पश्चिम बंगाल के लिए सुवेंदु अधिकारी का गुजरात मॉडल

गुजरात मॉडल का संबंध नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों से निकटता से जुड़ा है। इस दौरान उन्होंने पहले गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने ‘वाइब्रेंट गुजरात’ शिखर सम्मेलन की शुरुआत की थी। लेखक: जयंत घोषाल

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने गुजरात के दौरे के दौरान घोषणा की है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकास रणनीति का अनुसरण करेंगे और राज्य में औद्योगीकरण तथा आर्थिक विकास को गति देने के लिए गुजरात मॉडल अपनाएंगे।

गुजरात मॉडल का संबंध नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों से निकटता से जुड़ा है। इस दौरान उन्होंने पहले गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने ‘वाइब्रेंट गुजरात’ शिखर सम्मेलन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य निवेश आकर्षित करना और गुजरात को एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र के रूप में स्थापित करना था। मैंने स्वयं लगभग हर वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन में भाग लिया है और देखा है कि निवेश तथा औद्योगिक विकास पर निरंतर ध्यान देकर किसी राज्य की आर्थिक संभावनाओं को किस तरह बदला जा सकता है।

गुजरात की विकास रणनीति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में से एक उसकी वास्तविक ‘सिंगल-विंडो क्लीयरेंस’ व्यवस्था थी। इसका उद्देश्य अनावश्यक नौकरशाही बाधाओं को कम करना और निवेशकों के लिए प्रक्रियाओं को सरल बनाना था। उद्योगपति एक ही मंच के माध्यम से, ऑनलाइन सुविधाओं सहित, अपना आवेदन जमा कर सकते थे। उन्हें मंजूरी के लिए कई विभागों के चक्कर लगाने और जटिल प्रक्रियाओं से गुजरने की आवश्यकता कम पड़ती थी। इसका उद्देश्य स्पष्ट था—व्यापार करना आसान बनाना।

मैं कम-से-कम ऐसे दो उद्योगपतियों को जानता हूँ, जिन्हें पश्चिम बंगाल में काम आगे बढ़ाने में सफलता नहीं मिली, लेकिन बाद में उन्होंने गुजरात जाकर वहाँ अपने कारखाने स्थापित किए। उनके अनुभव पश्चिम बंगाल सरकार के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा करते हैं: आखिर उद्यमियों को अपने ही राज्य की तुलना में किसी दूसरे राज्य में निवेश करना आसान क्यों लगता है?

वर्षों के दौरान गुजरात ने ऐसी कार्यशैली विकसित की, जिसमें सरकार ने उद्योगों को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया और निवेश के अनुकूल वातावरण तैयार करने का प्रयास किया। अब यही अनुभव पश्चिम बंगाल में गुजरात मॉडल के कुछ पहलुओं को अपनाने की सुवेंदु अधिकारी की घोषित मंशा को दिशा दे रहा है। लेकिन इस मंशा को वास्तविकता में बदलने के लिए केवल राजनीतिक घोषणाएँ पर्याप्त नहीं होंगी। सबसे पहले कई बुनियादी बाधाओं को दूर करना होगा, विशेषकर भूमि अधिग्रहण, भूमि उपयोग संबंधी नियमों और औद्योगिक प्रोत्साहनों से जुड़ी समस्याओं को।

पश्चिम बंगाल में भूमि सबसे जटिल चुनौतियों में से एक है। शहरी भूमि सीमा कानून तथा भूमि अधिग्रहण और भूमि उपयोग से संबंधित व्यापक कानूनी ढाँचे की समीक्षा आवश्यक है। जुर्माने, छूट और अन्य प्रावधानों से जुड़े नियमों में बदलाव एक समग्र नीति का हिस्सा होने चाहिए, न कि अलग-अलग और तात्कालिक संशोधनों की श्रृंखला। यदि सरकार उद्योगों के लिए उपयुक्त भूमि उपलब्ध नहीं करा सकती, तो निवेश की बड़ी-बड़ी योजनाओं को भी सफल बनाना मुश्किल होगा।

