सुजीत ठाकुर,नई दिल्ली। दिल्ली में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्षी लामबंदी के बीच एक ऐसा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, जिसने देश की विपक्षी राजनीति में नए समीकरणों की रूप रेखा बनने की दस्तक दें दी है। माकपा (CPM) के महासचिव एम.ए. बेबी ने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से संपर्क कर विपक्षी दलों को एकजुट होकर संघर्ष करने की अपील की। ममता बनर्जी की सकारात्मक प्रतिक्रिया के बाद दोनों नेताओं के बीच फोन पर बातचीत भी हुई। यह फोन कॉल 2029 में बंगाल में भाजपा के खिलाफ तीनो विरोधी दल को साथ ला सकती है.यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि पश्चिम बंगाल में सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। कभी वाम मोर्चे के शासन के खिलाफ आंदोलन करके सत्ता तक पहुंचीं ममता बनर्जी की पार्टी और वामपंथी दलों के बीच राज्य में तीखा संघर्ष रहा है। ऐसे में साझा राजनीतिक मुद्दे पर दोनों के बीच संवाद विपक्षी एकता की संभावनाओं को नया संदर्भ देता है। जैसे सपा-बसपा, नीतीश-लालू जैसे धुर विरोधी साथ आये थे या हाल में तमिलनाडु में द्रमुक और अन्नाद्रमुक साथ आने के करीब आ गए थे.
फोन कॉल से शुरू हुई साझा संघर्ष की पहल
26 सितंबर को एम.ए. बेबी ने चुनाव आयोग से जुड़े विवाद पर व्यापक विपक्षी लामबंदी के लिए विभिन्न गैर-एनडीए दलों से संपर्क किया था। ममता बनर्जी ने भी इस पहल पर सकारात्मक रुख दिखाया। बेबी ने कहा कि दोनों पक्ष इस मुद्दे पर साथ काम करने और संघर्ष करने की समझ पर पहुंचे हैं। सूत्रों का कहना है कि संसद के शीतकालीन सत्र में दोनों विरोधी दलों कि करीबी बढ़ने की ठोस शुरुआत हो सकती है.इस पहल का दायरा केवल सीपीएम और टीमसी तक सीमित नहीं है। विपक्षी दलों के बीच चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर साझा रणनीति बनाने, अन्य दलों को साथ जोड़ने और व्यापक जन-अभियान चलाने की चर्चा भी हुई। मकसद 2029 के लोकसभा चुनाव में एनडीए के खिलाफ मोर्चावंदी है.
बंगाल में विरोधी, दिल्ली में साथ—क्या बदलेगी राजनीति?
इस घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि राष्ट्रीय राजनीति में सहयोग की संभावनाएं राज्य की राजनीति में भी बन सकती हैं। बंगाल में CPM और TMC के बीच संघर्ष का अपना इतिहास, संगठनात्मक आधार और चुनावी हित हैं। लेकिन बड़ा मुद्दा अपना अस्तित्व बचाना है इसलिए दिल्ली में बातचीत को बंगाल में राजनीतिक समझौते या चुनावी गठबंधन की सम्भावना मानने की गुंजाईश है. जब कोई मुद्दा दोनों दलों को साझा कार्रवाई की जरूरत महसूस कराता है, तब पुराने मतभेदों के बावजूद संवाद का रास्ता खुल सकता है। ममता बनर्जी और एम.ए. बेबी के बीच बातचीत इसी संभावना को सामने लाती है।
एम.ए. बेबी का ममता बनर्जी से संपर्क केवल दो नेताओं की बातचीत भर नहीं, बल्कि साझा मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच संवाद की एक महत्वपूर्ण मिसाल है। दिल्ली में चुनाव आयोग से जुड़े विवाद ने विपक्षी दलों को अपने मतभेदों से आगे बढ़कर सहयोग की संभावनाएं तलाशने का अवसर दिया है।
अब असली परीक्षा यह होगी कि यह पहल संयुक्त कार्यक्रमों, लगातार संवाद और ठोस राजनीतिक समन्वय में बदलती है या नहीं। यदि ऐसा होता है, तो विपक्षी एकता को नई दिशा मिल सकती है। लेकिन बंगाल में CPM और TMC के पुराने संघर्ष को देखते हुए राष्ट्रीय सहयोग और राज्यस्तरीय प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनता है तो आश्चर्य नहीं क्यूंकि,राजनीति सम्भावनाओं का खेल है.




