‘संत की समाधि’ : आस्था या अंधविश्वास

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‘केवल महाराज जी (आशुतोष महाराज) ही सच्चे गुरु हैं जो ‘ब्रह्मज्ञान’ दे सकते हैं. मीडिया वालों ने उनके बारे में काफी उल्टी-सीधी बातें फैला दी हैं. मीडिया वाले समाधि का अर्थ नहीं समझते. हम बार-बार कह रहे हैं कि महाराज जी समाधि में हैं और वे वापस आएंगे.’

ये बयान आशुतोष महाराज की अनुयायी 38 वर्षीय सोनिया का है. सोनिया पिछले 7-8 साल से आशुतोष महाराज के दिव्य ज्योति जागृति संस्थान से जुड़ी हैं. दिल्ली के कड़कड़डूमा स्थित केंद्र में होने वाले साप्ताहिक सत्संग में वे अक्सर अपनी 11 और 13 साल की दो बेटियों के साथ जाती हैं.

पिछले दो साल से आशुतोष महाराज को लेकर विवाद गहराते चले जा रहे हैं. पंजाब के नूरमहल में दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के संस्थापक आशुतोष महाराज को 2014 में डॉक्टरों ने चिकित्सकीय रूप से मृत घोषित कर दिया लेकिन उनके शिष्यों का कहना है कि वे लंबी समाधि में हैं और एक दिन वापस लौट आएंगे. संस्थान की वेबसाइट पर भी साफ-साफ लिखा गया है, ‘श्री आशुतोष महाराज जी 29 जनवरी 2014 से समाधि की अवस्था में हैं.’  ‘तहलका’ के साथ बातचीत में संस्थान के मीडिया प्रवक्ता विशालानंद ने बताया,‘समाधि लेने से कुछ दिन पहले महाराज जी खुद के लोप हो जाने की बात अपने प्रवचनों में कहते रहे हैं. बाद में हमें समझ आया कि वे दरअसल समाधि में जाने की बात कर रहे थे. महाराज जी के शरीर को संरक्षित करने के लिए विशेष प्रकार के फ्रीजर में रखा गया है.’

‘आशुतोष महाराज के सत्संग में साक्षात ईश्वर के दर्शन कराए जाते हैं. मैं पहले काफी तर्क करती थी, अब मैंने संस्थान के लिए जीवन समर्पित कर दिया है’

कड़कड़डूमा स्थित केंद्र आने वाले अनुयायियों के साथ ही केंद्र की संचालिका ‘मोनिका दीदी’ को पक्का यकीन है कि आशुतोष महाराज समाधि में हैं और एक दिन वापस जरूर आएंगे. समाधि के बारे में जानकारी किसने दी, के सवाल पर मोनिका ने बताया कि ‘ध्यान’ में बैठने पर महाराज जी ने उन्हें दर्शन देकर ऐसा कहा. उस वक्त लगभग 20-22 की संख्या में मौजूद अनुयायी ‘जय महाराज जी’ कहकर एक दूसरे का अभिवादन कर रहे थे. संध्या के समय दीप-धूप से आरती करते और सजे हुए सिंहासन पर आशुतोष महाराज की तस्वीर के सामने श्रद्धापूर्वक झुककर जैसे उनकी मौजूदगी को अनुयायी जीवंत करने पर आमादा नजर आ रहे थे. ‘मोनिका दीदी’ ने बताया, ‘बाकी जगहों पर केवल झूठी बातें की जाती हैं लेकिन आशुतोष महाराज के सत्संग में साक्षात ईश्वर के दर्शन कराए जाते हैं. मैं खुद भी पहले काफी तर्क करती थी और सवाल उठाती थी लेकिन यहां पर सचमुच ईश्वर के दर्शन करने के बाद मेरी श्रद्धा पूर्ण रूप से आशुतोष महाराज में हो चुकी है और मैंने संस्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है.’ उन्होंने आशुतोष महाराज के जीवन पर लिखीगई इसी साल प्रकाशित एक किताब ‘आशुतोष महाराज: महायोगी का महारहस्य’ भी उपलब्ध कराई जो किसी अनुयायी द्वारा नहीं बल्कि स्वतंत्र पत्रकार संदीप देव द्वारा लिखी गई है.

किताब में संदीप देव ने समाधि को अंधविश्वास कहकर प्रचारित करने वाले मीडिया के पक्षपातपूर्ण रवैये की आलोचना की है और गोवा में हर दस साल पर सेंट फ्रांसिस जेवियर के शव के सार्वजनिक प्रदर्शन का हवाला दिया है. सेंट फ्रांसिस जेवियर की मृत्यु वर्ष 1552 में हुई थी लेकिन वेटिकन चर्च का मानना है कि उनका शरीर आज भी खराब नहीं हुआ है. संदीप कहते हैं, ‘दिसंबर 2014 में भी ऐसी ही प्रदर्शनी लगाई गई लेकिन देश या विदेश की मीडिया ने कभी इसे अंधविश्वास के रूप में प्रचारित नहीं किया.’ बेशक संदीप के इस तर्क में कुछ दम हो सकता है लेकिन आशुतोष महाराज की कथित समाधि के बारे में जिस तरह के तथ्य सामने आते हैं वे कई सवाल उठाते हैं.

