वीरप्पन : राक्षस या रक्षक!

Veerappan, Photo by Tehelka

‘वीरम विधैक्का पट्टथु’ तमिल भाषा के इन शब्दों का हिंदी में अर्थ है, ‘यहां वीरता के बीज बोए गए हैं’. ये शब्द पत्थर के एक टुकड़े पर खुदे हुए हैं जो घने जंगल की झाडि़यों में स्थित एक कब्र का पता साफ तौर पर देते हैं. हालांकि इस स्मृतिलेख के लेखक के नाम की खबर नहीं मिलती. अपनी भव्यता में बहती कावेरी नदी के उस पार मेट्टूर बांध के पास चट्टानों से घिरे जंगल में दस्यु सरगना वीरप्पन की कब्र है जो  वीरान नहीं है.

इस चंदन तस्कर की मौत को हालांकि अब 11 वर्ष गुजर चुके हैं, लेकिन वीरप्पन की कब्र पर अब भी उसके चाहने वाले खिंचे चले आते हैं. विशेषकर पश्चिमी तमिलनाडु के जंगल में बसे गांवों और कर्नाटक के चमराजनगर इलाके के लोग यहां बड़ी संख्या में आते हैं. इन लोगों के लिए वीरप्पन एक रक्षक था. इसीलिए हर वर्ष 18 अक्टूबर को लोग वीरप्पन की पुण्यतिथि पर उसे श्रद्धांजलि देने पहुंच जाते हैं. चेन्नई से 350 किलामीटर दूर औद्योगिक नगर मेट्टूर के सीमांत इलाके में यह कब्र स्थित है.

श्रद्धांजलि अर्पित करने आए एक श्रद्धालु मुरूगेसन का कहना है, ‘11 वर्ष पहले हमने यहां वीरता के बीज बोए हैं. बाहरी दुनिया के लिए वे भले ही चंदन तस्कर और हाथी दांत चोर रहे हों लेकिन इस इलाके के गरीब लोगों, जंगल और पुलिस अधिकारियों के हाथों सताए हुए लोगों के लिए वे एक मसीहा थे. वीरप्पन सिर्फ एक बागी ही नहीं थे बल्कि हमारे लिए  अभिभावक और एक देवदूत की तरह थे जो हमें हर तरह के जुल्म और बर्बरता से बचाते थे. हमें यकीन है कि वीरता के ये बीज एक दिन फिर से अंकुरित होंगे.’ 18 अक्टूबर, 2004 को धर्मपुरी के नजदीक एक गांव में पुलिस अधिकारी के. विजय कुमार के नेतृत्व में तमिलनाडु स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने वीरप्पन और उसके दो साथियों को मार गिराया था.

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वीरप्पन की पुण्यतिथि पर उसके समाधि स्थल पर उमड़ी भीड़

