आइवीएफ कारोबार: सेहत से खिलवाड़

opener-main1

गीता (बदला हुआ नाम) की शादी को चार साल हो गए थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी. गीता और उनके पति की इकलौती चाहत यही थी कि उनका एक बच्चा हो. दोनों ने गाइनी सर्जन से संपर्क किया तो पता चला कि गीता की फैलोपियन ट्यूब में ट्यूबरकुलर इंफेक्शन है, जिसकी वजह से वह गर्भधारण नहीं कर सकतीं.

इसके बाद गीता ने करीब एक साल तक इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. फिर उनकी गाइनी ने उन्हें आइवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन – एक तरह का कृत्रिम गर्भाधान) कराने की सलाह दी. दंपत्ति ने इस बारे में रिसर्च की, जिसमें उन्हें पता चला कि आइवीएफ क्लीनिक सिर्फ दो बार ही आइवीएफ करवाने की सलाह देते हैं. सारी खोजबीन के बाद गीता और उनके पति नई दिल्ली के एक इनफर्टिलिटी क्लीनिक में गए और वहां पर ट्रीटमेंट शुरू हुआ. गीता और उनके पति ने दो बार कोशिश की, लेकिन दोनों बार नाकामयाब रहे. इस प्रक्रिया में उनके दो लाख से ज्यादा रुपये खर्च हो गए, लेकिन इसका फायदा कुछ नहीं हुआ.

इससे गीता और उनके पति को बहुत धक्का लगा. गीता बताती हैं, ‘डॉक्टरों ने हमसे कहा था कि इससे हमारे सपने पूरे हो जाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. हमारे सपने बिखर गए.’ गीता और उनके पति की तरह हजारों नि:संतान दंपत्ति संतान की चाहत में ऐसे क्लीनिकों के झांसे में आ जाते हैं, जिनका मकसद ग्राहकों से पैसा ऐंठना होता है. ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए वे ऐसे सफल मामलों का हवाला देते हैं, जिनमें दिखावा ज्यादा और सच्चाई कम होती है.

BABy by Trilochan sk (6)
आइवीएफ क्लीनिक तेजी से बढ़ रहे हैं क्योंकि सेरोगेसी का कारोबार काफी मुनाफे का सौदा है

आइवीएफ क्लीनिक के अंडरवर्ल्ड में आपका स्वागत है, जहां पर बच्चे का लालच देकर आपसे पैसे ऐंठे जाएंगे. आज पूरे देश में आइवीएफ तकनीक का बोलबाला है. इससे संबंधित विज्ञापन आपको जगह-जगह देखने को मिल जाएंगे, जिनमें इस बात का दावा किया गया होगा कि अब नि:संतान दंपत्तियों को निराश होने की जरूरत नहीं है, अब वे आइवीएफ तकनीक की मदद से संतान सुख पा सकते हैं. इन विज्ञापनों को पढ़कर संतान की चाहत लिए दंपत्ति जब वहां जाते हैं, तो बदले में उन्हें निराशा ही मिलती है.

जिस तरह संतान की चाहत रखनेवाले दंपत्ति होते हैं, ठीक उसी तरह एग डोनेट करनेवाले भी होते हैं, जो कुछ पैसों के लिए में एग बैंक को एग डोनेट करते हैं. अभी हाल ही में इसी मसले पर विकी डोनर नाम से एक फिल्म भी आई थी, जिसमें एग डोनेशन के इसी कारोबार का एक दूसरा पहलू दिखाया गया था. विज्ञान कहता है कि महिलाओं में हर महीने एग डेवलप होते हैं, जो गर्भधारण के लिए जरूरी होते हैं और ये हजारों की संख्या में होते हैं, जो बेकार हो जाते हैं, ऐसी ही बातें सुनाकर एग बैंकवाले अशिक्षित महिलाओं को एग डोनेट करने के लिए फुसलाते हैं. अगर ये कहें कि अब ऐसी महिलाओं के साथ एग्सप्लॉयटेशन (कोख का शोषण) हो रहा है, तो गलत नहीं होगा. अपनी सेहत की चिंता किए बगैर ये औरतें बिना किसी स्वास्थ्य जांच के एग डोनेट करती हैं, परिणामस्वरूप कई लाइलाज बीमारियों का शिकार हो जाती हैं.

