पटना आर्ट कॉलेज में अराजकता | Tehelka Hindi

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पटना आर्ट कॉलेज में अराजकता

देश भर के शिक्षण संस्थानों में फैली अराजकता से बिहार अछूता कैसे रह सकता था? एक तरफ टॉपर्स घोटाले की वजह से एक नाबालिग तक को जेल भेज दिया गया है तो दूसरी तरफ पटना आर्ट काॅलेज में छात्र दो महीने से काॅलेज प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. बदले में छात्रों को पुलिस की लाठियां मिलीं और कई छात्र जेल गए. फिलहाल आर्ट कॉलेज में जारी इस विवाद के खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं.

निरालाकृष्णकांत 2016-07-15 , Issue 13 Volume 8

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टाॅपर की फैक्ट्री सरीखा काॅलेज चलाने वाले बच्चा राय जेल में हैं. बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के पूर्व प्रमुख लालकेश्वर प्रसाद भी जेल में हैं. उनकी पत्नी पूर्व विधायक उषा सिन्हा भी जेल में हैं. इन सबके साथ अटपटे तरीके से बिहार में इंटर की टाॅपर रही रूबी राय भी जेल भेज दी गई हैं. रूबी राय क्यों जेल गईं यह अधिकांश बिहारवासियों को अब तक समझ नहीं आया. बिहार के शिक्षा जगत की तमाम बातें आजकल लोगों को समझ में नहीं आ रहीं. लोगों को यह बात भी समझ नहीं आ रही कि पिछले कुछ सालों में 200 से अधिक ऐसे काॅलेजों को मान्यता कैसे मिल गई जो कहीं किसी एक कमरे में चल रहे हैं या चल भी नहीं रहे. शिक्षा को लेकर उठ रहे तमाम सवालों के बीच नीतीश सरकार यह भी दिखाना चाह रही है कि वह सख्त है और शिक्षा में सुधार करके रहेगी. इस सबके बीच पिछले दो महीने से पटना आर्ट कॉलेज में चल रहे एक आंदोलन को लेकर सन्नाटा है. न तो बिहार सरकार ने इस मामले में अब तक कोई हस्तक्षेप किया है, न ही मीडिया ने इस आंदोलन को प्रमुखता दी.

पटना आर्ट कॉलेज में छात्रों की कथित प्रताड़ना, उन पर जातिसूचक टिप्पणियां करने और उन्हें पुलिस से लेकर गुंडों से पिटवाने तक के आरोप झेल रहे प्रिंसिपल चंद्रभूषण श्रीवास्तव फिलहाल छुट्टी पर हैं. कुछ छात्र जेल से बाहर आ गए हैं, कुछ अब भी जेल में हैं. छात्र अपनी मांगें माने जाने तक आंदोलन जारी रखने की जिद पर अड़े हैं. बिहार के सियासी गलियारे और मीडिया में इस मसले पर चुप्पी है. राष्ट्रीय मीडिया में यह आंदोलन जगह नहीं पा सका. बिहार में फिलहाल टॉपर घोटाले पर तो खूब शोर-शराबा है, लेकिन पटना आर्ट कॉलेज के आंदोलन पर आश्चर्यजनक चुप्पी है. छात्रों की कहीं सुनवाई न होने पर हाल ही में एक छात्र नीतीश पासवान ने आत्महत्या करने की कोशिश की पर किस्मत से उसे बचा लिया गया.

आत्महत्या की कोशिश करने वाले नीतीश पासवान ने बताया, ‘हमारी मुख्य मांग थी कि प्रिंसिपल को हटाया जाए. चंद्रभूषण श्रीवास्तव प्रभारी प्रिंसिपल हैं. उनके पास योग्यता भी नहीं है. वे फाइन आर्ट्स के छात्र भी नहीं रहे हैं. हम लोग इस नियुक्ति को स्वीकार नहीं करेंगे. उनकी डिग्री एमए इन पेंटिंग है. उनको कला की कोई जानकारी नहीं है. जो कला पर बोल भी नहीं सकते उनको प्राचार्य बना दिया गया है. उनको अंग्रेजी नहीं आती, न ही ठीक से हिंदी आती है. पटना यूनिवर्सिटी से जो पत्र वगैरह आते हैं अंग्रेजी में आते हैं. यूनिवर्सिटी से आया पत्र न पढ़ पाने के कारण हमारे छह साथियों का दो साल बैक लगा क्योंकि उनका फॉर्म ही नहीं भरवाया. यूनिवर्सिटी ने रूल भेजा था, लेकिन छात्रों को नहीं बताया गया. बाद में छात्रों पर ही इल्जाम लगा दिया कि हमने नोटिस निकाला था, छात्रों ने फॉर्म ही नहीं भरा. उन छह छात्रों का दो साल का नुकसान हुआ, लेकिन इन्होंने कुछ किया ही नहीं.’

