सियासी शराब | Tehelka Hindi

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सियासी शराब

बिहार में शराब का सियासत से गहरा रिश्ता है. शराबबंदी करने भर से नीतीश कुमार ने अनेक निशाने साधे हैं. इससे भाजपा के साथ सहयोगी लालू प्रसाद भी बैकफुट पर आ गए हैं

निराला 2016-04-30 , Issue 8 Volume 8

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बिहार में एक वरिष्ठ पत्रकार हैं जो एक जमाने में लालू यादव के काफी करीबी रहे हैं. शराबबंदी के आदेश के दिन संयोग से उनके साथ ही था. वे एक किस्सा सुनाते हैं. उन दिनों का किस्सा जब लालू यादव का बिहार में नया-नया उभार हो रहा था. उन्हें सत्ता मिल गई थी और मुख्यमंत्री बनने के कुछ माह के अंदर ही लालू सासाराम पहुंचे थे. भारी भीड़ थी. लालू मंच पर गए. तब समाज की नब्ज पकड़ने की उस्तादी सीख रहे थे लालू प्रसाद. उन्होंने अचानक ही मंच से पूछा कि यहां कौन-कौन है जो ताड़ के पेड़ पर चढ़ता है. हाथ उठाओ. भीड़ में सहमते हुए कुछ लोगों ने हाथ उठाया. लालू प्रसाद ने ललकार भरी, डरो नहीं, हाथ उठाओ. हाथों की संख्या कुछ और बढ़ी. लालू ने कहा कि सब इधर मंच पर आओ. हाथ उठाने वाले कुछ लोग मंच के पास बनी सीढ़ी के पास खड़े हो गए. लालू प्रसाद ने ललकारा, ‘ सीढ़ी से आओगे! नाम हंसाओगे! सामने से मंच पर चढ़ो.’ जो सीढ़ियों के पास थे, वे मंच के सामने गए और मंच पर चढ़ गए. लालू प्रसाद ने सबको मंच पर खड़ा किया. सबके कुरते के बटन को सामने से खोलने को कहा. फिर ताड़ के पेड़ पर चढ़ने से बने दाग को भीड़ को दिखाया. लालू ने कहा, ‘लालू जादव इसी दाग को मिटाने आया है. जाओ आज से ताड़ी टैक्स फ्री हुई.’

जिस समय की यह बात है, उस समय मीडिया का इतना विस्तार नहीं था. न तो इतने क्षेत्रीय चैनल थे, न सोशल मीडिया का जमाना. मोबाइल युग का सूत्रपात भी नहीं हुआ था. फोन भी तब इतने नहीं थे लेकिन सासाराम की यह बात शाम होते-होते तक पूरे बिहार में फैल गई और लालू प्रसाद एक बड़े तबके के लिए नायक बन गए. इस बार जब एक अप्रैल से देसी शराब पर प्रतिबंध की पूर्व घोषित योजना पर अमल शुरू हुआ और उसके चार दिन बाद ही विदेशी शराब पर भी प्रतिबंध लगा तो यह बात हवा में उड़ी कि ताड़ी को भी प्रतिबंधित कर दिया जाए जबकि ऐसा हुआ नहीं. नीतीश कुमार की कैबिनेट ने यह फैसला लिया कि ताड़ी सार्वजनिक जगहों पर नहीं बिकेगी और खुलेआम नहीं बिकेगी. शराबबंदी की बात तो सबको समझ में सीधे-सीधे आ गई कि देसी हो या विदेशी शराब, जो भी बेचेगा, पिएगा, उसे पकड़ लेना है. शराब जहां मिले, उसे जब्त कर लेना है, सड़कों पर बहा देना है. पुलिसवाले यह भी समझ गए कि अगर कोई शराब बेचते या बनाते हुए मिलता है तो उसे समझाना है कि 10 लाख रुपये तक का जुर्माना और दस साल तक की सजा हो सकती है. सार्वजनिक जगहों पर पीकर कोई बौराता है तो उसे दस साल तक की सजा दी जा सकती है. पुलिसवाले को यह भी समझ में आ गया था कि कैंपस या घर आदि में जमावड़ा लगाकर कोई पीने-पिलाने का प्रबंध करता है तो उसे भी बताना है कि दस साल की सजा और उम्रकैद तक हो सकती है. पुलिसवाले यह सब समझ गए लेकिन वे ताड़ी का पेंच समझ नहीं सके इसलिए अगले दिन से ताड़ी उतारने वाले चौधरियों को भी पकड़ने लगे, परेशान करने लगे. दो-चार दिन तक यह होता रहा और बिहार में शराबबंदी पर जितनी बात हुई, जितनी खुशी हुई, उतनी ही नाराजगी एक बड़े वर्ग में ताड़ी को लेकर हुई कार्रवाइयों से व्याप्त हो गई.

