यूपीएससी-सीसैट विवाद: प्रश्नपत्र पर सवाल

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यूपीएससी के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन  करते और खिरफ्तारी देते छात्र. फोटो: राहुल गुप्ता.
यूपीएससी के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन करते और गिरफ्तारी देते छात्र. फोटो: राहुल गुप्ता.

‘सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए कम से कम दिन में सात से आठ घंटे की पढ़ाई करनी होती है. इतने घंटे हम अपने कमरे में ही कैद रहते थे, लेकिन पिछले दस दिनों से हम पढ़ ही नहीं पा रहे. दिन रात सड़क पर रह रहे हैं. नोट्स के बदले बैनर-पोस्टर बना रहे हैं. ट्यूशन जाने की जगह प्रदर्शन और अनशन में जा रहे हैं. लेकिन करें तो क्या करें? यूपीएसी ने ऐसी ही हालत बना दी है कि हिंदी और दूसरे भाषाओं में परीक्षा देने वाले छात्रों को पहले लड़ना होगा, जीतना होगा और तब पढ़ना होगा. केवल पढ़ाई करने से कुछ नहीं होने वाला.’

मायूसी और जोश के मिले-जुले भाव के साथ यह बात कहते विवेक कुमार उत्तर प्रदेश के जौनपुर के रहने वाले हैं. पांच साल पहले सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने के लिए वे दिल्ली आए और अपने जैसे उन हजारों छात्रों की तरह शहर के मुखर्जी नगर इलाके में समा गए जो चुपचाप इस परीक्षा की तैयारी करते रहते हैं. लेकिन पिछले एक पखवाड़े से इन छात्रों का एक बड़ा वर्ग आंदोलित है. मुखर्जीनगर में अनशन और प्रदर्शन चल रहा है. हिंदी सहित अन्य दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में तैयारी करने वाले छात्रों का आरोप है कि सिविल सेवा करवाने वाला यूपीएसी 2011 से उनके साथ भेदभाव कर रहा है. इस साल यूपीएससी ने सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा में एक बदलाव किया था. इसे अब सी-सैट (सिविल सर्विसेस एप्टिट्यूड टेस्ट) के नाम से जाना जाता है. यूपीएससी ने यह बदलाव प्रोफेसर एसके खन्ना की अध्यक्षता वाली कमेटी की सिफारिशों के आधार पर किया था. लेकिन छात्रों के एक बड़े वर्ग को यह बदलाव मंजूर नहीं है और वह इसमें सुधार चाहता है.

2010 तक सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा 450 अंकों की हुआ करती थी. इसमें दो पर्चे होते थे. इतिहास, राजनीतिशास्त्र, भौतिकी जैसे 20 वैकल्पिक विषयों में से एक का प्रश्नपत्र जो 300 अंकों का होता था और 150 अंकों वाला सामान्य ज्ञान का प्रश्नपत्र. 2011 में लागू सीसैट में 450 अंकों की बजाय दो-दो सौ अंकों के दो प्रश्नपत्र हैं. पहला सामान्य ज्ञान का है और दूसरे में मानसिक क्षमता, तर्कशक्ति और आंकड़ों के विश्लेषण, अंग्रेजी भाषा के ज्ञान से जुड़े प्रश्न हैं.

हालिया विवाद इसी दूसरे प्रश्न पत्र को लेकर है. विरोध कर रहे छात्रों का कहना है कि जब मुख्य परीक्षा में अंग्रेजी की परीक्षा होती ही है तो फिर प्रारंभिक परीक्षा में भी इसकी क्या जरूरत है. छात्रों की शिकायत है कि इस प्रणाली के तहत मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले छात्रों को फायदा पहुंचता है. छात्र यह भी कहते हैं कि यह प्रणाली गांव-देहात के स्कूलों से पढ़कर आए हुए छात्रों के सामने बाधा पैदा करती है जबकि अंग्रेजी माध्यम और शहरों में पढ़े हुए बच्चों के लिए रास्ता और आसान करती है.

पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डॉक्टर विकास दिव्यकीर्ति कहते हैं, ‘देखिए, कुछ लोग जबरन इसे हिंदी बनाम अंग्रेजी की लड़ाई बता रहे हैं. ऐसे लोग यह तस्वीर बनाना चाहते हैं मानो हिंदी माध्यम के बच्चे अंग्रेजी नहीं जानते और इसी वजह से वे इसका विरोध कर रहे हैं जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. अंग्रेजी से किसी को भी दिक्कत नहीं है. अंग्रेजी का एक पेपर तो मुख्य परीक्षा में वर्षों से होता आ रहा है. आजतक किसी ने उसका विरोध नहीं किया. असल दिक्कत यूपीएससी के उस नए परीक्षा पैटर्न से है जो हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के बच्चों को तो नुकसान पहुंचाता है, लेकिन अंग्रेजी और विज्ञान पृष्ठभूमि के बच्चों को फायदा पहुंचाता है.

डॉक्टर दिव्यकीर्ति आगे बताते हैं, ‘समझने की कोशिश कीजिए. सी-सैट में कुल 80 सवाल होते हैं. इन 80 सवालों में से 40 सवाल ऐसे हैं जो सीधे-सीधे अंग्रेजी माध्यम के बच्चों को फायदा पहुंचाते हैं. इन 40 सवालों में से सात या आठ अंग्रेजी भाषा के होते हैं तो जाहिर तौर पर इन सवालों को वे बच्चे जल्दी हल कर लेंगे जिन्होंने अंग्रेजी भाषा पढ़ी होगी. 32 सवाल मानसिक क्षमता परखने के लिए होते हैं. मूल रूप से ये सवाल अंग्रेजी में बनते हैं और बाद में इनका हिंदी अनुवाद किया जाता है. अब इन अनुवादों को देखिए तो समझ में आएगा कि हिंदी माध्यम के बच्चे इन सवालों को कैसे हल कर पाएंगे. हिंदी में ऊल-जुलूल अनुवाद के चलते इन सवालों को समझने के लिए अंग्रेजी में छपे प्रश्न ही पढ़ने होंगे. जब तक हिंदी का बच्चा सवाल समझता है तब तक अंग्रेजी वाला कई सवाल हल कर चुका होता है.’ वे आगे कहते हैं, ‘यह कोई सामान्य परीक्षा नहीं बल्कि प्रतियोगी परीक्षा है जिसमें एक-एक मिनट बहुत कीमती होता है. क्या यह भेदभाव नहीं है? क्या इसका विरोध नहीं होना चाहिए?  क्या यह केवल हिंदी बनाम अंग्रेजी का मामला है?’

ऐसे कई सवाल हैं जिनका यूपीएसी के पास कोई जवाब नहीं है. हां कुछ पूर्व अधिकारी हैं जो केवल इतना भर कहते हैं कि यूपीएससी एक संवैधानिक संस्था है और इस पर भेदभाव का आरोप नहीं लगाना चाहिए. लेकिन उनके पास भी इस बात का जवाब नहीं है कि जो संस्था पूरे देश में इतनी महत्वपूर्ण परीक्षा लेती है वह सवाल के हिंदी अनुवाद में ’स्टील प्लांट’ को स्टील का पौधा’ , ‘टैबलेट कंप्यूटर’ को ‘गोली कंप्यूटर’ और ज्वाईंट वेंचर रूट’ को ‘संयुक्त संधिमार्ग’ कैसे लिख देती है?

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