अकलियत का अकाल | Tehelka Hindi

इन दिनों A- A+

अकलियत का अकाल

नई-नवेली लोकसभा में मुसिलम समुदाय का प्रतिनिधित्व अब तक का सबसे कम क्यों है? और इसके क्या परिणाम देखने को मिल सकते हैं?
अतुल चौरसिया 2014-06-15 , Issue 11 Volume 6
Muslim

ग्राफिक: हिमांशु भट्ट

सोलहवें लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं. अब नतीजों की चीरफाड़ का समय है. ज्यादातर चुनावों की तरह इस बार भी कई रिकॉर्ड बने हैं, कई चमत्कार हुए हैं. तीस साल बाद किसी दल को पूरी तरह से बहुमत मिला है. आजादी के बाद पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को पूर्ण बहुमत मिला है. पहली बार देश का चुनाव कमोबेश अमेरिका की तर्ज पर व्यक्ति-केंद्रित होकर लड़ा गया है.

इन तमाम विशेषताओं के बीच एक अनियमितता भी देखने को मिल रही है. मुसलिम आबादी की तुलना में लोकसभा में उसका प्रतिनिधित्व सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है. मात्र 22 मुसलिम सांसद इस बार चुनकर लोकसभा पहुंच सके हैं. और 24 राज्यों से एक भी मुसलमान सांसद नहीं चुना गया है. इनमें उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा सूबा भी शामिल है जहां मुसलिम आबादी 19 प्रतिशत के आस-पास है.

सीएसडीएस के एक सर्वे के मुताबिक देश में 87 सीटें ऐसी हैं जिन पर मुसलिम आबादी निर्णायक संख्या में है. इन सीटों पर मुसलिम आबादी का प्रतिशत 25 से 50 तक है. इस बार इनमें से 45 सीटें भाजपा के खाते में आईं हैं. निर्णायक मुसलिम मतों वाली इन सीटों पर यह भाजपा का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है. 2009 में भाजपा ने इन 87 में से सिर्फ 24 सीटें जीती थीं.

मुसलिम प्रभाव वाली 87 सीटों का एक बड़ा हिस्सा – 27 सीटें – उत्तर प्रदेश से आता है. भाजपा ने इन सारी सीटों पर जीत हासिल की है. ऐसा कैसे हो सकता है कि जिस उत्तर प्रदेश ने 2012 के विधानसभा चुनाव में अब तक की सबसे बड़ी संख्या में मुसलमान विधायक – 42 -भेजे थे वह दो साल के भीतर ही एक भी मुसलमान सांसद को संसद में नहीं भेजना चाहता. इनमें रामपुर और संभल की लोकसभा सीटें भी है जहां मुसलिम आबादी 50 प्रतिशत के आस-पास है.

इसी तरह से असम की चौदह में से सात सीटें मुसलिम प्रभुत्व वाली हैं. इनमें तीन सीटें भाजपा ने जीती हैं. आंध्र प्रदेश में भी भाजपा और सहयोगी टीडीपी ने झंडा गाड़ा है. सिर्फ हैदराबाद में एमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी अपना किला बचा पाए हैं. महाराष्ट्र में भी यही हालत है.

सिर्फ बंगाल ऐसा राज्य है जहां भाजपा अपना कोई प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही है. यहां की 42 में से 19 सीटों पर काफी मुसलिम आबादी है और यहां से कुल आठ मुसलिम सांसद लोकसभा पहुंचे हैं. दूसरा नंबर बिहार का है, यहां से चार मुसलिम सांसद लोकसभा में पहुंचे हैं.

