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केंद्र बनाम ममता, दावा अपनी-अपनी नैतिक जीत का

आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय के दखल से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र सरकार के बीच चल रही जंग कम से कम अभी के लिए खत्म हो गई। इसके साथ ही पुलिस आयुक्त एक तटस्थ स्थान पर सीबीआई जांच में शामिल हो गए है। इससे दोनों ही पक्षों को अपनी-अपनी नैतिक जीत का दावा करने का अवसर प्राप्त हो गया है। इसके साथ ही ममता ने भी अपना आक्रमक रूख खत्म करते हुए धरना खत्म कर दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कोलकता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार को सीबीआई के साथ एक तटस्थ स्थान शिलांग में पूरा सहयोग करने का आदेश दिया और साथ ही सीबीआई को भी उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई करने से रोक दिया।

ममता बनर्जी और केंद्र के बीच जंग तीन फरवरी 2019 को उस समय शुरू हुई जब लोकसभा चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं। इस समय सर्वोच्च न्यायालय हर उस स्थान पर चल रही सीबीआई जांच पर ध्यान दे रहा है जहां इस प्रकार का तनाव हो।

कोलकता में गुस्से से भरी ममता ने ‘संविधान बचाओ’ के नाम पर रात्रि से ही धरना शुरू कर दिया। इसके कारण भाजपा नेताओं को मौका मिल गया राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करने का। उधर विपक्षी नेता ममता के साथ आ गए। एक झटके में यह कार्रवाई विपक्षी एकता की धुरी बन गई और ममता इसका केंद्र बिंदु। क्या यह केंद्र का ‘स्वंय गोल’ था या उसकी जीत? इस प्रश्न पर लंबे समय तक बहस चलती रहेगी। इसका लाभ निश्चित तौर पर ममता को मिला है। कांग्रेस, आप, समाजवादी पार्टी, बीएसपी, एनसीपी और यहां तक कि नेशनल कांफ्रेस ममता की मदद के लिए आ गए। दुख की बात है कि लोगों की स्मृति कमज़ोर होती है, पर इतनी भी नहीं कि ऐसी घटना को भूल जाए जिसने समूचे विपक्ष को एक कर दिया। ममता ने इसे ‘संविधान का पूरी तरह टूटना बताया। उन्होंने सीबीआई से सवाल उठाया – ”आपने बिना वारंट पुलिस आयुक्त के घर जाने की जुर्रत कैसे की?’’

ममता ने कहा  कि यह सत्यग्रह है और मैं इसे जारी रखूंगी। तब तक जब तक देश सुरक्षित नहीं हो जाता। वे केंद्रीय कोलकता के प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थान पर पूरी रात बैठी रहीं। उनके साथ शहर के पुलिस प्रमुख राजीव कुमार थे। उन्होंने रात का खाना नहीं खाया और पूरी रात जाग कर बिताई। उन्होंने ताना मारते हुए कहा,”हमें न्यायापालिका, मीडिया और लोगों पर पूरा भरोसा है। यदि वे राष्ट्रपति शासन लगाना चाहते हैं तो लगाएं । हम इसके लिए तैयार हैं’’।

इस झगड़े की जड़ उस जांच में है जो जांच राजीव कुमार ने शारदा और रोज़ वैली पोंजी के मामलों में की थी। आरोप है कि बाद में उनके कई दस्तावेज़ गायब हो गए। छानबीन करने के लिए राजीव कुमार को बुलाया भी गया था। अदालत ने राजकुमार की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी और उन्हें आदेश दिया कि वे जांच एजेंसी के साथ पूरा सहयोग करें। यह सब उस झगड़े के बाद हुआ जिसमें ममता ने कोलकता में राजीव से बात नहीं करने दी थी। तृणमूल कांग्रेस मेघालय के समन्यवक और राजीव कुमार के वकील विश्वजीत देव ने बताया कि राजीव सीबीआई के साथ पूरी तरह सहयोग कर रहे हैं।

कुमार की भूमिका पर इसलिए सवाल उठे क्योंकि वे विशेष जांच दल (एसआईटी) के प्रमुख थे जिसने उपरोक्त दोनों मामलों की जांच की थी। बाद में यह जांच सीबीआई को दे दी गई। सीबीआई का कहना है कि जब जांच उन्हें दी गई उस समय राजीव ने कई दस्तावेज उन्हें नहीं दिए थे। भाजपा का आरोप है कि उन दस्तावेजों में सत्ताधारी दल के लोगों के नाम शामिल थे।इनमें कुछ ऐसे भी थे जो मुख्यमंत्री के भी काफी नज़दीक थे। इस समय सीबीआई कुणाल घोष के 91 पन्नों के पत्र के आधार पर जांच कर रही है। घोष को तृणमूल कांग्रेस ने बर्खास्त कर दिया था।

 कोलकता में झगड़ा उस समय शुरू हुआ जब सीबीआई की टीम पुलिस आयुक्त के पास गई लेकिन स्थानीय पुलिस ने उन्हें अंदर नहीं घुसने दिया। इसके बाद वह दल थाने गया। ममता का कहना है कि समस्या उस समय शुरू हुई जब उनकी  23 विपक्षी दलों की एक ज़ोरदार रैली पिछले महीने कोलकता में हुई। इससे केंद्र सरकार घबरा गई। उधर प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि पश्चिम बंगाल सरकार ‘ट्रिपल – टी’ – तृणमूल, तोलबाजी, टैक्स के द्वारा मध्यवर्ग की आकांक्षाओं को कुचल रही है। इसके बाद बाबुल सुप्रीयो ने राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की थी।

ममता और केंद्र की लड़ाई का नतीजा यह निकला कि विपक्षी नेता अरविंद केजरीवाल, तेजस्वी यादव, लालू यादव, उमर अब्दुल्ला, और एख्डी देवगौड़ा ने अपना खुला समर्थन ममता को दे दिया।

फसल बीमा से क्यों फायदा नहीं होता किसानों को?

भारत में हरित क्रांति के जनक मनकोंबू संवासीबन स्वामीनाथन ने किसानों के राष्ट्रीय आयोग की अध्यक्षता करते हुए जब यह कहा कि आज खेत-खालियानों में जो कुछ चल रहा है वह बहुत ही गलत है इससे यह साफ हो गया था कि कृषि क्षेत्र में जो परेशानियां हैं उसे दूर करने के लिए कुछ कदम उठाए जाने चाहिए। कई तरह के जोखिम कृषि क्षेत्र में हैं उन्हें ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार एक महत्वकांक्षी योजना ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ लेकर आई जिससे फसल के नुकसान होने की स्थिति में किसानों को कुछ राहत इस बीमा कवर से मिले।  लेकिन उससे किसानों को लाभ मिलने की बजाए, उसका लाभ बीमा कंपनियों को ज्य़ादा मिला।

‘तहलका’ के इस अंक में खास खबर के तौर पर इस विषय पर एक लेख प्रकाशित किया जा रहा है। आने वाले अंकों में ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ का पूरा तखमीना देने की कोशिश भी होगी। जिससे पूरी सच्चाई उजागर हो। सन  2016-17 में जो प्रीमियम किसानों से लिया गया और उन्हें जो मुआवजा मिला वह रु पए 6459.64 करोड़ है। इसी तरह 2017-18 में उन्होंने रु पए दो हज़ार करोड़ मात्र से ज्य़ादा की राशि दावों वगैरह में अदा की। लेकिन इंश्योरेंस कंपनियों को रु पए 9,335 करोड़ मात्र से अधिक की राशि हासिल हुई।

इस मामले की पूरी छानबीन इसलिए ज़रूरी है जिससे यह पता लग सके कि एक सामाजिक कल्याण योजना में इतनी बड़ी कमाई उचित है या नहीं। साथ ही इस मामले में यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि जब कु ल किसानों में से 84 लाख किसानों का बीमा योजना के पहले साल में कराया गया। जो यह कुल किसानों की तादाद का पंद्रह फीसद है इन्होंने खुद को 2017-18 की योजना से खुद को अलग कर लिया। जबकि तकरीबन 5.72 करोड़ किसानों ने खुद को 2016-17 की फसल बीमा योजना में शरीक कराया था। लेकिन उनकी तादाद घट कर 2017-18 मे 4.87 करोड़ रही गई।

यदि राज्य भर देखें तो सबसे ज्य़ादा राजस्थान से 31.25 लाख किसान इस योजना से बाहर आ गए। महाराष्ट्र से 19.29 लाख और मध्यप्रदेश से 2.90 लाख किसानों ने इस बीमा योजना से अपने हाथ खींच लिए। चिंता की दूसरी बात यह है कि यदि यह योजना किसानों के लिए लाभदायक होती तो कोई भी किसान इस योजना से बाहर क्यों होता?

