नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के धार में लंबे समय से चल रहे भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप भोजशाला और देवी वाग्देवी सरस्वती मंदिर का है। कोर्ट ने माना कि यहां हिंदुओं की पूजा-अर्चना की परंपरा लगातार जारी रही और कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड, साहित्य, पुरातात्विक तथ्यों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI की रिपोर्टों का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है। कोर्ट ने ASI की सर्वे रिपोर्ट और अधिसूचनाओं को भरोसेमंद माना। साथ ही फैसले में अयोध्या मामले में दिए गए कानूनी सिद्धांतों का भी जिक्र किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि भोजशाला सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं बल्कि संस्कृति और शिक्षा का भी प्रमुख केंद्र रही है। अदालत ने माना कि यह स्थान परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा हुआ था और संस्कृत शिक्षा का अहम केंद्र माना जाता था। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पूरा परिसर 1904 से संरक्षित स्मारक के दायरे में आता है और 1958 के कानून के तहत संरक्षित है।
फैसले में हिंदुओं को पूरे परिसर में पूजा करने का अधिकार दिया गया है। वहीं अदालत ने यह भी कहा कि अगर मुस्लिम पक्ष चाहे तो वह सरकार से वैकल्पिक जमीन की मांग कर सकता है। फैसले के बाद हिंदू पक्ष ने इसे बड़ी जीत बताया, जबकि मुस्लिम पक्ष ने कहा कि वह इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा। दोनों पक्षों की ओर से लोगों से शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने की अपील भी की गई है।




