मांझी के मन में क्या है?

फोटोः प्रशांत रवि
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फोटोः प्रशांत रवि

बिहार में एक लोककथा अक्सर सुनने को मिलती है.  अमावस की रात एक पंडित के यहां चोरों ने सेंध मारी. पंडित-पंडिताइन दोनों जान गए कि चोर आए हैं. पंडिताइन पंडित से बोली, ‘देखोजी, चोर आए हैं. शोर मचाओ.’ पंडित ने पंडिताइन को इशारे से समझाया, ‘भाग्यवान, अभी कुछ नहीं बोलो. अभी शोर मचाने का साइत नहीं.’ चोर चोरी करके चलते बने. लगभग एक महीने बाद पूर्णिमा की रात पंडित ने जोर-जोर से चोर-चोर का शोर मचाना शुरू किया. गांववाले पंडित के घर की ओर लाठी-डंडा लेकर दौड़े. पूछा कि किधर है चोर. पंडित ने कहा, ‘आज और अभी थोड़ी न आए हैं चोर, वे तो अमावस्या की रात आए थे, आज तो शोर मचाने का साइत-संजोग ठीक बन रहा है, इसलिए शोर मचाया.’ गांववाले पंडित को कोसते हुए आधी रात को वापस लौट आये और यही बतियाते रहे कि पंडितजी की बात भरोसे लायक नहीं .

इन दिनों जब बिहार में  मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के एक मंदिर में जाने के बाद उस मंदिर की सफाई के प्रसंग पर जमकर राजनीतिक बवाल हो रहा है तो बहुत से लोग इस किस्से को भी याद कर रहे हैं. यह विवाद 28 सितंबर को तब शुरू हुआ जब बिहार के दिग्गज दलित नेता रहे और पूर्व मुख्यमंत्री भोलापासवान शास्त्री के जयंती समारोह में मांझी ने यह बताया कि राज्य में हालिया उपचुनाव के दौरान जब वे मधुबनी जिले के एक मंदिर में गए तो उनके जाने के बाद मंदिर का शुद्धिकरण करने के लिए उसे धोया गया. मूर्तियों को भी धोया गया. मांझी ने कहा कि यह सूचना उन्हें राज्य के खान एवं भूतत्व मंत्री रामलखन राम रमण ने दी. मांझी ने कहा कि उन्हें बहुत दुख हुआ. उनका कहना था, ‘मेरे पास काम के लिए लोग आते हैं तो पैर छूते हैं. मैं जान नहीं पाता कि उनके मन में क्या है? बाद में ऐसा व्यवहार करते हैं. मैं अछूत हूूं, इसलिए… मेरा अनुसूचित जाति के घर में जन्म लेना ही कसूर है न!’  मांझी ने ऐसी कई भावुक बातें कहीं. इसकी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक ही था. देखते ही देखते मांझी के पक्ष में सहानुभूति की लहर चलने लगी.

लेकिन अब मांझी अपने ही बयान में फंसते दिख रहे हैं. सबसे पहले तो उन्हें उनके ही मंत्री रामलखन राम रमण ने झटका दिया. रमण के हवाले से ही मंदिर के शुद्धिकरण की सूचना मिलने की बात मांझी ने सार्वजनिक मंच पर साझा की थी. रमण ने कहा कि पता नहीं क्यों और कैसे मुख्यमंत्री ने उनका नाम लिया क्योंकि वे उस आयोजन में मांझी के साथ नहीं थे. रमण यहां तक बोले कि वे चुनाव प्रचार में भी मांझी के साथ नहीं थे. जदयू के प्रमुख नेता, राज्य सरकार में मंत्री व पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के बेटे नीतीश मिश्र ने भी बिना देर किए कहा कि मुख्यमंत्री को दी गई सूचना गलत और भ्रामक है. तहलका से बातचीत में वे कहते हैं, ‘उपचुनाव के दौरान मुख्यमंत्री का कार्यक्रम अंधराठाढ़ी में था, रास्ते में मां परमेश्वरी का मंदिर पड़ता है, मुख्यमंत्री ने वहां रुककर पूजा-अर्चना की थी. बात बस इतनी-सी ही है.’ मिश्र आगे जोड़ते हैं, ‘जिस मूर्ति को धोने की बात मुख्यमंत्री बता रहे हैं वह मिट्टी का पिंड है, जिसे कभी धोया ही नहीं जाता.’

