शाह बोले, २५० आतंकी मरे स्ट्राइक में
रैली में भूल गए शहीद को
मजबूत देश के लिए काम कर रहे हम : मोदी
भाजपा सांसद सावित्री फुले, पूर्व सांसद सचान कांग्रेस में
शोपियां में सेना कैंप के पास दिखा संदिग्ध
नशे की लत, प्लेग जैसी घातक
पिछले 15 वर्ष में अपनी तरह के इस पहले सर्वे में पाया गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर 10 से 75 आयु वर्ग के लोगों में करीब 14.6 फीसद (यानी करीब 16 करोड़ लोग) शराब का सेवन करते हैं। यह सर्वेक्षण बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि नशे के उपयोग की सीमा, पैटर्न और प्रवृत्ति पर अंतिम राष्ट्रीय सर्वेक्षण वर्ष बहुत पहले 2000-2001 में किया गया था। इसकी रिपोर्ट 2004 में प्रकाशित की गयी थी लेकिन इसे संपूर्ण नहीं माना गया था। कारण था, इसमें राज्य और क्षेत्रवार ब्योरे शामिल नहीं थे।
सर्वेक्षण के निष्कर्षों की पुष्टि करते हुए, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री, थावरचंद गहलोत कहते हैं – ‘पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश में शराब और नशीली अवैध दवाओं का उपयोग एक नए और बड़े खतरे के रूप में सामने आया है। युवा पीढ़ी में नशीली दवाओं का खतरा पूरी दुनिया में बढ़ रहा है और भारत भी कोई अपवाद नहीं है।’ गहलोत ने कहा कि सर्वेक्षण में देश के सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 5 लाख से अधिक व्यक्तियों के साक्षात्कार शामिल थे और डाटा एकत्र करने के लिए कई तरीकों का उपयोग किया गया था।
सर्वेक्षण में पाया गया है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में नशे का प्रचलन 17 गुणा अधिक है। यह पता चलता है कि भारत में शराब का सेवन करने वाले लोगों में देशी शराब का उपयोग 30 फीसद और अंग्रेजी जिसे इंडियन मेड फॉरेन लिकर कहा जाता है का भी 30 फीसद लोग उपयोग करते हैं और यह दोनों पेय सबसे ज्यादा प्रचलन में हैं।
‘एम्स’ के सर्वेक्षण में पाया गया है कि लगभग 5.2 फीसदी भारतीय (5.7 करोड़ से अधिक लोग) हानिकारक शराब की चपेट में हैं। दूसरे शब्दों में, भारत में हर तीसरा व्यक्ति शराब से संबंधित समस्याओं के निदान के लिए मदद की तलाश में रहता है।
शराब के व्यापक प्रसार वाले राज्य छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, पंजाब, अरुणाचल प्रदेश और गोवा हैं। अल्कोहल उपयोग के विकारों के उच्च प्रसार (10 फीसद से अधिक) वाले राज्यों में त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश, पंजाब, छत्तीसगढ़ और अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं।
भांग के राष्ट्रीय प्रचलन के अधिक वाले राज्य उत्तर प्रदेश, पंजाब, सिक्किम, छत्तीसगढ़ और दिल्ली हैं। कुछ राज्यों में, भांग के उपयोग के विकार सिक्किम और पंजाब जैसे राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी अधिक (तीन गुणा से ज्यादा) हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर, सबसे आम इस्तेमाल किया जाने वाला पदार्थ हेरोइन है, (वर्तमान उपयोग 1.14 फीसदी) इसके बाद फार्मास्युटिकल नशीले पदार्थ (वर्तमान उपयोग 0.96 फीसदी) और फिर अफीम (वर्तमान उपयोग 0.52 फीसदी) है। कुल मिलाकर नशीले पदार्थ के वर्तमान उपयोग की व्यापकता 2.06 फीसदी है और लगभग 0.55 फीसदी भारतीयों को नशीले पदार्थों के उपयोग की समस्याओं (हानिकारक उपयोग और निर्भरता) के लिए मदद की आवश्यकता है। अफीम और फार्मास्युटिकल नशीले पदार्थों की तुलना में अधिक लोग हेरोइन पर निर्भर हैं।
