पहले वीजा देना शुरू करें, एकीकरण बाद की बात है

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भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के एकीकरण से पहले हमें आज के हालात को देखना होगा. हमने दक्षिण एशियाई देशों का एक संगठन दक्षेस बनाया है. पहले हमें उसे ठीक ढंग से काम करने देना होगा. आज की तारीख में तो यही संगठन ठीक ढंग से काम नहीं कर पा रहा है. हम इस तरह की बात शुरू करने के लिए अक्सर यूरोपीय संघ का उदाहरण देते हैं, लेकिन अगर हम यूरोपीय संघ के गठन की प्रक्रिया को देखंे तो इस संगठन में शामिल देशों ने पहले आर्थिक सहयोग शुरू किया. फिर अपने दूसरे मसलों को हल किया. यह प्रक्रिया सतत रूप से चलती रही फिर एक ऐसा संघ बनकर तैयार हुआ.

अब यूरोपीय संघ जैसा कोई यूनियन बनाने के लिए हमें पहले हमारे यहां के हालात देखने होगे. हम दोनों-तीनों देश एक दूसरे के निवासियों को वीजा नहीं देते हैं. एक-दूसरे के साथ ठीक तरीके से व्यापार नहीं करते हैं. अब लोग एक-दूसरे देश के लोगों को जानेंगे-समझेंगे नहीं तो मुझे नहीं लगता है कि आगे की बात करने का कोई फायदा है. हमें तो सबसे पहले यही करना होगा कि लड़ना-झगड़ना बंद करके जितने भी दक्षेस के देश हैं उनके साथ व्यापार शुरू करें. एक-दूसरे देश में आवाजाही को सुगम बनाएं. दक्षेस का जो डेवलपमेंट फंड है उसे बढ़ाएं और सही तरीके से खर्च करें. एक दक्षेस विश्वविद्यालय बनाया गया है. वहां इन देशों के छात्रों की गतिविधियों में सक्रियता लाएं.

अब एकीकरण की पैरवी भारत का दक्षिणपंथी धड़ा करता है लेकिन उसकी विश्वसनीयता बात करने लायक भी नहीं है. यही वह धड़ा है जो भारत-पाकिस्तान की दोस्ती की मुखालफत करता रहता है. वह हमेशा ऐसी बात करता है जिससे दोनों देशों के मध्य कटुता बढ़े. जब से यह नई सरकार आई है तब से पाकिस्तान के लोगों को वीजा नहीं मिलने समेत तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. अब अगर यह धड़ा एकीकरण जैसी बात कर रहा है तो यह कैसे संभव होगा और किस आधार पर होगा यह मेरी समझ से परे है. आखिर ये लोग हमारे संवाद के जो माध्यम हैं या जो व्यवस्था पहले से चली आ रही है उसे नहीं चलने दे रहे हैं तो एकीकरण की बात क्या करेंगे.

एकीकरण की बात करने के बजाय हमें पहले यूरोपीय संघ की तरह का संघ बनाना होगा. दक्षेस के रूप में हमारे पास एक ऐसा मजबूत संगठन भी है. यह संगठन पूरे दक्षिण एशिया को एक ताकत के रूप में स्थापित करेगा

ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में इस तरह की चर्चाएं नहीं चलती हैं. पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के एक होने के बाद ऐसी चर्चाएं हर जगह होती हैं. पर मेरा और पाकिस्तान के एक बड़े तबके का मानना है कि दक्षेस जैसे संघ के ठीक से काम न करने के लिए भी भारत और पाकिस्तान दोनों मुल्क जिम्मेदार हैं. क्योंकि यही लोग अपने आपसी झगड़ों का निपटारा नहीं कर पाते हैं जिसकी छाप अक्सर दक्षेस संघ पर पड़ती है. इस संघ में यही दो बड़ी शक्तियां हैं. बाकी देश छोटे-छोटे हैं. वे इन दोनों देशों को देखते रह जाते हैं. मेरा मानना है कि जब तक ये दोनों देश अपने झगड़े नहीं सुलझाएंगे, दोनों देशों के लोग एक-दूसरे के यहां आएंगे-जाएंगे नहीं तब तक इस मसले का हल निकल पाना मुश्किल है. हमारे साथ दिक्कत यह है कि हम संबंधों को सुधारने की दिशा में दो कदम आगे बढ़ते हैं तो चार कदम पीछे आ जाते हैं. अब 2012 में हमने तय किया था कि 65 साल से अधिक उम्र के लोगों को हम ऑन अराइवल वीजा की सुविधा देंगे, लेकिन चार साल बीत जाने के बावजूद हम इस तरह की सुविधा नहीं शुरू कर पा रहे हैं. ऐसा वीजा देने से भारत ने ही इनकार कर दिया. यह तो सिर्फ एक बात है. ऐसी तमाम और चीजें हैं. हमने तमाम व्यापारिक समझौते किए थे लेकिन इसके बाद हमारे बीच कितना व्यापार बढ़ा? ऐसा भी नहीं हो पा रहा है कि दोनों देशों के मध्य लोगों के आवागमन में बढ़ोतरी हो गई है.

एकीकरण की बात करने के बजाय हमें पहले यूरोपीय संघ की तरह का संघ बनाना होगा. दक्षेस के रूप में हमारे पास एक ऐसा मजबूत संगठन भी है. यह संगठन पूरे दक्षिण एशिया को एक ताकत के रूप में स्थापित करेगा. पूरे दक्षिण एशिया में तमाम परिवार बिछड़े पड़े हैं. भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में एक-दूसरे के रिश्तेदार रहते हैं. अब अगर सब साथ में आएंगे तो इसमें सबका भला होगा. हमें इस दिशा में गंभीरता से सोचने की जरूरत भी है.

(लेखक पाकिस्तान इंडिया पीपुल्स फोरम फॉर पीस ऐंड डेमोक्रेेसी के संस्थापक सदस्य हैं)

(अमित सिंह से बातचीत पर आधारित)