मोदी लहर पर शाह की सवारी

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पिछली मई की गर्मियों में जिस लहर पर सवार होकर भाजपा ने लोकसभा चुनावों में फतह हासिल की थी उसी पर सवार होकर अब पार्टी ने हरियाणा और महाराष्ट्र की सत्ता भी हासिल कर ली है. ये दो ऐसे राज्य हैं जहां कांग्रेस अपने सहयोगियों के साथ पिछले दस और 15 सालों से सत्ता में थी.

भाजपा का इन दोनों राज्यों के चुनाव में अकेले दम पर उतरने का दांव हालांकि सफल रहा (इसने हरियाणा में बहुमत हासिल किया और महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी). पर पार्टी महाराष्ट्र में बहुमत के आंकड़े को छूने से थोड़ा पीछे रह गई. खुद भाजपा के कुछ नेताओं के मुताबिक महाराष्ट्र की जीत भी बहुत आसान हो जाती अगर वे भाजपा-शिवसेना महायुति को कायम रख पाते.

तथ्य यह है कि भाजपा मोदी की तमाम कोशिशों के बावजूद 288 सदस्यों की विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी 145 के आंकड़े से पीछे रह गई. फिलहाल देवेंद्र  फडणवीस के नेतृत्व में महाराष्ट्र में भाजपा की अल्पमत सरकार बन गई है लेकिन उसे एक बार फिर अपने पुराने खार खाए साथी शिवसेना के साथ रिश्ते जोड़ने की नौबत आ सकती है. जब सरकार संकट में होगी और उसे अपना बहुमत सिद्ध करना होगा तब उसे शिवसेना या एनसीपी की तरफ ताकना होगा ताकि वे सरकार के इस संकट को और बढ़ाने का काम न करें.

एनसीपी द्वारा महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार को बिना शर्त समर्थन की घोषणा उसके हाथ में एक बड़ा हथियार बन गई है. 25 सितंबर को जब भाजपा ने शिवसेना के साथ अपने 25 साल पुराने गठबंधन को तोड़ा था, शायद इसकी बुनियाद तभी पड़ गई थी. इसका एक संकेत उस घटना में भी छिपा हुआ है कि भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूटने के दिन ही महज कुछ घंटे बाद एनसीपी ने कांग्रेस के साथ अपना गठबंधन भी तोड़ लिया.

अल्पमत की सरकार बनाने के विकल्प को भाजपा की एक चाल के तौर पर भी देखा जा सकता है. इसके जरिए वह शिवसेना को किसी तरह से भी ज्यादा मोलभाव करने की छूट नहीं लेने देगी. इसके साथ ही अल्पमत की सरकार होने की वजह से वह गठबंधन धर्म की किसी भी तरह की मजबूरियों से मुक्त रहते हुए काम कर पाएगी. गठबंधन धर्म की मजबूरियां ऐसा बहाना रहा है जिसे समय-समय पर दिल्ली में मनमोहन सिंह और मुंबई में पृथ्वीराज चह्वाण सुविधानुसार अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं. खैर ऐसी स्थिति में बड़ा सवाल यह होगा कि ऐसी किसी सरकार का भविष्य और इसके टिकाऊ होने की संभावना कितनी होगी. कोई भी अनुमान लगा सकता है कि यह सरकार विपक्ष की एकता के भरोसे रहेगी. जितनी मजबूत या कमजोर विपक्ष की एकता रहेगी उतनी ही इस कमजोर या ताकतवर यह सरकार होगी.

भाजपा के खेमे में शिवसेना को साथ लेने के विकल्पों पर बातचीत का सिलसिला लगातार चल रहा है. शिवसेना नेता अनंत गीते ने 20 अक्टूबर को प्रधानमंत्री द्वारा अपने मंत्रिमंडलीय सदस्यों की दी गई दावत में हिस्सा लिया था, भाजपा आज भी बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (बीएमसी) में शिवसेना का समर्थन कर रही है. ये स्थितियां बताती हैं कि दोनों पार्टियों के बीच बातचीत के दरवाजे अभी भी खुले हुए हैं.

एक तरफ भाजपा जो कि महाराष्ट्र में जूनियर पार्टनर की भूमिका से बाहर निकलना चाहती थी, वह लक्ष्य उसने हासिल कर लिया है. अपनी सीटों की संख्या सैकड़े में पहुंचाकर वह उस स्थिति में पहुंच गई हैं जहां से गठबंधन की कुछ मजबूरियों से मुक्त हो सकती है. दूसरी तरफ कांग्रेस इन दोनों ही राज्यों में तीसरे नंबर पर जा पहुंची है. फिलहाल वह राष्ट्रीय राजनीति में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की लड़ाई लड़ रही है. एक के बाद एक राज्य उसके हाथ से निकलते जा रहे हैं. इस लिहाज से महाराष्ट्र के नतीजे जहां भाजपा के लिए संतुष्टिजनक हैं वहीं कांग्रेस के लिए ये नतीजे निराशाजनक हैं.

महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों से पैदा हुई खलबली और राजनैतिक गतिविधियों के बीच हरियाणा में भाजपा को मिली सफलता का महत्व सीमित होता दिख रहा है. लेकिन हरियाणा में भाजपा की बदली हुई किस्मत बेहद चमत्कारिक और उल्लेखनीय है. ऐसा राज्य जहां 2009 में भाजपा को चार सीटें, 2005 में दो सीटें और 2000 में छह सीटें हासिल हुई थीं. पहली बार भाजपा यहां 74 सीटों पर किस्मत आजमा रही थी. पहली बार उसे यहां 47 सीटों पर विजय हासिल हुई है. हरियाणा जहां से लोकसभा की दस और राज्यसभा की पांच सीटें आती हैं उसके विपरीत महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं जबकि राज्यसभा की 19 सीटें आती हैं. यह संख्या हरियाणा की तुलना में महाराष्ट्र को मिल रही जरूरत से ज्यादा तवज्जो का मुख्य कारण है.

नतीजों के मुताबिक महाराष्ट्र में भाजपा को 122 सीटें हासिल हुई हैं जबकि 2009 में उसका आंकड़ा 46 सीटों का था. अगर हम वोट शेयर की बात करें तो 2009 में भाजपा को 14 फीसदी वोट मिले थे जो इस बार बढ़कर 28 फीसदी तक पहुंच गया है. 1990 के बाद यह पहला अवसर है जब महाराष्ट्र की विधानसभा में किसी दल को सौ से ऊपर सीटें हासिल हुई हैं. 1990 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 141 सीटें मिली थीं. भाजपा की सफलता इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि उसने अपनी सीटों की संख्या ही तीन गुनी नहीं की है बल्कि कुल लड़ी गई और उनमें से जीती गई सीटों का अनुपात भी सबसे बेहतर रहा है. यही बात उसके वोट शेयर में वृद्धि और उसके पक्ष में हुए ध्रुवीकरण के बारे में भी कही जा सकती है. ऐसा तब हुआ है जब भाजपा इससे पहले राज्य में कभी भी 119 से ज्यादा सीटों पर चुनाव ही नहीं लड़ी थी.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सामने सिर्फ पार्टी संगठन का ढांचा खड़ा करने की ही चुनौती नहीं थी बल्कि उन 150 से ज्यादा सीटों पर योग्य उम्मीदवार ढूंढ़ने की भी चुनौती थी जहां पार्टी पहले कभी चुनाव ही नहीं लड़ी थी. भाजपा ने कई जगहों पर दूसरी पार्टियों (एनसीपी और कांग्रेस) को छोड़कर आए लोगों का साथ लिया. ऐसे करीब 50 उम्मीदवार थे. इनमें से सिर्फ 20 ही चुनाव जीतने में सफल रहे हैं. भाजपा के लिए एक और महत्वपूर्ण बात यह रही कि उसके साथ गठजोड़ कर चुनाव लड़ रही पार्टियों में सिर्फ राष्ट्रीय समाज पक्ष को एक सीट पर जीत हासिल हुई है.

आमने-सामने: इस समय उध‍व ठाकरे और शरद पवार दोनों को भाजपा की जरूरत है
आमने-सामने इस समय उध‍व ठाकरे और शरद पवार दोनों को भाजपा की जरूरत है, फोटोः विजय पांडे

maharatraमैन ऑफ द मैच

जीत से उल्लासित पार्टी अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं कि भाजपा ने महाराष्ट्र और हरियाणा में इतिहास रच दिया है. उनके मुताबिक भाजपा ने सिर्फ खुद को सरकार बनाने की स्थिति में ही नहीं पहुंचाया बल्कि कांग्रेस को भी ऐसी दशा में पहुंचा दिया है कि उसके पास इन दोनों विधानसभाओं में नेता प्रतिपक्ष का पद भी नहीं रहेगा. ‘हमने कांग्रेस मुक्त भारत की दिशा में दो कदम और बढ़ा दिया है,’ अमित शाह कहते हैं.

अमित शाह का स्पष्ट मानना है कि दोनों राज्यों की जनता ने मोदी सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों और उसके प्रदर्शन को बहुमत से स्वीकार किया है. इस बात में कहीं किसी शक-सुबहे की गुंजाइश नहीं बची है. उन्होंने महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा के एकला चलो नीति की वजह तत्कालीन परिस्थितियों को बताया.

पहली नजर में उन तमाम परिस्थितियों में एक बड़ी वजह यह थी कि भाजपा लोकसभा चुनाव में किए गए प्रदर्शन को दोनों राज्यों में ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़कर भुनाना चाहती थी. हरियाणा में उसके इस फैसले की राह में हरियाणा जनहित कांग्रेस रोड़ा बन रही थी तो महाराष्ट्र में शिवसेना. ऐसा करके भाजपा ने इन राज्यों में सिर्फ अपनी चुनावी जीत को ही पुख्ता नहीं किया बल्कि इस कदम से इसे इन राज्यों में अपना संगठन भी मजबूत करने में मदद मिलेगी. इसका एक और छिपा लाभ यह हुआ कि पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर दायरा और व्यापक हुआ है.

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