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देश में कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा के निर्देश

पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद देश भर में सुरक्षा कड़ी कर दी गयी है खासकर कश्मीरी छात्रों अन्य नागरिकों की हिफाजत के पुख्ता इंतजाम किये गए हैं। कुछ जगह से यह शिकायतें मिली थीं कि वहां कश्मीरी लोगों के साथ खराब व्यवहार किया गया है। उधर जम्मू में लगातार तीसरे दिन कर्फ्यू जारी रहा।

राजधानी दिल्ली में भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये गए हैं। किसी भी तरह से माहौल खराब न हो, इसका खास ध्यान रखा जा रहा है। अल्पसंख्यक बहुल इलाकों, खासकर जिन इलाकों में कश्मीरी स्टूडेंट रहते हैं, वहां पर निगरानी बढ़ा दी गई है।

पुलिस मौजूदा माहौल में किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं चाहती।

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने भी इस तरह की घटनाओं पर चिंता जताते हुए केंद्र से आग्रह किया है कि देश भर में रह  कश्मीरियों की सुरक्षा की जाए। पुलवामा आतंकी हमले के बाद से देशभर में लोगों का गुस्सा देखने को मिल रहा है हालाँकि कुछ आसमाजिक तत्व माहौल का फायदा उठाकर गलत चीजें करने में जुटे हैं।

देश में रविवार को भी जगह-जगह पाकिस्तान के खिलाफ नारेबाजी हुई। उसके पुतले फूंके गए। इस दौरान कोई गलत कदम न उठाए इस पर नजर रखी जा रही है। पब्लिक में पुलिस की विजिबिलटी बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।

जम्मू में लगातार तीसरे दिन कर्फ्यू जारी रहा। वहां से किसी घटना की कोइ जानकारी नहीं है। शहर में पुलिस की गश्त जारी है और लोग घरों में खुद को बंद रखे हैं।

पांच अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने पांच कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को दी गयी सुरक्षा वापस ले ली है। इनमें हुर्रियत नेता मीरवाइज उमर फारुक भी शामिल हैं हालाँकि 

सूची में अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी और यासीन मलिक का नाम नहीं है जिन्हें पाकिस्तान समर्थक नेता माना जाता है और जो रोज भारत विरोधी ब्यान जारी करते हैं।  

जिन अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस लेने की आदेश जारी किये गए हैं उनमें मीरवाइज़ के अलावा अब्दुल गनी बट्ट, बिलाल लोन, हाशिम कुरैशी और शब्बीर शाह शामिल हैं। बिलाल लोन के भाई सज्जाद लोन भाजपा-पीडीपी की पूर्व सरकार में भाजपा कोटे से मंत्री थे। उनकी पार्टी जम्मू कश्मीर में पीपल्स कांफ्रेंस भाजपा की सहयोगी पार्टी है। सज्जाद लोन २००९ में मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हो गए थे हालाँकि, उनके बड़े भाई बिलाल लोन हुर्रियत के साथ हैं। 

जेके प्रशासन ने पांच अलगाववादी नेताओं को जो सूची जारी की है उसमें आश्चर्यजनक रूप से वरिष्ठ अलगाववादी नेताओं सईद गिलानी और यासीन मलिक का नाम नहीं है जिन्हें पाकिस्तान समर्थक माना जाता है और वे आज़ादी के सबसे बड़े समर्थक रहे हैं। यह दोनों नेता हर रोज भारत विरोधी ब्यान जारी करते हैं। जेके प्रशासन के मुताबिक अलगाववादियों को दी गई सुरक्षा और उपलब्ध कराए गए वाहन रविवार (आज) शाम तक वापस ले लिए जाएंगे। उधर इन नेताओं ने कहा है कि उन्हें किसी सुरक्षा की ज़रुरत नहीं है। 

आदेश के मुताबिक किसी भी अन्य कारण से इन नेताओं को सुरक्षा या सुरक्षाकर्मी मुहैया नहीं कराए जाएंगे। अगर सरकार ने उन्हें किसी तरह की सुविधा दी है तो वह भी भविष्य में वापस ले ली जाएगी। गौरतलब है कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को श्रीनगर दौरे पर कहा था कि पाकिस्तान और उसकी एजेंसी आईएसआई से पैसा हासिल करने वाले लोगों को दी गई सुरक्षा की समीक्षा की जाएगी।

जेके प्रशाशन का यह फैसला पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद आया है जिसमें एक आत्मघाती विस्फोट में सीआरपीएफ के ४० जवानों की शहादत हो गयी थी। पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (जेएएम) के आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से भरे वाहन से सीआरपीएफ की बस को टक्कर मार कर यह हमला किया था। 

पंचतत्व में देह, और अमर हो के नारे

देश आज गमजदा है। इस माटी के ४० लाल आज खामोश थे, कफ़न के बीच तिरंगे में लिपटे। उसी तिरंगे में जिसके लिए उन्होंने अपने जीवन की कुर्बानी दे दी। बचपन से जिन्होंने चुहल की, शरारतें कीं, कागज़ के जहाज उड़ाए और जवानी में जिनकी गरजती बंदूकों ने दुश्मनों के कलेजे में सिहरन पैदा कर दी, वे आज हमेशा के लिए विदा हो गए।

शहीदों की चिताओं से उठता धुंआ मानों आसमां में उनकी वीरता की इबारत लिख रहा था। उनकी जय-जयकार के नारे थे। उनकी वीर विधवाओं की आँखों में आंसू थे तो उनकी कुर्बानी के प्रति गौरव की चमक भी थी। उनके नन्हें बच्चे, जिन्हें मौत का अर्थ भी मालूम नहीं, कहीं अपने चाचू तो कहीं ताऊ के काँधे पर बैठे सामने चिता से उठती लपटों में समझने का प्रयास कर रहे थे कि नारे गुंजाती भीड़ क्यों इन लपटों को देखकर आँखों में अश्रु भर रही है।

