भारत में गैर-कानूनी तरीके से टैक्सी का धंधा खुलेआम फल-फूल रहा है, जिससे सरकार भारी राजस्व का नुकसान हो रहा है। इस बारे में की गई तहलका एसआईटी की पड़ताल से पता चलता है कि पूरे भारत में प्राइवेट गाड़ियों का इस्तेमाल टैक्सी के तौर पर किया जा रहा है, जिसमें ऑपरेटर्स टैक्स की चोरी कर रहे हैं। इससे सरकारी खजाने का भारी नुकसान हो रहा है। साथ ही यात्रियों को कानूनी, आर्थिक और इंश्योरेंस से जुड़े जोखिमों का सामना करना पड़ता है। तहलका एसआईटी की रिपोर्ट ः–
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भारत में ज्यादातर लोग बिना यह जाने कि जिस कैब में वे सफ़र कर रहे हैं, एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए टैक्सी किराए पर लेते हैं। ऐसी कोई टैक्सी शायद किसी बड़े टैक्स फ्रॉड में शामिल हो सकती है। देश भर में ट्रैवल एजेंट और टैक्सी ऑपरेटर कथित तौर पर यह रैकेट चला रहे हैं, जिसमें कभी-कभी यात्रियों की जानकारी और भागीदारी भी शामिल होती है।
एक कामकाजी महिला कविता पिछले तीन सालों से हर दिन प्राइवेट टैक्सी से अपने ऑफ़िस आ-जा रही है। उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि जिस टैक्सी का वह अक्सर इस्तेमाल करती है, वह गैर-कानूनी तरीके से चल रही है और एक टैक्स फ्रॉड में शामिल है। इससे सरकार को करोड़ों रुपयों का नुकसान हो रहा है। उसे इसके बारे में तब पता चला, जब एक दोस्त ने उसे बताया कि उसने जो टैक्सी किराए पर ली है, वह गैर-कानूनी है।
भारत में अवैध टैक्सी का कारोबार कोई नई बात नहीं है और यह लंबे समय से बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी से जुड़ा रहा है। फिर भी इस मामले की पहले कभी गहराई से जांच नहीं की गई और रिपोर्टिंग नहीं की गई है। जनहित में तहलका ने इस मामले का पर्दाफाश करने का फ़ैसला किया, जिसे वह एक बड़ा घोटाला मानता है। कुछ मामलों में इन अवैध टैक्सियों में यात्रा करने वाले यात्री कथित तौर पर गड़बड़ी को छिपाने के लिए टैक्सी मालिकों के साथ मिलीभगत करते हैं। हालांकि कई सरकारी एजेंसियां सड़कों पर अवैध टैक्सियों को पकड़ने के लिए जांच करती हैं, लेकिन वे अक्सर उल्लंघन करने वालों की पहचान करने में नाकाम रहती हैं। हालांकि तहलका की इस पड़ताल में ऐसे सबूत मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि भारतीय सड़कों पर गैर-कानूनी टैक्सियों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, जिससे कथित तौर पर करोड़ों रुपए की टैक्स धोखाधड़ी हो रही है।
भारत में गैर-कानूनी टैक्सियों के जरिए टैक्स की धोखाधड़ी बरसों से चल रही है और लगातार कई सरकारें इस पर रोक लगाने में नाकाम रही हैं, जिससे सरकारी खजाने को करोड़ों रुपयों का नुकसान हुआ है। इस धोखाधड़ी में आम तौर पर सफ़ेद नंबर प्लेट वाली निजी गाड़ियों का इस्तेमाल कमर्शियल कामों के लिए किया जाता है, जो पूरे भारत में गैर-कानूनी है। इस तरह का इस्तेमाल मोटर व्हीकल एक्ट का उल्लंघन है, इस पर भारी जुर्माना लग सकता है और इससे इंश्योरेंस कवरेज भी रद्द हो सकता है। कई मामलों में मालिक कमर्शियल परमिट फीस और टैक्स से बचने के लिए अपनी निजी गाड़ियों को लोकप्रिय राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म या लोकल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क से जोड़ते हैं। अगर ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी इन गाड़ियों को पकड़ लेती है, तो इन्हें जब्त किया जा सकता है, जिससे यात्री बीच रास्ते में ही फँस सकते हैं।