ताड़ी के धंधे में लगे लोगों ने कहा कि लालू प्रसाद ही हमारे मसीहा थे, नीतीश तो दुश्मन जैसा व्यवहार कर रहे हैं. कुछ दिनों बाद ताड़ीवालों को परेशान करना छोड़ दिया गया लेकिन यह बात चूंकि तेजी से फैल चुकी थी इसलिए शराबबंदी के कुछ दिनों बाद नीतीश कुमार को भी बोलना पड़ा. उन्होंने कहा था, ‘हम जल्द ही ताड़ और ताड़ी का नया इस्तेमाल करने जा रहे हैं. रोजगार के सृजन का नया द्वार खोलने जा रहे हैं. सूर्योदय से पहले की ताड़ी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होती है इसलिए सुबह-सुबह की ताड़ी सभी जगहों से जमा होगी और फिर उसका प्रसंस्करण होगा, उसे बोतलबंद किया जाएगा जो ‘नीरा’ नाम से पूरे बिहार में बिकेगी.’

‘शराबबंदी के राजनीतिक निहितार्थ हैं. यह नीतीश के लिए अग्निपरीक्षा है. पुलिसवाले चाहेंगे, तभी यह सफल होगा और पुलिसवाले ऐसा आसानी से चाहेंगे, इसमें संदेह है’

शराबबंदी के प्रसंग में ताड़ी पर यह बात इसलिए कि महज पांच दिन में यह पता लग गया कि शराबबंदी का बिहारियों की सेहत और आर्थिक नफा-नुकसान से चाहे जिस किस्म का रिश्ता हो लेकिन इसका सियासत से भी उतना ही गहरा रिश्ता है लेकिन सियासी रिश्ते सतह पर नहीं हैं. बात सिर्फ ताड़ी पर नहीं हुई, पहले सिर्फ देसी शराब पर प्रतिबंध लगाने के ठीक चार दिन बाद ही जिस तरह से नीतीश कुमार ने विदेशी शराब पर भी प्रतिबंध लगाने का आदेश पारित किया, बिहार में शराबियों के मुंह से चाहे जितनी गालियां निकली हों, शराब का विरोध करने वालों ने चाहे जितनी वाहवाही दी लेकिन बिहार की सियासत को जो समझते हैं, उन्होंने प्रतिक्रिया दी थी कि जनता की नब्ज पकड़ने के मामले में नीतीश अब लालू से ज्यादा उस्ताद हो गए हैं और उन्होंने शराबबंदी के जरिए एक ऐसा तीर चलाया है जिससे एक साथ कई निशाने सधेंगे. जो यहां की सियासत को समझते हैं, वे यह भी जानते हैं कि नीतीश ने शराबबंदी का एजेंडा चुनाव के पहले क्यों सामने लाया और चुनाव होने और परिणाम आने के बाद सबसे पहले ठोस फैसले के रूप में शराबबंदी को ही क्यों लागू किया.