अवैध तरीके से चलनेवाला आइवीएफ का व्यवसाय बड़ी तेजी से पूरे भारत में फैल रहा है. कई मायनों में यह कारोबार अनैतिक भी कहा जा सकता है, क्योंकि यह अवैध सेरोगेसी के व्यापार को बढ़ावा दे रहा है. संयुक्त राष्ट्र की एक टीम ने साल 2012 में इस बारे में एक सर्वेक्षण किया था, जिसके मुताबिक भारत में इससे संबंधित बाजार 40 करोड़ डॉलर का है. इसमें छोटे से लेकर बड़े स्तर तक के लोग जुड़े हुए हैं. एजेंट जरूरतमंदों को थोड़े पैसे का लालच देकर उनसे एग लेते हैं और फिर उस एग को जरूरतमंद दंपत्तियों को लाखों रुपये में बेचते हैं.

आइवीएफ की सफलता की दर काफी कम है. जिन लोगों को बच्चे का सपना दिखाया जाता है, उनमें से कुछ लोगों की ही चाहत पूरी हो पाती है, अधिकांश लोगों के हाथ निराशा ही लगती है

इस कारोबार पर तहलका ने जो पड़ताल की, उससे पता चलता है कि आइवीएफ का यह धंधा इंसानी लालच की एक जीती-जागती मिसाल है. इसके जरिए कुछ लोगों का गिरोह नि:संतान परिवारों की भावनाओं से खेल रहा है. समस्या यह है कि जो लोग संतान की चाहत रखते हैं, उनकी इच्छा फिर भी पूरी नहीं हो रही है. क्लीनिक उनकी भावनाओं पर अपने धंधे की उड़ान भर रहे हैं. आइवीएफ की सफलता की दर काफी कम है. जिन लोगों को बच्चे का सपना दिखाया जाता है, उनमें से कुछ लोगों की ही चाहत पूरी हो पाती है, अधिकांश लोगों के हाथ निराशा ही लगती है.

[box]
भारत बन सकता है दुनिया का सेरोगेसी कैपिटल

Screen shot 2014-12-04 at 3.03

सेरोगेसी से जुड़ी औरतों के स्वास्थ्य के प्रति चिंतित लोगों और चिकित्सा जगत के बीच चल रहा द्वंद्व जल्द ही खत्म होे सकता है. केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में इस बारे में एक विधेयक- असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजीज रेगुलेशन बिल पेश किया जानेवाला है. इस विधेयक के कानून का रूप ले लेने के बाद भारत दुनिया का सरोगेसी कैपिटल बन सकता है.

साल 2008 में उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी की थी कि कॉमर्शियल सेरोगेसी ने व्यवसाय का रूप ले लिया है, क्योंकि अमीर परिवार अपने घरों में टेस्ट ट्यूब संतानों की किलकारियां सुनना चाहते हैं और गरीब औरतें कुछ पैसों के बदले अपनी कोख किराए पर दे रही हैं. उसी साल इस विधेयक का मसौदा तैयार किया गया, ताकि इस बाजार का नियमन किया जा सके.

इस विधेयक को 2010 और 2013 में संशोधित किया गया, लेकिन इन दोनों ही विधेयकों में आशय स्पष्ट था. यह विधेयक कुछ सुरक्षा शर्तों के साथ सेरोगेसी और एग डोनेशन को अनुमति देता है, लेकिन इन कामों से जुड़ी चिकित्सा प्रक्रियाओं के संभावित दुष्परिणामों को देखते हुए महिला स्वास्थ्य विशेषज्ञ इन शर्तों को सुरक्षित नहीं मानते.

अठारहवें विधि आयोग ने साल 2008 में बने इस विधेयक के मूल रूप का विश्लेषण किया था और यह टिप्पणी की थी- ‘भारत में कोख किराए पर है, जो विदेशियों के लिए बच्चे पैदा करती है और भारतीय सेरोगेट माताओं के लिए डॉलर.’ कॉमर्शियल सेरोगेसी का विरोध करते हुए आयोग ने व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए सेरोगसी पर रोक लगाने का सुझाव दिया था.

इस विधेयक के कानून का रूप ले लेने के बाद भारत यूक्रेन, जॉर्जिया और थाइलैंड जैसे देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जहां इसकी अनुमति है. इस विधेयक को उचित ठहराते हुए केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि भारतीय परिवारों के लिए वंश परंपरा काफी अहम होती है. तहलका ने आयुर्वेदिक और यूनानी डॉक्टरों के अलावा बांझपन उपचार से जुड़े केंद्रों के अधिकारियों से जो बातचीत की, उससे भी यह संकेत मिला िक नवविवाहित जोड़ों पर बच्चे के लिए परिवार और समाज की ओर से बराबर दबाव बनाया जाता है. इस संदर्भ में गृह मंत्रालय ने दिशा-निर्देश जारी किया कि केवल विपरीतलिंगी विवाहित जोड़े ही आइवीएफ का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस दिशा-निर्देश के तहत सिंगल विमेन, गे और लेस्बियन जोड़ों को इस तकनीक का इस्तेमाल करने से मना किया गया है.

