तहलका की पड़ताल: स्टे माफिया का खेल

- दिल्ली के बिल्डरों से जबरन वसूली के लिए अदालती प्रक्रियाओं का किया जा रहा दुरुपयोग

दिल्ली के बाटला हाउस में बिल्डरों से जबरन वसूली का खेल चलता है। इस वसूली के लिए बाकायदा अदालती प्रक्रियाओं का दुरुपयोग किया जाता है। तहलका एसआईटी की इस रिपोर्ट से पता चलता है कि बाटला हाउस के अनधिकृत निर्माण में तेजी ने स्टे माफिया को जन्म दिया है। ये स्टे माफिया अदालती आदेशों, पुलिस की मिलीभगत और कानूनी देरी का फायदा उठाकर बिल्डरों से जबरन वसूली करते हैं। तहलका एसआईटी की यह रिपोर्ट :-

भारत भर की अदालतों ने बार-बार चेतावनी दी है कि जनहित याचिका (पीआईएल) जैसे सम्मानजनक मंच का दुरुपयोग अक्सर व्यक्तियों या विशिष्ट परियोजनाओं को निशाना बनाने के लिए तेजी से ब्लैकमेल और जबरन वसूली के साधन के रूप में किया जा रहा है। पिछले कई वर्षों में न्यायपालिका ने अपने फैसलों के माध्यम से इस तरह के दुर्व्यवहार को रोकने के लिए बार-बार प्रयास किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि जनहित याचिकाओं का इस्तेमाल कभी-कभी दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में बुनियादी ढांचे और पुनर्विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए किया जाता है, जो कभी-कभी प्रतिस्पर्धियों या आर्थिक लाभ चाहने वाले निहित स्वार्थों के इशारे पर होता है। अदालतों की राय में कथित अनधिकृत निर्माणों को चुनौती देने वाले कई मामले ब्लैकमेलिंग प्रकार के मुकदमे के समान हैं, जिनका उद्देश्य जनहित की सेवा करने से कम और बिल्डरों से पैसा निकालने से अधिक है।
गुजरात उच्च न्यायालय ने हाल ही में जनहित याचिका का दुरुपयोग करने (जेल के पास स्थित एक निर्माण को ध्वस्त करने की मांग करते हुए व्यक्तिगत लाभ के लिए एक तंत्र का उपयोग करने) के लिए एक याचिकाकर्ता पर 20 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका का इस्तेमाल नागरिकों को ब्लैकमेल करने के आरोप में एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) पर 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई पुनर्विकास परियोजना के खिलाफ प्रेरित जनहित याचिका दायर करने के लिए एक सोसाइटी पर लगाए गए 1 लाख रुपए के जुर्माने को बरकरार रखा है।
ये मामले इस बात का केवल एक पहलू दर्शाते हैं कि किस प्रकार कानूनी तरीकों का कथित तौर पर जबरन वसूली के लिए हथियार के रूप में दुरुपयोग किया जा रहा है। तहलका की नवीनतम पड़ताल कथित तौर पर दबाव बनाने के एक अन्य साधन- अदालती स्थगन आदेशों पर केंद्रित है। स्थगन आदेश एक न्यायिक निर्देश है, जो किसी मामले के निपटारे तक कानूनी कार्यवाही को अस्थायी रूप से रोक देता है या यथास्थिति बनाए रखता है। जांच से पता चलता है कि कुछ मामलों में इस तरह के आदेशों का कथित तौर पर ब्लैकमेल और जबरन वसूली के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के जामिया नगर में स्थित बाटला हाउस इलाका पहली बार 2008 में हुए विवादास्पद पुलिस मुठभेड़ के बाद राष्ट्रीय सुर्खियों में आया, जो एक आतंकवाद विरोधी अभियान से जुड़ा था। इस खुलासे ने इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) नेटवर्क को बड़ा झटका दिया था। इस घटना ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया और जनता की राय को बुरी तरह से विभाजित कर दिया। लगभग दो दशक बाद यह अनधिकृत बस्ती एक बार फिर ध्यान आकर्षित कर रही है। लेकिन इस बार अवैध निर्माण गतिविधियों से जुड़े एक फलते-फूलते स्टे ऑर्डर माफिया के आरोपों को लेकर।
