‘जुबानी तलाक एक गलत प्रथा है, महिलाओं के सम्मान के लिए इसे खत्म करना जरूरी है’

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 देश में कई दशक से धर्म के नाम पर वोट बैंक की राजनीति हो रही है. चुनाव कोई भी हो ‘हम मुस्लिमों के लिए ये कर देंगे, वो कर देंगे’ कहकर उनका सच्चा हितैषी बनने का खेल शुरू हो जाता है. इस शोर में मुस्लिमों की असली परेशानियां सुनने वाला कोई नहीं मिलता. काबिले गौर पहलू ये है कि मुस्लिमों के हित-अहित की बात करते सियासी रहनुमा पुरुषों को ही संबोधित करते नजर आते हैं, मुस्लिम महिलाओं द्वारा झेली जा रही परेशानियों-मुश्किलों पर कभी कोई बात नहीं होती. देश में औरतें चाहे किसी भी धर्म, जाति या समुदाय से आती हों, उनके सामने कमोबेश एक-सी दिक्कतें पेश आती हैं. पर बात जब मुस्लिम महिलाओं की सामाजिक स्थिति की होती है तब चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं.

 देश में मुस्लिमों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर जानने के लिए 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा गठित ‘सच्चर कमेटी’ की रिपोर्ट आंखें खोल देने वाली साबित हुई. मुस्लिमों में साक्षरता का स्तर 59.15 प्रतिशत था जो देश के साक्षरता स्तर (65.1 प्रतिशत, 2001 जनगणना आंकड़ों के अनुसार) से कम था. देश के बड़े कॉलेजों में मुस्लिम विद्यार्थियों का स्नातक और परास्नातक में औसत क्रमशः 04 और 02 प्रतिशत था. ग्रामीण क्षेत्रों में 25 फीसदी और शहरी क्षेत्रों में मात्र 18 फीसदी मुस्लिम महिलाएं काम करती हैं, जिसके फलस्वरूप उन्हें थोड़ी-बहुत आर्थिक स्वतंत्रता मिली हुई है. रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिमों में महिलाओं की स्थिति ज्यादा खराब है.

 हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अनिल दवे और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की बेंच ने भी नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी से सवाल किया था कि क्या मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव को भारतीय संविधान में दिए गए मूलभूत अधिकारों के अंतर्गत आने वाले अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (धर्म, जाति, लिंग के आधार पर किसी नागरिक से कोई भेदभाव न किया जाए) और अनुच्छेद 21 (जीवन और निजता के संरक्षण का अधिकार) का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए? देश में मुस्लिम महिलाओं की आवाज उठाने वाली संस्था ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ (बीएमएमए) का मानना है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाला भेदभाव इन मूलभूत अधिकारों का सीधा हनन है. 2007 में इस संस्था का गठन ज़किया सोमान और नूरजहां सफिया नियाज़ ने किया था. बीते नवंबर में बीएमएमए ने दस राज्यों में 4,710 मुस्लिम महिलाओं के बीच किए सर्वे के आधार पर एक रिपोर्ट ‘नो मोर तलाक तलाक तलाक’ प्रकाशित की.

 ये रिपोर्ट दावा करती है कि  92.1 प्रतिशत महिलाओं ने जुबानी या इकतरफा तलाक को गैरकानूनी घोषित करने की मांग की है. वहीं 91.7 फीसदी महिलाएं बहुविवाह के खिलाफ हैं. 83.3 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए मुस्लिम फैमिली लॉ को कोडीफाई (विधिसम्मत) करने की जरूरत है. इसके बाद संस्था द्वारा प्रधानमंत्री को एक पत्र भी भेजा गया जिसमें बीएमएमए द्वारा किए गए सर्वे के आधार पर मुस्लिम महिलाओं की कई मांगें रखी गईं.

बीएमएमए की स्थापना के पीछे क्या उद्देश्य था?

