग में भाई-भतीजावाद और सेक्स की तमाम हरकतों पर वे पहले भी अपनी बात रखती रही हैं, लेकिन उनकी बातों को बहुत तवज्जुह देने वाले वहां कम ही हैं।

जब तमाम बाधाओं के बाद फिल्म ‘मणिकर्णिका’ तैयार हो गई तो कंगना ने बॉलीवुड की तमाम फिल्मी हस्तियों, मीडिया और फिल्म से जुड़े लोगों को अपनी फिल्म के ‘प्री-वयू’ के लिए आमंत्रित किया। लेकिन ज़्यादातर फिल्मी अदाकार फिल्म देखने नहीं पहुंचे। इस पर कंगना ने कहा कि फिल्म उद्योग उनके खिलाफ एकजुट हो गया है। मैं इसकी चुनौतियां स्वीकार करती रहूंगी ।

कंगना रानौट जब ‘मणिकर्णिका’-झांसी की रानी’ फिल्म के लिए बॉलीवुड के नामी अदाकारों का साथ चाह रही थीं तब अभिनेता अनुपम खेर ने ज़रूर उन्हें सहयोग दिया और ट्विटर पर लिखा कि वे ‘राकस्टार’ हैं। वे मेधावी हैं। मैं उनके साहस और अभिनय की तारीफ करता हूं। महिला सशक्तिकरण की वे सटीक उदाहरण हैं।

अभी हाल एक साक्षात्कार में कंगना ने कहा कि उन्होंने दंगल, सिक्रेट सुपर स्टार और राजी फिल्मों की ‘प्रि-व्यू’ में भाग लिया था। लेकिन आमीर खान और आलिया भट्ट ने उनके लिए ‘प्रि-व्यू’ में आना पसंद नहीं किया। हालांकि जब आलिया से पूछा गया तो उसका जवाब था कि यदि इस बात से कंगना नाराज़ हंै तो वे उनसे माफी मांग लेंगी। कंगना ने एक वीडियो इंटरव्यू में कहा है कि बॉलीवुड फिल्म उद्योग उनकी टिप्पणियों के कारण उनसे खफा है। इस पर उन्होंने कहा,’मैं इनकी वाट लगा दूंगी एक एक को एक्सपोज करूंगी।’

अपनी फिल्म के प्रचार के संबंध में बात करते हुए कंगना ने बताया कि एक बार आलिया को बुलाया और उससे पूछा कि ‘मणिकर्णिका’ क्यों उनको मेरे व्यक्तिगत विवादों से जुड़ी फिल्म लगती है। जबकि पूरे देश में इसकी खासी चर्चा ऐतिहासिक वजहों और कला रूपों के चलते रही। मैंने उससे पूछा कि क्यों बॉलीवुड में इस फिल्म पर इतनी खामोशी है। मैने जानना चाहा कि क्या मैं उसके प्रति सहृदय रहूं जब उसने अपने काम पर मेरी प्रतिक्रिया चाही। आखिर मेरी फिल्म से उसे क्यों इतना डर है।

कहीं तो ऐसा भी हुआ कि कंगना इतनी निराश थी कि वह खीझ कर बोली क्या रानी लक्ष्मीबाई मेरी चाची थी। वह देश की बड़ी प्रतिभा थी। लेकिन इस तरह की बेरूखी क्यों है? क्या इसलिए क्योंकि मैं भाई-भतीजावाद पर बात करती हंू। सात फरवरी को एक स्कूल में इस फिल्म के विशेष प्रदर्शन के मौके पर उन्होंने कहा कि यह ऐसे ही है किसी एक बच्चे के खिलाफ साठ बच्चे एकजुठ हो जाएं। उन्होंने कहा, मेरे साथ बॉलीवुड में कुछ ऐसा ही हो रहा हैं। उसे लगातार परेशान किया जा रहा है। बताओ, कैसा लग रहा है।

उन्होंने आलिया से अपनी एक और बातचीत का हवाला दिया जब उन्होंने उससे महिला सशक्तिकरण और राष्ट्रीयता के मुद्दे पर बनी एक फिल्म के लिए समर्थन चाहा। लेकिन ऐसा लगा कि उसकी अपनी रीढ़ नहीं है। उसकी अपनी कोई आवाज़ नहीं है। अपना अस्तित्व नहीं है। वह करण जौहर की कठपुतली है। ऐसे में वह खुद को कामयाब नहीं मान सकती। कंगना की इन बातों पर जब आलिया से बात की गई तो उसने कहा कि मुझे नहीं लगता कि कंगना मुझ से इतनी नाराज है कि मुझे नापसंद करें। वे नाराज हों इसलिए मैंने कुछ भी नहीं किया। फिर भी यदि उन्हें ऐसा लगता है तो उनसे मैं माफी मांग लूंगी।

