गति की अति!

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दिल्ली के खिड़की एक्टेंशन मामले में आरोपित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर धरने पर बैठे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल. फोटो: विकास कुमार

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महीना एक, विवाद अनेक. कुछ इसी तर्ज पर आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार ने बीती 28 जनवरी को दिल्ली में एक महीने का कार्यकाल पूरा कर लिया. पिछले एक महीने में अरविंद केजरीवाल आंदोलनकारी से ‘नायक’ मुख्यमंत्री बनते हुए अराजक, तानाशाह और न जाने क्या-क्या बन गए. पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक लक्ष्मीनगर से पार्टी विधायक विनोद कुमार बिन्नी जो पार्टी के दिल्ली में सत्ता में आने से पहले उसके एक मात्र जनप्रतिनिधि हुआ करते थे, जिनकी तारीफ करते हुए केजरीवाल और पार्टी के अन्य नेता अघाते नहीं थे, जिनके क्षेत्र में गठित की गई मोहल्ला सभा को पार्टी चुनाव से पहले आदर्श मॉडल के तौर पर प्रचारित करती रही और सत्ता में आने पर इसे पूरी दिल्ली में लागू करने का वायदा भी करती रही वे बिन्नी अब पार्टी से बाहर निकाले जा चुके हैं.

पार्टी के बीते 30 दिनों के लेखे-जोखे और उसकी बनती बिगड़ती तस्वीर को क्रमबद्ध तरीके से देखने- समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. इसकी शुरुआत आठ दिसंबर के चुनाव परिणाम आने के साथ हुई थी. भाजपा 32 सीटों (अकाली दल की एक सीट शामिल है) के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी. इसके बावजूद उसने दिल्ली में सरकार बनाने से इंकार कर दिया. पार्टी का आकलन था कि चूंकि बहुमत उसे मिला नहीं है, ऐसे में जोड़-तोड़ करने के बाद ही उसकी सरकार प्रदेश में बन सकेगी. यूपी से लेकर झारखंड आदि में सत्तासीन होने के लिए तमाम नैतिक-अनैतिक तरीके अपना चुकी भाजपा ने अचानक से ही हज पर जाने का मूड बना लिया था. वह अब नौ सौ चूहों की मौत को भूलना चाहती थी. भाजपा ने तय किया कि चूंकि जनता से उसे पूर्ण बहुमत नहीं दिया है सो वह सरकार नहीं बनाएगी. यह सबको पता चल गया कि इस कुर्बानी की स्क्रिप्ट नरेंद्र मोदी ने आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर लिखी है.

भाजपा का ऐसा आकलन था कि यहां नैतिक दिखने, विधायकों की खरीद-फरोख्त से बचने का फायदा पार्टी को आगामी लोकसभा के चुनाव में मिलेगा. हालांकि यह उसी आप का नतीजा था जिसकी कॉपी भाजपा कर रही थी. बड़े फायदे को ध्यान में रखकर पार्टी ने नैतिकता का चोला ओढ़ लिया. भाजपा के इंकार करने बाद दिल्ली के उप राज्यपाल ने दूसरी सबसे बड़ी पार्टी आप को बुलाया. आप ने भी सरकार बनाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया. उनका भी तर्क यही था कि जोड़तोड़ कर वे कोई सरकार नहीं बनाएंगे. इसी बीच बड़ी खबर यह आई कि कांग्रेस अपने आठ विधायकों का समर्थन आप को देने को तैयार है.

आप के प्रस्ताव ठुकराने के बाद से ही चारों तरफ एक माहौल आप के पक्ष में बनने लगा. लोगों की धारणा थी कि आप को मौका नहीं चूकना चाहिए और सरकार बनाने का प्रयास करना चाहिए. हर तबके से ऐसे विचार आने लगे. लोग उस नई पार्टी की नई राजनीति को अपना समर्थन दे चुके थे. वे आप को वह सब कुछ करते हुए देखना चाहते थे जिसका उसने वादा किया था. दैनिक अखबार जनसत्ता के संपादक ओम थानवी की उस समय टिप्पणी थी, ‘केजरीवाल को निर्णय करना होगा. गेंद उनके पाले में है. पता नहीं क्यों अब मुझे लगता है कांग्रेस के दिलासे में छुपा जोखिम उन्हें उठाना चाहिए. जितना कर सकते हो, कर दिखाओ. कहीं नए तेवर की राजनीति और कुछ अलग काम देखने की लोगों की हसरत ही न बुझ जाए.’ थानवी जैसी भावना रखने वाले लोग उस समय दिल्ली और देश में बहुत थे.