पटना आर्ट कॉलेज का गौरवशाली इतिहास रहा है. यहीं के छात्रों ने 500 रुपये के नोट का डिजाइन तैयार किया था, जो आज देश भर में चल रहा है

कुछ इसी तरह के आरोप लगाते हुए गौरव कहते हैं, ‘हमारी बस दो ही मांगें थीं. प्रिंसिपल साहब को हटाया जाए और छात्रों का निलंबन वापस लिया जाए. प्रिंसिपल साहब को हटाने की मांग इसलिए नहीं की गई कि उन्होंने उस दिन कार्रवाई की. उनके किस्से काॅलेज में हर कोई बता देगा. अव्वल तो वे आर्ट काॅलेज के प्रिंसिपल बनने की योग्यता नहीं रखते. क्लास लेने आते हैं तो सिगरेट पीते हुए पढ़ाते हैं.’

बिहार और झारखंड के इस इकलौते कला महाविद्यालय की स्थापना 1939 में हुई थी. भारत के पहले राष्ट्रपति डाॅ राजेंद्र प्रसाद कॉलेज की मैनेजमेंट कमेटी के पहले सदस्य थे. 1949 में इसे बिहार सरकार ने अपने नियंत्रण में लेकर कला और शिल्प का पांच वर्षीय कोर्स शुरू किया. 1977 से यह पटना विश्वविद्यालय के अधीन है.

गौरव बताते हैं, ‘यहां पिकासो से लेकर दुनिया के कई श्रेष्ठ और नामचीन कलाकारों के ओरिजिनल वर्क थे. अब अधिकांश गायब हैं. किसने गायब किया-करवाया, यह खुला रहस्य है. इसी काॅलेज के छात्र-छात्राओं ने 500 रुपये के नोट का डिजाइन तैयार किया था, जो आज देश भर में चल रहा है. इस संस्थान का गौरवशाली इतिहास रहा है लेकिन पिछले दो माह से यह संस्थान प्रशासनिक अराजकता का शिकार है.’

गौरव संक्षेप में बताते हैं, ‘हुआ यह था कि पटना आर्ट काॅलेज में निर्माण कार्य चल रहा था. निर्माण कार्य के लिए वे बच्चों के हाॅस्टल से बिजली लेते थे. एक-दो बार बिजली कनेक्शन लिया तो बच्चों को परेशानी हुई. फिर एक बार शाॅट सर्किट से एक बच्चे की पेंटिंग जल गई. 21 अप्रैल को जब एक बार फिर ठेकेदार के लोग बिजली लेने आए तो बच्चों ने अपने कमरे से बिजली का कनेक्शन देने से मना कर दिया. इस पर ठेकेदार के लोग बच्चों को पीटने लगे. जितेंद्र नारायण नाम के एक छात्र को जमकर पीटा गया. शिकायत काॅलेज के प्रिंसिपल चंद्रभूषण श्रीवास्तव तक पहुंची. प्रिंसिपल साहब के चैंबर में भी ठेकेदार के लोग घुसे, वहां भी उनके सामने ही उस छात्र को पीटा. इस घटना के बाद कई बच्चे समूह बनाकर प्रिंसिपल साहब के पास गए कि ऐसा क्यों हुआ? उनका जवाब था कि ऐसा कुछ नहीं हुआ. कोई पीटा नहीं गया. अगर ऐसा कुछ हुआ है तो लिखकर दो. लिखकर दिया गया, लेकिन उन्होंने कोई एक्शन नहीं लिया. जब प्रिंसिपल साहब ने कोई कदम नहीं उठाया तो 25 अप्रैल को हम लोगों ने आपस में मीटिंग की. मीटिंग करने का खामियाजा यह भुगतना पड़ा कि पटना के बुद्ध काॅलोनी थाने में हम छात्रों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया गया.’

