• कांग्रेसी राजकुमार की हैसियत से राहुल गांधी 2009 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंचे थे. वे उत्तर प्रदेश की एक दलित बस्ती का दौरा करके सीधे यहां आए थे. राहुल दलित बस्ती में तो बिना किसी तामझाम के गए, लेकिन जेएनयू में उनके साथ कड़ी सुरक्षा थी. इस पर बीबीसी ने लिखा था, ‘राहुल को जेएनयू के बुद्धिजीवियों से कोई खतरा तो नहीं था? वैसे नेताओं को जेएनयू में हमेशा खतरा रहता है लेकिन जान का नहीं, बल्कि सवालों का और उस खतरे से सामना राहुल का भी हुआ.’ राहुल को जेएनयू में काले झंडे दिखाए गए. ठीक वैसे ही जैसे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या उनसे बहुत पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दिखाए गए थे. राहुल बीच में भाषण छोड़कर मंच से नीचे आए और छात्रों से सवाल पूछने को कहा. छात्रों ने सवालों की झड़ी लगा दी. कॉरपोरेट को टैक्स में छूट, विदेश नीति, किसान आत्महत्या, गुटनिरपेक्षता, लैटिन अमेरिका पर भारत की नीति और कांग्रेस में मौजूद वंशवाद पर तीखे सवाल पूछे गए. यह संसद की समयबिताऊ बहस नहीं थी. यह हर दिन मार्क्स, एंगेल्स, गांधी, एडम स्मिथ और गॉलब्रेथ को पढ़ने वाले युवाओं के सवाल थे. राहुल गांधी छात्रों को माकूल जवाब देकर संतुष्ट नहीं कर पाए.
    यह जेएनयू की परंपरा है जहां से राजनीति और लोकतांत्रिक प्रतिरोध की एक स्वस्थ धारा निकलती है. देश और दुनिया भर से छात्र यहां पढ़ने आते हैं और कम से कम एशिया में उसे एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के तौर पर जाना जाता है. हालांकि, जेएनयू के बारे में तरह-तरह की भ्रांतियां और आरोप भी सामने आते रहे हैं. हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ‘पांचजन्य’ ने जेएनयू पर ‘दरार का गढ़’ शीर्षक से एक कवर स्टोरी प्रकाशित की, जिसमें आरोप लगाया गया, ‘जेएनयू को वामपंथियों का गढ़ कहा जाता है. भारतीय संस्कृति को तोड़-मरोड़कर गलत तथ्यों के साथ प्रस्तुत करना यहां आम बात है…यहां के लोग तमाम तरह की देशविरोधी बातों की वकालत करते हैं. यहां के ‘बुद्धि के हिमालयों’ को सिर्फ एक ही बात समझाई और घुट्टी में पिलाई जाती है कि कैसे भारतीय संस्कृति से द्रोह व द्वेष, भारतीय मूल्यों का विरोध, हिंदू विरोध, देश विरोधी कार्य, समाज विरोधी कार्य करना है.’ इसके अलावा पांचजन्य जेएनयू परिसर पर कुछ ऐसा आरोप लगाता है कि जैसे यहां पर देश तोड़ने वाले लोगों का कोई कैंप चलता हो.
    पांचजन्य के ये आरोप गंभीर हैं. उन पर जरूर गौर करना चाहिए. क्या जेएनयू में सिर्फ नक्सली समर्थक या देश तोड़ने वाले लोग पाए जाते हैं? वहां वामपंथ, दक्षिणपंथ, समाजवाद, गांधीवाद, अंबेडकरवाद आदि सभी धाराओं के मानने वाले लोग भी मौजूद हैं, क्या आरएसएस इन सबको नक्सली या समाज तोड़ने वाला मानता है? और अगर जेएनयू नक्सलियों और देशद्रोहियों का गढ़ है तो उसे क्यों न बंद कर दिया जाए?
