तहलका संडे स्पेशल : दो हत्याएं, दो साजिशें और 48 घंटे में चार को मौत की सजाएं; मेरठ की अदालतों के असाधारण फैसले

उत्तर प्रदेश के चर्चित हत्याकांड, जिनमें पत्नियों ने प्रेमियों की मदद से पतियों को कत्ल करने की गहरी साजिशों को अंजाम दिया, नीले ड्रम में बंद सच से लेकर बिस्तर पर छोड़े गए सांप तक: हत्या छिपाने के दो तरीके, लेकिन पोस्टमॉर्टम और साक्ष्यों ने खोल दी साजिश की परतें

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एम. रियाज़ हाशमी | मेरठ
उत्तर प्रदेश के मेरठ में 48 घंटे के भीतर दो हत्याकांडों में चार दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई। पहले मामले में मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को पूर्व मर्चेंट नेवी अधिकारी सौरभ राजपूत की हत्या के बाद शव के टुकड़े कर सीमेंट से भरे नीले ड्रम में छिपाने का दोषी ठहराया गया। दूसरे मामले में रविता कश्यप और उसके प्रेमी अमरदीप को रविता के पति अमित कश्यप की गला दबाकर हत्या करने और शव के पास जिंदा सांप रखकर मौत को सर्पदंश दिखाने की साजिश के लिए मृत्युदंड मिला।

14 अक्टूबर को सौरभ राजपूत हत्याकांड और 16 अक्टूबर को अमित कश्यप हत्याकांड में सजा सुनाई गई। दोनों अदालतों ने अपराधों को दुर्लभतम से दुर्लभ श्रेणी में रखा। लेकिन इन फैसलों की अहमियत सिर्फ चार लोगों को मौत की सजा सुनाए जाने में नहीं है। एक मामले में शव को छिपाकर अपराध के निशान मिटाने की कोशिश हुई, तो दूसरे में हत्या को प्राकृतिक मौत का रूप देने का प्रयास किया गया। दोनों मामलों में जांच के दौरान सामने आए साक्ष्यों ने अपराध की कथित कहानी और वास्तविक परिस्थितियों के बीच का अंतर उजागर किया।

इन फैसलों के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आया है: हत्या के बाद अपराध छिपाने की कोशिश को अदालतें किस तरह देखती हैं और मृत्युदंड तय करते समय अपराध की क्रूरता के अलावा किन कानूनी कसौटियों पर विचार किया जाता है?

नीले ड्रम में बंद था हत्या का राज

22 गवाह, 100 से अधिक सुनवाइयां और साक्ष्यों की कड़ियां; 15 दिन में दोषसिद्धि से सजा तक पहुंचा मामलाः सौरभ राजपूत की हत्या मार्च 2025 में मेरठ में हुई थी। अभियोजन के मुताबिक, उनकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने मिलकर हत्या की साजिश रची। आरोप था कि सौरभ को नशीला पदार्थ देकर बेहोश किया गया और फिर धारदार हथियार से उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद शव के टुकड़े कर नीले प्लास्टिक ड्रम में रखे गए और सीमेंट से ढक दिया गया।

ड्रम में शव छिपाने की इस कोशिश ने मामले को देशभर में चर्चा का विषय बना दिया। लेकिन अदालत में अभियोजन के सामने चुनौती केवल अपराध की भयावहता बताना नहीं, बल्कि यह साबित करना था कि हत्या किसने की और दोनों आरोपियों की इसमें क्या भूमिका थी। पुलिस ने आरोपियों की गतिविधियों, खरीदारी से जुड़े तथ्यों और दूसरे परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पड़ताल की। अभियोजन ने 22 गवाह पेश किए। मुकदमे के दौरान 100 से अधिक सुनवाइयां हुईं। अदालत ने 30 सितंबर 2026 को मुस्कान और साहिल को हत्या तथा साक्ष्य मिटाने का दोषी ठहराया। इसके 14 दिन बाद, 14 अक्टूबर को जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा ने दोनों को मृत्युदंड सुनाया।

यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों वाले मुकदमे में किसी एक संदिग्ध गतिविधि या वस्तु की खरीद से हत्या साबित नहीं होती। अदालत को यह देखना होता है कि अलग-अलग साक्ष्य एक-दूसरे से जुड़कर अपराध की ऐसी कड़ी बनाते हैं या नहीं, जो अभियुक्तों की भूमिका को विश्वसनीय ढंग से स्थापित करती हो। इस मामले में अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों को दोषसिद्धि और कठोरतम सजा के लिए पर्याप्त माना।

