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सबको एक करके देश बचाओ

नई दिल्ली में तेरह फरवरी का दिन खासा व्यस्त रहा। विपक्षी एकता के लिहाज से खासा काम हुआ। कांग्रेस, तृणमूल, वामपंथी दल, द्रमुक, तेलुगु देशम और कई और दल एक साथ आए। पश्चिम बंगाल में कोलकाता के बाद नई दिल्ली में ‘भारत एक रखो’ के तहत विपक्षी दलों की यह दूसरी रैली थी। इसके बाद विपक्षी दलों के नेताओं ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार के घर पर राय मश्विरा किया। एकजुटता का संकल्प लिया।

सभी दलों के नेतओं में इस बात पर सहमति बनी कि सब को एक होकर हाल-फिलहाल देश को बचाना है। सभी विपक्षी दलों में इस मुद्दे पर एकता होगी। राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल इस पर काम करेंगे। अगली बैठक अब 26 फरवरी को होगी। विपक्षी दलों की नियमित बैठकों पर भाजपा नेतृत्व के एनडीए में खासी बेचैनी है। राहुल गांधी ने कहा, यह नई शुरूआत है। भाजपा को हारने के लिए हम जनता के बीच जाएंगे । सारी बात बात बताएंगे।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने रैली में कहा, आज सबसे बड़ा संकट देश को बचाने का है। देश को मंदिर-मस्जिद, गिरजाघर, गुरूद्वारा के नाम पर बटाने आपसे में लड़ाने का नहीं होना चाहिए। जो भाजपा ने किया है। बदले की कार्रवाई में ये लोग सीबीआई के लोगों को भेजते हैं। सबको परेशान करते हैं। लेकिन मैं डरती नहीं। कितनी भी सीबीआई लगा दो। मैं सबको उनकी पसंद का वेज, और नॉन वेज खिलाऊँगी। लेकिन आपके अत्याचार के खिलाफ लडूंगी। मैं तो वाम मोर्चा, कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई लड़ती रही हूूं। यह लड़ाई हम बाद में भी लड़ लेंगे। लेकिन अभी देश बचाना है। देश को मोदी-शाह से बचाना है । ये लोग अब सिंह हो गए है । इनके हाथ खून से सने हैं।

रैली में वामपंथी दलों के नेता, राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी के नेता भी थे। ये कोलकात रैली में नहीं पहुंच पाए थे। इनके अलावा आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू थे। भाजपा नेता और प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों आंध्रप्रदेश में नायडू और उनके परिवार और मुख्यमंत्री के रूप में उनके काम काज पर जो कुछ कहा था उस पर नायडू नई दिल्ली में सार्वजनिक तौर पर अपना प्रतिवाद जताया और धरने पर बैठे थे।

रैली में चंद्रबाबू नायडू, नेशनल कांफ्रेस के नेता फारूख अब्दुल्ला लोकतांत्रिक जनता दल के शरद यादव, द्रमुक की कनीमोझी, अरूणाचल के पूर्व मुख्यमंत्री गोगांग अपांग जिन्होंने पिछले ही महीने नागरिकता कानून के मामले पर भाजपा से इस्तीफा दिया, माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी, भाकपा के डी राजा और सपा के नेता रामगोपाल यादव थे।

फारूख अब्दुल्ला ने कहा कि पहले भाजपा को हराओ फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी के बारे में सोचो। ममता बनर्जी ने कहा, विपक्ष जहां मजबूत है वहां की अपनी सीट फिर जीते और दूसरी जगहों पर भी लड़ाई तेज करे। अरविंद दिल्ली की सीटें, चंद्रबाबू आंध्र में और सपा-बसपा रालोद उत्तरपद्रेश में।

कांग्रेस की ओर से रैली में आनंद शर्मा ने कहा कि आश्चर्य है कि सीबीआई और ईडी एजेंसी कभी भाजपा नेताओं के खिलाफ छापे नहीं डालते। उनसे पूछताछ नहीं करती। भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार ने तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं को स्तरहीन बना दिया है।

मोदी पर नायडू ने कहा, कि यह देश पड़े लिखे लोगों का देश है। जिन्होंने तकनॉलॉजी में बहुत काम किया है। समस्या यह है कि प्रधानमंत्री खुद ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं है। मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने डिग्री कहां से ली तो उन्होंने बात टाल दी।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए की सरकार के खिलाफ भी इसी जंतर मंतर पर हवा बंधी थी। जनता फिर अब भाजपा के नेतृत्व की एनडीए सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकने की मांग कर रही है।

स्वामी अमितानदंन दानंद सरस्वती

फूंक-फूंक कर प्रियंका ने कदम रखे लखनऊ में

कांग्रेस को उत्तरप्रदेश में लगभग खत्म करने वाले घुटे हुए पुराने कांग्रेसियों की नींद उड़ गई है। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी प्रदेश में अपनी बहन प्रियंका को सेक्रेटरी बनाकर लाएंगे। उन्हें हमेशा यही लगता था कि अमेठी-रायबरेली तक ही गांधी परिवार सीमित रहेगा। प्रियंका को पूर्वी उत्तरप्रदेश में लाना राजीव की रणनीतिक सूझ है जिसमें वे कामयाब रहे।

प्रियंका की राजनीतिक सूझबूझ को अमेठी रायबरेली में ही सिमटा देने वाले राजनीतिक सूला इस समय काफी विस्मित हैं। उन्हें खुद को दिन-रात यह डर सता रहा है कि जातियों में उच्च वर्ग में होते हुए भी कहीं उन्हें राहुल-प्रियंका -ज्योतिरादित्य की तिकड़ी हशिए पर न कर दे। लखनऊ में अमौसी हवाई अड्डे से लखनऊ माल रोड में कांग्रेस के मुख्यालय के पूरे रास्ते चार घंटे के रोड शो में तिकड़ी और प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर ही छाए रहे। पूरे रास्ते प्रियंका सिर्फ अपने विभिन्नपोज से प्रशंसकों की तारीफ पाती रही। पूरे रास्ते वे खुश और प्रशंसकों के नारों को देखती-सुनती रहीं। उन्हें अहसास है कि राजनीति में किस तरह उन्हें फंूक-फंूक कर अगला कदम रखना है।

अमेरिका से दिल्ली में आने के बाद उन्होंने यही कहा था कि पति, परिवार और पार्टी उनकी जिम्मेदारी है। दूसरे दिन एक दो लाइन का उनका संदेश वायरल हुआ कि महिलाओं और युवाओं को साथ लेकर वे नई राजनीति में नई भागीदारी करेंगी। अपनी राजनीति प्रियंका अच्छी तरह जानती समझती है। तमाम चुनौतियों का उन्हें पूरा अहसास है इसलिए लखनऊ में जाकर भी उन्होंने सिर्फ भांपा है कि कितना कुछ उन्हें करना है। बेहद कम समय में।

प्रियंका को अहसास है कि उनके चेहरे में इंदिरा का नाक-नक्शा तलाशने वाले उनके व्यक्तित्व को दबाने की कोशिश में लगे हुए हैं। वे इस राजनीति को समझती हैं। लेकिन खामोश रहती है। लखनऊ में कांग्रेस ही नहीं बल्कि एक बड़े समुदाय ने राहुल-प्रियंका -सिंधिया का स्वागत किया। बाबा भूतनाथ से आए बुजुर्ग साधु रामचरण दास ने तो कहा कि उन्हें मानस की चैपाइयां स्मरण र्हो आइं और वही वे गुनगुनाने लगे। इस त्रिमूर्ति को उन्होंने प्रणाम किया। मुस्कराते हुए वे पैदल निकल गए।

एक अर्से से राहुल-प्रियंका और उनके विश्वसित लोग मिशन उत्तरप्रदेश पर काम करते रहे हंै। कांग्रेस में बिखराव और प्रदेश में उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं में गायब हो गए जोश को उन्होंने लखनऊ के इस रोड शो से खासा झिंझोड़ा है। उन्होंने ज़मीन पर उतर कर बदलाव की आंधी को परखा है। भाजपा के ऐसे नेता जो 2014 में मोदी लहर में अचानक कुर्सी पर आ गए वे अब खासे असमजंस में हैं। उन्हें अ बवह शिष्ट हिंदी याद नहीं आती जिसमें वे अपने घर-परिवार में बातचीत करते हैं।

अपनी खामोशी को ताजी मुस्कराहट के जरिए प्रियंका-राहुल-सिंधिया की तिकड़ी पूरे रोड शो में बिखेरती रही। यह ताजगी एक अलग किस्म की थी जो मंदिर-मस्जिद विवाद से अलग थी। यह ताजगी उस माहौल में बिखर रही थी जिसमें पेड़ों से पुराने पत्ते हट रहे थे नए पत्तों के आने के लिए। कांग्रेस की तिकड़ी के रोड शो के चलते न केवल लखनऊ बल्कि रायबरेली अयोध्या? फैजाबाद, अमेठी, सुल्तानपुर, शाहगंज और जौनपुर से वाराणसी , गोरखपुर , कुशीनगर तक कांग्रेस की वापिसी का संदेश पहुंचा। इस प्रदेश में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी और उनके साथ की अपील है। इस अपील में कोई जाति, वर्ण , अमीर-गरीब की बात नहीं है। इसमें सिर्फ साथ चलने और परस्पर सहयोग का निवेदन है।

कांग्रेस में आए इस बदलाव से सपा और बसपा शिविरों में कतई कोई घबराहट नहीं है, क्योंकि इन पार्टियों के धुरंधर नेता इस बात पर एकमत हैं कि राज्य में कांग्रेस को उसकी खोई हुई ज़मीन मिलनी चाहिए क्योंकि प्रदेश के लिए गंगा-जामुनी संस्कृति की परंपरा हमेशा विकास की ओर रही है। प्रदेश में शांति, सद्भाव और सौहार्द आज बहुत ज़रूरी है।

प्रियंका-राहुल-सिंधिया की तिकड़ी का रोड शो करीब चार घंटे का था। पूरी राह फूल-मालाओं से भरी पड़ी थी। गुलाबी टी शर्ट के साथ बड़ा जुलूस कांग्रेस कार्यकर्ताओं का था। राफेल जेट विमान का एक नमूना भी इस जुलूस में था और सड़क -सड़क पर नारे लग रहे थे ‘चैकीदार….’। कांगे्रस मुख्यालय पहुुंचने के साथ यह रोड शो खत्म हुआ।

 लेकिन इस रोड शो से यह संदेश पूरे प्रदेश में ज़रूर फैला कि कांग्रेस राज्य में खत्म नहीं हुई है। यह अभी भी सक्रिय है और सक्रिय हो सकती है, यदि राज्य के मतदाता सही ईवीएम मशीनों में अपने मत का उचित प्रयोग करें।

स्वामी अमितनंदनंदानंद सरस्वती

बहुमत वाली सरकार के लाभ गिनाए मोदी ने

फरवरी की तेरह तारीख को भाजपा नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोलहवीं लोकसभा में अपना विदाई भाषण दिया। उन्होंने देश की 125 करोड़ की जनता का धन्यवाद दिया। जिसने उनकी पार्टी को पूरा बहुमत दिया जिसके कारण यह सरकार देश में सबका साथ लेते हुए सबका विकास कर सकी। उन्होंने कहा कि देश की रक्षामंत्री, विदेश मंत्री और लोकसभा अध्यक्ष भी महिलाएं है जिन्होंने देश की कीर्ति बढ़ाई। उन्होंने एक नया आयाम अपने कार्यकाल में दिया है। इस सदन में सबसे ज़्यादा महिलाएं जीत कर आईं।