    पांचजन्य में छपा लेख कहता है, ‘जेएनयू की नीति निर्माण इकाई में नव-वामपंथियों ने गहरी घुसपैठ की है और इसका परिणाम यह हुआ कि यहां की पाठ्य सामग्री में उनका पूरा हस्तक्षेप हो गया. इतना ही नहीं यहां मानवाधिकार, महिला अधिकार, पांथिक स्वतंत्रता, भेदभाव एवं अपवर्जन, लैंगिक न्याय एवं सेक्युलरिज्म से ओतप्रोत पाठ्यक्रमों को बढ़ावा दिया गया. साथ ही यहां एक षडयंत्र के तहत भेदभाव एवं अपवर्जन अध्ययन केंद्र, पूर्वोत्तर अध्ययन केंद्र, अल्पसंख्यक एवं मानवजातीय समुदायों और सीमांत क्षेत्रों का अध्ययन केंद्र सहित और भी कई अध्ययन केंद्रों की स्थापना की गई. लेकिन इनमें नव वामपंथी छात्र एवं छद्म ईसाई मिशनरियों से ओतप्रोत शिक्षकों को भर दिया गया. इन तमाम चीजों ने जेएनयू से शिक्षित पीढ़ी को वैचारिक रूप से भ्रष्ट बना दिया.’ इस लेख के मुताबिक, जेएनयू के छात्र और शिक्षक दोनों ही मिलकर ‘देश और समाज’ को तोड़ रहे हैं.
    यह सोचने की बात है कि क्या मानवाधिकार, महिला अधिकार, पांथिक स्वतंत्रता, भेदभाव एवं अपवर्जन, लैंगिक न्याय एवं सेक्युलरिज्म जैसे मूल्यों का अध्ययन करने पर पीढ़ियां भ्रष्ट हो जाती हैं? क्या मानवाधिकारों का उल्लंघन, महिला उत्पीड़न, भेदभाव, लैंगिक अन्याय और सांप्रदायिकता से राष्ट्र मजबूत होता है? इन आधुनिक मूल्यों के प्रति युवाओं में जागरूकता फैलाना राष्ट्र को तोड़ना है या इनका विरोध करना राष्ट्र को तोड़ना है? उक्त सभी मूल्यों का विरोध करना क्या राष्ट्र को मध्ययुग में ले जाने का प्रयास करना नहीं है?
    जेएनयू के प्रोफेसर मणींद्र ठाकुर इन आरोपों के जवाब में कहते हैं, ‘यह बेवकूफी भरे आरोप हैं. किसी जमाने में जेएनयू काफी रेडिकल हुआ करता था, आज तो वह वैसा भी नहीं रहा. ये जरूर है कि 60-70 प्रतिशत छात्र पिछड़े तबके से आते हैं. वे देखते हैं कि यह व्यवस्था अमीरों के लिए ज्यादा है. पूरा भारतीय गणराज्य कॉरपोरेट के लिए खोल दिया गया है. वे वामपंथ से प्रभावित होते हैं क्योंकि वह सबकी भागीदारी और सामाजिक न्याय की बात करता है. आप माओवादियों की लड़ाई के तरीके से मतभेद रख सकते हैं, लेकिन जिस गरीब जनता के लिए न्याय की लड़ाई की बात की जाती है, उससे इत्तेफाक रखने में क्या बुराई है? यह सही है कि कुछ लोगों को नक्सल आंदोलन से सहानुभूति है, लेकिन इन छात्रों को नक्सली कहना ज्यादती है. कॉरपोरेट व्यवस्था पर सवाल करना देशद्रोह कैसे हो गया? कॉरपोरेट हमारे लिए राष्ट्र कैसे हो सकता है? यह भाजपा, संघ और सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों की निजी दिक्कत है.’
    जेएनयू की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद पांचजन्य के इस हमले को एक राजनीतिक हमले के रूप में देखती हैं. वे कहती हैं, ‘जेएनयू छात्रसंघ नॉन नेट फेलोशिप खत्म करने और शिक्षा के निजीकरण के विरोध में प्रदर्शन की अगुआई कर रहा है. विश्वविद्यालय में दक्षिणपंथ से प्रभावित कोर्स लागू करने के प्रयासों का विरोध किया गया. जेएनयू के छात्रों और शिक्षकों ने लेखकों, वैज्ञानिकों और कलाकारों के उस आंदोलन का समर्थन किया जो सांप्रदायिकता के खिलाफ और बोलने की आजादी के पक्ष में चलाया जा रहा है. आरएसएस के मुखपत्र का यह हमला इन्हीं राजनीतिक संदर्भों में देखना चाहिए. जेएनयू हमेशा ही प्रचलित स्थापनाओं के खिलाफ और प्रगतिशीलता के समर्थन में रहा है. यहां के अध्यापक और छात्र हमेशा राजनीतिक स्टैंड लेते हैं और सत्ताधारी वर्ग के शोषण के खिलाफ आवाज उठाते हैं.’
