उपभोक्ता फोरम : ग्राहकों का मरहम | Tehelka Hindi

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उपभोक्ता फोरम : ग्राहकों का मरहम

देश में उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा का कानून बने तीन दशक से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन आज भी उपभोक्ता आयोग के पास अपनी परेशानियों को लेकर जाने वालों की संख्या नाममात्र की है जबकि आयोग ने तमाम फैसलों से उपभोक्ताओं के हितों को लेकर नजीर पेश की है.

अमित सिंह 2016-06-15 , Issue 11 Volume 8

Lead

एस्कार्ट हार्ट इंस्टिट्यूट ऐंड रिसर्च सेंटर (हॉस्पिटल) देश के नामचीन अस्पतालों में शुमार है. यहां एक महिला के पैर में खून का प्रवाह रुकने पर उसके दिल का ऑपरेशन किया गया. बावजूद इसके महिला के पैर का दर्द कम होने के बजाय बढ़ता ही गया. तबीयत बिगड़ने पर उनके इलाज के लिए होम्योपैथी का सहारा लिया गया लेकिन हालत नहीं सुधरी और महिला को अपना एक पैर गंवाना पड़ा. इसी बीच वर्ष 2010 में महिला की मौत हो गई.

इस मामले में अब दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने डॉक्टरों द्वारा इलाज के दौरान अपनाए गए तरीके को जानलेवा लापरवाही माना है. आयोग ने एस्काॅर्ट अस्पताल पर ब्याज सहित एक करोड़ 15 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. इलाज में लापरवाही पर दिल्ली के इस अस्पताल पर लगा यह सबसे बड़ा जुर्माना है. आयोग ने एक करोड़ 15 लाख रुपये की रकम में से 75 लाख रुपये उपभोक्ता कल्याण फंड में जमा कराने के निर्देश अस्पताल को दिए हैं. जबकि ब्याज समेत 40 लाख रुपये मृतक महिला के पति और मामले के शिकायतकर्ता केसी मल्होत्रा को देने के आदेश दिए गए हैं. इतना ही नहीं, वर्ष 2008 से अब तक इस मुकदमे पर शिकायतकर्ता द्वारा खर्च किए गए 50 हजार रुपये का भुगतान भी अस्पताल को करना होगा.

इस मामले में आयोग ने एक और बात को स्पष्ट किया. दरअसल अस्पताल प्रशासन की तरफ से कहा गया था कि पीड़ित महिला की मौत हो चुकी है. ऐसे में मुआवजे की मांग अनुचित है. हालांकि आयोग ने साफ किया कि उपभोक्ता के कानूनी वारिस अथवा प्रतिनिधि भी मुआवजा मांगने के हकदार होते हैं. इसलिए इस मामले में पीड़ित महिला के पति की मांग जायज है.

उपभोक्ताओं के हितों से संबंधित एक ऐसा ही मामला दिल्ली विकास प्राधिकरण से जुड़ा है. दरअसल 30 साल पहले हजारों लोगों ने घर का सपना देखा था. लेकिन दिल्ली विकास प्राधिकरण (स्लम एवं जेजेआर विभाग) और दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड की लापरवाही की वजह से उनका सपना अब तक पूरा नहीं हुआ है. इन लोगों ने वर्ष 1985 में निकाली गई एक आवासीय योजना के तहत अपनी मेहनत की कमाई घर की कीमत के तौर पर डीडीए को जमा करा दी थी. तीन दशक बीत जाने के बाद भी 12 हजार से ज्यादा लोगों को घर नहीं मिला है. ये सभी बोर्ड की प्रतीक्षा सूची के तहत मकान पाने का इंतजार कर रहे हैं. दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने डीडीए और बोर्ड के इस रवैये को उनकी सेवा में कोताही माना है. अब आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड पर करीब एक करोड़ रुपये का जुर्माना किया है.

Consumer

इस मामले में दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग के न्यायिक सदस्य एनपी कौशिक की पीठ ने कहा कि वर्ष 1985 में मकान की कीमत चुकाकर घर का सपना देख रहे हजारों लोगों में से महज 2,650 लोगों को अब तक मकान मिल पाया है. जबकि उपभोक्ता आयोग में शिकायत दाखिल करने वाले सुंदरनगरी निवासी देशराज का नाम प्रतीक्षा सूची में 12,929 नंबर पर है. आयोग के समक्ष बोर्ड के अधिकारी ने खुद यह बात कबूली है. आयोग ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि अगर घर देने की यही रफ्तार रही तो शिकायतकर्ता देशराज को 150 साल और इंतजार करना होगा.

