नई दल्ली: दुनिया की सबसे बड़ी फुटबॉल संस्था फीफा ने अफगानिस्तान की महिला शरणार्थी टीम को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेलने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला उन खिलाड़ियों के लिए बेहद खास है, जो पिछले कई सालों से अपने देश से दूर रहकर भी खेल को जिंदा रखे हुए थीं।
दरअसल, अफगानिस्तान में तालिबान शासन आने के बाद महिला खिलाड़ियों के लिए खेलना लगभग नामुमकिन हो गया था। ऐसे में कई खिलाड़ियों को देश छोड़कर अलग-अलग देशों में शरण लेनी पड़ी। तब से वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के मौके का इंतजार कर रही थीं।
हाल ही में कनाडा के वैंकूवर में हुई फीफा परिषद की बैठक में नियमों में बदलाव करते हुए इस टीम को मान्यता देने का फैसला लिया गया। अब यह टीम ‘अफगान महिला यूनाइटेड’ के नाम से अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में हिस्सा ले सकेगी।
हालांकि, 2027 में ब्राजील में होने वाले महिला फुटबॉल वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई करने का मौका इस टीम के लिए निकल चुका है। लेकिन अच्छी बात यह है कि वे 2028 में लॉस एंजिलिस में होने वाले ओलंपिक खेलों के क्वालीफाइंग राउंड में हिस्सा ले सकती हैं।
इस फैसले को खेल जगत में एक सकारात्मक कदम के तौर पर देखा जा रहा है। इससे न सिर्फ इन खिलाड़ियों को पहचान मिलेगी, बल्कि उन महिलाओं के लिए भी एक उम्मीद जगेगी जो मुश्किल हालात में भी अपने सपनों को जिंदा रखती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ खेल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के अधिकार और उनकी आजादी का भी एक मजबूत संदेश देता है। लंबे संघर्ष के बाद मिली यह मंजूरी इन खिलाड़ियों के हौसले को और मजबूत करेगी।
अब पूरी दुनिया की नजर इस टीम पर होगी कि वे आने वाले मुकाबलों में कैसा प्रदर्शन करती हैं और कैसे अपनी पहचान बनाती हैं।