    जेएनयू वह कैंपस है, जहां पर 1975 में आपातकाल का पुरजोर विरोध किया गया था. यहां के छात्रों ने 1984 में सिख विरोधी दंगों का विरोध किया तो बाबरी ध्वंस और गुजरात दंगे का भी यहां विरोध हुआ. मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के अलावा प्रणब मुखर्जी भी जब जेएनयू आए तो उन्हें तीखे सवालों का सामना करना पड़ा. नवउदारवादी नीतियों का सबसे मुखर विरोध जेएनयू कैंपस में ही होता है. मुजफ्फरनगर दंगों का भी जेएनयू के छात्रों ने विरोध किया. हाल ही में मुजफ्फरनगर दंगे पर बनी डाक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग पुलिस ने रोकने की कोशिश की, लेकिन जेएनयू के छात्रों ने उसकी स्क्रीनिंग करवाई.
    जेएनयू में एबीवीपी के प्रेसीडेंट रह चुके डॉ. मनीष कुमार का कहना है, ‘यह पहली बार नहीं है कि जेएनयू के बारे में ‘पांचजन्य’ और ‘ऑर्गनाइजर’ में ऐसी बातें लिखी गई हैं. 2013 में भी ऑर्गनाइजर लिख चुका है कि जेएनयू नक्सलवाद का बुद्धिजीवी मुखौटा है. किसी ने उसे महत्व नहीं दिया. लेकिन इस बार पांचजन्य के लेख को असहिष्णुता आंदोलन से जोड़ दिया गया. जेएनयू के विद्यार्थी हर विचारधारा से जुड़े हैं. यहां आरएसएस की विद्यार्थी परिषद भी चुनाव लड़ती है. इस बार भी उनकी एक सीट आई है. यहां की फैकल्टी में जरूर संघ की विचारधारा वालों के लिए निषेध है. लेकिन जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा कहना अर्धसत्य है. यह एक वैचारिक दृष्टिकोण हो सकता है. ठीक उसी तरह जिस तरह भाजपा-संघ को वामपंथी फासिस्ट और न जाने क्या क्या कहते हैं. दोनों ही एक दूसरे को नीचा दिखाने में किसी से कम नहीं हैं.’
    यहां के छात्रों और शिक्षकों पर नक्सलवादियों और अलगाववादियों से सहानुभूति रखने का आरोप मनीष कुमार भी लगाते हैं लेकिन वे कहते हैं, ‘विचारधारा चुनने की स्वतंत्रता होनी ही चाहिए. नक्सलवाद एक समस्या है. जो लोग इसे एक सामाजिक-आर्थिक समस्या मानते हैं उनके लिए ये छात्र देशभक्त हैं और जो लोग नक्सलवाद को देशद्रोह मानते हैं वो इन्हें देशद्रोही कहने के लिए स्वतंत्र हैं. लोगों को भारत में विचारधारा चुनने की आजादी है. विश्वविद्यालय के छात्र वैचारिक आदर्शवाद का आनंद नहीं लेंगे तो कौन लेगा? जेएनयू के ज्यादातर वामपंथी छात्र भी पढ़ाई के बाद प्रशासन और अन्य क्षेत्रों में जाते हैं या फिर यूरोप-अमेरिका जाकर जेएनयू का नाम रोशन करते हैं. इसलिए जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा कहना उचित नहीं है.’
    जेएनयू के कुलपति सुधीर कुमार सोपोरी से एक बार एक साक्षात्कार में पूछा गया कि जेएनयू में खास क्या है? उनका जवाब था, ‘यहां का माहौल और खुली सोच इस विश्वविद्यालय की ताकत है. आपको कहने और सुनने की क्षमता मिलती है. यहां के शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच एक संबंध है. कई छोटी जगहों और पिछड़े तबके के छात्रों से मिलना बहुत भावुकता भरा होता है. कई छात्र कहते हैं कि जेएनयू नहीं होता तो हम पढ़ नहीं पाते. अगर शांति भंग न हो तो यहां आपको जो विचार-विमर्श करना है कीजिए. हमें कोई समस्या नहीं. हमें विभिन्न अनुशासनों की दीवारें तोड़नी होंगी, तभी नई धारणाएं सामने आएंगी और नई अकादमिक लहर बनेगी.’