प्रधानमंत्री अपने विदा भाषण में भी कांग्रेस पर व्यंग्य करने से नहीं चूके। उन्होंने कहा कि बड़ा सुना था भूकंप आने वाला है। लेकिन भूकंप नहीं आया (दरअसल राहुल गांधी ने 16 दिसंबर को अपने भाषण में कहा था कि इससे भूकंप आ जाएगा)। मोदी ने कहा, पहली बार पता चला मुझे कि गले मिलना और गले पडऩे का अलग-अलग अर्थ होता है।

उनका इशारा था कि पिछली जुलाई में राहुल गांधी लोकसभा में उनके गले लगे थे। उन्होंने आंखों की गुस्ताखी पर भी कटाक्ष किया। (उनका संदर्भ था कि राहुल गांधी ने गले मिलने के बाद आंख मारी थी।)

अपनी सरकार की तारीफ करते हुए प्रधानमंत्री ने अनेक उपलब्धियां गिनाई। उन्होंने कहा कि उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार में ऊर्जा, ग्लोबल वार्मिक, पेट्रोलियम, अंतरिक्ष में खासा विकास कार्य किया। अंतरिक्ष में सबसे ज़्यादा उपग्रह छोड़े। अपनी विदेश नीति की उपलब्धि गिनाते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह बांग्ला देश के साथ भूमि विवाद का निपटारा हुआ। रोहिंग्या शरणर्थी, शत्रु देश की संपत्ति आदि पर भी उचित फैसले हुए। पूरी दुनिया मे ंभारत का डंका पिटा। योग को कबूल किया गया। महात्मा गांधी की डेढ़ सौंवी जयंती पर दुनिया के सवा सौ गायकों से वैष्णव जन तो तेरे कहियो, पीर पराई जाने दे’। देश में 26 जनवरी की परेड में विभिन्न राज्यों ने महात्मा गांधी के विभिन्न रूपों की झलकियां दिखाई। यह कितना आकर्षक था। इसी सरकार ने संविधान दिवस, अंबडेकर दिवस मनाया। काले धान पर विधेयक, भ्रष्टाचार पर विधेयक, भगोडे लोगों को वापस देश में लाने, उन पर विधेयक चलाने का कानून बना। जीएसटी को ऐतिहासिक तौर पर लागू किया आधार को इतनी बड़ी आबादी के लिए उपयोगी और अनिवार्य किया। इसी सरकार ने सामाजिक न्याय पर विधेयक और उच्च वर्ग के गरीबों के लिए आरक्षण का विधेयक पास किया। ओबीसी के लिए आयोग भी बना। बेमतलब के 1400 ये ज़्यादा कानून खत्म किए। सिलसिला अभी जारी है।

सदन ने बुजुर्ग अनुभवी सांसदों के प्रति भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आभार जतााया। उन्होंने आडवाणी, मल्लिाकार्जुन खडग़े और मुलायम सिंह यादव के प्रति अपना सम्मान जताया। उन्होंने कहा कि इन्होंने सदन की स्वस्थ लोकतांत्रिक गरिमा बनाए रखी। मैं इनके प्रति आभार व्यक्त करता हूं।

‘झूठ और धमकाने वाली तूफानी सरकार है यह’

सोलहवीं लोकसभा में कांग्रेस संसदीय पार्टी की अंतिम बैठक में बोलती हुई कांग्रेस की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने बुधवार (13 फरवरी) को कहा कि नरेंद्र मोदी की सरकार झूट, और धमकाने वाली तूफानी सरकार रही है। यही इसका दर्शन रहा है।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी में नई ऊर्जा और ताकत का संचार पार्टी के नए अध्यक्ष की सक्रियता से हुआ है। इससे विपक्ष में थोड़ी घबराहट भी है। कांग्रेस पूरे आत्मविश्पास और संकल्प के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी।  पार्टी के पुराने और नए नेता और कार्यकर्ता इस बार अच्छे कामयाब भी नजऱ आएंगे। कांग्रेस में हमेशा एकता, आत्म त्याग और आत्म अनुशासन पर ज़ोर दिया जाता रहा है।

काग्रेस अध्यक्ष राहुल ने कहा कि राफेल जेट विमान सौदे में प्रधानमंत्री ने जो झूठ तूफानी तरीके से बोला है वह गली-गली में गूंज रहा है और लोग उसकी पहचान ‘चैकीदार ‘ शब्द  आते ही करते हैं। हम वैचारिक और चुनावी लड़ाई में भाजपा को परास्त करेंगे। पूरे देश में आज बदलाव की फिजां बन गई है।

सोनिया गांधी ने कहा आज देश में आर्थिक स्थिति बहुत खराब है और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था  की चूलें मोदी सरकार ने दरका रखीं है। हमारे संविधान के नियमों और व्सवस्थाओं को मोदी सरकार ने लगातार निशाना बनाया है। इसे ठीक किया जाना बहुत ही ज़रूरी है। तमाम लोकतांत्रिक संस्थानों की इस सरकार ने क्षति की है। राजनीतिक और बुद्धिजीवियों ने जब इसका विरोध किया तो उनके पीछे इस सरकार ने अपनी एजेंसियां लगा दी जिससे वे दबाव में आ जाएं। अभिव्यक्ति की आज़ादी, मीडिया पर अंकुश के विभिन्न तरीके इस सरकार ने अमल में लाए हैं। पूरे देश में डर और संघर्ष का माहौल है।

मुलायम का नरेंद्र मोदी को फिर प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लोकसभा में बुधवार (13 फरवरी) को अपने विदा भाषण में बुजुर्गों के प्रति आभार जताते हुए बुजुर्ग सांसद मुलायम सिंह यादव के प्रति कृतज्ञता जताई। उस पल मुलायम काफी भावुक हो  उठे। उन्होंने नरेंद्र मोदी को फिर प्रधानमंत्री होने का आशीर्वांद दिया। उनकी इस प्रतिक्रिया से कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और विपक्ष के दूसरे नेता खासे विस्मित हुए।

वरिष्ठ सांसद मुलायम सिंह यादव  ने नमन करते हुए कहा,’मेरी कामना है कि प्रधानमंत्री तो आप फिर से बने।’ उनके यह कहते ही भाजपा सांसदों ने मेज थपथपा कर स्वागत किया। उनके साथ ही बैठी सोनिया गांधी ने मुस्कुराते हुए उन्हें देखा।  मुलायम सिंह ने कहा, यहां जितने भी बैठे हैं वे फिर जीत कर लौटें। मुलायम सिंह की कामना और विभिन्न सांसदो की क्रिया -प्रतिक्रिया सदन से बाहर भी गूंजती रही।

मोदी का बघनखा बनाम राहुल का व्याकरण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा में दिया गया भाषण इस बात की ओर संकेत करता है कि आगामी चुनावों में अपनी जीत के प्रति आश्वत नहीं हैं। वे राष्ट्रपति के बजट अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कोई भी लोकतंत्र मिलावटी व्यवस्था को स्वीकार नहीं करेगा। इससे पूर्व वे यह भी कह चुके थे कि अब तो ‘महामिलावट’ आने वाला है। इससे स्पष्ट है कि उनके मन में कई तरह की आशंकाएं हैं।

मुझे इस बात की खुशी है कि फिसल कर ही सही प्रधानमंत्री की जुबान से यह बात निकली। यह इसलिए सुखद है कि हमारे प्रधानमंत्री असलियत से नावाकिफ़ नहीं हैं। मैं तो अब तक समझता था कि मोदी को ज़मीनी सच्चाई का पता ही नहीं है और ऐसा नहीं है कि वे अनजान होने का ढोंग भर रहे हैं। इसलिए यह देश के लिए राहत की बात है कि प्रधानमंत्री को सब पता है। वे जानते हैं कि उनकी लोकप्रियता चरमरा गई है। वे जानते हैं कि उनके साथ भारतीय जनता पार्टी डूब रही है। आप ही बताइए कौन सी स्थिति ज़्यादा खतरनाक होती। वह कि प्रधानमंत्री माने बैठे हैं कि उनका सिंहासन अडिग है। या वह कि प्रधानमंत्री को अहसास है कि पाए बुरी तरह हिल चुके हैं।

ज़ाहिर है कि अपने स्वर्ग में रह रहे एक प्रधानमंत्री से वह प्रधानमंत्री बेहतर है जो यथार्थ की मुंडेर पर खड़ा है। अपने में ही मस्त रहने वाले प्रधानमंत्री को अगर आगामी लू की लपटों का अहसास हो गया है तो मैं तो इसे अच्छा लक्षण मानता हूं। दूसरों को ठेंगे पर रखने वाले प्रधानमंत्री को अगर आगे की ऊबड़-खाबड़ राह दिखने लगी है तो मैं तो इसे सकारात्मक संकेत मानता हूं। लेकिन मैं थोड़ा डरा हुआ भी हूं। इसलिए कि यह तो मोदी पर ही निर्भर करता है कि अपने इस अहसास को वे भारतीय लोकतंत्र का शास्त्रीय नृत्य बनने देंगे या उनमें जागा यह आत्मबोध हमें अपने प्रधानमंत्री की तांडव मुद्राओं का दर्शन कराएगा। क्योंकि अगर नरेंद्र भाई अपनी गुदगुदी रजाई में ही बैठे होते तो कम से कम इतना तो होता कि वे कुछ भी ठीक करने की कोशिश नहीं करते और जो होना था हो जाता। मगर अब तो उन्हें मालूम हो गया है कि महागठबंधन उनकी देहरी तक पहुंच गया है इसलिए वे इस ‘महामिलावट’ से अपनी रसोई को बचाने के लिए सब कुछ करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे। और हमने देखा है कि जब हमारे प्रधानमंत्री चीज़ों को दुरुस्त करने पर आमादा हो जाते हैं तो आगा पीछा सोचे बिना ऐसी तलवार भांजते हैं कि मुल्क़ का रोआं-रोआं ज़ख्मी होकर कितना ही विलाप करे वे अपने कानों पर कोई जूं नहीं रेंगने देते हैं। पौने पांच बरस में अपने प्रधानमंत्री की हंटरबाज़ी से देश की देह पर पड़े फफोले अब तक रिसते हम देख ही रहे हैं।

ऐसे में ‘चोरों से निपटने’ के लिए हर कीमत पर अपनी हुकूमत वापस लाने की ताब ने हमारे ‘गऱीबनवाज़’ प्रधानमंत्री को अगर अपने इरादों के घोड़े पर सवार कर दिया तो समझ लीजिए कि इस बार के लोकसभा चुनाव तक बचे इन महीनों में भारत वह सब देखेगा जो उसने कभी नहीं देखा होगा। महागठबंधन की आहट सुन लेने के शब्द भले ही नरेंद्र भाई की ज़ुबान ने बत्तीस दांतों का पहरा तोड़ कर बाहर ठेल दिए मगर इसका मतलब यह नहीं है कि उनमें इस सच्चाई का सामना जनतांत्रिक तरीके से करने की नैतिक उदारता भी घुल गई है। उनके पोर-पोर में वह विचार मौजूद है जिसे अक्षरश: लागू करने में ही वे अपना जन्म सफल मानते हैं। लोकतंत्र की उनकी अपनी परिभाषा है समाजतंत्र की उनकी अपनी परिभाषा है और जन-जीवन में अनुशासन की उनकी अपनी परिकल्पना है। अपने सपनों का भारत बनाने के लिए वे भारत के किसी भी सपने को क़ुर्बान करने में कतई हिचक नहीं दिखाएंगे।

