एम. रियाज हाशमी

नई दिल्ली। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और उसके बाद बने सियासी हालात को विपक्ष सिर्फ एक व्यक्ति की केंद्रीय मंत्रिमंडल से विदाई तक सीमित नहीं रखना चाहता। खासतौर पर कांग्रेस की कोशिश इसे ‘शिक्षा व्यवस्था बनाम युवाओं के भविष्य’ की राष्ट्रीय बहस में बदलने की है। पार्टी के हालिया राजनीतिक कदमों और नेताओं के बयानों के संकेत साफ हैं कि आगे लड़ाई केवल पेपर लीक या परीक्षा अनियमितताओं तक सीमित नहीं रहेगी। इसे महंगी शिक्षा, बेरोजगारी, निजीकरण और शिक्षा ऋण जैसे मुद्दों से जोड़कर एक व्यापक राजनीतिक अभियान का रूप दिया जा रहा है। इस रणनीति के केंद्र में देश का लगभग ₹1.37 लाख करोड़ का एजुकेशन लोन पोर्टफोलियो है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में शिक्षा ऋण का एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट/ गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) अनुपात 2024-25 में घटकर करीब 2 प्रतिशत रह गया है। दूसरी ओर, संसद में सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक 2014 से 30 सितंबर 2025 तक लगभग ₹9.87 लाख करोड़ के कॉरपोरेट ऋण राइट-ऑफ किए गए। विपक्ष इन्हें राजनीतिक रूप से ‘कॉरपोरेट लोन माफी’ कहकर सरकार को घेरता रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि राइट-ऑफ का अर्थ ऋण माफी नहीं होता।
लेकिन कांग्रेस की नजर केवल इन आंकड़ों पर नहीं है। पार्टी की रणनीति उस राजनीतिक संदेश पर केंद्रित है, जो इन दोनों संख्याओं की तुलना से निकलता है। पेपर लीक का मुद्दा मुख्यतः प्रतियोगी परीक्षा देने वाले युवाओं तक सीमित था, जबकि एजुकेशन लोन का सवाल मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, निजी विश्वविद्यालयों और प्रोफेशनल कोर्स कर रहे लाखों छात्रों और उनके परिवारों से जुड़ता है। यानी कांग्रेस अब अपने ‘युवा अभियान’ का सामाजिक और राजनीतिक दायरा बढ़ाने की कोशिश करती दिखाई दे सकती है। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर कांग्रेस यह सवाल खड़ा कर रही है कि यदि बैंकिंग व्यवस्था बड़े कॉरपोरेट खातों के राइट-ऑफ का बोझ उठा सकती है तो उच्च शिक्षा के लिए कर्ज लेने वाले लाखों छात्रों को राहत देने पर राष्ट्रीय बहस क्यों नहीं हो सकती? हालांकि तथ्यात्मक रूप से ‘राइट-ऑफ’ और ‘ऋण माफी’ अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। राइट-ऑफ का अर्थ कर्ज माफ करना नहीं होता, बल्कि बैंक खराब ऋण को अपनी बैलेंस शीट से हटाते हैं और उसके बाद भी वसूली जारी रहती है। इसके बावजूद राजनीतिक विमर्श में यही तुलना सबसे प्रभावशाली हथियार बन सकती है।
शिक्षा और युवाओं के मुद्दे को लेकर कांग्रेस की यह रणनीति अचानक नहीं बनी है। पिछले महीने राहुल गांधी ने ‘छात्रों की गूंज’ अभियान शुरू किया। इसकी शुरुआत राजस्थान के कोटा से हुई, जिसके बाद उत्तराखंड के देहरादून में भी छात्रों और प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों के साथ संवाद आयोजित किया गया। अभियान का घोषित उद्देश्य पेपर लीक, परीक्षा अनियमितताओं, बढ़ती फीस, महंगी शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना था। देहरादून कार्यक्रम से पहले राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा था, “भारत की शिक्षा व्यवस्था अब एक बेईमान वसूली तंत्र बन चुकी है… अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था में क्रांति लाई जाए।” राजनीतिक दृष्टि से देखें तो कोटा और देहरादून के कार्यक्रम केवल छात्र संवाद नहीं थे। कांग्रेस ने पहली बार व्यवस्थित ढंग से शिक्षा को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाने की कोशिश की। पहले पेपर लीक, फिर महंगी शिक्षा और अब शिक्षा ऋण- ये तीनों मुद्दे अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही राजनीतिक श्रृंखला के हिस्से दिखाई देते हैं। यही वजह है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद पार्टी इस बहस को और व्यापक बनाने की कोशिश कर रही है।