सवाल यह है कि फसल नुकसान मापने का हमारा तरीका क्या है? क्या फसलों की नुकसान का जायजा लेने का तरीका किसानों से मित्रवत नहीं है या नुकसान -मुआवजा का पूरा तौर-तरीका बहुत ही बोझिल और समय खाऊ है? यदि यह योजना ‘जन धन योजना’ से जुड़ी होती तो क्या ज्य़ादा उपयोगी होती? आज ज़रूरत यह है कि किसानों की फसल चौपट होने पर तत्काल उसे राहत पहुंचाई जाए। जिससे प्रत्यक्ष लाभ उसे मिले। अभी हाल में यह देखा गया है कि देश में बेमौसम बारिश, आंधी आदि आई जिसके कारण बुवाई और फसल कटाई और मंडी को माल ले जाते हुए फसल का काफी नुकसान हुआ। इधर मौसम में गड़बड़ी की बढ़ोतरी से ज़रूरी हो गया है कि ऐसे कदम उठाए जाएं जिसमें किसानों को फौरन राहत मिले।

विशेषज्ञों का कहना है कि सूचना और संचार के माध्यमों से किसानों का भरोसा फसल बीमा योजनाओं में फिर जमाया जाए। फसल बीमा योजनाएं इतनी चुस्त और पारदर्शी होनी चाहिए कि किसानों का उसमें भरोसा जगे। कृषि क्षेत्र के तमाम जोखिम को कम करते हुए उत्पादन इतना ज़रूर बढऩा चाहिए कि किसानों का भी कल्याण हो।

‘पति, परिवार, पार्टी मेरी जि़म्मेदारी’

ए क सुगढ़, सुंदर, शालीन बेटी और कुलवधु के तौर पर प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुख्यालय में अपने कक्ष से (छह फरवरी की शाम) बाहर आते हुए उन्होंने पांच शब्दों से भारतीय संस्कृति, परंपरा और चुनौतियों से मुकाबले की अपनी तैयारी का इशारा कर दिया।

भारतीय इतिहास और संस्कृति के जानने समझने वाले भले इन पांच शब्दों (पति, परिवार, पार्टी मेरी जिम्मेदारी)को ठहाकों में उड़ा दी लेकिन देश की जनता प्रियंका के पांच सूत्रों से इशारा समझ गई है। अमेरिका से भारत आने के चौबीस घंटे के अंदर प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा को ईडी (एन्फोर्स मेंट डायरेक्टोरेट) के अफसरों के सामने जाना पड़ता है। प्रियंका उनके साथ निदेशालय के गेट तक जाती हैं। लौट कर अपनी मां सोनिया से मिलती हैं फिर वे पहुंचती हैं कांगे्रस मुख्यालय। वहां अपने कमरे में बैठती हैं। सहयोगियों से मिलती हैं। बाहर खड़े प्रशंसकों की भारी भीड़ और मीडिया से थोड़ी बहुत बात करने के बाद प्रियंका अपने घर लौट जाती हैं। ईडी विभाग राबर्ट वाड्रा से पूरे छह घंटे पूछताछ करता है। दूसरे दिन फिर उन्हें साढ़े दस बजे हाजिर होने को कहता है। जिससे चलती रहे कवायद पूछताछ की। पहले भी हो सकता था यह सब लेकिन अब तब, जबकि आम चुनाव शीघ्र होने हैं।

देश के वेदों, शास्त्रों, पुराणों में एक वहु चर्चित कहानी है सत्यवान और सावित्री की। देश में अभी भी गांवों में वटपूजन और सत्यवान सावित्री की कथा कहने सुनने की परंपरा है। पति से असीम प्रेम, परिवार के प्रति निष्ठा और देश के प्रति कर्तव्य की प्रतीक वह सावित्री थी जो अपने तप, पूजन और संघर्ष से अपने पति को यमराज के यहां से भी इस धरती पर वापस ला सकी थी। यह विजय थी प्रेम, निष्ठा, तप, त्याग और संघर्ष की। इस कथा की ओर ही किया था इशारा प्रियंका ने। उसने सिर्फ पांच शब्दों को कहा। क्रूर और कुटिल उपहास में इन शब्दों को उड़ा देने वाले संस्कृति विशेषज्ञ आने वाले दिनों में वैसा अट्टहास भी करने का दुरु साहस कर सकते हैं जैसा महाभारत काल में दुर्योधन और उसके तब दरबार ने किया था जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था। अपने विजय के वर्ष में फिर विजय श्री पाने की लालसा को पालने वाले ये क्षत्रप भले उन शब्दों का इशारा न समझें लेकिन वे देख रहे हैं दूर धरा पर उमड़ते-घुमड़ते बादलों को। उसे देख कर उनमें दहशत है। क्योंकि उनके झूठ, देश के इतिहास से उनकी छेड़छाड़ और लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों को मनमाने तौर पर तोडऩे-गिराने के उनके अनैतिक प्रयासों को देश की जनता अच्छी तरह जान बूझ रही है।

इसी जनता का अब भरोसा हैं आज प्रियंका जिसे पता है कैसे गौरीगंज, मुसाफिरखाना में उसकी दादी को कैसे आज भी याद किया जाता है। आज भी फैजाबाद में बीवी रसूलन अपने घर का कामकाज छोड़ कर कैसे उसकी एक झलक पाने के लिए बेचैन हो जाती थी। यह अनुराग वह नहीं समझ सकते जो ढांचों को गिरा कर अपनी पीठ थपथपाते हुए खुश होते हैं और इलाके का नाम बदल कर अट्टहास करते हुए नई भव्य मूर्ति बनाने की घोषणा करते हैं।  कहते हैं यह जो नया निर्माण होगा उसे देखने श्रद्धालु आएंगे। अरे, प्राचीन काल से लोग उस प्राचीन रामजन्मभूमि को देखने-जानने-समझने यहां आते रहे हैं। वे उस जमाने में रही कटुता, नरसंहार, और अत्याचार को आज नए सिरे से जीवित करने नहीं आते थे। बल्कि तबकी ध्वंसगाथा से अपने जीवन संघर्ष में खुद में हिम्मत बढ़ाने का हौसला उपजाने आते रहे हैं। तब का युग  और था और आज का युग और है। जहां नित्यप्रति चुनौतियां हैं। बहुत कुछ ऐसा है जिन्हें बिना आपस में आंदोलिन हुए मिल कर परस्पर सहयोग से किया जा सकता है। अपने देश को मजबूत उन्नत प्रदेश बना सकते हैं।

पूर्वी उत्तरप्रदेश जनता प्रियंका की भाषा समझती रही है। उसने देखा है कि अमेठी, रायबरेली के इलाकों में जो सपने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी ने दिखाए ये उन पर उन्होंने अपने तरीके से अमल भी किया था। पिछले पांच साल से केंद्र सरकार के मंत्रियों ने उन योजनाओं को असली जामा नहीं पहनाया बल्कि जो चल रही थी उन्हें भी रोक दिया। मीडिया तक को पद, रु पया, कजऱ्, ज़मीन, घर का लालच देकर सही खबरें दबवाई गईं। प्रियंका की वापिसी को लेकर आज जनसामान्य में भीतर-भीतर ही वह खुशी  है जो किसी अपने को बरसों बाद देख कर मिलती हैं।

पूर्वी उत्तरप्रदेश या कहें पूर्वांचल की राजनीति में प्रियंका गांधी वाड्रा के सक्रिय होने से एक नई ताजगी आई है। वाराणसी प्रधानमंत्री का अपना निर्वाचन क्षेत्र है जिसे उन्होंने अपनाया। गुजरात में जहां से वे जीतते आ रहे थे उसे छोड़ कर यहां फिर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उन्होंने विकास के ढेरों सपने दिखाए। वाराणसी को जापान के क्योटो शहर की तरह बनाने की तस्वीर दिखाई। वाराणसी क्योटो बना या नहीं यह समय बताएगा लेकिन विकास में काशी की ऐतिहासिक संकरी, गंदी तंग गलियां ज़रूर उजड़ गईं।

ये गलियां काशी में बाबा विश्वनाथ के गले में पड़ी रूद्राक्ष की मालाओं की तरह थीं। आज गलियां हैं गायब। बड़े-बड़े मैदान रह गए। न कहीं वे चर्चित छोटे-छोटे मंदिर, न कटरे और न उन ऊपर बने मकान। सरकार ने भारी मुआवजा दिया। कम-ज्य़ादा के तो सवाल-जवाब हमेशा रहेंगे। लेकिन क्या वाराणसी क्योटो सा बना। जो विकास हो रहा है उससे कुलीन भद्रलोक और वीवीआईपी लोग बड़ी-बड़ी गाडिय़ों से बाबा विश्वनाथ की ड्यौढ़ी तक आसानी से जा सकेंगे। आगे गंगा मैय्या के दर्शन करेंगे और आराम से लौटों। यही है विज्ञापनी विकास।

क्या विकास सिर्फ भद्र-कुलीन और वीवीआईपी के लिए ही होता है। क्या आप तरह-तरह के टैक्स लगा कर उस आम श्रद्धालु को भी नहीं दुहते जो बाबा के दरबार में अपना शीश नवाने जाता है। इस श्रद्धालु के लिए तो आपने विश्वनाथ कारिडोर नहीं बनाया। अपने काशी की ऐतिहासिक, व्यवसायिक, धार्मिक, सांस्कृतिक पहचान खत्म कर दी। ऐसा तो इस देश के उन शासकों ने भी नहीं किया जिन्हें आप कोसते है। आपने पैसों के बल पर  काशी के लोगों का मुंह बंद कर दिया। यह कौन सी संस्कृति है?