2009 की लोकसभा की बात करें तो इसमें कुल 30 मुसलमान सांसद थे. मुसलिम प्रतिनिधित्व के लिहाज से सबसे बढ़िया आंकड़ा 1980 में था तब लोकसभा में कुल 49 मुसलमान सांसद  थे. आम तौर पर लोकसभा में मुसलिम प्रतिनिधित्व का आंकड़ा 25 से 30 के बीच ही रहता आया है जो कि देश की 14 फीसदी मुसलिम आबादी के लिहाज से संतोषजनक नहीं है. लेकिन इस बार यह आंकड़ा अपनी निचली सीमा से भी तीन सीट नीचे पहुंच गया. इस बार के आंकड़ों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि देश में पहली बार किसी दक्षिणपंथी रुझान वाली पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला है. मुंबई स्थित रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के वरिष्ठ पत्रकार और महाराष्ट्र मुसलिम ओबीसी मूवमेंट के संस्थापक हसन कमाल कहते हैं, ‘कांग्रेस और दूसरी गैर भाजपा पार्टियों के वे तमाम उम्मीदवार भी इस चुनाव में हारे हैं जो मुसलमान नहीं हैं. भाजपा का तो यह पहले से ही स्टैंड रहा है कि वे मुसलमानों को टिकट नहीं देते लिहाजा उन्हें दोष नहीं दिया जाना चाहिए. यह सेक्युलर पार्टियों की अपनी नाकामी है.’

नतीजों का विश्लेषण करने पर मोटा-मोटी दो-तीन बातें उभरती हैं. पहली, यह बहुसंख्यकवाद का वोट है. दूसरी, हो सकता है कि मुसलमान अब केवल उस सेक्युलर बोगी का हिस्सा नहीं रहना चाहता जो उसे सिर्फ भाजपा से डरा कर अपने पाले में खीचती रही है. तीसरी, जरूरत से ज्यादा ‘सेक्युलर’ विकल्पों ने मुसलिम मतदाता को भ्रम में डाल दिया और वोटों का बंटवारा हो गया. मुसलिम समुदाय के पढ़े-लिखे और जानकार लोगों से बातचीत में ये सारी ही वजहें कहीं न कहीं खराब प्रदर्शन की वजह बताई जा रही हैं.

बहुसंख्यकवाद का वोट
ऊपरी तौर पर यह वजह महत्वपूर्ण दिखती है. वरिष्ठ अधिवक्ता और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सदस्य जफरयाब जिलानी कहते हैं, ‘अपने तौर पर मुसलमान यहां कभी भी चुनाव नहीं जीत सकता. मुसलमान यहां इसलिए जीतता रहा है क्योंकि बड़ी संख्या में उसे हिंदुओं के सेक्युलर तबके का वोट मिलता रहा है. उस सेक्युलर हिंदू वोट का शिफ्ट बड़ी संख्या में इस बार मोदी की ओर हुआ है. इसकी वजह यह रही कि कांग्रेस या सपा जैसी पार्टियों को अपनी जमीनी हकीकत का अंदाजा ही नहीं था.’

नतीजे साफ बयान करते हैं कि भाजपा को इस बार अपने परंपरागत वोटों के अलावा उन हिंदुओं का वोट भी मिला है जो अब तक किसी न किसी जातिगत या क्षेत्रीय पहचान से बंधे हुए थे. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायावती का सफाया इसका सबसे बड़ा प्रमाण है. यही बात बिहार में भी दिखी जहां लालू प्रसाद यादव और नितीश कुमार जैसे ओबीसी-मुसलिम राजनीति करने वाले नेताओं की लुटिया डूब गई. नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी सफलता यही रही कि उन्होंने परंपरागत दलित-पिछड़ा वोटों को भी उनकी पुरानी पहचान से बाहर निकालते हुए सबको उनकी एक दूसरी व्यापक पहचान (हिंदू) से जोड़ दिया.

वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत इस तरह के तबकों के मोदी और भाजपा से जुड़ाव पर कहते हैं, ‘अगर मोदी ने बहुसंख्यक तबके को गोलबंद किया है तो यह मुद्दों और नीतियों के आधार पर किया है. उन्होंने मंदिर या धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगा था. उन्होंने विकास के नाम पर वोट मांगा था. अब समय बदल चुका है. भारतीय राजनीति को अब हिंदू-मुसलमान की बजाय नीतियों के आधार पर बांटना चाहिए. देखना होगा कि यह सरकार अल्पसंख्यकों के प्रति किस तरह की नीतियां अख्तियार करती है. जो पार्टियां मुसलमानों की रहनुमा रही हैं उन्होंने मुसलमानों का कौन सा भला कर दिया है.’