बहुत बहनों ने अपने भाई खो दिए और बहुत भाइयों ने अपने भाई। माओं ने अपने लाल और पिताओं ने अपने बुढ़ापे की लाठी। पीटीए की अगली मीटिंग में पिता को शामिल करने के टीचर से किये अपने वादे को बच्चे अब कैसे पूरा करेंगे।

किसी की आँखों में किसी अपने के त्यौहार पर आने का इन्तजार था। कुछ ने होली पर अपने पति, बेटे, भाई या पिता के आने की अभी से तैयारी की होगी। लेकिन वो तो देश के लिए खून की होली खेल गया।

बस के शीशों से बाहर झांकता जब वो कश्मीर में अपनी ड्यूटी पर जा रहा होगा तो सड़क के किनारों पर हवा में हिलते पेड़ के पत्तों को देख उसे अपने गाँव की याद आ रही होगी। किसी बच्चे को सड़क के पार दौड़ते हुए देख गाँव में अपने बच्चे की याद आई होगी।

किसी अल्हड़ को सर पर थैला उठाये जाते देख गाँव में अपनी नवयौवना पत्नी की याद आई होगी या फिर किसी बूढ़ी को लाठी का सहारा लिए जाते देश अपनी मां को याद कर बचपन में उससे मिली ममता याद आई होगी। कहीं ढोल-नगाड़ों की ध्वनि ने गाँव के मेले की याद दिलाई होगी।

और यादों के इन्हीं झुरमुटों में अचानक कान फोड़ देने वाले शोर के बीच उसकी चीखें ”भारत मां के जयकारे” में बदल गयी होंगी। चारों तरफ धुएं के उस गुब्बार में उनकी हस्ती फिर भी नहीं खोई। दुश्मन ने अपने नापाक इरादे से उनकी जान ले ली लेकिन जांबाज कभी मरते नहीं।

मरते होते तो देश आज उनके लिए इतना बाबला न होता। उनके जयघोष नहीं हो रहे होते। जो उनसे कभी मिले भी नहीं, वो क्यों उनके लिए रो रहे होते। और क्यों उनकी विधवा हो गयी पत्नियां कलेजे पर पत्थर रखकर उनकी शहादत को ”जय हिन्द” कह रही होतीं। क्यों इन सपूतों के सजदे में हर सर झुक रहा होता।

देश के लिए यह कुर्बानी किताबों में लिखी जाने वाली गाथा मात्र नहीं है। यह प्रेरणा की महागाथा है। आने वाली पीढ़िओं के लिए रास्ता और ऊर्जा है। आज जब आप चिताओं में बैठे अपने शौर्य पर आसमां के किसी कोने में इतरा रहे थे, हम आपकी शहादत पर अपने आंसुओं को बह देने को आपकी वीरता के लिए अपना सलाम मान रहे थे।

जाओ हिन्द के लालो, जाओ। आपने अपना फ़र्ज़ अदा कर दिया। लेकिन आप हमेशा हमारे बीच रहेंगे। अपनी वीरता की महागाथाओं के साथ। आपके परिजनों की हिम्मत को देखकर हम इस बात का रश्क करेंगे कि क्यों नहीं हम भी आप की तरह बहादुर हो पाए। लेकिन सच यह भी है कि देश के लिए अपना जीवन भी कुर्बान कर देने का यह जज़्बा हर किसी का नहीं हो सकता। देश के यह लाल तो किसी ख़ास मिट्टी के बने होते हैं ! ”तहलका” का आपको सलाम !

अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ जांबाजों को विदाई 

पुलवामा में गुरुवार को हुए आतंकी हमले में शहीद हुए केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) के ४० जवानों को आज देशभर में अंतिम विदाई दी गयी। शहीद जवानों के पार्थिव शवों को शुक्रवार को कश्‍मीर से दिल्‍ली लाया गया था। वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और मंत्रियों सहित सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों ने श्रद्धांजलि दी। इसके बाद शहीदों के पार्थिव शव उनके घर भेजे गए। उनके अपने-अपने गृह राज्‍यों में इन जवानों का अंतिम संस्‍कार पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ किया गया।

पुलवामा हमले पर देश भर में प्रदर्शन

पुलवामा हमले में ४० जवानों की शहादत पर देश भर में आक्रोश है। पूरे देश में शनिवार को प्रदर्शन किये गए, कैंडल मार्च निकाले गए और पाकिस्तान के खिलाफ जमकर प्रदर्शन हुए। कई जगल पाक नेताओं और सेना के पुतले फूंके गए।

राजधानी दिल्ली समेत पूरे देश में लोगों ने सड़क पर निकल कर प्रदर्शन किये। इन प्रदर्शनों में जहाँ पाकिस्तान के खिलाफ ख्होब गुस्सा दिखा वहीं शहीद जवानों के परिवारों के प्रति एकजुटता का इजहार किया गया। इन प्रदर्शनों में सभी राजनीतिक दलों के नेताओं, व्यापार मंडलों, छात्र संगठनों ने हिस्सा लिया।

शहीद जवानों को समूचे देश की जनता ने अलग-अलग स्थानों पर अपनी श्रद्धांजलि दी। जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी और असम से गुजरात तक देश की आम जनता शहीद जवानों के बलिदान को सलाम करते हुए अलग-अलग तरीकों से उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दे रही है। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में भी सैकड़ों लोगों ने सड़क पर उतरकर जवानों को नमन किया है। कोलकाता में जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए निकाले गए एक कैंडल मार्च में राज्य की सीएम ममता बनर्जी ने भी हिस्सा लिया है।

