आरटीआई:सूचना! पूछ ना

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फोटोःविजय पांडे
फोटोःविजय पांडे
फोटोःविजय पांडे

आज से तकरीबन 130 साल पहले हिंदी के नामी साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ‘अंधेर नगरी’ नाम का एक नाटक लिखा था. व्यंगात्मक और रोचक प्रहसनों की भरमार वाले इस नाटक में एक आदमी अपनी बकरी के मरने की फरियाद लेकर राजदरबार में पहुंचता है और राजा से न्याय की गुहार लगाता है. उस व्यक्ति को मुआवजा दिलाने के बजाय राजा, बकरी की मौत के जिम्मेदार अपराधी का पता लगाने के लिए हास्यापद खोज का ऐसा सिलसिला शुरू करता है जो कल्लू बनिया नाम के दुकानदार से लेकर एक कारीगर, चूनेवाले, और गड़रिये से होते-होते अंतत: नगर के कोतवाल पर आकर थमता है. राजा कोतवाल को फांसी की सजा सुना देता है. पर इस बीच घटनाक्रम कुछ ऐसा घूमता है कि आखिर में राजा खुद ही फांसी पर चढ़ जाता है. इसके साथ ही नाटक समाप्त हो जाता है और बकरी की मौत पर न्याय मांगने आया फरियादी खाली हाथ रह जाता है.

उस दौर की अव्यवस्थित और अराजक प्रशासनिक व्यवस्था पर चोट करने वाले इस नाटक को लिखे आज एक सदी से भी ज्यादा का वक्त बीत चुका है. इस नाटक की भाषा में ही कहा जाए तो तब ‘एक टके’ में गली-नुक्कड़ों में आसानी से मिल जानेवाला सामान आज डॉलर और पाउंड की कीमत पर बड़े-बड़े शॉपिंग कांप्लेक्सों में मिलता है. लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था के मोर्चे पर तुलना की जाए तो ‘अंधेर नगरी’ वाला वह ‘चौपट राज’ आज भी उसी तरह कायम है. प्रशासन की तमाम इकाइयों में तब से ही घुस चुके अव्यवस्था के ये विषबीज अब सूचना का अधिकार (आरटीआई) नाम के उस कानून की अवधारणा पर चोट कर रहे हैं जिसे प्रशासन में पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने के उद्देश्य से साल 2005 में बड़े जोर-शोर से लागू किया गया था. देश-भर के अलग-अलग हिस्सों में इस कानून के तहत सूचना मांगने के ऐसे बहुत से मामले हैं जो भारतेंदु के उस नाटक को अक्षरश: चरितार्थ करते नजर आते हैं. यानी, सूचना चाहनेवाला फरियादी संबंधित विभाग में आवेदन लगाता है. इस पर सूचना देने के बजाय उस विभाग का सूचना अधिकारी आवेदन को एक विभाग से दूसरे, तीसरे और चौथे विभाग को सौंप देता है. तय सीमा से कहीं ज्यादा समय तक चलनेवाली इस आंखमिचौली के बाद भी जब सूचना नहीं मिलती है तो सूचना आयोग ‘राजा की फांसी’ की तरह सूचना अधिकारी पर जुर्माना ठोक देता है. इस तरह यह असली नाटक भी खत्म हो जाता है और यहां भी आवेदन करनेवाला फरियादी हाथ मलता रह जाता है.

‘सूचना अधिकार अधिनियम 2005’ के लागू होने से अब तक लगभग नौ साल की इस समयावधि में इसके प्रावधानों के तहत सूचना मांगे जाने पर सूचना न देने, आनाकानी करने, बहाना बनाने और आवेदनों को खारिज कर देने के ऐसे बहुत से मामले देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आ चुके हैं. ये मामले साफ तौर पर बताते हैं कि आरटीआई के तहत आवेदन करने पर पहली बार में ही सूचना हासिल करना किसी महाभारत लड़ने से कम नहीं है. इसके अलावा इन मामलों से यह भी पता चलता है कि किसी आवेदन को अलग-अलग विभागों की सैर पर भेज देने में खर्च होने वाले अतिरिक्त पैसे और समय की बर्बादी के चलते कई बार हासिल होने वाली सूचना सही होने के बावजूद भी रद्दी के अलावा किसी काम की नहीं रह जाती.

बात पिछले साल जून के महीने की है. उत्तराखंड के केदारनाथ समेत कई अन्य हिस्सों में आपदा ने भयंकर विनाशलीला मचाई थी. आपदा से हुए जानमाल के भारी भरकम नुकसान के लिए तब प्रदेश की सरकार को बहुत हद तक जिम्मेदार बताया जा रहा था. सरकार पर आरोप था कि आपदा से निपटने को लेकर उसकी तैयारियां पर्याप्त नहीं थीं. इन आरोपों की पड़ताल करने के लिए तहलका ने आठ जुलाई, 2013 को उत्तराखंड सरकार के मुख्यमंत्री कार्यालय में एक आरटीआई आवेदन लगाया. इसमें चार धाम यात्रा की तैयारियों को लेकर प्रदेश सरकार द्वारा पिछले तीन सालों में की गई बैठकों का ब्यौरा मांगा गया. आमतौर पर मुख्यमंत्री द्वारा की जाने वाली बैठकों का कार्यवृत्त तैयार किए जाने की जिम्मेदारी सीधे-सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय की होती है. इस लिहाज से देखा जाय तो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कार्यालय को अपने स्तर से यह सूचना प्रदान करनी थी. लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस आवेदन पर सूचना देने के बजाय इसे प्रदेश के आपदा प्रबंधन विभाग तथा पर्यटन विभाग को सौंप दिया. इन दोनों विभागों ने कुछ जानकारियां देने के साथ अन्य जानकारियों के लिए आवेदन को आपदा एवं न्यूनीकरण अनुभाग, धर्मस्व एवं संस्कृति विभाग, चार धाम विकास प्राधिकरण तथा कुछ अन्य विभागों की तरफ सरका दिया. तकरीबन तीन महीने के बाद अलग-अलग विभागों से तहलका को जो जानकारी मिल पाई उसके मुताबिक चारधाम यात्रा की तैयारियों को लेकर सरकार का रवैया बेहद रस्मी था. आलम यह था कि 2011 में हुई बैठक के दौरान लिए गए बहुत से निर्णय दो साल बाद भी धरातल पर नहीं उतर सके थे. आपदा को लेकर सरकार के राहत कार्यक्रमों की पोल खोलने के लिहाज यह एक बेहद महत्वपूर्ण जानकारी थी. लेकिन सूचना मिलने में हुई देरी के कारण इसका औचित्य लगभग समाप्त हो चुका था.