तब वीरप्पन की पत्नी मुथुलक्ष्मी की तरह मेट्टूर के अधिकांश लोगों ने भी एसटीएफ के एनकांउटर की कहानी को नकार दिया था. उस वक्त वीरप्पन आंशिक रूप से अपनी दृष्टि खो चुका था और इलाज की उम्मीद लिए गांवों में घूमता रहता था. ऐसे ही किसी मौके पर वह एसटीएफ के बिछाए जाल में फंस गया. स्थानीय निवासी और वीरप्पन के रिश्तेदार के. संबथ का कहना है, ‘इडली उन्हें बेहद पसंद थी और मटन करी के साथ इडली वह बहुत चाव से खाया करते थे. उनकी इस पसंद से वाकिफ एक रिश्तेदार ने एसटीएफ के कहने पर उन्हें इडली में जहर मिला कर खिला दिया था. खाना देने वाले आदमी पर वीरप्पन को पूरा भरोसा था. जहर मिली इडली खाकर वीरप्पन बेहोश हो गए. बेहोशी की हालत में वीरप्पन को पुलिस के हवाले कर दिया गया, जिसने उन्हें प्रताडि़त किया और फिर मार डाला.’ इसमें कोई शक नहीं कि आर्थिक मदद करने के चलते सत्यमंगलम, मेट्टूर और थलावाड़ी के लोगों के लिए वीरप्पन राॅबिनहुड की तरह था. गांववालों से जानकारी निकलवाने के लिए एसटीएफ अधिकारियों द्वारा की गई हिंसा ने स्वाभाविक रूप से वीरप्पन को उस क्षेत्र के लोगों का हीरो बना दिया था. ‘चाहे वह तमिलनाडु हो या कर्नाटक, हर जगह गांव वाले बड़ी संख्या में वीरप्पन के समर्थक थे.’ ये कहना है मुथुलक्ष्मी का, जो उस आदमी (वीरप्पन) से शादी करने का खामियाजा भुगत रही है जो भारतीय इतिहास के सबसे लंबे अपराधी खोज अभियान के शुरू होने का जिम्मेदार है. मुथुलक्ष्मी दिल दहला देने वाली घटनाओं का भी जिक्र करती हैं. ‘दूसरे बच्चे के जन्म के समय घने जंगल के बीच मेरे आसपास तकरीबन 10 महिलाएं थीं जो पुलिस और एसटीएफ के जवानों से लोहा ले रही थीं.’

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गांववालों के अनुसार, वीरप्पन ने पक्षपात को कभी भी बर्दाश्त नहीं किया. पुलिस के मुखबिरों के लिए वह एक बुरे सपने की तरह थे. उनके साथ वे बहुत सख्त थे, किसी दानव की तरह. दुविधा के क्षणों में फंसे निर्दोष गांववालों ने हमेशा वीरप्पन को प्राथमिकता दी. वीरप्पन की पुण्यतिथि पर मेट्टूर के लोगों के बीच खाना बांटने के बाद ‘तहलका’ से बात करते हुए मुथुलक्ष्मी कहती हैं, ‘पुलिस अब भी मुझे डराती है और वीरप्पन की पुण्यतिथि पर कोई आयोजन करने के मेरे मूलभूत अधिकारों को छीनना चाहती थी. बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने मुझे इसके लिए अनुमति दी. हालांकि पुलिस ने एक बार फिर इस आयोजन के लिए मुझे परेशान किया. आयोजन स्थल पर बैनर लगाने के लिए मेरे खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई.

मुथुलक्ष्मी का कहना है, ‘गांववालों को खाना खिलाना वीरप्पन के सम्मान में आयोजित पारिवारिक कर्मकांड का हिस्सा है. उन्हें गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने पर तसल्ली मिलती थी.’ जब मुथुलक्ष्मी से उनकी दोनों लड़कियों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने इस बारे में कुछ कहने से मना कर दिया. गांववाले उनके बारे में बताते हैं कि उन दोनों की शादी हो गई है और दोनों अब अपने-अपने परिवारों के साथ कहीं दूर रहती हैं. तमिलनाडु में सामाजिक सुधार के लिए कार्यरत ‘द्रविड़र विदुथलाई कषगम’ नाम के राजनीतिक संगठन के संस्थापक कोलाथुर मणि बताते हैं, ‘मेरे पिता लकडि़यों के ठेकेदार थे, हम नदी के रास्ते लकडि़यां लाते थे. फिर वीरप्पन के पिता बाद में मजदूरों के बीच लकड़ी ढोने की मजदूरी बांटते थे.’