अगर हम चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगियों की गतिविधियों पर नजर डालें तो उनमें एक जबर्दस्त रणनीतिक चतुराई दिखाई देती है. उनकी पूरी रणनीति ही बहुसंख्यक वोटों को अपने पाले में खींच लाने की रही. असम में नरेंद्र मोदी का बंगाली घुसपैठियों पर दिया गया बयान हो या फिर मुजफ्फरनगर में अमित शाह का बदले वाला बयान हो, मंशा बहुसंख्यक वोटों को गोलबंद करने की ही थी. नरेंद्र मोदी ने ज्यादातर समय खुद को विकास पुरुष के दावे तक सीमित रखा लेकिन उनके सहयोगी अमित शाह, गिरिराज सिंह और प्रवीण तोगड़िया जैसे नेता यदाकदा हिंदूवादी लाइन पर विचार रखते रहे. महत्वपूर्ण बात यह रही कि नरेंद्र मोदी ने न तो खुद को इन बयानों से अलग करने की कोशिश की और न ही इन बयानों की निंदा की. मशहूर उर्दू शायर मुनव्वर राणा कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी के लीडर बनने का छुपा हुआ संदेश था हिंदुत्व.’ राणा इसके साथ ही इस चुनाव में नाममात्र के मुसलिम प्रतिनिधित्व की एक और वजह बताते हैं, ‘मुसलमानों का सबसे ज्यादा नुकसान उनके उल्मा और आलिम कर रहे हैं. उन्होंने अपने फायदे के लिए पूरी कौम में बिखराव पैदा कर दिया है. आप देखिए कि वे कहते है कि जो भाजपा को हरा रहा हो उसे वोट दें. अब किसे पता कि कौन हार रहा है और कौन जीत रहा है. इससे मुसलमान बुरी तरह भ्रमित हुआ है. इन उल्माओं को अपनी गिरेबान में झांकना चाहिए और राजनीति से दूर रहना चाहिए. मस्जिदों के बाहर राजनीति में इनका क्या काम है. मुसलमान राजनीतिक रूप से काफी समझदार हंै.’

बहुसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण के पीछे एक और बड़ी वजह जो उभर कर सामने आ रही है वह है कथित सेक्युलर पार्टियों में मुसलिम वोटों के लिए मची होड़. इस होड़ ने बहुसंख्यक तबके में यह संदेश दिया कि सारी पार्टियां सिर्फ मुसलमानों के लिए काम कर रही हैं. यह धारणा कांग्रेस, जेडीयू और सपा जैसी पार्टियों के चुनाव अभियानों से भी मजबूत हुई. चुपचाप रहते हुए भाजपा ने इस सोच का जमकर दोहन किया. खुद नरेंद्र मोदी बार-बार एक बात कहकर लोगों को संदेश देते रहे कि ‘जस्टिस फॉर ऑल अपीजमेंट फॉर नन’ यानी सबको न्याय पर तुष्टिकरण किसी का नहीं. हसन कमाल के शब्दों में, ‘यह संदेश बार-बार जा रहा है कि गैर भाजपा पार्टियां मुसलमानों की मिजाजपुर्सी कर रही हैं लेकिन असलियत यह है कि मुसलमानों की दशा उनके समय में लगातार खराब हुई है. मुसलमानों को इस कुचक्र से बाहर निकलना होगा.’

muslim

फोटो: विकास कुमार

Pages: 1 2 Single Page

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 11, Dated 15 June 2014)