इसलिए हम सभी तुच्छ देशवासियों के लिए यह समय अपने पराक्रमी प्रधानमंत्री की एक-एक पदचाप पर गहरी निगाह रखने का है। पलक झपकी नहीं कि नरेंद्र भाई अपनी वापसी का रास्ता साफ कर लेंगे। वे तो आंखों में धूल झोंक कर मंजिल पर प्रकट होने की विद्या जानते हैं। सोए उनींदे पहरेदारों की बगल से तो वे चुटकी बजाते गुजऱ जाएंगे। ममता बनर्जी के सत्याग्रही धरनों अरविंद केजरीवाल के जिद्दी अभियानों चंद्राबाबू नायडू के सूक्ष्म जंजालों शरद पवार की कुशाग्र डुबकियों शिवसेना के जटिल गलियारों और प्रियंका गांधी के आगमन से कांग्रेस में आई तीक्ष्णता को भोथरा करने का जो विज्ञान हमारे प्रधानमंत्री के पास है वह नियमों और परंपराओं की किसी भी दीवार से बंधा हुआ नहीं है। असली चिंता यही है।

आगामी आम चुनाव के कुरुक्षेत्र में नरेंद्र भाई के रथ को रोकने के लिए देश के चारों कोनों से वैचारिक समानता के सिपाही निकल तो पड़े हैं लेकिन उन्हें भाजपा के इस वाजिब प्रश्न का उत्तर भी देना होगा कि आखिऱ उनका अखिल भारतीय सेनापति कौन है। जिन्हें लगता है कि मोदी के जानबूझ कर फेंके इस जाल में फंसने से बेहतर है सवाल की अनदेखी वे ग़लती पर हैं। पूरे चुनाव को दो विचार समूहों के बजाय दो व्यक्तियों के बीच चयन का मुद्दा बनाने की नरेंद्र भाई की चाल किसी को कितनी ही डरावनी लगती हो मुझे तो लगता है कि उनकी यह गेंद महागठबंधन को तुरंत लपक कर राहुल गांधी की तरफ  लुढ़का देनी चाहिए।

इसलिए कि जब बाकी सब के पास मज़ाक और उपहास था राहुल के पास दृढ़ता थी। मई 2014 में शुरू हुए मोदी युग के बाद एक साल पहले तक हम सब को लग रहा था कि इस युग ने अवाम से उसका लड़ाकूपन बड़ी कामयाबी से छीन लिया है। आज अगर यह लड़ाकूपन लौटा है तो उसमें राहुल की अनवरत दृढ़ता का सबसे बड़ा योगदान है। उन्होंने नरेंद्र मोदी के ‘चरखावतार’ का पर्दाफ़ाश किसी भी और से ज़्यादा शिद्दत के साथ किया। मोदी का लात खा कर लस्तपस्त पड़ी कांग्रेस को जब सोनिया गांधी फिर अपने पैरों पर खड़ा कर रही थीं तो राहुल ने अपने संगठन को वैचारिक और सांस्कृतिक तानाशाही के खि़लाफ़ लडऩे के लिए तैयार करने में अपनी महती भूमिका अदा की।

आज के राहुल में जो तेवर हैं उन्हें देख कर कोई भी मानेगा कि अगर अगला आम चुनाव ‘मोदी बनाम राहुल’ हो जाए तो नरेंद्र भाई बुरी तरह थर्रा जाएंगे। मैं जानता हूं कि पूरा संघ कुनबा किस तरह इस कोशिश में लगा है कि कहीं लोकसभा चुनाव मोदी राहुल के बीच चयन की जंग न बन जाए। क्योंकि मोदी की परछाईं से भयभीत देश को राहुल के साए में सुकून नजऱ आने लगा है। क्योंकि नरेंद्र भाई बघनखे के साए में सहमा देश बैर भाव के बिना सियासत का शाश्वत व्याकरण साधते राहुल की गोद में अपने को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करने लगा है। यही आम चुनाव का जीव द्रव्य है। नरेंद्र भाई तो इसे समझ गए हैं  महागठबंधन के क्षत्रप इसे जितनी जल्दी समझ जाएं उतना ही

बेहतर!

लेखक न्यूज़ व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।

रंगमंच सा बदला दिखा अपना बनारस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सात फरवरी को लोकसभा में राष्ट्रपति के भाषण पर धन्यवाद भाषण देते हुए देश में विदेशी निवेश की कामयाबी का उल्लेख किया। वाराणसी में 21 से 23 जनवरी के दौरान ‘प्रवासी सम्मेलन’ हुआ। इस आयोजन में देश-विदेश से आमंत्रित प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री इसमें मौजूद थे। इस सम्मेलन में निवेश के तमाम आश्वासनों पर आकलन का काम अब प्रशासन कर रहा है। वाराणसी में विकास की अभुगूंज इस मंच पर भी रही। तमाम धरोहरों पर विकास का खुलासा हावी रहा। व्यापक टूट-फूट पर विशाल हरे पर्दे लगे रहे।

पूरी वाराणसी रंगमंच में तब्दील रही। हर कहीं-कहीं देशी-विदेशी दर्शकों की खासी तादाद। शहर के किसी भी चौराहे, सड़क, गंगाघाट, काशी की गलियों, बनारस-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग हर कहीं सजा-संवरा रहा वाराणसी रंगमंच। शाम उठते ही बिजली के खंभों और घाट के मंदिरों से लेकर पर पाकाया (काशी की प्राचीन गलियों) से लाहौरी टोला तक अद्भुत समां दिखता रहा। यह समां था, विकास की रोशनी का। सड़क किनारे दीवारें भी चहक रही थीं। विभिन्न चित्रों और रोशनी से।

आपको बनारस की संस्कृति, मिजाज, रहन-सहन को समझने के लिए किसी पुस्तकालय या किसी से मिलने की ज़रूरत नहीं। बस भोजूबीर, कचहरी लहुराबीर, अंधरापुल, गोदोलिया, रथयात्रा, कमच्छा, भेलूपुर, रवींद्रपुरी कालोनी, लंका, गंगाघाट के किनारे कहीं भी दीवारों पर आधुनिक संस्कृति पढ़ सकते हैं। लाहौरी टोला में विकास। अब मैदानों मे दिखता है। कभी यहां संकरी ऐतिहासिक तंग गलियां थीं जिनमें छोटे-बड़े मंदिर थे। मकान थे धड़कते दिल की गुजरती बस की तरह यहां छोटी-छोटी दुकानों का व्यवसायिक शोर जिन पर तीर्थयात्रियों की भीड़ थी। वह शोर घर-घडिय़ालों की आवाज़ में डूबता-उतराता था। आज सिर्फ ‘विकास’ है।

प्रधानमंत्री अपने संसदीय क्षेत्र में ‘विकास’ की अद्भुत छटा पेश करने को हैं। प्रदेश और जिले का प्रशासन उनकी महत्वाकांशी योजना की अमल में लाने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पदभार संभालने के बाद से ही जुटा हुआ है। इस परियोजना के अमल में आने के साथ ही इस शहर की पूरी टोपोग्रैफी (प्राकृतिक बनावट) बदल जाएगी। साथ ही सदियों सेबसे एक प्राचीन शहर का सांप्रदायिक ताना-बाना भी बिखर जाएगा। यह दिखाना तब होगा जब देश विदेश में ऐसी तकनीकी सुविधाएं हैं। जिनकी मदद से पुरातन को संजोते हुए आधुनिक को बसाया जा सकता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर निर्माण योजना अमल में लाने के लिए काम ज़ोर-शोर से चालू है। इस महत्वकांक्षी योजना को अमल में लाते हुए नगर की सांस्कृतिक हिंदू विरासत खत्म कर दी गई। अभी तकरीबन ढाई सौ मकान और ध्वस्त होने हैं। सरकार ने कुछ को भरपूर और कुछ को आंशिक मुआवजा बांटा है इसलिए काशी के पुराने वाशिंदों की आवाज़ में वह दम भी नहीं रहा जो आंदोलन के लिए ज़रूरी होता है।

लेकिन फिर भी काशी में कुछ लोग बेहद बेचैन हैं। वे भले उस इलाके में कभी रहते न हों पर वे मानते हैं कि काशी की पूरी दुनिया में पहचान है। गंगा नदी, किनारे के घाट और यहां की प्राचीन संकरी तंग गलियों के लिए जहां मुगलों की सेनाओं और फिरंगियों की सेनाओं का मुकाबला होता रहा। उस इतिहास को ही दुबारा लिखा जा रहा है अपनी ही लोकतांत्रिक सरकार के हाथों। पुलिस की मौजूदगी में घर, मंदिर, दूकान सब तोड़े गए। काशी विद्वत समाज मन ही मन में आंदोलित है। अब वे अपने लोकतांत्रिक अधिकार के जरिए जवाब देने की बात करते हैं। वे दबे सुर में कहते हैं, यह सरकार आई थी अयोध्या में राम मंदिर बनाने लेकिन तबाह कर दिया बाबा की नगरी को। बर्बाद हो गई यहां की हिंदू आबादी। उनका काम-धंधा छिन गया। ‘का गंगा जी साफ हो गइलीं। गंगा जी उनके बुलौले रहलीं न।’ कुछ लोग बताते हैं कि कैसे अक्तूबर में एक प्राचीन धर्मस्थल के चबूतरे से जेसीबी छू गया तो किस तरह भीड़ जमा हो गई। प्रशासन ने माफी मांगी। लेकिन यहां तो क्या छोटे या क्या बड़े। सब टूटे। कोई नहीं बोला। अब खुले मैदान में कभी-कभी गाएं दिखती हैं।

दशाश्वमेघ घाट पर पंडागीरि करने वाले पंडा कन्हैया बनाते हैं कि गिने-चुने लोगों ने विरोध किया लेकिन पैसा और राजनीति के चलते वे भी चुप हो गए क्योंकि सरकार उन्हीं की थी। ‘एक वह समय था जब प्रदेश में बसपा या सपा की सरकार होती थी तो एक टूटे हुए शिवलिंग को लेकर धरना शुरू हो जाता था। आज तो ढेरों टूटे और साबुत शिवलिंग एक प्लॉट पर मिले तो कुछ भी नहीं हुआ। किसी नेता के मुंह से विरोध में कुछ एक बोल भी नहीं फूटा।’

कन्हैया कहते हैं कि प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी विकास परियोजना अगर यह रही है तो विकास आप प्राचीन काशी का ध्वंस करने की बजाए बाकी वाराणसी में कर देते। कम से कम तोड़-फोड़ करते हुए विशाल फ्लाई ओवर बनाते। आज तो दुनिया आपकी मुट्ठी में है। ग्लोबल टेंडर करते। प्राचीन काशी, गलियां भी सुरक्षित रहतीं और प्रधानमंत्री की महत्वकांक्षी योजना भी तरीके से अमल में आती। आपने तो सब तबाह कर दिया।