जब कंगना से पूछा गया कि क्या बॉलीवुड की तथाकथित हस्तियां फिल्म और लोकप्रिय बनाने में सहयोग देती तो कंगना ने कहा कि दूसरे सिने कलाकारों से कोई मदद मेरी फिल्म में नहीं मिलती। लेकिन वे फिल्म देख तो सकते ही थे। मुझे तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं वह भी सिर्फ 31 साल की उम्र में। अब तो मैं फिल्म भी बनाने लगी तो वे क्यों मुझे आगे बढ़ाएंगे।

कंगना ने कहा,’बॉलीवुड इंडस्ट्री के ऐसे लोग है जिन्हें शर्म ही नहीं है। इनमें कई तो मेरे दादा की उम्र के हैं। मैं उनके साथ काम नहीं करना चाहती। यह मैं उनके सामने कहने से डरती भी नहीं। हमने यह फिल्म रानी लक्ष्मीबाई की जिंदगी पर बनाई है। क्योंकि उन्होंने इस देश की खातिर जान गंवाई। आज अकेली कंगना रानौट एक आज़ाद देश में नहीं रह रही है। इस आज़ाद देश में 125 करोड़ लोग रह रहे हैं जो खुली हवा में सांस ले रहे हैं।

इस फिल्म के एक सह निर्देशक कृष जगरमुडी इस बात पर कंगना से रूठे हुए हंै कि वे कहती है कि वे भी इस फिल्म की निर्देशक हैं। कृष का कहना है कि पूरी फिल्म जून में उन्होंने संपादित की। साथ ही हर कलाकार ने अपने-अपने हिस्से की डबिंग की। उस समय कंगना लंदन में ‘मेंटल है क्या’ फिल्म की शूटिंग में थी। जब वे लौटी तो उन्होंने फिल्म देखी और कुछ जगह बदलाव की बात कहीं। कृष का कहना है कि उनके नाम के साथ क्रेडिट में छेडख़ानी हुई। मैंने जब उनसे कहा तो उन्होंने कहा,’आपको ज़रूरत है तो आए’। मुझे नहीं पता कि वे निश्चिंत होकर कैसे सो पाती है।

लोकतंत्र का ‘पांचवा’ स्तंम्भ भ्रष्टाचार

विश्व में लोकतंत्र को नया आयाम देने वाले हिटलर साहब कहा करते थे कि एक झूठ को बार-बार बोलो तो वह सच लगने लगता है। तभी तो हमारे नेता भी ऐसा ही करते हैं। इसी प्रकार किसी गीत को बार-बार सुनो तो वह अच्छा लगने लगता है। ‘भ्रष्टाचार’ भी कुछ ऐसा ही शब्द है। अपने देश में यह इतनी बार बोला जाता है कि अब यह भी लोकतंत्र का पांचवा स्तम्भ लगने लगा है। बाकी चार स्तंभ तो कुछ कमज़ोर हैं पर यह पांचवा दिनों-दिन मज़बूत होता जा रहा है। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी कितने मोहक शब्द लगने लगे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि भ्रष्टाचारी शब्द जुड़ता है देश के नेताओं के साथ, बड़े उद्योगपतियों के साथ, या बड़े नौकरशाहों के साथ यानी छोटा आदमी तो इस फहरिस्त में आता ही नहीं। हम क्या चाहते हैं? हम चाहते हैं अपने बच्चों को बनाना बड़ा नेता, बड़ा उद्योगपति या फिर बड़ा अफसर।

पर यहां एक विरोधाभास है। जो भी सरकार आई वह यही कहती है – ‘भ्रष्टाचार’ खत्म करके ही दम लेंगे। हालांकि ऐसा होता नहीं उल्टे होता तो यह है – ‘मजऱ् बढ़ता गया ज़्यों-ज़्यों दवा की’। तो इस धमकी से डरने की ज़रूरत नहीं यह केवल जुमला है जो बोलना पड़ता है। वैसे आज हम छाती फुला कर और सिर उठा कर कह सकते हैं कि हमने भ्रष्टाचार के मामले में दुनिया को कहीं पीछे छोड़ दिया है। देखना यह है कि भ्रष्टाचार है क्या? छोटी सी बात है – ‘पैसा दो काम लो’। बस इतना ही तो है। आपने ज़मीन का सौदा करना है तो राजस्व विभाग के कर्मचारी को पैसा दो। यदि विमान का सौदा है या तोप का सौदा है तो नेताओं को पैसा दो। अब तो भ्रष्टाचार को नए नाम भी दिए जाने लगे हैं- जैसे ‘डोनेशन’। बच्चे हमारी तरह ‘लायक’ हों और डाक्टर या इंजीनियर बनने की सलाहियत उनमें न हो तो निराश न हों। ऐसे योग्य छात्रों के लिए प्रोवीजऩ है। पर उसके लिए आपका अमीर होना ज़रूरी है। आप अमीर हैं, उद्योगपति हैं, तो पैसा फेंक दीजिए। मेडिकल या इंजीनियरिंग कालेज की एडमीशन आपके लाडलों के लिए घर तक चल कर आएगी। इस पैसा फेंकने को कहते हैं ‘डोनेशन’। बाकी बात रही गऱीब की, तो भाई यदि उसे डाक्टर या इंजीनियर बनवाना होता तो भगवान उसे अमीर घर में पैदा करता, भीखू के घर नहीं। हां यदि मामला स्कूल इत्यादि में दाखिले का हो तो स्कूल में ‘वाटर कूलर’ या ‘एसी’ पंख लगवा दो। मतलब यह कि जितना बड़ा काम उतना बड़ा दाम। इस सरकार ने तो शुरू में ही कह दिया था कि मुफ्त में कुछ नहीं मिलेगा।