1 Comment

  • सिकंदर हयात 19 Days Ago(+1) VoteREPORT
    पूर्ण बहुमत से मोदी बी जे पी की सरकार बन रही है इसका एक बड़ा क्रेडिट जाता है काबुल से कोहिमा तक फेले हुए मुस्लिम कट्टरपन्तियो का जिन्होने पाक बांग्लादेश कश्मीर से हिन्दुओ को लगातार भगाया जिन्होने अपना यहा की लड़कियॉ को बुरके पर्दे हिज़ाब की सलाह दी और सुन्दर स्मार्ट गेर मुस्लिम लड़कियॉ से शादिया की ( पाकिस्तान मे जबरदस्ती यहा लॉव मेरिज ) जिन्होने मुज्ज़फारनगर मे 2 जाट लडको को मारने के आरोपियो को छुड़वाया जिन्होने मुम्बई हमले को आर एस एस की करतूत बताया जिन्होने खुले आम परिवार नियोजन की मुखालफत की जिन्होने आतंकवाद और आक्रामकता की निन्दा मे हमेशा 100 बहाने किन्तु प्रणतु किये मेने 3 साल से लगातार लिखा की था की देर सवेर इस सबका फायदा संघ परिवार को मिलेगा ही क्योकि य बाते बड़े से बड़े सेकुलर हिन्दू को भी बदल देगी खासकर य लड़कियो के विष्य तो बेहद सवेंदानशील होते है मेरा अपना दोस्त जो एक बड़े हिन्दी अखबार मे है और 100 % सेकुलर था और पत्रकारिता मे सवरणो के वर्चसाव से परेशान रहता था उसके रवेयया मे भी मेने मुज्ज़फारनगर के बाद बदलाव देखा था जिसका ड़र था वही हुआ खेर कोई बात नही हम फिर से पूरी ताकत से अपने मिशन मे जुटेंगे और इंशाल्लाह अब मुस्लिम समाज हमारी भी सुनेगा आमीनAslam Khan 15 Days Ago(0) VoteREPORT
    आपकी तमाम बातो से इत्तेफाक रखते हुए मुज़फ्फरनगर मामले को साफ़ कर दूँ की जो गलत प्रचार किये गए आप भी उसी की ज़द में हैं! मुज़फ्फरनगर में किसी ने किसी को नहीं छुड़ाया, वहां दो हिन्दू लड़को के साथ एक मुस्लिम लड़के की भी हत्या हुयी थी जिसका कारण आपसी लड़ाई रही लड़की का कोई मामला नहीं था! और ये दंगा इतनी आसानी से संगठित नहीं हो सकता था ये किया गया था! इस पर पिछले दिन चार साल से लगातार काम चल रहा था
    रही बात पाकिस्तान और बांग्लादेश की तो आप या हम वहां जाकर कुछ नहीं बदल सकते अलबत्ता यहाँ बेहतर काम कर सकते हैं तार्किक बातें की जा सकती है!
    वैश्विक स्तर पर ही बहुसंख्यक कट्टर हो रहे है ये सच है इस कट्टरता से बिना किसी भेदभाव के लड़ना होगा और हम इस में सफल भी होंगे! केवल आलोचना भाव होता है तर्क नहीं हो सकता! इस लिए तार्किक समाज की बात की जाए आपके अखबारी मित्र भी हवा के शिकार मात्र हैंसिकंदर हयात 14 Days Ago(0) VoteREPORT
    असलम भाई पहले तो मेरा ये दावा सुन ले की हिंदी नेट पर हिन्दू कठमुल्लाओं और कटटरपन्तियो से जितनी बहस मेने की हे उतनी शायद ही किसी ने की हो य बात इसलिए कह रहा हु की कही आप मेरे बारे में कोई ग़लतफ़हमी न पाल ले मेंरा ये लेख देखे
    http://khabarkikhabar.com/?p=72