उस समय ऐसे लोगों की भी एक बड़ी तादाद थी जो मानते थे कि अरविंद और उनकी टीम चूंकि सरकार चलाने के योग्य नहीं है, उन्हें विश्वास नहीं है कि वे सरकार चला पाएंगे, इस कारण वे सरकार बनाने से पीछे हट रहे हैं. ऐसा मानने वालों में भाजपा और कांग्रेस वालों की बहुतायत थी. कांग्रेस का अपना एक अनुमान यह भी था कि आप ने चुनावी घोषणापत्र में जो वादे कर रखे हैं, उन्हें पूरा कर पाना असंभव है इसलिए उसे आप को जनता के सामने एक्सपोज करने का यही सही मौका लगा. उम्मीदों का बढ़ता दबाव देखकर आप ने जनता की राय लेने की घोषणा की. अरविंद केजरीवाल ने जनता से सरकार बनाने को लेकर राय मांगी. जनता की राय आप की सरकार बनाने के पक्ष में आई. कांग्रेस अपने आठ विधायकों का समर्थन संबंधी पत्र पहले ही उपराज्यपाल के पास पहुंचा चुकी थी सो आप के सरकार बनाने का रास्ता साफ हो गया. दो दिनों बाद राज्यपपाल ने केजरीवाल को बतौर मुख्यमंत्री उनके छह कैबिनेट मंत्रियों के साथ रामलीला मैदान में शपथ दिलाई. अब विधानसभा में पार्टी को विश्वासमत हासिल करना था. जैसा कि सबको उम्मीद थी विधानसभा में भी पार्टी ने विश्वासमत हासिल कर लिया.

यहां से आम आदमी पार्टी की आलोचना का दूसरा और बेहद कड़ा दौर शुरू होता है. पहली आलोचना ही यह रही कि जिस कांग्रेस से न समर्थन लेने और न समर्थन देने की बात केजरीवाल कहते आए थे, आखिरकार उसी कांग्रेस के समर्थन से उन्होंने सरकार बना ली. इस मुद्दे को लेकर भाजपा सबसे ज्यादा हमलावर थी. पार्टी का कहना था कि वह शुरू से ही कहती आई थी कि केजरीवाल और उनकी टीम कांग्रेस की ‘बी’ टीम है और उनका एक मात्र उद्देश्य भाजपा को रोकना है. कांग्रेस से समर्थन लेने की बात पर कभी समाप्त न होने वाले विवाद की शुरुआत हो चुकी थी.

सरकार बनाने के साथ ही केजरीवाल सरकार पर चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को लागू करने का भारी दबाव था. आप ने सत्ता में आते ही वीआईपी कल्चर को खत्म करने के अपने चुनावी वायदे पर तत्काल प्रभाव से अमल किया. मुख्यमंत्री और कैबिनेट ने न सिर्फ लाल बत्ती और सुरक्षा आदि लेने से इंकार कर दिया बल्कि सारे अधिकारियों के लिए लाल बत्ती लगाना मना कर दिया गया. सचिवालय की गाड़ियों से एक झटके में सारी लाल, नीली बत्तियां और सायरन गायब हो गए. अखबारों में ऐसी खबरें आईं जहां आप सरकार के मंत्रियों ने अपने दफ्तर, जिसमें अब तक पूर्व की कांग्रेस सरकार के मंत्री बैठते थे, को जरूरत से अधिक सुविधासंपन्न और विलासिता वाला बताते हुए उसे सामान्य बनाने का काम शुरू किया. इसी संदर्भ में अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में एक तस्वीर छपी जिसमें सरकार के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया के कमरे से एक कुर्सी को बाहर ले जाया जा रहा था और दूसरी कुर्सी उनके बैठने के लिए लाई जा रही थी. तस्वीर के नीचे लिखा था, ‘मैं आरामदायक कुर्सी पर नहीं बैठना चाहता. इसीलिए सामान्य कुर्सी मंगाई गई है.’ प्रतीकों की राजनीति का यह चरम था.

सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भी केजरीवाल और उनके साथी मेट्रो से शपथ लेने रामलीला मैदान पहुंचे थे. देश में यह पहली बार था जब मुख्यमंत्री और सरकार के मंत्री सार्वजनिक यातायात के साधनों का इस्तेमाल करते हुए शपथ लेने पहुंचे थे. सरकार जनता के बीच यह संदेश देने में सफल रही कि वह कहने के लिए नहीं वरन पूरी तरह से आम आदमी की सरकार है.

लेकिन उसी सरकार के आम से दिखने वाले चेहरे पर पहला प्रश्न उस समय खड़ा हुआ जब यह खबर आई कि सरकार के मंत्रियों को इनोवा गाड़ी दी गई है तथा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जो कौशांबी स्थिति अपने घर से दिल्ली आना जाना करते थे उनके रहने और ऑफिस के लिए भगवान दास रोड पर एक-दूसरे से सटे डीडीए के 5-5 कमरे वाले दो ड्यूप्लेक्स घर को चुना गया है. खबर आई कि अरविंद ने भी इसमें शिफ्ट होने पर सहमति जता दी है.  विपक्ष के हाथ में यह खबर हथियार बन गई. पार्टी, सरकार और खासकर केजरीवाल की आलोचना शुरू हो गई. गाड़ी वाले मसले पर आलोचकों का कहना था कि जो लोग मंत्री बनने के लिए मेट्रो से पहुंचे थे और जिन्होंने कहा था कि वे आम लोगों की तरह ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करेंगे उन्हें एकाएक इनोवा की जरूरत क्यों पड़ गई. क्या मेट्रो से शपथ लेने जाना और आम आदमी की तरह सार्वजनिक परिवहन से सफर करना एक नाटक था? लोगों ने यह तर्क भी दिया कि पार्टी सत्ता में आने से पहले से कहती रही थी कि उसके नेता सरकारी गाड़ी और घर नहीं लेंगे. मनीष सिसोदिया इसके बचाव में सामने आए. उनका कहना था, ‘आप वीआईपी संस्कृति के खिलाफ है लेकिन सरकारी कारें लेने में कुछ भी गलत नहीं है.’ खैर, मनीष सिसोदिया और आप की सफाई के बाद भी मामला तूल पकड़ता गया. खासकर उस सोशल मीडिया पर जहां से पार्टी को जीवनदायी ऑक्सीजन मिलती थी.’

मीडिया और सोशल मीडिया में केजरीवाल निशाने पर आ गए. पहले उन्होंने सरकारी घर लेने से इंकार कर दिया था, लेकिन बाद में उन्होंने 5-5 कमरे वाले दो फ्लैट के लिए हामी भर दी. मीडिया में उन घरों के रंग-रोगन की तस्वीरें भी आईं. अगले तीन दिनों तक यह मामला राजनीतिक चर्चा का केंद्रीय विषय बना रहा. अखबारों से लेकर टीवी और सोशल मीडिया में ऐसी खबरें आने लगीं जिनमें बताया जाने लगा कि अरविंद को मिलने वाले दोनों डुप्लेक्सों को मिला दें तो उसका क्षेत्रफल दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बंगले के बराबर निकल आएगा.

चौतरफा दबाव में केजरीवाल ने वह घर लेने से इनकार कर दिया. उनका कहना था, ‘मुझे जनता से काफी संदेश मिले हैं और कुछ करीबियों के फोन भी आए हैं कि मुझे और छोटा घर चाहिए. पार्टी समर्थकों को मेरे लिए दिल्ली सरकार द्वारा तय किए गए आवास से चोट पहुंची है. जब तक मेरे लिए छोटा घर उपलब्ध नहीं हो जाता है, मैं कौशांबी स्थित आवास से ही कामकाज करता रहूंगा.’