इसी तरह का एक और मामला मध्यप्रदेश सरकार के मुख्य सचिव कार्यालय का भी है. तहलका ने पांच जुलाई, 2013 को मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव कार्यालय से राज्य के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों तथा अन्य जनप्रतिनिधियों के खिलाफ हुई भ्रष्टाचार की शिकायतों की संख्या तथा उनको लेकर लोकायुक्त द्वारा की गई कार्रवाई पर  सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी. कायदे के मुताबिक मुख्य सचिव कार्यालय को इस आवेदन के जवाब में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी अपने स्तर से देनी चाहिए थी. लेकिन मुख्य सचिव कार्यालय ने यह आवेदन मध्यप्रदेश के लोकायुक्त कार्यालय को सौंप दिया.

इसके बाद इस आवेदन के साथ जो कुछ हुआ वह भी बेहद हैरान करनेवाला है. लोकायुक्त कार्यालय ने इस पर कोई सूचना देने के बजाय इस आवेदन को यह कहकर अमान्य करार दिया कि इसमें क्यों, कैसे, और कितने जैसे प्रश्नावाचक शब्दों का प्रयोग किया गया है. कार्यालय का साफ कहना था कि प्रश्नवाचक भाव वाले आवेदनों का जवाब आरटीआई के तहत नहीं दिया जा सकता.

कई बार अधिकारी आवेदन को सिर्फ इसलिए अन्य विभागों को भेज देते हैं ताकि सूचना छिपाई जा सके. वे सूचना न देने के जुर्म से भी बच जाते हैं और आवेदक को सही सूचना भी नहीं मिलती

जिस ‘कितने’ शब्द पर आयोग के लोक सूचना अधिकारी को आपत्ति थी जरा उस पर भी नजर डाल लेते हैं. तहलका ने अपने सवाल में पूछा था कि, ‘जनवरी 2010 से अब तक लोकायुक्त के पास दर्ज हुई शिकायतों में जांच के बाद लोकायुक्त ने ‘कितने’ मामलों में आरोपितों को दोषी माना? तथा इन मामलों में से जन प्रतिनिधियों (राज्य के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, राज्य मंत्रियों एवं विधायकों आदि) की संख्या ‘कितनी’ है?

लेकिन गजब देखिये कि इसी भाषा में तहलका ने जब दिल्ली सरकार के लोकायुक्त कार्यालय से बिल्कुल ऐसी ही सूचना मांगी तो बिना किसी सवाल के उसने सारी सूचना उपलब्ध करवा दी.

एक ही तरह के सवाल पर अलग-अलग राज्यों के सरकारी विभागों की अलग-अलग कार्यप्रणाली का यह अकेला उदाहरण नहीं है. बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव कार्यालयों तथा लोकायुक्त कार्यालयों ने भी तहलका के आवेदनों पर कमोबेश अलग-अलग जवाब ही दिए. छत्तीसगढ के लोकायुक्त कार्यालय ने तो सूचना एक साथ उपलब्ध होने की बात से ही इंकार कर दिया जबकि उसे सिर्फ ऐसे मामलों की संख्या ही बतानी थी.