सांप के काटने की कहानी, लेकिन मौत गला दबाने से हुई

एक हजार रुपये में खरीदा गया सांप; पोस्टमॉर्टम ने बदल दी जांच की दिशाः दूसरा मामला अमित कश्यप की हत्या का है। अप्रैल 2025 में मेरठ के अकबरपुर सादात गांव में अमित का शव उनके बिस्तर पर मिला। शव के पास एक जिंदा सांप था। शुरुआत में परिवार को लगा कि मौत सर्पदंश से हुई होगी। लेकिन गर्दन और नाक के आसपास चोट के निशान मिलने के बाद संदेह पैदा हुआ।

पोस्टमॉर्टम में मौत का कारण सांप का काटना नहीं, बल्कि दम घुटना सामने आया। गर्दन पर दबाव से जुड़ी चोटों ने शुरुआती कहानी पर सवाल खड़े किए और जांच की दिशा बदल गई। अभियोजन के अनुसार, रविता कश्यप और अमरदीप के बीच संबंध थे। अमित को इसकी जानकारी होने के बाद दंपती के बीच विवाद बढ़े। आरोप था कि दोनों ने अमित की हत्या की साजिश रची। अभियोजन ने अदालत में दावा किया कि अमरदीप ने एक सपेरे से एक हजार रुपये में सांप खरीदा था। इसके लिए धार्मिक आयोजन का बहाना बनाया गया।

पुलिस के मुताबिक, अमित की गला दबाकर हत्या करने के बाद शव के पास सांप रख दिया गया, ताकि मौत को सर्पदंश का परिणाम समझा जाए। जांच में सांप उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति की गवाही और दूसरे साक्ष्य भी महत्वपूर्ण बने। अदालत ने 7 अक्टूबर 2026 को रविता और अमरदीप को दोषी ठहराया। 16 अक्टूबर को अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश जयवीर सिंह नागर ने दोनों को मृत्युदंड सुनाया। अभियोजन ने 12 गवाह पेश किए थे। फैसले के बाद बचाव पक्ष ने अपील करने की बात कही।

इस मामले में पोस्टमॉर्टम ने निर्णायक शुरुआती भूमिका निभाई। घटनास्थल पर सांप की मौजूदगी अपने आप में मौत का कारण साबित नहीं करती थी। चिकित्सकीय जांच ने मौत की वजह को लेकर संदेह दूर करने और हत्या की आशंका की पड़ताल आगे बढ़ाने में मदद की।

अदालतों की अहम टिप्पणियां: दंड, धर्म और वैवाहिक विश्वास

नीला ड्रम हत्याकांड: “दोषी को उसके अपराध की गंभीरता के अनुरूप दंड देना भी धर्म है।” सौरभ राजपूत मामले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा ने सजा सुनाते समय महाभारत का संदर्भ दिया। अभियोजन पक्ष के वकील के अनुसार, अदालत ने दंड को अपराध की गंभीरता के अनुरूप रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

सर्पदंश हत्याकांड: “दंड का भय समाज को नियंत्रण में रखता है।” अमित कश्यप मामले में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश जयवीर सिंह नागर ने मनुस्मृति के एक श्लोक का उल्लेख करते हुए दंड और सामाजिक व्यवस्था के संबंध पर टिप्पणी की। अदालत ने सावित्री के पौराणिक प्रसंग का भी हवाला दिया और वैवाहिक विश्वास के महत्व को रेखांकित किया।

दोनों फैसलों में धार्मिक और पौराणिक संदर्भों का इस्तेमाल दंड के औचित्य को समझाने के लिए किया गया। हालांकि, मृत्युदंड की कानूनी वैधता का मूल्यांकन साक्ष्यों, लागू कानून और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित न्यायिक कसौटियों के आधार पर ही किया जाता है।

दो हत्याएं, अपराध छिपाने के दो तरीके

दोनों मामलों की तुलना करने पर सबसे बड़ा अंतर अपराध छिपाने के तरीके में दिखाई देता है। सौरभ राजपूत मामले में शव के टुकड़े कर सीमेंट से भरे ड्रम में छिपाने का आरोप था। अमित कश्यप मामले में शव को छिपाने के बजाय मौत का कारण बदलकर पेश करने की कथित कोशिश हुई। पहले मामले में जांच की चुनौती हत्या और शव छिपाने से जुड़े साक्ष्यों को जोड़ना था। दूसरे मामले में शुरुआती सवाल यह था कि क्या मौत वास्तव में सांप के काटने से हुई थी। पोस्टमॉर्टम ने दूसरे मामले में इस सवाल का चिकित्सकीय जवाब देने में अहम भूमिका निभाई।