दिल्ली में द्धारका मोड़ के पास शनिवार शाम व्यापार मंडल और स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन किया। लोगों ने हाथों में मोमबत्तियां ले रखीं थीं और वे ”शहीद जवान अमर रहें” के नारे लगा रहे थे। प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे राजेश बोहरा ने बताया कि यह हमला देश के हर नागरिक और हमारी अस्मिता के खिलाफ है। बोहरा मोहन गार्डन साउथ २५ के भाजपा के महामंत्री भी हैं।

बोहरा ने तहलका से बातचीत में कहा – ”पाकिस्तान में बैठे आतंकी सरगना हाफ़िज़ सईद ने यह हमला करके अपनी मौत को दावत दी है। हमारे पीएम मोदी ने साफ़ कहा है कि जिसने भी यह हमला किया किया है उसे पाताल से ढूंढ़ निकाला जाएगा। हमें उन्हें किसी भी सूरत में छोड़ना नहीं चाहिए, यही हर देशबासी चाहता है। हमारी शहीदों के परिवारों से पूरी संवेदना है और इस मुश्किल घड़ी में हर भारतीय उनके साथ है।”

पुलवामा की घटना के बाद से ही पूरे देश में आतंक के खिलाफ गुस्सा साफ झलक रहा है। हर राज्य में लोगों ने सड़क पर उतरकर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए सरकार से आतंकी घटना का मुंहतोड़ जवाब देने की बात कही है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी आतंकवाद का समर्थन करने वाले वाले लोगों को सख्त सबक सिखाने के तमाम संदेश लिखे गए हैं। पुलवामा में हमले के बाद से ही सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जिनके माध्यम से लोगों ने सरकार से आतंक के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने की बात कही है।

सुरक्षा के मद्देनजर कई जगहों पर कर्फ्यू लगाया दिया गया है। जम्मू में पूरी तरह से बंद है। वहां सभी दुकानें, पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद हैं। लोगों ने जम्मू मुख्य मार्ग तक बंद कर प्रदर्शन किया साथ ही जगह-जगह पर पाकिस्तान का पुतला फूंका। जम्मू के अलावा हिमाचल के विभिन्न नगरों में विद्यार्थियों, आम जनता, पूर्व सैनिकों ने सड़कों पर उतरकर इस जघन्य अपराध के खिलाफ अपना रोष जाहिर किया।

चंडीगढ़ और पंचकूला में भी प्रदर्शन किये गए। लोगों ने मांग की कि हमें निंदा नहीं चाहिए, अब एक भी आतंकी जिंदा नहीं बचना चाहिए। आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देते रहे पाकिस्तान का पुतला भी फूंका गया।

सर्वदलीय बैठक में तीन प्रस्ताव पास

दिल्ली में शनिवार को गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आयोजित की गई सर्वदलीय बैठक में नेताओं को पुलवामा हमले के बारे में जानकारी दी गई। बैठक में तीन सूत्रीय प्रस्ताव पास किया गया। बैठक की जानकारी देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि पूरा विपक्ष इस मामले में अपनी सेना और सरकार के साथ मजबूती के साथ खड़ा है।

पुलवामा के आतंकी हमले के देशभर में गुस्सा दिख रहा है। वहीं आतंक की देश को झकझोर देने वाली इस घटना के खिलाफ विपक्ष पूरी तरह सरकार के साथ खड़ा हो गया है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में एक तीन  सूत्रीय प्रस्ताव पास किया गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक इस  बैठक में जो तीन प्रस्ताव पास किये गए उनमें पहले में १४  फरवरी को पुलवामा के आतंकी हमले की कड़ी निंदा की गई। इस हमले में सीआरपीएफ के ४० जवानों की शहादत हो गई। प्रस्ताव में कहा – ”देशवासियों के साथ हम इस दुख की घड़ी में शहीदों के परिवारों के साथ खड़े हैं।”

दूसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि ”हम सीमा पार से समर्थन मिल रहे आतंकवाद के हर स्वरूप की कड़ी निंदा करते हैं।” तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है – ”पिछले तीन  दशक से भारत सीमा पार आतंकवाद का सामना कर रहा है। भारत में फैले आतंकवाद को सीमा पार से प्रोत्साहन मिल रहा है। भारत इन चुनौतियों का मिलकर मुकाबला कर रहा है। इस लड़ाई में पूरा देश एकसाथ है। हम आतंकवाद से लड़ाई में अपने सुरक्षा बलों के साथ पूरी मजबूती से खड़े हैं।”

राजौरी में मेजर शहीद

पुलवामा आतंकी हमले को लेकर देश भर में गम-ओ-गुस्से के बीच और और बुरी खबर जम्मू के राजौरी से आई है। वहां सेना के एक मेजर रैंक के अधिकारी आईईडी डिफ्यूज करते हुए शहीद हो गए हैं।

इस अधिकारी की पहचान अभी सेना ने नहीं बताती है क्योंकि अभी उनके परिवार को इसकी सूचना नहीं दी गयी है। हालांकि, जानकारी के मुताबिक यह अधिकारी मेजर रैंक के हैं और इंजीनियरिंग विंग से थे। तहलका की जानकारी के मुताबिक़ राजौरी जिले में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के नजदीक नजदीक यह मेजर जांच के लिए जा रहे थे। वहां आतंकियों की तरफ से लगाए आईईडी को जब वे डिफ्यूज कर रहे थे तो उसमें ब्लास्ट हो गया और अधिकारी शहीद हो गए।

