अंडरवर्ल्ड-2.0: टाइगर श्रॉफ पर हमले से पहले विदेश में बैठे अनिल पंडित के संपर्क में थे शूटर्स

सात गिरफ्तारियां, दो हथियार और विदेश में बैठे हैंडलर; लेकिन अभी कईं पेंचः अमृतसर में हथियारों का गुप्त ठिकाना, दिल्ली से मुंबई तक महिला कूरियर, ₹80 हजार तक का एडवांस भुगतान और शूटर्स के नेपाल भागने की थी योजना; क्या अनिल पंडित सिर्फ एक कड़ी है, या हमले के पीछे है बड़ा नेटवर्क?

एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली/ मुंबई
18 अक्टूबर की शाम मुंबई के जुहू इलाके में अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार पर हुई फायरिंग को पहली नजर में एक सेलिब्रिटी को डराने की कोशिश माना जा सकता था। लेकिन अगले तीन दिनों में सामने आई पुलिस जांच से जुड़े विवरणों ने इस मामले को कहीं ज्यादा गंभीर बना दिया। हथियारों की सप्लाई के लिए अलग-अलग लोगों का इस्तेमाल, अमृतसर में पूर्वनिर्धारित जगह से पिस्तौल और कारतूस उठाना, महिलाओं के जरिए उन्हें मुंबई पहुंचाना, एन्क्रिप्टेड ऐप पर निर्देश, हमले के बाद राज्य बदलते हुए भागना और अंततः नेपाल पहुंचने की योजना- ये सभी कड़ियां एक संगठित आपराधिक मॉड्यूल की आशंका पैदा करती हैं।

मुंबई पुलिस की जांच में अब तक तीन शूटरों और हथियारों की सप्लाई से जुड़े चार अन्य लोगों की गिरफ्तारी हुई है। लेकिन गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ने के बावजूद इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित है- आखिर हमले का अंतिम आदेश किसने दिया?

पुलिस के मुताबिक, हमले से पहले शूटरों ने टाइगर श्रॉफ के फुटबॉल खेलने की तस्वीरें और वीडियो अपने कथित हैंडलर को भेजे थे। लक्ष्य की पुष्टि होने के बाद ही गोलीबारी की गई। पुलिस सूत्रों के अनुसार, अनिल पंडित शूटरों के संपर्क में था और उसने हमले की जिम्मेदारी भी ली थी। रिपोर्ट कहती है कि लक्ष्य की तस्वीरें और वीडियो साझा किए गए और हर चरण की जानकारी फोन पर दी गई। इससे पंडित की भूमिका मजबूत होती है, लेकिन अभी यह साबित होना बाकी है कि अंतिम आदेश उसी ने दिया था।  सूत्र बताते हैं कि अनिल पंडित सीधे लॉरेंस बिश्नोई के संपर्क में नहीं था और उसे अमेरिका में मौजूद हैरी बॉक्सर से निर्देश मिलते थे। अनिल पंडित और कथित शूटर रेहान पहले रंदीप मलिक के नेटवर्क से जुड़े रहे थे और उसे रिपोर्ट करते थे। अमेरिका में मौजूद बताए जा रहे रंदीप मलिक और हैरी बॉक्सर के नाम भी नेटवर्क के संदर्भ में आए हैं। वहीं, सलमान खान को मूल निशाना बनाए जाने का दावा जांच में एक अलग और संवेदनशील कोण जोड़ता है। इस मामले की असली कहानी केवल गोली चलाने वालों की पहचान नहीं, बल्कि हथियार, पैसा, डिजिटल संपर्क और कथित आदेश देने वाले व्यक्ति के बीच प्रमाणित संबंध तलाशने में छिपी है।