मीनापुर के पूर्व राजद विधायक हिंद केशरी यादव कहते हैं, ‘नीतीश जी ने ये फैसला अचानक लिया है. स्वागत है लेकिन इस शराबबंदी के राजनीतिक निहितार्थ हैं. यह उनके लिए अग्निपरीक्षा है. उनके पुलिसवाले चाहेंगे, तभी यह सफल होगा और पुलिसवाले आसानी से चाहेंगे, इसमें संदेह है. मैं तो वर्षों से शराबबंदी अभियान चलाता रहा, चार साल पहले मुझे जिला प्रशासन और पुलिस के तमाम बड़े पदाधिकारियों के बीच में ही शराबबंदी अभियान के तहत पदयात्रा निकालने के कारण शराब माफियाओं ने मारा-पीटा. मेरे साथ महिलाओं को मारा-पीटा गया था. अभियान में शामिल एक गर्भवती महिला को इतना पीटा गया कि उनका अबॉर्शन कराना पड़ा. हमने नामजद एफआईआर कराई लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.’

हिंद केशरी कांग्रेसी कुल के नेता रहे हैं. बाद में राजद से जुड़े और विधायक बने. अब राजद, कांग्रेस सब नीतीश कुमार के साथ हैं इसलिए वे खुलकर कुछ नहीं बोल रहे. हिंद केशरी की मजबूरी है, इसलिए वे जो कहना चाह रहे हैं वह कह नहीं पा रहे लेकिन बिहार के जानकार लोग जानते हैं कि इसके निहितार्थ क्या हैं. निहितार्थ गहरे न होते तो शराब के कारोबार पर प्रतिबंध लगाने का फैसला एक झटके में नहीं लिया गया होता. एक झटके में 500 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान उठाने को कोई भी यूं ही तैयार नहीं हो जाता. बहरहाल इस प्रतिबंध के निहितार्थ सरल हैं. नीतीश दो साल पहले जब भाजपा से अलग होकर लालू प्रसाद के साथ जा मिले थे तो यह कोई साधारण राजनीतिक फैसला नहीं था. नीतीश के राजनीतिक जीवन के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी इस नए सियासी समीकरण को साध लेना और खुद को फिर से स्थापित कर लेना. उन्होंने ऐसा साबित किया और यह सब जानते हैं कि यह सब सिर्फ लालू से जुड़ाव या भाजपा की कमजोर रणनीतियों की वजह से नहीं हुआ बल्कि इसमें सबसे बड़ी भूमिका बिहार के महिलाओं की रही जिन्होंने नीतीश कुमार को खुलकर वोट किया और नीतीश को बड़ी जीत दिलवाने में अहम भूमिका निभाई. महिलाओं का इस तरह एकमुश्त खुलकर नीतीश को वोट देने के पीछे कई कारण माने जाते हैं.

संभावना है कि साइकिल वितरण और पंचायत में महिलाओं को आरक्षण देने के बाद शराबबंदी का फैसला सभी वर्गों की महिलाओं को नीतीश से जोड़ेगा

बताया जाता है कि नीतीश ने महिलाओं को पंचायत चुनाव में आरक्षण दिया इसलिए महिलाएं उनकी मुरीद हुईं. एक बड़ा तबका यह मानता है कि चूंकि नीतीश कुमार ने लड़कियों को साइकिल दी इसलिए भी महिलाएं प्रभावित हुईं. पहली खेप में साइकिल पाने वाली लड़कियां भी अब वोटर हो चुकी हैं, इसलिए भी उनके महिला वोट में इजाफा हुआ है. लेकिन जानकार यह बताते हैं कि इस बार तमाम प्रतिकूल स्थितियों में भी कास्ट और कम्युनिटी के दायरे से बाहर निकलकर महिलाओं ने नीतीश को वोट दिया. एक बड़ी वजह यह भी रही कि नीतीश ने चुनाव के पहले महिलाओं से शराबबंदी का वादा किया था. यह सब जानते हैं कि इसकी बुनियाद कब रखी गई थी. चुनाव के ठीक पहले नौ जुलाई, 2015 को पटना में जीविका परियोजना से जुड़ी महिलाएं ग्रामवार्ता कार्यक्रम में भाग लेने आई थीं. कार्यक्रम में नीतीश के भाषण के बाद एक महिला ने कहा कि शराब बंद करवा दीजिए, सर. तो नीतीश को एक बार फिर माइक संभालना पड़ी. तब उन्होंने कहा था कि इस बार जीत मिली तो पक्का. नीतीश के इस एलान का असर रहा. बाद में नीतीश ने इसे अपने सात निश्चयों में भी शामिल किया और सरकार बनने के बाद पहला फैसला शराबबंदी का ही लिया.