अब कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इस अभियान को नया आयाम दिया है। उनका कहना है कि अब शिक्षा केवल सामाजिक अधिकार नहीं, बल्कि आर्थिक बोझ बनती जा रही है। आज गरीब आदमी मजदूरी करके अपने बच्चे को पढ़ाता है। जैसे-तैसे उसे उच्च शिक्षा तक पहुंचाता है। लेकिन शिक्षा संस्थानों की फीस इतनी बढ़ गई है कि उसकी पहुंच से बाहर हो गई है। मजबूर होकर उसे एजुकेशन लोन लेना पड़ता है। फिर पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी नहीं मिलती। ईएमआई का बोझ अलग पड़ता है और पूरा परिवार आर्थिक संकट में आ जाता है। इमरान मसूद कहते हैं, “मैंने सरकार से पूछा है कि पिछले दस वर्षों में कितने छात्रों ने एजुकेशन लोन लिया और उनमें से कितने उसे चुका नहीं पाए? कितने खाते एनपीए हो गए? अगर सरकार सचमुच युवाओं को राहत देना चाहती है तो सबसे पहला फैसला एजुकेशन लोन माफ करने का होना चाहिए। जब आप उद्योगपतियों के 16 लाख करोड़ रुपये माफ कर सकते हैं तो देश के छात्रों के शिक्षा ऋण क्यों नहीं माफ कर सकते? क्या देश के संसाधनों पर युवाओं का अधिकार नहीं है?”
वह आगे कहते हैं, “कांग्रेस और भाजपा की सोच में बुनियादी फर्क है। कांग्रेस ने शिक्षा संस्थान इसलिए बनाए थे कि गरीब का बच्चा भी सस्ती शिक्षा हासिल कर सके। हमने शिक्षा का व्यावसायीकरण नहीं किया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जो सार्वजनिक उपक्रम स्थापित किए थे, उनका उद्देश्य रोजगार पैदा करना था, मुनाफा कमाना नहीं। उसी ब्लूप्रिंट पर देश खड़ा हुआ। लेकिन आज जितने लाभ में चलने वाले सार्वजनिक उपक्रम थे, उन्हें बेच दिया गया। जब सब कुछ निजी हाथों में जाएगा तो उनकी प्राथमिकता रोजगार नहीं, मुनाफा होगी। इसका असर युवाओं पर पड़ना स्वाभाविक है।”
इमरान मसूद का यह बयान केवल शिक्षा ऋण माफी की मांग नहीं है। दरअसल कांग्रेस पहली बार शिक्षा ऋण को उसी राजनीतिक फ्रेम में रखने की कोशिश कर रही है, जिसमें पहले किसानों की कर्ज माफी या कॉरपोरेट राइट-ऑफ पर बहस होती रही है। यदि पार्टी इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में सफल रहती है तो इससे शहरी मध्यवर्ग, प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थी, निजी विश्वविद्यालयों के छात्र और उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे करोड़ों युवाओं तक उसकी राजनीतिक पहुंच बढ़ सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अब केवल पेपर लीक को मुद्दा बनाकर नहीं चलना चाहती। पिछले दो वर्षों में पार्टी ने युवाओं से जुड़े मुद्दों को चरणबद्ध तरीके से उठाया है- पहले अग्निवीर, फिर पेपर लीक, उसके बाद बेरोजगारी और अब शिक्षा ऋण। इन सभी मुद्दों की एक समान विशेषता है कि ये सीधे 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग को प्रभावित करते हैं, जो देश का सबसे बड़ा मतदाता समूह भी है। यही वजह है कि राहुल गांधी ने पहले छात्रों के बीच जाकर संवाद शुरू किया और अब इमरान मसूद जैसे नेता शिक्षा ऋण को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसे संयोग नहीं, बल्कि कांग्रेस की दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है
यदि आने वाले महीनों में कांग्रेस शिक्षा ऋण, बढ़ती फीस, निजीकरण, सरकारी नौकरियों और पेपर लीक जैसे मुद्दों को एक साझा अभियान में बदलने में सफल रहती है, तो 2029 की राजनीति में पहली बार ‘युवा अर्थव्यवस्था’ (Youth Economy) एक स्वतंत्र चुनावी विमर्श के रूप में उभर सकती है। तब बहस केवल इस बात की नहीं होगी कि कितने पेपर लीक हुए, बल्कि इस सवाल पर भी होगी कि क्या उच्च शिक्षा हासिल करना अब आर्थिक रूप से केवल संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार बनता जा रहा है। यही वह राजनीतिक प्रश्न है, जिस पर कांग्रेस अपना नया नैरेटिव गढ़ती दिखाई दे रही है।