अमृतसर से मुंबई: हथियारों के सफर की कथित गुप्त व्यवस्था

हथियारों की सप्लाई के लिए ऐसी व्यवस्था अपनाई गई, जिसमें सामान देने और लेने वाले व्यक्तियों का आमने-सामने मिलना जरूरी नहीं था। इस तरीके को ‘डेड लेटर बॉक्स’ कहा जाता है। इसमें किसी पूर्वनिर्धारित जगह पर सामान छोड़ दिया जाता है और दूसरा व्यक्ति वहां से उसे उठा लेता है।

जांच के मुताबिक, कुणाल और सुमित अमृतसर गए और एक निर्धारित स्थान से पिस्तौल तथा 20 कारतूस उठाए। पुलिस का दावा है कि उन्हें यह स्थान अनिल पंडित के निर्देश पर बताया गया था। इसके बाद हथियारों को मुंबई पहुंचाने की जिम्मेदारी राधा और बबीता को सौंपे जाने का आरोप है।

दोनों महिलाएं 15 अक्टूबर को दिल्ली से रवाना हुईं और 17 अक्टूबर को मुंबई पहुंचीं। वहां एक नाबालिग के हाथों बैग सौंपे जाने की बात कही गई है।

यहां सबसे बड़ा सवाल उस व्यक्ति की पहचान का है, जिसने अमृतसर में हथियार रखे थे। वह कौन था? क्या वह स्थानीय हथियार सप्लायर था या किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा? हथियारों का मूल स्रोत क्या था? क्या पिस्तौल और कारतूस एक ही जगह से आए थे? इन सवालों के निर्णायक जवाब अभी सामने नहीं आए हैं। लेकिन, हथियारों के पाकिस्तान से आने की आशंका भी जताई गई है।

₹80 हजार का हिसाब: किसने दिया पैसा और किसे मिला?

इस मामले में दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी धन के लेनदेन से जुड़ी है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के सूत्र बताते हैं कि हथियारों की व्यवस्था करने वाले कुणाल को 70-80 हजार रुपये दिए गए थे। इस रकम में से लगभग 10 हजार से 12 हजार रुपये महिला कूरियर को मिले। शूटर रेहान को 37 हजार रुपये दिए जाने की बात भी सामने आई है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ये अलग-अलग भुगतान थे, किसी एक रकम के अलग विवरण थे या जांच के विभिन्न चरणों से संबंधित आंकड़े? लेकिन इन रकमों से एक स्पष्ट जांच-प्रश्न जरूर निकलता है- क्या हथियारों की खरीद, उन्हें मुंबई पहुंचाने, शूटरों की भर्ती और भागने की व्यवस्था के लिए अलग-अलग भुगतान किए गए थे? यदि हां, तो इन सभी भुगतानों का अंतिम स्रोत कौन था? पुलिस नकदी की आवाजाही, बैंक खातों, डिजिटल भुगतान, आरोपियों के बीच संपर्क और हैंडलरों से जुड़े वित्तीय रिकॉर्ड की जांच शुरू कर चुकी है।

अनिल पंडित: समन्वयक या किसी बड़े नेटवर्क का मोहरा?

इस मामले में अनिल पंडित का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आया है। पुलिस के अनुसार, वह हथियारों की व्यवस्था करने वाले कुणाल के संपर्क में था और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप के जरिए निर्देश देता था। फायरिंग के बाद उसके नाम से सामने आए ऑनलाइन संदेश में हमले की जिम्मेदारी लेने और सलमान खान को चेतावनी देने का दावा भी किया गया। अमेरिका में मौजूद बताए जा रहे रंदीप मलिक का नाम भी सामने आया। पुलिस सूत्रों के हवाले से कहा गया कि अनिल पंडित और शूटर रेहान पहले मलिक को रिपोर्ट करते थे। सवाल उठता है कि क्या अनिल पंडित हमले की योजना बनाने वाला अंतिम व्यक्ति था, या वह किसी बड़े नेटवर्क के लिए स्थानीय स्तर पर समन्वय कर रहा था?

फायरिंग के तुरंत बाद किसे दी गई थी सूचना?