बीएमएमए की स्थापना के पहले से ही मैं और ज़किया मुस्लिम महिलाओं के लिए काम कर रहे हैं. हमें काम करते हुए लगभग एक दशक हो चुका है. आजादी के इतने समय बाद भी हमारा समुदाय काफी पिछड़ा हुआ है. विकास की बातें सब करते हैं पर कोई भी लीडर जमीनी मुद्दे नहीं उठाता. सरकारों ने भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. जरूरी मुद्दों पर बात करने के लिए कोई नहीं है. उस पर महिलाओं के मुद्दे तो वैसे ही सामने नहीं आ पाते. लीडरशिप में एक खालीपन है, जिसे हमने भरने का फैसला किया, आगे बढ़कर अपने लिए खुद आवाज उठाने का फैसला किया, ताकि महिलाएं आगे आएं, उन्हें अपनी समस्याएं बताने के लिए एक मंच मिले. हम अभी पांच राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा में काम कर रहे हैं और हमारी प्राथमिकता में शिक्षा, रोजगार, कानूनी सुधार और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे हैं.

अब तक के काम का अनुभव कैसा रहा?

अब तक हमारा अधिकतर काम कानूनी मुद्दों से जुड़ा हुआ ही रहा है. हमारे पास जो मामले आए उनमें अधिकतर घरेलू हिंसा और जुबानी तलाक के थे. लगातार महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है. हमने न जाने कितने मामले देखे जहां लंबे समय तक घरेलू हिंसा हुई, झगड़े होते रहे, फिर एक दिन पति ने तलाक तलाक तलाक कह दिया और सब खत्म! न मेहर वापस दी गई न भरण-पोषण के लिए गुजारा भत्ता. कई ऐसे भी मामले थे जहां पति ने दो शादियां की थीं और दोनों ही बीवियों को एक शादी के बारे में नहीं पता था. सोचिए 45-50 साल की एक महिला को पति यूं ही छोड़ देता है, वो शिक्षित नहीं है, कोई रास्ता नहीं है जिससे अपना पेट पाल सके, उसका क्या होगा? कई मामले ऐसे भी थे जहां पति ने किसी रिश्तेदार या काजी के जरिये तलाक कहलवा दिया. कहीं ईमेल पर तो कहीं वाट्सएप पर तलाक दे दिया गया. हमने जो रिपोर्ट जारी की है उसमें देखिए, कहीं तलाक के बाद भत्ते की बात ही नहीं है, कुछ तलाक बीवी की गैर-मौजूदगी में हुए. कहीं बीवी को ‘हलाला’ के लिए कहा गया. (हलाला- अगर शौहर तलाक दे दे और फिर उसी औरत से निकाह करना चाहे तो वह औरत उसी सूरत में निकाह कर सकती है जब दूसरा निकाह करके दूसरे पुरुष से संबंध स्थापित कर चुकी हो) जुबानी तलाक एक गलत प्रथा है और महिलाओं के सम्मान के लिए इसे खत्म करना जरूरी है. आप औरतों को कोई वस्तु नहीं समझ सकते. सोचिए ये सब 21वीं सदी में हो रहा है. यहां एक विधि सम्मत कानून की जरूरत है. जो कानून हैं उनमें सुधारों की जरूरत है. हम चाहते हैं महिलाएं संगठित हों, वे साथ में जुड़ें, सरकार से जुड़ें और अपने हक के लिए खड़ी हों.

आपकी सरकार से क्या मांगें हैं?

सबसे पहले तो हम चाहते हैं कि एक कोडीफाइड मुस्लिम फैमिली लॉ बनाया जाए. सभी समुदाय चाहे हिंदू हों या ईसाई, सबका एक कोडीफाइड कानून है जो शादी और उससे जुड़े मुद्दों के लिए नियम बताता है. मुस्लिम समुदाय में ऐसा कुछ नहीं है. कुरान के नाम पर बहुविवाह, जुबानी तलाक जैसी कुप्रथाओं को प्रश्रय दिया जा रहा है. इन समस्याओं का हल ढूंढना ही होगा.

