गांव के मोड़ से ग्लोबल दुनिया तक: अंग्रेज़ी बन रही नई ताक़त

बृज खंडेलवाल

सुबह के आठ बजे हैं। मथुरा ज़िले की गोवर्धन तहसील के एक गांव के मोड़ पर रंग-बिरंगे स्कूल बैग टांगे, टाई और साफ-सुथरी यूनिफॉर्म पहने लड़के और लड़कियों का एक झुंड बस का इंतज़ार कर रहा है। कोई कह रहा है, hi, how are you? दूसरा मुस्कुराकर जवाब देता है, “I am fine, thank you.” तीसरी बच्ची अपनी सहेली से पूछती है, “Where is your project ?” उनकी अंग्रेज़ी अभी बहुत साधारण है, मगर सपने बड़े हैं। पास खड़े बुज़ुर्ग हैरानी और फ़ख्र से उन्हें देखते हैं। यही बच्चे कुछ साल पहले गांव के हिंदी स्कूल में जाते थे। आज रोज़ कई किलोमीटर दूर एक अंग्रेज़ी माध्यम के पब्लिक स्कूल की बस पकड़ते हैं। यह सिर्फ़ स्कूल बदलने की कहानी नहीं, बदलते भारत की तस्वीर है।

केरल, कर्नाटक, तमिल नाडु के अनेकों शहरों में और ग्रामीण अंचलों में प्राइवेट, मिशनरी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की भरमार है। ऊटी के रास्ते में मसिनीगुडी कस्बे में एक स्कूली हेड मास्टर ने बताया , “सरकारी स्कूलों में लोकल भाषा माध्यम है जहां अधिकांश गरीब बच्चे पढ़ते हैं, जिनके पास साधन हैं उनके बच्चे प्राइवेट में स्टडी करते हैं, अंग्रेजी सीखते हैं!” गांव गांव से प्राइवेट बसें बच्चों को स्कूलों तक ढोती हैं। दक्षिण भारत के ज्यादातर पेरेंट्स बच्चों को विदेश जाने के लिए पढ़ाते हैं, गल्फ कंट्रीज या अमेरिका! लोग मानने लगे हैं कि भारत में अंग्रेज़ी अब किसी हुकूमत की छोड़ी हुई निशानी नहीं रही। यह रोज़गार, तरक्की और नए मौकों की ज़ुबान बन चुकी है। करोड़ों भारतीय इसे पढ़ते, समझते और बोलते हैं। अनुमान है कि करीब 26 करोड़ से अधिक लोगों को अंग्रेज़ी की बुनियादी समझ है। हर साल लाखों नए बच्चे इस सफ़र में शामिल हो रहे हैं। एक दौर था जब अंग्रेज़ी सिर्फ़ बड़े शहरों और अमीर घरों तक सीमित मानी जाती थी। अब यह गांवों की गलियों तक पहुंच चुकी है। किसान, दुकानदार, मज़दूर और छोटे कारोबारी भी चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेज़ी सीखें। वे जानते हैं कि बदलती दुनिया में यह हुनर नई राहें खोल सकता है।

देश में अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। मिशनरी और कॉन्वेंट स्कूलों ने दशकों पहले इसकी बुनियाद रखी। बाद में निजी स्कूल, सीबीएसई और आईसीएसई संस्थान आगे आए। अब कई सरकारी स्कूल भी अंग्रेज़ी माध्यम की पढ़ाई शुरू कर चुके हैं। करोड़ों बच्चे इन स्कूलों में शिक्षा पा रहे हैं। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं,”इस बदलाव के पीछे कोई सियासी नारा नहीं, बल्कि ज़मीनी हक़ीक़त है। भारत जैसे बहुभाषी देश में अंग्रेज़ी अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोगों के बीच एक साझा पुल बन गई है। कश्मीर से केरल और गुजरात से असम तक, अलग-अलग प्रदेशों के लोग इसी भाषा के सहारे आसानी से संवाद कर लेते हैं।” उच्च शिक्षा में भी अंग्रेज़ी की अहमियत लगातार बढ़ी है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विज्ञान, क़ानून, प्रबंधन और शोध की अधिकांश किताबें और अध्ययन सामग्री अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं। दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़ने में भी यही भाषा सबसे बड़ा सहारा बनती है।

भारत की आईटी क्रांति में अंग्रेज़ी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, नोएडा और गुरुग्राम जैसे शहरों ने दुनिया भर की कंपनियों को आकर्षित किया। भारतीय युवाओं ने अपनी मेहनत के साथ अंग्रेज़ी की क्षमता के दम पर वैश्विक बाज़ार में पहचान बनाई। कॉल सेंटर, बीपीओ, सॉफ्टवेयर, डिजिटल सेवाएं और ऑनलाइन कारोबार लाखों लोगों को रोज़गार दे रहे हैं। आज डिजिटल दुनिया में भी अंग्रेज़ी एक अहम चाबी है। इंटरनेट, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, ऑनलाइन कोर्स, रिसर्च और नई तकनीकों का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी में उपलब्ध है। जिसे अंग्रेज़ी आती है, उसके सामने सीखने के रास्ते कहीं ज़्यादा खुल जाते हैं। लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाएं कमज़ोर हो जाएं। अपनी मातृभाषा इंसान की पहचान, संस्कृति और जड़ों से जुड़ी होती है। अंग्रेज़ी उस पहचान की जगह नहीं ले सकती। असली समझदारी दोनों को साथ लेकर चलने में है।

दुनिया के कई विकसित देशों के बच्चे अपनी मातृभाषा के साथ अंग्रेज़ी भी सीखते हैं। भारत में भी यही रास्ता सबसे बेहतर साबित हो सकता है। घर में अपनी भाषा, समाज में अपनी संस्कृति और दुनिया से जुड़ने के लिए अंग्रेज़ी; यही संतुलन भविष्य की ज़रूरत है। सरकारी स्कूलों में बेहतर अंग्रेज़ी शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक तकनीक और अच्छी पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराना अब समय की मांग है। अंग्रेज़ी किसी वर्ग विशेष की जागीर नहीं रहनी चाहिए। गांव का बच्चा भी वही अवसर पाए जो महानगर के छात्र को मिलता है।

भारत को अंग्रेज़ी विरासत में मिली थी, लेकिन उसने इसे अपनी मेहनत और ज़रूरत के मुताबिक़ नया रूप दिया। आज यह विदेशी भाषा कम और भारतीय क्षमता का हिस्सा ज़्यादा बन चुकी है।
शायद इसी लिए गोवर्धन के उस गांव के चौराहे पर खड़े वे छोटे-छोटे बच्चे, जो हिचकिचाते हुए कहते हैं, “Good morning, teacher,” सिर्फ़ अंग्रेज़ी नहीं बोल रहे होते। वे अपने भविष्य के दरवाज़े पर दस्तक दे रहे होते हैं। उनके होंठों पर कुछ साधारण अंग्रेज़ी के शब्द हैं, लेकिन उनकी आंखों में पूरे हिंदुस्तान के बदलते कल का ख़्वाब चमक रहा होता है।