कुछ टैक्सी मालिक कमर्शियल नंबर प्लेट (पीली प्लेट) के बजाय प्राइवेट नंबर प्लेट (सफेद प्लेट) वाली गाड़ियां चलाते हैं। ऐसा वे मुख्य रूप से ऑपरेटिंग खर्च कम करने, प्रशासनिक नियमों के पालन का बोझ घटाने और कड़े नियमों से बचने के लिए करते हैं। हालांकि यह तरीका कुछ स्थितियों में कानूनी तौर पर अस्पष्ट दायरे में आता है और कुछ मामलों में पूरी तरह से गैर-कानूनी है, फिर भी इससे होने वाले आर्थिक फायदों के कारण यह बड़े पैमाने पर प्रचलित है।
कमर्शियल तौर पर रजिस्टर्ड गाड़ियों (पीली प्लेट वाली) पर ज्यादा रोड टैक्स, परमिट फीस और दूसरे सरकारी शुल्क लगते हैं, जबकि प्राइवेट गाड़ियों पर टैक्स की दरें काफी कम होती हैं। कमर्शियल टैक्सियों को सड़क पर चलने लायक बने रहने के लिए रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस (आरटीओ) से रेगुलर फिटनेस जांच करवानी पड़ती है, जबकि प्राइवेट गाड़ियों के लिए नियम कम होते हैं, जिससे मालिकों का समय और मेंटेनेंस का खर्च दोनों बचता है। सफेद नंबर प्लेट वाली गाड़ियों के ड्राइवरों को भी राज्य की सीमाओं और ट्रैफ़िक चेकपॉइंट्स पर कम जांच-पड़ताल का सामना करना पड़ता है, क्योंकि जांच एजेंसियां आमतौर पर कमर्शियल गाड़ियों पर ज्यादा ध्यान देती हैं।
कमर्शियल कामों के लिए प्राइवेट गाड़ी का इस्तेमाल करना मोटर व्हीकल एक्ट का उल्लंघन है। पकड़े जाने पर मालिकों को भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है और उनकी गाड़ियां जब्त भी की जा सकती हैं। इसके अलावा अगर गाड़ी का इस्तेमाल कमर्शियल मकसद से किया जाता है, तो प्राइवेट मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी अमान्य हो जाती है। ऐसे में किसी दुर्घटना या यात्री के घायल होने की स्थिति में मालिक और ड्राइवर पूरी तरह से जिम्मेदार होते हैं।
इन कानूनी जोखिमों के बावजूद यह चलन पूरे भारत में बड़े पैमाने पर जारी है। ट्रैवल इंडस्ट्री के लोगों के अनुसार, 20 टैक्सियों के बेड़े वाले एक आम ट्रैवल ऑपरेटर के पास लगभग 12 प्राइवेट गाड़ियां और सिर्फ़ आठ कमर्शियली रजिस्टर्ड गाड़ियां हो सकती हैं। सरकारी एजेंसियों को भी इस बात की जानकारी है कि कई टैक्सियां जरूरी कमर्शियल परमिट के बिना चलती हैं और उन्होंने समय-समय पर ऐसी गाड़ियों के खिलाफ कार्रवाई भी की है। हालांकि इन सख्ती वाले अभियानों का ऑपरेटर्स पर बहुत कम असर हुआ है। कई लोग बिना पकड़े जाने के डर के सफेद नंबर प्लेट वाली गाड़ियों को टैक्सी के तौर पर चलाना जारी रखे हुए हैं।
‘अगर टैक्सी के तौर पर इस्तेमाल हो रही किसी प्राइवेट गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है, तो बिना परमिट के टैक्सी चलाने के लिए मालिक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। एक प्राइवेट टैक्सी में यात्रा करने के चलते यात्रियों को कोई इंश्योरेंस क्लेम भी नहीं मिलेगा। क्योंकि टैक्सी इस्तेमाल गैर-कानूनी तरीके से कमर्शियल टैक्सी के तौर पर किया जा रहा है।’ – कई सालों से ट्रैवल एजेंट के लिए टैक्सी चलाने वाले गुड्डू खान ने तहलका रिपोर्टर से बात करते हुए कहा, जो प्राइवेट गाड़ियों में यात्रियों को ले जा चुके हैं।
‘जब हम किसी प्राइवेट गाड़ी में यात्रियों को ले जाते हैं, तो हम उन्हें पहले ही जानकारी दे देते हैं। अगर ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के अधिकारी चेकिंग के लिए हमें रोकते हैं, तो हम उनसे कहते हैं कि वे इसे किसी दोस्त या रिश्तेदार की कार बताएं, न कि टैक्सी।’ -गुड्डू ने तहलका रिपोर्टर को बताया।
‘चार धाम यात्रा के दौरान एक महिला ट्रांसपोर्ट अधिकारी कभी-कभी यात्रियों से गंगा जल लेकर यह शपथ लेने को कहती है कि वे ऐसी किसी प्राइवेट गाड़ी में यात्रा नहीं कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल टैक्सी के तौर पर किया जा रहा है। चूंकि कई तीर्थयात्री झूठ नहीं बोलना चाहते, इसलिए वे सच बोलते हैं। एक बार मैं भी प्राइवेट गाड़ी में यात्रियों को ले जाते हुए इसी तरह पकड़ा गया था। मेरी गाड़ी जब्त कर ली गई थी और जरूरी सरकारी शुल्क चुकाने के बाद ही उसे छोड़ा गया।’ -गुड्डू ने कहा।