कुरान के नाम पर बहुविवाह, जुबानी तलाक जैसी कुप्रथाओं को प्रश्रय दिया जा रहा है. कुरान के गलत अर्थ निकाले गए हैं. मुस्लिम समुदाय में धर्म के नाम पर डरा-धमकाकर पितृसत्ता को और बढ़ावा दिया गया

कुछ साल पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में  ‘इमराना रेप मामला’ सामने आया था जहां ससुर ने उससे बलात्कार किया और पंचायत में पीडि़ता को ससुर के साथ बीवी के बतौर रहने को कहा गया. दार-उल-उलूम ने भी कुरान का हवाला देते हुए इस फैसले को सही बताया था. इस पर क्या कहेंगी?

यही तो असली समस्या है. कुरान के नाम पर, धर्म के नाम पर डरा-धमका कर पितृसत्ता को और बढ़ावा दिया गया. कानूनी मसलों पर कुरान में ऐसा कुछ नहीं लिखा है. कुरान के गलत अर्थ निकाले गए हैं, उसमें चालाकी से हेर-फेर किया गया. दरअसल जिस भाषा में कुरान लिखी गई उसे लोग नहीं जानते थे तो इसका तर्जुमा किया गया और अपने हिसाब से अर्थ निकाले गए. हमने कुरान पढ़ी है और ये काफी प्रगतिशील है. उसमें कहीं बहुविवाह, जुबानी तलाक या हलाला की बात नहीं कही गई है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और इस तरह के संगठनों के बारे में क्या कहना है?

हम इन्हें नहीं मानते. इन्होंने पितृसत्ता को संस्थागत बना दिया है बस! और यह कोई सरकारी संस्था नहीं है. जिस तरह एनजीओ रजिस्टर होते हैं वैसे ही ये भी एक रजिस्टर्ड बोर्ड ही है. उन्हें कोई कानूनी अधिकार नहीं मिले हुए हैं. और फिर जो खुद को हमारे रहनुमा बता रहे हैं उन्होंने हमारे लिए कुछ किया क्यों नहीं. जो औरतों के साथ हो रही नाइंसाफी पर कुछ नहीं कर रहे उन्हें क्यों मानें? ये समुदाय की आधी आबादी की परेशानियों को नजरअंदाज कर रहे हैं. सरकार ने भी इन्हें गैर-जरूरी अहमियत दे रखी है.

एक तबके का मानना है कि वर्तमान सरकार मुस्लिम और महिला विरोधी है. आपका क्या कहना है?

सरकार किसी भी पार्टी की हो हमें इससे खास फर्क नहीं पड़ता. अगर वे जनता द्वारा चुनकर आई सरकार है तो उनका सभी नागरिकों के प्रति फर्ज बनता है. कोई भी जनतांत्रिक सरकार हो, उसे सभी नागरिकों की परेशानियों को सुनना होगा, उनका समाधान करना होगा, उनसे जुड़े मुद्दों को जानना होगा. हम बस ये चाहते हैं कि मुस्लिम महिलाओं को भी उतना हक मिले जितना बाकी नागरिकों को मिला है. वरना बताइए ये औरतें कहां जाएंगी? वैसे अब तक तो सभी सरकारें मुस्लिम महिलाओं के मुद्दों को लेकर समान रूप से ही उदासीन रही हैं. मनमोहन सरकार के समय सच्चर कमेटी का गठन हुआ पर उस कमेटी के पैनल में एक भी महिला नहीं थी. खुद समझ लीजिए कि मुस्लिम महिलाओं से जुड़े मुद्दों को किस हद तक नजरअंदाज किया जाता है.

मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई 1985 में शाहबानो के मामले से शुरू हुई थी. इंदौर की 62 साल की शाहबानो ने तलाक के बाद गुजारा-भत्ता न देने पर अपने पति के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 125 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर किया. कोर्ट ने उनके हक में फैसला दिया पर मुस्लिमों के एक तबके में इसका कड़ा विरोध हुआ, जिसके चलते तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए मुस्लिम विमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डाइवोर्स एक्ट, 1986 पारित किया, जिसमें मुस्लिम महिलाओं के अपने तलाकशुदा पति से गुजारा-भत्ता पाने के अधिकार को नकार दिया गया. मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को इस मामले ने कैसे प्रभावित किया?