नौशेरा सेक्टर के राजौरी जिले में नियंत्रण रेखा के करीब डेढ़ किलोमीटर अंदर यह आईईडी लगाई गई थी। पुलवामा आतंकी हमले के बाद सेना के किसी जवान की यह पहली बड़ी शहादत है। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ पर हुए सबसे बड़े आतंकवादी हमलों में से एक में ४० जवान शहीद हुए हैं जिनका आज अंतिम संस्कार किया जा रहा है।

सीएम नीतीश के खिलाफ सीबीआई जांच के आदेश

बिहार के मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में एक सीबीआई अदालत का बड़ा फैसला आया है। कोर्ट ने शुक्रवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी सरकार के दो बड़े अफसरों के खिलाफ सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं।

स्पेशल पॉक्सो एक्ट अदालत ने एक चिकित्सक अश्विनी की तरफ से दायर किए एक आवेदन पर जांच के आदेश दिए हैं। पॉक्सो न्यायाधीश मनोज कुमार ने सीबीआई से मुख्यमंत्री के अलावा उन अधिकारीयों के खिलाफ जांच को कहा है जिनका नाम याचिका (आवेदन) में शामिल है।

गौरतलब है कि अश्विनी शेल्टर होम में रहने वाली लड़कियों को नशीली दवाइयों का इंजेक्शन लगाकर उनका सेक्शुअली इस्तेमाल करता था। अश्विनी ने कोर्ट में दायर अपनी याचिका में कहा था कि इस मामले की जांच में सीबीआई सबूतों के साथ खिलवाड़ कर रही है। इसके साथ ही इस याचिका में उसने मुजफ्फरपुर के पूर्व डीएम धर्मेंद्र सिंह, वरिष्ठ आईएएस ऑफिसर अतुल कुमार सिंह, मुजफ्फरपुर के पूर्व डिवीजनल कमिश्नर, सामाजिक कल्याण विभाग के वर्तमान सचिव और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम का भी जिक्र किया था।

अब अदालत ने इन सभी के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं। बिहार के इस चर्चित मामले की जांच का जिम्मा सुप्रीम कोर्ट ने ७ फरवरी को दिल्ली के साकेत स्थित पॉक्सो कोर्ट को दिया था। साल २०१८ में मुजफ्फरपुर शेल्टर होम सेक्स स्कैंडल का मामला पूरे देश में बेहद चर्चा में रहा था। इस आश्रय गृह में ३० से अधिक लड़कियों के साथ कथित रुप से दुष्कर्म किया गया था।

इस मामले में सुसती बरतने पर सुप्रीम कोर्ट ने नीतीश सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी और कहा था कि राज्य सरकार मामले में सही एफआईआर फाइल करने में असफल रही।

एक दिन में ही जाम हुए वंदे एक्सप्रेस के ब्रेक

पीएम नरेंद्र मोदी के शुक्रवार को हरी झंडी दिखाकर रवाना करने के २४ घंटे के भीतर ही शनिवार को वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन के पहिये तकनीकी दिक्कतों के चलते जाम हो गए। ट्रेन के ब्रेक में यह खराबी यूपी के टुंडला जंक्शन से करीब १४ किलोमीटर दूर हुए।

ट्रायल रन के दौरान वंदे भारत एक्सप्रेस को पहले कमर्शियल संचालन के लिए वाराणसी से नई दिल्ली लाया जा रहा था लेकिन इसी दौरान ट्रेन के आखिरी कुछ डिब्बों के ब्रेक जाम हो गए। एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रेक डाउन के बाद यात्रा कर रहे मीडिया कर्मियों को विक्रमशिला एक्सप्रेस से दिल्ली लाया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक ट्रेन के रुकने से पहले एक्सप्रेस का आखिरी डिब्बा आवाज करने लगा। कुछ गड़बड़ी का अंदेशा होने पर लोको पायलट ने ट्रेन की रफ्तार कुछ देर के लिए कम कर दी। ट्रेन से धुंआ निकलते भी देखा गया और ट्रेन के आखिरी चार डिब्बों से दुर्गंध आने लगी।

इस रिपोर्ट के मुताबिक सभी डिब्बों की बिजली आपूर्ति ठप हो गई जिसके बाद इंजीनियरों ने १० किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से ट्रेन को दोबारा शुरू किया। इस दौरान इंजीनियरों ने टॉर्च और अन्य उपकरणों की मदद से ट्रेन के डिब्बों के नीचे निरीक्षण करते रहे। इस गड़बड़ी के सही कारणों का अभी पता नहीं लग सका है। हालांकि, एक रेलवे प्रवक्ता ने कहा कि ऐसा लगता है कि रेलवे ट्रैक पर कुछ मवेशियों के आने पर ट्रेन की यात्रा बाधित हुई।

वैसे ट्रेन आम जनता के लिए आधिकारिक तौर पर रविवार से शुरू होनी है। हालांकि, इस ब्रेकडाउन की वजह से रविवार को आधिकारिक तौर पर शुरू हो रही इस ट्रेन के संचालन पर संशय है। इंजीनियरों के जाम हुए ब्रेक दुरुस्त करने के बाद ट्रेन को १०  किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से चलाना शुरू किया गया लेकिन इसमें एक बार फिर दिक्कत आने पर वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह ली गई और इसके बाद इसे ४०  किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चलाने का फैसला किया गया।

पीएम मोदी ने शुक्रवार को इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी। पुलवामा आतंकी हमले के बाद सरकार ने बहुत ही साधारण कार्यक्रम में इसे लॉन्च किया था। रेलवे बोर्ड के चेयरमैन वीके यादव ने कहा – ”इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाया जाना एक संदेश है कि आतंकवाद भारत के विकास में बाधक नहीं बन सकता।”

भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार को क्या उखाड़ पाएंगी ये महिला नेता?