पूर्वाचल के लोगों में प्रियंका को लेकर आज बहुत उत्साह है। वे दो बच्चों की मां हैं। उनका पति है। उनका परिवार है और साथ उनकी कमज़ोर पार्टी,  कांगे्रस हैं। लेकिन वाराणसी की जनता या कहें पूर्वांचल में कांग्रेस पार्टी और प्रियंका को लेकर बहुत उत्साह हैं। उनके पांच शब्दों से काशी का गौरव वापस तो नहीं आएगा लेकिन उम्मीद है कि विकास के नाम पर बंदरबांट और तोड़-फोड़ अब नहीं होगी। देश की जनता खुद अब अपना भविष्य लिखेगी। वह पूरे सम्मान, सहयोग और सहअस्तित्व से प्रियंका को अपने सिर माथे लेगी क्योंकि आज उसे बदलाव की ज़रूरत जान पड़ती है।

स्वामी अमितनंदन दानंद सरस्वती

राजधानी में आग बुझाने में नाकामी, 17 लोग मरे

दिल्ली में करोल बाग के एक होटल में मंगलवार की भोर में आग लगी। इस आग का फैलाव इतना ज़्यादा था कि सुबह होते-होते 17 लोगों की मौत हो चुकी थी। देश की राजधानी में आग से निपटने के ज़रूरी बंदोबस्त नहीं हैं। आग से बचकर निकलने वाले आपालकाल रास्ते का दरवाजा बंद था और ज़्यादातर को उसकी जानकारी भी नहीं थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मौके का मुआयना किया और मेजिस्ट्रेट जांच के आदेश जारी किए। होटल अर्पित पैलेस के मैनेजर और असिस्टेंट मैनेजर को गिरफ्तार कर लिया गया है। होटल का मालिक फरार है।

करोलबाग के इस होटल में पंचकूला के आईआरएस अधिकारी, म्यांमार के तीन पर्यटक, केरल से विवाह के सिलसिले में आई एक पार्टी के लोग मारे गए। दिल्ली पुलिस के अनुसार इस होटल में 37 कमरों में 53 लोग रह रहे थे। इसमें म्यांमार, अफगानिस्तान, कंबोडिया और युके से आए हुए लोग भी थे। आग लगने की सूचना मिलने पर सुबह ही सुबह पौने पांच बजे पांच फायर टेंडर पहुंचे। लेकिन वे गाड़ी पर लदी सीढ़ी न खोल पाने के कारण होटल की छठी मंजि़ल तक नहीं पहुंच पाए। बाद में फायर ब्रिगेड की 27 और गाडिय़ां पहुंची। कमरों के शीशे तोड़कर फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों ने आग में फंसे लोगों को बाहर निकाला।

अधिकारियों के अनुसार इस इलाके में ज़्यादातर मकानों को सिर्फ चार मंजिला रखने की हिदायत है। अब अधिकारी इस बात की छानबीन कर रहे हैं कि इस होटल ने पांचवीं और छठी मंजि़ल किस की अनुमति से बनाई। हर मंजिल पर लगे आग बुझाने वाले यंत्र तो थे लेकिन वे काम नहीं करते थे। घायलों के अनुसार संभवत: रात में डेढ बजे के बाद आग शार्ट सर्किट होने से लगी। होटल प्रबंधन सतर्क नहीं था। जबकि बिजली बोर्ड पर कोई भी स्विच दबाने से सनसनाहट होती थी। होटल में बार रूम और किचन ऊपर ही थे। अधिकारियों का अनुमान है कि आग ऊपर से ही लगी। जो धीरे-धीरे फैलती गई।

दिल्ली में और दिल्ली की सीमा से बाहर 20 किलोमीटर की परिधि में मौजूद बहुमंजिला व्यवसायिक, आवासीय इमारतों, अस्पतालों और होटलों में आग से सुरक्षा के इंतजाम सिर्फ कागजों में हैं। आग लगने या कोई बड़ा हादसा होने पर दिल्ली प्रशासन, दिल्ली पुलिस और जिला पुलिस सक्रिय होते हंै। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। ज़्यादातर होटल, आवासीय क्षेत्र, अस्पताल और नर्सिंग होम सुरक्षा मानकों की अनदेखी करके बने हैं। जिस तरह बस्तियों का फैलाव दिल्ली में हुआ है उस तरह से दिल्ली और उसके आसपास सुरक्षा प्रबंध नहीं के बराबर हंै। अग्निशमन दस्तों में भी 50 फीसद पद खाली हैं और आग बुझाने वाले वाहनों और उपकरणों की खासी कमी है।

कौन हैं राजीव कुमार

राजीव कुमार विशेषज्ञ हैं इलेक्ट्रानिक खुफियागीरी के। वे आईआईटी रु ड़की के कंप्यूटर साइंस के इंजीनियर रहे हैं और इस क्षेत्र के स्कॉलर माने जाते हैं। खादिम शूज के प्रबंध निदेशक पार्थ प्रतिम राय बर्मन जब अपहृत हुए थे तो उनकी तलाश का काम एमएसपी(सीआईडी) के तौर पर राजीव ने ही किया था। वे कोलकाता पुलिस की एसटीएफ इकाई में भी रहे हैं जिन्होंने नक्सलियों की गतिविधियों पर काम किया।

राजीव कुमार कोलकाता के पुलिस कमिश्नर है जिन्हें केंद्र की सीबीआई पूछताछ के लिए अपने साथ ले जाने कोलकाता पहुुंची थी। वह भी रविवार की शाम। सीबीआई की यह टीम 20 लाडडन स्ट्रीट पर कमिश्नर आवास पहुंच गई। सीबीआई उनसे शारदा चिट फंड घोटाले के सिलसिले में पूछताछ करना चाहती थी।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीबीआई के अचानक छापे के इस इरादे को संघीय गणराज्य के आधार के खिलाफ माना और वे तीन फरवरी से अनिश्चित कालीन धरने पर बैठ गईं। उनके इस प्रतिवाद का समर्थन किया आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, ओडिसा के नवीन पटनायक और दूसरे विपक्षी दलों ने।

राजीव कुमार कभी किसी पार्टी के साथ हमजोली नहीं कहे जा सकते। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीबीआई की कारस्तानी के विरोध में धरना इस बात पर दिया कि सीबीआई में स्थानीय प्रशासन को इस संबंध में जानकारी क्यों नहीं दी। अपनी जगह वे सही हैं क्योंकि उन्हें या उनके विभाग को एक ओहदेदार के संबंध में जानकारी दी ही जानी चाहिए। ममता बनर्जी तीन दिन तक धरने पर धर्मतला मेट्रो स्टेशन पर बैठीं। पूरे देश में चर्चा रही।

याद कीजिए 2011 में जब ममता बनर्जी 20 मई को प्रदेश में सत्ता संभाली तो वे कोलकाता पुलिस के ज्वाएट कमिश्नर राजीव कुमार को टेलिफोन कॉलस को इंटरपोट करने के आरोप में नाराज़ हुई थीं। हालांकि उस आरोप में वे फंस नहीं पाए। ममता को संदेह था कि वाममोर्चा के इशारे पर वे ऐसा कर रहे थे। इसलिए उन्हें हटाया जाए। वही राजीव कुमार उनके इतने करीब पहुंचे कि पूरे देश में उनका नाम गूंज उठा।