जो होना था वो हो गया है पर जो हुआ वो सही नहीं था. कोर्ट के फैसले को बदलकर सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकारों की लड़ाई में और पीछे धकेल दिया. उन्हें सीआरपीसी से ही निकाल दिया गया. अगर उस फैसले के लिए दी गई दलीलें पढ़ें तो सिर्फ हंसी आएगी.

देश की राजनीति में बार-बार मुस्लिम अपीजमेंट (मुस्लिम तुष्टिकरण) की बात होती है.

तुष्टिकरण सिर्फ धार्मिक नेताओं का हुआ है. अगर जमीन पर कुछ काम हुआ है तो वे बताएं. सच्चर कमेटी में आप मुस्लिमों का आर्थिक और शिक्षा का स्तर देख चुके हैं फिर भी क्या हालात सुधरे हैं. गरीबी का वही हाल है. न शिक्षा है न रोजगार.

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वक्फ बोर्ड पर क्या कहेंगी?

उनके भी हाल बुरे हैं. वहां कौन काम कर रहा है! हर रमजान में जकात में इतनी बड़ी रकम आती है, उससे क्या होता है? समुदाय के धार्मिक नेताओं को लगता है कि विकास हो रहा है पर उन्होंने सामाजिक विकास के लिए कुछ नहीं किया है. इसे आप टोटल फेलियर ऑफ लीडरशिप कह सकते हैं.

उत्तर प्रदेश के एक बड़े मुस्लिम नेता ने मुस्लिम विद्यार्थियों के लिए यूनिवर्सिटी खुलवाई है, जिसे अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी का दर्जा भी दिया गया है. अल्पसंख्यकों के लिए विशेष यूनिवर्सिटी की भूमिका को किस तरह देखती हैं?

शिक्षा बहुत जरूरी है पर ये देखना होगा कि जरूरतमंदों को यूनिवर्सिटी तक पहुंचने के मौके मिलें, पढ़कर निकलने वाले युवाओं को आगे बढ़ने के अवसर मिलें. कई बार मुस्लिमों को अरबी-फारसी जैसी भाषाएं सिखाने पर भी बहस होती है पर कोई दबाव नहीं होना चाहिए कि आप मुस्लिम हैं तो कोई भाषा विशेष जानना जरूरी है. जिस भाषा से रोजगार मिले वो सीखना जरूरी है. मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र में काम करते हैं तो मराठी भी आनी चाहिए. राज्यों की भाषाएं आनी चाहिए. अंग्रेजी जानना भी जरूरी है. तो सीधा हिसाब है जो भाषा आपके रोजगार में मददगार हो, उसे सीखना ज्यादा जरूरी है. नेताओं को लोगों को हुनरमंद बनाने की ओर काम करना चाहिए, जिससे नौजवान अपने पैरों पर खड़े हो सकें, दो जून की रोटी कमा सकें, पैसा आए, उनकी गरीबी मिटे. इससे ही उनका जीवन स्तर सुधरेगा. बुनियादी मसलों को समझना ज्यादा जरूरी है.

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भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) ने प्रधानमंत्री को भेजे गए खत में कहा है कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए या तो शरियत एप्लीकेशन लॉ, 1937 और मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939 में संशोधन किए जाएं या फिर मुस्लिम पर्सनल कानूनों का एक नया स्वरूप ही लाया जाए. बीएमएमए ने मुस्लिम महिलाओं, वकीलों और धर्म के जानकारों से बातचीत और कुरान के सिद्धांतों के आधार पर मुस्लिम फैमिली लॉ का एक ड्राफ्ट तैयार किया है, जो उनके अनुसार भारतीय संविधान के अनुकूल है. इस ड्राफ्ट में दर्ज कुछ मुख्य बिंदु:

  • निकाह के लिए लड़के की न्यूनतम आयु 21 साल और लड़की की आयु 18 साल हो
  • निकाह के लिए बिना किसी धोखे या दबाव के, दोनों पक्षों की सहमति हो
  • मेहर की न्यूनतम रकम लड़के की पूरी वार्षिक आय के बराबर हो, जो निकाह के वक्त ही लड़की को देनी होगी
  • तलाक केवल तलाक-ए-अहसान को माना जाएगा जिसमें 90 दिनों की अनिवार्य मध्यस्थता जरूरी होगी
  • जुबानी और एकतरफा तलाक को गैरकानूनी घोषित किया जाए
  • शादी के बाद बीवी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी शौहर की होगी, भले ही बीवी के पास आय का अलग स्रोत हो
  • तलाक के बाद गुजारा-भत्ता ‘मुस्लिम विमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डाइवोर्स एक्ट, 1986’ के अनुसार दिया जाएगा
  • बहुविवाह गैरकानूनी हो
  • हलाला और मुताह निकाह को अपराध घोषित किया जाए
  • माता-पिता दोनों ही बच्चे के अभिभावक होंगे. तलाक की स्थिति में बच्चों की कस्टडी उनकी इच्छा और उनकी भलाई के लिए उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ विकल्प के आधार पर दी जाएगी
  • निकाह को रजिस्टर करवाना अनिवार्य हो
  • संपत्ति के मामलों में बेटियों को भी बेटों के बराबर हक दिया जाए
  • अगर तलाक, बहुविवाह या ऐसे ही किसी मसले में बनाए गए नियमों का उल्लंघन होता है, तो काजी की जवाबदेही होगी

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मदरसों में शोषण के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, इस पर क्या कहेंगी?

शोषण कहां नहीं है? हर वो जगह जहां बच्चे अभिभावकों से दूर हैं, जहां कोई देखने वाला नहीं है, वहां शोषण हो रहा है, भले ही वो मदरसा हो, आश्रम, बोर्डिंग या अनाथालय. फिर ये समझिए कि मदरसों में जाता कौन है? किसी संपन्न परिवार के बच्चे तो मदरसों में जाते नहीं हैं. वहां वे जाते हैं जो बिलकुल हाशिये पर पड़े हैं. वे इस उम्मीद में वहां जाते हैं कि दो वक्त की रोटी मिल जाएगी, सिर पर छत होगी. कुछ सीख लेंगे तो जिंदगी में कुछ कर पाएंगे. मदरसे चलाने वाले भी जानते हैं कि वो कुछ भी कर सकते हैं क्योंकि विरोध करने वाला कोई नहीं है. यहां जिम्मेदारी सरकार की बनती है. उनके पास एक पूरा सिस्टम है. ये उस पर सवाल है कि उनके रहते ये सब हो कैसे रहा है. इस सिस्टम को एक्टिव होकर काम करने की जरूरत है.

हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में, दिल्ली के जामिया मिलिया में लड़कियों पर पाबंदियां लगाई गईं, जिसके विरोध में वे खुलकर सामने आईं. इस बदलाव पर क्या कहना है?

ये बदलाव देखना सुखद है. अच्छा है लड़कियां आगे आ रही हैं. जहां भी गैर-जरूरी बंदिशें हैं, चाहे वे धार्मिक गुरुओं की लगाई गई हों, यूनिवर्सिटी प्रशासन की या सरकार की, उनके खिलाफ संगठित होकर आवाज उठाना बहुत जरूरी है.

सरकार को भेजे गए पत्र पर कोई जवाब मिला?

नहीं, अब तक सरकार की ओर से हमें कोई जवाब नहीं मिला है.

इस आंदोलन का भविष्य कैसा देखती हैं?

हर एक को आगे आकर लीडरशिप संभालनी होगी. बीएमएमए का नारा भी है, ‘जिसकी लड़ाई, उसकी अगुवाई.’ तो मुस्लिम महिलाओं को अपने हकों के लिए ये लड़ाई लड़ने आगे तो आना ही पड़ेगा.