पश्चिम बंगाल (बंगाल) की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता के परेड ग्राउंड मैदान में अपनी ताकत एक महारैली में प्रदर्शित की थी। इसमें 20 राजनीतिक दल ने भाग लिया था। फिर जब वे धरने पर बैठीं तो भी विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने उनका साथ दिया। इससे यह संदेह तो पूरे देश में गया कि वे राजनीति में सक्रिय ज़रूर हैं। सवाल यह है कि क्या वे नरेंद्र मोदी को शिकस्त दे सकेंगी। जिनके बारे में चुनाव पूर्व आएं सर्वे-क्षणों में बताया गया है कि विपक्ष के तमाम नेताओं में मोदी ही देश में सबसे बड़े जिताऊ नेता हैं। कोई भी महागठबंधन उन्हेें या भाजपा नेतृत्व के गठबंधन को परास्त नहीं कर सकता।

दूसरी सोच है कि देश में राजनीतिक तौर पर सक्रिय ममता बनर्जी, बसपा सुप्रीमो मायावती और कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी वाड्रा मिल कर देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल सकती हैं। ये तीनों यदि एक साथ हुई तो नरेंद्र मोदी को अप्रैल मई में होने वाले लोकसभा चुनाव में विजय श्री सहज हासिल नहीं होगी। ममता बनर्जी को यह श्रेय हासिल है कि उन्होंने पश्चिम बंगाल में 35 साल से चल रहे वाममोर्चा राज को समाप्त किया था।  उन्हें राजनीति में देश में धर्मनिरपेक्ष नेता और राजनीतिक तौर पर मंजा हुआ खिलाड़ी माना जाता है।

उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती को 2014 के आम चुनाव में कोई कामयाबी तो नहीं मिली लेकिन अभी हाल ही में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उन्होंने खुद को ऐसे नेता के सपने ज़रूर जताया जिसे नकारा नहीं जा सकता। कहा जाता है कि मायावती प्रधानमंत्री पद की दावेदार हो सकती हैं। उनकी पार्टी बसपा का प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी से गठजोड़ भी हो गया है। जिससे भाजपा संशय में है लेकिन उसे राहत इस बात से है कि चुनाव मैदान में कांग्रेस अलग है तो उसकी जीत की संभावना बढ़ती है। फिर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के उपयुक्त नहीं मानते। उत्तरप्रदेश के चुनाव मैदान में अब राहुल, प्रियंका और ज्योतिआदित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस अलग से उतर रही है। इससे उत्तरप्रदेश में चुनावी जंग काफी दिलचस्प है।

मायावती की पार्टी बसपा ने अपने दम पर मध्यप्रदेश, राजस्थान में चुनावी जंग में हिस्सा लिया जबकि छत्तीसगढ़ में उन्होंने अजित जोगी के साथ सहयोग किया।  मायावती ने कर्नाटक में गौंडा और हरियाणा में चौटाला की इंडिया नेशनल लोकदल से गठजोड़ किया। इसी तरह उत्तरप्रदेश में दो सीटें कांगे्रस और दो सीटें अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के लिए छोडऩे की सहमति बनाई। इससे कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश में अकेले ही चुनाव लडऩे का संकल्प किया। यानी उत्तरप्रदेश में भाजपा का मुकाबला अब राहुल बनाम मोदी नहीं बल्कि अखिलेश-मायावती और राहुल-प्रियंका से है। भाजपा ने अपनी जीत के इरादे से ऊँची जातियों के गरीब युवाओं जिनकी सालाना आमदनी आठ लाख रु पए हो। उनके लिए नौकरीयों में दस फीसद आरक्षण की व्यवस्था की है। साथ ही गरीब युवाओं की शिक्षा में कजऱ् की व्यवस्था की है। इस बंदोबस्त का विरोध एक भी विपक्षी पार्टी भी नहीं कर सकी। चुनाव में इससे इनमें बेचैनी भी है।

मायावती जब 2007 में सत्ता में आई थीं तो उन्होंने ऊँची जातियों के गरीब युवाओं के लिए अरक्षण की मांग की थी। तब वे सर्ववर्ग सर्वधर्म सहयोग से जीती भी थीं। अब राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि यदि उत्तरप्रदेश चुनाव में सपा-बसपा गठजोड़ कामयाब रहता है तो दिल्ली में प्रधानमंत्री पद के लिए उनके नाम पर सपा सहयोग दे सकती हैं। अखिलेश तब उत्तरप्रदेश में कमान संभालेंगे। इस गठबंधन की विधानसभा सीटें 2017 में एनडीए के मुकाबले में अस्सी संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में 57 तक होती हैं।

प्रियंका गांधी वाड्रा ने जनवरी में उत्तरप्रदेश में भूमिका निभाने पर सहमति तब दी जब कांगे्रस ने उन्हें जिम्मेदारी का पद दिया। ‘तहलका’ ने अपने संपादकीय में तब राजनीतिक क्षेत्र में उनकी सक्रियता के बारे में लिखा था और राहुल गांधी की इस बात को भी अहमियत दी थी जिसमें उन्होंने कहा था कि राज्य में कांग्रेस कहीं भी पीछे नहीं रहेंगी। खुद कांगे्रस काफी पुरानी पार्टी है लेकिन इंदिरा गांधी से प्रियंका गांधी के चेहरे की साम्यता का उपयाग कांग्रेस इस चुनाव में करेगी। राहुल ने पिछले दिनों अपनी स्थिति में खासा सुधार कर लिया लेकिन पार्टी में अभी भी वह क्षमता नहीं दिखती जिसके बल पर वह पिछले चुनावों में जीत हासिल करती थी। उस कमी को दूर करने में प्रियंका भी अब कांग्रेस को मजबूत करेंगी।