29 जनवरी की रात को सांस लेने में तकलीफ होने के बाद अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों की एक टीम ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया था. तब मीडिया को एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने बताया था कि 60 घंटे के इंतजार के बाद एक फरवरी को आशुतोष महाराज का अंतिम संस्कार करने की योजना है. हालांकि ऐसा कुछ नहीं हो सका.  एक फरवरी को संस्थान की ओर से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कहा गया कि आशुतोष महाराज की मौत की खबर एक ‘अफवाह’ है. उनकी मृत्यु नहीं हुई बल्कि वे लंबे वक्त के लिए समाधि में चले गए हैं. उस समय तक पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी सहित पंजाब के कई बड़े राजनीतिज्ञों ने मेल के जरिए सभी प्रमुख मुख्य मीडिया संस्थानों को आशुतोष महाराज की मृत्यु पर शोक संदेश भेज दिया था. संस्थान द्वारा समाधि की घोषणा के बाद उन्होंने वे शोक संदेश वापस ले लिए गए.

उस समय इस खबर की रिपोर्ट करने वाले एनडीटीवी के पत्रकार अश्विनी मल्होत्रा बताते हैं, ‘संस्थान के तत्कालीन प्रवक्ता अमर श्रीवास्तव ने आशुतोष महाराज के निधन की खबर हमें दी थी, बाद में उन्हें प्रवक्ता पद से ही हटा दिया गया.’  इतना ही नहीं खबर सुनते ही नूरमहल में उमड़ने वाले अनुयायियों को आशुतोष महाराज के दर्शन नहीं करने दिए गए और न ही स्थानीय पुलिस ही जांच के लिए भीतर जा सकी.

3 फरवरी, 2014 को मामले में नया मोड़ तब आया जब 1988-1992 में आशुतोष महाराज का ड्राइवर होने का दावा करने वाले पूरण सिंह ने उनकी हत्या का शक जताते हुए ‘हैबियस कॉरपस’ यानी 24 घंटे के भीतर आशुतोष महाराज उर्फ महेश झा के शरीर को कोर्ट के समक्ष पेश करने तथा उनके पोस्टमॉर्टम के लिए याचिका दायर की. आशुतोष महाराज का रहस्य तब और गहरा गया जब 7 फरवरी को दिलीप झा नाम के व्यक्ति ने कोर्ट में यह दावा पेश किया कि आशुतोष महाराज दरअसल उनके पिता हैं, उनका असल नाम महेश झा है जो बिहार के मधुबनी जिले के लखनौर गांव के रहने वाले हैं. 1970 में जब दिलीप झा एक महीने के थे तो महेश झा उर्फ आशुतोष महाराज गांव छोड़कर दिल्ली आ गए थे. दिलीप ने याचिका में अपने पिता का अंतिम संस्कार करने की अनुमति भी मांगी.

इसके लगभग दस महीने बाद एक दिसंबर, 2014 को हरियाणा और पंजाब हाईकोर्ट के जज एमएमएस बेदी ने दिलीप झा की याचिका को  यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे ऐसा कोई भी साक्ष्य अदालत में पेश नहीं कर पाए जिससे यह साबित हो सके कि आशुतोष महाराज उनके पिता हैं. इसी सुनवाई में पूरण सिंह की याचिका को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने आशुतोष महाराज की हत्या की आशंका जताते हुए पोस्टमॉर्टम की मांग की थी. हालांकि इसके साथ ही अदालत ने पंजाब सरकार को 15 दिन के भीतर आशुतोष महाराज का अंतिम संस्कार करने का निर्देश दिया. अदालत ने दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा ‘समाधि’ बताकर आशुतोष महाराज के शरीर को अनिश्चितकाल के लिए संरक्षित किए जाने के अधिकार को खारिज कर दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित अधिकारों के तहत ऐसी कोई प्रथा उस धर्म विशेष का अनिवार्य भाग नहीं है जिसे आशुतोष महाराज के अनुयायी मानते हैं. साथ ही संविधान के अनुच्छेद 51 ए के तहत यह हर नागरिक का कर्तव्य है कि व​ह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवता, सवाल करने और सुधार करने की प्रवृत्ति को बढ़ाए. लेकिन पंजाब सरकार ने कोर्ट में यह हलफनामा दिया कि आशुतोष महाराज का अंतिम संस्कार सरकार के लिए संभव नहीं है क्योंकि यह आशुतोष महाराज के श्रद्धालुओं की आस्था का मामला है. ऐसे में जबरन अंतिम संस्कार किए जाने से कानून एवं व्यवस्था की समस्या खड़ी हो सकती है. इसके बाद 15 दिसंबर को हुई सुनवाई में चीफ जस्टिस शियावक्स जल वजीफदार और जस्टिस आॅगस्टीन जॉर्ज मसीह की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच द्वारा अंतिम संस्कार किए जाने संबंधी फैसले पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी.