पिछले साल-भर के दौरान तहलका ने केंद्र सहित अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग विभागों में 50 से अधिक आरटीआई आवेदन लगाए. जिन विभागों में आवेदन लगाए गए उनमें लोकसभा सचिवालय से लेकर केंद्रीय चुनाव आयोग, केंद्रीय रेल मंत्रालय, दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन से लेकर विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री कार्यालय, राज्यपाल कार्यालय, लोकायुक्त कार्यालय, सूचना एवं लोकसंपर्क विभाग तथा गृह, चिकित्सा एवं शिक्षा विभाग समेत कई महत्वपूर्ण विभाग शामिल हैं. लेकिन आधे दर्जन मामलों के अलावा किसी में भी पहली बार में सूचना नहीं मिल सकी. दिल्ली तथा गुजरात के सूचना एवं लोक संपर्क विभाग ने तो अपने-अपने मुख्यमंत्रियों द्वारा की गई घोषणाओं की जानकारी तक देने से हाथ खड़े कर दिए, जबकि आम तौर पर इस विभाग का मुख्य काम ही सरकार की योजनाओं और घोषणाओं को जनता तक पहुंचाना होता है. हैरान करनेवाली एक बात यह भी थी कि ‘सूचना उपलब्ध नहीं है’ के रूप में दिए गए अपने जवाब को तहलका तक पहुंचाने में इन दोनों राज्यों के सूचना एवं लोक संपर्क विभाग ने महीने-भर का वक्त लगा दिया. साफ है कि आरटीआई आवेदनों को टरका देने या फिर एक विभाग से दूसरे विभाग में सैर-सपाटे पर भेज देने की यह परिपाटी देश के लगभग सभी सरकारी विभागों में समान रूप से चल रही है.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ तहलका द्वारा मांगी गई सूचनाओं के संदर्भ में ही ऐसा हुआ. सूचना अधिकार अधिनियम के लागू होने के बाद बीते लगभग एक दशक में ऐसे मामले बड़ी संख्या में सामने आए हैं जिनमें लोगों को सूचना या तो मिल ही नहीं पाई या उन्हें इसके लिए लंबा इतजार करना पड़ा. 2012 में आई कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव, केंद्रीय सूचना आयोग तथा 10 राज्यों के राज्य सूचना आयोगों की एक साझा रिपोर्ट इस हकीकत को काफी हद तक बयान करती है. इस रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक साल 2011-12 में देश-भर में करीब 40 लाख लोगों ने आरटीआई का इस्तेमाल किया. यह संख्या बताती है कि आरटीआई को लेकर लोगों के बीच जागरूकता किस हद तक बढ़ी है. लेकिन इसी रिपोर्ट का अगला हिस्सा आरटीआई को लेकर बिल्कुल उलट तस्वीर दिखाता है. यह हिस्सा बताता है कि अलग-अलग विभागों में लगाए गए इन 40 लाख आवेदनों में से 10 फीसदी शुरुआती स्तर पर ही अस्वीकार कर दिए गए थे. यानी चार लाख लोगों के आवेदन विभागों के प्रथम सूचना अधिकारियों की लाल कलम की भेंट चढ़ गए.

पहली बार में सूचना पाने में नाकाम रहनेवाले अधिकांश लोग बेशक देश की आम जनता के बीच के हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि खास लोगों को इस अधिकार के तहत प्लेट में सजाकर सूचना मिली है. देश के पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त रह चुके शैलेश गांधी भी अधिकारियों द्वारा सूचना न देनेवाली इस बीमारी की चपेट में आने वाली फेहरिस्त में शामिल हैं. अपने एक मामले का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, ‘सूचना आयुक्त के पद से रिटायर होने के बाद पिछले साल मैंने महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार के आयकर रिटर्न से संबंधित सूचना मांगी थी. लेकिन इनकम टैक्स विभाग ने यह सूचना देने से इंकार कर दिया. इसके बाद मैने इस मामले में अपीलीय अधिकारी से शिकायत की, लेकिन वहां से भी मामला बैरंग हो गया. फिर मंैने महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग में अपील की. तब भी मुझे सूचना नहीं मिली. अब यह मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है.’

शैलेश गांधी के साथ हुआ यह वाकया बहुत हद तक यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जब एक पूर्व सूचना आयुक्त के आवेदन को लेकर ऐसा किया जा सकता है तो आम आदमी के आवेदनों के साथ किस तरह का बर्ताव किया जाता होगा. सूचना अधिकार को कानूनी शक्ल देनेवाले आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे से लेकर आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल तक कई मौकों पर इस तरह के वाकयों का जिक्र कर चुके हैं. प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई आंदोलन की अगुआ रहीं अरुणा राय ने भी कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में इसी तरह के एक वाकये का जिक्र किया था. उनके मुताबिक एक सूचना प्राप्त करने में खुद उन्हें कई साल लग गए थे. हालांकि तब देश में आरटीआई कानून लागू नहीं था. लेकिन अब इस कानून के लागू हो जाने के बाद भी जरूरी सूचनाएं आम लोगों की पहुंच से दूर ही हैं.

सूचना के लिए जद्दोजहद से दो-चार होनेवाले इन नामी लोगों के अनुभवों के बाद एक नजर आम लोगों के अनुभवों पर भी डालना जरूरी है. इस क्रम में ‘तीन साल से सूचना का इंतजार कर रहे’ एक ऐसे मामले का जिक्र किया जाना बेहद प्रासंगिक है.

अगस्त, 2011 में बिहार के एक आरटीआई कार्यकर्ता राम प्रवेश राय ने राज्य के बख्तियारपुर प्रखंड कार्यालय से सोलर लाइट वितरण से जुड़ी कुछ जानकारियां मांगी. तकरीबन तीन महीने बाद उन्हें जो सूचना मिली वह पर्याप्त नहीं थी. उस आधी-अधूरी सूचना से असंतुष्ट होकर उन्होंने विभाग के अपीलीय अधिकारी को चिट्ठी भेजी और पूरी जानकारी देने की मांग की. इस चिट्ठी के आधार पर अपीलीय अधिकारी ने संबंधित सूचना अधिकारी को पूरी जानकारी देने के लिए कहा. लेकिन इसके बावजूद भी राय को जानकारी नहीं दी गई. इसके बाद उन्होंने प्रदेश के राज्य सूचना आयोग में अपील कर दी. आयोग ने 21 फरवरी 2013 को अपने आदेश में संबंधित सूचना अधिकारी को सूचना नहीं देने का दोषी मानते हुए उस पर नियमानुसार 250 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाया और साथ ही उसे आदेश दिया कि वह तत्काल राय को पूरी जानकारी उपलब्ध कराए. लेकिन आयोग के आदेश के बाद भी मामला ढाक के तीन पात ही रहा. इसके बाद राय ने राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री से लेकर बिहार के राज्यपाल और मुख्यमंत्री तक को चिट्ठी लिखकर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी. लेकिन इस सबके बाद भी उन्हें जरूरी जानकारी नहीं मिल सकी. इस सब से व्यथित होकर राम प्रवेश राय ने इसी साल दो जून को आत्मदाह करने की चेतावनी दे डाली. हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों के आश्वासन के बाद उन्होंने आत्मदाह नहीं किया, लेकिन अब भी वह सूचना राय की पहुंच से दूर ही है.