‘मेरे पास एक कमर्शियल गाड़ी के कागजात हैं, जिनसे पता चलता है कि कितने तरह के टैक्स और फीस भरने पड़ते हैं। यात्री सिर्फ स्टेट टैक्स देते हैं। बाकी टैक्स गाड़ी का मालिक चुकाता है। इसीलिए कई ऑपरेटर इन सरकारी टैक्स से बचने के लिए प्राइवेट गाड़ियों का इस्तेमाल टैक्सी के तौर पर करते हैं।’ -गुड्डू ने बताया।
‘कभी-कभी जब हमारी निजी गाड़ियां टैक्सी के तौर पर इस्तेमाल होते हुए पकड़ी जाती हैं, तो हमें लगभग 10,000 से 15,000 रुपए की रिश्वत देनी पड़ती है। कई बार ऐसा हुआ है कि मेरे एम्प्लॉयर की प्राइवेट गाड़ी टैक्सी की तरह चलाते हुए पकड़ी गई।’ -कई सालों से एक ट्रैवल एजेंट के लिए टैक्सी चलाने वाले सुनील कुमार ने कहा।
‘निजी गाड़ी में यात्रा शुरू करने से पहले हम यात्रियों को निर्देश देते हैं कि अगर चेकिंग के लिए उन्हें रोका जाए, तो वे परिवहन विभाग के अधिकारियों को बताएं कि यह उनकी अपनी निजी कार है। लेकिन कभी-कभी यात्री दक्षिण भारत से होते हैं, जबकि गाड़ी उत्तर भारत में रजिस्टर्ड होती है और अधिकारियों को पता चल जाता है कि वे झूठ बोल रहे हैं।’ -सुनील ने बताया।
‘एक बार जब मैं प्राइवेट रजिस्ट्रेशन वाली इनोवा गाड़ी में यात्रियों को गुजरात से हरिद्वार ले जा रहा था, तो ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के अधिकारियों ने मुझे रोक लिया। गाड़ी की जांच होने से पहले मैंने यात्रियों से कहा कि वे कहें कि यह उनकी अपनी कार है और उन्होंने यात्रा के लिए सिर्फ़ एक ड्राइवर किराए पर लिया है। उन्होंने बिल्कुल यही कहा और हमें जाने दिया गया।’ -ट्रैवल एजेंट के लिए काम करने वाले एक और ड्राइवर धनराज ने कहा।
‘अगर वही प्राइवेट गाड़ी, उसी ड्राइवर के साथ एक ही रूट पर यात्रियों को ले जाती रहती है, तो ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के अधिकारियों के हाथों पकड़े जाने का खतरा ज्यादा होता है। इसीलिए मैं अपनी गाड़ी बदलता रहता हूं।’ -धनराज ने बताया।
‘एक बार मैं एक प्राइवेट गाड़ी में यात्रियों को ले जाते हुए पकड़ा गया था। अधिकारियों ने 30,000 रुपए की रिश्वत मांगी। मैंने उनसे मोल-भाव किया और आखिरकार वहां से जाने की इजाजत मिलने से पहले सिर्फ 500 रुपए दिए।’ -ट्रैवल एजेंट के लिए काम करने वाले एक और ड्राइवर शमशाद पठान ने कहा।
‘टैक्सी टैक्स में कथित धोखाधड़ी की पड़ताल तहलका ने कई सालों से एक ट्रैवल एजेंट के लिए ड्राइवर का काम करने वाले गुड्डू खान से शुरू की। उनके अपने बताए अनुसार, ट्रैवल बिज़नेस में आने से पहले उन्होंने एक सीनियर राजनेता के पर्सनल असिस्टेंट के ड्राइवर के तौर पर काम किया था। गुड्डू ने आरोप लगाया कि कई ट्रैवल एजेंट टैक्स और नियमों से बचने के लिए सफेद नंबर प्लेट वाली प्राइवेट गाड़ियों को कमर्शियल टैक्सी के तौर पर चलाते हैं। उनके अनुसार, कमर्शियल तौर पर रजिस्टर्ड टैक्सियों के लिए परमिट कई तरह के डॉक्यूमेंट, टैक्स पेमेंट और नियमों का लगातार पालन करना जरूरी होता है, जबकि प्राइवेट गाड़ियों के लिए ऐसा नहीं है। इसलिए जो ऑपरेटर इन जिम्मेदारियों से बचना चाहते हैं, उनके लिए प्राइवेट गाड़ियां एक सस्ता विकल्प होती हैं।’
रिपोर्टर : ये कमर्शियल गाड़ी और प्राइवेट गाड़ी में क्या अंतर है?
गुड्डू : जैसे?
रिपोर्टर : ये टैक्सी वाले कमर्शियल गाड़ी न भेजकर प्राइवेट भेजते हैं?
गुड्डू : टैक्स बचाता है। कमर्शियल गाड़ी हर कोई लेता नहीं है ना।
रिपोर्टर : क्यों?
गुड्डु : इसमें तुम्हारे 3 कागज हो गए। ये पूरी फाइल है। इंश्योरेंस ले, रोड टैक्स ले।
रिपोर्टर : कमर्शियल गाड़ी में?

गुड्डू : हां. दुनिया भर के कागज होते हैं।
रिपोर्टर : टैक्सी वाले को दिक्कत क्या है कमर्शियल गाड़ी देने में?