दोनों घटनाएं यह भी दिखाती हैं कि अपराध की जांच में शुरुआती धारणा को अंतिम सच नहीं माना जा सकता। घटनास्थल की परिस्थितियां, शव परीक्षण, गवाहों के बयान और अन्य भौतिक साक्ष्य मिलकर घटना की वास्तविक परिस्थितियों को समझने में मदद करते हैं। हालांकि, दोनों मामलों में निजी संबंधों को अपराध का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता। दोषसिद्धि का आधार अदालत के सामने पेश किए गए साक्ष्य और अभियोजन के आरोपों का न्यायिक मूल्यांकन था।

अपराध की क्रूरता बनाम मृत्युदंड की कसौटी

क्या जघन्य अपराध अपने आप मौत की सजा के लिए पर्याप्त है? दोनों अदालतों ने अपराध की गंभीरता और परिस्थितियों को देखते हुए मृत्युदंड सुनाया। लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था में मौत की सजा सामान्य दंड नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के मुताबिक, इसे केवल दुर्लभतम से दुर्लभ मामलों में दिया जा सकता है। अदालत को अपराध की प्रकृति और गंभीरता के साथ दोषी की व्यक्तिगत परिस्थितियों, सुधार की संभावना और आजीवन कारावास के विकल्प पर भी विचार करना होता है। हत्या के बाद शव छिपाने या जांच को गुमराह करने की कोशिश अपराध की परिस्थितियों को समझने में महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन केवल अपराध की वीभत्सता ही मृत्युदंड का पर्याप्त आधार नहीं है। इसलिए दोनों फैसलों का कानूनी महत्व केवल सजा की कठोरता में नहीं, बल्कि उन तर्कों और साक्ष्यों में भी है जिनके आधार पर अदालतों ने अधिकतम दंड चुना।

चार मौत की सजाएं, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया अभी बाकी

सत्र न्यायालय से मौत की सजा सुनाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि दोषियों को फांसी दे दी गई है या कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 407 के तहत सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई मौत की सजा हाईकोर्ट में पुष्टि के लिए भेजी जाती है। हाईकोर्ट की पुष्टि के बिना सजा पर अमल नहीं हो सकता।

हाईकोर्ट मामले के रिकॉर्ड और कानूनी पहलुओं की समीक्षा कर सकता है। कानून के अनुसार वह सजा की पुष्टि कर सकता है, दूसरी सजा दे सकता है या दोषसिद्धि को निरस्त कर सकता है। दोषियों को उपलब्ध कानूनी उपायों के तहत अपील करने का अधिकार भी है। इसलिए मेरठ के इन दोनों मामलों में निचली अदालतों के फैसले गंभीर न्यायिक घटनाक्रम जरूर हैं, लेकिन अंतिम कानूनी स्थिति आगे की न्यायिक प्रक्रिया से स्पष्ट होगी।

सनसनी से आगे: असली सबक जांच और न्याय का

नीले ड्रम और जिंदा सांप की वजह से इन मामलों ने व्यापक चर्चा बटोरी। लेकिन जांच के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों घटनाओं में शुरुआती कहानी को साक्ष्यों की कसौटी पर परखा गया। सौरभ राजपूत मामले में अभियोजन ने गवाहों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर अपनी दलीलें रखीं। अमित कश्यप मामले में पोस्टमॉर्टम ने मौत के कारण को लेकर संदेह दूर करने और जांच को नई दिशा देने में मदद की। इन मामलों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर हत्या में पोस्टमॉर्टम अकेले अपराधी तक पहुंचा देगा या परिस्थितिजन्य साक्ष्य हमेशा दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त होंगे। लेकिन यह जरूर स्पष्ट होता है कि निष्पक्ष जांच में शुरुआती धारणा को अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय हर तथ्य की वैज्ञानिक और कानूनी पड़ताल जरूरी है।

मेरठ की अदालतों के इन दो फैसलों ने चार लोगों को मौत की सजा सुनाए जाने के कारण राष्ट्रीय ध्यान खींचा है। अब आगे की न्यायिक समीक्षा यह तय करेगी कि ये फैसले कानूनी कसौटियों पर किस तरह टिकते हैं। क्योंकि अपराध कितना भी भयावह क्यों न हो, न्याय का स्थायी आधार सनसनी नहीं- साक्ष्य, कानून और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया है।