सूचना नहीं मिलने की सूरत में आत्मदाह करने की नौबत तक पहुंच जाने का यह मामला बताता है कि इस अधिकार की अवधारणा पर किस हद तक खतरा बढ़ चुका है. 2011 में ही इसी तरह का एक मामला गुजरात में भी सामने आया था. तब कच्छ जिले के रापड़ इलाके में स्थित एक सरकारी कार्यालय के सामने एक व्यक्ति ने इसलिए खुद को आग के हवाले कर दिया था क्योंकि लंबा वक्त बीत जाने के बावजूद उसे आरटीआई के तहत मांगी गई एक बेहद जरूरी सूचना नहीं दी जा रही थी. बुरी तरह झुलस चुके उस व्यक्ति की तब मौके पर ही मौत हो गई थी. इस मामले में एक हैरान करने वाली बात यह भी है कि आत्मदाह करने से पहले वह व्यक्ति उसी दफ्तर के सामने अनशन पर बैठा हुआ था, लेकिन प्रशासन ने तब उसके अनशन को लेकर कोई संजीदगी नहीं दिखाई.

आरटीआई के तहत आम आदमी को मिले सूचना हासिल करने के जायज अधिकार के हनन वाले इन सभी मामलों को देखते हुए एक अहम सवाल उठता है. सूचना का अधिकार लागू होने के इतने सालों के बाद भी सूचना हासिल करना इतना मुश्किल क्यों है? आखिर जिम्मेदार अधिकारी सूचना मांगे जाने पर वह सूचना क्यों नहीं देना चाहते जिसे हासिल करना आवेदक का हक है?

सूचना अधिकार को लेकर लंबी लड़ाई लड़ चुके अधिकांश आंदोलनकारी और कार्यकर्ता इसे प्रशासनिक भ्रष्टाचार से लेकर राजनेताओं तथा नौकरशाहों के बीच सांठ-गांठ तक उन तमाम कारणों से जोड़ते हैं जो वर्तमान व्यवस्था को इस कदर पंगु बनाने के लिए जिम्मेदार रहे हैं.

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जाने-माने सूचना अधिकार कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल के मुताबिक सरकार तथा उसे चलाने वाले अधिकारियों की मिलीभगत इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है. उनके मुताबिक सूचना देने के लिए जिम्मेदार अधिकारी आवेदक से इतनी मशक्कत इसलिए करवाते हैं ताकि वह थक हारकर बैठ जाए और प्रशासन में व्याप्त अनियमितताएं सामने न आ सकें. वे कहते हैं, ‘जब भी किसी गंभीर गड़बड़ी की आशंका वाले मामले को लेकर सूचना मांगी जाती है तो आवेदक को या तो कागजों का भारी-भरकम पुलिंदा पकड़ा दिया जाता है या फिर उसके आवेदन को कई-कई विभागों को भेज दिया जाता है. इसके बाद उन सभी विभागों से आवेदक को अलग-अलग भाषा विन्यास वाले ऐसे–ऐसे जवाब मिलते हैं जिनको समझने में ही आवेदक चकरा जाता है और सूचना पाने का उसका उद्देश्य बुरी तरह प्रभावित हो जाता है.’ अग्रवाल की मानें तो यह सीधे-सीधे सूचना अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6 (3) का खुला दुरुपयोग है. वे कहते हैं, ‘कई बार आवेदक को मालूम नहीं होता कि उसे सूचना किस विभाग से मिलेगी. इस बात को समझते हुए आरटीआई एक्ट 2005 की धारा 6 (3) में प्रावधान बनाया गया कि यदि किसी लोक सूचना अधिकारी को लगता है कि मांगी गई सूचना किसी दूसरे विभाग से संबंधित है तो उसका दायित्व है कि वह उस आवेदन को संबंधित विभाग को भेज दे.’ देखा जाए तो यह प्रावधान जनता की सहूलियत के लिए बनाया गया है. लेकिन कई बार अधिकारी धारा 6 (3) का सहारा लेकर आवेदन को सिर्फ इसलिए अलग-अलग विभागों को भेज देते हैं ताकि सूचना छिपाई जा सके. इस तरह अधिकारी सूचना नहीं देने के जुर्म से भी बच जाते हैं और आवेदक को सही सूचना भी नहीं मिल पाती.

अपने खुद के अनुभवों का जिक्र करते हुए अग्रवाल कहते हैं, ‘कुछ समय पहले मेरे एक आवेदन को सीपीडब्ल्यूडी ने अपने 200 कार्यालयों को अंतरित (भेज) कर दिया था. इन विभागों की तरफ से बेतरतीब संख्या में मुझे मिलनेवाली चिट्ठियों का सिलसिला अभी तक बरकरार है. इसके अलावा कई केंद्रीय विभागों के साथ मेरे इस तरह के बहुत से अनुभव रहे हैं जब मेरे आवेदनों को सैकड़ों विभागों को अंतरित कर दिया गया. इसके चलते उन विभागों से आनेवाले जवाबी पत्रों की संख्या ही कई बार 1000 के भी पार हो जाती है. कल्पना की जा सकती है कि हजार चिट्ठियों को लिखने और भेजने में कितना समय और सरकारी धन बेवजह बर्बाद होता होगा.’