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पटना आर्ट कॉलेज के प्रिंसिपल के खिलाफ रचनात्मक तरीके से विरोध-प्रदर्शन करते छात्र-छात्राएं

छात्रों के मुताबिक उन्होंने 29 अप्रैल को प्रिंसिपल, गर्वनर, शिक्षा मंत्री और कला मंत्री को लिखकर शिकायत की लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं मिला. इसके बाद दो जून से छात्रों ने पोस्टर प्रदर्शनी लगाकर अपना विरोध शुरू किया. गौरव बताते हैं, ‘हम कला के छात्र हैं, तो इसी तरह अपना विरोध दर्ज करा सकते थे. दो जून को हमारा विरोध शुरू हुआ, उसी दिन आठ छात्रों को काॅलेज से निलंबित कर दिया गया. नौ दिनों तक धरना चला, दसवें दिन से अनशन शुरू हुआ. इस बीच हम लोगों पर एफआईआर दर्ज करवा दी गई.’

गौरव बताते हैं, ‘यह सब होता रहा और इस बीच परीक्षा को लेकर प्रिंसिपल साहब ने नया विवाद खड़ा कर दिया. उन्होंने बिना किसी नोटिस के परीक्षा फाॅर्म भरवाना शुरू कर दिया. कोई 200 छात्र-छात्राओं में से मात्र 20 बच्चे यह जान सके कि फाॅर्म भरा जा रहा है. उन्होंने फार्म भरा. फिर एक रोज अचानक परीक्षा की तारीख नोटिस बोर्ड पर चिपका दी कि कल से परीक्षा होगी. अचानक नोटिस बोर्ड पर यह सूचना देख सभी छात्र हैरत में पड़ गए कि कल से परीक्षा कैसे दे सकते हैं. अधिकांश ने तो फाॅर्म भी नहीं भरा था और कोर्स भी पूरा नहीं हुआ था. विरोध हुआ तो कहा गया कि फिर से फार्म भरा जाएगा. 15 जून से परीक्षा होगी लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ. चार जून से ही परीक्षा शुरू हो गई. चार जून को हम लोगों ने परीक्षा का विरोध किया. करीब 20 लड़के परीक्षा देने को तैयार हुए, 180 विरोध में रहे. फिर छह जून को परीक्षा हुई. हम लोगों ने फिर विरोध किया. विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर (वीसी) से संपर्क करने की कोशिश करते रहे. कोई फायदा नहीं हुआ. परीक्षा शुरू हुई तो हम लोग विरोध करने पहुंचे. तभी छात्र समागम के कुछ लोग वहां पहुंचे और विरोध कर रहे छात्रों के साथ मारपीट की. छात्राओं के साथ बदतमीजी की. नीतीश पासवान को टारगेट किया और कहा कि प्रिंसिपल पर केस करता है, इसको मारो. पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में विरोध कर रहे छात्रों को पीटा गया.’

इसकी तस्दीक करते हुए नीतीश प्रभारी प्रिंसिपल पर कई गंभीर आरोप लगाते हैं. वे कहते हैं, ‘उन्होंने मुझे बार-बार जातिसूचक टिप्पणी करके अपमानित किया. वे लड़कियों को भद्दी बातें कह देते हैं. कैंपस में खुलेआम सिगरेट पीते हैं जबकि कैंपस के आसपास सिगरेट या नशे की चीजें बेचना भी मना है. कैंपस से हरे पेड़ कटवा कर बेच दिए. बुद्ध पार्क को तुड़वा दिया. छात्रों के लिए जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करके उन्हें अपमानित किया. हम लंबे समय से उनकी प्रताड़ना झेल रहे हैं. हर जगह शिकायत की लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है. उन्होंने मेरे घर फोन करके कहा कि अपने बेटे को ले जाइए, यहां नेतागिरी करता है, हीरो बनता है. मुझे कहा कि आरक्षण से आकर यहां हीरो बनते हो. तुम चमार-दुसाध की क्या औकात है, हमको पता है. अब अगर वे ऐसा बोलते हंै तो क्या मैं शिकायत नहीं करता? हमने अनुसूचित जाति आयोग में शिकायत की, शिक्षा मंत्री से शिकायत की, विश्वविद्यालय के वीसी से भी शिकायत की, लेकिन कोई सुनने वाला ही नहीं है.’