देश में कुल अनुमानित 60 लाख लोगों में नशीले पदार्थो के उपयोग से होने वाले विकार (हानिकारक या आश्रित पैटर्न) हैं, जिनमें से आधे से अधिक का योगदान सिर्फ कुछ राज्यों में है – उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, और गुजरात। प्रभावित आबादी के फीसद के मामले में, देश के शीर्ष राज्य पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के साथ पूर्वोत्तर (मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मणिपुर) में हैं।
दस से 75 वर्ष आयु वर्ग के भारतीयों के लगभग 1.08 फीसदी (लगभग 1.18 करोड़ लोग) शामक (गैर-चिकित्सा, गैर-पर्चे उपयोग) के उपयोगकर्ता हैं। वर्तमान क्रमिक उपयोग के उच्चतम प्रसार वाले राज्य सिक्किम, नागालैंड, मणिपुर और मिज़ोरम हैं। हालांकि, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, आंध्र प्रदेश और गुजरात शीर्ष पांच राज्य हैं जो शामक का उपयोग करने वाले लोगों की सबसे बड़ी आबादी हैं। इनहेलेंट पदार्थों की एकमात्र श्रेणी है जिसके लिए बच्चों और किशोरों के बीच वर्तमान उपयोग की व्यापकता वयस्कों (0.58 फीसदी) की तुलना में अधिक (1.17 फीसदी) है। राष्ट्रीय स्तर पर, अनुमानित 4.6 लाख बच्चों और 18 लाख वयस्कों को उनके इनहेलेंट उपयोग (हानिकारक उपयोग / निर्भरता) के लिए मदद की आवश्यकता होती है।
पूर्ण संख्या के संदर्भ में, इनहेलेंट उपयोग के लिए मदद की आवश्यकता वाले बच्चों की उच्च आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा हैं। कोकेन (0.10 फीसदी) एम्फ़ैटेमिन टाइप स्टिमुलेंट्स (0.18 फीसदी) और हॉलुकिनोजेन्स (0. 12 फीसदी) भारत में वर्तमान उपयोग की सबसे कम प्रसार वाली श्रेणियां हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर, यह अनुमान है कि लगभग 8.5 लाख लोग ऐसे हैं जो नशे के इंजेक्शन लेते हैं (पीडब्ल्यूआईडी) इंजेक्ट करते हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मणिपुर, और नागालैंड में पीडब्ल्यूआईडी की उच्च संख्या का अनुमान है। दवाओं के नशीले पदार्थ समूह को मुख्य रूप से पीडब्ल्यूआईडी (हेरोइन – 46 फीसदी और फार्मास्युटिकल नशीले पदार्थ – 46 फीसदी) द्वारा इंजेक्ट किया जाता है।
गौरतलब है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने पिछले साल 16 जुलाई को एम्स को 7 सितंबर तक रिपोर्ट को अंतिम रूप देने का निर्देश दिया था। इस निर्देश में कहा गया था कि ‘कोई और समय नहीं दिया जाएगा क्योंकि यह मामला राष्ट्रीय महत्व का है। हालांकि, एम्स ने खतरे से निपटने के लिए सिफारिशों के साथ-साथ भारत में नशीली दवाओं के दुरुपयोग की सीमा और प्रभावों पर एक सर्वेक्षण रिपोर्ट तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से और समय मांगा था। जून 2016 में शुरू हुए 30 करोड़ के खर्च वाले सर्वेक्षण का हवाला देते हुए अदालत ने एम्स को और अधिक समय दिया था, जिसे पिछले साल सितंबर में केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय ने शुरू किया था।
एडवोकेट श्रवण कुमार ने केथिरेड्डी जगदीश्वर रेड्डी द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें केंद्र से नशे के सौदागरों की संपत्तियों को जब्त करने और ड्रग या ड्रग के उपयोग से टेलीविजन और फिल्मों को हतोत्साहित करने के लिए कार्य योजना तैयार करने के निर्देश देने की मांग की गई थी। उन्होंने अदालत के आंकड़ों को रखा था जिसमें पता चला था कि हर दिन देश में ड्रग या शराब से संबंधित 10 आत्महत्या के मामले सामने आते हैं।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर (एनडीडीटीसी) ने ‘भारत में पदार्थ का उपयोग’ शीर्षक से नवीनतम सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने सर्वेक्षण को प्रायोजित किया है जबकि डॉ अतुल अम्बेकर के नेतृत्व में एनडीडीटीसी की एक टीम ने सर्वेक्षण किया।