Dilip Jha
दिलीप झा

‘मेरे पिता आशुतोष महाराज इस बात को सबके सामने जाहिर नहीं करना चाहते थे कि मैं उनका बेटा हूं या वह विवाहित भी हैं. उनकी असली पहचान गोपनीय रहे, इसलिए उन्होंने मुझे ‘हरिदत्त’ नाम से फोन करने की हिदायत दी थी. वे खर्च के लिए मुझे पैसे भी भिजवाते रहे हैं’: दिलीप झा

दूसरी ओर दिलीप झा ने आशुतोष महाराज के पुत्र होने का अपना दावा छोड़ा नहीं है. उन्होंने आशुतोष महाराज की डीएनए जांच के लिए याचिका दायर की है. कोर्ट में इसी 24 फरवरी को इसकी सुनवाई होगी. दिलीप झा ने बताया कि उनके पास 1999 में पिता का पत्र आया जिसमें उन्होंने अपने परिवार से मिलने की इच्छा जताई. इसके बाद वे दिल्ली में अपने पिता आशुतोष महाराज से मिले. 2002, 2006 और 2009 में भी वे अपने पिता से मिले हैं. दिलीप के अनुसार, ‘मेरे पिता आशुतोष महाराज इस बात को सबके सामने जाहिर नहीं करना चाहते थे कि मैं उनका बेटा हूं या वह विवाहित भी हैं. उनकी असली पहचान गोपनीय रहे, इसलिए उन्होंने मुझे ‘हरिदत्त’ नाम से फोन करने की हिदायत दी थी. 1999 के बाद से मेरा उनसे लगातार संपर्क रहा और वे खर्च के लिए मुझे पैसे भिजवाते रहे हैं.’

आशुतोष महाराज का ड्राइवर होने का दावा करने वाले पूरण सिंह बताते हैं, ‘मैं महाराज के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर 1988 में उनका अनुयायी और ड्राइवर बना लेकिन 1992 आते-आते मुझे ऐसी काफी सारी बातें पता चलीं जिसके कारण मेरा उनसे मोहभंग हो गया और मैंने संस्थान छोड़ दिया. सबसे पहले मैं तब चौंका जब आशुतोष महाराज ने बिहार में अपनी पत्नी और बेटे के बारे में मुझे बताया.’ पूरण सिंह का यह भी दावा है कि आशुतोष महाराज संन्यासी नहीं थे बल्कि उनके महिलाओं से संबंध थे. वह कहते हैं, ‘जिस तरह आशुतोष महाराज का दर्शन किसी को नहीं करने दिया गया, वह शक पैदा करता है. इसीलिए मैंने अदालत में पोस्टमॉर्टम के लिए याचिका भी डाली थी. वह याचिका खारिज हो गई लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैं दिलीप झा के संपर्क में हूं और उनका पूरा समर्थन करता हूं, क्योंकि मैं सच को किसी भी तरह सामने लाना चाहता हूं. इसके लिए मैं मरने से भी नहीं डरता.’ गौरतलब है कि पंजाब सरकार की ओर से पूरण सिंह को सुरक्षा मुहैया कराई गई है. दो सुरक्षा गार्ड हमेशा उनकी सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं.

पंजाब सरकार की ओर से दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के नाम पर एक गांव बसाया गया जिसका नाम ‘दिव्य ग्राम’ है. इस गांव की जनसंख्या 525 है

संदीप देव ने अपनी किताब में आशुतोष महाराज के मूल स्थान को विवादास्पद बताया है. वह कहते हैं, ‘मैं लखनौर गांव गया था लेकिन दिलीप झा के अलावा वहां कोई भी ऐसा नहीं मिला जो आशुतोष महाराज  के उस गांव का होने का दावा करता. वहां दिलीप से जब मैंने पिता की कोई पुरानी तस्वीर दिखाने के लिए कहा तो वे नहीं दिखा पाए. दिलीप की मां जिनके बारे में आशुतोष महाराज की पत्नी होने का दावा किया गया, वह एक शब्द भी नहीं बोलीं बस चुपचाप खड़ी रहीं.’