अब बताओ इतनी सरल बात हमारे जैसे कुछ लोगों को समझ में नहीं आती। कभी सीबीआई, कभी ईडी, कभी विजिलेंस जैसे विभागों को लगा देते है काम पर। बात तो सही है। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो दाम कैसे बढ़ेगे। आखिर इन विभागों के लोगों के भी तो मुंह और पेट लगे हैं।

भ्रष्टाचार चुनाव और देशभक्ति का भी आपस में काफी गहरा गठजोड़ है। जैसे चुनाव पास आते हैं सब में देश भक्ति जागती है। उनके अंदर का भगत सिंह जीवित हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि ऊपर दिए गए सभी विभाग हरकत में आ जाते हैं। फिर विपक्ष के नेताओं से उन मामलों में पूछताछ शुरू हो जाती है जो दशकों पहले कथित रूप से घट चुके होते हैं। इस सारी प्रक्रिया में पांच-सात महीने लग जाते हैं और चुनाव निपट जाते हैं। फिर यह पूछताछ और कथित जांच एक बक्से में डाल दिए जाते हैं, तब तक के लिए जब तक नए चुनाव नहीं आ जाते। ये कुछ ऐसा ही होता है जैसे गर्मियां आने पर सर्दियों के कपड़ों को सुरक्षित अलमारियों में रख दिया जाता है।

इसके बाद फिर वही रोज़मर्रा के काम शुरू हो जाते हैं। सब कुछ भुला दिया जाता है। गली मुहल्ले के छुट भैया नेता एक दूजे से बहस करते, गाली गलौज करते या सिर फुटोल करते रहते हैं पर ऊपर के स्तर पर कोई फर्क नहीं पड़ता। कार्यकर्ता दरियां बिछाने और उठाते रहते है, उम्र गुजऱ जाती है। ऐसा करने पर उनकी जिं़दगी में कोई बदलाव नहीं आता। यह ऐसा ही है जैसा हम लोगों के जीवन में घटता है। धोबी के हाथों पिटने और बोझा ढोने के अलावा हमारे जीवन में कुछ नहीं है। न तो हमारी संपत्ति है और न ही हमारे पास कोई धन दौलत। इसके अलावा हमारे लोकतंत्र में पूंजीपति, नौकरशाह और नेता नहीं होते, इसलिए शायद हमारे समाज में भ्रष्टाचार नहीं होता। हम जो है जैसे हैं अच्छे-बुरे, अक्लमंद या बेअक्ल पर ‘भ्रष्टाचारी ‘ नहीं हैं।

अमेरिका में राष्ट्रीय इमरजेंसी

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को राष्ट्रीय इमरजेंसी घोषित कर दी है। ट्रम्प ने कहा कि वे मैक्सिको बार्डर पर दीवार बनाने के लिए नेशनल इमरजेंसी लगा रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक इमरजेंसी के दौरान ट्रंप मैक्सिको बार्डर पर दीवार बनाने के लिए फंड मंजूर करेंगे जो कि आपातकाल लगाए जाने का मुख्य कारण है। ट्रम्प  इसके लिए सरकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर रहे हैं। व्हाईट हाउस की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि राष्ट्रपति दीवार बनाने, सीमा की सुरक्षा करने और हमारे देश को सुरक्षित बनाने के अपने वादे को पूरा करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं।

ट्रंप सरकारी कामकाज पर खर्च से संबंधित बिल पर हस्ताक्षर करेंगे और जैसा कि उन्होंने कहा है, वह दूसरी जरूरी कार्रवाई करेंगे जिसमें आपातकाल की घोषणा भी शामिल है। इसके जरिए हम सुनिश्चित करेंगे कि सीमा पर राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा न पहुंचे और मानवीय संकट पैदा न हो।