    जेएनयू के बारे में वहां के छात्रों या शिक्षकों से अलग तमाम लोग ऐसे हैं जो वहां की आबो-हवा से बहुत प्रभावित रहते हैं और सिर्फ बहस-मुबाहसों का आनंद लेने के लिए वहां आते-जाते रहते हैं. जेएनयू पर दक्षिणपंथी हमले के बरअक्स साहित्यकार अशोक कुमार पांडेय कहते हैं, ‘जेएनयू एक आधुनिक और लोकतांत्रिक शैक्षणिक माहौल के सृजन का प्रतीक है. देश के बाकी सभी विश्वविद्यालयों से इतर यहां सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक चेतना को विकसित करने का जो प्रयास लगातार किया गया है उसका परिणाम है कि इस विश्वविद्यालय ने न केवल ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में मौलिक तथा जनपक्षधर योगदान दिया है बल्कि करियरिज्म से ग्रस्त हमारी शिक्षा व्यवस्था के समक्ष एक समावेशी तथा लोकतांत्रिक मॉडल भी विकसित किया है. जेएनयू का छात्र सही मामले में वैश्विक चेतना से लैस होता है तथा देश-दुनिया के उन सभी मामलों में हस्तक्षेप की कोशिश करता है जो सत्ता और नागरिकों के द्वंद्व से उपजते हैं. धर्मनिरपेक्षता, जाति और लैंगिक समानता का संवैधानिक मूल्य यहां की शिक्षा व्यवस्था में ही नहीं बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार में भी गहरे समाए हुए हैं. यही वजह है कि संविधान विरोधी, कट्टरपंथी, पुरोगामी और असहिष्णु शक्तियों को जेएनयू से हमेशा ही समस्या रही है. उनके विनाशकारी मंसूबों के खिलाफ यह विश्वविद्यालय हमेशा एक चुनौती प्रस्तुत करता रहा है. शिक्षा के निजीकरण से लेकर जल, जंगल और जमीन की लूट के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाला संस्थान उन्हें कैसे पच सकता है? यह राष्ट्र का नहीं, बल्कि उस हिंदू राष्ट्र का विरोधी संस्थान है जिसमें संविधान के नाम पर मनुस्मृति लागू करने की घृणित मंशा छिपी हुई है.’
    इस साल सत्र की शुरुआत में भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का नाम बदल कर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम पर रखने की मांग की थी. इसी दौरान भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का कहना था कि जेएनयू नक्सलियों, जेहादियों और राष्ट्र विरोधियों का अड्डा बन गया है. उन्हें यहां का उप-कुलपति बनाने की चर्चा चली तो उन्होंने कहा कि पहले जेएनयू कैंपस में एंटी नॉरकोटिक्स ब्यूरो और सीआईएसएफ कैंप लगाया जाना चाहिए. जेएनयू के पूर्व छात्र सुयश सुप्रभ कहते हैं, ‘हाल के वर्षों में जेएनयू में संघ का प्रभाव बढ़ा है. लेकिन उनकी राजनीति का तरीका अलग है. वे उपद्रव और आतंक के सहारे लोगों को भड़काने की राजनीति करते हैं. जेएनयू की परंपरा में बहुत सी चीजें कमजोर हुई हैं. लिंगदोह कमेटी के सहारे छात्र राजनीति को लगातार कमजोर किया जा रहा है. वे समाज का जैसा ढांचा चाहते हैं, उसी के अनुरूप राजनीति भी चाहते हैं. हम सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की बात करते हैं तो इससे उन्हें परेशानी होती है.’
    भाजपा और संघ के जेएनयू विरोध पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के शोधार्थी आशीष मिश्र कहते हैं, ‘भाजपा सोच-विचार की हर संभावना को नष्ट करते हुए नागरिक को मात्र भीड़ बना देना चाहती है. इस प्रक्रिया में सबसे बड़े प्रतिरोधी हैं सोचने-समझने व तर्क करने वाले लोग. जो लोग अपने ही देश के मानक विश्वविद्यालय पर इस तरह की बातें कह रहे हैं उनके बारे में क्या कहा जा सकता है! जिस पवित्र स्थान पर पैर रखने से बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी डरते हैं, मूर्ख वहां धड़धड़ा के घुस जाता है.’
