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राजस्थान में किसानों की जीत आंदोलन में किसानों के साथ मज़दूर, व्यापारी और छात्र भी शामिल

राजस्थान के सीकर क्षेत्र मेें किसान आंदोलन ने वह कर दिखाया जिसकी उम्मीद भी किसी को नहीं थी। आज ऐसा समय है जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को फलने-फूलने का अवसर देने के लिए सरकारों के बीच जैसे होड़ लग गई है। मनमोहन सिंह की सरकार ने पूंजीपतियों के हक में जो  

मजबूत भी मजबूर भी

लालू से मिलन :  मजबूरी में मजबूती का वास्ता! मांझी प्रकरण की तपिश अब कम होती जा रही है. हालांकि चुनाव तक मांझी इसे बनाए रखना चाहेंगे और भाजपा इसमें हवा-पानी-घी आदि देकर उसे ज्वलंत भी बनाए रखना चाहेगी. अब नीतीश की राजनीतिक यात्रा में उनका और उनकी पार्टी का  

लुगदी, घासलेट, अश्लील, मुख्यधारा… साहित्य के स्टेशन

मिलिट्री डेयरी फार्म, सूबेदारगंज, इलाहाबाद. लौकी की लतरों से ढके एस्बेस्टस शीट की ढलानदार छतों वाले उन एक जैसे स्लेटी, काई से भूरे मकानों का शायद कोई अलग नंबर नहीं था. हर ओर ऊंची पारा और लैंटाना घास थी. कंटीले तारों से घिरे खेत थे जिनके आगे बैरहना का जंगल  

‘जो जिया सो लिखा, हवा-हवाई कुछ नहीं’

उनके साहित्य को लुगदी बताए जाने पर उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा का कहना है कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या कहता है. वह बस अपने पाठकों को जानते हैं, जिनसे उन्हें मरते दम तक लिखते रहने की प्रेरणा मिलती है. विकास कुमार की बातचीत  

लोकप्रिय है, लुगदी नहीं

लोकप्रिय साहित्य को लुगदी साहित्य कहना ठीक नहीं है क्योंकि साहित्य के नाम जो कुछ परोसा जा रहा है, उसमें से बहुत कुछ ऐसा है जो लुगदी की तुलना में बहुत ही खराब और बेहद गिरा हुआ है. लोकप्रियता अगर किसी चीज के अच्छे होने का प्रमाण नहीं है तो  

‘साहित्य में तुम मेरी पीठ खुजाओ, मैं तुम्हारी खुजाता हूं… बेहद आम बात हैै’

हिंदी अपराध लेखन में शीर्ष लेखकों में शुमार सुरेंद्र मोहन पाठक का मानना है कि लोकप्रिय साहित्य का पाठक अपने लेखक की हैसियत बनाता है, खालिस साहित्यकार इस हैसियत से वंचित हैं. विकास कुमार की उनसे खास बातचीत  

जासूसी और सेक्स थ्रिलर का कॉकटेल

लुगदी साहित्य में जासूसी के साथ रोमांस परोसने का सिलसिला काफी पुराना है. इस तरह के उपन्यासों की पाठक संख्या आज भी बनी हुई है. 80 और 90 के दशक में प्रकाशित उपन्यासों में रोचकता को बनाए रखने के लिए जासूसी एक महत्वपूर्ण तत्व होता था. इसके अलावा इसमें रोमांस  

सेक्स प्रेम की अभिव्यक्ति हो हिंसा की नहीं

पति-पत्नी के बीच प्यार, शत्रुता, उदासीनता अादि के बारे में कानून मौन रहता है. ऐसे में इच्छा-अनिच्छा और सहमति-असहमति का प्रश्न जटिल हो जाता है  

दोराहे  पर  राय

वैवाहिक बलात्कार को लेकर न्यायपालिका और संसद की प्रतिक्रिया बताती है कि भारत में घरेलू हिंसा और लैंगिकता को लेकर रवैया कितना वर्चस्ववादी है  

‘बलात्कार का कानूनी लाइसेंस !’

सहमति से संबंध बनाने की उम्र 16 साल से बढ़ाकर 18 साल कर दी गई है, मगर 15 साल से बड़ी उम्र की पत्नी से सहवास अभी भी बलात्कार नहीं माना जाता