इस मामले की एक महत्वपूर्ण कड़ी शूटरों के फोन और फायरिंग के बाद हुई गतिविधियों से जुड़ी है। मुंबई क्राइम ब्रांच यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि 18 वर्षीय शूटर रेहान रहीसुद्दीन फायरिंग से पहले और उसके तुरंत बाद किसके संपर्क में था। अनिल पंडित के नाम से सामने आए अकाउंट ने फायरिंग के कुछ ही मिनटों के भीतर कथित हमले का स्क्रीनशॉट साझा किया था। इस घटनाक्रम और डिजिटल सामग्री की फॉरेंसिक जांच में प्रमाणिकता परखी जा रही है। ताकि यह समझने में मदद मिल सके कि हमले की जानकारी कितनी तेजी से हैंडलर तक पहुंची? यह पता लगाया जा रहा है कि स्क्रीनशॉट किसने बनाया, किसने भेजा और उसे साझा करने वाला अकाउंट किसके नियंत्रण में था?

कैब ड्राइवर की एक कॉल से खुली फरारी की कड़ी

फायरिंग के बाद शूटरों ने पुलिस से बचने के लिए कई स्थानों और यात्रा के साधनों का इस्तेमाल किया। उन्होंने मोटरसाइकिल छोड़ने के बाद लोकल ट्रेन से बोरीवली का रास्ता लिया और वहां से कैब के जरिए सूरत पहुंचे। इसके बाद उन्होंने पुणे-जयपुर एक्सप्रेस पकड़ी। लेकिन सूरत जाने के लिए बुक की गई कैब नहीं पहुंची तो आरोपियों में से एक ने ड्राइवर को फोन कर अपनी प्रतीक्षा की जगह बताई। इसी संपर्क से जांचकर्ताओं को एक महत्वपूर्ण सुराग मिला। रेलवे स्टेशनों की सीसीटीवी फुटेज और पुलिस के समन्वय के बाद तीनों को राजस्थान के कोटा में पकड़ा गया। कोटा पुलिस ने बताया कि आरोपी जयपुर उतरकर बस से नेपाल भागने की योजना बना रहे थे। इस घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि फोन बंद रखने के बावजूद आरोपियों की यात्रा का क्रम कैब बुकिंग, ड्राइवर से संपर्क और रेलवे स्टेशनों के सीसीटीवी के जरिए जोड़ा जा सका। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कैब किसके खाते से बुक हुई थी, भुगतान किसने किया था और क्या किसी अन्य व्यक्ति ने आरोपियों के लिए यात्रा की व्यवस्था की थी?

मोटरसाइकिल के तीन मालिक: संयोग या पहचान छिपाने का तरीका?

फायरिंग में इस्तेमाल बजाज पल्सर 220 मोटरसाइकिल 2014 में खरीदी गई थी। इसके बाद 2022 में यह दूसरे मालिक के पास पहुंची और फिर इस्माइल नाम के व्यक्ति के हाथों बेची गई। पुलिस ने आगे की जांच में मोटरसाइकिल का संबंध आरोपी ऋतिक महतो उर्फ रोशन से जोड़ा। पुलिस ने अंधेरी रेलवे स्टेशन के पास मोटरसाइकिल को देखा और उसके पंजीकरण नंबर से पुराने मालिकों तक पहुंची। इस घटनाक्रम से यह सवाल उठता है कि हमले में इस्तेमाल वाहन का अंतिम उपयोगकर्ता कौन था और उसने इसे कैसे हासिल किया? लेकिन मोटरसाइकिल का तीन मालिकों से गुजरना अपने आप में किसी साजिश का प्रमाण नहीं है। यह स्थापित करना होगा कि अंतिम बिक्री कब हुई, भुगतान किसने किया, वाहन किसके कब्जे में था और क्या किसी व्यक्ति ने जानबूझकर वास्तविक उपयोगकर्ता की पहचान छिपाई? यदि वाहन की खरीद, भुगतान और हमले से पहले उसकी आवाजाही के बीच संबंध स्थापित होता है, तो यह पूर्वयोजना की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है।

क्या सलमान खान थे असली निशाना?