जनभावनाओं और लोकप्रियता की राजनीति करने वाली नई-नवेली सरकार के लिए यह पहला झटका था. इस घटना ने एक और सच सामने रखा. सच यह कि आप के छोटे से छोटे कदम की भी बहुत निर्मम समीक्षा होगी, विपक्ष द्वारा भी और मीडिया द्वारा भी. हालांकि एक वर्ग का यह भी मानना था कि अरविंद को घर के मामले में पीछे नहीं हटना चाहिए था. उनके इस कदम से यह बात स्थापित हो गई कि केजरीवाल पॉपुलर मूड के खिलाफ नहीं जा सकते. जबकि सरकार में कई बार आपको ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं जो लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा नहीं होते लेकिन व्यवस्था और दीर्घकालिक हितों के लिए जरूरी होते हैं. केजरीवाल का सामना उस सच से भी हुआ कि जनभावनाओं की सवारी शेर की सवारी की तरह होती है. इसमें सफलता की जितनी गुंजाइश होती है, पलट कर चोट खाने का खतरा भी उतना ही ज्यादा होता है.

जैसे-तैसे घर और कार का मामला शांत पड़ा तो सरकार की महिला और बाल विकास मंत्री राखी बिडलान विवाद में घिर गईं. उनकी कार पर अज्ञात लोगों द्वारा हमले की खबर आई. पार्टी के लोगों का कहना था कि हमले में राखी को चोट तो नहीं नहीं आई मगर उनकी कार का शीशा टूट गया. एक बार फिर से मुख्यधारा और सोशल मीडिया में चर्चा होने लगी कि कैसे आप के नेताओं पर हमला करने की शुरुआत हो चुकी है. पार्टी के लोग कहते पाए गए कि जनता के बीच रहने और सुरक्षा लेकर न चलने के कारण राखी पर हमला हुआ है. चर्चा शुरू हो गई कि आप के मंत्रियों को न्यूनतम सुरक्षा लेने के बारे में सोचना चाहिए. जो लोग सुरक्षा संबंधी तामझाम के खिलाफ थे वे भी इस बात के पक्षधर होते दिखे.

लेकिन अगले ही दिन संवेदना की यह लहर उलटी दिशा में बहने लगी. पता चला कि राखी पर किसी ने हमला नहीं किया था बल्कि क्रिकेट खेल रहे बच्चों की गेंद उनकी गाड़ी के शीशे से टकरायी थी. इस घटना के तुरंत बाद बच्चे और उसकी मां ने सबके सामने राखी से माफी भी मांग ली थी. लेकिन इसके बावजूद राखी नहीं मानी, वे मंगोलपुरी थाने में शिकायत दर्ज करवाने पहुंच गईं. राखी के पिता पर भी बच्चे के परिवार को अपशब्द कहने के आरोप लगे. बाद में यह खबर भी आई कि बच्चे समेत उसके माता-पिता मंत्री से डरकर अपना घर छोड़कर चले गए हैं. इस खबर ने राखी बिडलान और आप को चौतरफा आलोचना के केंद्र में ला दिया. आरोप लगाए गए कि आप भी राजनीति के उसी घटिया संस्करण को कॉपी कर रही है जिससे लड़ने की वह बात करती रही है. उसके मंत्री सुरक्षा लेने के लिए खुद पर फर्जी हमले की कहानी बना रहे हैं.