एम्स सर्वेक्षण को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह दो डेटा संग्रह दृष्टिकोणों के संयोजन को नियुक्त करता है। इसमें देश के सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधि, सामान्य जनसंख्या (10-75 वर्ष आयुवर्ग) के बीच एक घरेलू सर्वेक्षण (एचएचएस) किया गया था। इसका उद्देश्य मुख्य रूप से सामान्य, कानूनी पदार्थों (जैसे शराब और चरस) के उपयोग का अध्ययन करना था। राष्ट्रीय स्तर पर, 186 जिलों में कुल 2,00,111 घरों का दौरा किया गया और कुल 473,569 व्यक्तियों का साक्षात्कार लिए गए। गैर-कानूनी ड्रग्स पर निर्भरता से पीडि़त 70,293 लोगों के बीच 123 जिलों में गुणक दृष्टिकोण के साथ एक उत्तरोत्तर प्रेरित नमूनाकरण (आरडीएस) सर्वेक्षण किया गया था।
बचाव का रास्ता
एम्स के सर्वेक्षण से पता चलता है कि वैज्ञानिक उपचार को पदार्थ उपयोग के विकार वाले लोगों के लिए उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। दवा की समस्याओं को नियंत्रित करने में मदद करने के लिए एक अनुकूल कानूनी और नीतिगत वातावरण की आवश्यकता होती है क्योंकि रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि भारत में एक बड़े पैमाने पर लोग पदार्थ उपयोग विकारों से प्रभावित है उन्हें और तत्काल मदद की आवश्यकता है। सर्वेक्षण में कहा गया है, ‘मादक द्रव्यों के सेवन के विकारों के उपचार के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रमों का पहुंचना अपर्याप्त है’।
सर्वेक्षण में यह भी स्वीकार किया गया है कि ‘प्रमुख निवारक रणनीति के रूप में जागरूकता की प्रभावशीलता के लिए सबूत बहुत कमजोर है। रोकथाम कार्यक्रमों में न केवल मादक द्रव्यों के सेवन को रोकने के उद्देश्य से जोखिम और सुरक्षात्मक कारकों का निपटारा करना चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वयस्क स्वस्थ रहें, जिससे वे अपनी क्षमता का एहसास कर सकें और अपने समुदाय और समाज के उत्पादक सदस्य बन सकें’।
सर्वे बताता है कि देश में व्यापक उपचार अंतर (मांग और उपचार सेवाओं की उपलब्धता के बीच बेमेल) के मद्देनजर, भारत को उपचार के लिए सहायता बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश करने की आवश्यकता है। इस सर्वेक्षण के माध्यम से उत्पन्न साक्ष्य के आधार पर, पदार्थ के उपयोग से पैदा विकारों के उपचार के लिए संसाधनों का अधिकतम आवंटन अनिवार्य है। राज्यों के बीच प्राथमिकता के लिए राष्ट्रीय स्तर के उपचार कार्यक्रम की योजना को समस्या के पूर्ण परिमाण द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए।
व्यसन उपचार कार्यक्रम, नशा निवारण केंद्रों में असंगत उपचार/अस्पताल में भर्ती होने पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं, जो उपचार की भारी माँग को पूरा करने की संभावना नहीं रखते हैं। आउट पेशेंट क्लीनिक के रूप में उपचार सेवाओं को बढ़ाना, जिसमें सभी आवश्यक घटक (प्रशिक्षित मानव संसाधन, बुनियादी ढांचे, दवाएं और आपूर्ति, निगरानी और सलाह देने की एक प्रणाली) की तत्काल आवश्यकता है।
वे दिन और आज
सिर्फ साल भर पहले तक यानी 14 फरवरी 2018 में भी गंगा किनारे जाने के लिए प्राचीन काशी में गलियां थी। सुबह सवेरे नहीं, बल्कि भोरहरी में ही बनारसी गमछा लपेटे ललिता गली से गंगाघाट की तरफ जाने का सिलसिला शुरू हो जाता था। लेकिन अब 14 फरवरी 2019 में ऐसा नहीं है। गलियों का अस्तित्च अब इतिहास बन चुका है। लोग घरों को छोड़ कर जा चुके हैं।