इस मामले का सबसे संवेदनशील पहलू सलमान खान को संभावित निशाना बनाए जाने का दावा है। पुलिस सूत्रों ने बताया कि सलमान खान को पहले निशाना बनाने की योजना हो सकती थी। उनकी कड़ी सुरक्षा के कारण टाइगर श्रॉफ को चुने जाने की दिशा में योजना बदली गई। हमले के बाद सामने आए ऑडियो और संदेशों में सलमान खान को चेतावनी दिए जाने की रिपोर्ट भी है। दूसरी ओर, सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच में सामने आया कि तीन आरोपी 11 अक्टूबर को भी जुहू के उसी फुटबॉल मैदान पर पहुंचे थे। पुलिस को संदेह है कि उस दिन भी वे हमले की कोशिश में थे, लेकिन टाइगर श्रॉफ वहां नहीं पहुंचे। इससे टाइगर श्रॉफ की रेकी किए जाने की आशंका मजबूत होती है। लेकिन सलमान खान को पहले से तय लक्ष्य बनाए जाने का दावा अलग है।

दो हथियार, पांच खोखे और दो जिंदा कारतूस: अब फॉरेंसिक जांच

घटनास्थल से पांच खाली कारतूस के खोखे और दो जिंदा कारतूस मिले हैं। कारतूस 7.62 एमएम कैलिबर के बताए गए हैं। एक हथियार में खराबी आने की आशंका भी जताई गई है। यदि फॉरेंसिक जांच में खोखों और बरामद हथियारों के बीच बैलिस्टिक मिलान हो जाता है, तो हथियारों की सप्लाई चेन और फायरिंग की घटना के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने में मदद मिलेगी। कुणाल हाल ही में जमानत पर जेल से बाहर आया था। पुलिस का कहना है कि उसके एक परिचित ने उसे अनिल पंडित से मिलवाया था, जिसके बाद वह एन्क्रिप्टेड ऐप पर उसके संपर्क में आया। ऐसे में एक नया सवाल उठता है: कुणाल को पंडित से मिलवाने वाला व्यक्ति कौन था और क्या उसका संबंध हथियारों की सप्लाई या कथित शूटरों से भी था?

जांच की असली परीक्षा: सात गिरफ्तारियों के बाद क्या बचा है?

इस मामले में अब तक सामने आई जानकारी से तीन अलग-अलग लेकिन परस्पर संबंधित जांच-धाराएं दिखाई देती हैं। पहली, हथियारों की सप्लाई- अमृतसर से उन्हें उठाने और मुंबई पहुंचाने तक की कथित व्यवस्था। दूसरी, स्थानीय मॉड्यूल- शूटरों की भर्ती, रेकी, हमले के बाद फरारी और नेपाल जाने की कथित योजना। तीसरी, हैंडलर नेटवर्क- अनिल पंडित, रंदीप मलिक और हैरी बॉक्सर के बीच संपर्क तथा हमले के अंतिम आदेश की तलाश।

इन तीनों धाराओं के बीच संबंध स्थापित करने के लिए पुलिस को वित्तीय रिकॉर्ड, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, डिजिटल संदेशों, सीसीटीवी फुटेज और फॉरेंसिक रिपोर्टों को एक साथ जोड़ना होगा। क्योंकि सात गिरफ्तारियां अपने आप में यह साबित नहीं करतीं कि पूरी साजिश का पर्दाफाश हो गया है। न ही किसी व्यक्ति का नाम पुलिस जांच में आना दोष सिद्ध होने के बराबर है। इस मामले का निर्णायक खुलासा तभी होगा, जब जांच यह प्रमाणित कर सकेगी कि हथियार किसने दिए, पैसा किसने दिया, हमला करने का अंतिम आदेश किसने दिया और इन सभी के बीच वास्तविक संबंध क्या था?