बाटला हाउस एक अनधिकृत बस्ती बनी हुई है, जहां संपत्ति का पंजीकरण औपचारिक रूप से नहीं होता है और लेनदेन अक्सर जनरल पॉवर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) व्यवस्था के माध्यम से किए जाते हैं। इसके बावजूद घनी आबादी वाला यह मुस्लिम बहुल इलाका एक प्रमुख आवासीय केंद्र के रूप में विकसित हो गया है, जहां अपार्टमेंट्स की कीमतें करोड़ों में हैं। बाटला हाउस मामले में तहलका की पड़ताल से पता चलता है कि कैसे कुछ गैर सरकारी संगठन और व्यक्ति कथित तौर पर अवैध निर्माणों पर अदालती रोक का इस्तेमाल स्थानीय बिल्डरों से पैसे वसूलने के साधन के रूप में कर रहे हैं। इस इलाके के बिल्डर अक्सर इस घटना को स्टे माफिया कहते हैं। स्टे माफिया और उनके अवैध वसूली के खेल के बारे में तहलका ने कई कथित पीड़ितों से बात की, जिन्होंने विस्तार से बताया कि यह गिरोह किस तरह काम करता है।
‘यह 800 वर्ग गज का एक भूखंड है, जिसे अधिकारियों द्वारा वर्षों पहले सील कर दिया गया था। इसके बावजूद निर्माण कार्य जारी रहा, अपार्टमेंट बनाए गए और करोड़ों में बेचे गए। लोग वर्षों से इस इमारत में रह भी रहे हैं। कागजों पर तो यह इमारत सीलबंद है, लेकिन असल में यहां लोग रह रहे हैं।’ -कथित पीड़ित जावेद ने तहलका के गुप्त रिपोर्टर को बताया।
‘इस 800 वर्ग गज के भूखंड के मालिक प्रभावशाली लोग हैं, इसलिए अदालत द्वारा भवन निर्माण पर रोक लगाए जाने के बाद भी उन्होंने निर्माण कार्य नहीं रोका। उन्होंने उन ब्लैकमेलर्स को भी पैसे नहीं दिए, जिन्होंने कथित तौर पर उनसे 4-5 करोड़ रुपए की मांग की थी। लेकिन अब इतने वर्षों के बाद उन्हें एक और अनधिकृत मंजिल के निर्माण के लिए भुगतान करना पड़ सकता है, क्योंकि इस मामले की देखरेख कर रहे वर्तमान न्यायाधीश बहुत सख्त हैं।’ -जावेद ने तहलका रिपोर्टर को बताया।
‘बाटला हाउस इलाके में एक इमारत का निर्माण करते समय मुझे भी ब्लैकमेल किया गया था। उन्होंने मेरी इमारत पर अदालत से रोक आदेश प्राप्त कर लिया और 17 लाख रुपए की मांग की। अंततः यह सौदा 6 लाख रुपए में तय हुआ, जिसके बाद उन्होंने रोक आदेश वापस ले लिया।’ -जावेद ने कहा।
‘अदालती आदेशों के जरिए ब्लैकमेल करने वाले गिरोहों में कथित तौर पर शामिल लोग अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं। कुछ लोग गैर सरकारी संगठनों से जुड़े हैं। कुछ स्थानीय समाचार पत्र चलाते हैं। कुछ झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों या पुरानी दिल्ली से हैं, और यहां तक कि बिहार के लोग भी दिल्ली के आधार कार्ड का इस्तेमाल करके इस कथित जबरन वसूली रैकेट में शामिल हैं।’ -जावेद ने बताया।
‘ब्लैकमेलर बाटला हाउस में किसी भी अनधिकृत इमारत का निर्माण शुरू होने का इंतजार करते हैं। वे पहली छत की पटिया के लगने का इंतजार करते हैं, ताकि परियोजना में और अधिक पैसा लगाया जा सके। दूसरी छत बनने तक लाखों रुपए खर्च हो चुके होते हैं। इसके बाद स्टे माफिया इमारत की तस्वीरें खींचता है और इसे अवैध निर्माण बताते हुए स्टे ऑर्डर जारी करवाने के लिए अदालत का रुख करता है। अदालत द्वारा स्थगन आदेश जारी होते ही कथित ब्लैकमेलिंग की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।’ -जावेद ने बताया।
‘स्थगन आदेश एक दीवानी मुकदमे का हिस्सा होता है और ऐसे मामलों को सुलझने में वर्षों लग सकते हैं। ब्लैकमेलर अदालत से लंबी अवधि के लिए स्थगन की मांग करते रहते हैं। निर्माण कार्य लंबे समय तक रुका रहने से बिल्डर निराश हो जाते हैं और अंततः कई लोग समझौता करने और पैसे देने के लिए सहमत हो जाते हैं।’ -एमसीडी इंजीनियर आदिल ने तहलका के रिपोर्टर से बात करते हुए यह आरोप लगाया।