    जेएनयू में ही शोधछात्र और वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल इस विरोध के पीछे सवर्ण वर्चस्व की मानसिकता को रेखांकित करते हैं. वे कहते हैं, ‘जेएनयू का विरोध तमाम तरह से होता रहा है. लेकिन इस बार एक सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से संगठित ढंग से यह हमला हुआ है, जो अपने आप में एक संदेश है. जेएनयू में रेडिकलिज्म पहले भी था, उससे उन्हें दिक्कत नहीं थी. अब इसमें सामाजिक विविधता भी जुड़ गई है. यह दोनों बातें एक साथ होना सत्ता प्रतिष्ठान को पसंद नहीं है. 2011 में पूरी तरह से आरक्षण लागू होने के बाद यहां पर लड़कियों और दलितों-पिछड़ों की भागीदारी खूब बढ़ गई है. वैसे भी दलित संगठनों का सामना करना दक्षिणपंथी संगठनों के लिए मुश्किल होता है क्योंकि वे सामाजिक न्याय का मसला उठाते हैं. इसकी जगह कोई मुस्लिम संगठन हो तो उनके लिए यह आसान हो जाता है. महिलाओं व दलितों की ज्यादा संख्या और रेडिकलिज्म का एक साथ होना उन्हें चुभता है, जबकि यह दोनों चीजें अलग-अलग और भी जगह हैं, लेकिन वहां पर विरोध नहीं होता.’
    जेएनयू पर एक आरोप यह भी लगता है कि यह भारतीय मूल्यों को नष्ट करने पर तुला है और यहां पढ़ने वाली लड़कियां स्वच्छंद होती हैं, या फिर उनको सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों को तोड़ना सिखाया जाता है. उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से आकर यहां एमए कर रहीं अदिति मिश्रा किसी पार्टी या संगठन से जुड़ी नहीं हैं. वे कहती हैं, ‘एक लड़की के रूप में मुझे जेएनयू के कैंपस में जितनी आजादी मिली, उतनी और कहीं नहीं मिली. जेएनयू ही एक ऐसी जगह है, जहां पर कभी मुझे डर नहीं लगा. दिल्ली की सड़कों पर शाम सात-आठ बजे डर लगता है, लेकिन जेएनयू में रात के दो बजे भी डरने की जरूरत नहीं होती. मैं यहां पर आराम से रह सकती हूं, पढ़ती हूं, तो क्या मैं नक्सली या आतंकी हूं? जो आरोप लगा रहे हैं, उन्हें अपनी विचारधारा पर पुनर्विचार करना चाहिए कि लोग उन्हें क्यों नापसंद करते हैं.’
    आरएसएस के सपनों के भारत में परंपराओं के साथ-साथ सामाजिक बुराइयों का बड़ा मजबूत स्थान है. वे खुले तौर पर दलितों और महिलाओं के पक्ष को खारिज तो नहीं कर पाते, लेकिन मनुस्मृति पर आधारित शोषणकारी वर्ण व्यवस्था और गैर-लोकतांत्रिक पारिवारिक मूल्यों को भी बनाए रखना चाहते हैं. इसीलिए दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श से आरएसएस के लोग खासे असहज हो जाते हैं. पत्रकार अरविंद शेष कहते हैं, ‘आरएसएस जिस समाज की कल्पना करता है, वह जेएनयू जैसे परिसर में बहुत ठोस तरीके से ध्वस्त हो जाती है. यहां की वैचारिकी का पूरे देश में एक खास असर है. संघ का आरोप उनकी जेएनयू जैसे बौद्धिक परिसर के बरअक्स खड़ा होने की कोशिश है कि हम आरोप लगाएं और वहां के लोग हमसे बहस करें. वे अपने राजनीतिक विरोधियों को ही राष्ट्रद्रोही कहते हैं. जो इनके वैचारिक सामाजिक खांचे में फिट न बैठे, वह इनके लिए देशद्रोही हो जाता है.’