परीक्षा के विरोध में प्रदर्शन के दिन का हाल बताते हुए गौरव कहते हैं, ‘उस दिन नीतीश पासवान को ज्यादा निशाने पर लिया गया. वजह थी कि नीतीश ने पिछले साल ही प्रिंसिपल साहब पर केस किया था. प्रिंसिपल साहब उस पर बार-बार जातीय टिप्पणी करते थे. नीतीश ने इसे लेकर केस किया था लेकिन उस केस पर कोई सुनवाई या कार्रवाई नहीं हुई. उस दिन नीतीश पासवान इतना आहत हुआ कि वह अपने कमरे में खुदकुशी करने चला गया. शुक्र है कि किसी ने उसे देख लिया गया और वह बचा लिया गया. उस दिन छात्रों पर हमला हुआ तो कई छात्र घायल होकर अस्पताल पहुंचे. छात्रों के इलाज के बीच उन पर उल्टा केस दर्ज करा दिया गया. हम लोगों ने वीसी साहब से बात करने की कोशिश की. उनके घर गए लेकिन वहां पर गार्डों ने फायरिंग की. इस फायरिंग में एक लड़की के सिर के बगल से गोली निकल गई जिससे वह दहशत में आकर बेहोश हो गई.’ अभिषेक, विशाल और नीतीश भी इन आरोपों की पुष्टि करते हैं.

विशाल कहते हैं, ‘बात इतनी ही नहीं है. पहली बार पटना आर्ट काॅलेज के इतिहास में ऐसा हो रहा है कि किसी भी सत्र की परीक्षा लेने के पहले एकेडमिक काउंसिल की बैठक तक नहीं की गई, जबकि यह नियम रहा है कि परीक्षा की तारीख घोषित करने के पहले काउंसिल की बैठक में सभी शिक्षकों से पूछा जाता था कि क्या आपने कोर्स पूरा कर दिया है? कोई शिक्षक अगर आपत्ति करता था कि अभी उसका कोर्स पूरा नहीं हुआ है तो फिर परीक्षा की तारीख तय नहीं होती. लेकिन इस बार एकेडमिक काउंसिल की बैठक तक नहीं हुई. इतना ही नहीं, इस बार पहली बार हुआ जब पहले प्रैक्टिकल का एग्जाम नहीं हुआ, बल्कि लिखित परीक्षा ले ली गई.’
गौरव के मुताबिक, ‘हम अपने अधिकारों को लेकर आंदोलन करते रहे. हम पर मुकदमे होते रहे. निलंबित लड़कों की बहाली तो हुई नहीं, उल्टे आठ लड़कों को जेल भेज दिया गया, जो अब तक वहां बंद हैं. हम लोग अस्पताल में इलाज के लिए गए तो वहां भी पुलिस परेशान करती रही. बाद में बात आगे न बढ़े इसके लिए फिर से परीक्षा की तारीख बढ़ाकर से परीक्षा लेने की बात कही गई. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बाद में वीसी साहब ने बातचीत के लिए डेलिगेशन भेजा. इतनी फजीहत के बाद भी हम वार्ता को तैयार हो गए. वीसी साहब के सामने हम लोगों ने सिर्फ यही मांग रखी कि हमारे साथियों का निलंबन वापस करवाइए. जो छात्र जेल में बंद हैं, उन्हें रिहा करवाइए और प्रिंसिपल साहब को हटाकर दूसरा प्रिंसिपल नियुक्त कीजिए. वीसी ने कहा कि निलंबन वापस करवा देंगे, मुकदमा वापस लेकर छात्रों को जेल से भी छुड़वा देंगे लेकिन प्रिंसिपल साहब को बदलना हमारे वश में नहीं. अब प्रिंसिपल साहब छुट्टी पर चले गए हैं. उन्हें हटाया नहीं गया. प्रिंसिपल श्रीवास्तव की छुट्टी को विश्वविद्यालय ने मंजूरी दे दी और उनकी जगह मशहूर कवि और साहित्यकार अरुण कमल कार्यवाहक प्रिंसिपल बना दिए गए.’