इसी तरह के एक और मामले में उपभोक्ता आयोग ने ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण व एसबीआई पर 65 लाख रुपये जुर्माना लगाया है. दरअसल प्राधिकरण ने फ्लैट वापस करने पर तीन आवंटियों की बयाना राशि की 50 फीसदी रकम जब्त कर  ली थी. मामले में आयोग ने कहा है कि प्राधिकरण व बैंक ने बड़ी चालाकी से आवंटियों को धोखे में रखा. उन्होंने आवंटियों को सोचने-विचारने का मौका ही नहीं दिया और जबरन उनकी 50 फीसदी रकम काट ली. इसके लिए प्राधिकरण व बैंक पूरी तरह जिम्मेदार हैं.

दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने ग्राहकों में अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञता का जिक्र करते हुए अपने एक आदेश में कहा है कि देश भर के आंकड़े बताते हैं कि महज 0.3% लोग अपने अधिकारों के लिए उपभोक्ता अदालत पहुंचते हैं

मामला यह था कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने 8 नवंबर, 2010 को ग्रेटर नोएडा के विभिन्न सेक्टरों में फ्लैट आवंटन योजना निकाली थी. इस योजना के तहत भारतीय स्टेट बैंक ने सौ फीसदी का ब्याज देने का विज्ञापन अखबारों में दिया. पूर्वी दिल्ली निवासी तीन आवेदकों राजीव सिंह, मनोज कुमार शर्मा और सुमन लता ने स्टेट बैंक से बयाना रकम 3 लाख 90 हजार रुपये ब्याज पर लेकर फाॅर्म भरा.  24 जनवरी, 2011 को ड्रॉ निकाला. इस ड्रॉ में ये तीनों आवेदक सफल रहे. 11 फरवरी, 2011 को प्राधिकरण ने स्टेट बैंक को इन आवेदकों का आवंटन पत्र भेज दिया. लेकिन बैंक ने इसकी जानकारी इन आवेदकों को दो महीने बाद दी. आवंटन पत्र में लिखा था कि 30 दिन के भीतर फ्लैट को लेने अथवा वापस करने का समय है. बैंक से अप्रैल 2011 में आवंटन पत्र के बारे में सूचना मिलने के बाद इन तीनों आवेदकों ने पहले दूसरे बैंकों से अलग-अलग बयाना रकम ब्याज पर उठाई और स्टेट बैंक को चुकता करके आवंटन पत्र ले लिए. इसके बाद इन आवेदकों ने प्राधिकरण को लिखित में सूचना दी कि वे यह फ्लैट नहीं लेना चाहते. प्राधिकरण ने उनकी तीन लाख 90 हजार रुपये की राशि में से उन्हें सिर्फ एक लाख 95 हजार रुपये लौटाए. ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण का तर्क था कि उन्होंने एक महीने का तय समय गुजर जाने के बाद फ्लैट वापस किए हैं. इसलिए उनकी 50 फीसदी रकम काटी गई है.

कोचिंग पर तीन लाख जुुर्माना

मुंबई के एक कोचिंग सेंटर पर एक उपभोक्ता अदालत ने 3.64 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. अदालत ने माना कि कोचिंग सेंटर 2013 में एक 12वीं की छात्रा को वादे के मुताबिक सेवाएं देने में नाकाम रहा. मीडिया में आई खबरों के मुताबिक, इस महीने की शुरुआत में जज एमवाई मनकर और एसआर संदीप ने अंधेरी के लोखंडवाला कॉम्प्लेक्स स्थित कोचिंग सेंटर ऑक्सफोर्ड ट्यूटर्स अकादमी को निर्देश दिया कि वे छात्रा को न केवल फीस के 54 हजार रुपये लौटाएं, बल्कि  लड़की और उसके परिवार के मानसिक उत्पीड़न के लिए 3 लाख रुपये का मुआवजा दें. इसके अलावा, अदालती प्रक्रिया में हुए खर्च के लिए भी दस हजार रुपये चुकाएं. बता दें कि ऑक्सफोर्ड ट्यूटर्स अकादमी- एसएससी, एचएससी, सीबीएसई और आईसीएसई के छात्रों को घर पर कोचिंग की सेवा देती है. रिपोर्ट के अनुसार, विज्ञान की छात्रा अभिव्यक्ति वर्मा अपनी एचएससी परीक्षाओं की तैयारियां कर रही थीं. 2013 में उन्होंने गणित और रसायन के लिए कोचिंग ली.