उत्तरप्रदेश में कांग्रेस द्वारा प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तरप्रदेश में सचिव बनाने और पश्चिम उत्तरप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के सचिव बनाने पर भाजपा के नेताओं में खासी घबराहट हुई। विभिन्न नेताओं ने तरह-तरह की टिप्पणियां करके अपनी बेचैनी का इजहार किया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह ने सेवानिवृत फौजियों की ओआर, ओपी यानी वन टैंक, वन पेंशन की मांग को ‘ओनली मोदी, ओन्ली प्रियंका’ बता कर अपनी खीझ मिटाई। उनकी इस मनोदशा पर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला ने टिप्पणी की कि यह ‘ओनली मोदी, ओनली शाह’ का ओडोमस ओवरडोज का असर है।

अब यह साफ हो गया है कि उत्तरप्रदेश चुनाव क्षेत्र में कांग्रेस सचिव प्रियंका को खासा मुकाबला करना है। एक तरफ तो मोदी-शाह-योगी से और दूसरी ओर सपा-बसपा-रालोद से। एक तरह से प्रियंका को राजनीति की अग्निपरीक्षा से गुज़रना पड़ेगा। हालांकि उनके आने की खबर से भाजपा में नेताओं और कार्यकर्ताओं की हवाइयां उड़ रही हैं और दूसरी तरफ मायावती-अखिलेश शिविरों में भी सन्नाटा पसारा हुआ है।

प्रियंका के सामने सबसे बड़ी परेशानी है कि उत्तरप्रदेश में अर्से से कांग्रेस संगठन और उसके स्थानीय नेताओं में आराम करने की आदत पड़ गई है। अब उन्हें सक्रिय करना और उत्साही कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलना प्रियंका की जिम्मेदारी में आ गया है। कार्यकर्ताओं में खुशी बढ़ी है। उन्हें लगता है कि कांगे्रस मजबूत होगी तो उन्हें भी उसका समुचित लाभ मिलेगा। प्रियंका का ब्राह्रमण कुल से होना भी कांग्रेस के लिए एक वरदान है। वे इस तबके को साथ लेकर चलेंगी। ठाकुरों का भी वोट उन्हें मिल सकता है। अल्पसंख्यक और दलित जो भाजपा राज में खासे परेशान रहे हैं उनका भी उन्हें साथ मिल सकता है। खुद महिला होने के नाते वे बड़ी तादाद में महिलाओं और नौजवानों को कांग्रेस के प्रति आकर्षित कर सकती हैं। पहले भी अमेठी, रायबरेली में वे अपने भाई और मां के लिए राजनीतिक तौर पर सक्रिय रही हैं।

कांग्रेस की राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा में विजय से साधारण पार्टी कार्यकर्त का उत्साह बहुत बढ़ा है जिसका लाभ प्रियंका लेे सकती हैं। राजनीति विचारकों का मानना है कि कांगे्रस को लोकसभा में कम से कम 120 से 150 सीट मिल सकती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि विपक्षी दलों मे कांगे्रस प्रमुख विपक्षी दल तो रहेगा। भाजपा छोड़ चुके पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा का मानना है कि एनडीए की तुलतना में विपक्ष के पास एक से एक समर्थ और ताकतवर महिला राजनेता हैं। वे सीधे मतदाताओं को भरोसे में लेते हुए देश की तस्वीर बदल सकती हैं। भाजपा की तो सत्ता में अब तीन राज्यों में पराज्य के बाद उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है।

राजनीति में सक्रिय नेता के रूप मे प्रियंका गांधी वाड्रा का आगमन मीडिया पर  भी खासा असर डाल रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनका नाक-नक्श मिलना भी 43 साल की युवा महिला की संभावनाओं का नया आकाश बनाता है। जमीनी स्तर पर अमेठी-रायबरेली में उनकी मतदाताओं के साथ संपर्क की तस्वीरें अब भी पूर्वी उत्तरप्रदेश में युवाओं और महिलाओं के मन में हैं जिसका लाभ उन्हें मिलेगा। राहुल गांधी का एक अच्छे प्रभावशाली वक्ता और रणनीति पर सबसे राय-मश्विरा करके अपना फैसला लेने की क्षमता की भी सराहना कांग्रेस में हो रही है। देखना है कि भाई बहन और बुआ-भतीजा आपस में मिल कर उत्तर प्रदेश आम चुनाव 2019 में क्या गुल खिलाते हैं।

मायावती के बारे में कहा जाता है कि उनके मतदाता उनसे हमसे जुड़े हुए हैं कि  उनके इशारों पर इधर से उधर जाते हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल की सुप्रीमो ममता बनर्जी के बारे में भी यहीं बात प्रचलित है। दोनों को ही महागठबंधन की सरकार बनने की स्थिति में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताया जा रहा है। मायावती इस इस समय 64 साल की है। राजनीति में सक्रिय होने के पहले वे अध्यापक भी। जबकि ममता बनर्जी भी लगभग उसी उम्र की हैं वे किशोर उम्र में ही लड़ाकू और राजनीति समझने वाली प्रतिभा बतौर उभरी। उन्होंने बंगाल की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। फिलहाल वे मुख्यमंत्री हैं।

बसपा प्रवक्ता सुधींद्र भदोरिया का कहना है कि मायावती अध्यापन छोडऩे के बाद जब राजनीति में आई तो उन्होंने पार्टी को धीरे-धीरे विकसित किया। पंजाब, दिल्ली और उत्तरप्रदेश में उन्होंने इसे एक पहचान दी। उन्होंने दलित महिलाओं और पुरु षों को एक जुट किया। उनके बड़े-बड़े शिविर लगाए। उन्हें उनके अधिकार बताए। दूसरी जातियों को भी उन्होंने साथ लिया जिनमें गरीब और अल्पसंख्यक थे। मायावती आज राष्ट्रीय नेता हैं।

ममता, मायावती और प्रियंका आज विपक्ष में हैं लेकिन मतदाताओं ने बहुत बड़े तबके पर इनका असर है। कोई दावे के साथ नहीं कह सकता कि 2019 के आम चुनाव में सत्ता किसे मिलेगी?