गुड्डू : बस ये देख लो। कागज होते हैं. तुम्हें कागज दिखा दूं… पॉलिसी… ये देखो कितने हो गए… 4-5… 6, 7, 8… 9, 10, 11… इतने कागज होते हैं इसके।
नीचे दी गई बातचीत में गुड्डू बताता है कि अगर किसी प्राइवेट गाड़ी का इस्तेमाल टैक्सी के तौर पर किया जाता है और कोई दुर्घटना हो जाती है, तो इसके गंभीर कानूनी और आर्थिक नतीजे हो सकते हैं। उसके अनुसार, प्राइवेट तौर पर रजिस्टर्ड गाड़ी को टैक्सी के तौर पर इस्तेमाल करना गैर-कानूनी है, क्योंकि यह जरूरी परमिट के बिना कमर्शियल टैक्सी चलाने जैसा है। उन्होंने दावा किया कि विदेशी पर्यटक आम तौर पर कमर्शियल तौर पर रजिस्टर्ड गाड़ियां पसंद करते हैं, क्योंकि वे इंश्योरेंस के दायरे में आती हैं। दुर्घटना होने पर ऐसे वाहनों में यात्रा करने वाले यात्री बीमा का दावा कर सकते हैं। गुड्डू ने कहा कि अगर टैक्सी के तौर पर इस्तेमाल हो रही प्राइवेट गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है, तो बिना परमिट के गाड़ी चलाने के लिए मालिक पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है, जबकि यात्रियों को शायद कोई इंश्योरेंस मुआवजा न मिले।
रिपोर्टर : लेकिन टूरिस्ट तो कमर्शियल गाड़ी लेता है, बाहर का विदेशी?
गुड्डू : अंग्रेज क्यों लेता है…क्योंकि उनका बीमा होता है।
रिपोर्टर : बीमा होता है मतलब?
गुड्डू : कई-कई करोड़ के बीमे होते हैं इन लोगों के।
रिपोर्टर : इंश्योरेंस?
गुडडू : खुदा ना खास्ता कोई हादसा हो जाता है, तो वो इंश्योरेंस कंपनी से क्लेम कर सकते हैं।
रिपोर्टर : अच्छा, टैक्सी नंबर गाड़ी पर क्लेम कर सकते हो, बीमा मिल जाएगा?
गुड़डू : अगर प्राइवेट गाड़ी में कोई हादसा होता है ना, तो मालिक भी जेल जाएगा और कुछ नहीं मिलेगा उनको।
रिपोर्टर : मालिक क्यों जेल जाएगा?
गुड्डू : प्राइवेट गाड़ी टैक्सी में जो चल रहा है।
रिपोर्टर : अच्छा, प्राइवेट गाड़ी टैक्सी में नहीं चल सकते?
गुड्डू : नहीं…ये सब चोरी-छिपे चलते हैं।
नीचे दी गई बातचीत में गुड्डू बताता है कि टैक्सी के तौर पर इस्तेमाल होने वाली प्राइवेट गाड़ियों में सफर करने से पहले यात्रियों को कैसे सिखाया-पढ़ाया जाता है। उन्होंने बताया कि जब भी वे किसी प्राइवेट गाड़ी को टैक्सी की तरह इस्तेमाल करके यात्रियों को ले जाते हैं, तो ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के अधिकारियों की कार्रवाई से बचने के लिए वे यात्रियों को पहले ही जानकारी दे देते हैं। यात्रियों से कहा जाता है कि अगर चेकिंग के दौरान उन्हें रोका जाए, तो वे कहें कि टैक्सी नहीं है, गाड़ी किसी दोस्त या रिश्तेदार की है। गुड्डू ने आगे दावा किया कि उसने कई यात्रियों से टैक्सी मालिक का फोन नंबर सेव करने के लिए भी कहा, जिससे अगर अधिकारियों को गाड़ी के मालिक से संपर्क करने की जरूरत पड़े, तो वे उन्हें वह नंबर दे सकें।
रिपोर्टर : मान लो रस्ते में चेकिंग हो गई आरटीओ की?
गुड्डू : चेकिंग होती नहीं है, और हो तो कागज़ दिखा दो।
रिपोर्टर : मान लो प्राइवेट गाड़ी में कोई सवारी जा रही है और कहीं चेकिंग हो गई… फिर?
गुड्डु : वो शो करेगा ना भाई, टैक्सी नहीं, गाड़ी जा रही है…।
रिपोर्टर : अच्छा, उसको साबित करना पड़ेगा?
गुड्डू : हां।
रिपोर्टर : वो कैसे साबित करेगा?
गुड्डी : जैसे तुम गाड़ी में जा रहे हो। वो पूछेगा, तुम्हारी अपनी है या टैक्सी। अब ये तुम्हारे पर डिपेंड करेगा, तुम अपनी बता रहे हो या टैक्सी बता रहे हो।
रिपोर्टर : और सवारी ने कह दिया ‘टैक्सी में जा रहे हैं’?
गुड्डु : तो बंद कर देंगे गाड़ी।
रिपोर्टर : तो सवारी को सिखाकर ले जाते हो क्या?
गुड्डू : सब कुछ बताते हैं। प्लस, जिसके नाम गाड़ी है, उसका नंबर फोन में सेव करवा जाता है।
रिपोर्टर : जैसे नौशाद की गाड़ी में ले गए नैनीताल?