राजीव कुमार विशेषज्ञ हैं इलेक्ट्रानिक खुफियागीरी के। वे आईआईटी रु ड़की के कंप्यूटर साइंस के इंजीनियर रहे हैं और इस क्षेत्र के स्कॉलर माने जाते हैं। खादिम शूज के प्रबंध निदेशक पार्थ प्रतिम राय बर्मन जब अपहृत हुए थे तो उनकी तलाश का काम एमएसपी(सीआईडी) के तौर पर राजीव ने ही किया था। वे कोलकाता पुलिस की एसटीएफ इकाई में भी रहे हैं जिन्होंने नक्सलियों की गतिविधियों पर काम किया। यह टीम वाममोर्चा सरकार के दौरान गठित हुई थी।

शारदा घोटाले की शुरूआती जांच-पड़ताल का काम करते हुुए वे मुख्यमंत्री के करीबी हुए। तब वे विधानसभा के कमिश्नरी में थे। उनकी टीम ने ही शारदा समृह के प्रमोटर सुदिप्त सेन और उसकी सहयोगी देवयानी मुखर्जी को गिरफ्तार किया था। सीबीआई का कहना है कि इस चिटफंड घोटाले के साथ ही रोज वैली घोटाला भी हुआ था जिसकी सारी जांच-पड़ताल राजीव कुमार की जानकारी में होगी। सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में यह आरोप लगाया था कि शारदा घोटाले में प्रमाणों को कथित तौर पर नष्ट कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट नेराजीव कुमार को शिलांग के सीबीआई ऑफिस में पूछताछ के लिए जाने का निर्देश दिया और सीबीआई को उन्हें गिरफ्तार करने से रोका।

भाजपा का झारखंड में बेहतर रहेगा गठबंधन

झारखंड में भाजपा नेतृत्व का गठबंधन ज़्यादा कारगर हो सकता है। यहां पर तिकोनी चुनावी मुकाबले की दश उभर रही है। इससे भाजपा को लाभ होने के आसार हैं।

हालांकि कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, झारखंड विकास मोर्चा और राष्ट्रीय जनता दल का गठबंधन मोटे तौर पर बना लग रहा है। इनमे यहां राज्य की 14 सीटों पर खींचतान है, लेकिन नेताओं को भरोसा है कि वे इसे सुलझा लेंगे। कांग्रेस के नेतृत्व वाले इस गठबंधन को 2004 में 14 में से 13 सीटें मिली थीं। सवाल आज यही है कि क्या वैसा चमत्कार 2019 में संभव है?

तब से अब में फर्क यह है कि तब बाबू लाल मिरांडी भाजपा में थे और वे ही तब जीते भी थे। इस बार उनके ही कारण पेंच आया है। उनकी मांग दो सीटों की है। इनमें एक सीट है गोड्डा की । उनकी पार्टी के दूसरे नंबर के नेता प्रदीप यादव वहां से विधायक हैं। वे लंबे समय से वहां जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई लड़ रहे हैं। अडानी पावर प्रोजेक्ट के खिलाफ आंदोलन में वह छह महीने जेल में भी रहे। दूसरी ओर कांग्रेस के पास पूरे प्रदेश में यही एक सीट है जहंा से किसी मुस्लिम उम्मीदवार को लड़ाया जा सकता है। कांग्रेस के पूर्व सांसद फुरकाम अंसारी को इस सीट से लड़ाना चाहती है। लेकिन मरांडी का तर्क है कि ध्रुवीकरण में अंसारी चुनाव हार जाएंगे इसलिए उन्हें राज्यसभा में भेजने का प्रस्ताव बेहतर होगा। उधर राजद की भी दो सीटों की मांग है। पर आसार यही है कि एक सीट पर सहमति बन जाए। गठबंधन में विवाद संथाल परगना के दो कद्दावर नेताओं को उनके अंह को लेकर भी है। दोनों में ही एक दूसरे को नेता मानना सहज नहीं है। गठबंधन में खीचतान की एक वजह यह भी है।

चुनावी विश्लेषणों का मानना है कि यदि गठबंधन में तनातनी बदली बिखराव  में तो इसका असर खासा व्यापक होगा। यदि जेएमएम अलग होती है तो उसके साथ  ही राजद भी चली  जाएगी। इसके पीछे यह तर्क है कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद जेएमएम के साथ अच्छे संबंधों को बनाए रखना चाहते हैं। क्योंकि फिलहाल वे जेल में हैं और यदि सत्ता में जेएमएम किसी भी तौर रहे तो उससे लाभ हो सकता है।

ऐसे में यदि जेएमएम और राजद  एक साथ हुए तो भाजपा को छोड़कर आजसू का तालमेल कांग्रेस और जेवीएम से हो सकता है। राज्य  में लड़ाई तब तिकोनी होगी। इसका लाभ भाजपा को होगा। तिकोनी लड़ाई में उसका फायदा ही फायदा है।

पक्ष के गठबंधन और विपक्ष के महागठबंधन ने कमर कसी

आम चुनाव के लिए अभी भी दो महीने बाकी हैं। लेकिन सत्ता और विपक्ष एक दूसरे पर परस्पर आरोप-प्रत्यारोप  में लगा हुआ है। पूरे देश में चुनावी सरगर्मी की खासी जबरदस्त शुरूआत हो गई है। आपसी बातचीत, तालमेल गठबंधन, महागठबंधन, महा मिलावट आदि शब्द ही नहीं बल्कि एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के हथियार भी हैं। लोकतंत्र के इस भारतीय महा समर की तैयारियां लगभग पूरी होने की दिशा में हैं। जनता दोनों पक्षों को जान-समझ रही है। फैसला उसके हाथ है। पक्ष और विपक्ष दोनों में ही गठबंधन का सिलसिला अर्से से है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद धन्यवाद प्रस्ताव दिया। यह एक घंटे पैंतालिस मिनट का था। पूरा भाषण सत्ता में अपनी उपलब्धियां और विपक्ष की बाधाओं का रोजनामचा था। भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में बनी एनडीए सरकार ने काफी काम जनहित में किए लेकिन कई काम ऐसे भी हुए जिनसे देश में अशांति, भय और हिंसा का माहौल भी बना। आम नागरिक को जाति, धर्म, खान-पान, भाषा आदि के नाम पर बेचैन किया गया। लगा देश में असहिष्णुता को राजनीतिक धार्मिक एजेंडे के तौर पर अमल में लाया जा रहा है। संविधान की अनदेखी की जा रही है।

यह सही है कि एनडीए सरकार ने देश में अपने पांच साल के कार्यकाल में अपने विभिन्न कार्यक्रमों से जनता में नई जागरूकता पैदा की। अपने परिवेश को साफ  रखने, खुद साफ रहने आदि के कई काम किए जिन पर पिछली सरकारों ने सोचा भी नहीं था। लेकिन वे आंकड़ों की बजाए आम जन-जीवन में किस हद तक कामयाब हुए यह जनता जानती-समझती है। रोजगार, शिक्षा, सामाजिक न्याय और भ्रष्टाचार ऐसे मुद्दे रहे जिन पर प्रधानमंत्री ने भाजपा नेतृत्व की सरकार की उपलब्धियां गिनाई साथ ही लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमज़ोर करने के विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए उसके लिए कांग्रेस की सरकारों को ही दोषी करार दिया। उन्होंने विपक्षी दलों के महागठबंधन को महामिलावट करार दिया। उन्होंने उपहास में विपक्ष की रणनीति पर अपनी चिंता जताई। लेकिन विपक्ष काफी समझ-बूझ कर इस बार सत्ता दलों को जनता के सामने घेरने में लगा है। ऐसा लगता है कि यदि ईवीएम मशीनों ने वाकई निष्पक्ष तरीके से काम किया तो आश्चर्यजनक नतीजे आ सकते हैं।

कोलकाता में 19 जनवरी को युनाइटेड इंडिया के लिए 23 दलों के नेता परेड ब्रिगेड ग्राउंड में रैली में शामिल हुए। चार फरवरी को बंगाल की मुख्यमंत्री ने सीबीआई टीम को कलकत्ता के पुलिस कमिश्नर को गिरफ्तार करने  की कोशिश पर तीन फरवरी को धरना दिया। तीन फरवरी को परेड ब्रिगेड ग्राउंड में हुई वाम मोर्चा की रैली, दिल्ली में आठ फरवरी को युवाओं का प्रदर्शन और 13 फरवरी को नई दिल्ली में हुई ‘तानाशाही मुर्दाबाद, लोकतंत्र बचाओ’ रैलियां यह ज़रूर बताती हैं कि सत्ता में रही पार्टियों ने भी अच्छा खासा बहुमत पाकर भी देश की जनता को समस्याओं से राहत नहीं दी। जिसके कारण विपक्ष दलों की जनता के बीच पैठ बढ़ी।

 अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने विमुद्रीकरण (नोटबंदी) और जीएसटी को अमल में लाने के लाभ गिनवाए। अभी हाल में जीएसटी के चलते छोटे-मझोले कल-कारखानों को जो बंदी के कगार पर थे उन्हें  जनवरी महीने में जीएसटी कौंसिल से 40 लाख तक का कारोबार करने पर जीएसटी से राहत मिली। लेकिन पेट्रोलियम, रियल एस्टेट आदि को भी जीएसटी के तहत राहत मिलती तो शायद तस्वीर कुछ और बेहतर हो पाती।

असम और उत्तरपूर्व में एनडीए सरकार का नागरिकता (संशोधन ) विधेयक पर खासा बवाल मचा हुआ है। लोकसभा में यह विधेयक पास हो गया है। लेकिन राज्यसभा में यह फिलहाल है। इस विधेयक के जरिए यह कोशिश की जा रही है कि जो अवैध प्रवासी असम और उत्तरपूर्वी राज्यों में आकर बसे हैं उनकी नागरिकता को वैधता दी जाए। इससे स्थानीय समुदायों और नागरिकों को खासा खतरा हो गया है।  इस विधेयक में मुसलमानों को छोड़ कर हिंदुओं, जैनियों , सिखों, बौद्धों और इसाइयों को प्राथमिकता दी गई है।

इस विधेयक का विरोध एनडीए सकार में शामिल असम और उत्तरपूर्वी राज्यों के विभिन्न राजनीतिक दल कर रहे हैं। असम सरकार के साथ सहयोग कर रही असम गण परिषद अब सरकार में नहीं है। साथ ही तीन उत्तर पूर्वी राज्य नगालैंड, मिज़ोरम और मेघालय भी अपना विरोध जता रहे हैं।

इसी तरह राफेल सौदे पर रोज़ नए-नए दस्तावेज विपक्ष ला रहा है जिससे सत्ता पक्ष की बेचैनी कम नहीं हो रही हैं रक्षा सौदे में कांग्रेस की सरकार की भी खासी भद्द पिटी थी और उसी तरह के आरोप में भाजपा और इसके नेता के नाम का उछलना जनता को सतर्क तो करता ही है। इस मामले में आधी अधूरी जानकारी पर अदालती फैसला, सीएजी की रपट आदि से भी विभिन्न सवाल उठते हैं जिसका उचित समाधान सरकार नहीं कर पा रही है।

नोटबंदी के बाद देश में एनडीए सरकार ने पुराने नोट बंद करके नए नोट ज़रूर चलाए लेकिन लेबर ब्यूरों की रपट के अनुसार बेरोजग़ारों की तादाद में बढ़ोतरी 2016-17 में 76.8 फीसद हो गई। इस रिपोर्ट में महिला बेरोजग़ार शक्ति शमिल नहीं है। सरकार इस बढ़ोतरी से भले इंकार करे लेकिन इस बात पर जनता में भी आम सहमति है।

अब अंतरिम बजट के बाद मई में आम चुनाव हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के विरोध में विपक्षी दलों का महागठबंधन आकार ले रहा है। सामूहिक नेतृत्व पर ज़ोर देने वाले इस महागठबंधन में वैचारिक विभिन्नता है और आपसी उठा-पटक भी है। इसे ध्यान में रखते हुए भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को सत्ता में आने लौटने की पूरी उम्मीद है। इसकी एक वजह यह कही जा रही है कि भाजपा सरकार देश के किसानों के लिए रुपए पांच सौ मात्र महीने यानी रुपए छह हजार मात्र सालाना की वित्तीय सहायता छोटे किसानों को देने की घोषणा की है। यह इस घोषणा के पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने घोषित किया था कि जिन प्रदेशों में किसान कांग्रेस की सरकारें बनेंगी वहां की सरकारें सभी बेरोजगारों को न्यूनतम आमदनी मुहैया कराएंगी। इस घोषणा के बाद लगभग हड़बड़ी में भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार ने छोटे किसानों के लिए घोषणा की।

अब आम चुनाव में जनता को फैसला लेना है। पिछले पांच साल के भाजपा नेतृत्व के एनडीए सरकार के कामकाज और उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए अपना बहुमूल्य वोट उस पार्टी और गठबंधन को देना है जिससे उसे कुछ बेहतर की उम्मीद हो।

वामपंथ की महारैली में जुटा जनसैलाव

कोलकाता में एक ही पखवाड़े में हुई दो बड़ी रैलियां अलग-अलग विचार के लोग पूरे बंगाल और उत्तरपूर्व से आए। दोनों ही रैलियों में परिर्वतन यानी बदलाव पर जोर था। पहली महारैली तृणमूल कांग्रेस की ओर से 19 जनवरी को युनाइडेट इंडिया के तहत थी। दूसरी रैली महारैली थी जिसे वाम मोर्चा ने तीन फरवरी को आयोजित किया था।

कोलकाता के परेडग्रांउड में माकपा के नेतृत्व में बाम मोर्चा की इस महारैली में आते हुए लोग दिखते तो थे लेकिन रैली का आखिरी हिस्सा कहीं नहीं दिखता था। यह महारैली ममता बैनर्जी की पार्टी की ओर से 19 जनवरी को आयोजित युनाइटेड इंडिया रैली से किसी भी हालत में 19 नहीं थी। इस रैली में शामिल लोग नारे लगा रहे थे ‘भाजपा हटाओ, देश बचायो, तृणमूल हटाओ, बंगाल बचाओ।’ इसमें माकपा के अलावा माकपा, फारवर्ड ब्लॉक,  आरएमपी और कम्युनिस्टों के विभिन्न छोटे दल थे।

इस रैली में कुल नौ वक्ता थे। लेकिन इनमें एक भी देश के प्रधानमंत्री पद की आस में नहीं था। पश्चिम बंगाल में माकपा के राज्य सचिव सूर्यकांत मिश्र ने कहा कि इस रैली में पिछली रैली की तुलना में दो गुणे लोग आए हैं। यहां आई जनता यह जानती है कि क्या अंतर है उस रैली और इस रैली में। कौन उनके लिए कुछ कर सकता है और कौन सिर्फ सपने दिखा सकता है।

इस महारैली में कम्युनिस्ट पार्टी (माले)लिवरेशन के महासचिव दीपकर भट्टाचार्य मुख्य अतिथि थे। मुख्य अतिथि के तौर पर उनका आना वामपंथी तालमेल में एक विस्तार माना जा सकता है। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि आज ज़रूरत है कि इस पर सोचा जाए कि भाजपा किस तरह देश में हिंदुओं और मुसलमानों को बांट रही है। सिटिजंसशिप विधेयक  के बहाने कथित अप्रवासी बाहर किए जा रहे हैं। उसका कैसे मुकाबला हो। बंगाल में उन्होंने नए वामपंथी विकल्प की मांग की जिससे अत्याचारी तृणमूल कांग्रेस की सत्ता खत्म हो और सांप्रदायिक भाजपा को राज्य में हावी न होने दिया जाए। आज इस बता की ज़रूरत है कि तमाम वामपंथी लोकतांत्रिक ताकतें एक हों और जन समर्थन से 2019 के लोकसभा चुनाव में वे मिल कर लड़ें।

माकपा (भाले) लिबरेशन वह लोकतांत्रिक राजनीतिक नक्सल पार्टी है जो बंगाल में वाममोर्चा सरकार की हमेशा खिलाफत करती रही। जब बाबरी ध्वंस हुआ तब माकपा (माले) लिबरेशन के नेतृत्व ने 1993 में हुई ब्रिगेड रैली में भाग लिया था। अब उस माले इसने तीन फरवरी 2019 को भाग लिया। यह संगठन, बंगाल-बिहार, झारखंड उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में सक्रिय है। इस वामपंथी महारैली में 17 छोटे वाम पंथी गुटों ने भी हिस्सेदारी की। इस रैली में बड़ी तादाद में नौजवान लोग थे। इससे एक संभावना ज़रूर बनी थी कि आगे वाले चुनावों में वामपंथी दलों का भी एक व्यापक मोर्चा बन सकता है। जब कोलकाता में ब्रिगेड परेड ग्राउंड में 19 जनवरी और तीन फरवरी 2019 को हुई दोनों महारैलियों का आकलन होता है तो उससे जाहिर होता है कि देश में बदलाव की बयार जबर्दस्त है।

