डॉ. हेडगेवार ने सुरंग खोदकर तिरंगा फहराया

asdasयूं तो स्वतंत्रता के आंदोलन में होम हुए सेनानियों के मामले में हमारे राष्ट्रवादी कुनबे का झोला रीता ही है लेकिन कहानियों और संघ साहित्य में ब्रिटश काल के दौरान प्रबल राष्ट्रवाद से जुड़ी अनेकानेक दंत कथाएं पूरी प्रखरता से मौजूद हैं. जब गांधी, नेहरू, पटेल, आजाद समेत आजादी के तमाम नायक अंग्रेजों से भारत को छुड़ाने की कोशिश में थे तब संघी कुनबा भारत को मलेच्छों और मुसलमानों से छुड़ाने की फिराक में था. खैर करने को भले न कुछ रहा हो लेकिन कहने को बहुत कुछ है.

यह कथा संघ के शिक्षालयों और शिशु मंदिरों में संघ संस्थापक डॉ. केशव बलराम पंत हेडगेवार को लेकर है जिसे खूब कहा-सुना भी जाता है. कथा कुछ यूं है कि बचपन से ही हेडगेवार के मन में देशप्रेम की भावना बलवति थी. पंद्रह बरस की आयु में ही उनके मन में अंग्रेजों को इस देश से बाहर खदेड़ने का भाव हावी हो गया था. अंग्रेजी जमाना था. नागपुर के अंग्रेज मजिस्ट्रेट का दफ्तर किसी किले की मानिंद ऊंची दीवारों और अट्टालिकाओं से घिरा होता था. निरंतर संतरी पहरेदारी किया करते थे. किले के भव्य द्वार के शीर्ष पर कभी न अस्त होनेवाला अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतीक यूनियन जैक फड़फड़ाता रहता था. हर दिन उधर से गुजरते बाल हेडगेवार के मन को यह बात बहुत कचोटती थी. अपमान के प्रतीक यूनियन जैक को उसकी हैसियत दिखाने और अंग्रेजों को उनकी वाजिब जगह दिखाने का प्रण बाल हेडगेवार ने कर लिया. रणनीति तय हो गई. बाल हेडगेवार ने अपने कुछ साथियों के साथ अपने घर के भीतर से एक सुरंग खोदनी शुरू कर दी. उनका दृढ़ निश्चय था कि यूनियन जैक के स्थान पर तिरंगा फहराना है. अपने बाल मित्रों के सहयोग से कुछ ही दिन में हेडगेवार ने इस काम को अंजाम तक पहुंचा दिया. यूनियन जैक हटाकर मजिस्ट्रेट के दफ्तर पर तिरंगा फहराने की यह कहानी शिशु मंदिरों में खूब कही सुनी जाती हैं. बाद में इस कहानी के सूत्र पकड़ने की तमाम कोशिशें व्यर्थ गईं. किसी स्वतंत्र इतिहासकार अथवा पुस्तक में इस तरह का कोई दृष्टांत देखने-सुनने को नहीं मिला.


गौर फरमाएं

संघ का एक सच यह है कि आजादी के पहले और बाद तक वह तिरंगे को भारत का राष्ट्रीय प्रतीक मानता ही नहीं था. उसके सपनों में भारत का राष्ट्रीय ध्वज भगवा स्वरूप लिए हुए था. दूसरी बात हेडगेवार का जन्म 1889 में हुआ था. यानी यह घटना पंद्रह वर्ष बाद 1904 या 05 के आस पास की होनी चाहिए. उस समय तक तिरंगे का कोई अस्तित्व ही नहीं था. मौजूदा स्वरूपवाला तिरंगा 1947 में अस्तित्व में आया उससे पहले तिरंगे के बीच में चक्र की जगह चरखा होता था. उससे भी पहले का ध्वज औऱ भी अलग आकार-प्रकार का होता था. एक सच यह भी है कि लंबे समय तक संघ तिरंगे से खुद को इतना दूर रखता रहा कि नागपुर स्थित संघ मुख्यालय पर 2002 में पहली बार तिरंगा फहराया गया.