आप की नई सरकार का हनीमून पीरियड अभी और कड़वा होना था. राखी बिडलान प्रकरण से पार्टी और सरकार जूझ ही रही थी कि पार्टी के वरिष्ठ नेता कुमार विश्वास के पुराने कवि सम्मेलनों में की गई टिप्पणियां पार्टी के गले की फांस बनने लगीं. दिल्ली विधानसभा में आप की ऐतिहासिक जीत के कुछ समय बाद ही कुमार विश्वास ने इच्छा जाहिर की कि वे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़ना चाहते हैं. इसके बाद अचानक से सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर विश्वास के कवि सम्मेलनों की ऐसी क्लिपिंग्स आनी शुरू हो गईं जो पार्टी के लिए फजीहत का कारण बनने लगीं. 2008 के उनके कवि सम्मेलन का एक वीडियो सामने आया जिसमें विश्वास सिखों और मुसलमानों पर चुटकले कहते दिखाई दिए. क्लिप सामने आने के बाद दिल्ली में आप सरकार को समर्थन दे रहे जदयू के विधायक शोएब इकबाल ने इसकी तीखी आलोचना की और कुमार विश्वास से माफी मांगने और ऐसा ना होने की सूरत में सरकार से समर्थन वापस लेने की बात की. खैर आनन फानन में विश्वास ने ‘आहत’ हुए सभी लोगों से माफी मांग ली. पर यह अंत नहीं था. एक और क्लिप सामने आ गई जिसमें वे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते दिखे. फिर बवाल मचा, इस पर विश्वास ने सफाई देते हुए कहा कि चूंकि मोदी उस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे इसलिए उन्होंने उस कार्यक्रम में मोदी की तारीफ की थी. यह 2009 का वीडियो था. इसके चंद रोज बाद ही केरल की नर्सों को काली-पीली कहकर उनका अपमान करने वाली विश्वास की एक नई क्लिप सामने आई. वीडियो के सामने आने के बाद विरोध भी शुरू हो गया. एक ओर जहां कांग्रेस के सदस्यों ने आप के केरल ऑफिस पर पथराव और तोड़फोड़ किया, वहीं केरल के मुख्यमंत्री ऊमन चांडी ने भी कुमार विश्वास से माफी की मांग की. इसको लेकर केरल के कई शहरों में विश्वास और पार्टी के खिलाफ प्रदर्शन हुए.

हर दो चार दिन में उनके खिलाफ आ रहे आपत्तिजनक वीडियो के बारे में कुमार विश्वास का कहना है कि यह सबकुछ तभी से शुरू हुआ है जब से उन्होंने अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने की घोषणा की है. आप के अन्य नेता भी विश्वास से इत्तफाक रखते हैं. मीडिया से बातचीत में विश्वास कहते हैं, ‘ये सारे क्लिप 2008-09 के हैं जिन्हें जानबूझकर और काट-छांट कर दिखाया जा रहा है. अगर ये सब गलत था तो लोग क्यों पिछले चार सालों से उन वीडियो को सामने नहीं ला रहे थे. 19 देशों में मैंने एक लाख घंटे की कविताएं पढ़ी है. विरोधियों को तय करना होगा कि वे मेरे कविता सम्मेलन पर चुनाव लड़ना चाहते हैं या फिर मुद्दों पर.’ अपने बचाव में विश्वास का कहना था कि कवि सम्मेलन में काफी कुछ स्क्रिप्टेड होता है. वहां कही गई बातें उनके अपने विचार नहीं हैं. विश्वास पर हो रहे हमले के दौरान उनकी पार्टी उनके साथ खड़ी रही लेकिन हाल ही में आप से जुड़ी मशहूर नृत्यांगना मल्लिका साराभाई ने उनकी जमकर आलोचना भी की.

मल्लिका ने कुमार विश्वास को एक अपरिपक्व नेता बताते हुए राहुल गांधी पर विश्वास के हमले की भी क्लास ली. साराबाई ने अमेठी में खुद को वहां का नौकर बताने वाले विश्वास के बयान की आलोचना करते हुए कहा, ‘विश्वास खुद फाइव स्टार होटल की सुविधा मांगते हैं. वे बिजनेस क्लास में चलते हैं. अमेठी में उनके साथ 300 कारों का काफिला गया. ऐसे में तो अमेठी की जनता को यह नौकर काफी महंगा पड़ेगा.’  इधर जब पत्रकारों ने विश्वास से मल्लिका के बयान पर प्रतिक्रिया मांगी तो उनका कहना था, ‘मैं जानता नहीं वे कौन हैं और मैं ये भी नहीं जानता कि ये पार्टी में कब आईं. पार्टी में एक करोड़ लोगों को लेना है. जिनको कॉल आई होगी, उनमें से ही एक होंगी. उनका स्वागत है. सब अपनी-अपनी बातें करेंगे मैं किस-किस का जवाब दूंगा.’