गुड्डू : हां, तो नौशाद का नंबर सेव करवा देंगे।
रिपोर्टर: तुमने पहले दिया ही नहीं। मैं नैनीताल गया हूं.
गुड्डू : रूट पर जो दिक्कत आती है ना, वो हमें पता है।
गुड्डू ने हमें बताया कि उसे उन रास्तों की जानकारी है, जहाँ ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट की कड़ी निगरानी रहती है और जहां प्राइवेट गाड़ियों को टैक्सी की तरह इस्तेमाल करने वाले ड्राइवरों के पकड़े जाने की संभावना ज्यादा होती है। उसने चार धाम यात्रा के दौरान हुई एक घटना का जिक्र किया। उसके अनुसार, उसे बिना परमिट के टैक्सी के तौर पर इस्तेमाल की जा रही एक प्राइवेट गाड़ी में यात्रियों को ले जाते समय रोका गया था। गुड्डू ने बताया कि एक महिला रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिसर (आरटीओ) यात्रियों से अपने हाथों पर गंगाजल लेकर यह शपथ लेने को कहती है कि वे किसी ऐसे प्राइवेट वाहन में यात्रा नहीं कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल कमर्शियल तौर पर किया जा रहा हो। उसेने कहा कि कई तीर्थयात्रियों ने, जो धार्मिक यात्रा के दौरान झूठ नहीं बोलना चाहते, सच बोल दिया। गुड्डू ने दावा किया कि एक बार इसी तरह उसकी गाड़ी जब्त कर ली गई थी और जरूरी टैक्स चुकाने के बाद ही उसे छोड़ा गया था। उसने आगे आरोप लगाया कि कई टैक्सी ऑपरेटर बिना परमिट के प्राइवेट गाड़ियों को टैक्सी के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि यात्री सिर्फ राज्य का टैक्स देते हैं, जबकि कमर्शियल गाड़ी मालिकों को कई दूसरे टैक्स और नियमों के पालन का खर्च उठाना पड़ता है।
रिपोर्टर : कौन-कौन से?
गुड्डू : जैसे चार धाम में।
रिपोर्टर : और?
गुड्डू : चार धाम में अगर कह दोगे मेरी अपनी है, तब भी झूठे साबित हो जाओगे… क्योंकि वहां आरटीओ लेडी है। बहुत हर* है। हाथ पर गंगाजल रखकर कसम खिलवाती है। और जो तीर्थ यात्रा करने जा रहा है, कसम कैसे खा ले झूठी?
रिपोर्टर : ऐसा हुआ है तुम्हारे साथ?
गुड्डू : काई बार हुआ है।
रिपोर्टर : पकड़े गए हो तुम, बचे कैसे?
गुड्डू : बंद कर दी गाड़ी।
रिपोर्टर : तुम्हारी गाड़ी बंद हो चुकी है पहले?
गुड्डू : हां।
रिपोर्टर : ड्राइवर के साथ कुछ नहीं होता?
गुड्डू : नहीं।
रिपोर्टर : पेनल्टी तो लगती होगी?
गुड्डू : टैक्स देना पड़ता है फिर उसका। जैसे 4 साल पुरानी गाड़ी है तुम्हारी, टैक्स भरो और जाओ।
रिपोर्टर : तो तुम्हें टैक्स भरना पड़ेगा?
गुड्डु : हां।
रिपोर्टर : मतलब सवारी कभी घबरा गई और उसने बोल दिया टैक्सी की है हमने, फिर तो डर गए तुम, फंस गए?
गुड्डू : हम क्यूं फंस गए?
रिपोर्टर : टैक्स तो देना पड़ेगा?
गुड्डु : मालिक देगा ना टैक्स।
रिपोर्टर : ये तो बहुत सारे टैक्सी वाले चला रहे हैं प्राइवेट गाड़ी। सब टैक्सी में चल रही हैं?
गुड्डू : हां।
रिपोर्टर : टैक्सी वालों का ये फायदा है कि उनका टैक्स बच रहा है। टैक्स तो तुम सवारी से ले रहे हो, फिर कहां बच रहा है?
गुड्डू : स्टेट टैक्स ही तो दे रही है। गवर्नमेंट टैक्स थोड़ी दे रही है सवारी। फिटनेस हुई, रोड टैक्स हुआ, वो थोड़ी देती है सवारी। सब मालिक को देना पड़ता है.
गुड्डू के अनुसार, पीली नंबर प्लेट और परमिट वाली टैक्सी के मालिकों को कानूनी रूप से गाड़ी चलाने के लिए 12 अलग-अलग दस्तावेज रखने पड़ते हैं। चूंकि इन जरूरतों को पूरा करना मुश्किल है, इसलिए कई मालिक बिना परमिट के सफेद नंबर प्लेट वाली प्राइवेट कारों का इस्तेमाल टैक्सी के तौर पर करते हैं। गुड्डू का कहना है कि परमिट वाली टैक्सियों का इस्तेमाल मुख्य रूप से दो ही स्थितियों में होता है- ऐसी कंपनियों द्वारा जिन्हें जीएसटी इनवॉइस की जरूरत होती है और विदेशी पर्यटकों द्वारा। इन जरूरतों को पूरा करना मुश्किल होता है, इसलिए कई मालिक बिना परमिट के सफेद नंबर प्लेट वाली प्राइवेट कारों को टैक्सी के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
रिपोर्टर : इसके अलावा कौन-कौन से टैक्स हैं?
