दरकता दंभ

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फोटोः तहलका अर्काइव
फोटोः तहलका अर्काइव

महाराष्ट्र में राजनीतिक उथल-पुथल थम चुकी है. भारतीय जनता पार्टी के अकेले सरकार बनाने के लगभग डेढ़ महीने बाद अब शिवसेना उनके साथ आ गई है और प्रदेश में इन दोनों के गठबंधनवाली सरकार बन चुकी है. लेकिन अलगाव के इस छोटे दौर में शिवसेना की वह फजीहत हुई, जिसकी उसने शायद ही कल्पना की हो.

बदले हुए राजनीतिक समीकरणों के बीच अपनी कमजोर स्थिति को स्वीकार करने में शिवसेना को कुछ वक्त लगा. इसकी वजह से आखिरकार वह भाजपा के साथ सरकार में शामिल तो हो गई, लेकिन उसे न तो उपमुख्यमंत्री का पद मिला और न ही गृह मंत्रालय. परिस्थितियां कुछ ऐसी बदलीं कि शिवसेना को भाजपा के साथ आने के लिए मजबूर होना पड़ा. शिवसेना की धमक और इसके संस्थापक बाल ठाकरे की हनक को याद करें, तो शिवसेना के लिए यह अप्रत्याशित है. विधानसभा चुनावों के दौरान घटी घटनाओं और जानकारों की राय से अगर शिवसेना की मौजूदा स्थिति के बारे में कोई तस्वीर बनानी हो तो यही तस्वीर उभरती है कि, एक तो बदली हुई स्थितियों में अपनी कमजोर स्थिति का आकलन करने में उनसे गंभीर चूक हुई और दूसरी बात, उन्होंने इस दौरान राजनीतिक अपरिपक्वता की भी कई मिसालें पेश कीं, मसलन चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री के पिताजी को निशाना बनाना या फिर आदित्य ठाकरे जैसे अनुभवहीन युवा को सीटों के बंटवारे की जिम्मेदारी सौंपना आदि.

पिछले लगभग पांच दशकों के दौरान महाराष्ट्र की राजनीति में ठाकरे परिवार एक तरफ रहा है, तो प्रदेश की बाकी राजनीति एक तरफ. इसकी वजह रही है बाल ठाकरे की छवि और शिवसेना का रोचक इतिहास.

बाल ठाकरे, जिन्हें उनके चाहनेवाले बालासाहेब या सिर्फ साहेब कहकर संबोधित करते थे, का जन्म 23 जनवरी 1927 को पुणे में एक चंद्रसेनीय कायस्थ परिवार में हुआ था. उनके पिता प्रबोधनकार ठाकरे का मूल नाम केशव सीताराम ठाकरे था, लेकिन उनकी पत्रिका ‘प्रबोधन’ की बदौलत उन्हें यह उपनाम दिया गया था. वह समाज सुधारक ज्योतिबा फूले के अनुयायी थे और जातिवाद, बाल विवाह, दहेज प्रथा और दकियानूसी परंपराओं के खिलाफ संघर्षरत थे. वह संयुक्त महाराष्ट्र समिति के संस्थापक सदस्यों में थे और मुंबई व बेलगाम के महाराष्ट्र में समावेश की पैरवी करते थे. इस तरह बाल ठाकरे को सामाजिक मूल्य उनके पिता से विरासत में  मिले थे.

भारत में जन्मे ब्रिटिश मूल के लेखक विलियम मेकपीस ठाकरे से प्रबोधनकार ठाकरे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपने उपनाम ठाकरे की अंग्रेजी में स्पेलिंग विलियम की स्पेलिंग से बदल ली जो आज तक चल रही है. यह बात और है कि उन्हीं के बेटे बाल ठाकरे ने बाद में अंग्रजों के दिए गए नाम बॉम्बे को बदलकर मुंबई कर दिया.

बाल ठाकरे, मार्मिक और शिवसेना

बाल ठाकरे ने अपने करियर की शुरुआत ‘फ्री प्रेस जर्नल’ अखबार में कार्टूनिस्ट के तौर पर की थी. साल 1959 में उन्होंने वहां से इस्तीफा दे दिया और व्यंग्य चित्रों की एक साप्ताहिक पत्रिका निकालने के बारे में अपने पिता से चर्चा की, जिसके बाद अगस्त 1960 में ‘मार्मिक’ पत्रिका का जन्म हुआ. किसे पता था कि आनेवाले दिनों में यही पत्रिका बाल ठाकरे को कार्टूनिस्ट से नेता बनानेवाली थी.