‘पुलिस द्वारा अनधिकृत क्षेत्रों में निर्मित प्रत्येक छत के लिए कथित तौर पर पैसे लेना एक नियमित प्रक्रिया है। सौदे के आधार पर प्रति छत की दर 50,000 रुपए से लेकर 70,000 रुपए तक होती है। मैंने अपने छः मंजिला भवन के निर्माण के दौरान पुलिस को 2.5 लाख रुपए का भुगतान किया था।’ -बाटला हाउस के निवासी सलीम ने तहलका के रिपोर्टर से बात करते हुए यह दावा किया।
बाटला हाउस इलाके में तहलका रिपोर्टर की मुलाकात सबसे पहले जावेद (बदला हुआ नाम) से हुई। जावेद ने तहलका रिपोर्टर को कथित स्टे माफिया के नेटवर्क के बारे में विस्तार से बताया। जावेद के अनुसार, ब्लैकमेलर बाटला हाउस में अनधिकृत भूखंडों पर निर्माण शुरू होने का इंतजार करते हैं। जावेद ने कहा कि वे पहली छत की पटिया के बनने का इंतजार करते हैं, ताकि बिल्डर निर्माण में और अधिक पैसा लगाए।
दूसरी छत बनने तक बिल्डर लाखों रुपए खर्च कर चुका होता है। इसके बाद कथित स्टे माफिया इमारत की तस्वीरें खींचता है और इसे अवैध निर्माण बताते हुए स्टे ऑर्डर जारी करवाने के लिए अदालत का रुख करता है। जावेद ने आगे कहा कि अदालत द्वारा स्थगन आदेश जारी होते ही कथित ब्लैकमेलिंग की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस बातचीत से यह भी संकेत मिलता है कि इस प्रक्रिया में बिचौलियों, वकीलों और अन्य लोगों की कथित संलिप्तता होती है।
रिपोर्टर : ये मामला क्या है स्टे वाला?
जावेद : अब ये जो जगह है, ये जो प्लॉटिंग हुई है, ये XXXXX के खेत थे। उनके वालिद साहब के ये प्लॉट थे, खेत थे। भैंस पालते थे। तरक्की हुई, मकान बनने शुरू हो गए, बिल्डिंग बन गई। अब ये बिल्डिंग है, ये 800 गज की बिल्डिंग है। अब इस फ्लोर पर स्टे ले आए। लेंटर डाला, पहला लेंटर पड़ गया। दूसरा पड़ गया। तीसरे लेंटर पर कोर्ट चले गए, स्टे ले आए- ये बिल्डिंग इल्लीगल है।
रिपोर्टर : मान लीजिए मैं बिल्डिंग बना रहा हूं…?
जावेद : चलो ठीक है, आप बिल्डिंग बना रहे हो, ये प्लॉट है, अब मुझे आपसे पैसे लेने हैं….।
रिपोर्टर : आपको मुझे ब्लैकमेल करना है? पैसे लेने हैं?
जावेद : हां, मतलब मैं आपसे लूट रहा हूं, 420 कर रहा हूं… पुलिस के साथ करूंगा, लीगल रूल से करूंगा…।
जावेद (आगे) : मुझे क्या है, पहले बिल्डिंग बनाना शुरू कर दी, पहले लेंटर में मैं कुछ नहीं करूंगा, क्यूंकि मैं चाहूंगा आपके 50-60 लाख और लग जाएं। यानी 100 गज का प्लॉट है, आपने 2 करोड़ का प्लॉट बेचा, …अब जैसे ही दूसरा लेंटर चलेगा, मैं जाऊंगा, इसके फोटो खिंचवाऊंगा. इसके पीछे चेन है पेपर की, जो किसान बैठे हुए हैं- ‘ये प्लॉट हमारा है। ये अवैध तरीके से बना रहे हैं।’ मैं जाके वकील के थ्रू कोर्ट में अर्जी लगा दूंगा। कोर्ट फोन करेगा- ‘फला बिल्डिंग बन रही है, उसको रोको।’ कोर्ट लिखकर दे देगा। पुलिस वाले आएंगे, पुलिस वाले बोलेंगे- ‘तेरी बिल्डिंग पर स्टे है।’ पुलिस मिली हुई है, दोनों तरफ से। वो काम रुक गया। अब आप परेशान, किसने स्टे लिया? मेरी बिल्डिंग रुकवाई किसने? अब मैं अंदर खाने में अपनी डिमांड रख के किसी को भेजूंगा, कि मुझे 20 लाख चाहिए, 25 लाख चाहिए। अब जितने भी एनजीओ चला रहे हैं, वो ये काम करते हैं। वो अंदर खाने कर रहे हैं, झोंपड़-पट्टी वाली जो  औरतें हैं, उनके नाम से किसी से डाल देंगे, जो यहां नहीं रहती… बस अब आप ढूंढते रहो, कराया मैंने है…।

आगे की बातचीत में जावेद बताते हैं कि कथित तौर पर अदालत से स्टे ऑर्डर प्राप्त करने वाले लोग बिल्डरों के साथ सीधे संपर्क से कैसे बचते हैं। उनका दावा है कि इस तरह के अभियानों के पीछे के असली लोग छिपे रहते हैं और अपनी मांगों को रखने के लिए बिचौलियों का इस्तेमाल करते हैं। इस बातचीत से पर्दाफाश होने का डर भी सामने आता है, जिसमें जावेद का कहना है कि रिकॉर्डिंग या स्टिंग ऑपरेशन से बचने के लिए सीधी मुलाकातों से बचा जाता है।
रिपोर्टर : एक चीज बताइए, जो स्टे लेने जा रहा है, उसका नाम, एड्रेस कोर्ट से मिल जाएगा?