पहला फैसला यही लेने की ठोस वजहें भी थीं. नीतीश जान चुके थे कि भाजपा से अलगाव और राजद से जुड़ने के बाद भी वे अगर भारी जीत हासिल करने में सफल हुए हैं तो उसमें महिलाओं का वोट सबसे अहम रहा है और यह सही वक्त है जब वे उस वोट के चैंपियन बन जाएं और सदा-सदा के लिए अपने पक्ष में कर लें. पहले नीतीश कुमार ने सिर्फ देसी शराबबंदी का आदेश दिया लेकिन चार दिन में ही वे यह भी जान गए कि यह उनकी राजनीतिक भूल है और इसका नुकसान उन्हें ज्यादा होगा इसलिए चार दिन के भीतर ही विदेशी पर भी प्रतिबंध लगा दिया. नीतीश कहते भी हैं कि यह फैसला उन्होंने महिलाओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए लिया है.

नीतीश यह बात सही कह रहे हैं. उन्होंने वास्तव में महिलाओं के दबाव में आकर यह फैसला लिया है क्योंकि महिलाएं न सिर्फ इसकी मांग कर रही थीं बल्कि पिछले कुछ सालों से बिहार के अलग-अलग हिस्से में आंदोलन भी चला रही थीं. अपने दम पर शराबबंदी अभियान चलाकर शराब के अड्डों को ध्वस्त भी कर रही थीं. नीतीश के पास शराबबंदी करने की घोषणा करना ही एकमात्र विकल्प बच गया था. महिलाओं ने पूरे बिहार में किस तरह से शराबबंदी की कमान संभाली थी उसकी बानगी बिहार चुनाव के दौरान ही देखने को मिली थी. रोहतास जिले में महिलाओं ने शराबबंदी के लिए नोटा का प्रचार शुरू कर दिया था. पांच सितंबर को एक बड़ी खबर छपरा के शोभेपुर गांव से आई. वहां शराबबंदी के लिए समूह में पहुंची महिलाओं ने शराब के अड्डे को ध्वस्त कर दिया था. ऐसी ही खबर पटना से सटे मनेर हल्दी छपरा, सादिकपुर, शेरपुर, छितनावां जैसे गांवों से आई थी कि वहां महिलाओं ने शराब के अड्डों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया है. बरबीघा जैसे इलाके से यहां तक खबर आई कि महिलाओं ने वहां समूह बनाकर पीने और पिलाने वाले, दोनों पर जुर्माना और सार्वजनिक तौर पर डंडे से पिटाई जैसे दंड की व्यवस्था की न सिर्फ घोषणा की बल्कि उस पर अमल भी कर रही थीं. बिना किसी राजनीतिक दल के सहयोग के ये सारे अभियान महिलाओं ने खुद चलाए. इस तरह के अभियान पूरे बिहार में इतनी तेजी से फैल रहे थे कि अगर नीतीश यह फैसला नहीं लेते तो शायद जिन महिलाओं ने उनका साथ दिया था वे उनसे छिटकना शुरू कर देतीं.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 8, Dated 30 April 2016)

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