सबसे पहले काशी की तंग, संकरी गलियों को छोड़कर परिंदे चले गए। वे समझ गए थे कि अब यहां रहना मुश्किल है। उसके बाद कुत्ते गए। फिर वे सांड जो यहां की गलियों में घूमते थे वे इसे छोड़ कर चले गए। जब घरों का उनमें बने बड़े छोटे मंदिरों का ध्वंस शुरू हुआ तो चूहे भी नए ठिकानों को चले गए । अब तो बंदर भी जा चुके हैं। वहां न जाने कहां।
ऐसा लगता है कि परिंदे और कुत्ते सबसे पहले भांप लेते हैं कि आदमी के दिमाग में क्या चल रहा है। जब परिंदे किसी बस्ती को छोड़कर जाने लगें तो समझ जाइए कि सभ्यता का विकास जल्दी ही वहां होने को है। आदमी के मन मस्तिष्क से निकलती तरंग और गंध को परिंदे और कुत्ते न केवल जानते-समझते हैं बल्कि वे उसके तात्पर्य को भी समझ-बूझ लेते हैं।
परिंदों को बदलते मौसम की भी समझ होती है। पहले ऋषि-मुनि तो जीव-जंतुओं की गतिविधियों से अनुमान लगा लेते थे कि मौसम का क्या रुख होगा। चीटियों के अपने बिल से बाहर निकलने पर उन्हें अनुमान हो जाता था कि अब बारिश होगी। हमारे ही यहां घाघ नाम के कवि अपने जमाने के बड़े मौसम वैज्ञानिक थे जो हवा, आसमान में बादलों के उतार-चढ़ाव और रूपरंग और जीव -जंतुओं के व्यवहार में बदलाव के आधार पर सटीक भविष्यवाणी अपने दोहों में करते थे।
लेकिन अब हमारा इतना ‘विकास’ हो चुका है कि परिंदों, कुत्तों और चौपायों की भाषा समझने-जानने की क्षमता खो चुके हैं। हमारे ऋषि -मुनि न केवल उनके संकेतों और व्यवहार से जान जाते थे कि वे क्या चाहते हैं और मौसम में क्या बदलाव होगा । यह था उनका ‘वेलेंटाइन डे’ यानी प्रेम-उमंग-उत्साह का उत्सव।
आज ‘विकास’ ने सबको -‘अपने साथ’ ले लिया है ‘सबका विकास’ करने के लिए। पुननिर्माण के नाम पर ध्वंस, प्रेम की जगह अब झूठ, मक्कारी, फरेब, जालसाजी, विश्वासघात, तिकड़मबाजी आदि गुण विकसित हो गए हैं। जिनसें एक सभ्यता नष्ट होती है। दूसरी का निर्माण होना शुरू हो जाता है। यही है ‘पक्काप्पा’। यानी विकास की हमने जो राह चुनी है उसी दिशा में आगे बढऩा है। पीछे लौटने का सवाल ही नहीं है। यह है काशी की संस्कृति का ‘विकास’ या ‘विनाश’। आप आज़ाद हैं कुछ भी कहने के लिए।
सुरेश प्रताप
भूल-भुलैया से भरी थी काशी की गलियां
काशी में सड़कों का कोई महत्व नहीं है, इसलिए बहुत कम लोग सड़कों पर चलते हैं। सड़कों का उपयोग जुलूस निकालते समय होता है। उस पर पैदल से अधिक लोग सवारी से चलते हैं। इधर कुछ ऐसे लोग (शायद मेंटल हास्पिटल से छुटकर)आ गये हैं जो सड़कों को महत्व देने लग गये हैं। ऐसे लोग लबे सड़क ‘मकान बिकाऊ है,’ ‘दुकान $खाली है,’ अथवा ‘भाड़े पर लेना है’ का विज्ञापन छपवाते हैं।
काशी की अधिकांश गलियां ऐसी हैं जहां सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचती। कुछ गलियां ऐसी हैं जिनमें से दो आदमी एक साथ गुज़र नहीं सकते। इन गलियों की बनावट देखकर कई विदेशी इंजीनियरों की बुद्धि गोल हो गयी थी जो लोग यह कहते हैं कि बम्बई-कलकत्ता की सड़कों पर खो जाने का डर रहता है, वे काशी की गलियों का चक्कर काटें तो दिन भर के बाद शायद ही डेरे तक पहुंच सकेंगे। आज भी ऐसे अनेक बनारसी मिलेंगे जो बनारस की सभी गलियों को छान चुके हैं, कहने में दाँत निपोर देंगे।