पश्चिम बंगाल में भूमि के स्वामित्व और वितरण का स्वरूप भी एक अतिरिक्त चुनौती पेश करता है। राज्य की कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा उपजाऊ है और छोटे-छोटे भूखंडों में बँटा हुआ है। इसकी एक वजह भूमि सुधारों की ऐतिहासिक विरासत भी है। इन सुधारों का अपना सामाजिक और आर्थिक महत्त्व था, लेकिन औद्योगिक परियोजनाओं के लिए अक्सर बड़े और आपस में जुड़े हुए भूखंडों की आवश्यकता होती है। इसलिए किसानों की आजीविका की रक्षा और औद्योगिक विस्तार की जरूरतों के बीच संतुलन बनाने के लिए सावधानीपूर्वक योजना, पारदर्शी प्रक्रियाओं और राजनीतिक संवेदनशीलता की आवश्यकता होगी।

गुजरात में परिस्थितियाँ ठीक वैसी नहीं हैं जैसी पश्चिम बंगाल में हैं। इसलिए पश्चिम बंगाल को दूसरे राज्य की नीतियों की हूबहू नकल करने के बजाय अपनी परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करने होंगे।

हालाँकि, राज्य में कुछ ऐसे अवसर भी हैं जिनका उपयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, पुरुलिया और बाँकुड़ा के कुछ हिस्सों में अपेक्षाकृत शुष्क और कम कृषि-उपयोगी भूमि उपलब्ध है, जिसे उचित बुनियादी ढाँचे, पर्यावरणीय मानकों और भूमि उपयोग संबंधी नियमों के अधीन औद्योगिक गतिविधियों के लिए विकसित किया जा सकता है। सही योजना और उपयुक्त प्रोत्साहनों के साथ इन क्षेत्रों में अडानी और रिलायंस जैसे बड़े औद्योगिक समूहों से निवेश आकर्षित किया जा सकता है।

इसी संदर्भ में विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। आलोचकों का प्रश्न है कि ममता बनर्जी के 15 वर्षों के शासनकाल में इस स्तर का निवेश क्यों नहीं आया और अब ऐसा निवेश संभव होता हुआ क्यों दिखाई दे रहा है?

इसका एक संभावित कारण निवेशकों को दिए जाने वाले प्रोत्साहन हैं। औद्योगिक निवेश एक दोतरफा प्रक्रिया है। कंपनियाँ पूँजी लगाती हैं, रोजगार पैदा करती हैं और आर्थिक गतिविधियों में योगदान देती हैं। दूसरी ओर, सरकारें परियोजनाओं को व्यावहारिक और लाभकारी बनाने के लिए बुनियादी ढाँचा, नीतिगत सहयोग और वित्तीय प्रोत्साहन उपलब्ध कराती हैं। कोई भी उद्योगपति केवल परोपकार की भावना से निवेश नहीं करता। इसलिए सरकारों को आवश्यकतानुसार सब्सिडी, बुनियादी ढाँचे और स्पष्ट निवेश प्रोत्साहनों के रूप में सहायता देने के लिए तैयार रहना चाहिए।

लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि इन सुविधाओं से व्यापक जनहित को लाभ पहुँचे। प्रोत्साहन पारदर्शी, वित्तीय रूप से टिकाऊ और रोजगार सृजन, स्थानीय आर्थिक विकास तथा दीर्घकालिक औद्योगिक गतिविधियों जैसे ठोस परिणामों से जुड़े होने चाहिए। साथ ही, कृषि भूमि और किसानों की आजीविका से संबंधित चिंताओं का समाधान एक विश्वसनीय, न्यायसंगत और संतुलित नीति के माध्यम से किया जाना चाहिए।

इस संदर्भ में सिंगूर में टाटा की प्रस्तावित ऑटोमोबाइल परियोजना से जुड़ा विवाद आज भी एक महत्त्वपूर्ण सबक है।