    यह भी एक तथ्य है कि देश भर के विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति को कमजोर किया गया है. जर्मनी के मीडिया संस्थान डायचे वेले में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार उज्ज्वल भट्टाचार्य ने बताया, ‘बीएचयू कैंपस में छात्रों का राजनीतिक विमर्श में भाग लेने व संगठन बनाने का अधिकार छीन लिया गया है. हम सबको याद है कि किस तरह छात्र संघ व शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार को छात्रों के साथ बातचीत करने से रोक दिया गया था. लेकिन आरएसएस की गतिविधियां जारी हैं. परिसर में अन्य छात्र संगठनों की गतिविधियां तो प्रतिबंधित हैं, लेकिन एबीवीपी खुलेआम काम कर रही है. विश्वविद्यालय परिसरों का अराजनीतिकरण किया जा रहा है. इसकी एक वजह यह भी है कि शिक्षा के क्षेत्र को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के लिए खोला जाना है. विरोध और विमर्श की संस्कृति उसमें बाधा बन सकती है. पूरे देश में शैक्षणिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श के मंच के रूप में विश्वविद्यालयों की भूमिका को खत्म किया जा रहा है.’ अब सवाल उठता है कि क्या जेएनयू पर हमला इसी योजना की कड़ी है?
    जेएनयू छात्रसंघ में इस बार एबीवीपी के एक प्रत्याशी सौरभ शर्मा को भी ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर जीत हासिल हुई थी. उन्होंने कहा, ‘मैं पांचजन्य के आरोप से सहमत हूं. सब लोग यहां ऐसे नहीं हैं, लेकिन कुछ लोग हैं जो नक्सलवाद और देशद्रोही गतिविधियों के समर्थक हैं. जब दंतेवाड़ा में सुरक्षा बलों पर नक्सली हमला हुआ तो यहां पर खुशियां मनाई गईं. याकूब मेमन की फांसी पर उन्हें शहीद बताया गया और अब्दुल कलाम की मृत्यु पर उन्हें भला बुरा कहा गया. यहां के वामपंथी खास विचार की तरफ लोगों का ध्रुवीकरण करते हैं. वे महिषासुर दिवस मनाते हैं. आप रावण या महिषासुर की पूजा कीजिए, लेकिन वे लोग हिंदू देवी देवताओं को गालियां देते हैं. वामपंथी संगठन लोकतंत्र की बात करते हैं लेकिन जैसा स्पेस अपने लिए चाहते हैं, वैसा सबको क्यों नहीं देना चाहते? वे भारतीय संस्कृति का विरोध क्यों करते हैं? हम भी सबके लिए स्वतंत्रता चाहते हैं, लेकिन वे लोग जिस स्वतंत्रता की बात करते हैं, वह देश तोड़ने वाली है.’
    जेएनयू की छात्रा रह चुकीं साहित्यकार सुमन केशरी कहती हैं, ‘जेएनयू इस देश में एकमात्र ऐसा कैंपस है जहां पर लड़कियां सुरक्षित हैं. जेएनयू सही अर्थों में विश्वविद्यालय है जो विश्वदृष्टि देता है. वहां छात्रों में एक लोकतांत्रिक और समतामूलक दृष्टि विकसित होती है. वहां पढ़ने वाली लड़कियां सही अर्थों में अपने को मनुष्य मानती हैं, क्योंकि उनकी बहुत लोकतांत्रिक और चेतनासंपन्न ट्रेनिंग होती है. जेएनयू में ऐसा खुला वातावरण है कि वे अन्याय के खिलाफ खड़ी हो पाती हैं. अब इस बात से जिन्हें लगता है कि संस्कृति टूट जाएगी, यह उनकी और संस्कृति की समस्या है. किसी परिवार में अगर हर सदस्य लोकतांत्रिक और स्वतंत्रचेत्ता सोच का हो, तो इससे तो परिवार और मजबूत व लोकतांत्रिक होंगे. बाकी कैंपसों में जेएनयू जैसा खुलापन और वैचारिक माहौल क्याें नहीं है.’
    गुजरात विश्वविद्यालय में पीएचडी के छात्र अर्श संतोष लिखते हैं, ‘विश्वविद्यालयी शिक्षा और शोध के हवाले से विश्व-स्तर पर जो थोड़ी-बहुत पहचान भारत की बनी थी वह जेएनयू के कारण ही थी. इसीलिए आरएसएस खेमे को वह देशद्रोहियों का अड्डा लगता है. हालांकि सच यह है कि केवल जेएनयू ही नहीं, हर वह विश्वविद्यालय जहां दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी छात्र पढ़ते हैं, वह इन्हें देशद्रोहियों का ही अड्डा लगता है. इन्हें वैज्ञानिक, तर्क आधारित शिक्षा ही राष्ट्रद्रोही लगती है. पढ़ाई-लिखाई का माहौल देखकर ही इन्हें परेशानी होने लगती है.’