पर्दे के हीरो धर्मेंद्र असली जिंदगी के बड़े नायक हैं

0
224

24600-dharmendra-singh-deol.jpg

बचपन से ही मैं सदाबहार अभिनेता धर्मेंद्र की ओर आकर्षित रहा. जब मैंने फिल्म देखनी शुरू की थी तब मेरी उम्र कोई आठ-नौ साल की रही होगी पर सचेत मन की पहली फिल्म ‘सत्यकाम’ थी जिसने मेरे मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी. पिता आदिम जाति कल्याण विभाग में काम करते थे. भोपाल में पुराना सचिवालय स्थित उनके ऑफिस में 16 एमएम का एक प्रोजेक्टर हुआ करता था जिसे रमेश चाचा ऑपरेट किया करते थे. हर शनिवार को वे वहां फिल्में दिखाते थे. वहीं ‘सत्यकाम’ देखी. फिल्म का नायक मन में बहुत गहरे उतर गया. आकर्षण इस कदर बढ़ता गया कि युवा होते-होते उनकी हर फिल्म देखना अनिवार्यता-सी बात बन गई थी.

फिल्मों पर लिखते-लिखते मैं मुंबई के संपर्क में आ गया. कलाकार का पीआर का काम देखनेवाले टेलीफोन पर भी इंटरव्यू करा दिया करते थे. मैंने मुंबई जाकर कलाकारों से मिलना-जुलना शुरू कर दिया था. शुरूआती दौर में सितारों से मिलना बहुत रोमांचित करता लेकिन फिर धीरे-धीरे सब सहज होता गया.

धर्मेंद्र से मुलाकात हो जाए, इसके लिए मैं प्रयासरत रहा. लेकिन उनसे मुलाकात इतना आसान कहां था? धर्मेंद्र पर लिखी गई टिप्पणी कहीं किसी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित होती तो मैं उसकी कतरने उनके पते पर भिजवा देता. ऐसा करते हुए मेरे मन के किसी कोने में यह बात जरूर होती कि कभी उनका जवाब जरूर आएगा. पर ऐसा कभी नहीं हुआ. उनकी एक्शन फिल्मों का असर मुझपर कई-कई दिनों तक बना रहता. गंजे खलनायक शेट्टी से उनकी मुठभेड़ बहुत रोमांचित करती थी. उनकी फिल्में आंखें, फागुन, आदमी और इंसान, इज्जत, अनुपमा, बंदिनी, नीला आकाश, चुपके-चुपके, गुड्डी से लेकर गुलामी तक जाने कितनी बार देखी कि वे आज भी अपने दिल की हार्ड डिस्क में सुरक्षित हैं.

‘गजक खाकर उन्होंने कहा बहुत स्वादिष्ट है. जब भी आना मेरे लिए लेकर आना. इतने बड़े इंसान का ऐसा कहना हमें सजल कर गया’

खैर, कई सालों के जतन के बाद सिनेमा से ही जुड़े एक मित्र ने बड़ी मिन्नतों के बाद जन्मदिन के मौके पर उनसे मेरी बात कराई. फोन पर मैंने जैसे ही अपना नाम कहा तो उन्होंने कहा कि कैसे हो सुनील? मेरे गले में शब्द फंस से गए. मैंने हकबकाते हुए उन्हें बधाई दी. यह सिलसिला चल निकला.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here