इन गलियों से गुज़रते समय जहां कहीं चूके तुरन्त ही दूसरी गली में जा पहुंचेंगे। कोलकत्ता, मुंबई की तरह सड़क की मोड़ पर अमुक दुकान, अमुक निशान रहा- याद रहने पर मंजि़ल तक पहुंच सकते हैं – पर बनारस में इस तरह के निशान-दुकान-साइनबोर्ड भीतरी महाल में नहीं मिलेंगे। नतीजा यह होगा कि काफी दूर आगे जाने पर रास्ता बन्द मिलेगा। उधर से गुज़रने वाले आपकी ओर इस तरह देखेंगे कि यह ‘चाँइया’ इधर कहाँ जा रहा है। नतीजा यह होगा कि आपको फिर गली के उस छोर तक आना पड़ेगा जहां से आप गड़बड़ाकर मुड़ गये थे। कुछ गलियाँ ऐसी हैं कि आगे बढऩे पर मालूम होगा कि आगे रास्ता बन्द है, लेकिन गली के छोर के पास पहुंचने पर देखेंगे कि बगल से एक पतली गली सड़क से जा मिली है। अक्सर इन गलियों में जब खो जाने में आता है, खासकर रात के समय, तब लगता है जैसे ऊँचे पहाड़ों की घाटियों में खो गये हैं। इन गलियों में लोग चलते-फिरते कम नज़र आते हैं। जो नज़र भी आते हैं, वे उस गली के बारे में पूर्ण विवरण नहीं बता सकते। हो सकता है, वे भी आपकी तरह चक्कर काट रहे हों। गलियों का तिलिस्म इतना भयंकर है कि बाहरी व्यक्ति को कौन कहे अन्य लोग भी जाने में हिचकते हैं। कुछ गलियाँ ऐसी हैं जिनसे बाहर निकलने के लिए किसी दरवाज़े या मेहराबदार फाटक के भीतर से गुज़रना पड़ता है।
मुंबई, कोलकत्ता की तरह यहां की सड़कों मे चार से अधिक रास्ते नहीं हैं, पर गलियों में चार से 14 तक रास्ते हैं। किस गली से आप तुरन्त घर पहुंच सकते हैं यह बिना जाने या बिना पूछे नहीं जान सकते। जिस गली से आप घर पहुंच सकते है उसी से आप श्मशान या नदी किनारे भी जा सकते हैं।
गलियों का नगर
शैतान की आंत की भांति यह भूल-भुलैया संसार का एक आश्चर्यजनक दर्शनीय स्थान है। इन गलियों में कितनी आज़ादी है। नंगे-घूमो, गमच्छा पहिने चलो, जहां जी में आए बैठो और जहां जी आए सो जाओ। कोई बिगड़ेगा नहीं, भगाएगा नहीं और न डांटेगा। गावटी का गमच्छा या सिल्क का कुरता पहने बनारसी रईस भी इन गलियों में छाता लगाये चलते हैं। शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिस गली में सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचती, बरसात का मौसम नहीं है, फिर भी लोग वहां छाता लगाकर क्यों चलते हैं? कारण है – गन्दगी। मान लीजिए आप बाज़ार से लौट रहे हैं, अचानक ऊपर से कूड़े की बरसात हो गयी। यह बात अच्छी तरह जान लीजिए- बनारसी तीन मंजि़ले या चार मंजि़ले पर से बिना नीचे झांके थूक सकता है, पानी फेंक सकता है और कूड़ा गिरा सकता है। दुकान झाड़ बटोरकर आपके चेहरे पर सारा गर्द फेंक सकता है। यह उसका जन्म-सिद्ध अधिकार है: नीचे इस सत्कार्य से घायल व्यक्ति जब गालियां देता है तब सुनकर भाई लोग प्रसन्न हो उठते हैं। उनका रोम-रोम गाली देने वाले को साधुवाद देगा। अगर कहीं वे सज्जन चुपचाप चले गये तो इसका उन्हें अपार दु:ख होगा और उस दु:ख को मिटाने के लिए मुख से अनायास ही निकल जाएगा – ‘मुर्दार निकसल!’
किसी-किसी गली में बनारसी रईसों का पनाला इस अदा से चूता है कि फुहारे का मज़ा आ जाता है! गरमी के दिनों में रात को ऐसी गलियों से गुज़रना और $खतरनाक होता है। सोते समय ‘शंका समाधान’ के लिए बनारसी अपने को अधिक कष्ट नहीं देगा। परिणाम स्वरूप छत के पनाले से आप पर ‘शुद्ध गंगाजल’ बरस सकता है। गुस्सा उतारने के लिए ऐसे घरों में आप घुसने की हिम्मत नहीं कर सकते। एक तो बाहर का भारी दरवाज़ा बन्द है, दूसरे भीतर जाने पर भी यह पता चलना मुश्किल है कि यह सत्कार्य किसने किया है। मुंह आपका है, गालियां बक लीजिए और राह लीजिए, बस! $खासकर नंगे पैर चलना तो और भी मुश्किल हैं। घर के बच्चे ‘दीर्घशंका’ गलियों में रात को कर देते हैं।