उधर वाराणसी के डिवीजनल कमिश्नर का कहना है कि प्रशासन ने सबसे राय-बात करके दूकानें, घर खरीदें। तोड़-फोड़ के दौरान घरों में मंदिरों का पता चला कोई मंदिर नहीं टूटा। वहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे कृष्ण कुमार ने कहा, ‘इस महत्वाकांक्षी योजना को अमल में लाते हुए ढेरों मंदिर तोड़े गए। धर्मसंसद में विहिप ने इस पर सवाल भी उठाए।

काशी में कभी कहा जाता था कि ‘मंदिर में घर है या घर में मंदिर।’ केदारनाथ में श्री विद्या मठ के अध्यक्ष अविमुक्तेश्वरानंद ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर निर्माण के लिए गलियों, घरों-मंदिरों की तोड़ फोड़ का खासा विरोध किया। कई बार आंदोलन किए। लेकिन कभी प्रशासन ने उनकी नहीं सुनी। वे सुबह से शाम तक पूरे इलाके में अपने कुछ समर्थकों के साथ घूमते। लोगों से अपील करते लेकिन उन्हें वह व्यापक जनसमर्थन नहीं मिल सका जिसके बल पर विनाश को संभाला जा सकता। उन्होंने बताया कि इस महत्वकांक्षी योजना को अमल में लाने के लिए पुरानी काशी की गलियों में बोझ से ज्य़ादा मंदिर और अनगिनत छोटे-छोटे मंदिर और मूर्तियां टूटीं।

वाराणसी विकास प्राधिकार के सचिव और काशी विश्वनाथ मंदिर के सीईओ और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के स्थानीय कर्ताधर्ता मिशाल सिंह है। उनकी खासी ख्याति है। लगभग 40 साल का यह अधिकारी 24 घंटे में 18 घंटे काम और दौरों में जुटा रहता है। उनका कहना है कि उनका नाम अब माताएं अपने रोते हुए बच्चों को धमकाने के लिए लेती हैं। जबकि न कभी उनकी प्रवृति न तो ऐसी है और न ही उनका वैसा व्यक्तित्व है। उनका कहना है कि किसी भी दिन देख लें काशी में एक लाख से ऊपर की संस्था में यहां श्रद्धालु और भक्त आते हैं। समय के साथ गलियां तो डेढ़ से दो फुट की चौड़ाई की हो गई थीं और तीज त्यौहार में भक्तों की कतार मुख्य सड़कों गलियों तक पहुंच जाती थी। बढ़ रहे ट्रैफिक से शहर यों ही बिहाल हो जाता था। फिर कतार में भक्त खड़े रहते दर्शन के लिए। न कहीं खाना पीना, न पानी और न शौचालय हमने सारी तोडफ़ोड़ और नवनिर्माण भक्त की श्रद्धा बनाए रखने के लिए थोड़ी सहज की है।

गलियों में जिन भी लोगों के घर-दुकानें टूटीं। उन्हें उसके लिए कानून के तहत उन्हें अच्छा खासा मुआवजा दिया गया। सर्किल टेंट का भी दुगुना जिसके चलते तो किसी ने विरोध नहीं किया। मुआवजा लिया और दूसरी ओर चलते बने। लेकिन लालच पैसा देख कर बढ़ता ही है। इसलिए अब खूब शोर है। हिंदुओं के धार्मिक इतिहास में यह पहली बार हुआ कि किसी प्राचीन धार्मिक स्थल को बेहतर बनाने की कोशिश की गई हो। अब तक कहीं किसी प्रशासन ने ऐसा नहीं किया। हम इस मिशन को रोकेंगे नहीं। पूरा करेंगे। यदि और भी मकान दूकान हमारी राह में आएंगे तो उन्हें भी ले लेंगे।

गलियों को मकानों दूकानों को ध्वंस करने का 80 फीसद काम हो गया है। बाकी तेजी से पूरा भी लेंगे। इस परियोजना को जिसमें काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्ट और गंगा रीवर फं्रट व्यू के लिए जिस सलाहकार को चुना गया वह अहमदाबाद से ही एचसीपी डिजाइन, लैंडिंग और मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड है। इसकी स्थापना हसमुख पटेल ने की थी जो साबरमती रिवरफ्रंट डेपलपमेंट परियोजना पूरी की थी। पिछले साल उनकी मौत हुई। उनके मित्र विमल पटेल को यह ठेका मिला है। कोशिश यह है कि वाराणसी के सभी रास्ते काशी विश्वनाथ और गंगा की ओर हो आएं।

काशी विश्वनाथ मंदिर के दो सौ मीटर के दायरे में अब न गलियां है, न मकान और न दूकान। जबकि पिछले साल अप्रैल तक मंदिर के आसपास बेहद व्यस्त बाजार हुआ करता था। अब व्यापार खत्म हो गया है। अभी काशी विश्वनाथ मंदिर के दूसरी तरफ विश्वनाथ गली भी टूटेंगी। कारिडोर की जगह और चौड़ा होगी। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री का कहना है कि यह पूरा काम महाश्विरात्रि तक पूरा कर लिया जाएगा।

किसानों, मज़दूरों और मझोले वर्ग को रिझाने के लिए आया बजट

अभी हाल भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में एनडीए सरकार को देश के महत्वपूर्ण हिंदी प्रदेशों मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा। इस खतरनाक स्थिति को भांप कर केंद्र सरकार ने समाज की अगड़ी जातियों को दस फीसद आरक्षण की घोषणा की। इससे कृषि से जुड़े समुदायों, नौकरी पेशा लोगों को रिझाने की कोशिश की गई।

कांग्रेस 2017 में जब पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा सरकार को परास्त कर सत्ता में आई तो इसने कजऱ् माफी की घोषणा की। पंजाब सरकार की इस पहल को राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी अपनाया गया।

इससे जाहिर हो गया कि मोदी सरकार भी आम चुनाव पर ऐसा बजट लाएगी जो सबको रिझा सके। इसलिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना घोषित की गई। जिसके तहत रुपए छह हजार मात्र छोटे और मझोले किसानों को मिलेंगे। सरकार ने निचले मझोले वर्ग के लिए भी घोषणाएं की हैं।

इसके तहत आयकर छूट की सीमा बढ़ा कर रुपए पांच लाख मात्र सालाना कर दी गई। साथ ही अंसगठित क्षेत्र के लिए पेंशन योजना घोषित की गई। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार यह घोषणा इसलिए आवश्यक थी क्योंकि कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष ने यह घोषणा कर दी थी कि कांग्रेस यदि सरकार में आई तो सरकार ही बेरोजगारों और किसानों को न्यूनतम आमदनी मुहैया कराएगी।

अंतरिम बजट जो 2019 का पेश किया गया उस पर इसी साल होने वाले आम चुनाव की गहरी छाप है। इससे यह भी पता चलता है कि समाज के कौन -कौन से वर्ग केंद्र से नाखुश हैं जिसका असल तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में दिखा, इसलिए किसानों के लिए आमदनी का समर्थन और असंगठित क्षेत्र के ऐसे श्रमिक जो रुपए 15000 मात्र मासिक तौर पर कमाते हैं उनके लिए पेंशन योजना भी घोषित की गई। मझोली आमदनी वाले वर्ग के लिए आयकर में छूट को इतनी बखूबी पेश किया गया है कि कम आय वर्ग के कर्मचारियों को लाभ हो। सालाना रुपए छह हजार मात्र की जिस आमदनी की घोषणा किसानों के लिए की गई है उससे बारह करोड़ परिवारों को लाभ होगा जो सभी घरों का 50 फीसद है। निजी आयकर में छूट उन लोगों को मिलेगी जिनकी सालाना आय रुपए पांच लाख मात्र से ऊपर है। इससे देश के तीन करोड़ मझोली आय वाले लोगों को टैक्स में लाभ होगा। घर संबंधी आमदनी पर लगे टैक्स के प्रस्तावों से रियल एस्टेट क्षेत्र को लाभ होगा। जो अमूमन सभी राज्यों में गृह निर्माण कार्य में जुटा है।

अंतरिम बजट 2019-20 को संसद में वित्त, कारपोरेट मामलों, रेलवे और कोयला के केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने पहली फरवरी को पेश किया। इसमें किसानों के लिए बड़ी योजना, विभिन्न कर सुविधाएं और आगामी वर्षों के लिए संभावित विकास के लिहाज से भी योजनाएं हैं। छोटे और हाशिए पर पहुंचे किसानों को रुपए छह हजार मात्र की सालाना आय है। असंगठित क्षेत्र के दस करोड़ मजदूरों और सालाना रुपए पांच लाख मात्र की आमदनी को कर मुक्त करने और स्टांप डयूटी में सुधार उत्तर-पूर्वी इलाकों के लिए रुपए 58,166 करोड़ मात्र की राशि, रक्षा पर रुपए तीन लाख करोड़ मात्र की व्यवस्था की गई। इसके अलावा हरियाणा के लिए नया एआईआईएमएस, विदेशियों की ही तरह भारतीय फिल्म निर्माताओं को एक ही जगह एकल खिड़की की सुविधाएं और शिक्षा, स्वास्थ्य, मूलभूत संसाधन और अनुसूचित जातियों, मत्स्य पालन और 1.5 करोड़ मछुआरों के कल्याण के लिए अलग मंत्रालय आदि अंतरिम बजट की खास विशेषताएं हैं।

किसानों के लिए योजनाएं

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएन-किसाल) के जरिए ऐसे किसान परिवारों जिनके पास दो हैक्टेयर भूमि है जिस पर फसल होती है उन्हें सालाना रुपए छह हजार मात्र की दर से सीधी आमदनी का समर्थन मिलेगा। इसके लिए वित्त वर्ष 2019-20 के लिए अंतरिम बजट में रुपए 75 हजार करोड़ मात्र रखा गया है। भारत सरकार की ओर से दी गई इस सुविधा का लाभ उन बारह करोड़ छोटे और हाशिए पर पहुंचे किसानों को उनके बैंकों में रुपए दो हजार मात्र की दर से तीन तिमाही किश्तों में दिया जाएगा। यह राशि पहली दिसंबर 2018 से जुडऩी शुरू होगी और 31 मार्च 2019 तक की अवधि की पहली किश्त इसी साल अदा कर दी जाएगी।

मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने मछली मंत्रालय (डिपार्टमेंट ऑफ फिशरीज) बनाने का फैसला लिया है। सरकार का इरादा है कि लगभग 1.45 करोड़ लोगों के जीवन यापन में सात फीसद से ज़्यादा की बढ़ोतरी हो सकेगी।

सरकार ने राष्ट्रीय गोकुल मिशन के लिए रुपए 750 करोड़ मात्र चालू साल के लिए तय किए हंै। राष्ट्रीय कामधेनु आयोग का गठन किया जाएगा जिससे उत्पादन बढ़े और गायों की वंशवृ़िद्ध हो। आयोग गायों के कल्याण और कानूनों को प्रभावशाली तौर पर अमल में लाएगा।

असंगठित क्षेत्र के दस करोड़ श्रमिकों और मजदूरों के लिए बतौर पेंशन प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन के तहत एक नई लाभदायक पेंशन योजना घोषित की गई है। वित्तमंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि अगले पांच साल में यह दुनिया की सबसे बड़ी पेंशन योजना के तौर पर गिनी जाएगी। इस योजना के तहत रुपए पांच सौ करोड़ मात्र की व्यवस्था की गई है। इस योजना को अमल में लाते हुए अतिरिक्त धन की यदि ज़रूरत हुई तो उसे भी उपलब्ध कराया जाएगा। यह योजना इसी साल से शुरू हो जाएगी।