    आगे में य कहूँगा असलम भाई की मुस्लिम यूनिटी अधिकांश एक ”यूटोपिया ” ही रही हे इसी के तहत हम पर ”दबाव ” डाला जाता हे की हम दुनिया के किसी कोने में कोई भी केसा भी पंगा हो हम उस पर आँख मूंद हमेशा मुस्लिम्स का ही पक्ष ले हम ऐसा करते भी हे मेरा मन्ना हे की इससे कोई मुस्लिम यूनिटी नहीं आती प्रेक्टिकल में -हा गैर मुस्लिमो से ( और आपस में भी ) रिश्ते जरूर ख़राब हो रहे हे लेकिन में इस ” दबाव ” में नहीं आता में तो पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब की इस हदीस का पालन करता हु की ” इन्साफ होना ही चाहिए भले ही आसमान फट जाये ” तो में तो इन्साफ की ही बात करूँगा में मूल मुज्जफरनगर का ही हु मेरा मुस्लिम ही दोस्त मुज्जफरनगर में डॉक्टर हे उसके पास उस इलाके के मरीज़ आते हे उसने ही बताया की बात लड़की की ही बात थी और खुद भी सोचिये की अगर बात कुछ और होती तो वो उस लड़के को कही न्यूट्रल इलाके में घेरते न की उसी की गली में जाकर हमला करता जहा उन्हें भी खतरा होना ही था और हुआ भी दोनों मारे गए. मुसलमानो को बताया जा रहा हे य आर इस इस की साज़िश थी बाद में जो कुछ हुआ ( सी डी सर्कुलेशन ) वो जरूर हो सकती हे मगर उन २ जाट लड़को का वहाँ जाना साज़िश नहीं हो सकती हे क्योकि य अत्यधिक गुस्से में उठाया आत्मघाती कदम था क्या आर एस एस के पास आत्मघाती भी हे ? बाद में जो हुआ वो जरूर भाजपा सपा की मिलीभगत लगती हे मगर शरू में क्या सन्देश था की भाई ” लड़की आपने छेड़ी फिर 1 के बदले २ आपने मारे फिर कुछ आरोपिया को छुड़वा भी लिया ? आगे भी कुछ मुस्लिम नेताओ की मूर्खता देखिये की उसी लड़के के पिता ( 13 बच्चो का उसका परिवार ऐसा सुना हे मेने ) से चुनाव प्रचार करवा रहे थे जो सुना हे की कह रहे थे की सिर्फ ”अपने लोगो पर भरोसा करो ” ज़ाहिर हे इसी का भाजपा को पूरा फायदा मिलना ही था मिला भी — जारी
    Reply comment
    Quote
    सिकंदर हयात
    सिकंदर हयात 14 Days Ago(0) VoteREPORT
    भारी मुस्लिम आबादी वाले वेस्ट यु पि में सभी मुस्लिम नाम चुनाव हांर गए क्यों ? मुज्जफरनगर काण्ड के बाद जनवरी की बात हे में वेस्ट यु पि में गया हुआ था रस्ते में पता चला फिर एक जगह एक दबंग सी जाती के लोग अपनी लड़की के मुस्लिम लड़के से शादी पर हल्ला कर रहे थे और बी जे पि संघ इसे लवजिहाद का नाम देकर इसकी फसल काटने में लगे थे मेने तभी कह दिया था की इन्हे इसका बहुत फायदा होगा भारत जैसे देश में जहा कही भी कही भी आज भी अंतर्जातीय शादी भी आसान नहीं हे अधिक अंतर्धार्मिक शादियों पर कुछ तो होना हे आजकल अक्सर ही हम हिन्दू लड़कियों की मुस्लिम लड़को से लवमैरिज सुनते हे संघ ने इसका खूब प्रचार किया और उसे चुनाव में इसका फायदा मिला मेरे अपने भाई ने कहा की तू बार बार ये शादियों का मुद्दा क्यों उठा रहा हे ? शादी करना क्या गुनाह हे मेने कहा की कोई गुनाह नहीं हे लेकिन मेने कहा की अगर मुस्लिम समाज में एक नयी रौशनी आ रही हो जिसके तहत अशराफ अज़लाफ शिया सुन्नी देवबंदी बरेलवी अमीर मुस्लिम गरीब मुस्लिम की भी आपस में सरलता से लव या अरेंज्ड मेरिज हो रही हे तो फिर उसी वे में हिन्दू मुस्लिम शादिया भी हो तो बड़ी अच्छी बात होती मगर ऐसा नहीं हो रहा हे आप ही बताय ? हो ये रहा हे की उधर बहुत सी जगह लोग 5 10 साल की लड़कियों को भी हिज़ाब करवा रहे हे बहुत सी पढ़ी लिखी लडकिया तक