अगर इन गलियों में भगवान शंकर के किसी मस्ताने वाहन से भेंट हो गयी अर्थात् उसने नाराज़ होकर आपको हुरपेटा तो जान बचाकर भागना मुश्किल हो जाएगा। खासकर उन गलियों में जो आगे बन्द मिलती हैं। क्योंकि आप पीछे भाग नहीं सकते, आगे रास्ता बन्द है, बगल के सभी मकानों में भीतर से भारी सांकल लगी है और इधर सांड़ महाराज हुरपेटे आ रहे हैं! साल में दो-एक व्यक्ति इन सांड़ों के कारण काशी-लाभ करते हैं। लगे हाथ एक उदाहरण सुन लीजिए। अब्राहिम लिंकन के बाद जनरल ग्रांट अमेरिका के राष्ट्रपति हुए थे। एक बार जब वे हिन्दुस्तान में दौरे पर आये तब बनारस भी आये थे। उन्होंने इस शहर को ‘एक सिटी ऑफ लेन्स’ अर्थात् गलियों का शहर कहा है। कहा जाता है कि उनकी पत्नी को शंकर भगवान के वाहन ने अपने सींग पर उठा लिया था।
कहा जाता है कि राजा रामचन्द्र के सुपुत्रों (लव और कुश) से बुरी तरह शिकस्त खाकर पवनसुत हनुमान जी अपनी बिरादरी के साथ बनारस में आकर बस गये हैं। आज वे इन गलियों में क्रीड़ा-स्थल बनाकर परम प्रसन्न हैं। ऐसी घटनाएं प्राय: सुनने में आती हैं कि गली से गुज़रते समय अचानक ऊपर छत से पत्थर का बड़ा रोड़ा सिर पर आ गिरा और बड़ी आसानी से स्वर्ग में सीट रिजर्व हो गयी। असल में यह पवनसुत के वंशजों का महज़ खिलवाड़ है। ‘खिलवाड़’ में अगर कोई सीधे स्वर्ग पहुंच जाता है तो वह अपराध कैसे हो सकता है? पवनसुत के वंशजों का तर्क $कानून शास्त्रियों को घपले में डाल देता है। इस आसमानी ख़तरे से बचने के दो ही उपाय हैं – एक तो सिर पर फौजियों वाली लोहे की टोपी या फिर आपका अपना भाग्य! क्योंकि इस तरह की फौजदारी की घटना किसी थाने मे दर्ज नहीं होती और न इसके मु$कदमे अदालत में स्वीकार किये जाते हैं।
इन गलियों के नामकरण और उनकी दूरी को यदि आप नज़र अन्दाज़ करें तो बनारस के पोस्टल विभाग की प्रशंसा करेंगे। हर बनारसी अपने को ‘सरनाम’ (प्रसिद्ध) समझता है। मुहल्ले का एक व्यक्ति समुचे मुहल्ले की जानकारी रखता है। उसका विश्वास है कि मुहल्ले के डाकिये से मुख्यमंत्री तक उसके नाम से परिचित हैं। काशी में ‘दसपुतरिया गली’ महज आठ-दस मकानों का एक मुहल्ला है, पर वहां के रहने वालों को ‘दसपुतरिया गली’ के नाम पर पत्र मिल जाते हैं। इस प्रकार छोटी-छोटी गलियां यहां काफी प्रसिद्ध हैं। नगरपालिका भले ही नेताओं के नाम पर गलियों का नामकरण करे, पर बनारस वाले अपनी पुरानी परम्परा को नहीं बदल सकते।
इन गलियों में गर्मी के दिनों में शिमले का मज़ा, जाड़े में पुरी का मज़ा और बरसात में पहाड़ी स्थानों का मज़ा अनायास मिलता रहता है। यही वजह है कि बनारसी लोग पहाड़ी स्थानों में कभी नहीं जाते। रहा गन्दगी का प्रश्न, सो कहां नहीं है। जिस गली में इमली के बीज बिखरे हों, समझ लें इस गली में मद्रासी रहते हैं। जिस गली में मछली महकती हो, वह बंगालियों का मुहल्ला है। जिस गली में हड्डी लृुढ़की हो, वह मुसलमान दोस्तों का मुहल्ला है। इस प्रकार हर गली में प्रत्येक वर्ग का ‘साइनबोर्ड’ लटकता रहता है। अध्ययन करने वालों को इन साइनबोर्डों से बड़ी ‘हेल्प’ मिलती है। मदनपुरा, पांडे हवेली, सोनारपुरा
आदि मुहल्लों में साडिय़ां बनती हैं और रानीकुआं, कुंजगली आदि मुहल्लों में बिकती हैं। गोबिन्दपुरा, राजा दरवाज़ा, रानीकुआं, कोदई की चौकी मे सोने-चांदी का व्यवसाय होता है। कचौड़ी गली की कचौड़ी, ठठेरी बाजार के पीतल के बर्तन, विश्वनाथ गली की चूडिय़ां, लकड़ी के खिलौने भारत में प्रसिद्ध हैं। मिश्रपोखरा स्थित ज़र्दे के कारखाने, लोहटिया और नखास में लोहे, लकड़ी का व्यवसाय होता है। अधिक दूर क्यों, काशी में मंगलामुखियों का व्यवसाय भी गलियों में ही होता है। दालमंडी-छत्तातले, मडुवाडीह में आशि$क लोग नित्य शाम कोvजुटा करते हैं।
मतलब यह है कि बनारस की प्रसिद्धि जिन वस्तुओं के कारण है, उन वस्तुओं का व्यवसाय गलियों में ही होता है।