जावेद : सब होता है, लेकिन मैं आपसे मिलूंगा नहीं।
रिपोर्टर : पर्सनली नहीं मिलूंगा?
जावेद : नहीं।
रिपोर्टर : ऐसा क्यूं?
जावेद : देखिए, मैं आपसे मिलूंगा नहीं, पुलिस नहीं ढूंढेगी, आप ढूंढोगे।
रिपोर्टर : आप मिलोगे नहीं, ऐसा क्यूं?
जावेद : अगर मैं आपसे पर्सनली मिलूंगा, क्या पता आप मेरी वीडियो बना लो, बैठा लो, एक्सपोज कर दो। मेरा काम ही ये है, लोगों से चोरी-चोरी करना…।

आगे की बातचीत में जावेद बताते हैं कि कैसे कथित स्टे रैकेट प्रॉक्सी पहचान और कमजोर लोगों का उपयोग करके काम करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि स्टे माफिया ब्लैकमेल करने के लिए अदालती स्टे प्राप्त करने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। उनके अनुसार, वे कभी-कभी झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में रहने वाली महिलाओं से संपर्क करते हैं, उन्हें थोड़ी सी रकम देते हैं। उनके हस्ताक्षर लेते हैं और उनके नाम पर रहने की व्यवस्था सुरक्षित कर लेते हैं। अक्सर इन महिलाओं को इसकी जानकारी भी नहीं होती है। उन्होंने दावा किया कि कई बार बिहार में बैठे लोग कथित तौर पर दिल्ली के आधार कार्ड का इस्तेमाल करके स्टे ऑर्डर प्राप्त कर लेते हैं।
जावेद : अब ये तो मेरा काम हो गया। अब आप समझ लो, आगे झोंपड़-पट्टी है, 3-4 लेडीज पड़ी हैं, मैंने 500 देकर उसके साइन करा लिए। अब ढूंढ लो, अब पुलिस आएगी।
रिपोर्टर : अच्छा, उस औरत को 10-20 हजार देकर उसके नाम से स्टे करा दिया?
जावेद : स्टे करा दिया…।
रिपोर्टर : उसको पता भी नहीं है?
जावेद : वो मिलेगी ही नहीं। झोंपड़-पट्टी में कहां ढूंढोगे आप…, ऐसे भी लोग हैं, वो बिहार बैठकर स्टे ले रहे हैं।
रिपोर्टर : बिहार बैठकर स्टे ले रहे हैं?
जावेद : हां, आधार कार्ड यहां का बना हुआ है। बिहार के लोग मिले हुए हैं, व्हाट्सएप पर लिखा।
रिपोर्टर : और डिमांड कितनी करते हैं- 20-25 लाख?
जावेद : हां, मतलब बिल्डर कमाएगा भी और नहीं भी कमाएगा।

जावेद ने आगे बताते हैं कि बाटला हाउस क्षेत्र में बिल्डर अंततः कथित तौर पर स्टे माफिया द्वारा बनाए गए दबाव के आगे झुक जाते हैं और निर्माणाधीन इमारतों से अदालती स्टे हटवाने के लिए पैसे देते हैं, ताकि काम फिर से शुरू हो सके। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस तरह के समझौते बिचौलियों के द्वारा पुलिस की मिलीभगत से होते हैं।
जावेद : मैं दबंग आदमी हूं, मेरी बिल्डिंग रुक गई, पुलिस वालों को बुलाया…कहेंगे XXXX है।
रिपोर्टर : हैं?
जावेद : XXXXX यहां पर मशहूर है स्टे माफिया। बहुत सारे नाम हैं, XXXXX छोटा सा है… वो हाथ नहीं आएगा, वो 6 महीने से गायब है। आप बौखला गए। आपकी 1.5 करोड़ की एम*-बी* एक कर दी… आपने, 2 फ्लैट बेच भी दिए इस बीच में। आप बौखला गए। अब आप कहोगे फैसला करा दो। लास्ट में टूट जाते हो आप।
रिपोर्टर : आप कैसे कहोगे?