मोदी की ‘घर वापसी’ इसी चुनाव में

निर्दलीय विधायक और दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवानी ने कहा कि इस साल के आम चुनाव में मोदी की ‘घर वापिसी’ ज़रूर हो जाएगी। देश में बेरोजगार युवाओं का आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा है। केंद्र में सरकार किसी भी बने पर उसे राजपाट संभालने के 100 दिन के अंदर सरकारी क्षेत्र में खाली 24 लाख पद पर नियुक्तियां करनी होगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में सात फरवरी को जब यह जानाकरी दे रही थे कि उनकी सरकार ने पांच साल में लाखों युवाओं को रोज़गार से जोड़ा। इसके साथ ही वे उन्होंने फार्मल और इनफार्मेल क्षेत्रों में रोजगार की बदलती परिभाषा पर अपनी व्याख्या भी दी। उसी समय देश के तकरीबन पचास युवा संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रहे युवा एक बड़े जुलूस में रोज़गार  की मांग करते हुए नारेबाजी कर रहे थे। यह जुलूस पुलिस निर्देश के चलते दिल्ली में जामा मस्जिद में मंडी हाउस तक ही जा सका। लेकिन इसमें शामिल युवाओं ने अपनी इस कूच से प्रधानमंत्री के दावों की कलई खोल दी।

इसके पहले यंग इंडिया अधिकार मार्च के समर्थन में 22 जनवरी को नागरिक सभा दिल्ली प्रेस क्लब में हुई थी। जिसमें युवाओं की मांगों और सरकारों की अनदेखी पर बातचीत की गई थी।

दिल्ली में युवा अधिकार मार्च में रेलवे के अप्रेंटिस कर्मचारी भी शामिल हुए। ऑल इंडिया रेलवे अप्रेंटिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष चंदन पासवान ने बताया कि आईआईटी पास युवा रेलवे में अप्रेटेंसिस भरती हुए। साल भर काम किया। यानी डबल स्किल होने पर भी हमें नौकरी नहीं दी गई। जबकि पहले अप्रेंटिस को नौकरी में वरीयता थी। मोदी सरकार सिर्फ हमारे 20 फीसद लोगों को नौकरी दे रही है। जबकि पहले 100 फीसद नौकरी मिलती थी।

आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुचेता डे ने कहा वित्त मंत्री अमेरिका में इलाज करा रहे हैं। वे ट्वीट करते हैं देश में बेरोज़गारी समस्या नहीं हैं। अब अगर ऐसा नहीं है तो आंदोलन पर युवा क्यों हैं? आज हजारों की संख्या में ऐसे देश में युवा दिल्ली पहुंचे हैं। उसे देख कर हालात का अनुमान लगा सकते हैं।  पंजाब विश्वविद्यालय की अध्यक्ष कनुप्रिया ने कहा, संघ और भाजपा देश भर में विश्वविद्यालयों के परिसरों को जेल में बदल रही है। छात्र भी इसका प्रतिरोध कर रहे हैं। हमारे आंदोलन को प्रशासन ने कुचलना चाहा। हमारे विरोध पर वे झुके। अब वहां कोई कफ्र्यू नहीं है। पूर्वाेत्तर से भी काफी संगठन आए थे। असम के गोहाटी से आए छात्र नेता रजीत करमसा ने कहा, मोदी सरकार ने उत्तरपूर्व के लोगों को ठगने का काम किया है। इस कारण आज पूरे उत्तरपूर्व राज्यों में आंदोलन की आग लगी है। उन्होंने नागरिक संशोधन बिल को जबरन लागू करने की प्रयास शुरू कर दिए हैं। उसका विरोध जताने भी हम आए हैं।  जेएनयू छात्र संघ में अध्यक्ष एन आई बालाजी ने कहा, इस सरकार ने हर साल दो करोड़ रोजगार का वादा किया था। लेकिन पांच साल में इस सरकार के दौरान ही सबसे ज्य़ादा बेरोज़गारी है। फिर छात्रों पर विश्वविद्यालय प्रशासन, यूजीसी और दूसरे तरीकों से लगातार हमले यह सरकार कर रही है।

जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया ने कहा, दंगा नहीं, युवाओं कोरोजगार चाहिए, जुमला नहीं, अधिकार चाहिए। आज देश में व्यापक छात्र युवा एकता बेहद ज़रूरी है क्योंकि मोदी  जी अपनी जुमलेबाजी पांच साल और चाहते हैं। उन्होंने छात्रों ईवीएम पर काबू पाने की पूरी कोशिश की लोगों पर गोलियां चलाई, गिरफ्तारियां की लेकिन वे देश के अंदर लोकतंत्र की आवाज कुचल नहीं पा रहे। लोग अपने हक और अधिकार के लिए आज सड़क पर उतर रहे हैं। ये कहते हैं, मोदी नहीं तो देश में कौन? अरे भाई, मोदी के खिलाफ हिंदुस्तान के ढेरों युवा हैं। इनके पास है मोदी का विकल्प। इसी लिए आज वे सड़क पर उतरे हैं।

गुजरात के युवा दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने कहा मोदी सरकार, दरअसल जुमला सरकार है। अगर नौजवान मोदी सरकार को सत्ता में ला सकता है तो उसे सत्ता से उतार भी सकता है। अगर मोदी ईवीएम सीबीआई के भरोसे सत्ता में लौटते की सोच रहे हैं तो अबकी उनके जुमले नहीं चलेंगे।

इस सभा में पहुंचे माकपा (माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि किसान परिवारों के लिए इस सरकार ने रु पए छह हज़ार मात्र सालाना की घोषणा की है। यनी महीने में पांच सौ और पांच लोग यह परिवार में है तो रोज हर सदस्य के लिए सिर्फ रु पए तीन मात्र और तीस पैसे। यह किसानों का अपमान है। तीन रु पए और तीस पैसे में आज एक कप चाय भी नहीं मिलती। क्या यह किसानों की मदद है।

उन्होंने कहा, इस मोदी सरकार ने किसानों, मज़दूरों युवाओं के साथ मजाक किया है। अगर लोकतंत्र में आस्था रखने वाले नौजवान, मज़दूर किसान एक हो जाएं तो देश में धर्म-जाति के नाम पर नफरत, लूट और झूठ बंद हो जाएगा। युवाओं की लड़ाई के साथ हम हैं और साथ-साथ इस लड़ाई को और तेज करेंगे जिससे मोदी की सरकार जाए। परिसर ‘मोदी की ‘घर वापिसी’ इसी चुनाव में’

निर्दलीय विधायक और दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवानी ने कहा कि इस साल के आम चुनाव में मोदी की ‘घर वापिसी’ ज़रूर हो जाएगी। देश में बेरोजगार युवाओं का आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा है। केंद्र में सरकार किसी भी बने पर उसे राजपाट संभालने के 100 दिन के अंदर सरकारी क्षेत्र में खाली 24 लाख पद पर नियुक्तियां करनी होगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में सात फरवरी को जब यह जानाकरी दे रही थे कि उनकी सरकार ने पांच साल में लाखों युवाओं को रोज़गार से जोड़ा। इसके साथ ही वे उन्होंने फार्मल और इनफार्मेल क्षेत्रों में रोजगार की बदलती परिभाषा पर अपनी व्याख्या भी दी। उसी समय देश के तकरीबन पचास युवा संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रहे युवा एक बड़े जुलूस में रोज़गार  की मांग करते हुए नारेबाजी कर रहे थे। यह जुलूस पुलिस निर्देश के चलते दिल्ली में जामा मस्जिद में मंडी हाउस तक ही जा सका। लेकिन इसमें शामिल युवाओं ने अपनी इस कूच से प्रधानमंत्री के दावों की कलई खोल दी।

इसके पहले यंग इंडिया अधिकार मार्च के समर्थन में 22 जनवरी को नागरिक सभा दिल्ली प्रेस क्लब में हुई थी। जिसमें युवाओं की मांगों और सरकारों की अनदेखी पर बातचीत की गई थी।

दिल्ली में युवा अधिकार मार्च में रेलवे के अप्रेंटिस कर्मचारी भी शामिल हुए। ऑल इंडिया रेलवे अप्रेंटिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष चंदन पासवान ने बताया कि आईआईटी पास युवा रेलवे में अप्रेटेंसिस भरती हुए। साल भर काम किया। यानी डबल स्किल होने पर भी हमें नौकरी नहीं दी गई। जबकि पहले अप्रेंटिस को नौकरी में वरीयता थी। मोदी सरकार सिर्फ हमारे 20 फीसद लोगों को नौकरी दे रही है। जबकि पहले 100 फीसद नौकरी मिलती थी।

आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुचेता डे ने कहा वित्त मंत्री अमेरिका में इलाज करा रहे हैं। वे ट्वीट करते हैं देश में बेरोज़गारी समस्या नहीं हैं। अब अगर ऐसा नहीं है तो आंदोलन पर युवा क्यों हैं? आज हजारों की संख्या में ऐसे देश में युवा दिल्ली पहुंचे हैं। उसे देख कर हालात का अनुमान लगा सकते हैं।

पंजाब विश्वविद्यालय की अध्यक्ष कनुप्रिया ने कहा, संघ और भाजपा देश भर में विश्वविद्यालयों के परिसरों को जेल में बदल रही है। छात्र भी इसका प्रतिरोध कर रहे हैं। हमारे आंदोलन को प्रशासन ने कुचलना चाहा। हमारे विरोध पर वे झुके। अब वहां कोई कफ्र्यू नहीं है।

पूर्वाेत्तर से भी काफी संगठन आए थे। असम के गोहाटी से आए छात्र नेता रजीत करमसा ने कहा, मोदी सरकार ने उत्तरपूर्व के लोगों को ठगने का काम किया है। इस कारण आज पूरे उत्तरपूर्व राज्यों में आंदोलन की आग लगी है। उन्होंने नागरिक संशोधन बिल को जबरन लागू करने की प्रयास शुरू कर दिए हैं। उसका विरोध जताने भी हम आए हैं। जेएनयू छात्र संघ में अध्यक्ष एन आई बालाजी ने कहा, इस सरकार ने हर साल दो करोड़ रोजगार का वादा किया था। लेकिन पांच साल में इस सरकार के दौरान ही सबसे ज्य़ादा बेरोज़गारी है। फिर छात्रों पर विश्वविद्यालय प्रशासन, यूजीसी और दूसरे तरीकों से लगातार हमले यह सरकार कर रही है। जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया ने कहा, दंगा नहीं, युवाओं कोरोजगार चाहिए, जुमला नहीं, अधिकार चाहिए। आज देश में व्यापक छात्र युवा एकता बेहद ज़रूरी है क्योंकि मोदी  जी अपनी जुमलेबाजी पांच साल और चाहते हैं। उन्होंने छात्रों ईवीएम पर काबू पाने की पूरी कोशिश की लोगों पर गोलियां चलाई, गिरफ्तारियां की लेकिन वे देश के अंदर लोकतंत्र की आवाज कुचल नहीं पा रहे। लोग अपने हक और अधिकार के लिए आज सड़क पर उतर रहे हैं। ये कहते हैं, मोदी नहीं तो देश में कौन? अरे भाई, मोदी के खिलाफ हिंदुस्तान के ढेरों युवा हैं। इनके पास है मोदी का विकल्प। इसी लिए आज वे सड़क पर उतरे हैं।

गुजरात के युवा दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने कहा मोदी सरकार, दरअसल जुमला सरकार है। अगर नौजवान मोदी सरकार को सत्ता में ला सकता है तो उसे सत्ता से उतार भी सकता है। अगर मोदी ईवीएम सीबीआई के भरोसे सत्ता में लौटते की सोच रहे हैं तो अबकी उनके जुमले नहीं चलेंगे।

इस सभा में पहुंचे माकपा (माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि किसान परिवारों के लिए इस सरकार ने रु पए छह हज़ार मात्र सालाना की घोषणा की है। यनी महीने में पांच सौ और पांच लोग यह परिवार में है तो रोज हर सदस्य के लिए सिर्फ रु पए तीन मात्र और तीस पैसे। यह किसानों का अपमान है। तीन रु पए और तीस पैसे में आज एक कप चाय भी नहीं मिलती। क्या यह किसानों की मदद है।

उन्होंने कहा, इस मोदी सरकार ने किसानों, मज़दूरों युवाओं के साथ मजाक किया है। अगर लोकतंत्र में आस्था रखने वाले नौजवान, मज़दूर किसान एक हो जाएं तो देश में धर्म-जाति के नाम पर नफरत, लूट और झूठ बंद हो जाएगा। युवाओं की लड़ाई के साथ हम हैं और साथ-साथ इस लड़ाई को और तेज करेंगे जिससे मोदी की सरकार जाए।

जहरीली शराब से उत्तराखंड में 136 की मौत, उत्तरप्रदेश में भी 60 मरे

उत्तराखंड और साथ लगते उत्तरप्रदेश में विषैली शराब से हुई मौतों के पूरे क्षेत्र में सनसनी  फैला दी है और साथ ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है दोनों सरकारों के कामकाज पर।

उत्तराखंड विधानसभा सत्र के पहले दिन समूचे विपक्ष ने राज्यपाल के अभिभाषण का बहिष्कार कर विरोध जताया।

कच्ची शराब बनाने और बेचने का यह अवैध धंधा उत्तराखंड में दशकों से प्रचलित है। कच्ची शराब का सेवन यहां रोजमर्रा की जिंदगी में गांव वाले शीतल पेय की तरह करते हैं। जहरीली शराब से मौत के तांडव की शुरुआत रुड़की के झबरेड़ा कस्बे में छह फरवरी को 29 वर्षीय सुधीर कुमार के ताऊ की तेहरवीं आयोजन में हुई। इस तेरहवीं कार्यक्रम में आस-पास के गांव के करीब 300 परिवार सम्मिलित हुए थे। झबरेड़ा थाना क्षेत्र में गांव बालूपुर, बिंदुखड़क, भगवानपुर और भलस्वगाज गांवो से सैकड़ों लोग आए थे।  तेहरवीं भोज के बाद कुछ ग्रामीणों ने वहीं पर और कुछ ने रास्ते में कच्ची शराब का सेवन किया। इन इलाकों में हरिजन, राय सिख, गुर्जर और मुस्लिम समुदायों की मुख्य आबादी है। राय सिखों की आबादी यहां कम है लेकिन वह लोग यह कार्य ज्य़ादा करते हैं और उनका दबदबा भी है।

 सुधीर के मुताबिक जहरीली शराब के इस कारोबार में पुलिस और प्रशासन भी मिला हुआ है। उसका कहना है अगर हम इनकी शिकायत कभी करते भी हैं तो उल्टा हमें ही झूठे केस में फंसा दिया जाता है। शराब माफिया की पुलिस से सांठगांठ के कारण कोई इनके खिलाफ आवाज नहीं उठाता, इसलिए गांव वालों ने इनकी शिकायतें करनी बंद कर दी हैं। तेहरवीं भोज और मदिरा सेवन के बाद पड़ोस के गांव वाले जैसे जैसे अपने घरों में पहुंचे तो उनकी हालत बिगडऩी शुरू हो गई। अगले दिन ग्रामीण इलाकों में एक के बाद एक मौत की खबर से उस गांव में कोहराम मच गया। मरने वालों की संख्या पहले ही दिन 40 पार कर गई थी अब तक मरने वालों की संख्या 136 हो चुकी है और अभी 77 की हालत गंभीर बनी हुई है। जहरीली शराब के प्रभावितों की देखभाल कर रहे चिकित्सकों की माने तो उन्हें यह संख्या 350  तक पहुंचने की आशंका है। अकेले सुधीर कुमार के घर पर उसके दो जीजाए भाई और पिता की मौत हो गई है। उसके घर में अब कोई बड़ा नहीं बचा है।

 आबकारी मंत्री प्रकाश पंत ने इस हादसे पर प्रथम दृष्टया लापरवाह पाए गए आबकारी विभाग के 13 और चार पुलिसकर्मियों को निलंबित किया है। मजिस्ट्रेट जांच के आदेश के साथ पूरे सूबे में अवैध शराब की भट्टियों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए करीब 40 संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है और हजारों लीटर अवैध शराब नष्ट की गई। जहरीली शराब से मरने वाले उत्तर प्रदेश के अधिकांश लोग भी उत्तराखंड के इसी गांव से शराब पीकर गए थे।  बिंदु खेड़ा गांव के एक परिवार में तीन लोगों की मौत हुई है। यहां हर दूसरे घर में  मातम छाया हुआ है। इस गांव में 19 मौतें हो चुकी हैं और अभी भी कई की हालत गंभीर बनी हुई है। बिंदुखड़क गांव के लोगों का यह भी कहना है कि उन्होंने दर्जनों शिकायतें पुलिस और प्रशासन में की लेकिन पुलिस वालों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। उनको इस बात का दुख है कि सरकार जागी भी तो इतने भीषण नरसंहार के बाद जागी।  सरकार की आंखें तब खुली जब 136 से ज्यादा लोग हमेशा के लिए मौत की नींद सो चुके थे।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने हादसे पर दुख व्यक्त करते हुए तत्काल उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने मरने वालों के परिजनों को दो-दो लाख और गंभीर रूप से बीमार को 50 हज़ार तत्काल मुहैया कराने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री रावत ने हालांकि इस बात को स्वीकार किया कि अवैध शराब के कारोबार को नष्ट करने में संबंधित विभाग के अधिकारियों को काफी विरोध का सामना करना पड़ता है जिसके लिए सरकार शीघ्र ही एक रणनीति बनाएगी ताकि अवैध शराब के कारोबार पर नकेल कसी जा सके। उन्होंने जल्द ही राज्य में इस बाबत कानून लाने की भी बात कही।