ऑक्सफोर्ड ट्यूटर्स अकादमी यह दावा करती है कि उसके पास अनुभवी शिक्षकों की फैकल्टी है. उसे अभिव्यक्ति के घर ट्यूटर भेजने थे, लेकिन एक महीना बीतने के बावजूद वे केमिस्ट्री का टीचर मुहैया कराने में नाकाम रहे. इसके अलावा, गणित का भी शिक्षक हिंदी माध्यम का था, जो अभिव्यक्ति को इंग्लिश मीडियम में पढ़ा नहीं पाया. अभिव्यक्ति की मां नीना एक वकील हैं. उन्होंने कोचिंग सेंटर से कई बार एक केमिस्ट्री टीचर भेजने की मांग की. कोचिंग सेंटर ने जिस टीचर को भेजा, वह आईसीएसई में आठवीं दर्जे के छात्रों को पढ़ाता था. नीना को डर था कि उनकी बेटी पढ़ाई में पिछड़ जाएगी. उन्होंने एक बार फिर कोचिंग सेंटर से बीते साल नवंबर में संपर्क किया.

  तब सेंटर ने एक आईआईटी स्टूडेंट को भेजा, जिसने क्वेश्चन पेपर बैंक सॉल्व करने में मदद की. हालांकि, वह भी अभिव्यक्ति की मदद करने में नाकाम रहा. इस दबाव में एसएससी में 83 प्रतिशत नंबर पाने वाली अभिव्यक्ति फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में मिलाकर 60 प्रतिशत अंक लाने में नाकाम रही. दरअसल, वे हैदराबाद के एक कॉलेज में दाखिला लेना चाहती थीं, जहां मेरिट के आधार पर एडमिशन मिलता है. हालांकि बाद में मैनेजमेंट से बातचीत के बाद उन्हें कॉलेज में एक सीट मिल ही गई. अभिव्यक्ति का कहना है कि वे कोचिंग सेंटर की ओर से की गई देरी की वजह से अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकीं. नीना ने 2015 में ऑक्सफोर्ड ट्यूटर्स अकादमी के खिलाफ कोर्ट में केस किया और खुद अपने मामले की पैरवी की. कोचिंग सेंटर ने कोर्ट के नोटिस पर जवाब नहीं दिया.

ऐसा नहीं है कि आयोग सिर्फ बड़े मामलों में ही उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करता है. हम लोग हर दिन कुछ न कुछ सामान दुकानों से खरीदते रहते हैं. ऐसे में अगर हमारे पास उसका पक्का बिल है और हमारे सामान में कुछ गड़बड़ी है तो भी हम उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं. आयोग ने हाल ही में एक ऐसे मामले में जहां ‘बिग बाजार’ ने ग्राहक से सिर्फ 90 रुपये ज्यादा वसूली की थी अपना फैसला सुनाया है. पूर्वी दिल्ली में रहने वाली सरिता नारायण 13 जून, 2012 को किराने का सामान खरीदने बिग बाजार गई थीं. उन्होंने 3,512 रुपये का सामान खरीदा. घर जाकर बिल देखा तो पाया कि 500 ग्राम के बाबा रामदेव की पतंजलि कंपनी के हल्दी पाउडर पर एमआरपी (तय अधिकतम कीमत) 90 रुपये अंकित था. जबकि बिल में इसकी कीमत 160 रुपये वसूली गई थी. वहीं बृज देव एसएनडीएल साबुन पर एमआरपी 30 रुपये अंकित था और दो साबुन के एवज में 80 रुपये वसूले गए थे. महिला के बिल में कुल 90 रुपये की गड़बड़ की गई थी. महिला ने इसके खिलाफ उपभोक्ता अदालत में शिकायत की.