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पटना विश्वविद्यालय के कुलपति वाईसी सिम्हाद्री इस पूरे विवाद पर कहते हैं, ‘इस काॅलेज में जो कुछ हुआ या हो रहा है, उसे जल्द ही दुरुस्त कर दिया जाएगा. हम जो भी करेंगे काॅलेज के हित में ही करेंगे. नए प्रभारी प्राचार्य चर्चित कवि अरुण कमल ने कई दफा छात्रों से बातचीत की है.’
वहीं अरुण कमल कहते हैं, ‘हमको विश्वविद्यालय ने बड़ी जिम्मेदारी दी है. कोशिश रहेगी कि छात्रों की समस्याओं का समाधान हो और काॅलेज में फिर से अध्ययन-अध्यापन का माहौल बने. हमसे जो और जितना संभव होगा, उतना करने की कोशिश करेंगे.’

अरुण कमल बहुत कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं. वे जानते हैं कि उन्हें बस एक महीने का प्रभारी प्राचार्य बनाया गया है. चंद्रभूषण श्रीवास्तव वापस आ सकते हैं, इसकी पूरी संभावना है. चंद्रभूषण श्रीवास्तव की वापसी होगी तो फिर काॅलेज एक नए किस्म के युद्ध का अखाड़ा बनेगा, यह तय है. इसलिए आंदोलनरत छात्र किसी भी हाल में प्राचार्य से बर्खास्तगी से कम पर आंदोलन समाप्त करने को तैयार नहीं हैं. छात्र अभिषेक आनंद कहते हैं, ‘अरुण कमल को प्रभार देना एक नौटंकी है. उनको स्थायी क्यों नहीं कर दिया? चंद्रभूषण को हटाया नहीं गया है. मामले को रफा-दफा करने के लिए अरुण कमल को लाया गया है लेकिन जब तक हमारी सभी मांगें मानी नहीं जातीं, हम आंदोलन जारी रखेंगे.’

पिछले दो दशक से इस काॅलेज को बचाने और आगे बढ़ाने की लड़ाई लड़ रहे चर्चित कलाकार संन्यासी रेड कहते हैं, ‘श्रीवास्तव का प्रिंसिपल बनाया जाना ही अवैध है. हाईकोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाकर चंद्रभूषण श्रीवास्तव को नियुक्त किया गया था. पटना विश्वविद्यालय के वीसी थे शंभूनाथ सिंह, उन्होंने मनमर्जी कर जैसे-तैसे लोगों को नियुक्त कर दिया था. ये श्रीवास्तवजी उन्हीं की देन हैं, जो राज्य के सबसे प्रतिष्ठित काॅलेज के प्रिंसिपल हैं. दुर्भाग्य तो यह है कि नीतीश कुमार कला को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं और पटना के बेली रोड में एक विशाल कला म्यूजियम भी बना रहे हैं लेकिन ड्रीम प्रोजेक्ट वाले नए संग्रहालय में भी चंद्रभूषण श्रीवास्तव जैसे लोगों को प्रदर्शनी समिति का अध्यक्ष बना दिया गया है. समझ सकते हैं कि आगे उसका भविष्य क्या होने वाला है.’

रोजाना पटना के बुद्धिजीवी भी इस आंदोलन को समर्थन देने काॅलेज कैंपस पहुंच रहे हैं लेकिन अभी बिहार की सरकार जिस तरह से शिक्षा विभाग के ही विवाद में फंसी हुई है, उसे देखते हुए लगता है कि पटना आर्ट काॅलेज की समस्या का समाधान जल्दी नहीं होने वाला.