फसल बीमा से जेब भरतीं निजी बीमा कंपनियां

योजना के शुभारंभ के दो वर्षों में सभी 18 कंपनियों ने मिलकर 15795 करोड़ रुपए का लाभ कमाया। ऐसा लगता है कि किसानों को राहत प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा शुरू की गई योजना के उद्देश्य को ही  खत्म कर दिया गया है।  पीएमएफबीवाई का उद्दश्ेय ” मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण किसानों को राहत प्रदान करना है। न्यूनतम पैदावार से 50 फीसद से कम उपज होने की स्थिति में बीमित किसानों को तत्काल राहत देने के लिए पीएमएफबीवाई अंतिम उपज के डेटा की प्रतीक्षा किए बिना लेखागत अंाशिक  भुगतान (संभावित दावों के 25 फीसद तक) के लिए व्यवस्था करना है।

साल 2017-18 के लिए भारतीय बीमा विनियामक और  विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष सुभाष सी खुंतिया ने वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग के सचिव को रिपोर्ट  भेजी भारत सरकार ने इसकी पुष्टि भी की। रिपोर्ट पत्र नबंर 1018आर एंड डी/एसडी/एआर/-2077-18/01/नवंबर-18 के द्वारा  28 नवंबर 2018 को सचिव को दी गई।

पूछताछ से पता चला है कि 2016-17 के दौरान 13 निजी कंपनियों का लाभ 3283 करोड़ रुपए था। साल 2017-18 में यह बढ़कर कुल 4863 करोड़ रुपए हो गया। इंश्योरेंस रेगुलेटरी  एंड डेवलमेंट ऑथरिटी ऑफ इंडिया की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार ‘निजी क्षेत्र’ की बीमा कंपनियों ने प्रीमियम के रूप में 11,905.89 करोड़ रुपए एकत्र किए। हालांकि इन बीमा कंपनियों ने किसानों को केवल 8831.78 करोड़ रुपए के दावों का भुगतान किया और तेजी से लाभ कमाया। आईआरडीआई का कहना है कि सरकार द्वारा प्रयोजित फसल बीमा योजनाओं में भारतीय फसल बीमा बाज़ार का बोलबाला है। भारत में सरकारी फसल बीमा कार्यक्रम 1985 में व्यापक फसल बीमा योजना (सीसीआईएस) को लागू करने के साथ शुरू हुआ। सीसीआईएस को  1999 में रबी की फसल के दौरान राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था जो 2015-16 तक जारी रहा। दोनों योजनाओं के तहत राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और सीसीआईएस के अंतर्गत नियंत्रित प्रीमियम दर प्रभारित की गई तथा एकत्र प्रीमियम से अधिक दावा देयता को राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा साझा किया गया था।

साल 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) को देश में आरम्भ किया गया। इसलिए 2016 में खरीफ की फसल से पीएमएफबीवाई ने मौजूदा योजनाओं को बदल दिया था। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना प्राथमिक रूप से एक क्षेत्र उपज सूचकांक आधारित योजना है। जहां एक अधिसूचित क्षेत्र के लिए हानियां सामान्य फसल अनुमान सर्वेक्षण के अंतर्गत आवश्यक संख्या में नमूना फसल कटाई प्रयोगों के आधार पर निर्धारित की जाती है। तथापि पीएमएफबीवाई के अंतर्गत आधारभूत जोखिम को कम करने के लिए स्थानीकृत हानियों  (ओलावृष्टि, भूस्खलन और बाढ़) और फसल के बाद की हानियों का आकंलन  (चक्रवात, बारिश और गैर-बारिश के कारण नुकसान) वैयक्तिक कृषि क्षेत्र के स्तरीय सर्वेक्षण के आधार पर  किया जाता है। पीएमएफबीवाई  कम वर्षा या प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों बुआई, रोपण से बीमित क्षेत्र के बाधित होने की स्थिति में किसानों को सरक्षण प्रदान करती है।

मौसम की प्रतिकूलता के मामले में न्यूनतम पैदावार से 50 फीसद कम होने की संभावना  में बीमित किसानो को तत्काल राहत प्रदान करने के लिए पीएमएफबीवाई उपज के अंतिम आंकड़ों की प्रतीक्षा किए बिना तत्काल आंशिक भुगतान (संभावित दावों का 25 फीसद तक)  की व्यवस्था करता है।  पीएमएफबीवाई सभी ऋणी किसानों के लिए अनिवार्य बीमा रक्षा को अधिदेशात्मक करता है और गैर-ऋणी किसानों को भी प्रोत्साहित करता है। बीमा योजना सभी खाद्य और तिलहन फसलों और वार्षिक वाणिज्यिक फसलों के लिए खुली है। बीमा की मुख्य ईकाई प्रमुख फसलों के लिए गांव/ ग्राम पंचायत है  और अन्य फसलों के लिए ईकाई का आकार इस स्तर से अधिक हो सकता है। जबकि बीमा कंपनिया निश्चित प्रीमियम लेती हैं। किसानों को खरीफ के लिए अधिकतम दो फीसद और रबी फसलों के लिए 1.5 फीसद और वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के लिय पांच फीसद का भुगतान करना पड़ता है, किसानों द्वारा देय बीमा प्रीमियम दर और  बीमा शुल्क की दर के बीच के अंतर को सामान्य प्रीमियम सब्सिडी की दर के रूप में माना जाता है जिसे केंद्र और राज्य सरकार द्वारा समान रूप से साझा किया जाता है। हालांकि सरकारें अपने बजट से निर्धारित सब्सिडी से अधिक और अतिरिक्त सब्सिडी देने के लिए स्वतंत्र हैं।