टैक्स संबंधी लाभ

आयकर देने वाले ऐसे लोग जिनकी सालाना आय रुपए पांच लाख मात्र तक होगी उन्हें कोई आयकर नहीं देना होगा। वित्त मंत्री ने कहा कि जिनकी कुल आमदनी रुपए 6.50 लाख मात्र होगी उन्हें भी कोई आयकर नहीं देना होगा। बशर्ते वे भविष्य निधि (प्राविडेंट फंड) बचत और बीमा आदि में उनका निवेश है।

आवास पर लिए गए कजऱ् पर ब्याज बशर्ते यह रुपए दो लाख मात्र हो , शिक्षा कजऱ्, नेशनल पेंशन स्कीम निवेश, चिकित्सा बीमा और वरिष्ठ नागरिकों पर हुए चिकित्सा खर्च पर भी 2019-20 के अंतरिम बजठ में आयकर सहूलियतें दी गई हैं। करों में रुपए 18,500 करोड़ मात्र का लाभ प्रस्तावित हैं । इससे मझोले वर्ग और कर अदा करने वाले स्वंयसेवी, छोटे व्यापार धंधे, छोटे व्यापारी, वेतन कामगार, पेंशनर्स और वरिष्ठ नागरिकों को कर में राहत मिलेगी।

व्यक्तिगत तौर पर जिनकी सालाना आय रुपए पांच लाख मात्र हैं उन्हें कर से पूरी तौर पर छूट मिलेगी। उन्हें कोई आयकर देने की ज़रूरत नहीं है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, पिछले साढ़े चार साल में हमने जो कर संग्रह किए और कर का जो आधार जांचा-परखा उसमें खासी बढ़ोतरी दिखी है। इससे ‘माडरेट टैक्सशन हाई कांप्लाएंस’ उपलब्धि हुई है। ऐसे में ज़रूरी है कि कर सुधारों से हासिल लाभ से मझोली आमदनी वालों को राहत दी जाए।

ऐसे वेतनभोगी लोगों की वेतन से कटौती चालू रुपए 40 हजार मात्र से बढ़ाकर रुपए 50 हजार मात्र की जा रही है। इससे तीन करोड़ वेतनभोगियों और पेंशनर्स को रुपए 47 सौ करोड़ का अतिरिक्त लाभ मिलेगा।

इसी तरह स्त्रोत पर आयकर में कटौती बैंक व पोस्ट आफिस में रुपए दस हजार मात्र से बढ़ा कर रुपए 40 हजार कर दी गई है। इससे छोटे जमाकर्ताओं और रोजग़ार न करने वालों को लाभ होगा। मकान के किराए में टैक्स की कटौती भी एक लाख अस्सी हजार से दो लाख चालीस हजार कर दी गई है जिससे छोटे करदाताओं को राहत मिले।

वित्तमंत्री ने कहा कि सरकार ने मकान खरीदने वालों को भी टैक्स में राहत दी है। उन पर जीएसटी का जो दबाव है उसे कम करने पर सोचा जा रहा है। उन्होंने कहा कि जीएसटी देने वालों को हर तिमाही रिटर्न दाखिल करने की सुविधा दी जाएगी। इस संबंध में जल्दी ही मंत्री समूह और जीएसटी कौंसिल की बैठकों में फैसला लिया जाएगा।

मकान मालिकों को राहत

दूसरा मकान जहां मकान मालिक रहता हो वहां हो रही आय से टैक्स में राहत मिलेगी । अभी व्यवस्था है कि यदि किसी के पास खुद रहने के मकान के अलावा भी मकान है तो उससे आने वाले किराए पर टैक्स लगता था । वित्त मंत्री ने कहा कि मझोले वर्ग के लोगों को नौकरी के चलते दो स्थानों पर मां-बाप की देखरेख में कठिनाई होती थी। इसलिए आयकर

कानून का धारा 54 के तहत लाभ एक की बजाए दो आवास में दो करोड़ रुपए मात्र है। निवेश पर आयकर दाता को छूट मिलेगी।

मंहगाई

वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार को कामयाबी हासिल हुई है कि वह पिछले पांच साल में महगाई का औसत 4.6 फीसद कम कर सकी है। यह किसी भी और सरकार के दौर की तुलना में कम है। दिसंबर 2018 में तो महंगाई की दर महज 2.19 फीसद थी। यदि हमने महगाई पर काबू नहीं पाया होता तो हमारे परिवार आज 35-40 फीसद से ज्य़ादा का खर्च, भोजन, यात्रा, आवास आदि पर नहीं कर पाते। पिछले पांच साल यानी 2009-2014 मेें तो मंहगाई की औसत दर 10.1 फीसद थी।

विकास और विदेशी निवेश

हम लोग 2013-14 में विश्व अर्थव्यवस्था में 11वें स्थान पर थे। लेकिन आज हम दुनिया में छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं।

आज भारत में पिछले पांच साल में 239 बिलियन डालर का विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) हुआ है। ज्य़ादातर एफ डीआई के लिए ज्य़ादा भागदौड़ नहीं करनी पड़ी। यह अपने आप आई।

मनरेगा(एमजीएजआईजीए)

मनरेगा के लिए 2019-20 में रुपए 60 हज़ार करोड़ का बजट प्रावधान है। मंत्री ने बताया कि यदि और ज्य़ादा ज़रूरत हुई तो अतिरिक्त व्यवस्था की जाएगी।

आयुष्मान भारत

दुनियाभर में सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत के तहत देश के पचास करोड़ लोगों की चिकित्सा के लिए समुचित व्यवस्था इस बजट में की गई है। अब तक दस लाख मरीजों को मुफ्त इलाज से काफी लाभ हुआ है।

लाखों गरीब और मझोले आय वर्ग के लोगों को प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों पर समुचित कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। देश में 21 एआईआईएमएस की स्थापना की 2014 से घोषिणाएं हुई हैं। इनमें 14 पूरी तरह से काम कर रहे हैं। 22वां एआईआईएमएस हरियाणा में खुलने को है।

रक्षा बजट

पहली बार देश का रक्षा बजट तीन लाख करोड़ से भी ऊपर का है। रुपए 3,05,296 करोड़ मात्र की व्यवस्था 2019-20 के बजट अनुमान में है। इसके पहले रुपए 2,82,733 करोड़ मात्र की व्यवस्था की गई है। लेकिन 2018-19 में संशोधित आंकलन किया गया था उसमें यह राशि पहली बार देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिहाज से रक्षा बजट 2019-20 में तीन लाख करोड़ से भी ज्य़ादा का है।

अन्य

वित्तमंत्री ने कहा कि देश में मोबाइल टेलिफोन की दरें शायद दुनिया भर में कम हैं। पिछले पांच साल में मोबाइल डाटा का उपयोग पचास गुणा हुआ है। डाटा और वॉयस कॉल की दरें काफी कम हैं। आज मेक इन इंडिया के तहत मोबाइल और उसके कलपुर्जों को बनाने वाली कंपनियों दो की बजाए 268 हो गई हैं। इनमें नौकरी की अपार संभावनाएं हैं। वित्तमंत्री ने कहा कि जन धन अधिकार मोबाइल (जेएएम) और डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांस्फर से से समाज में खासा बदलाव दिखायें।

बैंकों का राष्ट्रीयकरण करीब पचास साल पहले हुआ। लेकिन ज्य़ादातर बैंक अधिकांश जनता से बैंकिंग कारोबार से जुड़े नहीं थे। पिछले पांच साल के जनधन बैंक खाते खोले गए। वित्तमंत्री ने कहा, आधार पर लगभग सारे देश में अमल हो चला है। इस से गरीब और मझोले तबके के लोगों को सीधे सरकारी योजनाओं का लाभ उनके बैंक अकाउंट में पहुंचता है।

देश के मनोरंजन उद्योग को नौकरी प्रदान करने वाला बड़ा क्षेत्र बताते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि भारतीय फिल्म निर्माताओं की समस्याओं का हल एक ही खिड़की पर अब होगा। यह सुविधा पहले विदेशी फिल्म निर्माताओं को हासिल थी। अब यह भारतीय फिल्म निर्माताओं को भी हासिल होगी।

उन्होंने घोषणा की, फिल्म निर्माण और पाइरेसी को रोकने के लिए ऐसी नियायक व्यवस्थाएं की गई हैं जिसके तहत खुद ही की गई घोषणाओं पर जांच-पड़ताल होगी।

प्रतिक्रिया

पूर्व केद्रीय वित्त मंत्री पी चिंदबरम ने कहा कि यह बजट वोटों की खातिर ही है। अंतरिम वित्तमंत्री ने हमारी याद्बाश्त में सबसे बड़ा अंतरिम बजट भाषण पेश किया है। यह बजट तो चुनावी प्रचार का बजट था। ऐसा करके सरकार ने परंपरा तोड़ी है।

सरकार ने गौओं को याद किया और उनके कल्याण के लिए रुपए 750 करोड़ मात्र नियत किए है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए रुपए 3000 मात्र की पेंशन का वादा किया है। जब वे 60 साल की उम्र में होंगे। इसके लिए रुपए 500 करोड़ मात्र नियत किए गए हैं। यदि ये चीजें वाकई महत्वपूर्ण थीं तो सरकार पांच साल तक इन योजनाओं के लिए घोषणाएं क्यों नहीं कर सकीं।

इस तरह सरकार ने छोटे-मझोले किसानों की आमदनी के लिहाज से रुपए 6000 मात्र सालाना की व्यवस्था की है। सवाल फिर यह भी उठता है कि शहरी गरीबी के लिए क्या कोई ऐसी योजना नहीं चाहिए। किसानों के लिए योजना का मैं स्वागत करता हूं लेकिन इसके लिए जो धनराशि तय की गई है वह कम है। इससे किसानों को तो मदद कम मिलेगी। असली लाभ तो जमींदारों और किसानों को कजऱ् देने वाले साहूकारों को होगा। मैं यह जानना चाहूंगा कि कैसे यह धन भूमि-लाभ किसानों और कृषि मजदूरों तक पहुंचाएगा जो वाकई ज़मीन जोततें हैं फसल उगाते हैं और बाज़ार तक उसे पहुंचाते हैं।

उन्होंने कहा प्रत्यक्ष कर रियायतों सरकार की अधिकार सीमा के बाहर है क्योंकि 100 दिन बाद नई सरकार सत्ता में आएगी।

सावधान! खतरे में हैं ग्लेशियर

इस सदी के अंत तक हिमालय के एक-तिहाई ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे। चाहे पूरी दुनिया मौसम के बदलाव को रोकने के लिए अपनी सारी निर्धारित योजनाएं पूरी ईमानदारी से लागू कर दे। ‘हिंदूकुश हिमालय’ पर जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि वातावरण और जलवायु नियंत्रण के लिए सभी उपाय नहीं हुए तो 2100 तक हिमालय के दो-तिहाई ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे। बड़े देशों के रुख को देखते हुए ऐसा लगता नहीं कि वे वातावरण को बचाने के प्रति किसी भी तरह से ईमानदार हैं।

इन हालात में सदी के अंत तक हिमालय का तापमान 4.4 डिग्री सेल्सियस (आठ डिग्री फारेनहाइट) तक बढ़ जाएगा जिससे खान-पान में बदलाव आने के साथ भारी गिनती में लोग विस्थापित हो जाएंगे।

हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के 2000 मील इलाके में फैले ग्लेशियर एक चौथाई दुनिया को पानी के स्त्रोत देते हैं। इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले फिलिपस वेस्टर इसे जलवायु का ऐसा संकट बताते हैं जिसके बारे में किसी ने सोचा तक नहीं होगा। इस रिपोर्ट को पिछले पांच सालों में 210 लेखकों ने पूरा किया है और 22 देशों के 350 से ज़्यादा अनुसंधानकर्ताओं ने इसमें अपने अनुसंधान का योगदान दिया है। पिछले साल अक्तूबर में संयुक्त राष्ट्र के जलवायु बदलाव पैनल ने एक रिपोर्ट पेश की थी जिसमें कहा गया था कि यदि ‘ग्रीन हाउस गैसेस’ मौजूदा दर पर वातावरण में फैलती रहीं तो 2040 तक इसका तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। यदि इसे रोकना है तो विश्व की अर्थव्यवस्था की गति और स्तर में भारी बदलाव लाना होगा।

एक रिपोर्ट के मुताबिक खतरा यह है कि मौजूदा हालात में हिमालय का तापमान कहीं और अधिक न हो जाए। एक अनुमान अनुसार यह 2.1 सेल्सियस तक बढ़ सकता है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पूरे विश्व में कम बर्फबारी और गर्मी का मौसम लंबे होने की वजह से 90 फीसद ग्लेशियर क्षेत्र कम हो जाएगा। नेपाल में स्थित ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटेग्रेटिड माउनटेन डिवेलपमेंट’ के महानिदेशक डेविड मोलडन का कहना है कि वातावरण का गर्म होना पहाड़ी लोगों पर काफी भारी पड़ेगा। इसके लिए हमें अभी कुछ करना पड़ेगा।

दक्षिण एशिया के आसपास जलवायु परिवर्तन का असर दिखना शुरू हो गया है। गर्म हवाएं लोगों को बीमार और गऱीब बना देंगी। इससे 8000 लाख लोगों का जीवन स्तर नीचे जाएगा। इसके साथ ही पानी की कमी भी होगी। यदि देखें तो पहाड़ी शहरों और कस्बों में पानी की किल्लत पहले से ही महसूस की जा रही है। पिछले मौसम में शिमला में लोगों ने पर्यटकों को नगर में न आने की सलाह दी थी ताकि वहां के स्थाई निवासियों को पानी की किल्लत न हो। एक सरकारी रपट के मुताबिक जो पिछले साल जारी की गई, भारत में अब तक का सबसे गहरा जल संकट है।

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 6000 लाख लोग पानी की भारी कमी का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक स्वच्छ जल न मिलने के कारण हर साल 2,00,000 लोग मारे जाते हैं। यह भी अनुमान है कि 2030 तक पीने के पानी की ज़रूरत उसकी सप्लाई से दुगना हो जाएगी। नेपाल की बात करें तो वहां तापमान बढऩे की वजह से पहले ही कई लोग उजड़ चुके हैं। पहाड़ी गावों में कम बर्फ पडऩे से बर्फ की चादर सिकुड़ रही है और साथ ही बारिश होने का ‘पैटर्न’ भी बदल रहा है। उपजाऊ भूमि बंजर होती जा रही है।

समुद्र तल से 13,000 फुट से भी अधिक उंचाई पर बसे एक गांव सैमजोंग के किसान पीटी गुरंग का कहना है कि सभी जल स्त्रोत खत्म हो गए हैं। कुछ साल पहले सैमजोंग गांव में रहने वाले सभी 18 परिवार लगभग 1000 फुट नीचे आ कर एक दूसरे गांव में बस गए थे। पर गुरूंग और उसके साथ रहने वाले लोग अभी भी चिंतित हैं। यहां भूस्खलन का लगातार खतरा है। सरकार की ओर से भी मिली सहायता अधूरी है। गुरूंग के पास पैसा भी नहीं है। इस हालात में वे लोग कहां जाएंगे ,उन्हें नहीं पता। गुरूंग ने बताया कि अब उनके पास ज़मीन भी नहीं है वे ज़मीन और पानी के बिना हिमालय क्षेत्र में कैसे रह पाएंगे, यह एक बड़ा सवाल है।

ग्लेशियर पूरे संसार में सिकुड रहे हैं। इसका बड़ा असर भारत में भी दिख रहा है। देश के प्रांत हिमाचल प्रदेश में कई ग्लेशियर हैं। इनमें बड़ा शिगरी, छोटा शिगरी, ब्यासकुंड, चंद्र ग्लेशियर, लेडी ऑफ किलांग, मुकिला ग्लेशियर वगैरा -वगैरा हैं।

स्पीति घाटी में कुंज़ुम दर्रे के पास बातल नामक स्थान से जुड़ा बड़ा शिगरी ग्लेशियर जिसका मुख (सनाउट)

1986 में सड़क तक था, आज वही पिघल कर कई किलोमीटर तक सिकुड़ गया है । उस तक पहुंचने के लिए एक पूरा दिन पैदल चलना पड़ता है। कमोवेश यही स्थिति ब्यास कुंड ग्लेशियर और बाकी ग्लेशियरों की भी है। इन पर शोध करने वाले कुछ लोगों की बात को अगर माने तो मांऊट एवरेस्ट के साथ के हिंदू-कुश हिमालय क्षेत्र के 5,500 ग्लेशियर सन 2100 तक 70 से 99 फीसद तक खत्म हो जाएंगे। इनके खत्म होने का सबसे बुरा असर खेती-बाड़ी और पन बिजली उत्पादन पर पड़ेगा। नेपाल में एक शोधकर्ता जोसफ शाय ने यूरोपीय ‘जियोसांइसेस यूनियन (इजीयू)’ की पत्रिका -द क्रियोस्फीयर’ में छपे अध्ययन में कहा है कि – ग्लेशियरों में परिवर्तन का संकेत स्पष्ट है। ग्लेशियरों का सिकुडऩा और उन पर बर्फ का घटना तापमान बढऩे का सबूत है।

शोधकर्ताओं के एक दल ने नेपाल में ग्लेशियरों का अध्ययन किया। इस क्षेत्र में विश्व की सबसे ऊंची चोटी मांऊट एवरेस्ट समेत कई और भी शिखर है। यहां का ग्लेशियर क्षेत्र 400 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है। उनका कहना है कि निचले इलाकों के ग्लेशियर जल्दी खत्म होंगे और ऊपरी इलाकों के देर में। अभी यह पता नहीं लग पाया है कि ‘ग्रीन हाउस’ गैसें ग्लेशियरों पर कितना प्रभाव डाल रही हैं। वे तापमान, हिमपात और बारिश पर भी कितना असर करती हैं। पर इतना पता चला गया है कि पिछले कुछ दशकों की तुलना में अब ग्लेशियर अधिक तेज़ी से पिघल रहे हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्लेशियरों के सिकुडऩे से उनके अंदर पानी की बड़ी-बड़ी झीलों के बनने की संभावना बढ़ जाती है। इसके बाद उस क्षेत्र में आने वाले भूकंप, और हिमस्खलन से उन झीलों के टूट जाने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसी झीलें टूटने पर निचले क्षेत्रों में भारी तबाही आ जाती है।

2013 से मिलान विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे नेपाल के एक वैज्ञानिक ने बताया था कि मांऊट एवरेस्ट के इर्द-गिर्द के ग्लेशियर पिछले 50 साल में 13 फीसद सिकुड़ गए हैं। इसके साथ ही ‘स्नो लाइन’ भी इन 50 सालों में 180 मीटर पीछे चली गई है। हिमालय के भारतीय क्षेत्र में कई प्रसिद्ध ग्लेशियर हैं। इनमें से ज़्यादातर उत्तराखंड, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में पड़ते हैं। कुछ ग्लेशियर अरूणाचल प्रदेश में भी पाए जाते हैं। अरुणाचल प्रदेश के ग्लेशियर तिब्बत की सीमा के साथ-साथ लगते हैं। यहां पर पर्वतों की सभी चोटियां 4500 मीटर से अधिक उंचाई की हैं। इन पर साल भर बर्फ रहती है। यहां पर दो मुख्य ग्लेशियर हैं- बिकम ग्लेशियर और कांगटो ग्लेशियर। जम्मू-कश्मीर में कई ग्लेशियर हैं, इनमें सबसे महत्वपूर्ण है सियाचिन ग्लेशियर। यह पोलर क्षेत्र के बाहर दुनिया का दूसरा सबसे लंबा ग्लेशियर है। हिमालय-कर्राकोरम क्षेत्र में यह सबसे विशाल हिमखंड है। इसके अलावा वहां हरिपर्वत, चैंग कमडन, द्रांग द्रुंग, नाज़ी ग्लेशियर है। ये ग्लेशियर नदियों के जल स्त्रोत हैं। इनमें से सियाचिन ग्लेशियर लद्दाख क्षेत्र में नुबरा नदी में पानी का मुख्य स्त्रोत है। यह नदी बाद में शियोक नदी में मिल जाती है। इस प्रकार यह ग्लेशियर सिंधु नदी को पानी देता है और विश्व की सबसे बड़ी सिंचाई प्रणाली को चलाता है।

 इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश में लगभग 17 मुख्य ग्लेशियर है। ये ग्लेशियर यहां बहने वाली मुख्य नदियों – रावी, व्यास, सतलुज, चिनाब के पानी के मुख्य स्त्रोत हैं। पर ये सभी ग्लेशियर सिकुड़ते जा रहे हैं। यह सब हो रहा है मौसम में आ रहे बदलाव और ग्रीन हाउस गैसों के कारण। वैसे तो यह एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है, पर भारत पर भी इसका बड़ा असर पड़ रहा है। जिस प्रकार देश में वनों का कटान और लकड़ी की तस्करी हो रही है उससे देश के वन क्षेत्र पर बुरा प्रभाव पड़ा है। पिछले साल के एक अध्ययन के अनुसार 7,08,273 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वन है जो कि देश की भूमि का 21.54 फीसद बनता है। हालांकि यह दावा है कि 2015 से 2017 के बीच इस में एक फीसद का इजाफा हुआ है। अब दो सालों में कौन से पौधे है जो बढ़ कर पेड़ बन गए या जिन्होंने 630 वर्ग किलोमीटर धरती को वनों के क्षेत्र में ला दिया, यह आम लोगों की समझ से बाहर है। पर फिर भी यह दावा है कि इस समय 8,02,088 वर्ग किलोमीटर भारतीय धरती पर वन हैं। यह देश की कुल ज़मीन का 24.39 फीसद है। यह जानकारी ‘इंडियन स्टेट ऑफ फारेस्ट रिपोर्ट (आईएसएएफआर) में दी गई है। इस हिसाब से देखें तो यह 33 फीसद वन क्षेत्र से काफी कम है। जो की सरकार ने लक्ष्य रखा है। इस प्रकार वनों का कम होना देश के ग्लेशियरों के लिए खतरनाक साबित हो रहा है।

 जिस प्रकार तापमान वढ़ रहा है, उससे ग्लेशियरों के बीच दबे पत्थरों का तापमान भी बढ़ता है और ग्लेशियर बीच में से पिघलना शुरू हो जाते हैं। उनका पानी ग्लेशियर के भीतर इक_ा हो कर वहां एक झील बना देता है। धीरे-धीरे झील का पानी बढ़ता रहता है। और जब ग्लेशियर की दीवारें कमज़ोर हो कर उसे संभल पाने में असफल हो जाती हैं तो वह झील टूट कर निचले क्षेत्रों में तबाही ला देती है। इसे अंग्रेजी भाषा में ‘ग्लेशियल लेक आउट ब्रस्ट’ भी कहते हैं। मनाली (हिमाचल प्रदेश) में आई बाढ़ सोलंग नाला ग्लेशियर के टूटने से ही आई थी। इसी प्रकार की बाढ़ सतलुज नदी में भी देखी गई है।

इस प्रकार ग्लेशियरों के लिए धरती का बढ़ रहा तापमान खतरनाक है। यदि ग्लेशियर नहीं रहेंगे तो धरती पर नदियों की कल्पना भी नहीं की जा सकत। सोचो यदि ग्लेशियर नहीं होंगे तो क्या होगा?