इस पर पूर्वी दिल्ली के सैनी एनक्लेव स्थित उपभोक्ता विवाद एवं निपटारा फोरम के अध्यक्ष एनए जैदी एवं सदस्य पूनम मल्होत्रा की पीठ ने शिकायतकर्ता सरिता नारायण के पक्ष में फैसला सुनाते हुए महिला को उनकी रकम 12 फीसदी ब्याज सहित लौटाने के आदेश दिए हैं. इतना ही नहीं, अदालत ने आयकर विभाग और कारोबार एवं कर विभाग को कंपनी के खातों की जांच करने को कहा है ताकि इस कंपनी द्वारा उपभोक्ताओं को पहुंचाए जा रहे नुकसान का विवरण मिल सके. साथ ही कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सके.

Box

उपभोक्ता अदालतों द्वारा सुनाए गए ऐसे फैसले ग्राहकों के हितों को लेकर एक उम्मीद जगाते हैं लेकिन बड़ी संख्या में अब भी लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हो पाए हैं. दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने उपभोक्ताओं में अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञता का जिक्र करते हुए हाल ही में अपने एक आदेश में कहा है कि देश भर के आंकड़े बताते हैं कि महज 0.3% लोग अपने अधिकारों के लिए उपभोक्ता अदालत पहुंचते हैं.

गौरतलब है कि देश में उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिए कानून को आए हुए तीन दशक से ज्यादा बीत चुके हैं. इसके लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था की गई है. देश में एक राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग है. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का गठन किया गया है. इस आयोग में एक अध्यक्ष (जो  सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस होते हैं) और 11 सदस्य मनोनीत किए जाते हैं. आयोग में देश भर से उपभोक्ताओं द्वारा राज्य उपभोक्ता आयोग के निर्णयों पर पुनर्विचार व आदेश में संशोधन के लिए आवेदन किया जाता है.

इसके अलावा प्रत्येक राज्य में एक उपभोक्ता आयोग होता है. राज्य उपभोक्ता आयोग में एक अध्यक्ष (जो हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज होते हैं) व चार मनोनीत सदस्य होते हैं. यह आयोग संबंधित राज्य के उपभोक्ता के हक संबंधी मामलों पर सीधे सुनवाई अथवा जिला उपभोक्ता आयोग के निर्णयों पर पुनर्विचार अथवा आदेश में संशोधन के मसलों पर सुनवाई करता है.

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वहीं हर राज्य के हर जिले में एक उपभोक्ता विवाद निपटारा फोरम होता है. यह फोरम संबंधी जिले के लोगों की शिकायतों पर सुनवाई करता है. फोरम में एक अध्यक्ष व दो सदस्य होते हैं. अध्यक्ष सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश अथवा उच्च पद पर आसीन रह चुके अधिकारी हो सकते हैं. इसके अलावा अन्य सदस्य भी सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश होते हैं. उपभोक्ता फोरम में ग्राहक अपने सामान में खामी को लेकर शिकायत करता है. प्राथमिक स्तर पर पहले ग्राहक के मामले की सुनवाई उपभोक्ता फोरम में ही होती है.

उपभोक्ता अदालतें दीवानी अदालत की तरह होती हैं. किसी भी पक्षकार को समन कर तलब करना अथवा जुर्माना आदि करने का अधिकार इन अदालतों को है लेकिन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत इन अदालतों को एक विशेष प्रावधान के तहत पक्षकार के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है. जैसे कि प्रतिवादी द्वारा उपभोक्ता अदालत द्वारा दिए गए निर्णयों को नहीं मानने पर उसकी गिरफ्तारी के आदेश उपभोक्ता अदालत दे सकती है. तब तक उक्त प्रतिवादी एवं पक्षकार को जेल से रिहाई नहीं मिल सकती, जब तक वह उपभोक्ता अदालत के निर्णय का पालन नहीं कर लेता.