गुड्डू : सारे टैक्स हैं। 12 पेपर हैं इसके।
रिपोर्टर : आप कह रहे हो सवारी सिर्फ स्टेट टैक्स देती हैं?
गुड्डु : हां।
रिपोर्टर : और नहीं देती, इसलिए आप टैक्सी गाड़ी नहीं भेजते?
गुड्डु : टैक्सी गाड़ी दो जगह जाती है। या तो फॉर्नर (फॉरेन टूरिस्ट के केस में) में मिलेगी, या फिर कंपनी में। वहां पर (कंपनी में) जीएसटी बिल मांगते हैं वो तो उसमें टैक्सी नंबर दिखाना पड़ता है।
गुड्डू ने दावा किया कि पंजाब, हरियाणा और आस-पास के राज्यों में लगभग 70 प्रतिशत ट्रैवल एजेंट प्राइवेट गाड़ियों का इस्तेमाल करके बिना परमिट के टैक्सी चलाते थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब ऐसी गाड़ियां पकड़ी जाती हैं, तो ड्राइवर अक्सर कार्रवाई से बचने के लिए पुलिसकर्मियों को थोड़ी-बहुत रिश्वत दे देते हैं। इस तरह के वाहनों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से सरकार को टैक्स के तौर पर करोड़ों रुपए का नुकसान होता है। वह उन जगहों की ओर भी इशारा करता है, जहां ऐसे वाहनों की जांच होने की संभावना ज्यादा होती है।
रिपोर्टर : लेकिन फिर भी सारे प्राइवेट चला रहे हैं टैक्सी वाले।
गुड्डू : कम से कम 70 परसेंट गाड़ी पंजाब की है। पंजाब, हरियाणा की प्राइवेट नंबर वाली गाड़ियां यूज हो रही हैं।
रिपोर्टर : सब टैक्स बचाने के लिए कर रहे हैं, तो गवर्नमेंट का तो नुकसान हो रहा है…..कभी कोई पुलिस वाला पकड़ लेता है, तो तुम ले देकर छूट जाते होंगे?
गुड्डू : हां, 1000-2000 ले लेता है वो।
गुड्डु (आगे) : हरिद्वार गए, ऋषिकेश की तरफ तो दिक्कत हो सकती है। चार धाम में हो सकती है. पंजाब में, चंडीगढ़ में दिक्कत होती है।
रिपोर्टर : पुलिस वाले भांप लेते होंगे ये प्राइवेट पर टैक्सी चल रही है?
गुड्डू : हां…ये दिन रात का काम है हमारा। चेहरे पहचान लेते हैं ये।
गुड्डू से मिलने के बाद तहलका रिपोर्टर ने एक और टैक्सी ड्राइवर सुनील कुमार से बात की, जो गुड्डू की तरह ही कई सालों से एक ट्रैवल एजेंसी के लिए काम कर रहा है। इस बातचीत में सुनील कुमार ने बताया कि जिस ट्रैवल एजेंसी में वह काम करता है, वो यात्रियों को ले जाने के लिए प्राइवेट गाड़ियों का इस्तेमाल करती है। उसने कहा कि जब भी एजेंसी की किसी प्राइवेट गाड़ी को ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट टैक्सी के तौर पर चलाते हुए पकड़ता है, तो उसे लगभग 10,000 से 15,000 रुपए की रिश्वत देनी पड़ती है। उसने यह भी कहा कि ऐसा कई बार हुआ है।
रिपोर्टर : किसी दिन पकड़े गए तो?
सुनील : देना पड़ता है, 10-15 हजार, जो भी पड़े।
रिपोर्टर : पकड़ी गई (व्हीकल) है कभी?
सुनील : पकड़ी गई है कई बार।
रिपोर्टर : पर्सनल को टैक्सी में चलाते हैं? ….आपके साथ हुआ कभी?
सुनील : नहीं, मेरे साथ नहीं. मैं तो टैक्सी चलाता हूं।
सुनील ने तहलका रिपोर्टर को बताया कि प्राइवेट गाड़ी में यात्रियों को घुमाने ले जाने से पहले, वह उन्हें समझाता है कि अगर चेकिंग के लिए रोका जाए, तो वे ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के अधिकारियों को बताएं कि यह उनकी अपनी प्राइवेट कार है। हालांकि उसने कहा कि यह कहानी कभी-कभी गड़बड़ा जाती है, खासकर तब जब यात्री दक्षिण भारत के हों और गाड़ी किसी उत्तरी राज्य में रजिस्टर्ड हो। सुनील ने यह भी दावा किया कि जब वह बिना परमिट के टैक्सी चलाते हुए पकड़ा जाता है, तो आमतौर पर आगे की कार्रवाई से बचने के लिए वह लगभग 15,000 से 20,000 रुपए की रिश्वत देता है।
रिपोर्टर : सवारी को सिखाकर भी ले जाते हैं ये?