साभार: बना रहे बनारस
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ
अंग्रेजों के पसीने छुड़ाने वाले आज़ाद सदा आज़ाद ही रहे
चंद्रशेखर आज़ाद, एक ऐसा नाम जिससे अंग्रेज सरकार कांपती थी। 15 साल की उम्र में एक आंदोलन में पकड़े जाने के दौरान जब अंग्रेज जज ने नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम ‘आज़ाद’ बताया था। असल में उनका नाम चंद्रशेखर तिवारी था। इस पर जज ने उन्हें 15 बेंत मारने की सज़ा सुनाई। चंद्रशेखर ने वहीं कसम खाई कि वे कभी अंग्रेज सरकार के हाथ नहीं आएंगे। उन्होंने इस कसम को बखूबी निभाया। 27 फरवरी 1931 को जब वे अपनी उम्र के 25वें बरस में थे, वे पुलिस के साथ भिड़ंत में शहीद हो गए। कहा जाता है कि यह मुठभेड़ इलाहाबाद के अल्फ्रड पार्क में हुई, आज़ाद के पास गोलियां खत्म होने लगी तो अपने पास बची अंतिम गोली उन्होंने खुद को मार ली। पर जीवित अंग्रेजों के हाथ नहीं आए।
इस महान क्रांतिकारी का जन्म 23 जुलाई 1906 को पंडित सीताराम तिवारी के घर हुआ था। वे मध्यप्रदेश के अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते थे। बाद में वे भावरा गांव में बस गए। चंद्रशेखर का बचपन यहीं पर बीता। यहीं वे भीलों के बच्चों के साथ धनुष-बाण खेला करते थे। इस तरह वे बचपन में ही अच्छे निशानेबाज बन गए थे। उस समय देश में आज़ादी के लिए अहिंसक आंदोलन चल रहा था। पर चंद्रशेखर इससे सहमत नहीं थे। इसलिए वे सशस्त्र क्रांति की ओर चल पड़े। उन दिनों बनारस क्रांतिकारियों का गढ़ था। वहां उनकी मुलाकात मम्मथनाथ गुप्त और प्रवेश चटर्जी के साथ हुई और वे क्रांतिकारी दल के सदस्य बन गए। इस दल का नाम ‘हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ’ था।
जलियांवाला बाग (अमृतसर) की 1919 में घटी घटना ने चंद्रशेखर आज़ाद के ऊपर बहुत असर डाला। उस समय आज़ाद पढ़ रहे थे। 1921 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो और युवकों की तरह चंद्रशेखर भी उसमें शामिल हो गए। उसी में वे पहली और आखिरी बार पकड़े गए।
इसके बाद क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए चंद्रशेखर ने झांसी को अपना ठिकाना बना लिया। यहां से लगभग 10 मील दूर ओरखा के जंगलों में आज़ाद निशानेबाजी का अभ्यास करते। उनका अपना निशाना अचूक था, इसलिए वे बाकी साथियों को भी निशानेबाजी का अभ्यास कराते थे। वहां वे पंडित हरिशंकर के नकली नाम से बच्चों को पढ़ाते भी थे। वे धिमापुर गांव में अपने इसी नकली नाम से काफी लोकप्रिय हो गए। झांसी में ही उन्होंने गाड़ी चलानी भी सीख ली।
असहयोग आंदोलन के चलते जब 1922 में चौरी-चौरा की घटना घट गई तो महात्मा गांधी ने यह आंदोलन वापिस ले लिया। गांधी चौरा-चौरी में आंदोलनकारियों द्वारा पुलिस के नौ जवानों को जिंदा जलाने से खिन्न थे यह उनके अहिंसावादी सिद्धांतों के खिलाफ था। लेकिन चंद्रशेखर आज़ाद का कांग्रेस से मोहभंग हो गया। उनके अलावा और भी कई युवा कांग्रेस से बाहर आ गए। इनमें से रामप्रसाद बिस्मिल, शचींद्रनाथ सान्याल और योगेशचंद्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के कुछ और क्रांतिकारियों को इक_ा करके एक ‘दल हिंदुस्तानी प्रजातांत्रिक संघ ‘ (एचआरए) का गठन कर दिया। चंद्रशेखर आज़ाद भी इसमें शामिल हो गए। इस दल ने गांवों के अमीरों के घर डकैतियां डालकर संगठन के लिए पैसा इक_ा करना शुरू किया। यह भी तय किया गया किसी भी महिला पर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गांव में चंद्रशेखर आज़ाद, बिस्मिल के साथ लूट करने गए तो वहां एक महिला ने आज़ाद का पिस्तौल छीन लिया, लेकिन आज़ाद ने उस औरत पर हाथ नहीं उठाया। इस दल में कुल आठ क्रांतिकारी थे। इन पर पूरे गांव ने हमला बोल दिया। बिस्मिल अंदर गए और उस औरत को थप्पड़ मार कर पिस्तौल वापिस ली और आज़ाद को खींच कर सुरक्षित निकल आए। इसके बाद यह फैसला लिया गया कि केवल सरकारी खजाने लूटे जाएं।