‘भूरे बादल भी जिमेदार हैं ग्लेशियरों के पिघलाने के लिए

कुछ वैज्ञानिक काफी लंबे समय से यह दावा करते आ रहे हैं कि यदि बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर इस रफ्तार से पिघलते रहे तो 2035 में इनका अस्तित्व खत्म हो जाएगा। पर कुछ वैज्ञानिक इस तिथि के साथ सहमत नहीं। वे ये तो मानते हैं कि ग्लेशियर खतरे में हैं, पर 2035 को वे अंतिम तिथि नहीं मानते।

अध्ययन में यह भी पाया गया है कि हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बहुत तेज है। कश्मीर में किए गए अध्ययन बताते हैं कि कोल्हाई ग्लेशियर एक साल में 20 मीटर तक सिकुड़ गया था जबकि एक और ग्लेशियर जो थोड़ा छोटा था पूरी तरह खत्म हो गया।

इन ग्लेशियरों पर अध्ययन कर रहा हैदराबाद का राष्ट्रीय भूभौतिकी अनुसंधान संस्थान। वहां के वैज्ञानिक मुनीर अहमद का कहना है कि ग्लेशियरों के इतनी तेजी से पिघलने की वजह ग्लोबल वार्मिग के साथ-साथ ‘ब्राउन क्लाउड’ भी है। ‘ब्राउन क्लाउड’ प्रदूषण युक्त वाष्प की मोटी परत होती है और यह परत तीन किलोमीटर तक मोटी हो सकती है। इस परत का वातावरण पर विपरीत असर होता है और यह जलवायु बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

उधर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी यूएनपीई की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की तलहटी में भी काले धूंए के कण हंै और इनका घनत्व प्रदूषण वाले शहरों की तरह है। इन पर शोध कर रहे लोगों का कहना है कि काली घनी सतह ज़्यादा प्रकाश और गर्मी सोखती है, इसलिए ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की यह भी एक वजह हो सकती है । यदि ग्लेशियरों के पिघलने की गति इतनी ही रही तो इसके नतीजे बहुत भयानक हो सकते हैं।

दक्षिण एशिया में गंगा, युमना, सिंधु, ब्रहमपुत्र वगैरा नदियों के स्त्रोत ग्लेशियर ही हैं। यदि ग्लेशियर खत्म हो जाते हैं तो ये नदियां भी सूख जाएंगी और इनमें केवल बरसाती पानी ही आएगा। इसका करोड़ों लोगों के जीवन पर कैसा प्रभाव पड़ेगा इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं।

ग्लेशियर झीलें

ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का एक असर यह भी है कि उनके भीतर पानी की झीलें बननी शुरू हो जाती है जिनका आकार लगातार बढ़ता रहता है। हिंदुकुश हिमालय में इस प्रकार की कई नई झीलें बनने का भी पता चला है। वैज्ञानिकों के अनुसार इन में से कई झीलें बाढ़ ला सकती हैं।

एक सर्वेक्षण में पाया गया कि पांच दरियाओं के क्षेत्र में 25,614 ग्लेशियर झीलें हंै और 1,444 वर्ग किलोमीटर इलाका इनके तहत आता है। हालांकि हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में कई

ग्लेशियर जिनकी लंबाई चौड़ाई घट रही है इनमें से ज़्यादा ग्लेशियर हिमालय और तिब्बत के इलाके में हैं।

जलवायु बदलाव पर गंभीर नहीं विकसित देश

आंकड़ें भयावह हैं। भारत की राजधानी दिल्ली में पिछले साल सामान्य से पांच गुणा ज़्यादा वायु प्रदूषण रिकार्ड किया गया। दिल्ली में पीएम 2.5 की मात्रा 209 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रिकार्ड की गई। यही नहीं अगर औसत वैश्विक तापमान में वृद्वि को 21वीं सदी के अंत से पहले ही दो डिग्री सेल्सियस से कम रखने में विफल रहे तो दिल्ली की तबीयत क्या होगी, इसका आकलन भी कर लिया गया है।

दिल्ली का तापमान 2030 तक 2.1, 2060 तक 3.0, 2080 तक 5.0 और 2100 तक 6.1 डिग्री बढ़ जाएगा। दिल्ली के साथ-साथ बाकी दुनिया भी तपेगी। इसी चिंता से निपटने के लिए पोलैंड के काटोवाइस में सीओपी 24 यानी कांफ्रेंस ऑफ पार्टी की 24वीं बैठक का सम्मेलन चला। संयुक्त राष्ट्र जलवायु कांफ्रेंस में 197 देशों ने की। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक बयान में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की अनदेखी करना मुश्किल हो रहा है। दुनिया जंगल की आग,लू और तूफानों के कारण आग से घिरी है। गौरतलब है कि 2015 में पेरिस में हुए शिखर सम्मेलन में वैश्विक तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने पर सहमति बनी थी। लेकिन हालात क्या हैं?

आईपीसीसी की हाल में जारी रिपोर्ट में तापमान बढ़तरी को 1.5 डिग्री तक सीमित रखने की बात कही गई है। सवाल यहां यह भी अहम है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर विकसित देश पेरिस में की गई अपनी प्रतिबद्धताओं के प्रति कितने गंभीर हैं। दुनिया की सबसे बड़ी ताकत कहे जाने वाले अमेरिका में 2017 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी और अमेरिका ने ऐलान किया कि अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में इस जलवायु करार से अलग हो रहा है। सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाला अमेरिका ही है। काटोवाइस बैठक का एंजेडा बहुत ही महत्वपूर्ण रहा। इसमें पैरिस समझौते के अम्लीकरण के लिए यानी लक्ष्य को हासिल करने के लिए रूलबुक अर्थात नियमावली बनी है। उस रूलबुक में लिखा है कि तापमानवर्धक गैसें कौन सी हैं, उन्हें कैसे मापा जाना चाहिए और मापने की एक समान इकाई क्या होगी। अभी दुनिया के सभी देश एक ही मापन प्रणाली और एक ही इकाई का इस्तेमाल नहीं करते।

यही नहीं इस रूलबुक में ऐसे भी नियम कायदे हैं कि जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के अंतरराष्ट्रीय सहयोगों का स्वरूप कैसा होना चाहिए। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को पारदर्शी व जिम्मेदारियों को न्यायसंगत कैसे बनाया जा सकता है। दरअसल रूल बुक एक प्रक्रिया है। 2015 में पेरिस जलवायु समझौते में समझौता हुआ था कि जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने के लिए हर मुल्क अपने उत्सर्जन को कम करेगा।

रूलबुक बावत केंद्रीय वन,पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव और काटोवाइस सम्मेलन में भारतीय दल का प्रतिनिधित्व कर रहे सीके मिश्रा ने एक अखबार को दिए साक्षात्कार में बताया कि रूल बुक बने पर एक दो विषय पर नहीं,सभी विषयों पर,ताकि इस चुनौती से निपटने की राह खुले। सचिव मिश्रा ने इस पर भी रोशनी डाली कि विकसित व विकासशील मुल्कों को एक ही पैरामीटर में न रखा जाए। विकसित मुल्क चाहते हंै कि सभी देशों के लिए नियम कायदे एक जैसे हों। भारत इसके खिलाफ है। भारत चाहता है कि विकसित मुल्क अपनी जिम्मेदारी निभाएं और हरित कोष में सौ अरब डालर की राशि देने का अपना वादा पूरा करें। ध्यान देने वाली बात यह है कि पेरिस समझौते में विकसित मुल्कों ने 2020 तक हरित कोष में 100 अरब डालर की राशि देने का ऐलान किया था मगर उसे पूरा करते नजर नहीं आते।

सौ अरब डालर का वादा भी वर्ष 2025 तक ही है। एक तरफ इस बात को भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है कि बहुत से विकासशील मुल्क अपने अपने यहां गरीबी के खात्मे के साथ- साथ ही र्काबन-डाईआक्साइड जैसी गैसों के उत्सर्जन को कम में करने की दोहरी लड़ाई लडऩे में समर्थ नहीं हैं।

ऐसे में पेरिस में तय किए गए जलवायु परिवर्तन का लक्ष्य हासिल करने के लिए आर्थिक संसाधन बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इस संदर्भ में भारत व चीन अपवाद हो सकते हैं मगर शेष विकासशील और गरीब मुल्कों को इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वित्तीय मदद की दरकार होगी। विकसित देश क्या अपेक्षा के अनुरूप आर्थिक सहयोग करेंगे, इस पर संदेह है।

भारत चाहता है कि विकसित मुल्क जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करें। खासकर गरीब और विकासशील मुल्कों को आर्थिक मदद देने के लिए आगे आएं। इधर जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की इस कंवेशन समिट में विश्व बैंक ने कहा कि वह जलवायु परिवर्तन से लडऩे के लिए 14 लाख करोड़ रुपए देगा। यह राशि अब तक दिए जा रहे पैकेज से दोगुणा है। यह रकम 2021-25 तक खर्च की जाएगी। इसमें से सात लाख करोड़ रुपए बैंक देगा और शेष रकम बैंक की दो एजेंसियों से जुटाई जाएगी। विश्व बैंक के जलवायु परिवर्तन पर वरिष्ठ निदेशक जॉन रूम ने कहा हम उत्सर्जन कम करने में नाकाम रहते हैं तो 2030 तक 10 करोड़ लोग गरीबी में पहुंच जाएगें।

लांसेट की हालिया रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में पिछले चार सालों के दौरान प्रभावित होने वालों की संख्या में 200 फीसद से भी अधिक की बढ़ोतरी हुई है। गर्मी बढऩे और तबाही की अन्य घटनाओं के कारण यह असर पड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के खतरों से होने वाली मौतें देश में उच्च आय वाले देशों की तुलना में सात गुणा अधिक हैं। जबकि घायल होने और विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या छह गुणा अधिक है। इस रिपोर्ट का विश्लेषण करने वाली दिल्ली की संस्था क्लाईमेट ट्रेंड के अनुसार 2017 में बाढ़ और सूखे के कारण 18 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक का नुकसान हुआ जबकि 2018 में अकेले केरल में बाढ ़से 20 हजार करोड़ रुपये की क्षति होने का अनुमान है।