जावेद : पुलिस से कहेंगे, या अपना बंदा भेजूंगा।
रिपोर्टर : XXXX का असली नाम क्या है?
जावेद : XXXX ही है।
रिपोर्टर : कहां रहता है?
जावेद : छोटा सा है, यहीं रहता है।
जावेद (आगे) : और एक है आपका बाल्टी चौक पर XXXX… उसका अखबार भी है… XXXX बहुत मशहूर है।
Reporter- XXXX?
जावेद : आईटीओ पर उसका ऑफिस है… घर उसका जसोला में है। उसके नाम पर XXXXX चौक बना रखा है- XXXX चौक।

इसके बाद जावेद ने तहलका से एक चौंकाने वाला दावा किया। उन्होंने बाटला हाउस में 800 वर्ग गज के भूखंड पर बनी एक इमारत की ओर इशारा किया, जिसके बारे में उनका आरोप है कि इसे अधिकारियों ने वर्षों पहले सील कर दिया था। इसके बावजूद इमारत के अंदर अपार्टमेंट बनाए गए और खरीदारों को बेच दिए गए, क्योंकि कथित तौर पर बिल्डर प्रभावशाली है। उन्होंने आगे दावा किया कि लोग इमारत में रहना जारी रखे हुए हैं, जबकि कागजों पर इसे सील कर दिया गया है। जावेद ने यह भी आरोप लगाया कि निरीक्षण के लिए आने वाले अधिकारियों को बिल्डर द्वारा भुगतान किया जाता है और बदले में वे सकारात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत कर देते हैं।
रिपोर्टर : तो अभी कौन-सी बिल्डिंग सील है आपकी?
जावेद : ये पूरी बिल्डिंग, ये 800 गज है पूरी।
रिपोर्टर : 800 गज, और सील कितनी है?
जावेद : पूरी।
रिपोर्टर : 800 गज सील है…?
जावेद : एक ही प्लॉट है ना।
रिपोर्टर : और कब से सील है?
जावेद : जबसे बनी है, 3 साल हो गए।
रिपोर्टर : 2-3 साल से सील है… लोग तो रह रहे हैं यहां पर?
जावेद : वो तो दिखाने के लिए…. क्यूंकि ‘पंक्चर’ (टोकन डिमोलेशन टू अवॉइड एक्शन- कार्रवाई से बचने के लिए सांकेतिक विध्वंस) कर रखा है ना!
जावे (आगे) : वो आपका डीसीपी, पुलिस, सब साथ हैं। थाने में पैसे खिलाया…।
रिपोर्टर : मतलब कोर्ट का आदमी नहीं आता चेक करने?
जावेद : आता है।
रिपोर्टर : आप इतने साल से पैसे खिला रहे हो, कितने खिला दिए होंगे?
जावेद : इन लोगों ने बहुत पैसा खिला दिया।
रिपोर्टर : इन लोगों ने या आपने?
जावेद : मेरा नहीं है इसमें। मेरा सिर्फ XXXX है, वो भी किराए पर।
रिपोर्टर : ऑनर कौन है इस बिल्डिंग के?
जावेद : XXXXX.
रिपोर्टर : अच्छा, ये बिल्डिंग कागजों में तो सील है, वैसे लोग रह रहे हैं इसमें?
जावेद : हां।
रिपोर्टर : तो यहां ब्लैकमेलर कौन था, किसने लगाया था स्टे?
जावेद : पुरानी दिल्ली की 2 लेडीज।
रिपोर्टर : पुरानी दिल्ली की… और ये बना कब था?
जावेद : 5 साल हो गए।
रिपोर्टर : जिन लोगों ने स्टे लिया है, उनको पैसे नहीं खिलाए?
जावेद : एक्चुअली दबंग लोग…. पैसे खिलाए नहीं- ‘हम तो निकाल लेंगे।’
रिपोर्टर : और डिमांड कितनी आई थी?
जावेद : 4-5 करोड़।
रिपोर्टर : 4-5 करोड़ की डिमांड आई थी?
जावेद : अब तो देने पड़ेंगे।
रिपोर्टर : अब क्यूं देंगे? अब तो बिक ही गई बिल्डिंग।
जावेद : अब तो फ्लोर ऊपर  और डलेगा… 800 गज पर 2 फ्लोर में अभी..।.
रिपोर्टर : जैसे ये बनाए हैं, वैसे ही वो भी बन जाएगा?
जावेद : नहीं सर, अब ये कोर्ट में चला गया है।
रिपोर्टर : लेकिन कोर्ट में तो पहले ही चला गया ये?