मंदिर प्रकरण को छोड़ भी दें तो मांझी शुरुआत से ही महादलितों व दलितों के मसले पर अपना अलग रुख दिखाकर एक निश्चित दिशा में जाते हुए दिखते हैं 

मांझी यह बात कहकर अपनों से तक घिरते गए. उनके दो मंत्रियों के अलावा जदयू के ही विधान पार्षद विनोद सिंह ने भी कहा कि उस दिन वे मुख्यमंत्री के साथ थे और ऐसी कोई घटना नहीं हुई. उधर, मंदिर के पुजारी अशोक कुमार झा भी इसकी पुष्टि करते हैं. वे कहते हैं, ‘मंदिर में भगवती की कोई प्रतिमा नहीं है. वैसे तो रोजाना ही सुबह-शाम मंदिर की साफ-सफाई होती है, लेकिन 18 अगस्त को सीएम के आने की वजह से ज्यादा लोग आए थे तो उस शाम सफाई तक भी नहीं हो सकी थी. 19 की सुबह ही सफाई हुई थी.’

मांझी ने भोला पासवान को याद करते हुए जो कहा, वह क्यों कहा, किस मकसद से कहा, यह तो वही बता सकते हैं. लेकिन वे फिलहाल यह बताने की बजाय अपने बयान से बने जाल से निकलने की कोशिश में लगे हुए हैं. मांझी ने जब यह बात कही तो तुरंत जांच की बात उठी और बिना कोई वक्त लिए जांच कमिटी भी गठित हो गई. जांच का जिम्मा दरभंगा प्रमंडल के आयुक्त बंदना किन्नी और आईजी एके आंबेडकर को दिया गया है. जो परिणाम सामने आएंगे, हो सकता है उनमें वक्त लगे, लेकिन अभी से जो संकेत मिल रहे हैं, उससे मांझी इस मामले में फंसते ही नजर आ रहे हैं. मंदिर के पुजारी अशोक झा  ने जांच दल को बताया कि मंदिर के पिंड को कभी धोया नहीं जाता, सुबह-शाम घी लगाया जाता है. उनके मुताबिक जिस दिन मुख्यमंत्री आए थे उस दिन मंदिर के बाहर मटका फोड़ का आयोजन भी था इसलिए भीड़-भाड़ की वजह से शाम को साफ-सफाई भी नहीं हुई थी. पुजारी अशोक झा ताल ठोकते हुए कह रहे हैं कि हर तरह की जांच हो जाए. यह भी कि अगर वे गलत हैं तो उन्हें फांसी पर चढ़ाया जाये और अगर बात में सच्चाई नहीं है तो गलत बात कहने वाले को सजा मिले. स्थानीय ग्रामीणों का भी कहना है कि जिस मंदिर की बात मुख्यमंत्री उठा रहे हैं उसमें इस रास्ते से गुजरनेवाले दलित-महादलित अधिकारी नियमित आते हैं और कभी किसी को रोका नहीं गया. गांव के लोग यह भी बताते हैं कि उस मंदिर में होने वाले भजन में जो नियमित ढोल बजानेवाला है, वह दलित चौठी राम ही है.

ऐस कहनेवाले अब सिर्फ पुजारी या ग्रामीण नहीं हैं. मांझी इस मामले में अब चारों तरफ से घिरते नजर आ रहे हैं. एक तरफ उन्हें इस मुद्दे पर अपने दल की ओर से कोई सहयोग नहीं मिल रहा तो दूसरी ओर भाजपा को जैसे बैठे-बिठाए एक मौका मिल गया है. पार्टी नेता सुशील मोदी कहते हैं कि अगर यह घटना सही है और सीएम के जाने की वजह से मंदिर का शुद्धिकरण हुआ है तो वे इसकी निंदा करते हैं लेकिन अगर यह सही नहीं है तो फिर जिस मंत्री ने मुख्यमंत्री को यह सूचना दी, उसे बर्खास्त करना चाहिए. उनका कहना था, ‘अगर सीएम झूठ बोल रहे हैं तो उन पर आईपीसी की धारा 152 एक के तहत मामला दर्ज होना चाहिए जिसके तहत गैर जमानती वारंट और तीन साल की सजा का प्रावधान है.’ मोदी इस मसले पर सवर्णों के बीच पार्टी को और मजबूत करने में लगे हैं. साथ ही वे इसे मिथिला इलाके का अपमान बताकर क्षेत्र की राजनीति को भी साध लेने की जुगत लगाये हुए हैं.