‘प्रिंसिपल ने सिर्फ नीतीश को जातीय तौर पर प्रताड़ित नहीं किया. काॅलेज कैंपस में बने बुद्ध पार्क को तुड़वाना भी उनके दलित विरोधी होने पर मुहर लगाता हैे’

आंदोलन में छात्रों का साथ दे रहे पटना के वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर कहते हैं, ‘1990 के बाद से जो इस काॅलेज की लय लड़खड़ाई, तब से फिर पटरी पर नहीं आ सकी. यह लड़ाई सिर्फ एक प्रिंसिपल चंद्रभूषण श्रीवास्तव के खिलाफ नहीं है बल्कि इसके पहले भी 1996-97 में एक और प्रिंसिपल के खिलाफ काॅलेज में लंबी लड़ाई लड़ी जा चुकी है. लेकिन तब लालू प्रसाद यादव ने मामले में सीधे हस्तक्षेप किया था. नीतीश कुमार को भी इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करना चाहिए. मामले को नजरअंदाज किया जा रहा है, लेकिन अंदर ही अंदर विस्फोट की जमीन तैयार हो रही है. उस दिन नीतीश पासवान ने फांसी लगाई. अगर मर जाता तो दूसरा रोहित वेमुला होता.’

अनीश भी आरोप लगाते हैं, ‘प्रिंसिपल चंद्रभूषण श्रीवास्तव अपनी सोच से ही सामाजिक न्याय और दलित विरोधी हैं. उन्होंने सिर्फ नीतीश पासवान को ही जातीय तौर पर प्रताड़ित नहीं किया, बल्कि काॅलेज कैंपस में बने बुद्ध पार्क को तुड़वाना भी उनके दलित विरोधी होने पर मुहर लगाता है. इसके अलावा उनके खिलाफ दर्जनों शिकायतें हैं. अगर उन्हें नहीं हटाया जाता तो आने वाले दिनों में वे बिहार सरकार के लिए नासूर बन सकते हैं.’

आर्ट कॉलेज में चल रहे आंदोलन को समर्थन देने के लिए जेएनयू छात्रसंघ के पदाधिकारी भी वहां पहुंचे थे. जेएनयू छात्रसंघ उपाध्यक्ष शहला राशिद बताती हैं, ‘हम लोग पटना गए थे. नीतीश ने आत्महत्या की कोशिश की थी, उससे मिले. हमने उसको साथ लेकर प्रोग्राम किया, मार्च किया. उससे स्पीच दिलवाई. लेकिन बिहार का मीडिया बड़ा अजीब-सा है. इस मसले पर वहां के मीडिया में कोई कवरेज नहीं हुई. वहां का जो प्रिंसिपल है वह बिल्कुल गुंडा है. वह नीतीश कुमार का आदमी है. लड़कियों के साथ बदतमीजी करता है. बोलता है कमरे पर आओ. कौन-सी क्रीम लगाई है, कौन-सा परफ्यूम लगाया है. तुम तो आज बहुत सुंदर लग रही हो. दलित छात्रों पर तरह-तरह के अत्याचार किए जा रहे हैं, जातिसूचक टिप्पणियां की जाती हैं. एक छात्र का सब सामान कपड़े वगैरह तीन महीने के लिए बाथरूम में बंद कर दिए. ये सब चल रहा है वहां. छात्रों पर फर्जी मुकदमे लगाकर जेल में डाला जा रहा है. कुछ छूटे हैं और कुछ अभी जेल में हैं. हमने मार्च किया तो हमें गांधी मैदान के पास रोक दिया गया. विधानसभा से भी कोई मिलने भी नहीं आया, न ही कोई कार्रवाई हुई.’

वहां के छात्र भी इस आरोप की तस्दीक करते हैं कि लड़कियों के प्रति प्रिंसिपल चंद्रभूषण श्रीवास्तव का व्यवहार गली के गुंडों से भी बुरा है. हाल ही में जेल से बाहर आए छात्र अभिषेक आनंद कहते हैं, ‘जब आप तंत्र के खिलाफ लड़ते हैं तो वहां पर बैठा व्यक्ति अपनी शक्ति का इस्तेमाल करता है, भले ही वह गलत क्यों न हो. वे अपनी गलती को सही बताने के

लिए अपनी ताकत का दुरुपयोग करते हैं. इस सिस्टम में गलत के खिलाफ लड़ने वालों की जगह तो जेल ही है.’ आखिर प्रशासन इन समस्याओं का हल निकालने की जगह छात्रों को जेल में डालकर क्या हासिल करना चाहता है?’

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 13, Dated 15 July 2016)

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