बेमेल ब्याह और तलाक के हजार बहाने

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कुछ दिन पहले ही भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में तलब किया गया था. सूत्र बताते हैं कि अमित शाह से संघ प्रमुख ने दो टूक शब्दों में साफ कर दिया कि कश्मीर में इस तरह से गठबंधन नहीं चल सकता. भाजपा को सरकार से बाहर निकलने के बारे में सोचना शुरू करना चाहिए. हालांकि संघ के हालिया बयान इससे विपरीत आए हैं. संघ ने भाजपा को सार्वजनिक तौर पर फिलहाल ब्रीथिंग स्पेस दे दिया है. संघ के अनुसार भाजपा-पीडीपी गठबंधन एक प्रयोग है और इसे और समय दिया जाना चाहिए.

संघ प्रमुख से मुलाकात के बाद अमित शाह ने पार्टी के संसदीय बोर्ड के सामने संघ प्रमुख की राय को रखा. अंत में आम राय यह बनी कि अभी सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया जाना चाहिए. वक्ती तौर पर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी को सख्त लहजे में चेताकर आगे बढ़ना ठीक रहेगा. इशारों में संदेश दे दिया जाए कि आगे कोई भी गड़बड़ी हुई तो भाजपा गठबंधन से बाहर निकल जाएगी. यह सारी कवायद राज्य सरकार द्वारा अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की रिहाई के बाद हुई है. शाह ने पार्टी के निर्णय से जम्मू कश्मीर सरकार में उपमुख्यमंत्री निर्मल सिंह को भी अवगत करा दिया.

पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘प्रदेश भाजपा को सूचित किया जा चुका है कि उसे पीडीपी की हरकतों से रक्षात्मक मुद्रा अख्तियार करने की जरूरत नहीं है. आगे पीडीपी की तरफ से अगर कोई गड़बड़ी हुई तो पार्टी समर्थन वापस लेने में हिचकेगी नहीं.’ भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने अपनी नाराजगी से पीडीपी नेतृत्व को भी अवगत करा दिया है.

दोनों के संबंधों पर ग्रहण लगने की शुरुआत तो नई सरकार के शपथ ग्रहण के साथ ही शुरू हो गई थी. मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के घंटेभर के भीतर ही प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने बयान दिया, ‘जम्मू कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनाव के लिए पाकिस्तान, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और आतंकी संगठनों को भी श्रेय दिया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने चुनाव के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया.’

मुफ्ती ने दावा किया कि उन्होंने इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी साफ कहा था कि अगर सीमा पार से अलगाववादी नेता हरकत करते तो ऐसा चुनाव नहीं हो पाता. हुर्रियत, पाक और आतंकियों ने ही राज्य में चुनाव के लिए बेहतर माहौल बनाया. अभी मुफ्ती के इस बयान पर जम्मू से लेकर पूरे देश में बवाल मचा ही था कि अगले दिन पीडीपी के सात विधायकों ने केंद्र सरकार से एक पत्र लिखकर मांग की कि संसद पर हमले में फांसी की सजा पा चुके अफजल गुरु के अंतिम अवशेष केंद्र सरकार उसके परिजन को सौंपे. अपने पत्र में इन विधायकों ने कहा कि अफजल को फांसी देकर न्याय का मजाक उड़ाया गया था. इन विधायकों और पूर्व में पीडीपी की भी यह शिकायत रही है कि अफजल गुरु को 28वें नंबर से उठाकर सीधे फांसी पर चढ़ा दिया गया. जबकी अफजल ने राष्ट्रपति के यहां दया याचिका दायर कर रखी थी.

पीडीपी विधायकों की इस मांग पर राजनीतिक बवाल मचना ही था. अभी इस विषय पर कोई दूसरी पार्टी विरोध करती, उससे पहले ही प्रदेश भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसकी आलोचना करते हुए जम्मू में धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया. प्रदेश सरकार में भाजपा के मंत्रियों के साथ ही प्रदेश भाजपा के नेता-कार्यकर्ताओं ने भी पीडीपी विधायकों की इस मांग पर अपनी तीखी

नाराजगी जताई.

भाजपा अपने गठबंधन की सहयोगी के खिलाफ नाराजगी का इजहार कर ही रही थी कि पीडीपी के एक और फैसले ने दोनों के संबंधों में तनाव को नया आयाम दे दिया. खबर आई कि जम्मू कश्मीर की मुफ्ती सईद सरकार ने एक आदेश जारीकर अलगाववादी नेता मसर्रत आलम को रिहा कर दिया. आलम को साल 2010 में कश्मीर घाटी में हुए हिंसक प्रदर्शन और पथरावों का मास्टरमाइंड बताया जाता है. इसके अलावा भी उसके ऊपर कई मामलों में एफआईआर दर्ज है. पिछले साढ़े चार वर्षों से वो जेल में बंद था. मुफ्ती सरकार ने मसर्रत की रिहाई को अपनी उस नीति का हिस्सा बताया जिसके तहत वो ऐसे राजनीतिक बंदियों को जेल से बाहर निकालना चाहती है जिनके ऊपर कोई आपराधिक मामला न दर्ज हो.

मुफ्ती सरकार के मसर्रत को रिहा करने के फैसले के सामने आते ही यह मामला जंगल की आग की तरह फैल गया. जम्मू कश्मीर सरकार में साझीदार भाजपा ने मसर्रत की रिहाई के फैसले पर हैरानी जताई. उसका कहना था कि मुफ्ती सरकार ने उससे इस बारे में कोई सलाह मशविरा तक नहीं किया और न ही उन्हें कोई सूचना दी. देखते-देखते मर्सरत की रिहाई बड़ा मुद्दा बन गई. देश के अलग-अलग हिस्साें में मुफ्ती सरकार के इस निर्णय और खासकर भाजपा की चुप्पी की आलोचना होने लगी. भाजपा विरोधी पार्टियों ने कहना शुरू किया कि वो खुद को राष्ट्रवादी बताती है लेकिन उसी के राज में आतंकवादियों को आंख मूंदकर रिहा किया जा रहा है. लोकसभा और राज्यसभा में भी कांग्रेस समेत अन्य विरोधी दलों ने नरेंद्र मोदी को घेरते हुए इस मसले पर बयान देने की मांग रखी.

जवाब में, मोदी ने लोकसभा में इस विषय पर तल्ख बयान दिया. उनके मुताबिक सरकार बनने के बाद जम्मू कश्मीर में जो गतिविधियां हो रही हैं वे न तो भारत सरकार से सलाह करके हो रही हैं, न ही भारत सरकार की जानकारी में हो रही हैं. सदन में और देश में जो आक्रोश है, मैं भी उस आक्रोश का हिस्सा हूं. यह देश अलगाववाद के मुद्दे पर दलबंदी के आधार पर न पहले कभी सोचता था, न अब सोचता है, न आगे कभी सोचेगा. भाजपा वहां सरकार में हिस्सेदार है, आप उसकी भरपूर आलोचना करें, होनी भी चाहिए लेकिन ऐसा करते

समय देश की एकता के संबंध में यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि हमारे भिन्न स्वर हैं. ऐसा संदेश न देश में, न दुनिया में और न कश्मीर में जाना चाहिए. यह पूछा जा रहा है कि मोदी जी चुप क्यों हैं, ऐसा कोई कारण नहीं है कि हमें इस मुद्दे पर चुप रहना पड़े.

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