जब पश्चिम बंगाल में टाटा की परियोजना स्थापित करने की योजना बनाई जा रही थी, तब निरुपम सेन राज्य के उद्योग मंत्री थे और बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री थे। सेन ने परियोजना के शुरुआती दौर में मुझसे इस बारे में बातचीत की थी। राज्य सरकार टाटा को आकर्षित करने के लिए उत्सुक थी। शुरुआत में खड़गपुर, मिदनापुर में कारखाना स्थापित करने पर विचार किया गया था। बाद में टाटा ने सिंगूर में भूमि की माँग की, क्योंकि वह कोलकाता के हवाई अड्डे के निकट था और वहाँ से परिवहन तथा माल की आवाजाही अधिक सुविधाजनक हो सकती थी।

किसी औद्योगिक इकाई के लिए स्थान का चुनाव केवल भूमि की उपलब्धता का सवाल नहीं होता। सड़क और रेल संपर्क, परिवहन, कच्चे माल की उपलब्धता, आपूर्ति शृंखला तथा लॉजिस्टिक्स जैसे पहलू किसी परियोजना की व्यवहार्यता तय करते हैं। किसी विशेष स्थान पर कंपनी को निवेश के लिए तैयार करने में प्रोत्साहन और सब्सिडी भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

लेकिन टाटा की परियोजना भूमि अधिग्रहण और कंपनी को दी जा रही रियायतों के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का केंद्र बन गई। टाटा को प्रोत्साहन दिए जाने के औचित्य पर सवाल उठने लगे। इसके बाद हुए टाटा-विरोधी आंदोलन ने पश्चिम बंगाल की बड़े औद्योगिक निवेश के लिए एक आकर्षक गंतव्य बनने की कोशिशों को गंभीर नुकसान पहुँचाया।

सिंगूर प्रकरण आज भी इस सवाल को सामने रखता है कि सरकारों को औद्योगिक विकास, किसानों के अधिकारों और राजनीतिक विरोध के बीच संतुलन कैसे बनाना चाहिए। यह भी स्पष्ट करता है कि केवल प्रशासनिक फैसलों के सहारे निवेश नीति सफल नहीं हो सकती। बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं को लंबे समय तक स्वीकार्यता दिलाने के लिए जन-परामर्श, पारदर्शिता, उचित मुआवजा और राजनीतिक सहमति आवश्यक हैं।

अब सुवेंदु अधिकारी के सामने टाटा और दूसरी बड़ी कंपनियों को पश्चिम बंगाल में निवेश के लिए आकर्षित करने की चुनौती है। साथ ही, उन्हें निवेशकों को यह भरोसा भी दिलाना होगा कि राज्य में कारोबार करने के लिए स्थिर और पूर्वानुमानित वातावरण उपलब्ध है। इसके लिए केवल घोषणाएँ पर्याप्त नहीं होंगी। स्पष्ट भूमि नीति, तेज मंजूरी प्रक्रिया, विश्वसनीय बुनियादी ढाँचे, प्रतिस्पर्धी प्रोत्साहनों और योजनाओं को जमीन पर उतारने की निरंतर प्रतिबद्धता की जरूरत होगी।

गुजरात का अनुभव पश्चिम बंगाल को कई महत्त्वपूर्ण सबक देता है, विशेषकर निवेश को आसान बनाने और नौकरशाही की बाधाओं को कम करने के मामले में। लेकिन पश्चिम बंगाल गुजरात की नकल मात्र नहीं कर सकता। उसे इन सबकों को अपनी सामाजिक, कृषि संबंधी और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप ढालना होगा।

अंततः पश्चिम बंगाल में गुजरात मॉडल की सफलता का असली पैमाना यह नहीं होगा कि सरकार नरेंद्र मोदी के उदाहरण का उल्लेख कितनी बार करती है। असली कसौटी यह होगी कि क्या वह इस अनुभव को निरंतर औद्योगिक निवेश, रोजगार के अवसरों और व्यापक आर्थिक विकास में बदल पाती है—और ऐसा करते हुए किसानों तथा स्थानीय समुदायों के हितों की रक्षा भी कर पाती है।