[/box]

इतना ही नहीं, अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए ये लोग एग डोनर की सेहत की भी अनदेखी करते हैं. सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी हजारों औरतें इनकी लच्छेदार बातों में आकर थोड़े से पैसों के लिए एग डोनेट करने को तैयार हो जाती हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि एग डोनेट करने के बाद सेहत को जो नुकसान होता है, उसका पता एकदम से तो नहीं चलता, लेकिन इसका असर कुछ दिनों बाद दिखना शुरू हो जाता है. मोटे तौर पर एक अनुमान है कि उचित सावधानी अपनाए बगैर एग डोनेशन करने की वजह से लगभग 40 से 45 हजार औरतें गंभीर बीमारियों का शिकार हो चुकी हैं.

दिल्ली के कापसहेड़ा की रहनेवाली विमलेश देवी ने अपने आपको बड़ा भाग्यशाली समझा, जब उन्हें ऐसा मौका मिला. उनके पड़ोसियों की आंखें खुली की खुली रह गईं, जब उन्होंने देखा कि उनके पति राजेश, सिक्योरिटी गार्ड का काम करनेवाले, ने नई बाइक खरीद ली. उसके बाद जल्दी ही उनके छोटे से घर में सुख-सुविधा की सारी चीजें भर गईं. फिर पड़ोसियों को पता चला कि 25 वर्षीया विमलेश की इस समृद्धि की वजह उनका सेरोगेट मदर बनना है.

विमलेश की छोटी उम्र में ही शादी हो गई थी. चार बच्चे होने के बाद उनके पति की मौत हो गई. उसके बाद उनकी मां ने उनकी शादी राजेश से करवा दी, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति खराब ही बनी रही. उसके बाद एक एजेंट ने उन्हें आसानी से पैसे कमाने का लालच देकर एग डोनेट करने के लिए राजी कर लिया. विमलेश और उनकी एक करीबी रिश्तेदार एक एजेंट के जरिए एग डोनेट करने लगीं, जो इससे मिले पैसों में से अपना हिस्सा भी लेता था.

दो बार एग डोनेट करने के बाद विमलेश की जिंदगी में जैकपॉट तब लगा, जब उन्हें सेरोगेट मदर बनने का मौका मिला. इससे उन्हें तीन लाख रुपये मिले. जब बच्चा हो गया, तो उन्हें पैसे मिल गए. इस तरह विमलेश को पैसों का चस्का लग गया. यह बात और है कि एक पैन कार्ड थमा कर उनके पति ने उन्हें यह झांसा दे दिया था कि यह उनके उस खाते का डेबिट कार्ड है, जिसमें उनके पैसे जमा हैं. भले ही उनके साथ यह ठगी हो गई हो, लेकिन अब उनकी तरक्की हो गई थी. वह अब साधारण एग डोनर से एजेंट बन गई थीं. विमलेश अब अपने पड़ोस की महिलाओं को जल्दी पैसे कमाने के लिए एग डोनेट करने के लिए उत्साहित करने लगीं.

विमलेश की यह कहानी ईशानी दत्ता के वृत्तचित्र वॉम्ब्स ऑन रेंट (किराए पर कोख) में दिखाई गई उन चुनिंदा कहानियों में से एक है, जो देश के शहरी इलाकों में चल रही धोखाधड़ी और शोषण की गाथा पेश करती हैं.

कभी-कभी एग डोनेट करनेवाली महिला से संकोचशील सेरोगेट मदर और फिर चालाक एजेंट बनने तक की विमलेश की कहानी इस कारोबार में शामिल लालच और धोखाधड़ी को बखूबी बयान करती है.

2 COMMENTS

  1. Content is good but inside story is not effective. It contains a lot of repetitions. You talk about what happened but didn’t put light on correct, medical & legal way to be a surrogate mother. you even didn’t discussed about after effects and harms of egg donation. as i know tehlka as a open minded magazine, but in this i found some shyness or lack of knowledge of whole content.

  2. स्टोरी पर पूरी तरह काम नहीं क‌िया गया। जो कुछ गलत बताया जा रहा है तो वह कैसे है? मानक क्या है। इस बारे में व‌िशेषज्ञ डॉक्टरों से बातचीत भी नहीं है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here