सुशील मोदी राजनीति करते हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि वे हर मुमकिन मौके से राजनीतिक फायदा उठाना चाहेंगे और वे वैसा ही कर रहे हैं. लेकिन इस पूरे प्रकरण में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि आखिर मांझी ने एक घटना के इतने दिनों बाद, वह भी एक प्रमुख दलित नेता के जयंती समारोह में अचानक ही यह बात हवा में क्यों उछाल दी. जदयू के पूर्व पार्षद रहे और अब राजद से ताल्लुक रखनेवाले नेता व लेखक प्रेम कुमार मणी कहते हैं, ‘मांझी ऐसी बात कर रहे हैं कि समझ में ही नहीं आ रहा. मान लिया कि घटना सही भी हो. लेकिन क्या कोई एसपी, डीएसपी आकर कहे कि उसे तो एक उचक्के ने आज रास्ते में पीट दिया तो क्या करें?’ वे आगे कहते हैं, ‘मांझी मुख्यमंत्री हैं. अगर इस बात की सूचना उन्हें एक माह से भी अधिक समय पहले मिली थी तो उन्होंने तुरंत ही क्यों नहीं इसकी पुष्टि और जांच करवाकर अस्पृश्यता निवारण कानून के तहत केस नहीं किया? एक मुख्यमंत्री इतनी उम्मीद तो की ही जाती है.’

ऐसे सवालों के जवाब में मांझी कहते हैं कि वह उपचुनाव का समय था और वे ऐसा कहते तो सामाजिक तनाव का खतरा होता. उधर, मणी कहते हैं, ‘उस दिन भी जीतन राम मांझी सार्वजनिक तौर पर यह बात एक महादलित की तरह बता रहे थे, जबकि उन्हें हमेशा यह याद रखना चाहिए  िक वे सिर्फ महादलित नहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं और इस तरह की बातें, इतने दिनों बाद कहकर भी वे सामाजिक तनाव बढ़ाने का ही काम करेंगे.’ उनके मुताबिक सवाल यह भी है कि अगर महादलितों के साथ आज भी बिहार में ऐसा ही सुलूक होता है तो यह तो नीतीश कुमार के शासनकाल पर भी एक सवाल है. वे कहते हैं, ‘इसलिए कि उनके शासनकाल में सबसे ज्यादा महादलितों की स्थिति ही सुधारने और उनके विकास की बात कही जाती है लेकिन इतने सालों क्या स्थितियों में कोई बदलाव नहीं हुआ.’  इस बारे में बात करने पर हाल तक जद यू के प्रमुख नेता रहे शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘मामला समझ में नहीं आ रहा. क्यों मांझी इतने दिनों तक चुप रहने के बाद बोले? जिसके हवाले से बोले वही इंकार कर रहा है, उनकी पार्टी के नेता इंकार कर रहे हैं.’ तिवारी कहते हैं कि इस बात को सार्वजनिक मंच से कहकर मांझी अपनी पार्टी की फजीहत ही करवा रहे हैं.

‘वे जानते हैं कि अगर महादलितों और दलितों का नेता बना जाए तो जदयू-राजद गठबंधन के लिए उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा’

मंदिर धुलाई मामले में मांझी सच बोल रहे हैं या झूठ अभी तो साफ-साफ नहीं कहा जा सकता. इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बिहार के कई हिस्सों में आज भी दलितों से अछूतों की तरह व्यवहार किया जाता है और रोजमर्रा के जीवन में उन्हें मानसिक प्रताड़ना का सामना भी करना पड़ता है. लेकिन मांझी अगर दूसरे संदर्भ में, दूसरे प्रसंग के साथ यह बात रखते तो बात इतनी आगे नहीं बढ़ती. यह भी सच है कि अब आगे जांच के परिणाम चाहे जो आएं, घटना के लगभग डेढ़ माह बाद सनसनी के साथ, वह भी किसी के जरिये प्राप्त जानकारी का हवाला देकर सार्वजनिक मंच पर ऐसी बात कहकर उन्होंने अपनी पार्टी को न उगलने-न निगलनेवाली स्थिति में ला दिया है.

