तहलका ब्यूरो।
नई दिल्ली। Washington में ओवल ऑफिस से लेकर सीनेट की गलियारों तक, ट्रंप प्रशासन ने ईरान के विरुद्ध अपनी रणनीति को एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा कर दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि ईरान अब युद्ध को और खींचने की स्थिति में नहीं है और वह किसी भी कीमत पर समझौता करने के लिए बेताब है। ट्रंप के अनुसार, अमेरिका की हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने ईरान की सैन्य शक्ति को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। उनकी नौसेना और वायुसेना लगभग समाप्त हो चुकी है, वहीं मिसाइल उत्पादन के 90 प्रतिशत और ड्रोन निर्माण के 82 प्रतिशत कारखाने अब ठप पड़े हैं। सबसे महत्वपूर्ण दावा उनकी परमाणु क्षमता को पूरी तरह नष्ट करने और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी के जरिए ईरानी अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ने को लेकर है।
तनाव के बीच यह कूटनीतिक दांव कानूनी मजबूरियों से भी जुड़ा है। 1973 के ‘War Powers Resolution’ के अनुसार, बिना संसद (Congress) की मंजूरी के अमेरिकी राष्ट्रपति केवल 60 दिनों तक सैन्य कार्रवाई जारी रख सकते हैं। शुक्रवार को यह समय सीमा समाप्त हो रही थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने तर्क दिया है कि 8 अप्रैल से लागू Ceasefire के बाद युद्ध प्रभावी रूप से समाप्त हो चुका है। रक्षा मंत्री Pete Hegseth के बयानों का समर्थन करते हुए प्रशासन ने स्पष्ट किया कि चूंकि अब सक्रिय गोलीबारी नहीं हो रही है, इसलिए उन्हें कांग्रेस से युद्ध की औपचारिक अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।
भले ही ईरान ने जवाबी हमले की धमकी दी हो, लेकिन अमेरिकी दावे बताते हैं कि ईरान की आय का मुख्य स्रोत ‘तेल’ अब नाकाबंदी के कारण ठप है। ट्रंप का कहना है कि पर्दे के पीछे चल रही बातचीत के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है, लेकिन परिणाम सकारात्मक होने की उम्मीद है। राष्ट्रपति ने अपनी छवि एक ‘शांतिदूत’ के रूप में पेश करते हुए एक बार फिर दोहराया कि उन्होंने India-Pakistan conflict सहित दुनिया के आठ संभावित युद्धों को रोकने में सफलता हासिल की है। फिलहाल, होर्मुज में जारी नाकाबंदी और ईरानी बेताबी के बीच गेंद अब राजधानी तेहरान के पाले में है।