वीरप्पन का परिवार कावेरी नदी के किनारे कर्नाटक की सीमा पर बसे गोपीनाथम गांव में रहता था. वीरप्पन बहुत कम उम्र से ही शिकार करने लगा था. बदला लेने के लिए एक खून करने के बाद से उसे जंगल में छिपकर रहना पड़ा. उसके बाद से ही वीरप्पन ने जानवरों का शिकार और चंदन की तस्करी शुरू कर दी. मणि का कहना है, ‘वह एक अच्छा इंसान था, लेकिन पुलिस की हिंसा ने उसे बर्बर बना दिया.’ वीरप्पन को 1980 में गिरफ्तार किया था, लेकिन वह जेल से भाग गया. बाद में फिरौती के लिए बड़े-बड़े लोगों के अपहरण और पुलिस व वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की हत्या के लिए कुख्यात हुआ. मेट्टूर, गोपीनाथम और थलावाड़ी जैसे कुछ अन्य गांवों के लोग वीरप्पन से आज भी बेहद प्यार करते हैं. वीरप्पन की पुण्यतिथि पर वे श्रद्धाजंलि देते हैं और उसके लिए प्रार्थना करते हैं.

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वीरप्पन की पत्नी अपनों बेटियों के साथ (फाइल फोटो)

वीरप्पन एक अनुशासित इंसान था और महिलाओं का वह बहुत सम्मान करता था. बलात्कार या यौन अपराधों को वह बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करता था. इसलिए महिलाएं अक्सर उसे ‘पेरियन्ना’ (बड़ा भाई) कहती थीं. 55 वर्षीय थंगमा अपने साथ हुई हिंसा को याद करते हुए बताती हैं, ‘वीरप्पन को पान के पत्ते बेचने के आरोप में पुलिस ने एक बार मुझे गिरफ्तार किया था. हिरासत में तत्कालीन एसटीएफ प्रमुख वाल्टर देवराम सहित कई पुलिस अधिकारियों ने मेरे साथ गैंगरेप किया था. इसके बाद मुझे अधमरा होने तक पीटा गया. आज वे अधिकारी खुलेआम घूम रहे हैं. सरकार उन लोगों को सजा क्यों नहीं देती, जिन्होंने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी.’

महिलाओं के साथ ज्यादती करने वाले लोगों को वीरप्पन सजा देता था. वास्तव में भारतीय वन सेवा अधिकारी पी. श्रीनिवास का सिर काट देने की घटना से वीरप्पन काफी कुख्यात हुआ था. इस अधिकारी ने कथित रूप से वीरप्पन की बहन का बलात्कार किया था. जिसके बाद उसकी बहन ने आत्महत्या कर ली थी.

एसटीएफ की हिंसा की शिकार मुनियम्मा कहती हैं, ‘किसी भी तरह का दुर्व्यवहार जो हम झेलते हैं, वह बलात्कार की तुलना में कुछ भी नहीं होता.’ गांव के पुरुषों और महिलाओं को अक्सर पुलिस अपने कैंप में ले जाती थी जिसे वह ‘वर्कशाॅप’ कहती थी. वहां उनसे सवाल किए जाते थे और बुरी तरह उन्हें प्रताडि़त किया जाता था. इसमें बलात्कार करने के साथ गुप्तांगों पर इलेक्ट्रिक शाॅक दिया जाना, अपंग बना देना और बुरी तरह पीटना शामिल था.

अपने साथ हुई ज्यादती को याद करते हुए मुनियम्मा गहरी सांस लेते हुए बताती हैं, ‘मुझे हिरासत में लेने के बाद मेरे कपड़े उतार दिए गए थे. फिर मेरे ऊपर पानी फेंका गया और मेरे गुप्तांग और वक्षों पर इलेक्ट्रिक शाॅक दिया गया. वीरप्पन ने ऐसे अमानवीय अधिकारियों से बदला लिया था.’ बाहरी दुनिया वीरप्पन को एक जघन्य अपराधी मानती है लेकिन मेट्टूर और आसपास के इलाकों के गांव वाले अब भी उसकी पूजा करते हैं. पुलिस की धमकियों के बावजूद स्थानीय समुदाय के लोग आज भी वीरप्पन की याद को जिंदा रखने की कोशिश में लगे हुए हैं.

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