अग्रवाल की इन बातों से एक ऐसा महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है जो सूचना देने में देर लगानेवाले एक बड़े तर्क को कटघरे में खड़ा करता नजर आता है. दरअसल कई बार ऐसा भी देखा गया है कि कई विभाग कर्मचारियों की कमी का बहाना बनाकर ‘सूचना एकत्रित की जा रही है’ जैसे जवाबों के सहारे अनावश्यक रूप से जवाब देने में देरी करते हैं. लेकिन सवाल यह है कि जब अग्रवाल के एक आवेदन के जवाब में अनावश्यक रूप से ताबड़तोड़ चिट्ठियां भेजने के लिए विभागों के पास कर्मचारियों की इतनी अधिक भरमार है तो फिर जरूरी सवालों का जवाब देने के लिए उनके पास कर्मचारियों का टोटा कैसे हो जाता है. इस सवाल का जवाब देते हुए खुद अग्रवाल कहते हैं, ‘यह मामला कर्मचारियों की कमी का नहीं बल्कि इच्छाशक्ति की कमी का है.’

लेकिन आरटीआई के तहत लगाये जानेवाले आवेदनों के ऐसे हश्र के लिए क्या सिर्फ यही कारण जिम्मेदार है? पूर्व सूचना आयुक्त शैलेश गांधी इस बात से इंकार करते हैं. उनके मुताबिक अनियमितताओं को छुपाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाए जाने के अलावा और भी बहुत से कारण हैं जिनके चलते लोगों को सूचना के लिए इतनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है. गांधी के मुताबिक सरकारी विभागों में सूचना देने के लिए अधिकृत किए गए अधिकारियों का इस काम में पारंगत न होना भी इसका एक बड़ा कारण है. वे कहते हैं, ‘तमाम सरकारी विभागों में सूचना अधिकारी के रूप में नियुक्त किए गए अधिकतर कर्मचारियों की आरटीआई एक्ट को लेकर जानकारी बेहद कम है. ये कर्मचारी कई बार इतना तक नहीं जानते कि किसी फाइल का कौन-सा पन्ना सूचना है और कौन-सा नहीं. यह भी एक बड़ी वजह है कि अपने सर की बला टालने के लिए वे आवेदक को पूरी की पूरी फाइल ही पकड़ा देते हैं.’

अधिकार पर वार

1. एक साल के दौरान तहलका ने केंद्र और राज्यों के कई अहम विभागों में 50 से ज्यादा आरटीआई आवेदन लगाए
2. छह मामलों के अलावा किसी में भी पहली बार में सूचना नहीं मिल सकी
3. एक आवेदन तो इसलिए अमान्य हो गया कि इसमें क्यों, कैसे और कितने जैसे प्रश्नावाचक शब्दों का प्रयोग किया गया था
4. एक ही तरह के सवालों को लेकर अलग-अलग राज्यों के सरकारी विभागों का अलग-अलग रवैय्या और जवाब देखने को मिला

गांधी की यह बात देहरादून के आरटीओ कार्यालय की एक करामात से समझी जा सकती है. कुछ साल पहले इस कार्यालय के लोक सूचना अधिकारी ने एक आवेदक को चार बिंदुओं की सूचना के जवाब में 20 हजार रुपये की मोटी फीस लेकर 10 हजार पेज का भारी-भरकम पुलिंदा थमा दिया था. ताज्जुब की बात यह थी कि आटो में भरकर घर तक लाए गए कागजों के इस ढेर को खंगालने पर आवेदक को केवल 40 पन्नों में ही वह सब सूचना मिल गई जो उसे चाहिए थी. इस तरह जो सूचना उसे सिर्फ 80 रुपये में मिलनी चाहिए थी उसके लिए उसे 10 हजार रुपये चुकाने पड़े.

अनावश्यक रूप से कागजों के गट्ठर पकड़ाकर सूचना के नाम पर खानापूर्ति करने का यह सिर्फ एक उदाहरण है. आरटीआई कानून और आम आदमी के साथ किए जानेवाले मजाक के देश-भर में इतने मामले हैं कि उनको लेकर एक पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है. पिछले साल आरटीआई एक्ट के आठ साल पूरे होने पर नई दिल्ली में हुए एक सम्मेलन में भी इस तरह की बातें सामने आईं थी. केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा आयोजित किए गए उस सम्मेलन में बहुत से राज्यों के सूचना आयुक्तों ने इस बात को स्वीकार किया था कि उनके पास ऐसे बहुत से मामले आते हैं जिनमें कई सूचना अधिकारी इस बात को स्वीकार करते हुए कम से कम जुर्माना लगाने की मांग करते हैं कि उन्हें एक्ट के नियमों की पूरी जानकारी नहीं थी. गांधी कहते हैं, ‘सरकारों को चाहिए कि वे सूचना देने के लिए अधिकृत किए गए अपने अधिकारियों को प्रशिक्षण दें ताकि आम जनता को सटीक और समयबद्ध सूचना मिल सके, लेकिन संकट यह है कि सरकारें ऐसा करना ही नहीं चाहतीं क्योंकि ऐसा होने पर उन्हें खुद के काले कारनामों के उजागर रहने का डर रहता है.’