पहली जनवरी 1925 को दल ने पूरे देश में अपना पर्चा ‘द रेवोल्यूशनरी’ बांटा। इसमें दल की नीतियों के बारे में विस्तार के साथ जानकारी दी गई थी। इसमें सशस्त्र क्रांति की बात की गई थी। इस पर्चे के लेखक के रुप में ‘विजय सिंह’ का नकली नाम छापा गया था। शचींद्र सान्याल इसे बंगाल से पोस्ट करने जा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी बांकुरा में हुई। इस संगठन के गठन के समय से ही इसके उद्देश्यों को लेकर रामप्रसाद बिस्मिल, सान्याल और चटर्जी के बीच मतभेद थे। संगठन ने नौ अगस्त 1925 को काकोरी कांड को अंजाम दिया। जब शाहजहांपुर में इस योजना के बारे में चर्चा करने के लिए बैठक बुलाई गई तो पार्टी के एकमात्र सदस्य अशफाक उल्ला खां ने इसका विरोध किया था। उनका तर्क था कि इससे प्रशासन उनके पीछे पड़ जाएगा, और ऐसा ही हुआ। पुलिस आज़ाद को तो नहीं पकड़ पाई पर बाकी बड़े नेता – राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर सिंह को 19 दिसंबर 1927 और इससे दो दिन पहले राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 को फांसी पर लटका दिया गया। सभी प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के कारण मुकदमे के दौरान यह संगठन पूरी तरह निष्क्रिय ही रहा। इसमें चार क्रांतिकारियों को फांसी और 16 को कड़ी सज़ा सुुना दी गई।
आज़ाद ने बिस्मिल और चटर्जी को छुड़ाने की कुछ कोशिश भी की जो सिरे नहीं चढ़ी। इसे बाद आज़ाद ने आठ सितंबर 1928 को उत्तर भारत के सभी क्रांतिकारियों को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में इक_ा किया। यहां एक गुप्त सभा की गई। सभी ने एकमत से फैसला लिया कि यह लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है हमारी जीत या हमारी मौत। आज़ाद ने भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की फांसी को कम कराने का काफी प्रयास किया।
27 फरवरी 1931 को आज़ाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मिलने पहुंचे। उसी समय सीआईडी का एसएसपी नॉट बाबर भारी पुलिस के साथ वहां आ पहुंचा। दोनों ओर से गोलीबारी हुई। इस मुठभेड़ में आज़ाद शहीद हो गए। पुलिस ने बिना किसी को सूचित किए उनका अंतिम संस्कार कर दिया।
तहलका ब्यूरो
दूसरा बनवास
राम बनवास से जब लौट के घर में आए
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए
रक़्से-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसंबर को श्री राम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आए
जगमगाते ये जहां राम के कदमों के निशां
प्यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहां
छोड़ नफरत के उसी राहगुजर में आए
धर्म क्या उनका है क्या जात है यह जानता कौन
घर न जलता तो उन्हें राम में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा लोग जो घर में आए
शाकाहारी है मेरे दोस्त तुम्हारा खंजर
तुम ने बाबर की तरफ फेंके ये सारे पत्थर
हैं मेरे सर की $खता जख़्म जो सर पर आए
पांव सरयू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नजर आए वहां खून के गहरे धब्बे
पांव धोए बिना सरयू के किनारे से उठे
‘राजधानी की $िफज़ा आई नहीं रास मुझे
छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे।’
कैफी आज़मी