आरटीआई अधिनियम  के तहत सूचना प्राप्त करने वाले रोपड़ के सक्रिय कार्यकर्ता दिनेश चड्ढा का कहना है कि ”केंद्र सरकार को योजना पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।’’ आंकडों से पता चला है कि निजी बीमा कंपनियों द्वारा कमाया गया 80 फीसद लाभ एचडीएफसी जैसी कंपनी को मिला जो 1816 करोड़ रुपए के लाभ के साथ शीर्ष स्थान पर रही। इसके बाद रिलांयस ने 1361 करोड़ रुपए, यूनिवर्सल सोमपो जनरल इंश्योरेंस कंपनी ने 1195 करोड़ रुपए, आईसीआईसीआई ने 1193 करोड़ रुपए, बजाज एलांइस ने 815 करोड़ रुपए, भारती- एक्सा ने 302 करोड़,चोलामंडलम एमएस 182 करोड़ रुपए, फ्यूचर जनरल इंडिया इंश्योरेंस कंपनी111 करोड़ रुपए और श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी ने 107 करोड़ रुपए कमाए।

थोड़ा संदेह है कि मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी फसल बीमा योजना किसानों की तुलना में बीमा कंपनियों के लिए एक जैकपोट साबित हुई हैं। कृषि मंत्रालय के आंकड़े इस ओर इशारा करते हैं जब वह कहता है कि 17 बीमा कंपनियों जिनमें पांच सार्वजनिक क्षेत्र और 12 निजी कंपनियों ने पीएमएफबीवाई के तहत 15029 करोड़ रुपए का लाभ दर्ज किया है और उन्होंने 17,706 करोड़ रुपए के प्रीमियम के खिलाफ 2,767 करोड़ रुपए के दावों का भुगतान किया है । इसे जोडऩे के लिए पीएमएफबीवाई को सेवा कर और जीएसटी से छूट दी गई।

सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनी के एक बीमाकर्ता सुभाष शर्मा ने तहलका को बताया कि निजी बीमा कंपनिया यह दावा करती हैं कि अच्छे मानसून के परिणाम स्वरूप अच्छे उत्पादन के कारण लाभ हुआ था। लेकिन सवाल यह है कि निजी ऑपरेटरों को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के मुकाबले अधिक व्यवसाय क्यों दिया गया। कृषि निकायों ने दावा करते हुए कहा कि महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में सूखे जैसे हालात हैं और अन्य भागों में बाढ़ जैसी स्थिति थी लेकिन इन बीमा कंपनियों ने फिर भी धन कमाया। यह इस नीति पर फिर से विचार करने का आहवान करता है क्योंकि पीएमएफबीवाई ने मुख्य रूप से किसानों की तुलना में बीमा कंपनियों  को अधिक लाभान्वित किया है। क्या किसानों के दावे व्यवस्थित नही थे?

जानकारी यह भी बताती है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना भी किसानों को उत्साहित करने  में असफल रही है। मध्यप्रदेश में लगभग 2.90 लाख किसानों ने, राजस्थान  में 31.25 लाख, महाराष्ट्र में 19.47 लाख और उत्तरप्रदेश में 14.69 लाख किसानों ने इस योजना को छोड़ा। साल 2016-17 में 5,72,17,159 लाख किसान इस योजना में शामिल हुए थे लेकिन अगले साल यानी 2017-18 में 84.47 लाख किसानों ने इसे छोड़ दिया। वास्तव में एक साल के बाद ही लगभग एक करोड़ किसानों ने इस योजना को छोड़ दिया था। क्या किसान इस बात के पक्षधर थे कि यह योजना केवल निजी कंपनियों के लिए धन बनाने वाली थी?  आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि इस योजना के तहत किसानों की संख्या में कमी आई है। लेकिन बीमा कंपनियों के लाभ में वृद्धि हुई है।

उदाहरण के लिए  उत्तरप्रदेश में 2016-17 में बीमित किसानों की संख्या 67.69 लाख थी लेकिन अगले साल 2017-18 में यह घट कर 53 लाख हो गई। हालांकि प्रीमियम और प्राप्त मुआवजों के बीच का अंतर कम होने के बजाए 2016-17 में 548.94 करोड़ रुपए से बढ़कर अगले साल 1046.81 करोड़ रुपए हो गया। ठीक यही हाल मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल में 2016-17 में फसल बीमा योजना के लिए पंजीकरण कराने वाले किसानों की संख्या 41.33 लाख थी जो 2017-18 में यह घटकर 39.09 लाख हो गई। लेकिन प्राप्त प्रीमियम और मुआवजे के बीच का अंतर 2016-17 में 321.26 करोड़ रुपए से बढ़कर 2017-18 में 547.87 करोड़ रुपए हो गया ।

इस मुद्दे पर एक श्रंृखला राज्यवार पत्रिका में आएगी। इसे प्रस्तुत करेंगी- कोमल अमित गेरा।