बृज खंडेलवाल द्वारा

मेरठ का नीला ड्रम, आगरा में फर्श के नीचे दफन पति, मुंबई-वसई में प्रेमी की हत्या और ऐसी ही कुछ दूसरी सनसनीखेज़ वारदातों ने पूरे देश को झकझोर दिया। टीवी स्टूडियो गरजे, सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई और एक नया निष्कर्ष गढ़ लिया गया: “क्या अब महिलाएँ पुरुषों पर भारी पड़ने लगी हैं?” लेकिन क्या कुछ भयावह अपराध सचमुच भारत की सामाजिक हकीकत बदल देते हैं? क्या कुछ वायरल घटनाएँ सदियों पुरानी पितृसत्ता, असमानता और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के पहाड़ को मिटा सकती हैं? जवाब भावनाओं में नहीं, आँकड़ों में छिपा है।
आज के दौर में सच से कहीं तेज़ दौड़ती है सनसनी। किसी पत्नी पर पति की हत्या का आरोप लगता है। कहीं प्रेमी के साथ मिलकर हत्या की साज़िश रची जाती है। टीवी चैनलों पर दिन-रात वही दृश्य चलते हैं। सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ जाती है। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी फ़ौरन फैसला सुना देती है; “अब तो औरतें मर्दों पर भारी पड़ने लगी हैं।” कुछ लोग तो यह तक कहने लगते हैं कि अब पुरुष ही सबसे बड़े पीड़ित हैं। ऐसी बातें सुनने में आकर्षक लगती हैं, लेकिन आंकड़ों की कसौटी पर टिकती नहीं हैं। अपराध का कोई लिंग नहीं होता। हत्या करने वाला चाहे पुरुष हो या महिला, कानून की नज़र में दोनों बराबर हैं। दोषी को सज़ा मिलनी ही चाहिए। लेकिन कुछ सनसनीखेज़ घटनाओं के आधार पर पूरे समाज की तस्वीर बदल देना न्याय भी नहीं है और बुद्धिमानी भी नहीं।
कुछ अपराध सदियों की सामाजिक हकीकत को नहीं बदल सकते।
यह सच है कि भारत में महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। आज पहले की तुलना में कहीं अधिक लड़कियाँ स्कूल और कॉलेज पहुँच रही हैं। उच्च शिक्षा में महिलाओं का सकल नामांकन अनुपात अब पुरुषों से अधिक है। महिलाएँ लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, अंतरिक्ष अभियानों का नेतृत्व कर रही हैं, उद्योग चला रही हैं, न्यायपालिका और प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। पंचायतों में लाखों महिलाएँ जनप्रतिनिधि हैं। मातृ मृत्यु दर घटी है, संस्थागत प्रसव बढ़े हैं और करोड़ों महिलाओं के बैंक खाते खुले हैं। यह बदलाव स्वागत योग्य है। लेकिन कुछ सफल महिलाओं की उपलब्धियों को पूरे देश की महिलाओं की वास्तविक स्थिति मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी।
असल सवाल यह है कि गाँवों, कस्बों और शहरों की आम महिला कैसी ज़िंदगी जी रही है? यहीं तस्वीर बदल जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर बढ़ी जरूर है, लेकिन आज भी पुरुषों की तुलना में आधी से भी कम है। जो महिलाएँ काम करती भी हैं, उनमें अधिकांश असंगठित क्षेत्र में हैं, जहाँ न नौकरी की सुरक्षा है, न उचित वेतन और न सामाजिक सुरक्षा। इससे भी बड़ा सच है वह काम जिसका कोई वेतन नहीं मिलता।समय-उपयोग सर्वे बताते हैं कि भारतीय महिलाएँ पुरुषों की तुलना में रोज़ तीन घंटे से अधिक अतिरिक्त समय रसोई, सफाई, बच्चों की परवरिश और बुज़ुर्गों की देखभाल में लगाती हैं। यह श्रम देश की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है, लेकिन न इसका कोई वेतन है और न सम्मान।”
संपत्ति का बँटवारा भी बराबरी की कहानी नहीं कहता। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार केवल लगभग 13 प्रतिशत महिलाओं के नाम अकेले मकान है और मात्र 8 से 9 प्रतिशत महिलाओं के पास अपनी भूमि है। आर्थिक निर्भरता आज भी सामाजिक निर्भरता को जन्म देती है। सोशल एक्टिविस्ट विद्या चौधरी के मुताबिक, “सबसे कठोर सच महिलाओं के खिलाफ हिंसा का है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में महिलाओं के विरुद्ध 4.41 लाख से अधिक अपराध दर्ज हुए। यानी हर दिन लगभग 1,210 मामले और औसतन हर 71 सेकंड में एक महिला के खिलाफ अपराध। इनमें सबसे अधिक मामले पति और रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के हैं। इसके बाद दुष्कर्म, अपहरण, यौन उत्पीड़न और दहेज से जुड़े अपराध आते हैं।” ये केवल दर्ज मामले हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण बताता है कि भारत में लगभग हर तीन विवाहित महिलाओं में से एक ने अपने जीवन में पति या साथी द्वारा शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा झेली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि असंख्य महिलाएँ सामाजिक बदनामी, आर्थिक निर्भरता और पारिवारिक दबाव के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करा पातीं।
यही भारत की असली तस्वीर है। इसके मुकाबले हाल के वर्षों में पतियों की हत्या के कुछ चर्चित मामलों ने पूरे देश का ध्यान खींचा। ये घटनाएँ भयावह हैं और दोषियों को कठोर सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन ये अपवाद हैं, प्रवृत्ति नहीं। सोशल मीडिया अपवाद को सामान्य बना देता है। एक सनसनीखेज़ हत्या कई दिनों तक सुर्खियों में रहती है, जबकि घरेलू हिंसा झेल रही सैकड़ों महिलाएँ किसी समाचार की पात्र भी नहीं बनतीं। लगातार दिखाई जाने वाली असाधारण घटनाएँ धीरे-धीरे लोगों को यह भ्रम दे देती हैं कि अब सत्ता का संतुलन बदल गया है। लेकिन आंकड़े इस भ्रम की पुष्टि नहीं करते। हाँ, महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कुछ कानूनों के दुरुपयोग के मामले सामने आए हैं। लेकिन कुछ झूठे मामलों के कारण पूरे कानून को गलत नहीं ठहराया जा सकता। एक और दुखद सच्चाई विधवाओं की है। भारत में करोड़ों विधवाएँ आज भी गरीबी, उपेक्षा, संपत्ति से वंचित किए जाने और सामाजिक तिरस्कार का जीवन जी रही हैं। वृंदावन जैसे शहर आज भी हजारों बेसहारा विधवाओं की पीड़ा के मौन गवाह हैं। उनका दर्द कभी वायरल नहीं होता, क्योंकि ख़ामोश पीड़ा टीआरपी नहीं देती। एक सनसनीखेज़ हत्या एक सप्ताह तक सुर्खियाँ बना सकती है। लेकिन वह भारत की करोड़ों महिलाओं के हिस्से में आज भी दर्ज असमानता, हिंसा और भेदभाव की सदी पुरानी कहानी को नहीं बदल सकती।