हालांकि ऐसा नहीं है कि देश भर में उपभोक्ता अदालतें बहुत ही बेहतर तरीके से काम कर रही हैं. प्रावधानों के मुताबिक उपभोक्ता आयोग को तीन महीने के भीतर मामले का निपटारा करना होता है पर कई बार ऐसा नहीं हो पाता है. आईटी सेक्टर में काम करने वाले दीपक चौबे ऐसी ही एक समस्या से जूझ रहे हैं. वे कहते हैं, ‘एक शोरूम से लिए गए मोबाइल में परेशानी आने के बाद उन्होंने उपभोक्ता फोरम में शिकायत की थी पर तीन महीने से ज्यादा का वक्त बीत जाने पर भी मामले का निपटारा नहीं हो पाया है. अक्सर स्टाफ की कमी की शिकायत की जाती है.’

कुछ ऐसी ही शिकायत मीडिया इंडस्ट्री में काम करने वाले प्रदीप कुमार की है. उनका कहना है कि तीन महीने में मामले का निपटारा हो जाना चाहिए था, लेकिन एक  चाइनीज मोबाइल कंपनी के खिलाफ पूर्वी दिल्ली के सैनी एनक्लेव स्थित उपभोक्ता विवाद एवं निपटारा फोरम में करीब चार महीने पहले की गई अपील पर अभी तक फैसला नहीं आ पाया है. इस मामले की पहली सुनवाई के बाद से ही स्टाफ की कमी का मामला सामने आ गया था. अभी तक चार बार मामले की  सुनवाई हो चुकी है पर कुछ भी हल नहीं निकल पाया है.

दिल्ली जैसे बड़े शहरों की बात छोड़ दी जाए तो छोटे शहरों में उपभोक्ता अदालतें बहुत ही बदतर स्थिति में हैं. इनके पास स्टाफ की समस्या के साथ-साथ संसाधनों की बेहद कमी है. इसके अलावा लोगों के कम जागरूक होने के चलते कम मामलों की सुनवाई भी होती है.

उपभोक्ता अधिकारों को लेकर काम कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता जेपी बंसल कहते हैं, ‘सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग जागरूक नहीं हैं. उन्हें अपने अधिकारों के बारे में जानकारी नहीं है. कई बार लोग कहते हैं कि पैसों की बात नहीं लेकिन अदालतों के चक्कर में कौन फंसे. अब जब लोग जागरूक नहीं हैं तो मामले कम संख्या में दायर होते हैं. ऐसे में सरकारें भी उदासीन हैं. उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा उसके एजेंडे में खास जगह नहीं पा रही है. अब दिल्ली के जिला उपभोक्ता फोरम में कई बार स्टाफ की समस्या रहती है. क्लर्क वगैरह बहुत कम हैं. संसाधन बहुत सीमित हैं. कई बार फोरम के अध्यक्ष का पद कई महीनों तक खाली रहता है. ऐसे में सुनवाई समय पर पूरी नहीं हो पाती है. यह दिल्ली का हाल है. बाकी बाहर तो हाल और भी बुरा है. छोटे-छोटे जिलों में तो महीनों स्टाफ ही नहीं रहता है. कुल मिलाकर मामला जागरूकता है. हम ही जागरूक नहीं है तो सरकार और ज्यादा उदासीन है.’

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दरअसल बढ़ते बाजारवाद के दौर में उपभोक्ता संस्कृति तो देखने को मिल रही है, लेकिन अब भी जागरूक उपभोक्ताओं की कमी है. आज हर व्यक्ति उपभोक्ता है, चाहे उसका व्यवसाय, आयु, लिंग, समुदाय तथा धार्मिक विचारधारा कोई भी हो. चाहे वह कोई वस्तु खरीद रहा हो या फिर किसी सेवा को प्राप्त कर रहा हो. वस्तुओं में मिलावट और निम्न गुणवत्ता की वजह से जहां उन्हें परेशानी होती है, वहीं सेवाओं में व्यवधान या पर्याप्त सेवा न मिलने से भी उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.

हालांकि भारत सरकार कहती है कि जब आप पूरी कीमत देते हैं तो आपको गुणवत्ता भी पूरी मिलनी चाहिए यह सुनिश्चित करने के लिए कानून है, लेकिन इसके बावजूद उपभोक्ताओं से पूरी कीमत वसूलने के बाद उन्हें सही वस्तुएं और वाजिब सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं. यह परेशानी की बात है.    

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 11, Dated 15 June 2016)

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