जावेद : बन गया था, मगर अब जो जज बैठा है, वो सख्त है।

जावेद ने आगे बताया कि कैसे कथित स्टे माफिया अंततः बिल्डरों के साथ समझौता कर लेते हैं। उनके अनुसार, इस तरह के निर्माणों के पीछे जो लोग होते हैं, वे अंततः बिल्डरों से पैसे वसूलने और जगह खाली करने के लिए लिखित आश्वासन देने के लिए आगे आते हैं। जावेद ने दावा किया कि बाटला हाउस में कई इमारतों को कथित तौर पर अदालती रोक के नाम पर इस तरह की जबरन वसूली का सामना करना पड़ा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बिल्डरों पर दबाव डालने के लिए स्टे ऑर्डर प्राप्त करने में परिचितों या दोस्तों का भी इस्तेमाल किया जाता है।
रिपोर्टर : अब XXXXX के बारे में बताएं?
जावेद : अब आपने बिल्डिंग बनाई, 2 फ्लोर डाल दिए, 2 करोड़ का प्लॉट लिया 100 गज का, 2 करोड़ का हो गया। 20 लाख का लेंटर डाल दिया, 2 करोड़ 20 लाख हो गए। एक लेंटर और डाल दिया, एक लेंटर डलता है 6-7 लाख का। फिर… ‘ये अवैध तरीके से बना है।’ पुलिस काम रुकवा देगी। पुलिस आएगी- ‘तेरे पर स्टे आ गया।’ वो अब परेशान होगा। उसके बाद में यहां का लोकल हूं, मेरी जान-पहचान है। मैं पता लगाऊंगा कि फलां आदमी ने इस पर स्टे लिया है। फिर उसको पकड़ो स*…को, वो हाथ में आएगा। उसे मारोगे? …मार नहीं सकते। जान से मार देंगे, तब भी आप फंसोगे एंड में आकर लुट जाते हो. अब आता है फैसले का टाइम। मैंने 20 मांगे, आपने 10 किए, 8 करे।
रिपोर्टर : जब फाइनल स्टेटमेंट होता है, तो वो लोग आते हैं सामने?
जावेद : पैसा आएगा और लिखकर देगा। वो आएगा और लिखकर देगा। पुलिस भी पैसा खाएगी। वकील ने पैसा खाया है, तो वो भी खाएगा।
रिपोर्टर : तो ऐसा तो बहुत सारी बिल्डिंग्स पर हो चुका होगा?
जावेद : मेरे हिसाब से तो अनलिमिटेड है।
रिपोर्टर : अनलिमिटेड बिल्डिंग पर ऐसा हो चुका है, बाद में स्टे हट जाता है?
जावेद : हट जाता है। ‘पंक्चर’ (टोकन डिमोलेशन टू अवॉइड एक्शन – कार्रवाई से बचने के लिए सांकेतिक विध्वंस) होते ही, बात खत्म। लेटर भी 1 नहीं, 4-5 डलेंगे। उसके बाद ‘पंक्चर’ होना शुरू होगा। एक लेटर में नहीं हटेगा पंक्चर।
रिपोर्टर : तो ये 2 लोग हैं, जो ये सब कर रहे हैं?
जावेद :  इसमें दाढ़ी वाले भी हैं, और जो आपके साथ बैठे हैं, पता नहीं चलता, वो भी होते हैं।
रिपोर्टर : तो ये तो करोर्स (करोड़ों) कमा लिए होंगे इन्होंने?
जावेद : हां, अब आप XXXXX को ही देख लो, अखबार निकालता है, एनजीओ चलाता है…।

इस बातचीत में जावेद निर्माण गतिविधि से संबंधित अदालत के स्टे ऑर्डर के साथ अपने कथित अनुभव का वर्णन करते हैं। उन्होंने दावा किया कि भवन निर्माण विवाद के संबंध में उन्हें भी कथित तौर पर ब्लैकमेलिंग का सामना करना पड़ा था। उनके अनुसार, प्रारंभिक तौर पर 17 लाख रुपए की मांग की गई थी। लेकिन बातचीत के बाद उन्होंने 6 लाख रुपए का भुगतान किया, जिसके बाद रोक हटा दी गई, जो उनके द्वारा वर्णित बातचीत के माध्यम से होने वाले समझौतों के एक पैटर्न को दर्शाती है।
रिपोर्टर : आपके ऊपर हुई है कोई बिल्डिंग?
जावेद : मेरे साथ तो बहुत बड़ा कांड हुआ है…।
रिपोर्टर : आपने कितने खिलाए थे?
जावेद : मैंने 6 लाख खिलाए, 17 लाख मांगे थे।
रिपोर्टर : मतलब, 17 लाख की डिमांड थी, 6 लाख खिलाए?
जावेद : हां।
रिपोर्टर : उसके बाद स्टे हट गया?