आरटीआई को लेकर काम करनेवाले कार्यकर्ता चंद्रशेखर करगेती कहते हैं, ‘आरटीआई के तहत मांगी जानेवाली सूचनाओं को लेकर सरकारों का यह डर इसलिए इतना गहरा है क्योंकि इस अधिकार के जरिए भ्रष्टाचार के बहुत से ऐसे मामले हाल के समय में सामने आए हैं जिनमें मंत्रियों और अफसरों की मिलीभगत खुले तौर पर उजागर हुई है. यह भी एक बड़ी वजह है कि ऊंचे पद पर बैठे ब्यूरोक्रेट्स के खिलाफ जाने वाली सूचनाओं को आरटीआई के जवाब के रूप में देने से कई कर्मचारी कतराते हैं.’ जानकारों की मानें तो सूचना छिपाने के लिए अलग-अलग हथकंडों का प्रयोग करते हुए कई सरकारें अपने अधिकारियों को गुप्तरूप से ऐसे पैंतरे भी बताती हैं जिनसे या तो सूचना को सामने ही नहीं आने दिया जाता या फिर अनावश्यक विलंब लगा दिया जाता है. उत्तराखंड सचिवालय में कार्यरत एक अनुभाग अधिकारी बताते हैं,  ‘हर मामले में तो नहीं लेकिन कुछ मामलों में आरटीआई आवेदनों को लेकर उच्च अधिकारियों का लोक सूचना अधिकारियों को निर्देशित करना कोई बड़ी बात नहीं है.’ करगेती कहते हैं, ‘आवेदनों को तमाम विभागों को अंतरित कर देने या फिर बहुत अधिक पन्नों में बता कर आवेदक को हतोत्साहित करनेवाले ये तरीके भी इन्हीं गुप्त ट्रेनिंगों का परिलक्षण हैं.’

‘अधिकतर कर्मचारियों की आरटीआई एक्ट को लेकर जानकारी बेहद कम है. वे कई बार इतना तक नहीं जानते कि किसी फाइल का कौन सा पन्ना सूचना है और कौन सा नहीं’

RTIसूचना की राह में बाधा के रूप में कुख्यात हो चुके इन तरीकों के अलावा और भी बहुत से तरीके हाल के समय में देखे गए हैं जिनके जरिए अधिकारी या तो सूचना देने से ही पल्ला झाड़ लेते हैं या फिर विलंब करके उसके औचित्य को कम करने का प्रयास करते हैं. सूचना के आवेदनों पर तरह-तरह के जवाब देना भी इन्हीं तरीकों में शामिल है. कई बार यह भी होता है कि सूचना होने के बावजूद अधिकारी ‘सूचना उपलब्ध नहीं है’ या फिर ‘सूचना अन्य विभाग से संबंधित प्रतीत होती है’ जैसे ऊल-जुलूल जवाब तक दे देते हैं.’ ऊल-जुलूल जवाबों वाले ऐसे मामलों की फेहरिस्त भी बहुत लंबी है. पिछले साल केंद्रीय चुनाव आयोग ने चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन पर उसके द्वारा की गई कार्रवाई का ब्यौरा मांगे जाने पर इसी तरह का हैरान करनेवाला जवाब दिया था. तहलका के आवेदन पर आयोग ने अपने जवाब में लिखा कि, ‘इस तरह की कार्रवाईयों को एक साथ संकलित किया जाना संभव नहीं है, क्योंकि इससे अनानुपातिक विचलन हो सकता है.’ इसी तरह उत्तराखंड के उड्ययन विभाग से जब आरटीआई के तहत राज्य के मुख्यमंत्री तथा अन्य मंत्रियों द्वारा प्रदेश-भर में की गई हवाई यात्राओं का व्यौरा मांगा गया तो विभाग ने वह आवेदन सभी जिलों के जिलाधिकारियों को यह लिख कर अंतरित कर दिया कि, ‘यह सूचना आपके निकटतम प्रतीत होती है.’

एक दशक के इस सफर के दौरान सूचना की राह में अवरोधक के रूप में सबसे बड़ा रोड़ा विभागों के सूचना अधिकारियों तथा अपीलीय अधिकारियों को माना जाता है. लेकिन कई बार सूचना आयोगों पर भी अपील में आनेवाले मामलों पर टरकाऊ रवैय्या बरतने के आरोप लगे हैं. उत्तराखंड में इस तरह का एक मामला बेहद चर्चित भी रहा. नवंबर 2012 में आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर करगेती ने प्रदेश के राजस्व सचिव से प्रदेश की उस सिंचित भूमि की जानकारी मांगी जिसका इस्तेमाल लेंड यूज चेंज करके आवासीय उपयोग के लिए किया गया था. 2001 से 2012 तक के इस ब्यौरे में करगेती ने उन लोगों, संस्थाओं, न्यासों तथा कंपनियों की जानकारी भी मांगी जिन्हें सरकार नें यह भूमि पट्टे अथवा लीज पर दी थी. लेकिन राजस्व विभाग ने उनके आवेदन पर कोई सूचना नहीं दी. इसके बाद अपीलीय अधिकारी के कार्यालय में मामला पहुंचा तो उन्होंने इस आवेदन को राजस्व परिषद के साथ ही प्रदेश के सभी जिला अधिकारियों को अंतरित कर दिया. करगेती कहते हैं कि रायता फैलाने की शुरुआत यहीं से हुई. ‘राजस्व परिषद तथा जिलाधिकारियों के कार्यालयों से जो सूचना मुझे मिली, उसमें अधिकतर की जानकारी छुपा ली गई थी.’ वे कहते हैं, ‘वर्तमान गृहमंत्री राजनाथ सिंह, वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक तथा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट बाड्रा समेत कई राजनीतिक शख्सियतों को उत्तराखंड सरकार ने इस दौरान जमीनंे आवंटित की थीं जिसकी जानकारी मुझे अपने स्तर से मालूम हुई थी.’ इसके बाद करगेती ने राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया जहां उनका मामला राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त एनएस नपल्च्याल के अधीन था. लेकिन इसके बाद भी उन्हें जमीनों के आवंटन संबंधी पूरी सूचना नहीं मिल सकी. करगेती का आरोप है कि उन्हें सूचना न दिए जाने की असली वजह प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त से ही जुड़ी थी. दरअसल मुख्य सूचना आयुक्त नपल्च्याल इससे पहले राज्य के मुख्य सचिव तथा राजस्व सचिव भी रह चुके थे. करगेती का कहना है कि जिन बड़े नामों को प्रदेश सरकार ने जमीनंे आवंटित की थीं उन जमीनों की अनुमति संबंधी अधिकांश आदेश नपल्च्याल के कार्यकाल के दौरान ही दिए गए. यही वजह थी कि उन्होंने इस मामले में लंबे समय तक तारीखें बढ़वाईं और चंद सूचनाएं दिलाने के साथ ही मई 2013 में यह अपील निस्तारित कर दी.