यहां से पार्टी और सरकार पर बाहर से हो रहे हमलों के अलावा पार्टी के भीतर ही नेताओं के बीच भी खींचतान शुरू हो गई.

पार्टी इस मामले में डैमेज कंट्रोल का प्रयास कर ही रही थी कि पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने अपने बयानों से एक नए विवाद का सूत्रपात कर दिया. भूषण का यह बयान कश्मीर को लेकर था. उनका कहना था, ‘यह अत्यंत जरूरी है कि हम लोगों के दिलों और मन को जीतें और अलगाव की भावना को उभरने से रोकें. इसके लिए सबसे पहले आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (आफ्स्पा) को हटाने की जरूरत है जो सेना को मानवाधिकार के उल्लंघन के मामलों में छूट प्रदान करता है. आंतरिक सुरक्षा के मामलों में सेना की तैनाती लोगों की मंजूरी के बाद ही होनी चाहिए.’ कश्मीर में सेना की उपस्थिति पर भूषण जनमतसंग्रह कराने की बात कर रहे थे. फिर क्या था. उनका यह बयान जंगल में आग की तरह फैल गया.

भूषण के इस बयान की भाजपा समेत तमाम पार्टियों और समूहों ने पुरजोर निंदा की. पुतले फूंके गए. आप पर देश विरोधी और सेना विरोधी होने के आरोप लगने लगे. पार्टी को समर्थन देने वाले युवाओं का एक बड़ा वर्ग सोशल मीडिया पर कश्मीर पर प्रशांत के बयान के बाद उसकी आलोचना करने लगा. चारों तरफ से दबाव बढ़ता देख पार्टी ने खुद को भूषण के बयान से अलग कर लिया. पार्टी का कहना था कि ये उनका निजी बयान है और पार्टी इससे इत्तेफाक नहीं रखती. लेकिन इस सफाई से भी बात न बनती देख पार्टी ने प्रशांत भूषण को अपना बयान वापस लेने के लिए किसी तरह मनाया. जिसके बाद उनका ये बयान आया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और इस तथ्य को चुनौती नहीं दी जा सकती है.

खैर, कश्मीर मामले पर प्रशांत भूषण और पार्टी की सफाई के बाद भी बात नहीं बनी. एक अनजान से संगठन ‘हिंदू रक्षा दल’ के लोगों ने पार्टी के कौशांबी स्थित दफ्तर पर हमला कर दिया. इस हमले शामिल लोगों की तस्वीरें प्रवीण तोगड़िया, अशोक सिंघल से लेकर अरुण जेटली तक के साथ सोशल मीडिया पर मौजूद हैं. अभी कश्मीर पर बयान को लेकर उठा बवंडर थमा भी नहीं था कि प्रशांत भूषण ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया. इस बार उन्होंने नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षाबलों की तैनाती को लेकर जनमत संग्रह कराने की वकालत की. फिर से भूषण और आप विरोधियों के निशाने पर आ गए. इस बार भी पार्टी ने खुद को भूषण से अलग कर लिया.

खैर, जिस तरह से एक समस्या के खत्म होने से पहले ही दूसरी समस्या के जन्म देने की परिपाटी आप ने बनाई उसमें पार्टी का हर सदस्य दिलोजान से अपना योगदान देने के लिए आतुर था. केजरीवाल के कानून मंत्री सोमनाथ भारती भी विवादों की इस प्रतियोगिता में पूरे दमखम के साथ कूद पड़े. भारती से जुड़ा पहला विवाद तब सामने आया जब उन्होंने सचिवालय में दिल्ली कोर्ट के सभी जजों की बैठक बुलाने का आदेश अपने सचिव एएस यादव को दिया. सचिव ने ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता जताई. सोमनाथ पर यादव को भला बुरा कहने का आरोप लगा. कानून सचिव एएस यादव ने कानून मंत्री सोमनाथ भारती को कहा था कि न्यायपालिका दिल्ली सरकार के अधीन काम नहीं करती है और हाईकोर्ट ही दिल्ली के कोर्ट के जजों की बैठक बुला सकता है.

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