अब सवाल दो हैं. पहला यह कि क्या मांझी इतने नासमझ नेता हैं कि ऐसा कहने के पहले उन्होंने जरा भी सोचा नहीं होगा कि इसके आगे-पीछे ढेरों सवाल खड़े होंगे. इससे पार्टी की छवि को भी नुकसान होगा और इससे एक नयी बहस का दौर भी शुरू होगा. या फिर मांझी ने सबकुछ सोच-समझकर यह बात कही होगी.

मांझी को नासमझ नेता मानने को शायद ही कोई तैयार हो. इसकी वजहें भी हैं. मांझी पिछले तीन दशक से अधिक समय से बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं और अच्छे ओहदे के साथ भी राजनीति करते उन्हें एक लंबा समय हो गया है. यूं भी राजनीति में वे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और धाकड़ कूटनीतिक नेता सत्येंद्र नारायण सिन्हा के चेले माने जाते हैं. जगन्नाथ मिश्र को भी उनका गुरू कहा जाता है. सत्येंद्र नारायण सिन्हा और जगन्नाथ मिश्र की राजनीति को जाननेवाले जानते हैं कि दोनों सधी हुई चाल चलने में उस्ताद नेता रहे हैं. कई राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस लिहाज से देखें तो मांझी को कभी भी इतना नासमझ नेता नहीं माना जा सकता कि वे बिना सोचे कुछ भी बोल दें.

मंदिर शुद्धिकरण मामले की जांच के चाहे जो नतीजे निकलंे. संभव है मांझी ने किसी के कहे पर ही जो बात हवा में उछाली है, वह सही भी साबित हो जाए. तब भी इस मामले को लेकर मांझी पर उठे सवाल अपनी जगह रहेंगे. सबसे पहला सवाल कि वे इतने दिनों तक वह चुप्पी क्यों साधे रहे. अगर उन्हें सार्वजनिक तौर पर यह कहना ही था तो पहले जांच ही क्यों नहीं करवा ली? उसके बाद इस बात को सार्वजनिक तौर पर कहते. मांझी को करीब से जाननेवाले गया के एक पत्रकार बताते हैं, ‘मंदिर मामले में क्या सच्चाई है, मैं यह तो नहीं कह सकता, लेकिन यह तय है कि मांझी जो बोलते हैं बहुत कैलकुलेट कर बोलते हैं.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘मांझी एक साथ कई तरह की राजनीति साध लेने की जुगत में हैं. जिस दिन वे मंदिर प्रकरण पर बोले थे, उसी दिन उन्होंने यह भी कहा था कि वे सिर्फ 15 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करनेवाले नेता नहीं है, बल्कि महादलित के साथ दलितों को मिलाकर 23 प्रतिशत की आबादी होती है बिहार में और अगर यह एकजुट हो जाए तो फिर अगला मुख्यमंत्री इसी समुदाय से होगा.’ मांझी को करीब से जाननेवाले गया के इस पत्रकार जैसी बातें ही कुछ दूसरे जानकार भी कहते हैं.

भाजपा नेता सुशील मोदी चुटकी लेने के अंदाज मंे कहते हैं कि मांझी को नीतीश कुमार ने रोबोट सीएम बनाया था, लेकिन मांझी खुद ही रोबोट के माउस को आॅपरेट करने लगे हैं. मोदी विपक्षी नेता हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि वे चुटकी ले रहे हैं या मंदिर मामले से राजनीतिक फसल काटने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन और भी कई हैं जो मानते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही मांझी अपनी अलग राह बना रहे हैं और मंदिर मामले को उठाकर उन्होंने बिना किसी की परवाह करते हुए सोच-समझकर एक चाल चली है.

साथ-साथ! विरोधियों का आरोप है कि मांझी, नीतीश कुमार की छाया से बाहर निकलने की कोशिश में हैं
साथ-साथ! विरोधियों का आरोप है कि मांझी, नीतीश कुमार की छाया से बाहर निकलने की कोशिश में हैं

1 COMMENT

  1. मांझी तो राजनीति करते हैं निराला जी …………..आप अशोक कुमार झा,नीतीश मिश्र ,पुजारी और इन सब के साथ आप तो है हीं …सारे तर्क देकर क्या करना चाहते हैं महोदय आप का एजेंडा क्या है.

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