कई बार यह भी होता है कि सूचना होने के बावजूद अधिकारी ‘सूचना उपलब्ध नहीं है’ या फिर ‘सूचना अन्य विभाग से संबंधित प्रतीत होती है’ जैसे ऊल-जुलूल जवाब तक दे देते हैं’

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सूचना का अधिकार पूरी तरह से अपने लक्ष्य से भटक चुका है. 2005 में लागू होने से अब तक के दशक भर लंबे इस सफर में इस अधिनियम ने बेशक कई मील के पत्थर भी गाड़े हैं. ग्राम पंचायत स्तर से लेकर केंद्रीय स्तर तक भ्रष्टाचार के कई मामलों को उजागर करने और दोषियों को दंडित करने में इस अधिनियम ने बेहद अहम भूमिका भी अदा की है. इन दिनों मध्यप्रदेश की राजनीति में उफान लाने वाले व्यापम घोटाले को उजागर करने में भी आरटीआई एक्ट की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जा रही है. लेकिन इस सबके बावजूद यह भी उतना ही कड़वा सच है कि आबादी के बड़े हिस्से को यह अधिनियम अभी भी उतना सुकून नहीं दे सका है जिसकी उम्मीद इसको बनाए जाने के वक्त की गई थी.

कुछ समय पहले एक नामी संस्था ने पांच राज्यों में आरटीआई को लेकर एक सर्वेक्षण किया था. इस सर्वेक्षण के जरिए आरटीआई एक्ट से निकले परिणामों को लेकर आम लोगों की राय जानी गई थी. सर्वे के परिणाम के मुताबिक केवल 25 फीसदी लोग ही आरटीआई से मिलनेवाली सूचनाओं को लेकर संतुष्ट थे. इसके अलावा 25 फीसदी लोगों ने इसके परिणामों को ठीक ठाक बताया. जबकि 50 फीसदी लोगों ने साफ तौर पर इस तरफ इशारा किया कि आरटीआई से मिलनेवाली सूचनाओं के लिए उन्हें बेहद मशक्कत करनी पड़ती है. शैलेश गांधी कहते हैं, ‘यह सर्वे यह भी बताता है कि बहुत से लोग आरटीआई से खुश हैं, लेकिन उससे अधिक यह इस बात की तरफ इशारा करता है कि आम लोगों को आसानी के सूचना दिलाने का दावा करनेवाले इस अधिकार की बेहतरी के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.’ जाहिर तौर पर ‘बहुत कुछ’ से शैलेश गांधी का इशारा उन सुझावों की तरफ है, जो इस अधिनियम के असली उदेश्य को पूरा करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

तो सवाल उठता है कि ऐसे कौन से उपाय किए जा सकते हैं कि बिना किसी अड़चन के आवेदक को समयबद्ध और सटीक सूचना मिल जाए.

बहुत से लोगों के मुताबिक सूचना आयोग की ताकत को बढ़ाकर उसे और अधिक मजबूत किए जाने की जरूरत है. एक बड़े वर्ग का मानना है कि आयोग के पास ताकत होनी चाहिए कि वह देर से सूचना देनेवाले अधिकारियों पर जुर्माना लगाने के अलावा उन्हें आपराधिक दण्ड भी दे सके, क्योंकि कई बार बड़ी गड़बड़ियों को छुपाने के लिए कर्मचारी जान बूझकर जुर्माना भरने के आसान रास्ते को चुन लेते हैं, और आयोग एक सीमा के बाद उन पर जुर्माना भी नहीं लगा सकता. ऐसे में आवेदक को न्यायालय की शरण में जाना पड़ता है जहां न्याय मिलने में लंबा वक्त लग जाता है. लेकिन शैलेश गांधी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते. वे कहते हैं कि जो शक्तियां और अधिकार आयोग को वर्तमान में प्राप्त हैं अगर आयुक्त उन्हीं को ठीक से अमल में लाने लगें तो बहुत कुछ ठीक किया जा सकता है. लेकिन संकट यह है कि अधिकतर सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राजनीतिक स्तर से की जाती है जिसके चलते वे भी बहुत बार खुल कर काम नहीं कर पाते.

आदर्श स्थिति में सूचना हासिल करने के लिए आरटीआई की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए. सरकारी विभाग आवश्यक सूचनाएं खुद ही सार्वजनिक कर दें तो ऐसा हो सकता है

सुभाष अग्रवाल की मानें तो आदर्श स्थिति यही है कि सूचना चाहने के लिए आरटीआई एक्ट की जरूरत न पड़े. वे कहते हैं, ‘अगर सभी सरकारी विभाग आवश्यक सूचनाओं को खुद ही सार्वजनिक कर दें तो लोगों को विभागों में आरटीआई आवेदन ही नहीं लगाना पड़ेगा. सूचना क्रांति के इस दौर में सभी विभाग अपनी वेबसाइटों पर इन जानकारियों को डाल सकते हैं, लेकिन सवाल वही है कि क्या इन विभागों के कर्ताधर्ता कभी ऐसा चाहेंगे कि उनके कारनामों और जनता की नजरों के बीच सिर्फ एक क्लिक  की दूरी रह जाए.’