ट्रंप आपातकाल की घोषणा कर वह दीवार बनाने के लिए जरूरी ५.६ अरब अमेरिकी डॉलर की राशि हासिल कर सकते हैं। अमेरिकी में सरकारी खर्चों के लिए वित्तीय प्रस्तावों को मंजूरी देने का अधिकार संसद के पास सुरक्षित है. इसके चलते राष्ट्रपति  ट्रंप और संसद के बीच टकराव चल रहा है।

ट्रंप अमेरिका में अवैध रूप से घुस आने वाले घुसपैठी प्रवासियों की समस्या पर लगाम लगाने के लिए मैक्सिको की सीमा पर दीवार बनाना चाहते हैं। साल २०१६ के राष्ट्रपति चुनाव के समय वादा किया था लेकिन संसद दीवार बनाने के लिए पैसे मंजूर नहीं कर रही है। इसके चलते इमरजेंसी की घोषणा कर ट्रंप ये रकम मंजूर करना चाहते हैं। व्हाइट हाउस की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि राष्ट्रपति दीवार बनाने, सीमा की सुरक्षा करने और हमारे देश को सुरक्षित बनाने के अपने वादे को पूरा करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं।

मोदी, राहुल ने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की

पीएम नरेंद्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सहित मंत्रियों ने दिल्ली एयर पोर्ट पर
पुलवामा के शहीदों के शवों पर पुष्प चक्र रखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, गृह मंत्री राजनाथ सिंह के अलावा तीनों सेनाओं के अध्यक्षों ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
इससे पहले जम्‍मू कश्‍मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद हुए ४०  सीआरपीएफ जवानों के पार्थ‍िव शरीर लेकर सेना का एक विमान दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर पहुंचा। वायु सेना के सी-१७ विमान से पार्थिव शरीर लाए गए। शहीदों को श्रद्धांज‍ल‍ि देने के लिए पीएम मोदी के अलावा रक्षा मंत्री न‍िर्मला सीतारमन, गृहमंत्री राजनाथ सि‍ंह और कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी पालम एयरपोर्ट पहुंचे।
पालम एयरपोर्ट पर पहुंचकर पीएम मोदी ने इस आतंकी हमले में शहीद हुए जवानों को अपनी श्रद्धांज‍ल‍ि दी और परिक्रमा भी की। प्रधानमंत्री ने पुष्‍पचक्र अर्प‍ित करने के बाद सभी पा‍र्थ‍िव शरीर के आसपास पूरा एक चक्‍कर लगाया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी बहुत पहले एयर पोर्ट पहुँच गए थे। वे सेना अध्यक्ष जनरल विपिन रावत के साथ खड़े थे और दोनों को काफी देर तक बातचीत करते देखा गया। सेना के अध‍िकार‍ियों के अलावा कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने शहीद जवानों को अपनी श्रद्धांज‍ल‍ि दी।

पाक में उच्चायुक्त को दिल्ली बुलाया

पाकिस्तान में उच्चायुक्त अजय बिसारिया को दिल्ली  बुलाया है। पुलवामा आतंकी हमले, जिसमें सीआरपीएफ के ३७ जवान गुरूवार को शहीद हो गए थे, को लेकर चर्चा के लिए उन्हें दिल्ली तलब किया गया है। इससे पहले सुबह भारत ने पाकिस्तान को विशेष राष्ट्र (मोस्ट फावर्ड नेशन) का दर्जा ख़त्म कर दिया था, जो १९९६ में दिया गया था।

आतंकी घटना के बाद कश्मीर के पुलवामा और अवंतीपोरा में सात लोगों को हिरासत में लिया गया है। भारत पाकिस्तान के ऊपर दुनिया भर से दवाब बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। देश भर में इस घटना के बाद बहुत ज्यादा आक्रोश है और मोदी सरकार इससे दवाब में है।

भारत सरकार ने किसी तरह के मिलिट्री आपरेशन का कोइ संकेत नहीं दिया है लेकिन जैसा दवाब देश में बन रहा है उसे देखते इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सरकार विभिन्न देशों के साथ कल की आतंकी घटना को प्रमाण सहित संपर्क कर उठाये ताकि पाकिस्तान पर जबरदस्त दवाब बनाया जा सके।

उधर पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त को कंसल्टेशन के लिए बुलाया गया है। इसके बाद सरकार क्या फैसला करेगी अभी कहना मुश्किल है लेकिन इसमें कोइ दो राय नहीं कि पाकिस्तान अब दवाब में है। चीन ने भले अज़हर मसूद को लेकर भारत विरोधी रुख अपनाया है, आज उसने पुलवामा की घटना की निंदा ज़रूर की है।