सुनील : हां, सिखाकर… जैसे आपको जाना है हिमाचल, तो आपको बोल देंगे, ‘आपके दोस्त की गाड़ी है।’
रिपोर्टर : रास्ते में कोई पकड़े, तो बता दें मेरी पर्सनल गाड़ी है?

सुनील : अब अगर बार-बार उस प्रांत में जाएगी, तो उनको भी पता पड़ जाता है ना क्या है…इतना पर्सनल आदमी कौन है, जो बार-बार अपनी गाड़ी दे रहा है।
रिपोर्टर : कई बार सवारी डर के बता देती होगी?
सुनील : हां, बता देती है… अब साउथ के आएंगे, उनकी भाषा अलग है ना। वो तो हाल समझ जाएंगे. अब यूपी का नंबर है, साउथ का बैठा है, तो पर्सनल कैसे हो जाएगी गाड़ी?
रिपोर्टर : पकड़े जाते हो, तो 15-20 हजार देते होंगे। गाड़ी सीज भी हो जाती होगी?
सुनील : हां, कई बार।
सुनील (आगे) : सीज नहीं करानी, तो पैसे देने पड़ते हैं।
रिपोर्टर : कोई ईमानदार मिल जाता होगा, फिर तो सीज करानी पड़ती होगी गाड़ी?
सुनील : हम्म।
सुनील से बात करने के बाद तहलका रिपोर्टर एक और टैक्सी ड्राइवर धनराज से मिले, जो एक ट्रैवल एजेंसी के लिए काम करता है और प्राइवेट नंबर प्लेट वाली गाड़ियों में यात्रियों को ले जाता है। धनराज ने माना कि एक बार उसे प्राइवेट नंबर प्लेट वाली इनोवा में पांच यात्रियों को गुजरात से हरिद्वार ले जाते हुए पकड़ा गया था। उसने कहा कि उसने यात्रियों को पहले ही निर्देश दे दिया था कि वे ट्रांसपोर्ट अधिकारियों को बताएं कि यह उनकी अपनी निजी गाड़ी है और उन्होंने यात्रा के लिए सिर्फ एक ड्राइवर को काम पर रखा है। धनराज के अनुसार, यात्रियों ने उनके निर्देशों का पालन किया और अधिकारियों ने जाने दिया।
रिपोर्टर : जो प्राइवेट गाड़ी आप टैक्सी में ले जाते हो, तो सवारी को तो सिखाकर ले जाते होंगे?
धनराज : पुराने आप जैसे ही जाते हैं, नए कहां मिलते हैं।
रिपोर्टर : मान लो…।
धनराज : हां, तो पुलिस रोकेगी तो बोल देंगे, यारी दोस्ती में लेकर आये हैं।
रिपोर्टर : कोई साउथ इंडियन मिल गया, जिसको भाषा नहीं आती?
धनराज : उनको ये नहीं देते, फिर टैक्सी देते हैं। साउथ इंडियन भी, गुजराती भी, ये साफ हिंदी नहीं बोल पाता। मैं भी एक बार फंस गया था।
धनराज (आगे) : मैं आप प्राइवेट गाड़ी टैक्सी में ले जा रहे थे। उनको पहले समझा दिया था। पर देखो, हर आदमी ऐसा होता नहीं। ऊपर वाले का मेहर होता है. कुछ हो जाए, पर मेरे साथ नहीं हुआ कुछ। वहां उन्होंने मान लिया।
रिपोर्टर : कौन सी गाड़ी थी?
धनराज : इनोवा थी…कई गाड़ियां हैं इसके पास।
रिपोर्टर : सवारी कितनी थी?
धनराज : पांच सवारी।
रिपोर्टर : कहां की?
धनराज : गुजरात की. मैंने बोला, थोड़ा हेल्प करनी पड़ेगी आपको। बोले, कोई नहीं. क्योंकि चालान करेंगे, दो-चार घंटे बर्बाद करेंगे।
धनराज : मैंने कहा, आपको इतना बोलना है, ‘हम गाड़ी लेकर आए हैं, ड्राइवर हमारा है।’ मैं खड़ा रहा. पुलिस वाले ने लाइसेंस मांगा, कागज देखे। कुछ तो आदमी की शकल सूरत से पता चलता है। फिर वो समझ गया होगा, बोला, ‘जाओ।’
धनराज (आगे) : ‘कहाँ जा रहे हो?’ मैंने कहा, हरिद्वार।
रिपोर्टर : मतलब उसने पकड़ा नहीं, वो समझा नहीं, टैक्सी नहीं समझा?