मार्मिक के जरिए ठाकरे ने मराठी लोगों के अधिकारों की लड़ाई शुरू की, साथ ही मुंबई में गुजरातियों, मारवाड़ियों और दक्षिण भारतीयों के मुंबई में बढ़ते प्रभाव के खिलाफ अभियान चलाया. मार्मिक में उन्होंने यह मसला उठाया कि दूसरे राज्यों से मुंबई आए लोगों के पास नौकरी है, लेकिन स्थानीय लोग नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं. कई बार महाराष्ट्र की विभिन्न संस्थाओं में कार्यरत ऐसे अधिकारियों के नामों की सूची पत्रिका में छापी जाती थी, जो दूसरे राज्यों से थे. एक बार उन्होंने सरकारी और निजी अस्पतालों में कार्यरत गैर-मराठी डॉक्टरों के नामों की सूची छापी और मुद्दा उठाया कि स्थानीय मराठी लोगों को नौकरी नहीं दी जा रही है. 5 जून 1966 को उन्होंने मार्मिक में शिवसेना स्थापित करने की घोषणा की और लिखा, ‘हम दक्षिण भारतीयों (यंडू-गंडू) के हमलों का जवाब देंगे.’ गौरतलब है कि उस समय मुंबई के सरकारी और निजी दफ्तरों में काफी संख्या में दक्षिण भारतीय लोग कार्यरत थे.

इसके बाद 19 जून 1966 को शिवसेना की स्थापना की गई. फिर 23 अक्टूबर को मार्मिक में यह घोषणा जारी की गई कि 30 अक्टूबर 1966 को दादर के शिवाजी पार्क में शिवसेना की सभा होने वाली है और सभी स्वाभिमानी मराठी बंधुओं से प्रार्थना है कि वे सभा में शामिल हो कर खुद के ही प्रदेश में हो रही अपनी अवेहलना को समाप्त करने के लिए आगे आएं. बाल ठाकरे के इस आह्वान का जोरदार स्वागत हुआ. शिवसेना की पहली सभा में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में लोग शिवाजी पार्क पहुंचे. खुद ठाकरे को भी यह उम्मीद नहीं थी कि शिवाजी पार्क लोगों से खचाखच भर जाएगा.

बाल ठाकरे की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह उनकी बात करने की शैली थी. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कुमार सप्तऋषि, जिनके बाल ठाकरे से निजी संबंध थे, बताते हैं, ‘बालासाहेब एक बेहतरीन कार्टूनिस्ट थे, वह जब बोलते भी थे, चित्रशैली में बोलते थे. एक बार उन्होंने एक वरिष्ठ राजनेता को मेंढक कह दिया था. जब उनसे पूछा गया कि आपने ऐसा क्यों कहा, तो उन्होंने जवाब दिया, यह राजनैतिक दल बदलते रहते हैं, इधर से उधर कूदते रहते हैं. जब मैं इन्हें देखता हूं, तो मुझे मेंढक दिखाई देता है.’

शिवसेना के गठन के बाद से इसका एजेंडा बदलता रहा है. पहले उन्होंने दक्षिण भारतीयों का विरोध किया, फिर वामपंथियों का, फिर उत्तर भारतीयों का

महाराष्ट्र के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री वसंत राव नाईक का समर्थन बाल ठाकरे को प्राप्त था. इसकी वजह थी कम्युनिस्ट ट्रेड यूनियनों का बढ़ता प्रभाव. नाईक चाहते थे कि ठाकरे शिवसेना के जरिए कम्युनिस्टों पर नकेल कसें. साल 1967 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने वीके कृष्ण मेनन को उत्तर पूर्व मुंबई से टिकट देने से मना कर दिया. माना जाता है कि गैर-मराठी होने की वजह से उनका टिकट काट दिया गया था. इसके बाद मेनन ने इस सीट से निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ा, लेकिन शिवसेना की मदद लेते हुए मराठियों के मुद्दे को हवा देकर कांग्रेस ने उनको हरा दिया. इसके बाद शिवसेना की लोकप्रियता में काफी बढ़ोतरी हुई.

पुराने दिनों को याद करते हुए सप्तऋषि बताते हैं, ‘बालासाहेब का शिवसैनिकों से आत्मीय रिश्ता था. वह खुद चालों में जाया करते थे, लोगों से मिलते थे, उनकी परेशानियां पूछते थे. आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए वह उन्हें प्रोत्साहित करते थे. बालासाहेब  जात-पांत में यकीन नहीं रखते थे. वह शिवसैनिकों से बस वफादारी और आदेशपालन की उम्मीद रखते थे.

साल 1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित कर दिया, तब ठाकरे ने मार्मिक में आपातकाल के समर्थन में एक संपादकीय लिखा. माना जाता है कि मार्मिक में छपे संपादकीय ने शिवसेना को प्रतिबंधित होने से बचा लिया था.

शिवसेना के गठन के बाद से कई बार इसका एजेंडा बदल चुका है. पहले उन्होंने दक्षिण भारतीयों का विरोध किया, फिर वामपंथियों का, उसके बाद उत्तर भारतीयों का. अस्सी के दशक में शिवसेना हिंदुत्व के एजेंडे को लेकर आगे बढ़ी, जिसके समर्थन में नवंबर 1987 में मार्मिक में एक संपादकीय भी लिखा गया था.