काजीरंगा में हुई मौतों से पनपा विवाद

असम कई कारणों से दुनिया के विभिन्न हिस्सों से पर्यटकों, शोध विद्वानों और वैज्ञानिकों को आकर्षित करता है, निसन्देह इसका एक प्रमुख कारण काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान है। काजीरंगा एक सींग वाले गैंडों के लिए सुरक्षित आश्रय के रूप में जाना जाता है और यह एक विश्व प्रसिद्ध सुरक्षित अभयारण्य है। हालांकि वन्य जीवों के निरंतर शिकार और आदिवासी लोगों पर हो रहे अत्याचार के कारण अब इसका नाम बदनाम भी हो रहा है।

भारत में वन्य जीवों के संरक्षण के इतिहास में एक सफल कहानी के रूप में जाना जाने वाले काजीरंगा के बारे में हाल ही में एक चौंकाने वाली खबर आई जब जनजाति लोगों का अधिकार निकाय इसके बहिष्कार के साथ सामने आया। उन्होंने दावा किया कि संरक्षण के नाम पर यह निर्दोष जनजातीय लोगों की हत्या के क्षेत्र में बदल गया है। लंदन स्थित आदिवासी अधिकार संगठन सरवाइवल इंटरनेशनल, ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बहुमूल्य एक सींग वाले गैंडों की रक्षा के नाम पर शिकारियों को मारने के लिए वन रक्षक अत्याधिक शक्ति का उपयोग कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठन ने ज़ोर देकर कहा कि सशस्त्र वन रक्षकों ने केवल संदेह के आधार पर कई आदिवासियों को भी मारा।

जब काजीरंगा प्राधिकरण एक सींग वाले गैडेें की दो तिहाई संख्या को बचाने की अपनी सफलता का जश्न मना रहा था तो उस समय सरवाइवल की बात को सुनने वाले बहुत कम लोग थे। मध्य असम में स्थित संरक्षित वन जिसे हाल ही में बाघ परियोजना के रूप में विकसित किया गया है, यह गैंडों के अलावा रॉयल बंगाल टाइगर, एशियाई हाथियों और हिरणों की विभिन्न प्रजातियों को भी आश्रय देता है।

अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) की 2008 में जारी सूची में गैंडे की पहचान असुरक्षित प्रजाति के रूप में की गई। इससे पहले 1986 में इस जीव को विलुप्त होने वाले जीव के रूप में वर्गीकृत किया गया था। शिकारी सीगों के लिए गैंडे को मारते हैं जो पारंपरिक चीनी और वियतनामी औषधियों की मांग को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी कीमत पर बिकते हैं।

शक्तिशाली ब्रहमपुत्र नदी के दक्षिण तट पर 800 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैले हुए और यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल के रूप में वर्गीकृत यह उद्यान वर्तमान समय में लगभग 2500 गैंडों को आश्रय देता है और यह प्राधिकरण असम में 3000 गैंडों के लक्ष्य को 2020 तक प्राप्त करने की उम्मीद रखता है।

ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन (बीबीसी) द्वारा हाल ही में एक विशेष कार्यक्रम प्रसारित करने के बाद वन्यजीवन संरक्षण के नाम पर लोगों को मारने का मुद्दा सामने आया। पत्रकार जस्टिन रोवलट ने जिम्मेदार वन अधिकारियों और फ्रंट लाइन रक्षकों का साक्षात्कार यह जानने के लिए किया कि काजीरंगा इलाके के अंदर वन्य जीवों के संरक्षण के लिए वे किसी भी अवांछित को मारने के लिए पूरी तरह मानसिक रूप से तैयार थे।

बीबीसी ने दावा किया है कि 2013 से काजीरंगा के सशस्त्र रक्षक जिन्होंने अप्रैल 2016 में ब्रिटेन के प्रिंस विलियम और कैथरीन की मेजबानी भी की थी, एक क्रूर संरक्षण नीति के तहत हर महीने लगभग दो लोगों को मार रहे हैं। काजीरंगा में वर्ष 2015 में 18 गैडों को शिकारियों ने मारा जबकि 23 लोगों को रक्षकों ने मार दिया।

मासूम, निर्दोष ग्रामीण ज़्यादातर आदिवासी लोग संघर्ष में फंस जाते हैं (शिकारियों और वन रक्षकों की बीच) और अधिक समस्या इसलिए है क्योंकि पार्क रक्षक कठोर बल का प्रयोग करने में अविवेकी हैं और उन्हें अभियोजन पक्ष द्वारा प्रतिरक्षा भी दी जाती है।

”पार्क के रक्षकों ने लोगों को मारा, घायल, किया और इन पर आरोप भी लगा कि इन्होंने लोगों के साथ मारपीट भी की। इसमें कोई शक नही है कि गैंडों को बचाया जाना चाहिए। लेकिन किस कीमत पर? बीबीसी के दक्षिण एशियाई संवाददाता ने कार्यक्रम में यह टिप्पणी कि ‘यह भारतीय उद्यान और संरक्षण के नाम पर मारे गए लोगों की अंतरिक कहानी है’’।

रोवलट ने यह आरोप भी लगाया कि उसकी पहल के बावजूद नई दिल्ली और दिसपुर के पर्यावरण मंत्रालय (वन और वन्यजीवन की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार) एनटीसीए (भारत का राष्ट्रीय बाध संरक्षण प्राधिकरण) और असम वन विभाग ने उसके आवश्यक प्रश्नों का कोई जवाब नहीं दिया। जब बीबीसी ने 11 फरवरी 2017को ”हमारा संसार: संरक्षण के लिए हत्या’’ नामक कार्यक्रम प्रसारित किया तो सरकार और असम के लोगों ने इसकी विषय सामग्री पर गंभीर चिंता जताई और तर्क दिया कि काजीरंगा के वन रक्षकों को शिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने का कानूनी अधिकार है। अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने काजीरंगा की गलत छवि का प्रचार करने के लिए विभिन्न सुरक्षा समूहों ने लंदन स्थित न्यूज चैनल को लताड़ा उन्होंने सभी प्रभावशाली साधनों के साथ गैंडों और अन्य वन्यजीवन की रक्षा के लिए काजीरंगा प्राधिकरण के पक्ष में प्रभावशली रैली की।

लोगों के सहयोग से उत्साहित एनटीसीए ने बीबीसी के पत्रकार रोवलट पर भारत के सभी 50 बाध अभयारण्यों में पांच साल तक फिल्म बनाने पर रोक लगा दी। बाद में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने विदेश मंत्रालय से रोवलट और उसके सहयोगियों जिन्होंने फिल्म शूट की थी उनका वीज़ा रद्द करने का अनुरोध किया। एनटीसीए ने दावा किया कि रोवलट ने सरकारी अधिकारियों को गलत स्क्रिप्ट देकर फिल्म बनाने की अनुमति ली। एनटीसीए ने दावा किया कि इसके बाद दी गई स्क्रिप्ट के विपरीत उन्होंने एक वृतचित्र तैयार किया जो भारतीय संरक्षण प्रयासों को नकारात्मक ढंग से दिखाता है।

एनटीसीए ने दावा किया है कि रोवलट और बीबीसी ने चार पूर्व स्थितियों का उल्लंघन किया है उन्होंने सूर्यास्त के बाद फिल्मांकन किया (काजीरंगा में) उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की समिति के समक्ष वृतचित्र को स्क्रीन नहीं किया और विदेश मंत्रालय और बाघ संरक्षण प्राधिकरण को मूल स्क्रिप्ट भी नही दी। हालांकि भारतीय बाघ परियोजना में फिल्मांकन से बीबीसी को हटाना संरक्षण प्राधिकरण का त्वरित समाधान नहीं है। लेकिन इसने सरवाइवल को उस पार्क का बाहिष्कार करने के लिए एक अभियान शुरू करने के लिए उकसाया जो कि 11,000 से अधिक विदेशी पर्यटकों सहित 1,50,000 से अधिक वार्षिक मेहमानों को आकर्षित करता है, जब तक काजीरंगा प्राधिकरण अपनी शूट-ऑन-साइट नीति को रद्द नहीं करता। जनजातीय अधिकार निकाय ने तर्क दिया है कि पिछले 20 सालों में काजीरंगा में 100 से अधिक लोग मारे गए हैं। इसने जुलाई 2016 में काजीरंगा इलाके में वन रक्षक की गोली से घायल आदिवासी लड़के आकाश ओरंग के मामले को भी उठाया। आकाश की टांग में गहरी चोट लगी और अभी भी उसका इलाज हो रहा है। स्थानीय लोगों के विरोध के बाद काजीरंगा प्राधिकरण ने दो रक्षकों को निलंबित कर दिया।

आकाश के अलावा काजीरंगा में मारने के लिए गोली चलाने की नीति (पकडऩे की बजाए) के और भी पीडित हैं। शिकार के पीछे आपराधिक नेटवर्क का मुकाबला करने के बजाए हिंसा को प्रोत्साहित करने वाली इस अमानवीय नीति का संरक्षण संस्थाएं पहले ही आलोचना कर रहीं हंै।

काजीरंगा बाहिष्कार अभियान। इसके निर्देशक स्टीफन कोरी ने ज़ोर देकर कहा है कि काजीरंगा प्राधिकरण वर्षों से न्यायेतर हत्या का अभ्यास कर रहा है, और वे अब इस मामले को अनदेखा नहीं कर सकते हैं। काजीरंगा की परिधि में रहने वाले स्थानीय निवासियों ने रोवलट को नैतिक समर्थन दिया और बीबीसी पत्रकार पर लगे अनावश्यक प्रतिबंध को तुरंत हटाने की मांग की। काजीरंगा इलाके में स्थित किसान-श्रमिकों के एक संगठन ”जीपल कृषक, श्रमिक संघ’’ (जेकेएसएस) ने काजीरंगा के कठोर संरक्षण तरीकों की आलोचना करते हुए सरकार से पार्क के आसपास हुई जनजातीय लोगों की मौत की उच्चस्तरीय जांच करवाने का आग्रह किया है।

हाल ही में बीबीसी की प्राकृतिक इतिहास इकाई ने एनटीसीए को काजीरंगा में वन्यजीव संरक्षण के लिए की गई हत्याओं को उजागर करने वाली रिपोर्ट के प्रतिकूल प्रभाव के लिए खेद व्यक्त किया । जिसे बाद में विभिन्न भारतीय मीडिया आउटलेट में प्रकाशित किया गया। लेकिन प्रतिष्ठित चैनल की संबंधित इकाई को दोषी ठहराते हुए सरवाइवल ने यह स्पष्ट का दिया कि बीबीसी प्राधिकरण केवल भारतीय रिजर्व वन में फिल्मांकन की अनुमति पाने के लिए पीछे हटने की कोशिश कर रहा है। ”भारतीय मीडिया में आई खबरों के विपरीत बीबीसी ने अपनी जांच की शुद्धता और सच्चाई पर संदेह नहीं किया” बीबीसी प्राधिकरण ने वास्तव में यह स्वीकार नहीं किया है कि सच को उजागर करने वाला इसका काजीरंगा शूट गलत था।

लेकिन एनटीसीए के फरमानों को न मान कर बीबीसी प्राधिकरण ने न केवल मानव विरोधी कार्य किया बल्कि मानव अधिकारों के बुनियादी मूल्यों को कायम रखने और अच्छी पत्रकारिता की नैतिकता को बनाए रखने में भी असफल रहा है। सरवाइवल ने कहा कि ऐसा करके चैनल ने स्थानीय बहादुर लोगों पर बेबुनियादी आरोप लगाए हंै। कोई भी इसका इस्तेमाल करके भारत की प्रतिष्ठा को बदनाम कर सकता है।