जावेद : हट गया।

जावेद ने आगे आरोप लगाया कि चूंकि बाटला हाउस एक अनधिकृत क्षेत्र है और बिल्डरों को अनुमत ऊंचाई सीमा से अधिक निर्माण करने की अनुमति नहीं है। इसलिए तथाकथित स्टे माफिया बिल्डरों को ब्लैकमेल करने के लिए इस कमजोरी का फायदा उठाते हैं। उनके अनुसार, पैसे लेने के बाद भी पुलिस अधिकारी कभी-कभी बिल्डरों को निर्माण रोकने के लिए कहते हैं, जिससे उनके पास बात मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। उनका यह भी मानना है कि ऐसे मामले कभी-कभी व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित होते हैं।
रिपोर्टर : और वैसे भी ये एरिया अन-ऑथोराइज्ड है, बना नहीं सकते आप। इसलिए बिल्डर भी कमजोर हो जाता है।
जावेद : जी, जी…, पुलिस भी कमजोर रहती है, फिर मजबूरी में करना पड़ता है। एसएचओ पैसा खाने के बाद भी कहता है- ‘रुक जाओ…।’
रिपोर्टर : ये सारे बिल्डर के साथ होता है?
जावेद : जिसकी जिससे दुश्मनी हो, सबके साथ नहीं होता…।

जावेद के बाद तहलका की मुलाकात आदिल (बदला हुआ नाम) नामक एक अधिकारी से हुई, जो दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) में इंजीनियर हैं और बाटला हाउस इलाके में रहते हैं। दिल्ली में अनधिकृत निर्माण से संबंधित मामलों में एमसीडी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आदिल के अनुसार, स्टे के मामलों में दीवानी मुकदमे होते हैं, जो अदालतों में वर्षों तक चल सकते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि स्टे की मांग करने वाले लोग बार-बार स्टे लेकर जानबूझकर कार्यवाही को लंबा खींचते हैं, जिससे उन बिल्डरों को निराशा होती है, जिनकी परियोजनाएं रुक जाती हैं। उनके अनुसार, कई बिल्डर अंततः समझौते के लिए सहमत हो जाते हैं और कथित तौर पर स्टे हटाने के लिए पैसे का भुगतान करते हैं। आदिल ने आगे दावा किया कि कुछ मामलों में 10-15 लाख रुपए का भुगतान करने के बाद स्टे ऑर्डर हटा दिया जाता है।
रिपोर्टर : काम रुक गया, स्टे आ गया? …उसके बंद क्या होता है?
आदिल : उसके बाद स्टे चलेगा। 99.99 पर्सेंट ये हारेंगे। बट टाइम कितना लगेगा, ये आप जानते हो या वो जानते हैं।
रिपोर्टर : 20 साल लगेंगे?
आदिल : भाई, सिविल शूट है। मेरी सेटिंग हो जाए कोर्ट में, मैं जाऊंगा अहमद के पास- ये ले भाई 5000 रुपए. वैसे तो बड़ी रकम होगी। मैं कहूंगा ये 5000 रुपए ले ले, 6 महीने बाद की डेट लगा दे…। अब ये 6 महीना किराया भी देंगे। वेट भी करेंगे। ये बोलेंगे- ‘भाई, सेटलमेंट करा दो, मेरी जान छुड़वा दो।’
रिपोर्टर : सेटलमेंट कैसे होता है?
आदिल : सेटलमेंट ऐसे होता कि ये अपने पैसे लेंगे।
आदिल (आगे) : मैंने 10 लाख आपने ले लिए।
रिपोर्टर : 10-15 लाख देकर स्टे हटा दिया?
आदिल : इनका वकील रिट अप्लाई कर देगा, स्टे खत्म हो जाएगा। अब दोबारा कंन्स्ट्रक्शन चालू करेंगे।
रिपोर्टर : उसमें एमसीडी का क्या रोल होता है?
आदिल : एमसीडी का ये रोल होता है कि जिस टाइम पर हमें पार्टी बनाते हैं ना ये लोग- ‘अनाथोराइज्ड बन रहा है, रोक दो।’
रिपोर्टर : ये आपको लिखकर देना होता है?
आदिल : हम तो देंगे।

आदिल के बाद तहलका रिपोर्टर की मुलाकात बाटला हाउस के निवासी सलीम (बदला हुआ नाम) से हुई, जिन्होंने दावा किया कि उन्होंने अपने घर के निर्माण के दौरान पुलिसकर्मियों को रिश्वत दी थी। सलीम के अनुसार, इस तरह के भुगतान दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों में निर्माण गतिविधि का एक नियमित हिस्सा हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि हर छत की पटिया के निर्माण तक के लिए पैसे दिए जाते हैं। सौदे के अनुसार यह राशि अलग-अलग होती है। सलीम ने दावा किया कि उसने छः मंजिला इमारत के निर्माण के दौरान पुलिस को लगभग 2-2.5 लाख रुपए का भुगतान किया था।
रिपोर्टर : आपने कितने पैसे दिए पुलिस को?
