बृज खंडेलवाल

आगरा से लेकर कोलकाता, चेन्नई से लेकर मुंबई, अहमदाबाद, भारत का सबसे लोकप्रिय स्ट्रीट फूड बन चुका है गोल गप्पा, पानी पूरी, पानी की टिकिया! क्या आपने कभी सोचा है कि पहला गोलगप्पा किसने खाया होगा? किसी बादशाह ने, किसी रानी ने, या किसी भूखे राहगीर ने?
दिल्ली की चाँदनी चौक से लेकर आगरा, मथुरा, लखनऊ, बनारस और कोलकाता तक, चाट सिर्फ़ एक नाश्ता नहीं, बल्कि हमारी तहज़ीब का ज़िंदा हिस्सा है। यह अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, बच्चे-बूढ़े, सबकी पसंद है। सड़क किनारे ठेले पर मिलने वाली यह मामूली-सी दिखने वाली चीज़ सदियों का इतिहास अपने भीतर समेटे हुए है। आगरा के हॉस्पिटल रोड पर शाम ढलते ही वही पुरानी खुशबू हवा में घुल जाती है। गरम तेल की महक, हरे धनिये की ताज़गी और इमली की खटास। ठेले पर खड़े बुलाकी चाट वाले अपनी उँगली से फुर्ती से गोलगप्पे में छेद करते हैं, मसालेदार पानी भरते हैं और ग्राहक के हाथ में पकड़ा देते हैं।
“अभी खाइए,” वे मुस्कराकर कहते हैं। “गोलगप्पा किसी का इंतज़ार नहीं करता।” शायद यही बात चाट पर भी लागू होती है। इसे हमेशा ताज़ा ही खाना पड़ता है, और इसकी कहानी भी हर पीढ़ी के साथ नई हो जाती है। सबसे मशहूर किस्सा यह है कि मुगल बादशाह चाँदनी चौक की नहर में नाव की सैर करते हुए चाट खाते थे। कहा जाता है कि रात में चाँद की रोशनी पानी पर पड़ती थी, संगीत बजता था और शाही मेहमान चटपटी चाट का लुत्फ़ उठाते थे। सुनने में यह कहानी बेहद ख़ूबसूरत लगती है। लेकिन इतिहास इसकी पूरी तस्दीक़ नहीं करता।
इतिहासकार मानते हैं कि चाँदनी चौक की नहर सचमुच थी। इसे शाहजहाँ की बेटी जहाँआरा बेगम ने बनवाया था। उसी नहर की वजह से इस बाज़ार का नाम चाँदनी चौक पड़ा। लेकिन कहीं भी ऐसा कोई भरोसेमंद दस्तावेज़ नहीं मिलता जिसमें लिखा हो कि बादशाह नाव में बैठकर चाट खाते थे। यह शायद उन कहानियों में से एक है जो हर बार सुनाए जाने पर थोड़ी और रंगीन होती चली गईं। एक और कहानी कुछ ज़्यादा भरोसेमंद लगती है। कहा जाता है कि शाहजहाँ के हकीमों ने दिल्ली के खारे पानी से होने वाली बदहज़मी दूर करने के लिए दही, इमली और मसालों वाली चाट खाने की सलाह दी थी। इसका भी कोई पक्का सबूत नहीं है, लेकिन यह बात पूरी तरह नामुमकिन भी नहीं लगती।
असलियत यह है कि चाट मुगलों से भी कहीं ज़्यादा पुरानी है। गोलगप्पे की कहानी तो दो हज़ार साल पहले के मगध साम्राज्य तक पहुँच जाती है। एक और मशहूर दास्तान महाभारत से जुड़ी है। कहा जाता है कि द्रौपदी ने बचे हुए आटे और सब्ज़ियों से पांडवों के लिए पहला गोलगप्पा बनाया था। इन दोनों बातों का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यह व्यंजन सदियों से आम लोगों का साथी रहा है। हाँ, उस समय आलू नहीं था। आलू तो सोलहवीं सदी में पुर्तगाली भारत लाए थे। इसलिए शुरुआती गोलगप्पों में दाल, अनाज या मसालेदार साग भरा जाता होगा।
फूडी दर्शन भाई बताते हैं, “मुगलों ने चाट बनाई नहीं, लेकिन उसे नया मुक़ाम ज़रूर दिया। उनके दौर में दिल्ली, आगरा और मथुरा के बाज़ार तेज़ी से आबाद हुए। हिन्दू और जैन समाज की शाकाहारी परंपराओं ने आलू, दही, दाल और मसालों से बनने वाले सस्ते और स्वादिष्ट नाश्तों को खूब बढ़ावा दिया। यही बाज़ार आगे चलकर चाट की असली पहचान बने।” दिल्ली की पापड़ी चाट, आगरा की करारी आलू टिक्की और मथुरा की भक्तिभाव से जुड़ी चाट आज भी उसी विरासत की याद दिलाती हैं। दिल्ली में शाह जहां रोड पर दही भल्ले की चाट खाने नेताओं की भीड़ लगी रहती थी, लोग बताते हैं मेनका गांधी भी इनकी चाट की शौकीन थीं।
फिर रेल आई। लोग एक शहर से दूसरे शहर पहुँचे। बँटवारे के बाद लाखों शरणार्थी दिल्ली आए और अपने साथ चाट के नए स्वाद भी ले आए। मुंबई ने भेलपूरी बनाई, कोलकाता ने पुछका को और तीखा कर दिया, जबकि हर शहर ने अपनी ज़ुबान में चाट का नया अध्याय लिख दिया। आज चाट करोड़ों रुपये का कारोबार है। शादियों की दावतों में सबसे ज्यादा भीड़ चाट स्टॉल पर रहती है। बड़े बड़े इमरतबानों में तरह तरह के मसालेदार पानी रहते हैं। पाँच सितारा होटलों के मेन्यू में भी है और सोशल मीडिया की तस्वीरों में भी। बादशाहों के किस्से सच हों या अफ़साने, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। सच यह है कि चाट ने हर सल्तनत को पीछे छोड़ दिया। आज भी भारत की गलियों में वही सबसे बड़ा बादशाह है, जिसके सामने हर कोई बराबर खड़ा होता है; जेब चाहे भरी हो या खाली।