भी अरबी ईरानीहुलिये में आ गयी हे ( नवभारत पर ब्लॉगर ज़ीशान ज़ैदी से उनके नवम्बर के ब्लॉग बेगानी शादी में — पर इस विषय पर बहस ) वही दूसरी तरफ कोई मुस्लिम लड़का किसी खूबसूरत स्मार्ट घूँघट का नामोनिशान भी नहीं रखने वाली गैर मुस्लिम लड़की से लवमैरिज करेगा तो संघ परिवार तो इसे लवजिहाद का नाम देकर इसका फायदा उठाएगा ही संघ की तो दिली इच्छा हे की ऊपर से लेकर निचे तक बटे हुए हिन्दू समाज को मुस्लिम ईसाई खतरा दिखा कर एकजुट करे वोटबैंक बने और भाजपा को फायदा हो वैसा ही हुआ भी मेने इस सम्बन्ध पिछले 3 साल से लगातार लिखा था जो मेने चेतावनियां दी थी वही हुआ मोदी साहब को इसका पूरा फायदा मिला किसे ने सपने में भी नहीं सोचा था की अपने डैम पर बहुमत आ जाएगा बहुत अफ़सोस–जारी ( नवभारत ब्लॉग पर इन सब विषयो पर अफज़ल खान भाई के ब्लॉग पर मेने अनगिनत बहस की हे आप भी देखे मेरी कोई 1 सिंगल लाइन भी गलत लगे तो बताय में जरूर जवाब दूंगा )सिकंदर हयात 13 Days Ago(0) VoteREPORT
    भाई आपने कहा की ”रही बात पाकिस्तान और बांग्लादेश की तो आप या हम वहां जाकर कुछ नहीं ” सही कहा लेकिन बात य हे की पाकिस्तान के ये कटटरपन्ति इस बात पर अन्धविश्वास करते हे की भारत के मुस्लिम बहुत ही परेशान हे और वो भी उनके साथ हे उनकी साइकि ये हे की उपमहादीप के 60 करोड़ मुस्लिमो को हिन्दुओ से नफरत के आधार पर एकजुट करके फिर से दिल्ली पर कब्ज़ा किया जाए हमेशा याद रखे की सिर्फ कश्मीर कोई मसला नहीं हे हमें उनके इस अन्धविश्वास को तोडना होगा आगे एक पुराना कॉमेंट ”महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश तक एक भी मुस्लिम सांसद नहीं पहुँचा । बिहार में जाकर इस प्रजाति के कुल दो जीते । झारखंड में फिर नदारद ।
    ये नई गंगा जमुनी सच्चाई है, दर्ज किया जाय -!!
    जवाब दें ”smith को जवाब )- सिकंदर हयात
    May 19,2014 at 12:31 PM IST
    हो सकता हे की इन मुस्लिम सांसदों को पाकिस्तानी हिन्दुओ और उनकी लड़कियों की हाय लगी हो जिन्हे पिछले2- 3 सालो से उनके ही बाप दादाओ की जमी से निकला जा रहा हे उनकी लड़कियों से ज़बरदस्ती शादिया की जा रही हे क्या इस सम्बन्ध में इन मुस्लिम सांसदों का फ़र्ज़ नहीं था की ये सब दलगत राज़नीति से ऊपर उठ कर संसद में इनके लिए आवाज़ उठाते पाकिस्तान एम्बेसी के सामने इस विषय पर धरना प्रदर्शन करते क्या कुछ किया इन्होने ? कुछ भी तो नहीं अब अगर आप कहते हे की य दूसरे देश का मसला था तो फिर इन मुस्लिम सांसदों को उन लोगो की खबर लेनी चाहिए थी जिन्होंने आज़ाद मैदान में बर्मा के मसले पर हिंसा की थी क्या किया इन्होने कुछ भी तो नहीं अगर ये सब करते तो य इंसानियत और इनकी राज़नीति दोनों के लिए ही अच्छा होता गंगा जमुनी संस्कर्ति का जहा तक सवाल हे तो उपमहादीप में 60 करोड़मुस्लिम और 90 करोड़ हिन्दू हे मुस्लिम हर जगह हर कोने कोने में हे जबकि हिन्दुओ से अनगिनत इलाके खाली करवा लिए गए हे य सब सोचना पड़ेगा गंगा जमुनी संस्कर्ति की जिम्मेवारी सिर्फ हिन्दुओ की ही तो नहीं हे ?