सलीम : पुलिस को मैंने 2-2.5 लाख दिए हैं बस।
रिपोर्टर : वो किस बात के?
सलीम : बिल्डिंग बन रही है।
रिपोर्टर : ये जो आपका घर बन रहा है, इसी में दिए हैं?
सलीम : हम्म।
रिपोर्टर : पूरी बिल्डिंग तुड़वा कर बनवा रहे हो तुम?
सलीम : नहीं, सिर्फ ग्राउंड फ्लोर बना हुआ था उसमें।
रिपोर्टर : पूरी बिल्डिंग बनवा रहे हो?
सलीम : हां, 6 फ्लोर बन रही है।
रिपोर्टर : तो आपको स्टे नहीं आया?
सलीम : हर किसी को थोड़ी आता है स्टे।
रिपोर्टर : 2 लाख तो फिर भी दे दिए आपने?
सलीम : पुलिस वालों को तो लाना ही लाना है…।
रिपोर्टर : 2 लाख किस चीज के दिए तुमने?
सलीम : अलग-अलग।
रिपोर्टर : लेंटर फिक्स होता है- 50 हजार, 60 हजार, 70 हजार। जैसा आपका सौदा फिक्स हो जाए?
सलीम : 2-2.5 लाख।
रिपोर्टर : सस्ते में निपट गए तुम तो?
सलीम : जब लेंटर पड़ता है तो हजार रुपए पीसीआर वाला भी ले जाता है।
रिपोर्टर : रजिस्ट्री तो नहीं है, अन-ऑथोराइज्ड  हो पूरा?
सलीम : पूरा जामिया ही अन-ऑथोराइज्ड है…।
सलीम (आगे) : जिस जगह हम तुम बैठे हैं, वहां फ्लैट्स की कीमत 2 करोड़ तक पहुंच गई है।
रिपोर्टर : बिना रजिस्ट्री के?
सलीम : बिना रजिस्ट्री के।
रिपोर्टर :अन-ऑथोराइज्ड?
सलीम : अन-ऑथोराइज्ड ।

अगस्त 2025 में प्रकाशित लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि न्यायिक प्रक्रिया को राष्ट्रीय राजधानी में अनधिकृत निर्माण में शामिल लोगों से पैसे वसूलने का एक उपकरण बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। ‘यद्यपि यह न्यायालय इस तथ्य को स्वीकार करता है कि अनधिकृत निर्माण के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन साथ ही इस न्यायालय का उपयोग ऐसे निर्माण करने वाले व्यक्तियों से धन की उगाही करने के उपकरण के रूप में नहीं किया जा सकता है।’ न्यायालय ने टिप्पणी की।
तहलका की पड़ताल ने ठीक यही बात उजागर की है कि कैसे अदालती प्रक्रियाओं का कथित तौर पर दुरुपयोग करके बाटला हाउस में अनधिकृत निर्माण में शामिल लोगों से पैसे वसूले जा रहे हैं। तथाकथित स्टे माफिया का मकसद किसी जनहित की सेवा करना नहीं है, बल्कि बिल्डरों पर पैसा वसूलने के लिए दबाव डालना है। अदालत को मुकदमे के पीछे के असली इरादे की जानकारी दिए बिना ये लोग ऐसा करते हैं। बटला हाउस एक अनधिकृत कॉलोनी होने के कारण इस तरह की गतिविधियों के लिए उपजाऊ जमीन तैयार कर चुका है, जहां अवैध निर्माण और कथित जबरन वसूली एक साथ फल-फूल रहे हैं।
इस पड़ताल में  निवासियों और बिल्डरों के अनुसार, पुलिसकर्मियों की कथित मिलीभगत का भी खुलासा हुआ, जो पैसे लेकर अवैध निर्माण को बेरोकटोक जारी रहने देते हैं। इससे प्रवर्तन और जवाबदेही की व्यापक विफलता सामने आती है, जहां उल्लंघन तब तक पनपते रहते हैं, जब तक कि वे जबरदस्ती और लाभ के अवसर नहीं बन जाते। यदि अधिकारियों ने प्रारंभिक चरण में ही अवैध निर्माण के खिलाफ दृढ़तापूर्वक और लगातार कार्रवाई की होती, तो शायद बुलडोजर की बहुत कम आवश्यकता होती, जो आज भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक विमर्श में सबसे अधिक ध्रुवीकरण करने वाले प्रतीकों में से एक उपाय बन गया है।