पिछले साल केंद्रीय सूचना आयोग ने देश के छह राजनीतिक दलों को आरटीआई के अधीन बतानेवाला एक फैसला दिया था. आम तौर पर सभी मामलों में एक-दूसरे के बिल्कुल उलट राय रखनेवाले इन दलों में से सिर्फ दो पार्टियों को छोड़कर बाकी सब पार्टियों ने तब एक विचार पर गजब की एकता का प्रदर्शन किया था. वह एक विचार यह था कि केंद्रीय सूचना आयोग के इस फैसले का विरोध करते हुए आरटीआई के प्रावधानों के साथ कुछ ऐसा किया जाए कि राजनीतिक दल हमेशा के लिए इसके शिकंजे से बाहर आ जाएं. नियमों के मुताबिक संसद चाहे तो ऐसा कर सकती है. और संसद के ताजा सूरते हाल की बात करें तो सांसदों की संख्या के मामले में इन चार दलों में से एक दल (भाजपा) लोकसभा तथा दूसरा दल (कांग्रेस) राज्यसभा में पहले नंबर पर है.

बहरहाल कई लोगों की मानें तो आने वाले वक्त में सूचना मिलने का यह बदरंग सूरते हाल सिर्फ दो ही स्थितियों में ही संवर सकता है. या तो राजनीतिक मंशा का हृदयपरिवर्तन या फिर जनता का आंदोलन.

5 COMMENTS

  1. अच्छा लेख. धन्यवाद। प्रदीप जी वास्तविकता यह की कानून बनने के बाद सूचना मांगने वालो की हत्याएं हुई उनकी सुरछा के लिए कोई व्यवस्था नहीं, दूसरा सूचनाये अधिकतर सिस्टम के भ्रस्टाचार से सम्बंधित होती जिसे देने में विभाग सहयोग नहीं करते तीसरा भ्रस्टाचार से जुडी सूचनाये मीडिया में आसानी से छपती नहीं है, स्थानीय मीडिया को पता भी होता है किन्तु अज्ञात कारणों से उसके वक्त पर छापा नहीं जाता उदहारण के लिए के लिए बता दू तहलका में राहुल कोटियाल जी ने “चिन्ह पर प्रश्न चिन्ह” नाम से एक विस्तृत खबर छापी थी जो मुख्यतः जनसूचना अधिनियम के द्वारा ही प्रकाश में आयी थी. हमने शुरू से ही अनियमिततवो के बारे में मीडिया को बताना शुरू किया किन्तु सब जानते हुए काफी दिनों तक चुप रहे. यहाँ तक की रूपये के प्रतीक चिन्ह के प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी किसी विद्वान पत्रकार ने (नाम अब तक अज्ञात) यह बात उठाई किन्तु रहस्यमई तरीके से यह बात दबा दी गयी थी. हालाँकि तहलका के संज्ञान में आने पर छापी गयी. यदि लोकमहत्व के विषय मीडिया में वक्त पर आ जाये तो अदालत की दहलीज पर माथा क्यों पटका जाता अंत में कोर्ट ने जो आदेश किया आज भी जिंतनी प्रतीक चिन्ह प्रतियोगिताएँ हो रही है उनका पालन नहीं किया जा रहा है, कब तक आप लड़ेंगे? इन्ही सब वजहों से नागरिक का विश्वास हौसला टूट जाता है बरबस उसे “होहिहै वही जो राम रचि रखा” मानकर संतोष करना पड़ता है. दरअसल इन दिनों आवेदको में डर मिश्रित निराशा घर कर गयी है. अच्छा होता लोकमहत्व के विषयो को उठाने वालो को सम्मानित पुरस्कृत किया जाये मीडिया में “जनसूचना” की खबरों विशेष पत्रकार और सेल नियुक्त किये जाये। तभी यह अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकेगा अन्यथा ” समय, ऊर्जा और धन की बर्बादी का” आधार बता कर इस अधिनियम को दफ़न कर दिया जायेगा, और आवेदक “बरबस सती” होता रहेगा। “सती प्रथा” की तरह ही “सूचना प्रथा” कहा जाने लगेगा यह फिर हो जायेगा प्रतिबन्ध, और अर्जुन की तरह नागरिको को मिला यह गाण्डीव निस्तेज हो जायेगा। आपने/तहलका ने इस मुद्दे पर तथ्यपरक लेख लिखा पुनः हार्दिक धन्यवाद।

  2. Unique Identification Authority of India (आधार कार्ड) की वेबसाइट ने एक बहुत अच्छा सरहनीय कार्य किया है, यह की जनसूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत जितने भी आवेदको ने उनसे सूचना मांगी उन सभी आवेदको के आवेदन पत्र और उस पर दी गयी सूचना का पी० डी० एफ० बनाकर अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित/अपलोड कर दिया है. मै उसका लिंक भी आपसे साझा कर रहा हूँ कृपया देखे और और ऐसी ही व्यवस्था हेतु समस्त सरकारी संस्थानों को लिखे सोशल मीडिया पर अभियान चलाये। इस व्यवस्था से कोई भी आवेदक “सुचना की पुनरावृति” नहीं करेगा और आवेदक का पैसा /संस्थान की ऊर्जा और समय बचेगी साथ ही पारदर्शिता की आँधी भी चल पड़ेगी । धन्यवाद।
    http://uidai.gov.in/rti/rti-requests.html?view=details

  3. बेहतरीन आलेख भाई, पहले प्रिंट संस्करण में भी पढ़ चुका था, आज ई संस्करण फिर से पढ़ा, अब तक काफी और कड़वे अनुभव हो चुके हैं, इस पर कम करते हुए…..

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