धनराज : नहीं।
धनराज के अनुसार, जब एक ही प्राइवेट गाड़ी बार-बार उसी रूट पर यात्रियों को ले जाती है, तो पकड़े जाने का जोखिम बढ़ जाता है। उसका कहना है कि ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के अधिकारी आखिरकार ऐसे वाहनों को पहचान ही लेते हैं। इसीलिए वह अपनी गाड़ी बदलता रहता है।

रिपोर्टर : नहीं, एक ही गाड़ी, एक ही ड्राइवर, एक ही रूट पर जाएंगे।
धनराज : हां, तब पकड़ा जाता है। वो पहचान जाते हैं, ‘ये बार-बार आ रहा है, इसका मतलब इसका कार्ड चल रहा है।’ बट ऐसा होता नहीं. अगर हम हैं, तो हमारी गाड़ियां भी तो बदलती रहती हैं ना। हमें नहीं पकड़ पाते।
धनराज ने माना कि निजी वाहनों का टैक्सी के तौर पर बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने से राज्य सरकारों को टैक्स का भारी नुकसान होता है। उसने दावा किया कि अलग-अलग राज्यों में कई ट्रैवल एजेंट बिना परमिट के प्राइवेट गाड़ियां चलाते हैं। धनराज ने बताया कि यह तरीका आम है और इस बिज़नेस में ज्यादातर ऑपरेटर इसे अपनाते हैं।
रिपोर्टर : इसमें टैक्स का बड़ा नुकसान हो रहा होगा गवर्नमेंट का, करोर्स (करोड़ों) का?
धनराज : हो रहा है. पर हर स्टेट में 10-12 गाड़ियां हैं। सब जगह 4-5 गाड़ियां प्राइवेट चल रही हैं, और अन्य जो हैं, वो भी।
रिपोर्टर : सभी चला रहे हैं?
धनराज : सभी चला रहे हैं।
धनराज के बाद तहलका रिपोर्टर की मुलाक़ात एक और टैक्सी ड्राइवर शमशाद पठान से हुई, जो बिना परमिट के टैक्सी चलाता है। उसने तहलका रिपोर्टर को बताया कि एक बार उसे प्राइवेट नंबर प्लेट वाली गाड़ी में यात्रियों को ले जाते हुए पकड़ा गया है। पठान के अनुसार, अधिकारियों ने 30,000 रुपए की रिश्वत मांगी। उसने दावा किया कि उसने अधिकारियों से मोल-भाव किया और आखिर में सिर्फ 500 रुपए देकर छूट गया।

इस तरह तहलका की पड़ताल में ऐसे ट्रैवल एजेंटों का पता चला, जो कथित तौर पर ट्रांसपोर्ट नियमों का उल्लंघन करके निजी गाड़ियों को टैक्सी के तौर पर चला रहे हैं। ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट ऐसे वाहनों को कमर्शियल टैक्सी के तौर पर मान्यता नहीं देता है, इसलिए इन्हें गैर-कानूनी तरीके से चलाया जा रहा है। कमर्शियल परमिट नियमों के तहत कमर्शियल कामों के लिए इस्तेमाल होने वाले वाहन पर पीली नंबर प्लेट होनी चाहिए।
हालांकि प्राइवेट कार ऑपरेटर वैगनआर और इनोवा से लेकर मर्सिडीज सेडान तक की गाड़ियां किराए पर देते हैं; इन सभी गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन प्राइवेट होता है और इन्हें प्राइवेट ड्राइविंग लाइसेंस वाले ड्राइवर चलाते हैं। वे आमतौर पर कम से कम आठ घंटे या 80 किलोमीटर के लिए चार्ज करते हैं। ये गाड़ियां ज्यादातर लोकल टैक्सी स्टैंड और ट्रैवल एजेंटों के जरिए उपलब्ध होती हैं, जिससे सरकारों को टैक्स के तौर पर करोड़ों रुपयों का नुकसान होने की आशंका है। पड़ताल के दौरान कई ड्राइवरों ने यह भी दावा किया कि कभी-कभी यात्रियों को अधिकारियों को गुमराह करने के लिए सिखाया-पढ़ाया जाता है और ऐसी गाड़ियां पकड़े जाने पर कथित तौर पर रिश्वत दी जाती है, जिससे कानून लागू करने में संभावित कमियों का पता चलता है।
इसलिए अगली बार जब आप टैक्सी किराए पर लें, तो सबसे पहले यह पक्का कर लें कि उसकी नंबर प्लेट पीली हो, क्योंकि इससे पता चलता है कि वह ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के पास कमर्शियल टैक्सी के तौर पर रजिस्टर्ड है। अगर आप सादे सफेद नंबर प्लेट वाली टैक्सी में सफर करते हैं और दुर्भाग्य से कोई दुर्घटना हो जाती है, तो आपको आमतौर पर मिलने वाले इंश्योरेंस या मेडिक्लेम का फायदा नहीं मिलेगा, क्योंकि ऐसी गाड़ियां प्राइवेट गाड़ियों के तौर पर रजिस्टर्ड होती हैं। अपनी सुरक्षा और कानूनी बचाव के लिए सिर्फ पीली नंबर प्लेट वाली टैक्सी में ही यात्रा करें। अगर गाड़ी की नंबर प्लेट सफेद है, तो उसे टैक्सी के तौर पर इस्तेमाल न करें।