घटना के बाद लगातार बढ़ रही मरने वालों की संख्या से सरकार के लिए भी मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है ।

सूत्रों से पता चला है कि यूपी और उत्तराखंड में जहरीली शराब से हुई इतनी बड़ी संख्या में मौतों के पीछे का कारण इस गोरखधंधे को चलाने वाले एजेंट हैं जो रेक्टिफायर नामक केमिकल को सप्लाई करते हैं । यह केमिकल कच्ची शराब को ज्यादा नशीला बनाता है और इस की मात्रा थोड़ी भी ज्यादा हो जाए तो यह इसे जहर बना देता है। रोजाना शराब माफिया के एजेंट यूपी के बॉर्डर से उत्तराखंड के सीमावर्ती गांव में कच्ची शराब बनाने वालों को माल सप्लाई करते हैं और कच्ची शराब में रेक्टिफायर की मात्रा को यह लोग अंदाजे से डालते हैं। एक बोतल रेक्टिफायर से करीब 20 बोतल कच्ची शराब तैयार होती है। मुजफ्फरनगर में शराब फैक्ट्रियों से यह माफिया अवैध धंधे के लिए रेक्टिफायर को बहुत कम दामों पर खरीद कर उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में सप्लाई करते हैं। पुलिस ने इनको भी चिन्हित कर लिया है और शीघ्र इनका खुलासा करने का दावा किया है। उधर जहरीली  शराब पीने से हुई मौतों के सारे मामलों में हत्या की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए गए हैं। एसएसपी हरिद्वार जन्मेजय प्रभाकर खंडूरी ने एसआईटी गठित कर दी है। एसपी देहात नवनीत सिंह के नेतृत्व में एसआईटी का संचालन होगा और मंगलौर के क्षेत्राधिकारी  बी एस रावत को एसआईटी का प्रभारी बनाया गया है।

सीमावर्ती उत्तर प्रदेश में भी पुलिस ने एक पिता पुत्र को गिरफ्तार कर लिया है। यह दोनों यहां उत्तराखंड में कच्ची शराब सप्लाई करते थे पुलिस के अनुसार इस हादसे से जुड़े फकीरा और उसके बेटे सोनू को गिरफ्तार कर लिया है। एसपी देहात नवनीत सिंह के नेतृत्व में पुलिस ने एक सूचना के आधार पर भलस्वगाज़ तिराहे के पास से दोनों को गिरफ्तार कर लिया।  इन दोनों ने यह भी कबूला कि पांच फरवरी को शाम को सुखविंदर सिंह और उसके बेटे हरदेव सिंह से उन्होंने 35 बोतल कच्ची शराब खरीदी थी।  घर पहुंचने पर सोनू ने देखा की शराब का रंग और दिनों की तुलना में ज्य़ादा सफेद है और उसमें डीजल जैसी बदबू आ रही है। सोनू ने फोन पर हरदेव से बात की तो हरदेव ने यह कहकर बात टाल दी कि उसने शराब को डीजल के बर्तन में बनाया था। इसलिए उसमें ऐसी दुर्गंध आ रही है और सफेद रंग उसने खुद मिलाया था। एसएसपी खंडूरी ने बताया कि सोनू ने 20 बोतल शराब बालूपुर गांव के गजराज को बेच दीए सोनू ने दो बोतल के आठ पाउच बनाकर ग्रामीणों को बेच दिए। इनमें से जिस एक धीर सिंह नाम के व्यक्ति को सोनू ने चार पाउच बेचे उसने एक पाउच उसके घर पर पिया और दुर्गंध आने पर उसको तीन पाउच लौटा दिए। बाकी की छह लीटर शराब सोनू ने भलस्वगाज़ के चंद्रभान को बेच दी। अगले दिन छह फरवरी को सोनू फिर हरदेव के पास सहारनपुर जाकर 20 बोतल शराब ले आया जिसे उसने बिंदुखड़क के बिट्टू को बेच दी। एसएसपी के अनुसार सोनू यह काम मात्र रु पए 20 प्रति बोतल मुनाफा कमाने के लिए करता था। और रु पए 25 का पाउच ग्रामीणों को बेचता था। अगले दिन जब सोनू को यह खबर लगी कि उससे शराब खरीद कर पीने वाले और बेचने वाले धीरा और चंद्रभान सहित अन्य कई लोगों की मौत हो गई है तो वह फरार हो गया। हरदेव पहले ही यह भनक लगते फरार हो गया था। उसके घर पर पुलिस ने दबिश देकर शराब बनाने के उपकरण समेत अन्य सामग्री भी बरामद की है। दोनों राज्यों की पुलिस इस घटना के बाद से लगातार दबिश देने में जुट गई है। उत्तर प्रदेश ने फौरी तौर पर 55 पन्नों की एक नई आबकारी नीति जारी कर दी है। अवैध शराब के धंधे और तस्करी पर गहरी चिंता जताई है। शराब कारोबारियों ने नई नीति का कड़ा विरोध किया है।

उत्तराखंड के राजनीतिक हलकों में जहरीली शराब कांड पर सरकार की जमकर किरकिरी हुई है। विधानसभा सत्र शुरू होते ही नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश की अगुवाई में समूचे विपक्ष ने सदन से वॉकआउट कर दिया।  राज्यपाल के अभिभाषण का भी यह कह कर विपक्ष ने बहिष्कार किया कि निर्धारित समय से चार मिनट पूर्व ही कैसे अभिभाषण शुरू हो गया। इंदिरा हृदयेश ने इसे सदन की परंपरा तोडऩा बताया।

उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने जहरीली शराब कांड के लिए दोनों प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को दोषी ठहराते हुए उनके इस्तीफे की मांग की है। धस्माना ने इस घटना को लोगों का सामूहिक नरसंहार बताया और आबकारी नीति को दोषपूर्ण करार देते हुए इस त्रासदी को उत्तराखंड पर एक कलंक बताया। धस्माना ने यह भी कहा कि जहरीली शराब कांड के बाद ताबड़तोड़ छापों में प्रशासन ने जो हज़ारों लीटर शराब नष्ट की है उससे जाहिर होता है की सरकार और प्रशासन की शह पर यह सब चल रहा था। उन्होंने इस बात पर भी दुख व्यक्तकिया कि हर छोटी बात पर ट्वीट करने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस नरसंहार पर एक शब्द भी नहीं बोले। कांग्रेस के ही प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह  ने इन मौतों के लिए सीधे तौर पर सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने तत्काल प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचकर हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों की सुध ली। केवल कांग्रेसी ही नहीं भाजपा के अपने नेताओं ने भी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है भाजपा के पूर्व प्रवक्ता प्रकाश सुमन ध्यानी ने कहा कि इस पूरे खेल में सिर्फ छोटी नहीं बल्कि बड़ी मछलियों का भी संरक्षण प्राप्त है। उन्होंने आबकारी मंत्री की ओर इशारा करते हुए उदाहरण दिया कि स्वण् लाल बहादुर शास्त्री ने एक बार रेल मंत्री रहते हुए रेल दुर्घटना में 112 लोगों की मौत पर तत्काल नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया था।

बहरहाल पक्ष और विपक्ष के इन आरोपों प्रत्यारोपों के बीच सूबे की जनता को इस बात का अब खासा इंतजार है इस जहरीली शराब को परोसने वाले माफिया हत्यारों को पकडऩे और सजा दिलवाने में जीरो टॉलरेंस की त्रिवेंद्र रावत सरकार कितना कठोर और कितना जल्द न्याय दिलवाती है।

में 112 लोगों की मौत पर तत्काल नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया था।

बहरहाल पक्ष और विपक्ष के इन आरोपों प्रत्यारोपों के बीच सूबे  की जनता को इस बात का अब खासा इंतजार है इस जहरीली शराब को परोसने वाले माफिया हत्यारों को पकडऩे और सजा दिलवाने में जीरो टॉलरेंस की त्रिवेंद्र रावत सरकार कितना कठोर और कितना जल्द न्याय दिलवाती है।